प्रथम प्रीमीयम लेने का अधिकार है बीमा एजेण्ट को


अत्यधिक लोकप्रिय, प्रतिष्ठित और विश्‍वसनीय ब्लाग ‘तीसरा खम्बा’ (http://teesarakhamba.blogspot.com/ )में श्रीयुत दिनेश नारायणजी द्विवेदी की पोस्ट ‘जीवन बीमा के प्रीमीयम की राशि सीधे बीमा निगम को जमा कराएं, एजेण्ट को दी गई राशि की जिम्मेदारी निगम की नही ' (में">http://teesarakhamba.blogspot.com/2008/11/blog-post_14.html)में एक बहुत ही छोटा सा सुधार कर लीजिएगा ।

प्रीमीयम किश्‍तें सामान्यतः दो प्रकार की होती हैं । पहली - नया बीमा कराते समय (अर्थात् नई पालिसी लेते समय) दी जा रही प्रीमीयम । इसे ‘प्रथम प्रीमीयम’ (फर्स्‍ट प्रीमीयम) कहा जाता है । और दूसरी - परवर्ती प्रीमीयम (रीन्यूअल प्रीमीयम) । प्रथम प्रीमीयम चुकाने के बाद दी जाने वाली प्रत्येक प्रीमीयम, यह दूसरी प्रकार की ‘परवर्ती प्रीमीयम’ होती है ।

किसी भी बीमा एजेण्ट को ‘प्रथम प्रीमीयम’ लेने का अधिकार मिला हुआ है । लेकिन इस व्यवहार का अवधारणागत आधार यह होता है कि यह प्रीमीयम लेते समय बीमा एजेण्ट, प्रस्तावक (ग्राहक) के एजेण्ट के रूप में काम कर रहा है ।

इसके सिवाय, बीमा एजेण्ट को और कोई प्रीमीयम लेने का अधिकार नहीं है । लेकिन इस स्थिति को कुछ भी कहा जाए - विक्रयोपरान्त सेवा के नाम पर यह परवर्ती प्रीमीय जमा कराना ही एजेण्ट का मुख्य काम बना हुआ है । ऐसी प्रत्येक परवर्ती प्रीमीयम लेते समय प्रत्येक बीमा एजेण्ट भली प्रकार जानता है कि वह नियमों के प्रतिकूल काम कर रहा है । लेकिन चूंकि ग्राहक यह बात नहीं जानता इसलिए यह व्यवहार निर्बाध गति से चला आ रहा है ।

बीमा करने के बाद, प्रीमीयम जमा कराने की याद दिलाना, एजेण्ट की आचरण संहिता का महत्वपूर्ण निर्देश है । लेकिन ऐसा करते समय वह किसी से प्रीमीयम मांग नहीं सकता । केवल सूचित करेगा कि आपकी प्रीमीयम देय हो रही है या हो गई है जिसे आप निर्धारित समयावधि में जमा करा दें ।

