नाजी संस्कारों से बचाया अपने बच्चों को



बर्लिन से बब्‍बू को
तीसरा पत्र - पहला हिस्सा


यूसाडेल, मित्रोपा मोटेल
न्यूब्रान्डेनवर्ग काउन्टी
14 सितम्बर 76
रात्रि 8.30


प्रिय बब्बू,

प्रसन्न रहो,

मेरे दो पूर्व पत्र मिल गये होंगे।

जी. डी. आर. (पूर्वी जर्मनी) के बारे में मैं बहुत कुछ लिखता जा रहा हूँ। यह मान कर लिखता हूँ कि और किसी तक यदि मेरा लेखन नहीं भी पहुँचे तो कम से कम मेरे परिजनों तक तो मेरे बहाने बहुत आसानी से पहुँच ही जाये। अस्तु।

विश्व विद्यालय जी. डी. आर. के
कल मध्याह्न भोजन के बाद हम लोगों ने रोस्तोक छोड़ दिया है। उस काउण्टी के राजनेताओं और कार्यकर्ताओं ने हमें भावभीनी विदाई दी। चलने से पूर्व सुबह का समय रोस्तोक विश्व विद्यालय में बिताया। कोई दो ढाई घण्टे हम लोग वहाँ प्रश्न और चर्चा करते रहे। विश्व विद्यालय के लिये कुछ बड़ी-बड़ी बातें लिख रहा हूँ।

1. यह विश्व विद्यालय 560 वर्ष पुराना है। संसार के विश्व विद्यालयों में इसकी बड़ी प्रतिष्ठा है। सन 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के कारण यह बन्द हो गया था। इसे वापस चालू किया गया।
2. संसार में कोई 50 देशों के विद्यार्थी इसमें पढ़ते हैं। पढ़ाई का स्तर तकनीकी और व्यावहारिक अधिक है। कला संकाय में बहुत कम विद्यार्थी हैं।
3. विश्व विद्यालय की लायब्रेरी में केवल 12 लाख पुस्तकें हैं।

4. विगत 25 वर्षों में सरकार ने इस विश्व विद्यालय के लिए मात्र 25 लाख मार्क याने सिर्फ 100 करोड़ भारतीय रुपये खर्च किए हैं। केवल चार करोड़ रुपया सालाना।

5. विश्व विद्यालय के केण्टीन में विद्यार्थियों को बीयर, ब्राण्डी, व्हिस्की, वोदका, कोनिया और अन्य शराबें सहज उपलब्ध हैं।

6. छात्राेंं की संख्या घटती बढ़ती रहती है पर होती है हजारों में।

हमारे विश्व विद्यालयों की अपनी समस्याएँ हैं और एक साम्यवादी विकसित देश और एक समाजवादी विकासशील देश की तुलना करना निरर्थक है। इस विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों ने हमें कोई विभाग या कक्षा नहीं दिखाई। कई प्रश्नों को वे टाल भी गये। कक्षा दिखाने की माँग का उत्तर यह था कि हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं उन्हें बाधा पहुँचाना उचित नहीं होगा।

सब कुछ, कितना नियोजित
बात फिर घूम फिर कर बच्चों और जवानों पर आती है। पता नहीं भारत के समाचार पत्रों में यह समाचार किस तरह स्थान बना पाया है कि विगत सप्ताह ही पूर्वी बर्लिन के एक प्रेरक और राष्ट्रीय समारोह में यहाँ की सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी के प्रथम सचिव और राष्ट्र एवं प्रशासन के सर्वेसर्वा श्री होनेकर ने माण्ट्रीयल ओलम्पिक में भाग लेने वाले पूर्वी जर्मनी के खिलाड़ी दल का वीरोचित राष्ट्रीय सम्मान किया है। यहाँ के अखबारों ने इस समारोह को मुखपृष्ठ पर आठ कालम न्यूज और आठ कालम फोटो देकर अपना कर्तव्य पूरा किया है। यशस्वी खिलाड़ियों को राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान दिये गये। दूसरों को यथोचित सम्मान प्रदान किया गया।

इस स्थिति की तैयारी इस देश ने 1945 से की है। 1945 से हिटलर के पतन के तत्काल बाद वाले मात्र चार महीनों में कोई 19000 उन शिक्षकों को स्कूलों से निकाल दिया गया जिन पर फासिस्ट और नाजी होने का या नाजियों से उनका सम्पर्क भर होने का सन्देह था। प्रमाण की बात नहीं, केवल सन्देह भर लिख रहा हूँ मैं। अपने बच्चों को कितनी सतर्कता के साथ नाजी संस्कारों से बचाया इस देश ने। भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक और प्रशिक्षित कार्यकर्ता, शिक्षा विभाग में सर्वाधिक घुसपैठ क्यों कर गये और कर रहे हैं, उसकी रणनीति यहाँ समझ में आती है। भारत के लोकतन्‍त्र की जड़ों पर चोट करने का आर. एस. एस. का तरीका वास्तव में नाजियों और फासिस्टों का तरीका है। भारत में समाजवाद और लोकतन्त्र के हामियों के आगे पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग जैसे संगठित फासिस्ट गिरोहों पर निर्ममता पूर्वक निर्णय लेकर प्रहार करना होगा। वर्ना हम अपनी दो पीढ़ियों को तबाह कर चुके हैं। तीसरी पीढ़ी को बचाने का क्षण हमारे सामने उपस्थित है। इस देश ने उन 19000 शिक्षकों के बदलेे नये प्रशिक्षित 40 हजार शिक्षकों की ताबड़तोड़ व्यवस्था की। आज यहाँ प्रत्येक 6 बच्चों के पीछे एक प्रशिक्षित शिक्षक का औसत आता है। राष्ट्र की नींव पुख्ता भरी जा रही है और उत्कृष्ट राष्ट्रीयता एवम् स्वर्णिम भविष्य के प्रति पूरा राष्ट्र आश्वस्त है। सुरक्षित तो है ही।

रातें, औरतेंं, कारें, मशीनें और कविता



बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - पाँचवाँ/अन्तिम हिस्सा


इतने बड़े व्यस्त देश में आखिर निमाण कार्य कब होते हैं? क्या ये रात-दिन होते हैं? नहीं। सड़कें और भवन निर्माण तथा शहर, सड़कों, गलियों और चौराहों की सफाई के सारे काम रात में होते हैं। दिन में कोई खट-खट नहीं। सड़कों पर दवा का छिड़काव नियमित होता है पर साँझ ढले। रात नौ बजे के बाद किसी को टेलीफोन करना भी बुरा माना जाता है। नाईट क्लब जरूर हैं पर इने-गिने। कोई विशेष नाईट लाईफ नहीं है। सप्ताह में शनिवार, रविवार की छुट्टी  होती है पर महीने में प्रत्येक व्यक्ति को 192 घण्टे काम करना ही होता है। इससे कम की गुंजाइश नहीं है। मजदूर, किसान और हर कामगार के लिये ओव्हर टाईम की व्यवस्था है पर लालच में उसको जान नहीं देने दी जाती है। राजनीतिज्ञ हमारी तरह चौबीसों घण्टे भाइयों! बहनों! नहीं करते फिरते।

सोमवार से शुक्रवार तक सप्ताह के पाँचों दिन यदि सड़कों पर देखो तो कुल दो चीजें दिखाई देंगी। कारें-कारें-कारें और फिर औरतें-औरतें-औरतें। इसका अर्थ यह नहीं है कि और कुछ दिखाई नहीं देता, पर पहिले आपको ये दो चीजें देखनी होंगी। अन्य बाद में।

खेती का सारा आधार या तो सहकारी खेती है या फिर सामूहिक खेती। समूची खेती मशीनों से होती हैं। कहीं कहीं घोड़ों से भी  होती दिखाई पड़ी। खेती की कोई मेड़ नहीं। एक खेत शुरु हुआ तो मीलों तक चला गया। फिर सौ-पचास एकड़ का जंगल आ गया। फिर खेत शुरु हो गया। उत्तरी जर्मनी में कोई पहाड़ है ही नहीं। उधर दक्षिण जी.डी. आर. में पहाड़ है पर उत्तरी जी.डी. आर. मैदानों, खेतों, छोटे टीलों और छोटे जंगलों का इलाका है। जंगल घने हैं पर बीहड़ नहीं। पेड़ों में चीड़, देवदारु मुख्य। सारे देश में लकड़ी का काम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का मिलेगा।

कारखानों में मशीन, मनुष्य की गुलाम है। मनुष्य मशीन का दास नहीं। निजी स्वामित्व समाप्त सा हो गया है। मशीन यहाँ मनुष्य की सहायता करती है। भारत में कितने ही कामों को मैं मशीन से हुआ मानता था पर यहाँ देखा कि यह सब काम मनुष्य हाथों से कर रहा है। यदि मशीनीकरण में मानव श्रम की गुंजाईश नहीं रखी गई तो मशीन मनुष्य को खा जायेगी। मार्क्स और गाँधी शायद इस बिन्दु पर एक हैं।

और उलरिच ने कविता पढ़ी
यहाँ के कवियों-लेखकों-नाटककारों का भी देश व्यापी संघ बना हुआ है और वे भी करीब-करीब ट्रेड यूनियनी तरीकों से काम करते हैं। रोस्तोक के एक 36 वर्षीय युवा कवि श्री उलरिच (Ulrich) से भोजन पर मेरी भेंट करवाई गई। कोई दो घण्टे हमारी कविताबाजी वहीं भोजन के समय चलती रही। मैंने कविता सुनाई, मिट्टी, रक्त, पसीने, श्रम, संघर्ष और भाईचारे की। जब उससे कहा गया तो उसने कविता पढ़ी। विचित्र लगी सबको। शीर्षक था ‘गलियारे में।’ अनुवाद मैंने किया। कविता इस तरह बही-

फ्लेट तुम्हारे पास भी है फ्लेट मेरे पास भी
एकान्त तुम्हारे पास भी है, एकान्त मेरे पास भी
पर ओ! मेरी प्रेमिका!
जो रोमाँच
इस गलियारे में लिये गये
आलिंगन, चुम्बन देते हैं
वह कमरों के एकान्त में कहाँ?
कमरों में हमें हाथ धोना पड़ते हैं
गलियारों में नहीं
कमरों के कसाव ढीले पड़ जाते हैं
गलियारे के सुदृढ़।
आओ न गलियारे में
कुछ करें
एक दूसरे की बाहों और आँखों में
डूब मरें।
आओ न गलियारे में
कुछ करें।।
ओ! मेरी प्रेमिका !
आओ गलियारे में।।

जापानी सिरेमिक्स की प्रदर्शनी इस देश की रोस्तोक आर्ट गेलरी में देखने के बाद ऊपर वाली कविता एक समाजवादी साम्यवादी- प्रगतिशील से सुनकर मुझे बिलकुल अनपेक्षित नहीं लगा। हाँ, दूसरे श्रोताओं को अवश्य आश्चर्य हुआ।

बर्लिन की मेरी 15-9 से 22-9 वाली यात्रा में मैं इस देश की महान् कवयत्री श्रीमती अन्ना सेगर से मिलने की जिद किये हुए हूँ। कोई 80 वर्षीया इस वन्दनीया नारी को मैं प्रणाम करना चाहता हूंँ। मुझे विश्वास है कि मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हो जाएगा।

बड़ा मन है हम सबका इस शेष यात्रा में दक्षिण का प्रसिद्ध शहर लिपजिग देखने का। लिपजिग का विश्व मेला अभी-अभी समाप्त होने को है। हमारे कार्यक्रम में दक्षिण का कोई भाग सम्मिलित है। हम लोग अपने-अपने स्तर पर प्रयत्नशील हैं पर समस्या वही है- होटलों की। कोई बिस्तर वहाँ खाली नहीं मिल रहा है हमारे मेजबानों को।

आठ दिनों के बाद आज ज्ञात हो पाया है कि हम शाकाहारियों को नियमित तौर पर मशरूम भी खिलाया जाता रहा है। क्या होता है यह मशरूम? जब पल्ले पड़ा तो माथा ठोक लिया मैंने। रोज जो सब्जी हम यहाँ मशरूम की खा रहे हैं वह होता है ‘‘कुकुरमुत्ता”- हमारे यहाँ ‘कुत्ते की छतरी।’ प्याज का दर्शन इस देश में अभी तक नहीं हो पाया। कहते हैं कि इसी साल इस देश ने भारत से कोई दो लाख रुपयों का प्याज लिया था। भगवान जाने उसे कौन खा गया?
भाई 

अपनी ही माँ को चुड़ैल कह बैठे

नए राजनीतिक मुहावरे गढ़ने, नए राजनीतिक मूल्य देने के लिए यह काल खण्ड इतिहास में दर्ज किया जाएगा। भाषा की शालीनता, आचरण की शिष्टता, संस्कारशीलता से मुक्ति पाने के लिए याद किया जाएगा। हमारी अगली पीढ़ियाँ हमें इसलिए याद करेंगी कि हम न तो सोच कर बोलते थे न ही बोलने के बाद सोचते थे। मूर्खता का जवाब मूर्खता से देने के हमारे सयानेपन पर वे गर्व करेंगी या शर्मिन्दा होंगी? 

