गुल से लिपटी रही तितली

आज दादा श्री बालकवि बैरागी का 93वाँ जन्म दिन और 92वीं जन्म वर्ष-गाँठ है। उनके प्रेमी-प्रशंसक उन्हें आत्मीयता और श्रद्धा-प्रेम से याद कर रहे हैं। याद करनेवालों में कलमकार भी हैं और राजनीतिकर्मी भी। 

दादा की राजनीति आजीवन काँग्रेस-प्रतिबद्धता की रही। काँग्रेस की आन्तरिक राजनीति के चलते उन्हें जिस भी हाल में रहना पड़ा,सदैव प्रसन्नतापूर्वक रहे। कभी, कोई शिकायत नहीं की। जब भी किया, पार्टी का बखान और पार्टी के प्रति कृतज्ञता, आभार ही प्रकट किया। वे साहित्य को अपना धर्म और राजनीति को अपना कर्म कहते थे। अपने ‘धर्म और कर्म’ की शुचिता और पावनता की रक्षा और निर्वाह उन्होंने आजीवन, अत्यन्त सावधानीपूर्वक किया। अनजाने में भी दोनों का घालमेल नहीं होने दिया। अपने बारे में वे सदैव कहते थे - “मै ‘काँग्रेसी कवि’ हूँ, ‘काँग्रेस का कवि’ नहीं।” इस बारीक अन्तर को लोग समझें या नहीं, इसकी परवाह किए बिना वे अपना जीवन जीते रहे।

राजनीतिक निष्ठा और प्रतिबद्धता से जुड़ा उनका एक प्रसंग मुझे गए कई दिनों से बराबर याद आ रहा है।   

चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर घमासान मचना आम बात है। जिसे उम्मीदवारी मिल जाती है, उसके यहाँ वसन्त आ जाता है और जिसे नहीं मिलती वह खुद को पतझड़ में पाता है। पतझड़ में वसन्त लाने की ललक, लोभ-मोह में आदमी पार्टियाँ बदल लेते हैं। कल जिसे डायन कहते नहीं थकते थे उसी पार्टी को आज माँ कह कर लहालोट हो जाता है। आत्मा, नैतिकता, लोकलाज जैसे मूल्य, अवैध सन्तानों की तरह त्याग दिए जाते हैं। सत्ता की सम्भावनाओं के वीरान में अकेले रहना अब शायद ही किसी को भाता हो। निष्ठा और प्रतिबद्धता का निर्वाह अब या तो लाचारी में किया जाता है या लालच में। आत्मा और नैतिकता के आधार पर विरले ही ये मूल्य निभा रहे हैं।

1967 से 1972 तक दादा विधायक रहे। इस काल में 1969 से 1972 तक वे मध्य प्रदेश के सूचना प्रकाशन राज्य मन्त्री रहे। 1972 के विधान सभा चुनावों में उन्हें उम्मीदवारी नहीं मिली। शायद ही कोई विश्वास करे, उम्मीदवारी की भागदौड़ और प्रतियोगिता में दादा कभी नहीं रहे, कभी ‘केम्पेनिंग’ नहीं किया। उनके लिए जब भी किया, उनके नेताओं ने किया। 

सो, 1972 में जब उन्हें उम्मीदवारी नहीं मिली तो हजारों-हजार बातें चलीं। लेकिन ‘बातों’ के इस गुबार में दादा बराबर चुप्पी साधे रहे। 

इसी बीच, मार्च 1972 में, ‘दिनमान’ के एक अंक में दादा की दो कविताएँ छपीं तो काँग्रेस की आंचलिक राजनीति में एक, छोटा-मोटा तूफान सा आ गया। ‘दिनमान’ उस समय ‘राजनीतिक बजट’ का ‘प्राधिकार’ (अथॉरिटी) माना जाता था। उसमें जगह पाना ‘बड़ी’ और ‘प्रतिष्ठा’ की बात होती थी। श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सह सम्पादक थे। दादा की ये दो कविताएँ सर्वेश्वरजी की टिप्पणी सहित निम्नानुसार छपी थीं -

आक्रोश का सन्दर्भ: 