लेकिन, जिस देश में 'भाग्य' और 'भगवान' की दुहाई बिना बात के ही दी जाती हो, वहां बीमा बेचना सबसे कठिन कामों में से एक है । आज भी अधिकांश बीमे ‘जबरिया विक्रय’ (फोर्स्‍ड सेलिंग) की गिनती में आते हैं । ऐसे में, प्रत्येक ग्राहक सामान्यतः बीमा एजेण्ट के सामने एक शर्त अवश्‍य रखता है कि उसे प्रीमीयम जमा कराने की न तो याद आएगी और न ही इस काम के लिए उसे फुर्सत मिलेगी । इसलिए, इन दोनों कामों की जिम्मेदारी यदि एजेण्ट लेने को तैयार हो तो वह बीमा ले लेगा । किसी एजेण्ट की हिम्मत नहीं होती कि यह शर्त मानने से इंकार कर दे ।सो, एजेण्ट समुदाय, नियमों के प्रतिकूल यह व्यवहार करता चला आ रहा है और लगता नहीं कि यह कभी बन्द हो पाएगा । परवर्ती प्रीमीयम लेने का यह व्यवहार पूरी तरह से ग्राहक और एजेण्ट की आपसी समझ और परस्पर विश्‍वास के दम पर चल रहा है और मोटे तौर पर किसी को शिकायत का मौका नहीं मिलता है । जो भी एजेण्ट बीमा व्यवसाय पर निर्भर है, वह इस काम को अपने इष्‍ट की आराधना की तरह ईमानदारी और चिन्ता से करता है और प्रीमीयम जमा कराते ही, जल्दी से जल्दी रसीद पहुंचाता है ।
लेकिन सब तरह के लोग सब जगह, सब संस्थानों में होते हैं । सो, कोई-कोई एजेण्ट (भारतीय जीवन बीमा निगम के एजेण्टों की संख्या इस समय 10,00,000 का आंकड़ा पार कर चुकी है) अमानत में खयानत कर देता है । जब ग्राहक को महीनों तक रसीद नहीं मिलती और उसे उसकी पालिसी लेप्स होने की सूचना मिलती है तो उसे, एजेण्ट को दी गई रकम याद आती है । वह एजेण्ट को पकड़ता है । ऐसे 99 प्रतिशत मामलों में एजेण्ट या तो प्रीमीयम की रकम तत्काल जमा करा देता है या ग्राहक को उसकी रकम लौटा देता है । ऐसे मामले सबसे पहले शाखा प्रबन्धक के सामने जाते हैं लेकिन वे भी मौखिक होते हैं । मुझे यह देख-देख कर आश्‍चर्य होता है कि लिख कर देने वाले, इन एक प्रतिशत में भी बिरले ही होते हैं । शाखा प्रबन्धक अपने स्तर पर एजेण्ट को समझाइश देकर, मामला निपटाने की कोशिश करता है । ऐसे मामले सामान्यतः निपट भी जाते हैं लेकिन फिर भी इस एक प्रतिशत के नाम मात्र प्रतिशत मामले फिर भी रह जाते हैं । तब शाखा प्रबन्धक एक ओर तो ग्राहक को यह कह कर कि ‘इस लेन-देन के लिए भाजीबीनि जिम्‍मेदार नहीं है’ हाथ झटक लेता है लेकिन दूसरी ओर वह एजेण्ट के खिलाफ, एजेन्सी निरस्तीकरण की कार्रवाई भी शुरु कर देता है । यदि ग्राहक अपनी पूरी ईमानदारी से साथ देता है तो एजेण्ट की एजेन्सी निरस्त हो जाती है । मैं जनवरी 1991 से इस व्यवसाय में हूं और मेरी शाखा में, ऐसे आचरण के कारण दो एजेण्टों की एजेन्सियां निरस्त हुई हैं ।

ऐसे में मेरा विनम्र परामर्श है कि अपनी प्रीमीयम यथा सम्भव खुद ही जमा करें या कराएं और हाथों-हाथ रसीद प्राप्त कर निश्चिन्त हो जाएं । आज तो इण्टरनेट के माध्यम से आन लाइन प्रीमीयम भुगतान की सुविधा भी है । लेकिन यदि इस काम के लिए आप अपने एजेण्ट पर निर्भर हो रहे हैं (कृपया इसका मतलब यह बिलकुल न निकालें कि मैं आपको, एजेण्ट के माध्यम से प्रीमीयम जमा कराने का परामर्श दे रहा हूं) तो सर्वाधिक सुरक्षित उपाय है कि आप यह भुगतान ‘भारतीय जीवन बीमा निगम’ के पक्ष में बने और रेखांकित किए चेक से करें, नगद रकम न दें । चेक के पीछे अपना पालिसी नम्बर अवश्‍य लिख दें । यदि आपके पास उपरोक्त दोनों सुविधाएँ नहीं हैं तो फिर आप एजेण्ट को नगद रकम ही देंगे । आप भुगतान चेक से करें या नगद, इस भुगतान के चैबीस घण्टों के तत्काल बाद एजेण्ट से अपनी रसीद मांग लें - बिना कोई संकोच बरते और बिना कोई लिहाज पाले । यदि वह तनिक भी आनाकानी करता अनुभव हो तो तत्काल लिखित में अपनी शिकायत उसके शाखा प्रबन्धक को करें और अगली कार्रवाई में सहायता करें ।
लेकिन इस सबमें एक अच्‍‍छी खबर भी है । भारतीय जीवन बीमा निगम ने अभी-अभी, एजेण्‍‍टों को परवर्ती प्रीमीयम संग्रहण का अधिकार देना शुरु किया है । किन्‍तु इसके लिए 'पात्रता की शर्तें' तनिक कठोर हैं इसलिए ऐसे एजेण्‍टों की संख्‍या नगण्‍य ही है । इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है 'निगम' के इन्‍दौर मण्‍डल (जिसका क्षेत्राधिकार 9 राजस्‍व जिलों में स्थित 32 शाखाएं हैं) ने कुल एक एजेण्‍ट को और समूचे मध्‍य क्षेत्र (जिसमें समूचा मध्‍य प्रदेश और समूचा छत्‍तीसगढ शामिल है) में 6 या एजेण्‍टों को ही यह अधिकार दिया है । ऐसे एजेण्‍टों पास (घर पर अथवा अन्‍यत्र)अपना स्‍वतन्‍त्र और पृथक कार्यालय , इण्‍टरनेट सुविधा और प्रिन्टर होना अनिवार्य है । ऐसे अधिकृत एजेण्‍ट को आप निश्चिन्‍त होकर अपनी प्रीमीयम की रकम दे सकते हैं । ऐसे एजेण्‍ट आपको हाथों हाथ रसीद देंगे जो 'निगम' की वैध और अधिकृत रसीद मानी जाएगी ।