हमारे नेताओं के बयानों से हैरत होती है। विरोधी को नंगा करने के लिए  खुद नंगे हो रहे हैं। खुद ही नहीं, अपने नेता को भी नंगा कर रहे हैं! हैरत पर हैरत यह कि नेता के नेता को भी फर्क नहीं पड़ रहा। हम राजनीति को किस मुकाम पर ले आए हैं? अगला मुकाम कौन सा तय किया है हमने?

आदमी के पास जब गिनाने को उपलब्धियाँ नहीं होती हैं तो वह अपने व्यक्तित्व का बखान शुरु कर देता है। यदि उसका व्यक्तित्व आभाहीन, प्रभावहीन हो तो वह अपने विरोधी का व्यक्तित्व हनन करता है। अपने नायक का यह आचरण देखकर उसके समर्थक ‘देव-आराधना’ की तरह अपने नायक के इस यज्ञ में अपनी आहुतियाँ देने में जुट जाते हैं। देश में आज यही हो रहा है।

मुझे सबसे पहले हतप्रभ किया था, अमित शाह ने। विरोधियों के जमावड़े की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने बड़ी अजीब उपमा दी। कहा कि जब बाढ़ आती है तो जान बचाने के लिए कुत्ते, बिल्ली, चूहे सब प्राणी एक जगह इकट्ठे हो जाते हैं। यह कहते समय वे अपने नेता और देश के प्रधान मन्त्री को ‘प्राकृतिक आपदा’ घोषित कर बैठे। यह भी भूल बैठे कि बाढ़  तो सब-कुछ ध्वस्त कर देती है। विनाश कर देती है। जान-माल की हानि होती है। निश्चय ही अमित शाह ने ऐसा तो नहीं ही कहना चाहा होगा। लेकिन वे मोदी को प्राकृतिक आपदा ही कह गए। वह भी गर्वपूर्वक।

सोशल मीडिया में इन दिनों एक सन्देश देखकर बड़ा ताज्जुब हो रहा है। मोदी का महिमा मण्डन करते हुए, मोदी के चित्र के साथ कहा जा रहा है - ‘शेर अकेला आता है। झुण्ड में तो सूअर आते हैं।’ विरोधियों को सूअर कहने से अधिक दुःख इस बात का है कि हममें तो गाली देने की भी तमीज और अकल नहीं रह गई है। किसी जमाने में देश के तमाम विरोधी दल इन्दिरा गाँधी के विरोध में एक जुट हुआ करते थे। उनमें अटलजी, आडवाणीजी भी शरीक थे। बाद में राजीव गाँधी के विरोध में भी ये सब एकजुट हुए थे। इस तुलना के मुताबिक तब इन्दिरा और राजीव शेर की दशा में थे और अटल-आडवाणी सहित तमाम नेता दूसरे पशुओं की दशा में। मोदी के महिमा मण्डन की कोशिश में क्या यही कहा जा रहा? और, शेर तो जंगल में रहता है! उसका तो शिकार किया जाता है और उसका सिर, उसकी खाल, ‘ट्राफी’ की तरह दीवालों पर प्रदर्शित की जाती है। क्या मोदी के लिए यही सब सोचा जा रहा है? 

लगभग ऐसा ही एक और अभियान चल रहा है। कहा जा रहा है कि जब सारा विपक्ष एकजुट हो जाए तो समझो कि देश का राजा ईमानदार है। इस पैमाने से तो मोदी से पहले इन्दिरा और राजीव को ईमानदारी का प्रमाण-पत्र दिया जा रहा है! जबकि उन्हें तो भ्रष्ट और बेईमान कह-कह कर तालियाँ पिटवाई जाती हैं। आखिर, सच क्या है?

अभिनेत्री सपना चौधरी के राजनीतिक फैसले की खिल्ली उड़ाते हुए उसे ‘ठुमके लगानेवाली’ कह कर खारिज किया गया। यह उपमा देते समय एक क्षण भी सुप्रसिद्ध अभिनेत्री हेमामालिनी का विचार मन में नहीं आया? फिल्मी दुनिया से परे, वे तो ख्यात नृत्यांगना भी हैं। सपना चौधरी की खिल्ली उड़ाते हुए क्या हेमामालिनी को ‘ठुमके लगानेवाली’ नहीं कह दिया? यदि ‘ठुमके लगानेवाली’ उपेक्षणीय है तो ‘अपनी ठुमकेवाली’ को क्यों बर्दाश्त किया जा रहा है? सपना चौधरी की खिल्ली उड़ाने, उसे खारिज करने की कोशिश करने में हेेमामालिनी निशाने पर नहीं आ गईं? उन्हें कैसा लगा होगा? दूसरे की माँ को डायन कहते-कहते अपनी माँ को चुड़ैल कह देना इसी को कहते हैं।

अभी-अभी प्रभात झा का वक्तव्य पढ़ कर अत्यधिक निराशा हुई। वे तो पत्रकार भी रह चुके हैं। लेकिन क्या राजनीतिक लिप्सा, पत्रकारिता की आत्मा और चेतना को ढक देती है? स्व. अर्जुनसिंह की पत्नी श्रीमती सरोज देवी और उनके बेटे, मध्य प्रदेश विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता अजयसिंह के बीच उभरे विवाद को हथियार की तरह वापरते हुए झा ने कहा कि जो व्यक्ति अपनी माँ को नहीं सम्हाल पा रहा हो वह भला प्रदेश को क्या सम्हालेगा? मैं अब भी चाह रहा हूँ कि प्रभात झा ने यह नहीं कहा हो। यह कहते हुए उन्हें अपने नेता, प्रधान मन्त्री मोदी की याद नहीं आई? मोदी ने, पवित्र अग्नि की साक्ष्य में, दोनों कुटुम्बों के सदस्यों की उपस्थिति में, भारतीय संस्कृति का निर्वाह करते हुए जसोदा बेन के साथ सात फेरे लिए थे। उन्हें अपनी अर्द्धांगिनी स्वीकार कर उनकी देखरेख, उनकी रक्षा के लिए वचनबद्ध हुए थे। लेकिन वे तो बिना कुछ कहे, बिना बताए, जसोदा बेन को छोड़ गए। अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। वे तो उन्हें पत्नी कबूल करने को भी तैयार नहीं थे। उन्होंने तो जसोदा बेन को अपनी पत्नी भी तब ही घोषित किया जब चुनाव लड़ने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया। क्या प्रभात झा को पल भर भी नहीं लगा कि जब वे अजय सिंह पर यह आरोप लगा रहे हैं तो बात मोदी तक पहुँचेगी? माँ की जिम्मेदारी निभाने में अक्षम व्यक्ति यदि प्रदेश का जिम्मा नहीं निभा सकता तो अपनी धर्म पत्नी की जिम्मेदारी से पीठ फेरनेवाला आदमी भला देश की जिम्मेदारी कैसे निभा सकेगा?

गुना के भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य भी मानो प्रभात झा से प्रतियोगिता कर रहे। उन्होंने कहा कि काँग्रेस शासन काल में पैदा हुए नेताओं को गलत नीति बनानेवाले नेता घोषित कर दिया। उन्हें पता ही नहीं होगा कि सत्रह सितम्बर 1950 को जब मोदी पैदा हुए तो देश में काँग्रेस की सरकार थी और नेहरू प्रधान मन्त्री थे। वही नेहरू जो मरने के चौपन बरस बाद भी मोदी को काम नहीं करने दे रहे। शाक्य के हिसाब से तो मोदी की नीतियाँ भी गलत हैं। 

हम कहाँ आ गए हैं? क्या अब चुनाव इन्हीं और ऐसे ही मुद्दों पर लड़ा जाएगा? क्या यही सब अब चुनावी घोषणा-पत्रों के मुद्दे बनेंगे? अधिक निराश करनेवाली बात यह कि प्रतिपक्ष भी मूर्खता का जवाब मूर्खता से दिए जा रहा है। न इनके पास बताने के लिए कोई उपलब्धि है न उनके पास कोई कार्यक्रम। मेहनत तो सब कर रहे हैं और खूब कर रहे हैं लेकिन अपनी लकीर बड़ी करने के लिए नहीं, सामनेवाले की लकीर छोटी करने के लिए। अपनी कमीज बेदाग बनाए रखने के बजाए सामनेवाले की कमीज गन्दी करने के लिए पतले गोबर में पत्थर फेंक रहे हैं जिसके छींटे इनकी खुद की कमीज पर भी गिर रहे हैं। दोनों की कमीजें गन्दी हो रही हैं। हवाओं में गालियाँ ही गालियाँ तैर रही हैं।

तकलीफ यही है। हम अपनी अगली पीढ़ियों को कैसी राजनीति देकर जा रहे हैं - शालीन, शिष्ट, सुसंस्कृत, संस्कारित राजनीति या घिनौनी, चरित्रहनन करने की, जुगुप्सा भरी राजनीति? राजनीति, सामाजिक बदलाव का प्रभावी और धारदार औजार होती है। यदि औजार ही नकली और भोथरा होगा तो बदलाव तो दूर रहा, इसका रख-रखाव ही भारी पड़ जाएगा। बोझ बन जाएगा। 

हम अपनी अगली पीढ़ियों के लिए बदबूदार बोझ छोड़ जाएँगे या ठण्डी हवा, गहरी छाया देनेवाले, हरे-भरे, खुशबूदार फलदार बाग?
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 05 जुलाई 2018

.....परीक्षा लेते-लेते मैं खुद ही फेल हो गया

मुझे थोड़ा नहीं, बहुत अजीब लगा था, दादा श्री बालकवि बैरागी के निधन के बाद अर्जुन की चुप्पी पर। उसने दादा के बारे में, उनकी आकस्मिक मृत्यु के बारे में मुझसे अब तक एक शब्द नहीं कहा। मनासा में अर्जुन का घर, मेरा दूसरा घर है। मैं जब भी मनासा जाता हूँ तो यह माना जाता है कि मैं अर्जुन से मिलकर ही गाँव में घुसा हूँ। उसके बेटे आलोक के विवाह में मनासा गया था तो अपने घर रुकने के जाय अर्जुन के घर ही रुका था। दादा को अच्छा नहीं लगा था। 