असत्य से हम व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों से जुड़े होने के कारण भी टकराते हैं और निजी स्वार्थों से जुड़े होने के कारण भी। इसलिए सत्य कहने, विरोध करने और जूझने-टकराने का मूल्य उस सन्दर्भ से ही लगाया जाता है। एक मुद्दा चुनाव का है, जिसे टिकिट नही मिलता उसे गुस्सा आता है। जिसकी जबान चलती है वह बकता-झकता है। जिसकी कलम चलती है वह उसे दौड़ाता है।  बालकवि बैरागी को चुनाव टिकिट नहीं मिला। उन्होंने एक पत्र के साथ कुछ कविताएँ भेजीं। दो यहाँ दी जा रही हैं जो उनके रचनात्मक आक्रोश को एक दिलचस्प पहलू प्रदान करती है:

“मध्यप्रदेश के सूचना प्रसारण राज्य-मन्त्री का चोला उतरने पर कविसम्मेलनों में घूम रहा हूँ। ‘जहाज का पंछी’ या ‘लौट के बुद्धू’ जो भी कहें। ‘दिनमान’ के लिए इस पत्र के साथ छोटी-छोटी कविताएँ (कुछ एडहॉक कविताएँ) भेज रहा हूँ। नीमच से भागलपुर तक के प्रवास में थर्ड स्लीपर में जो बातें मुसाफिर इन दिनों करते हैं वही प्रेरणा है। इस प्रकार की ये पहली कविताएँ हैं जो इंदिरा जी के एक अनुयायी द्वारा लिखी जा रही हैं। मैं कल, आज और कल उनके पीछे था, हूँ और रहूँगा। लोग कैसी कैसी बातें करते हैं कि क्या कुछ कहें और उत्तर दें!”

                (1)

व्यंग्य कर के कहने लगे त्यागी जी
‘कहिए बैरागी जी!
चला गया न मन्त्रीपद?
छिन गयी न विधायकी?
और करो काँग्रेस की भाँडगिरी
चापलूसी और गायिकी?
मरोड़ दी न मिसिरजी ने घेंटी
कत्ल हो गए न श्यामाचरण?
आ गए न सेठी?
अच्छे भले चल रहे थे
मरे राजनीती में
कुर्सी के लालच में
फँस गए न फजीती में-’
मैंने उनके कानों से मुँह सटाया
कन्धा दबाया
आँख मारी और समझाया
“गुरु! मौसम शानदार है
भाव ऊँचे दिख रहे हैं
‘गाय बछड़े’ वालों के
छिलके भी काजू के भाव बिक रहे हैं।
बैठा नहीं रहूँगा यूँ ही
काजू न सही मूँगफली तो हूँ ही
जुलूस में सबसे आगे हो लूँगा
गला फाड़ कर जय बोलूँगा
बड़ा भरोसा है मेरा
जवाहरलाल की बेटी में
कभी तो रहम खाएगी
और घुसेड़ देगी किसी
एडहॉक कमेटी में।”

                (2)

चुनाव लड़ने वालो!
तुम किसी भी पार्टी में क्यों न हो
ले जाओ नया नारा
इतना लगाओ, इतना लगाओ
कि फट जाए आसमान सारा
‘इन्दिरा गाँधी जिन्दाबाद
बाकी दुनिया मुर्दाबाद।’

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जैसा कि मैंने कहा ही है, इन कविताओं ने काँग्रेस की आन्तरिक राजनीति में तूफान सा ला दिया। दादा के प्रतिद्वन्द्वी काँग्रेसियों ने इन कविताओं को इन्दिरा-विरोधी और इन्दिराजी का अपमान घोषित कर, दादा को काँग्रेस से निष्कासित करने का अभियान शुरु कर दिया। कुछ ही महीनों चला यह अभियान यद्यपि अन्ततः ‘चाय की प्याली में तूफान’ की गति को ही प्राप्त हुआ लेकिन वे कुछ महीने मन्दसौर जिले की काँग्रेस की राजनीति के बड़े ही तनाव भरे महीने रहे। 