श्रीयुत द्विवेदीजी ने ‘मेरी कविताएं’ (http://alpana-verma.blogspot.com/) की ब्लाग स्वामिनी सुश्री अल्पना वर्मा (email-alpz2007 atyahoo dotcom) की एक जिज्ञासा मुझे फारवर्ड की है । वे पूछती हैं - ‘हम जैसे और भी लोगों के लिए आप क्या सलाह देंगे जो भारत के बाहर हैं । हमें तो एजेण्ट के भरोसे ही रहना पड़ता है और किश्‍तें (डीडी) उसी के माध्यम से जमा करानी पड़ती हैं । अभी तक तो सारी रसीदें हैं ।’

यद्यपि अल्पनाजी ने यह नहीं बताया है कि ऐसा वे कितने समय से कर रही हैं तदपि उनके प्रश्‍न से प्रथम दृष्‍टया दो बातें साफ-साफ अनुभव होती हैं । पहली - वे कम से कम दो वर्षों या उससे अधिक अवधि से, अपने एजेण्ट के माध्यम से प्रीमीयम जमा करा रही हैं । और दूसरी - उनके एजेण्ट ने उन्हें कोई शिकायत का मौका अब तक तो नहीं दिया है और ईमानदारी तथा निष्‍ठापूर्वक उनकी प्रीमीयम जमा करवा कर, रसीदें उन्हें भेज रहा है । मुझे पूरा विश्‍वास है कि यदि उन्होंने ‘तीसरा खम्बा’ की उपरोक्त पोस्ट नहीं पढ़ी होती तो उनके मन में यह सवाल उठता ही नहीं ।

मुझे लगता है कि, इस पोस्ट के, अल्पनाजी की जिज्ञासा प्रस्तुत करने से पहले वाले अंश में उन्हें उनकी जिज्ञासा का समाधान मिल गया होगा । वैसे भी कहावत है कि ताले साहूकारों के लिए लगाए जाते हैं और नियम-कायदे भले-ईमानदार लोगों के लिए बनाए जाते हैं । अल्पनाजी का एजेण्ट निश्‍चय ही ऐसा पूर्णकालिक एजेण्ट होगा जिसका एकमात्र व्यवसाय (और जीविकोपार्जन का एकमात्र जरिया) यह बीमा एजेन्सी ही होगी ।

परवर्ती प्रीमीयम लेते समय चूंकि प्रत्येक एजेण्ट यह बात भली प्रकार जानता है कि इस व्यवहार में तनिक भी अनुचित करने पर न केवल उसकी एजेन्सी निरस्त कर दी जाएगी अपितु उसकी, अब तक बेची गई पालिसियों से मिलने वाला कमीशन भी जब्त कर लिया जाएगा (याने उसकी रोटी छीन ली जाएगी) इसलिए वह पूरी चिन्ता और अतिरिक्त सावधानी से यह सेवा देता है ।