 दादा से अर्जुन के जुड़ाव को कोई और अनुभव करे न करे, मैं खूब अच्छी तरह अनुभव करता हूँ। दादा उसके आदर्श व्यक्तियों में से एक तो हैं ही, वह अपने जीवन के स्थायित्व में भी दादा को सहायक मानता है। ऐसे में उसकी चुप्पी मुझे अजीब लगनी ही थी। यह ‘अजीब लगना’, ‘बुरा लगना’ में बदलकर मुझे क्षुब्ध करने ही वाला था कि अल्हेड़वाले  सुरेश नागदा ने मुझे इस अपराध से बचा लिया।

अल्हेड़ मेरे पैतृक कस्बे मनासा से लगा हुआ, हैसियतवाला, ठाठदार गाँव है। दादा के निधन के बाद शोक प्रकट करने के लिए वह, नन्दलाल नागदा के साथ आया था। बातों ही बातों में सुरेश ने वह बात बता दी कि अर्जुन के प्रति मेरा क्षोभ, आत्म-ग्लानि में बदलने लगा।

दादा के निधनवाले दिन, 13 मई को अर्जुन सपरिवार, मनासा के पास स्थित तीर्थ भादवामाता गया हुआ था। राजस्थान में, कोटा के पास स्थित छबड़ा से उसकी बेटी नीतू अपने पति गिरीश और सवा तीन बरस के बेटे आशुतोष के साथ मायके आई हुई थी। अर्जुन का बेटा आलोक भी अपने बाल बच्चों के साथ मनासा आया हुआ था। वह मन्दसौर में, केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ाता है। अर्जुन अपने पूरे परिवार के साथ गया था। उस दिन रविवार भी था। सो सब लोग पूरी तरह फुरसतिया मनोदशा में थे। शाम का भोजन भी साथ लेकर गए थे। यात्रियों की संख्या लगभग दस थी। सो, अर्जुन ने बड़ी गाड़ी भाड़े पर ली थी। सुरेश नागदा का बेटा धरमू इस गाड़ी का चालक था। 

सुरेश ने बताया  कि शाम करीब छः-सवा छः बजे उसे वाट्स एप पर दादा के निधन की सूचना मिली थी। सूचना पाकर सुरेश को धक्का लगा। अचानक ही उसे याद आया कि धरमू ‘अर्जुन सर’ के परिवार को लेकर गया है। अर्जुन और दादा के सम्बन्धों को सुरेश भली प्रकार जानता था। सुरेश ने धरमू से कहा कि वह ‘अर्जुन सर’ से उसकी बात कराए। बेटे ने फोन ‘अर्जुन सर’ को दिया। सुरेश ने यह खबर उन्हें दी। अर्जुन को विश्वास नहीं हुआ। उसने फौरी पूछताछ की और फोन बन्द कर दिया। 

सुरेश ने कहा - ‘मेरी बात सुनकर अर्जुन सर की आवाज तो बिलकुल मरी-मरी हो गई। जैसे उनमें जान ही नहीं रही हो। मैंने अपने बेटे से कहा कि वह सर का और उनकी फेमिली का ध्यान रखे। बाद में धरमू अर्जुन सर को मनासा छोड़ कर आया तो बताया कि जब मैं अर्जुन सर से बात कर रहा था फेमिली ने भोजन के डिब्बे खोल कर परोसना शुरु कर दिया था। लेकिन मुझ से यह खबर सुनकर अर्जुन सर उदास हो गए और सब से दूर, एक ओर जाकर माथा झुकाकर खड़े रह गए। उन्होंने भोजन भी नहीं किया। घरवालों ने खूब कहा लेकिन उन्होंने भोजन नहीं किया तो नहीं ही किया। बाकी घरवालों ने भोजन किया और सब मनासा चले आए। पूरे रास्ते अर्जुन सर चुपचाप बैठे रहे। शायद उन्होंने फेमिली को भी यह खबर घर पहुँचने के बाद दी होगी।’

सुरेश की बातों ने मुझे मन की तलहटी तक भीगो दिया। मैं अर्जुन से अत्यधिक निकटता का दावा करता हूँ लेकिन मैं उस पर सन्देह कर बैठा! मैंने उसकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा और प्रतीक्षा की! मुझे तो अपने मन से उसके मन की बात समझनी चाहिए थी! लेकिन मैं उसकी परीक्षा लेने लगा और इस परीक्षा में खुद ही फेल हो गया। 

बाद में मैंने उससे पूछताछ की तो उसने सहज भाव से कहा - ‘ऐसी बातें कहने-सुनने की कहाँ होती हैं? वे तो महसूस करने की होती हैं। तू तो खुद ही परेशान था। क्या कहता? और फिर! तू तो मुझे अच्छी तरह जानता है! तुझसे क्या कहना-सुनना?’

मेरे पास उसकी बात का जवाब न तब था न अब है। सन्देह करने के अपने अपराध को, उसके सामने कबूल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। अब यह सब लिखकर अपना मन हलका कर रहा हूँ। 

मुझे माफ करना अर्जुन! मैंने अपना अविश्वास तुम पर थोपने का अपराध किया। माफ करना।
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बाँये सुरेश नागदा दाहिने नन्दलाल नागदा


ऑपेरा, हिन्दी, भीड़, किशोर और गर्भवती नारी


बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - चौथा हिस्सा

यहाँ आकर यदि कोई ऑपेरा नहीं देखे तो यात्रा अधूरी मानी जाती है। हम लोगों को सौभाग्य से विश्व प्रसिद्ध कला सर्जक ऑपेरा आराध्य जर्मन लेखक  स्व. मोजार्ट का ऑपेरा ‘दी एस्केप’ अनायास देखने को मिल गया। यहाँ का आपेरा मंच चूँकि दुरुस्त किया जा रहा है इसलिये इसका प्रदर्शन कोई 300 लोगों की उपस्थिति में एक पुराने डान्स हाल में, फर्श पर किया गया। चिली, बल्गेरिया, जर्मन और पोलैण्ड के कलाकारों ने यह भव्य संगीत कथा जब बिलकुल हमसे कोई 7 या 8 फीट दूरी पर, ठीक हमारे सामने, फर्श पर प्रस्तुत की तो हम लोग साँस रोके देखते रह गये। यह एक सुल्तान के हरम से दो बेगमों को, उनके प्रेमियों द्वारा भगाये जाने की सुखान्त नाटिका है। कोई पर्दा नहीं। कोई सेट नहीं। हाँ, कोई 70 लोगों का कर्ण मधुर आर्केस्ट्रा अवश्य था। संगीत संचालक पसीने से नहा गया था। पहिली बार मैंने किसी जर्मन सर्वांग सुन्दरी नारी को इतने पास से इस देश में देखा था। यह इस ऑपेरा की नायिका थी। यहाँ की सुप्रसिद्ध गायिका भी है। ऑपेरा का रूप हमारे ‘माच’ और खास तौर पर ‘भोई’ से बिलकुल मिलता है। सवा दो घण्टे के इस प्रदर्शन में सम्वाद तो हमारे किसी की समझ में एक अक्षर भी नहीं आया पर अभिनय इतना अद्भुत था कि कथानक क्षण-क्षण प्राणों में उतरता चला गया। दो घटनाएँ इस आपेरा की मुझे सदा याद रहेंगी। एक तो समाप्ति पर बजी तालियाँ। कोई बीस मिनिट लगातार सारा सभागार तालियों से गूँजता रहा और कलाकार अभिवादन स्वीकार करते रहे। दूसरा, इस प्रदर्शन पर यहाँ के विजिटर्स बुक में लिखी मेरी टिप्पणी। मुझसे इस प्रदर्शन पर आपेरा की संचालिका ने कुछ लिखने का आग्रह किया। मैंने एक पृष्ठ की टिप्पणी हिन्दी में लिखी। जब संचालिका और नायिका को बताया गया कि यह टिप्पणी ‘हिन्दी’ में है तो दोनों ने उस पृष्ठ को भाव विभोर होकर चूम लिया। मैं इसे हिन्दी का गौरव मानता हूँ। मेरा यह विशेषाधिकार रहा कि मेरी टिप्पणी पर एक अन्तर्राष्ट्रीय लोक-नायिका-गायिका के ओठ भावाकुलता से लगे। मैंने तब उन्हीं के सामने अपने कलम को चूम लिया था। मैं और कर भी क्या सकता था?

भीड़ का चरित्र: रैली के सम्बन्ध में
आज हम लोग एक अन्तर्राष्ट्रीय रैली के दर्शक बने। 12 सितम्बर इस पूरे देश में फासिस्ट विरोधी दिवस के तौर पर मनाया गया। बड़े सबेरे नौ बजे यह रैली एक सभा में बदल गई। दो लाख की आबादी वाले इस शहर में कल शाम ऐसी कोई चहल-पहल नहीं थी। पर सुबह के नौ बजते-बजते शहर के मुख्य चौक में कोई पचास-साठ हजार आबाल-वृद्ध नर-नारी राष्ट्र पताकाओं और बैण्डबाजों की धुनों के साथ बिलकुल संयत होकर जुट गये। तीन या चार भाषण हुए। मंच पर कोई कुर्सी नहीं थी। जमीन पर कोई बिछात नहीं। मंच पर दस-दस की पंक्ति में पचास आदमी खड़े थे। सामने हजारों की भीड़। दस बजते-बजते सारी भीड़ न जाने कहाँ समा गई। न कहीं ट्रेफिक रुका, न कोई चिल्लपों मची, न सभा स्थल पर कोई गन्दगी  हुई, न कोई अनहोनी। सारा शहर एक घण्टे भर में वापस रविवार के सन्नाटे में डूब गया। 

उसके बाद हम लोग इसी काउण्टी की सरकारी बोट में बाल्टिक सागर तक सैर करने चले गये। इस सैर में खूब कविताएँ और खूब ठहाकेबाजी हुई। यहाँ आकर मुझे अहसास हुआ कि मैं यूरोपीय स्तर की अंग्रेजी बोल भी लेता हूँ। समझ भी लेता हूँ। कविताएँ मैं हिन्दी में लिखता और गाता हूँ।  श्री क्लोफर उनका जर्मनी में अनुवाद करते हैं। जर्मनी के लिये अंग्रेजी अनुवाद श्री प्रसाद और श्री सेठ करते हैं पर मैं अब यह काम खुद भी कर लेता हूँ।