जिला काँग्रेस पर दादा के प्रतिद्वन्द्वी गुट का कब्जा था। दादा तो अपने कवि सम्मेलनी दौरों पर रहते थे। वे पत्रकारों के लिए सहज उपलब्ध नहीं रह सकते थे। संचार साधन बहुत ही सीमित थे। लेकिन प्रतिद्वन्द्वी तो, चौबीसों घण्टे, यहीं के यहीं थे। सो, स्थानीय अखबारों में प्रतिदिन एक न एक सुर्खी बनी रहती थी। दादा की अनुपस्थिति में दादा के समर्थक, प्रेमी अपनी क्षमतानुसार मोर्चा बचाने के लिए ‘युद्ध-रत’ थे। दोनों खेमों की फौज, ‘खुद राजा से अधिक राजा के प्रति वफादार’ की भावना से आमने-सामने थे। लेकिन दादा पर इस अभियान का कोई प्रभाव नजर नहीं आता था। वे जब भी आते, अपने प्रेमियों से कहते - “क्यों अपना वक्त बर्बाद कर रहे हो? कुछ नहीं होना-जाना। तुम सब यहाँ मरने-मारने पर उतारू हो। जबकि ‘ऊपरवालों’ को इस बात की हवा भी नहीं है। घर-गृहस्थी लेकर बैठे हो! बाल-बच्चे पालने हैं कि नहीं? अपना-अपना काम करो भाई!”

दादा की ऐसी बातें सुन-सुन कर दादा के समर्थक पशोपेश में पड़ जाते - ‘यहाँ हम जी-जान से भिड़े हुए हैं और दादा हैं कि हमें ही हड़का रहे हैं?’ इसी मनोदशा में, झुंझलाए कुछ प्रेमियों को दादा ने एक बार घेर लिया और ‘आर-पार’ की लड़ाई की बात करने लगे। एक ने तमक कर कहा - ‘आप बड़े नेता हो। आप तो अपना काम चला लोगे। लेकिन जब आप ही (काँग्रेस में) नहीं रहोगे तो हमारी तो दुर्गति हो जाएगी। हमें कौन बचाएगा?’

दादा को शायद इस बात का अनुमान रहा होगा। उन्होंने कहा - ‘देखो! मेरा तो जनम ही काँग्रेस में हुआ है। मैं जन्मा भी काँग्रेस में और मरूँगा भी काँग्रेस में।’ थोड़ा रुक कर बोले - ‘मुझे काँग्रेस से निकालनेवालों से मेरा नाम लेकर कहना कि हो सकता है कि वे मुझे काँग्रेस से निकाल दें। लेकिन मेरे अन्दर, मेरी आत्मा में जो काँग्रेस है, है उनकी या किसी हिम्मत कि उसे निकाल दे?’ 

दादा की बात सुनकर उनके सारे प्रेमी चुप हो गए। अपना जाना-पहचाना ठहाका लगा कर बोले - “उन्हें मेरी ओर से यह शेर सुना देना -

‘गुल से लिपटी हुई तितली को गिराओ तो जानूँ,
हवाओं, तुमने दरख्तों को गिराया होगा।’

 मुझे काँग्रेस से निकालनेवालों को कोई काम ही नहीं है। सब फुरसतिये हैं। लेकिन यार! तुम तो कामकाजी लोग हो! किसके चक्कर में अपना वक्त खराब कर रहे हो? मैंने अपने कवि सम्मेलन बन्द कर दिए क्या? कहीं, कुछ भी होना-जाना नहीं है। अपना-अपना और काँग्रेस का काम करो भैया! काँग्रेस का काम है देश बनाना। यह, बहुत बड़ा काम है। इसी में जुट जाओ।”

दादा के प्रेमियों ने भारी और बुझे मन से, अत्यधिक अनिच्छापूर्वक दादा का कहा माना। लेकिन इसके बाद हुआ वही जो दादा ने कहा था। कहीं, कुछ भी नहीं हुआ। पत्ता भी नहीं खड़का। 

यह तो 1972 की बात थी। लेकिन जमाने ने देखा - तितली अपने गुल से ही लिपटी रही। अपनी अन्तिम साँस तक।

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