अपवाद सब जगह होते हैं लेकिन हम सब जानते हैं कि अपवाद अन्ततः सामान्य नियमों की ही पुष्‍िट करते हैं ।

बीमा सन्दर्भों में यदि किसी की कोई जिज्ञासा हो तो सूचित कीजिएगा । मुझे प्रसन्नता होगी यदि मैं तनिक भी सहायक और उपयोगी साबित हो सका ।

(जैसा कि मैं बार-बार कहता आ रहा हूं, मुझे तकनीक की जानकारी नहीं हैं । नहीं जानता कि पर्मालिंक केसे दी जाती है । इस हेतु मैं ने अपने गुरु श्रीयुत रवि रतलामीजी से फोन पर और श्रीयुत द्विवेदीजी तथा श्रीयुत अफलातूनजी से ई-मेल से दिशा निर्देश लिए हैं । पता नहीं, मैं पर्मालिंक उपलब्ध करा पाऊं या नहीं, सो पोस्ट में ही सम्बन्धित ‘पते’ लिख दिए हैं ।)


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्‍य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे भेजें । मेरा पता है - विष्‍णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर-19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001

5 comments:

  1. आप के इस आलेख ने मेरे आलेख की सारी कमियाँ दूर कर दी हैं। मेरा आलेख इस चिन्ता से उपजा था कि यदि बीमा एजेन्ट को दिए गए परवर्ती प्रीमियम की किस्त किसी वजह से जमा नहीं होती और पालिसी कालातीत(लेप्स)हो जाती है और उस अवस्था में बीमित का (भगवान न करे)देहान्त हो जाए तो उस के उत्तराधिकारियों को बीमा दावा प्राप्त नहीं हो सकेगा।

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  2. बहुत अच्छा आलेख है. यदि अल्पना जी का कोई बैंक खाता भारत में है तो वे उस बैंक को अपने खाते में से प्रीमियम जमा करने का स्थायी निर्देश (standing instruction)दे सकती हैं. इसके अलावा भारतीय जीवन बीमा निगम में ऑनलाइन जमा की सुविधा भी है: http://licindia.com/online_payment.htm

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  3. Sir,धन्यवाद आप का ,आप ने अपनी पोस्ट के द्वारा यह जिज्ञासा भी दूर कर दी.
    कई सालों से हम बिमा की रकम भर रहे हैं और अभी तक एजेंट से /की कोई शिकायत नहीं आयी है.
    सही कहा उस व्यक्ति की यही रोजी है वह ईमानदार व्यक्ति है.
    लेकिन अगर आप के कहे अनुसार
    इन्टरनेट के मध्यम से पैसे भर सकेंगे तो हमारे लिए भी अच्छा है.
    स्मार्ट इंडियन[अनुराग जी] को भी धन्यवाद उन्होंने LIC का लिंक दिया है.
    बैंक को standing instruction देने के बारे में सोचना पड़ेगा.ऑनलाइन पेमेंट एक बहुत ही बेहतर उपाय है.
    आभार सहित
    अल्पना

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  4. प्रिय महोदय
    मैं LIC of India के लिए एजेंट के रूप मे काम कर रहा हूँ | आपका लेख पडा और अछा भी लगा लेकिन मैं एक और बात आपके ब्लॉग के द्वारा LIC के बीमा धारकों को बताना चाहता हूँ की अगर आप पॉलिसी का प्रीमियम चेक द्वारा जमा करा रहे है तो आप निश्चिंत होकर अपना प्रीमियम किसी भी एजेंट को दे सकतें है |
    आप को ऐसे भी एजेंट मिलेंगे जो केवल आपको सुविधा देने के लियें फ्री सर्विस देतें है।
    यह सच हा की कुछ ब्रष्ट एजेंट इस व्यवसाय का दुरुपयोग करतें है पर सभी पाँच उँगलियाँ बराबर नहीं होती |

    एक मित्र
    तरुण कुमार बंसल
    एजेंट - भारतीय जीवन बीमा निगम
    9899212115 - tarun.lic@gmail.com

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