मैं बात भीड़ की कर रहा था। भीड़ को सलीके और शिस्त से रास्ते लगाने के लिए अच्छी सड़कों का होना बहुत जरूरी है। मैं लिख चुका हूँ कि यहाँ की सड़कें खूब चौड़ी और चमकीली हैं। उनसे लगे ही हुए दोनों तरफ सबसे पहिले सायकल पाथ हैं। सायकल वालों का रास्ता कोई तीन फीट चौड़ा छोड़ने के बाद फिर पैदल चलने के लिये रास्ता है। सायकलें यहाँ बहुत हैं पर भारतीय सायकलों की तरह खूबसूरत नहीं हैं। अक्सर महिलाएँ, बच्चे और किशोर सायकलों पर भागते हैं। मोटरें, कारें और सायकलें यहाँ तेज अवश्य चलती हैं पर अन्धाधुन्ध नहीं। तीन साल के बच्चे को बिना पेडल की सायकल थमा दी जाती है। वह निश्चिन्त होकर इन सड़कों की उप सड़कों पर अपनी सायकल चलाता रहता है। यह सायकल भी दो पहियों की ही होती है।
वास्तव में बच्चों पर यह देश तभी से ध्यान देना शुरू कर देता है जब वह गर्भ में होता है। गर्भवती महिलाओं की इतनी देखभाल राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी-साम्यवादी देश में ही सम्भव है। गर्भवती नारी को यह देश राष्ट्रमाता का दर्जा देता है। उसका धारित गर्भ वस्तुतः राष्ट्र होता है। इस बहस में जी. डी. आर. कभी नहीं पड़ा कि गर्भ में लड़का है या लड़की। गर्भ के एक-एक दिन का हिसाब रखा जाता है और गर्भवती को अतिरिक्त सुख, सन्तोष और समुल्लास दिया जाता है। वन्दनीय है यह आराधना।

किशोरों और जवानों को अलग से यूथ क्लब की व्यवस्था दी गई है। 18 वर्ष का नागरिक यहाँ मतदान का अधिकारी है। यह राष्ट्र की अमानत और भविष्य होता है। यूथ क्लबों पर उपन्यास लिखे जा सकते हैं। उनका अनुशासन और कठोर प्रवर्तन, निर्मम नहीं आकर्षक है। 17 बरस का होते-होते विद्यार्थी कम से कम 100 मार्क (भारतीय 400 रुपये) प्रशिक्षण वृत्ति पाने लगता है। डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट, जैसी उसकी प्रतिभा और रुझान हो, उसके लिए अवसर का हर द्वार खुला है। सम्भावनाओं का क्षितिज निस्सीम है। वह शिकायत नहीं, प्रयत्न करने पर बाध्य है। राजनीति से वह जुड़े या नहीं जुड़े, कोई प्रतिबन्ध नहीं है। उसे स्वतन्त्र चिन्तन का पूरा अवसर मिलता है। लेकिन उसके आसपास का वातावरण ही ऐसा है कि वह राजनीति, समाजवाद, प्रगति, कठोर श्रम, अनुशासन, राष्ट्रीयता और विश्व-बन्धुत्व की चेतना से जुड़ जाता है। राजनीतिक दलों और मजदूर संघों के विशाल आराम देह कार्यालय यहाँ दर्शनीय हैं। उनमें पुस्तकालय से लेकर टी. वी. तक की सुविधा है। पार्टियों के कार्यालय यहाँ इतने विशाल और आधुनिकतम हैं कि भारत में बड़े से बड़े उद्योगपति का कार्यालय इतना साधन-सम्पन्न नहीं होगा। हाँ, उनमें साज सजावट बिलकुल नहीं है पर सुविधाएँ सभी हैं।


घाटे के सौदे फायदेमन्द होते हैं

ये हैं, नीलू और बी डी। नीलू, मेरी छोटी बहन और बी डी याने बाबूदासजी बैरागी, मेरे जीजाजी। इन्हें यह ‘बी डी’ नाम मैंने ही दिया है। हम कक्षापाठी पहले रहे। जीजा-साले बाद
में बने। यह चित्र इनके विवाह की पचासवीं वर्ष गाँठ के अवसर का। दस मई 1968 को इनका विवाह हुआ था। विवाह की पचासवीं सालगिरह इन दोनों ने बहुत ही साधारण तरीके से अपने घर में ही मनाई। दोनों, मन्दसौर जिले की मल्हारगढ़ तहसील के गाँव बूढ़ा मे रहते हैं। बूढ़ा गाँव बहुत बड़ा तो नहीं है लेकिन भरपूर समृद्ध गाँव है। पाटीदार बहुल इस गाँव में, आज की तो मुझे नहीं मालूम लेकिन चालीस-बयालीस बरस पहले तक यहाँ, ट्रेक्‍टर ट्रालियाँ बनाने की कम से कम पैंतीस औद्योगिक इकाइयाँ थीं। मेरे पैतृक गाँव मनासा से बूढ़ा की दूरी मात्र तीस किलोमीटर है। 

दस मई के तीसरे दिन, तेरह मई को सुबह-सुबह बी डी ने नीलू से अचानक कहा - ‘चलो! भाई साहब (बालकविजी) से मिल आते हैं।’ नीलू तैयार नहीं थी। बोली कि पहले कहा होता तो चले चलते। लेकिन आज के लिए तो कुछ काम निकाल रखे हैं। आज नहीं, अगले रविवार को चलेंगे।

लेकिन वह अगला रविवार नहीं आया। अब कभी आएगा भी नहीं। उसी शाम सात बजते-बजते उसे दादा के निधन का समाचार मिल गया। रात के नौ बजने से पहले ही दोनों पति-पत्नी मनासा में दादा के शव के पास बैठे थे।

दादा के निधन से दुःखी तो हम सब हैं। अब भी हैं। लेकिन नीलू और बी डी तनिक अधिक दुःखी हैं। शायद आजीवन रहेंगे। जब-जब भी याद आएगा, तब-तब दुःखी होते रहेंगे - ‘काश! उस दिन मनासा चले गए होते! दादा से मुलाकात हो गई होती।’ ये दोनों शेष जीवन इसी कसक के साथ जीएँगे।

ये हैं श्री नरेन्द्र नाहटा। मेरे नरेन्द्र भाई सा’ब। मन्दसौर निवासी हैं। मनासा के विधायक और मध्य प्रदेश सरकार में मन्त्री रह चुके हैं। 

दादा के निधनोपरान्त उनके दाह संस्कार में और उठावने में आए तो आए ही। बाद में भी आए। हर बार खुद को कोस रहे थे। बता रहे थे कि वे हर महीने-दो महीने में दादा से मिलने नियमित रूप से मनासा आया करते थे। कह रहे थे - ‘मैं जब भी दादा से मिल कर जाता तो उनसे कुछ न कुछ ऐसी बात लेकर जाता था जो जिन्दगी भर काम आती है। इस बार ही ऐसा हुआ कि मैं आना टालता रहा और टालते-टालते तीन-साढ़े तीन महीने निकल गए। पहले की तरह ही वक्त पर आ जाता तो कुछ न कुछ मिल जाता। अब वह कभी नहीं मिलेगा।’ अब, जब भी कभी, कहीं दादा की बात चलेगी तब, कोई ताज्जुब नहीं कि नरेन्द्र भाई सा’ब को हर बार अपनी यह ‘चूक’ याद आ जाए।

यह चित्र मेरे छोटे बेटे तथागत और उसकी अर्द्धांगिनी नन्दनी का है। दस दिसम्बर 2017 को इनकी भाँवर पड़ी है। इनके विवाह में दादा आए थे और पूरे दो दिन हम सबके
साथ रहे थे। लेकिन ये दोनों चूँकि वर-वधू थे, इसलिए दादा के साथ बहुत ही कम उठ-बैठ पाए।

दादा के बारे में नन्दनी की जानकारियाँ शून्यवत हैं। उसने कहा कि विवाह के बाद उसे दादा के बारे में बहुत सारी बातें सुनने को मिल रही हैं। लेकिन वह कुछ नहीं जानती। उसने कहा - ‘पापाजी! मुझे ताऊजी के बारे में कुछ बताइए ना!’ मैंने कहा कि मैं कितना भी बता दूँ, कम ही होगा। मैंने उसे सलाह दी - ‘तुम दोनों कम से कम दो दिनों के लिए दादा के पास मनासा जाओ। उनके साथ रहो। उनसे बातें करो। उन्हें लोगों से बातें करते देखो-सुनो। तुम्हें काफी कुछ जानने-समझने को मिलेगा। वह जानना-समझना तुम्हारे लिए नींव का काम करेगा क्योंकि वह सब तुम खुद देखोगी-सुनोगी। उसके बाद जब-जब तुम्हें कुछ जानना हो तो अपन बात करते रहेंगे।’ नन्दनी को यह बात जम गई थी। उछल कर बोली थी - ‘हाँ पापाजी! यही ठीक रहेगा। जल्दी ही यह विजिट मेनेज करते हैं।’ लेकिन पेकेजवाली नौकरियाँ हमारे बच्चों को अपने लिए और अपनेवालों के लिए वक्त कहाँ देती हैं? सो, ये दोनों, दो दिनों के लिए दादा के पास जाते उससे पहले ही दादा अपने 'चार दिन' पूरे कर चले गए। नन्दनी अब बात-बात में कहती है - ‘आपके कहते ही हम चले जाते तो कितना अच्छा होता पापाजी!’ दादा को लेकर अब उसके पास इस एक वाक्य के अलावा शायद ही कुछ बचा हो। 

इन तीन मामलों के बाद चौथा मामला मैं खुद हूँ। तीन दिन पहले मैंने उपाध्याय सर के निधन पर अपनी बात कही थी। मेरी वह बात मेरे आलस्य की आत्म स्वीकृती थी। जनवरी 2017 में उपाध्याय सर से मुलाकात क फौरन बाद यदि मैंने वह सब लिख दिया होता तो आज मैं अपराध बोध से ग्रस्त नहीं होता। लेकिन मैं हर बार टालता गया और खुद ही अपराधी बन बैठा। अब मैं आजीवन खुद को सजा देता रहूँगा।

ऐसे अनेक छोटे-छोटे पछतावे हममें से प्रत्येक के पास हैं। ये पछतावे हम ही जुटाते हैं। मन जब भी कुछ कहता है, माँगता-सलाह देता है तो मस्तिष्क उसे परे धकेल देता है। विवेक पर बुद्धि भारी पड़ जाती है। बाद में, जब रेत मुट्ठियों से फिसल चुकी होती है तो हम अपने खाली हाथ देखते हुए खुद को कोसते रह जाते हैं।

दिल की सुन लेने पर, मुमकिन है, ‘दो-पैसों’ का नुकसान हो जाए लेकिन जो दौलत हासिल होगी, वह अनमोल ही होगी।

आईए! दिल की सुनें। कभी-कभी घाटे के सौदे भी बड़े फायदेमन्द होते हैं। जिन्‍दगी को कसकते रहने से बचाते हैं।
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अवकाश गृह के अजूबे


बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - तीसरा हिस्सा

अपने कामगारों, किसानों और बुद्धिजीवियों की सुख सुविधा का सारा माध्यम यहाँ की ट्रेड यूनियनें हैं। हर व्यक्ति को वर्ष में 13 दिन का सवेतन अवकाश मिलता है। इस अवकाश को ये लोग समुद्र के किनारे बने होलीडे होम्स (अवकाश गृहों) में पूरी मस्ती के साथ बिताते हैं। कल शनिवार को हम लोगों को ऐसे ही एक हालीडे होम में ले जाया गया। अकेले रोस्तोक प्रान्त के पास छुट्टियाँ मनाने के लिये ऐसे 35 हजार शेडों की व्यवस्था है। एक शेड में दो व्यक्ति आराम से पाँव पसार कर समुद्र के किनारे स्नानावकाश, मालिश और धूपस्नान का आनन्द लेते हैं। 13 दिनों के लिये प्रति व्यक्ति केवल 75 मार्क याने 300 भारतीय रुपये चुकाने होते हैं। बच्चे के 30 मार्क अलग। इस तरह यदि पति, पत्नि और एक बच्चा अवकाश मनाने आयें तो उन्हें 720 भारतीय रुपयों में पूरे 13 दिन तक हर सुविधा (खाना, पीना, नाश्ता, स्नान, शेड और होटल) ट्रेड यूनियन देती है। यह घर से भी सस्ता होता है। शेड का तात्पर्य है छायादार छोटी सी गुमटी। समुद्री हवा से बचने के लिए शेड की पीठ समुद्र की तरफ करके, सूर्य की ओर मुँह करे, पति पत्नि या प्रेमी युगल केवल स्नान के कपड़ों में सारा दिन समुद्र स्नान और धूप स्नान का आनन्द लेते हैं। कल हम लोगों ने कोई 6 या 7 हजार जोड़े इस तरह एक साथ देखे। मक्खन की तरह गोरी काया वाली इतनी महिलाओं और पुरुषों को करीब-करीब 90 फीसदी नग्न देखने का यह हमारा पहला अवसर था। कई मित्रों की बाँछे खिल गईं पर कई की घिग्गी बँध गई। निस्संकोच जोड़े अपने कलापों में लगे हुए थे। हमें इस अवकाशगृह के डायरेक्टर ने कहा कि आप चाहें जिससे, चाहें जो बात कर सकते हैं पर बात कौन कर सकता था! इन अवकाश गृहों में युवा विद्यार्थियों का प्रवेश बिना किसी झिझक के वर्जित है। उनके लिए अलग से अवकाश गृह बने हुए हैं। इस अवकाश गृह का चरम अभी आगे है। डायरेक्टर ने बताया कि समुद्री हवा में नमक के कारण प्रायः यहाँ चर्म रोग बहुत हो जाते हैं। इसलिए कई नर-नारी अपने चर्म रोगों का ईलाज करवाने, डॉक्टरों की सलाह से यहाँ भेजे जाते हैं। डायरेक्टर महोदय ने एक लकड़ी के बाड़े की तरफ इशारा किया। समुद्र तट से बिलकुल लगा यह बाड़ा एक दम सामान्य था पर जब उसके भीतर धूप ले रहे और खेलते कूदते सैंकड़ों स्त्री पुरुषों को हमने देखा तो हमारे दीदे फटे रह गये। सैकड़ों स्त्री पुरुष चर्म रोग का अद्भुत ईलाज कर रहे थे। उनके पास नाम मात्र को भी कपड़ा नहीं था। अद्भुत संकोचहीनता थी। अविश्वसनीय दृश्य था। इतने, बिलकुल नंगे लोग इस तरह उछलते-कूदते जीवन में किसी भी भारतीय ने नहीं देखे होंगे। ओफ! क्या नजारा था! वे अपनी दुनिया में मस्त थे। हम काठ होते जा रहे थे।

इस अवकाश गृहों में दो मौसम अवकाश मनाने के होते हैं। एक शरदावकाश और दूसरा ग्रीष्मावकाश। अगली योजना में कोई 50 लाख लोगों के लिए इस तरह के अवकाश गृहों का प्रावधान किया जा रहा है। अभी यह संख्या शायद 10 लाख तक ही सीमित है। 

ऐसे होती है धरम की मुफ्त सेवा

वे दोनों तनिक सहमते हुए आए थे। बोले - ‘आप से थोड़ी बात करनी है। लेकिन डर लग रहा है। कहीं आप बात बात सबके सामने नहीं कर दो।’ मुझे हँसी आ गई। पूछा - ‘बात मेरे काम की है या तुम्हारे काम की?’ सहमी आवाज में एक बोला - ‘बात है तो हमारे ही काम की।’ मैंने कहा - ‘तो फिर रहने दो। तुम्हारे काम की तुम जानो।’ दोनों सकपका गए। दूसरा बोला - ‘वो ऐसा है कि है तो हमारे काम की लेकिन थोड़ी-थोड़ी आपके काम की भी है।’ मैंने कहा - ‘तो फिर मुझे उतनी ही बता दो जो मेरे काम की है।’ जवाब आया - ‘देखो सा’ब! हम पहले ही डरे हुए हैं। ऐसी बातें करके आप हमें और मत डराओ।’ अब मैं जोर से हँसा - ‘यार! तुम लोग साफ-साफ बात करो। लेकिन यदि तुम केवल मुझे कहने या बताने आए हो तो रहने दो। इसके बाद भी मुझे बताओगे तो मैं वादा नहीं करता कि तुम्हारी बात अपने तक ही रखूँगा।’ 

दोनों ने आँखों ही आँखों में बात की, फैसला लिया। दूसरा बोला - ‘देखो सा’ब! आए तो आपको सुनाने ही हैं। सुना कर ही जाएँगे। आपको जो करना हो वो कर लेना। लेकिन आपको हमारे बच्चों की सौगन्ध, आप हमारा नाम किसी को मत बताना।’ मानो उनके खानदान पर अहसान कर रहा होऊँ, कुछ इस तरह कहा - ‘हाँ। ये वादा मैं करता हूँ। तुम्हारा नाम नहीं बताऊँगा लेकिन तुम्हारा नाम, पता और मोबाइल नम्बर अपने पास लिख कर जरूर रखूँगा। सुनकर दोनों के हाथ-पाँव फूल गए। घबरा कर पूछा - ‘क्यों? वो किस लिए?’ जोर से हँसते हुए मैंने कहा - ‘डरो मत यार! यदि तुम्हारी बात में काम का मसाला हुआ और मुझे कुछ  पूछताछ करनी पड़ी तो तुमसे फोन करके पूछ लूँगा। इसलिए।’ दोनों की घबराहट कम हुई। मैंने अर्द्धांगिनीजी को आवाज लगा कर उनके लिए पानी और चाय के लिए कहा और उनसे बोला - ‘अब फटाफट अपने काम की बात मुझे बता दो। जरा साफ-साफ बताना। खुलकर।’ 

बिना किसी क्रम के, टुकड़ों-टुकड़ों में, एक दूसरे की बात पूरी करते हुए  उन्होंने जो बताया उसका सार था कि वे मेरा, 14 जून वाला, ‘बिच्छू पण्डित’ का लेख पढ़ कर आए थे। दोनों ही रतलाम की श्री सनातन धर्म सभा के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उनकी संस्था और  महारुद्र यज्ञ समिति, प्रत्येक अधिक मास में, त्रिवेणी मेले में नौ दिवसीय ग्यारह कुण्डी यज्ञ कराती हैं। यज्ञ करानेवाले पण्डितों के व्यवहार से वे परेशान रहते हैं लेकिन कर कुछ नहीं पाते। ‘आपको तो एक बिच्छू पण्डित की बात मालूम हुई। लेकिन ये ग्यारह के ग्यारह बिच्छू पण्डित से कम नहीं हैं। हमें तो सा‘ब पूरे नौ दिन इन ग्यारह बिच्छू पण्डितों को झेलना पड़ता है।’ 

बात मेरी समझ में नहीं आई। मैंने तनिक झल्ला कर कहा - ‘मैंने पहले ही कहा है, साफ-साफ बात करो। मुझे घुमा फिरा कर बात करना पसन्द नहीं।’ मेरे तेवर देख दोनों असहज हो गए। एक बोला - “वो! सा’ब! ऐसा है कि व्यवस्था में राई बराबर भी कमी हो जाए तो ये पण्डित माथे आ जाते हैं। आँखें दिखाने लगते हैं। कहते हैं - ‘हम अपना काम छोड़ कर आते हैं। धरम का काम है। समिति से एक पाई भी नहीं लेते हैं। तुम्हें केवल व्यवस्था करनी है। तुमसे वो भी नहीं होती? फिर तुम्हारी समिति किस काम की? फोकट में वाहवाही लूटते हो।’ मैंने पूछा - ‘क्या सच्ची में समिति उन्हें दक्षिणा नहीं देती?’ वे बोले - ‘हाँ सा’ब। वो लोग समिति से कोई दक्षिणा नहीं लेते।’ मैंने पूछा - ‘तो फिर झगड़ा किस बात का? सही तो कहते हैं वो! तुम लोगों को बुरा क्यों लगता है?’ वे मानो मेरे इसी सवाल की राह देख रहे थे। फौरन बोले - ‘येई तो वो बात है सा’ब जो बताने आए हैं। वो समिति से दक्षिणा नहीं लेते लेकिन हर एक पण्डित एक हजार रुपये रोज से कम नहीं उठाता। फिर भी हमें आँखें दिखाते हैं। हम कुछ भी कहते हैं तो वही, ‘हम अपना काम छोड़ कर फोकट में धरम का काम करने आते हैं।’ की बात सुनाते हैं।”

उनकी बात मेरे सर के ऊपर से निकल गई। मेरी शकल देख कर एक बोला - ’वो ऐसा है सा’ब कि मेले में दूर-दूर से तो धार्मिक-दानी लोग आते ही हैं, आसपास के गाँवों के लोग टुल्लर के टुल्लर आते हैं। ये आनेवाले यज्ञ को तो भेंट चढ़ाते ही हैं, अपनी-अपनी हैसियत से यज्ञ करानेवाले सारे पण्डितों को भी दान-दक्षिणा देते हैं। सौ-सौ रुपये देनेवाले तो दिन में पाँच-सात आ ही जाते हैं। इसके अलावा कभी कोई धोतियाँ दे जाता है तो कोई शालें दे जाता है। कभी कोई कुर्तों का कपड़ा दे जाता है। कभी मौसमी फलों की थैलियाँ तो कभी मिठाई के डब्बे। एक साल एक आदमी चाँदी के सिक्के दे गया था। इन पण्डितों को ये चीजें और दक्षिणा नजर नहीं आतीं। हमने एक बार कहा भी कि यदि फोकट में ही धरम सेवा कर रहे हो तो ये दान-दक्षिणा भी मत लो। समिति को दे दो। हमने जैसे ही कहा तो वे गुर्रा कर लाल-लाल आँखें दिखाने लगे। कहने लगे कि यह समिति ने थोड़ी ही दिया है! यह तो श्रद्धालु भक्त दे जाते हैं। इसका समिति से क्या लेना-देना?’ 

दोनों की बातों से लग रहा था कि तकनीकी रूप से पण्डित सही थे और व्यावहारिक रूप से ये दोनों सही थे। लेकिन मैं फिर भी समझ नहीं पाया कि वे मुझसे क्या चाहते थे। मैंने अपनी उलझन बताई तो उन्होंने अपने वाद का मुद्दा पेश किया - ‘वो! ऐसा है सा’ब कि उन पण्डितों को हमें ही झेलना पड़ता है। वे हमारी टप्पल में टींचे मारते हैं। हमें इस तरह सुनाते हैं जैसे वे हमारे खानदान पर एहसान कर रहे हों। हम इनके तानों से आजीज आ गए सा’ब। हम इसीसे मुक्ति चाहते हैं।’ मुझे अचरज हुआ। कहा - ‘समितिवालों से क्यों नहीं कहते? उनसे कहो। वे जरूर कोई रास्ता निकालेंगे।’ जवाब आया - ‘समितिवाले तो सा’ब ऐन टेम पर ही आते हैं और हार-फूल करके चले जाते हैं। हम कहते हैं तो सुनते नहीं।’ उनकी आँखों से लग रहा था कि वे सच ही बोल रहे थे। मैंने कहा - ‘एक काम करो। इन पण्डितों को मिलनेवाले फायदे रतलाम के दस-बीस दूसरे पण्डितों को गिनवाओ और उनसे कहो कि अगली बार वे सबके सब समिति से कहें कि वे भी समिति से बिना किसी दान-दक्षिणा के धरम की सेवा करना चाहते हैं। इसके साथ ही साथ समितिवालों को भी बराबर वास्तविकता बताते रहना। मुझे लगता है कि यदि तुम ईमानदारी से मेहनत करोगे तो तुम्हारा काम हो जाएगा।’

दोनों खुश हो गए। एक बोला - ‘अरे सा’ब! ये बात हमारे दिमाग में क्यों नहीं आई। आपके यहाँ से निकलते ही हम तो इसी काम पर लग जाएँगे। पण्डित बदलें या न बदलें लेकिन इन ग्यारह बिच्छू पण्डितों की बोलती जरूर बन्द हो जाएगी।’

इस बीच चाय आ ही चुकी थी और वे पी ही चुके थे। वे जाने लगे तो मैंने कहा -‘लेकिन अगली बार जब यज्ञ हो तो मुझे बताना जरूर कि क्या हुआ। नहीं बताओगे तो ये सारी बातें तुम्हारा नाम लेकर सबको बता दूँगा।’

इस बार वे डरे नहीं। जोर से हँसे और कोहनियों तक हाथ जोड़, कर चले गए।
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पूजा कर्मठता की, पद की नहीं


बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - दूसरा हिस्सा

खेतों में इस समय यहाँ मक्का की फसल खड़ी है। मेरी-तेरी छाती बराबर ऊँची फसल होगी। कच्ची मक्का यहाँ सूअरों की खिलाई जाती है। उनके खाने से जो बच जाती है वह सूखने पर घर आती है और फिर उसे विशेष तौर पर भून कर नमकीन बनाकर काजूनुमा फूलों की तरह खाया जाता है या फिर सलाइयों जैसे मुरमुरे लम्बे बिस्कुट बनाकर चाय काफी और शराब के साथ सेवन किया जाता है।

पशुओं में अभी तक कुत्तेे, बिल्ली, सुअर, घोड़े और गायें ही हमें यहाँ देखने को मिली। गायें यहाँ सफेद या लाल नहीं होतीं। वे काली, कबरी, कजरी और कपिला होती हैं। सींग  छोटे, सामने की ओर और पैने। एक भी गाय दुबली या मरियल नहीं देखी। खूब दूध देती है। थन भरे और फटते से दिखाई पड़ते हैं। दूध उतना ही स्वस्थ और नीरोग। मैं साँझ सवेरे डटकर दूध पीता हूँ। 24 अगस्त की शाम को डाक्टर संघई साहब की मशीन पर 67 किलो तुलकर बस में बैठा था। कल शाम को यहाँ तुला तो 69 किलो उतरा हूँ। कुल 19 दिन की खुराक, भ्रमण और आत्म सन्तोष का यह पुरुस्कार मिला। शाकाहारी भोजन यद्यपि इतना रुचिकर नहीं होता, तो भी इतना पुष्ट होता है कि जिस समय हमारी शिष्ट मण्डल यहाँ पहिले दिन खाना खाने बैठा था तब शाकाहारी के नाम पर हम कुल तीन व्यक्ति थे। पर आज? 15 में से 9 शाकाहारी टेबल पर बैठते हैं। मजा तब आता है जब कि अण्डा शाकाहारियों को भी परोस दिया जाता है। हम केवल दो व्यक्ति हैं जो अण्डा भी नहीं खाते। सारी प्लेटें फिर से लगाई जाती हैं। अण्डे की सामग्री हटाई जाती है। शाकाहारियों को उबली सब्जियाँ और ब्रेड, मक्खन आदि मिलता है। दूध, दही खूब खाओ। सामिष लोग यहाँ के मांस से ऊब गये। मछली, मुर्गी तो खाते ही हैं यहाँ ‘बीफ’, जिसे गौमांस कहते हैं खूब खाया जाता है। जब खाना शुरु होता है तब आनन्द यह आता है कि शाकाहारी लोग तो सामिष भोजन की चर्चा करते हैं और सामिष लेने वाले शाकाहारी भोजन की बातें करते पाये जाते हैं। व्यवस्थापकों सहित यह दल  कोई 22 लोगों का है पर इन 22 ही लोगों को होटल में एक ही कन्या बिना किसी हड़बड़ी और तनाव के हँसते-मुस्कुराते आराम से खाना खिला देती है। इन कन्याओं की संख्या कभी तीन से अधिक नहीं बढ़ी। शराब भी ये ही प्रस्तुत करती हैं।

इन 22 लोगों में हमारी बस का ड्रायवर भी शामिल है। कितना अच्छा लगता है जब नाश्ता करते समय और खाना खाते समय तथा घूमते, देखते समय ड्रायवर भी साथ ही खाता-पीता और बैठता है। व्यवस्थापक दल में दो तो दुभाषिये हैं। एक श्री क्लोफर, मूलतः आस्ट्रियन। खूब हँसोड़ और विनोदी। जी. डी. आर. के ट्रांसलेशन ब्यूरो में चीफ ट्रांसलेटर हैं। अनुवाद इतना सजीव और विनोदपूर्ण करते हैं कि सुनने वाले बाग-बाग हो जाते हैं। दूसरी हैं श्रीमती ईरीज कोबा। कल तक हम उसे कुमारी समझते थे। वह श्रीमती निकली। नई-नई अनुवादिका है। सीख रही है। फिर है
श्रीमती रुथ के साथ दादा। चित्र भोजन के समय का है। श्रीमती रुथ ने मनुहार की 'कोनिया लीजिए।'
दादा ने जवाब दिया - 'धन्‍यवाद। मैं शराब नहीं पीता।' कोनिया वहां की स्‍थानीय शराब है।

व्यवस्थापिका श्रीमती रुथ और श्रीमती ईमी। गये पत्र में मैं श्रीमती ईमी को श्रीमती एन लिख गया था। डॉ. गुन्थर अगली व्यवस्था के लिए बर्लिन चले गये हैं। और प्रथम मानो या अन्तिम सदस्य है हमारा ड्रायवर। इस देश में काम और कर्मठता की पूजा होती है। पदों की नहीं। डॉ. गुन्थर इस दल के सर्वोच्च आफिसर हैं पर हम लोग बड़े से बड़े पदासीन लोगों से मिले तब भी हमारा ड्रायवर साथ था। आज इस काउन्टी के उपाध्यक्ष की बराबरी में उनका व हमारा ड्रायवर इत्मीनान से खाना खा रहा था। मनुष्य यहाँ समानता का व्यवहार पाते हैं और करते हैं। यदि तनख्वाह से ही मामला जाँचा जाय तो हमारे बस ड्रायवर की तनख्वाह है 650 मार्क याने 2600 भारतीय रुपये। सामान्य जीवन में यह देश व्यक्ति को पद से नहीं नापता।

ए! हुण! कमलापति फिनिश......

दादा श्री बालकवि बैरागी के निधन के बाद शोक प्रकट
करने के लिए आनेवालों का ताँता सुबह से रात तक लगा रहता था। दिन में देहातों के लोग अधिक आते तो सूरज ढलने के बाद स्थानीय लोग। इनमें से कुछ प्रतिदिन आते। ऐसे आनेवालों में हम परिजनों के बाल सखा, कक्षापाठी, पारिवारिक स्तर पर अन्तरंग लोग देर रात तक बैठते। तब, शोक के बीच हास-परिहास भी जगह बना लेता था।

ऐसा ही एक प्रसंग गोर्की, मेरे छोटे भतीजे ने सुनाया। उसने अपनी ओर से आगे रहकर नहीं, रामप्रसाद कसेरा से गपियाते हुए अचानक ही सुनाया।

मुझे नहीं पता कि रामप्रसाद कसेरा और गोर्की सहपाठी हैं या नहीं। लेकिन यह पता है कि दोनों अच्छे मित्र हैं। गोर्की जब भी मनासा आता है तो रामप्रसाद उससे यत्नपूर्वक मिलता है। 

घटना के समय रामप्रसाद मनासा ब्लॉक काँग्रेसाध्यक्ष था। तब हमारा मकान कस्बे के बाहर, खेत पर नहीं, कस्बे में ही, पुरबिया गली, भाटखेड़ी रास्ते पर हुआ करता था। वहाँ, रास्ते आते-जाते आसानी से आया जा सकता था। ब्लॉक काँग्रेसाध्यक्ष होने के कारण रामप्रसाद प्रायः ही घर पर आता रहता था।

एक दिन दादा को अपराह्न तीन बजे की बस से बाहर जाना था। अचानक ही खबर आई कि काँग्रेस नेता, श्री कमलापति त्रिपाठी का निधन हो गया है। दादा ने जाने से पहले शोक सभा करने का विचार किया और रामप्रसाद से कहा - ‘मुझे तीन बजे की बस से जाना है। उससे पहले शोक सभा हो सकती है?’ रामप्रसाद ने कहा - ‘क्यों नहीं हो सकती? हो जाएगी।’ तय हुआ कि दोपहर ढाई बजे, अन्नपूर्णा मन्दिर पर शोक सभा होगी।

तब आज जैसी मोबाइल और वाट्स एप की सुविधा तो थी नहीं। लेण्ड लाइन फोन भी बहुत कम थे। एक-एक के पास जाकर खबर करनी पड़ती थी। वक्त कम था और काम बड़ा। सो, फैसला होते ही रामप्रसाद, हमारे घर से ही चल पड़ा, लोगों को खबर करने के लिए। अपने स्कूटर पर।

कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा लोगों को खबर करना किसी चुनौती से कम नहीं था। रामप्रसाद ने अपना तरीका निकाला। दुकान के सामने, एंजिन बन्द किए बिना स्कूटर रोका। जब तक दुकान में बैठा कार्यकर्ता रामप्रसाद की ओर न देख ले तक तक रामप्रसाद बराबर हार्न बजाए। कार्यकर्ता की नजर पड़ते ही रामप्रसाद ने, सड़क पर खड़े-खड़े, खुले गले से सूत्र-सन्देश की हाँक लगाई - ‘ए! हुण। कमलापति फिनिश। दादा ने क्यो। अन्नपूर्णा। ढाई वजाँ।’ याने ‘ए! सुन! कमलापतिजी का निधन हो गया है। दादा ने कहा है कि अन्नपूर्णा मन्दिर पर ढाई बजे शोक सभा रखी है। आना है।’ कह कर, सुननेवाले की प्रतिक्रिया से बेपरवाह रामप्रसाद यह जा, वह जा।

अधिकांश लोगों ने रामप्रसाद की इस सूचना-शैली पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ ‘जूने-पुराने’ लोगों को अच्छा नहीं लगा - “ये कौन सा तरीका है शोक सभा की खबर देने का। मरनेवाले को तो वैसे भी आदर से याद किया जाता है। फिर कमलापतिजी तो अपने राष्ट्रीय नेता रहे हैं! उन्हें बिना मान-सम्मान के ‘कमलापति’ कहना? कम से कम ‘कमलापतिजी’ तो कहना चाहिए!” लेकिन वे कहते किससे? रामप्रसाद तो हवा का झोंका बना कस्बे में घूम रहा था। सो, ऐसे झुंझलाए तमाम ‘जूने-पुराने’ मन मसोस कर रह गए।

रामप्रसाद की मेहनत फलीभूत हुई और शोक सभा, कमलापतिजी की प्रतिष्ठा के अनुरूप  ‘ढंग-ढांग’ से सम्पन्न गई। सभा के बाद इन ‘जूने पुरानों’ ने दादा से शिकायत की - ‘पता है रामप्रसाद ने क्या किया? ये भी कोई तरीका है?’ दादा ने सबको आश्वस्त किया कि वे रामप्रसाद से पूछेंगे और उसे समझाएँगे। दादा चले गए। लेकिन बात आई-गई नहीं हुई।

अवसर मिलते ही दादा ने पूछा - ‘भई! रामप्रसाद! ये तुमने शोक सभा की खबर कैसे दी? ऐसा क्यों किया भई?’ हनुमान की तरह नतमस्तक, विनयावनत मुद्रा में रामप्रसाद ने जवाब दिया - ‘अशो हे दादा! के आपने तीन वजाँ जाणो थो। अबे मूँ एक-एक की दुकान पर स्कूटर बन्द करी ने, सड़क पर ऊबो करीने, दुकान में जईने पूरी वात हमजातो। केतो के भई आपणा कमलापतिजी त्रिपाठी मरी ग्या। वणा की शोक सभा हे। ढाई वजाँ। थने आण्ो हे। ने ऊ पूछी लेतो के ई कमलापति कूण हे? तो वणीने पूरी वात हमजाणी पड़ती। अणी तराँ ती खबर करतो दादा! तो तीन तो यूँ ईज वजी जाती ने तीन मनक नी पोंचता सभा में! अबे आप ई वताओ! अशो नी करतो तो कई करतो?’ (ऐसा है दादा कि आपको तीन बजे जाना था। यदि मैं एक-एक दुकान पर स्कूटर बन्द कर, सड़क पर खड़ा कर, दुकान में जाकर पूरी बात समझाता। कहता कि अपने कमलापतिजी त्रिपाठी का स्वर्गवास हो गया है। ढाई बजे उनकी शोक सभा है। तुझे आना है। यदि वह पूछ लेता कि कमलापतिजी कौन हैं? तो उसे पूरी बात समझानी पड़ती। यदि इस तरह खबर करता न दादा! तो, तीन तो यूँ ही बज जाती और शोक सभा में तीन लोग नहीं पहुँचते। अब आप ही बताओ! मैं ऐसा न करता तो क्या करता?)

रामप्रसाद के लाजवाब जवाब ने दादा को बेजवाब कर दिया। वे मुस्कुरा कर रह गए - ‘ठीक किया रामप्रसाद।’ 

दादा की प्रतिक्रिया जानकर रामप्रसाद  खुश हो गया और जाने की अनुमति माँगी - ‘तो! दादा! म्हारे खिलाफ कम्पलेण्ट फिनिश? मूँ जऊँ?’ (तो! दादा! मेरे विरुद्ध शिकायत समाप्त? मैं जाऊँ?)

दादा की हँसी चल गई। हँसते-हँसते ही बोले - ‘हाँ। फिनिश। तू जा।’ 

और रामप्रसाद पूर्वानुसार ही, हनुमान की तरह, विनयावनत मुद्रा में प्रस्थान कर गया।
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भिखारी एक, शर्मिन्दा पूरा जी. डी. आर.


बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - पहला हिस्सा

रोस्तोक से
12-9-76
शाम 6 बजे
भारतीय समय रात्रि 10.30

प्रिय बब्बू,

प्रसन्न रहो,

इस आशा से यह लम्बा पत्र फिर लिख रहा हूँ कि मेरा पूर्व पत्र मिल गया होगा और लगता होगा कि पत्र अधूरा है। मैं नहीं जानता कि तुम लोग मेरे उस पत्र का कैसा और क्या उपयोग करने का सोच रहे होगे। खैर,

वह पत्र लिखते-लिखते एक दिलचस्प घटना घट गई। श्री के. एन. सेठ जिनका कि आने की हम लोग उम्मीद छोड़ बैठे थे वे अनायास आ गये। दिल्ली से मास्को और फिर मास्को से बर्लिन, उनकी अकेले की यात्रा कम दिलचस्प नहीं रही। पर वे स्वयम् एक जागरुक पत्रकार हैं सो उनकी यात्रा पर वे खुद लिखेंगे। ज्यों ही होटल में हम लोगों को पता चला कि श्री सेठ दिल्ली से रोस्तोक पहुँच गये हैं, हर कमरे से प्रतिनिधि भाग कर उनके कमरे में जा पहुँचे। उन्हें घेर लिया। भारत के ताजा समाचार वे ही हमें दे सकते थे। वे हमारे तीन-चार दिन बाद भारत से चले थे। यद्यपि बी. बी. सी. का समाचार बुलेटिन हमारे लोग सुन लेते थे तो भी मात्र एक दिन पूर्व के समाचार उनसे ही मिलने की प्रामाणिक उम्मीद थी। पर श्री सेठ ने हम सबको निराश किया। वे न तो समाचार लाये न पुराने समाचार-पत्र ही। भारत में सब कुछ यथावत है। कोई विशेष गर्म हवा उधर नहीं चली। निराशा के साथ ही साथ तसल्ली भी मिली। यहाँ न तो हिन्दी अखबार आते हैं न अंग्रेजी। हाँ, लन्दन से निकलने वाला अंग्रेजी अखबार मार्निंग स्टार (Morning Star) जरूर आता है। पर वह मूलतः भारत विरोधी अखबार है। किसी की दिलचस्पी उसमें नहीं थी। मेरे पास तो केवल 5-9 से 11-9 तक का ‘धर्मयुग’ है जिसे मैं पचासों बार तरह-तरह से पढ़ चुका हूँ।

अंग्रेजी को किसी तरह का प्रोत्साहन यह देश नहीं देता है। अंग्रेजी सारे यूरोप में अपाहिज और अमान्य भाषा है। यदि दुभाषिया नहीं हो तो यहाँ अंग्रेजी किसी काम नहीं आये। अपनी भाषा जर्मन के लिये इस देश की आसक्ति हम हिन्दी वालों के लिये ईर्ष्या की बात है। मैंने कहा न! अंग्रेजी यहाँ पहले पंगु है फिर अनाथ।

जर्मनी में भिखारी?
श्री सेठ के आगमन से भी अधिक दिलचस्प रही दूसरी घटना। इस घटना ने हमें मनुष्य की कमजोरियों का आश्वासन दिलवा दिया। हुआ यह कि बड़ी सुबह कोई 7.30 या 8 बजे मैं होटल के ठीक बाहर अपनी डाक डालने के लिये पोस्ट के डिब्बे का ढक्कन टटोल रहा था कि एक जर्मन भिखारी मेरे सामने खड़ा हो गया। पाँच फिनिक्स का सिक्का दिखा-दिखा कर वह हाथ फैला रहा था। यह समूचे संसार के लिये एक अविश्वस्त समाचार है पर है बिलकुल
मूलचन्‍दजी गुप्‍ता और दादा
सच। मैंने तत्काल श्री मूलचन्द गुप्ता को बुलाकर उस भिखारी से उनकी भेंट करवा दी। हमने किसी ने उसे भेंट या भीख नहीं दी पर मेरा मन करता है हो न हो वह भिखारी इस देश का निवासी नहीं रहा होगा। पर फिर बाहरी आदमी 
यहाँ क्यों कर भीख माँगेगा? आनन्द तब आया जब वह मुझसे पाँच फिनिक्स के लिये आजिजी करने लगा। मुझे अपने बीते दिन याद गये। मेरी हँसी भी चल गई। एक भिखारी से दूसरा भिखारी माँग रहा है! वह भी जी. डी. आर. जैसे समाजवादी देश में! वाह रे भाग्य? भीख से यहाँ भी पीछा नहीं छूटा। अपने जैसे हर जगह भगवान मिला देता है। पर उस समय सारे होटल में कुहराम मच गया जब हमारे व्यवस्थापकों को इस बात का पता चला। किस बुरी तरह उस भिखारी की ढूँढ मची कि मैं कह नहीं सकता। ईश्वर जाने उसका क्या भविष्य हुआ होगा। राम जाने वह कहाँ होगा। पर हम लोगों से क्षमा माँगते-माँगते हमारे व्यवस्थाकों की जबान घिस गई है।

कल दोपहर के भोजन के बाद हम लोग रोस्तोक काउण्टी छोड़ देंगे। दो  रातें रास्ते के किसी मोटल में बिताकर 15-9 की सुबह बर्लिन पहुँच जायेंगे। पूरे आठ दिन इस प्रान्तर में बहुत अध्ययन मनन के काटे। खाने वालों ने खूब खाया। मैंने खूब लिखा पर सबसे ज्यादह बाजी मार ले गये पीने वाले। रूसी शराब, जिसे वोदका कहते हैं, यारों ने खूब पी। यहाँ की स्थानीय शराब कोनिया भी पट्ठों ने खूूब गटकी। कोनिया बमुकाबले वोदका कुछ कम नशीली होती है। पर नशा आखिर नशा तो है ही।

अब पता चला कि हमारी यह यात्रा जून 1976 में क्यों नहीं हो पाई? चक्कर यह चला कि एक साथ एक होटल में कहीं भी 25 बिस्तर या 16 कमरे नहीं मिल सके। मार्च में हम लोगों के लिये कमरों की तलाश शुरु हुई। कमरे मिल पाये सितम्बर के लिए। वे भी आठ दिन एक जगह और आठ दिन दूसरी जगह। 6 माह  पूर्व कमरों का आरक्षण यहाँ सामान्य बात है। जिस समय मनासा में यह समाचार आया कि हमारी यात्रा जून के बदले सितम्बर में होगी तो तुझे पता होगा, मेरे ईर्ष्यालु फूहड़ आलोचकों ने कितनी फब्तियाँ कसी थीं। वे लोग कितना कूदे थे। राम जाने यह सब पढ़कर उन पर क्या बीत रही होगी क्योंकि मैं यह सारी राम कहानी उसी देश से लिख रहा हूँ। इतना ही नहीं इस देश की यात्रा मारिशस से और जुड़ गई। याने एक के बदले दो देश जाना पड़ा। ईश्वर कितना सटीक उत्तर देता है!


उसने यह तैयारी खुद ही की होगी

अब जो मैं लिखने जा रहा हूँ, उसकी कोई प्रासंगिकता या सन्दर्भ नहीं है। कोई कारण भी नहीं है कि मैं यह सब लिखूँ। लेकिन कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि न चाहते हुए भी लिखना पड़ जाता है। जबरन। नहीं जानता कि क्यों लिख रहा हूँ। लेकिन लिख रहा हूँ क्योंकि बिना लिखे रहा नहीं जा रहा। 

धीमी गति से, निरन्तर हो रहे बदलाव सामान्यतः अनदेखे ही रह जाते हैं। उनके बारे में हमें अपने आसपास से जानकारी मिलती है तो हम चौंक जाते हैं - ‘अरे हाँ! ऐसा हुआ तो है। लेकिन कब, कैसे हो गया? पता ही नहीं चला!’ कुछ ऐसी ही दशा होती है हमारी। 

किन्तु नरेश में धीमी गति से आया यह बदलाव मुझे बराबर नजर आता रहा। लेकिन मेरा ‘पत्रकार’ सदैव सन्देही बना रहता है। किसी भी बात पर मुझे फौरन ही विश्वास नहीं करने देता। लेकिन कोई दो बरस से मैं नरेश को ध्यानपूर्वक देख रहा हूँ और अब विश्वास कर पा रहा हूँ कि उसमें स्वभावगत बदलाव आया है और ऐसा बदलाव आया जो आनन्ददायी, सुखकारी है।

नरेश के बारे में, उससे मेरे नाते-रिश्ते के बारे में मैं पहले बता चुका हूँ। यह भी बता चुका हूँ कि वह स्वभाव से ही सेवाभावी है। लेकिन कुछ बरस पहले तक वह अपनी उलझनों के कारण ‘जी भर सेवाभावी’ नहीं था। उसके, अपनी किस्म के संघर्ष थे। तब, धनोपार्जन उसका प्रमुख लक्ष्य अनुभव होता था। थक कर बैठने की सुविधा उसे कभी मिली नहीं। इसलिए वह थकता कभी नहीं था। रुकता तभी था जब आगे बढ़ने के लिए रुकना जरूरी हो। जब भी बात करो, व्यापारिक व्यस्तताओं की एक असमाप्त सूची सदैव उसकी जबान पर बनी रहती थी। ऐसे में तब, वह अपनी सुविधा से ही किसी की सेवा कर पाता था।

लेकिन गए दो-तीन बरस से नरेश में अनूठा बदलाव मैं साफ देख रहा हूँ। पहले वह ‘कमाई’ के लिए मेहनत करता था। अब ‘पुरुषार्थ’ के निमित्त काम करता नजर आता है। अब उसकी बातों में भाव-ताव, मार्जीन, मुनाफा जैसे शब्द गुम हो गए हैं। अब वह केवल काम करने के लिए काम करता नजर आता है। बस! अपना काम करो, बाकी बातों की छुट्टी। कितना, क्या मिलेगा, यह जानने, गिनने की जिज्ञासा अब मुझे नरेश में नजर नहीं आती।

एक बात मैं तेजी से अनुभव कर रहा हूँ। उसका ‘सेवा भाव’ अब एक कदम आगे बढ़कर ‘सहयोग भाव’ में बदल रहा है। और सहयोग भी कुछ इस तरह जो सामनेवाले को ‘लाभदायक’ हो। प्रत्येक सुपात्र उसके ‘लाभदायक सहयोग’ का ‘लाभिती’ होता है। नरेश उसकी चिन्ता तब तक करता है जब तक कि उसकी चिन्ता से खुद मुक्त न हो जाए।

मेरे आसपास के लोगों में ऐसा बदलाव मुझे पहली बार अनुभव हो रहा है। आदमी में ऐसा बदलाव तब ही आ पाता है जब वह दूसरों के कष्टों, अभावों को अनुभव करे। अपने विकट संघर्ष से नरेश ने जीवन की प्रतिकूलताओं को परास्त किया और आर्थिक अभावों को बिदाई दी। सुखपूर्वक जीवन जीते हुए आदमी को अपना अतीत नजर आने लगता है। तब उसे, जमाने की तकलीफें अपनी तकलीफें लगने लगती हैं। तकलीफों का यह तादात्म्य आदमी को करुणा से सराबोर कर तमाम तकलीफजदा लोगों से जोड़ देता है। मैं अनुममान लगा रहा हूँ, शायद ऐसा ही कुछ, किसी क्षण नरेश के साथ हुआ होगा। और घर में अकेले बैठे-बैठे ही वह दुनिया से जुड़ गया। 

कभी, किसी से सुना था (शायद अपने ब्लॉग पर लिखा भी हो) कि लक्ष्मी की तीन स्थितियाँ होती हैं - दान, भोग और नाश। आपके पास यदि अपनी आवश्यकताओं से अधिक धन हो तो ‘दान’ उसके उपयोग की सर्वोत्कृष्ट स्थिति है। लेकिन यदि दान करने को जी न करे, मन में आए कि न दिन को दिन समझा न रात को रात। सर्दी-गर्मी-बरसात नहीं देखी। बैल की तरह जुट कर धन कमाया। ऐसे धन को भला किसी को दान कैसे कर दूँ? तब उत्कृष्ट स्थिति होती है कि आदमी उसे खुद पर खर्च कर ले, उसका उपभोग कर ले। लेकिन यदि न दान किया न ही उपभोग तो उसकी तीसरी और अपरिहार्य स्थिति होती है - नाश। चोरी चला जाएगा, आग लग जाएगी, नोटों को दीमक लग जाएगी, उधारी डूब जाएगी आदि-आदि। कभी-कभी मुझे लगता है, कहीं नरेश ने लक्ष्मी की यह व्याख्या तो नहीं सुन ली?
  
वास्तविकता या तो नरेश जाने या फिर ईश्वर लेकिन ऐसे बदलाव मुझे आदमी के पुनर्जन्म जैसे लगते हैं - एक नया जीवन, एक नया जीव, एक नया आदमी, एक बेहतर आदमी। 

मैं कहने का साहस नहीं जुटा पा रहा कि ‘काश! ऐसा मेरे साथ हुआ होता।’ क्योंकि ऐसा तब ही होता है जब आदमी खुद ऐसा होने के लिए तैयार हो।

सुनता रहा हूँ कि अपनी इच्‍छाओं की पूर्ति हेतु ईश्‍वर सुपात्रों का चयन करता है। लेकिन निस्‍सन्‍देह  नरेश ने यह तैयारी खुद ही की होगी।
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खिलाड़ी, मजदूर, आबादी, जनमत और जन प्रासाद



बर्लिन से बब्‍बू को
पहला पत्र - छठवाँ/अन्तिम हिस्सा


खिलाड़ियों पर यह देश बहुत ध्यान देता है। आज से 25 वर्ष पूर्व जब इस देश ने खेलकूद पर पैसा खर्च करना शुरु किया तो पश्चिम ने इसकी बहुत आलोचना की। वैसे ही जैसी कि हमारी अणु नीति पर की गई है। पर यह देश अपने खिलाड़ियों को अवसर देता रहा। परिणाम ओलम्पिक (माण्ट्रियल) की पदक तालिका पर अमिट है। जब मैंने कुछ ओलम्पिक खिलाड़ियों से भेंट करने की इच्छा प्रकट की तो मुझे बताया गया कि हमारे खिलाड़ी अभी थकान उतार रहे हैं, आराम कर रहे हैं। हम उन्हें किसी तरह की बाधा नहीं पहुँचायें, कृपा होगी।

यहाँ के मजदूर की समस्या आज न रोटी है न कपड़ा। और मकान, शिक्षा या चिकित्सा तो है ही नहीं। उसकी समस्या अब है टेलिविजन, कपड़े धोने की मशीन और रेफ्रीजरेटर। सन 1980 तक यह सब हर वर्कर को प्राप्त हो जायेगा ऐसा वादा अगले प्लान में आ रहा है।

रिहायशी मकानों की समस्या को इस देश ने जिस तरह हल किया है उसका मुकाबला इतिहास में नहीं है। 1945 में यह सारा देश राख और मलबे का ढेर मात्र था। आज शहरों के आसपास ऊँची-ऊँची आवासीय बस्तियों के इन्द्रलोक बस गये हैं। 20 हजार से कम आबादी वाला कोई उपनगर नहीं बसाया गया। हर उपनगर में हर सुविधा प्रदान की गई। एक कमरे का फ्लैट, दो कमरों का फ्लैट और फिर तीन, चार और पाँच कमरों के फ्लैट।

साफ सफाई की बात क्या पूछिये! सड़कें, गलियाँ, घर, आँगन, बाग-बगीचे और गलियारे, बाथरूम, सब मन्दिरों की तरह साफ और सजे हुए। मकानों के रंग बिलकुल सादे। कोई रंगीनी पुताई में नहीं। सड़कें, फुटपाथ फूलों, पौधों से लहलहाते। जगह-जगह कचरा पेटियाँ और चलती फिरती कचरा बटोरने वाली ट्रालियाँ। गन्दगी से कोई रिश्ता नहीं।

पीने के पानी का कोई नल मीलों तक नहीं। पानी पीना हो तो बाथरूम में जाओ और नल चला कर पानी पियो। होटलों में पानी नहीं दिया जाता। न कहीं सार्वजनिक मूत्रालय, न शौचालय। हर आदमी मानो कहीं जरूरी काम से भागा जा रहा हो। धीरे चलने का कोई कारण नहीं। सबको न जाने कौन-सी जल्दी पड़ी है। कोई किसी की न तो सुनता है न कहता है।

जनमत और जन प्रासाद
साम्राज्यवाद, अमेरिका, प्रतिक्रियावाद, नाजीवाद, फासिस्ट, हिटलर, सम्प्रदायवाद, रंगभेद ये ऐसे शब्द हैं जिन्हें पूरी नफरत के साथ बोला जाता है। पूँजीवाद माँ-बहिन जैसी गाली के अर्थ में प्रयुक्त होता है। जबकि शान्ति, अमन, भाईचारा, समाजवाद, साम्यवाद, मित्रता, कॉमरेड, संघर्ष, मुक्ति, मानवता, समानता ऐसे शब्द हैं, जिन्हें बोलते समय गर्व और प्रगति का अनुभव किया जाता है। गाँंधी, नेहरु, लेनिन, मार्क्स को आदर से बोला जाता है। इन्दिरा गाँधी और भारत के प्रति आत्मीय समादर व्यक्त होता है। भारतीयों को ये लोग पवित्र पूज्य और आदर्श मानते हैं। भारतीयों की कमजोरियों से खूब परिचित है यह देश। पर भारत ने गये 30 सालों में बिना किसी नो-हाऊ के जो तकनीकी तरक्की की है, वैज्ञानिक विकास किया है और समाजवाद को हृदय से स्वीकार किया है उसका लोहा यह देश खुलकर मानता है। हमारी यात्रा के ओर-छोर कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े हैं। अभी-अभी इस देश की 9वीं काँग्रेस सम्पन्न हुई है। जुलाई में इन्दिराजी का भव्य स्वागत इस देश ने किया। आगामी सत्रह अक्टूबर को यहाँ की संसद और काउण्टी कौंन्सिलों (प्रान्तीय-विधानसभाओं) के आम चुनाव हैं। माण्ट्रियल की अद्भुत विजय, माओ की मृत्यु, भारतीय हवाई जहाज का अपहरण वातावरण में अपना असर बनाये हुए हैं। किसी बात पर यहाँ वाले चुप हो जाते हैं तो किसी बात पर हम चुप्पी लगा जाते हैं। 

अद्भुत है यहाँ का संसद भवन जिसे पीपुल्स पैलेस कहा जाता है। मैंने इसे जन प्रासाद नाम दिया है। मात्र 32 महिनों में यह विशाल भवन आधुनिकतम तकनीक पर बना दिया गया। यह आश्चर्य की बात है। पूरा भवन तो हम लोग नहीं देख पाये पर इसका मात्र एक प्रेक्षागृह हमने देखा है। 5000 सीटों वाला यह सभागार दो तीन बटन दबाने मात्र से चाहे जिस आकार में बदल लिया जाता है। इसका मंच और कुर्सियाँ अपने आप कम ज्यादह हो जाते हैं। 12 भाषाओं में अनुवाद की व्यवस्था इस सभागार में है। पूरे संसद भवन में कहीं भी, एक भी, पर्दा नहीं लगाया गया है। सारी दीवारें स्टील और एल्यूमिनियम की हैं। ताम्रवर्णी पारदर्शी विशाल शीशे, धूप से रक्षा करते हैं और जीवन की हर सुविधा यहाँ उपलब्ध है। यह संसद भवन बर्लिन में है। संसद की बैठक वर्ष में चार या पाँच बार होती है और वह भी केवल एक-एक दिन के लिये। यहाँ की चुनाव पद्धति और कार्यप्रणाली पर पूरा लेख अलग से हो सकता है। कुल पाँच पार्टियाँ जनता में काम करती हैं पर विरोधी दल नाम की कोई चिड़िया इस देश में नहीं है। भ्रष्टाचार, लालफीता और वेश्यावृत्ति इस देश के लिए अपरिचित शब्द है। 

दूसरा पत्र तुझे जल्दी ही लिखूँगा। अभी इतना ही बस।

भाई,