डीटीएच लगवा ही लीजिए


'एक अपराध बोध से मुक्ति' शीर्षक वाली मेरी पोस्ट (10 अक्टूबर 2008) पर कुछ कृपालुओं ने मेरा उत्साहवर्ध्‍दन करते हुए, डीटीएच को लेकर मेरे अनुभव प्रस्तुत करने का आग्रह किया था ।


मेरे अनुभव बहुत ही सुखद और सन्तोषदायक हैं ।

चित्र और ध्वनि की गुणवत्ता ‘उत्कृष्‍ट’ है और अब ही मैं अनुभव कर पा रहा हूँ कि पहले मुझे कितनी निकृष्‍ट गुणवत्ता का प्रसार प्राप्त हो रहा था ।

विद्युत प्रदाय सन्दर्भ में मेरा आवास ईश्वर कृपा से ‘इमरजेन्सी झोन’ में है, सो मेरे मोहल्ले में बिजली कटौती ‘अत्यधिक गम्भीर स्थिति’ में ही होती है । किन्तु मेरे केबल आपरेटर का आवास ‘इमरजेन्सी झोन’ में नहीं है । उसके यहाँ घण्टों बिजली बन्द रहना सामान्य बात है । ऐसी स्थिति में होता यह था कि मेरे यहाँ तो बिजली चालू लेकिन केबल संचालक के यहाँ अन्धेरा । ऐसे समय में प्रतिदिन मैं अपने टी वी का नीला पर्दा देख-देख कर दुखी होता रहता था । अब मुझे उस दुख से मुक्ति मिल गई है ।

डीटीएच में मुझे स्थानीय चैनलें नहीं मिल रहीं । मुझे दुखी होना चाहिए था । लेकिन मैं तनिक भी दुखी नहीं हूं । इसके विपरीत मैं बहुत सुखी हूँ । ‘लाभ-हानि’ की भाषा में, ‘घाटे में कमी भी मुनाफा’ मानी जाती है । केबल न मिलने के मामले में भी मैं इसी स्थिति में हूँ । निस्सन्देह मुझे स्थानीय समाचार देखने/सुनने को नहीं मिल रहे किन्तु स्थानीय चैनलों के समाचार सम्पादक और समाचार वाचिकाएँ, अपना ‘भाषा कौशल’ दिखाने ने जो अशुध्द और गलत भाषा प्रयुक्त करते थे वह सब देख/सुन कर मेरा रक्त उबालता रहता था । उन पर आने वाले आक्रोश से अधिक आक्रोश इस बात पर आता था कि मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ । अब उस ‘रक्त-उबाल और आत्म-ग्लानि भाव’ से मुक्ति मिल गई है और पूर्ण सामान्य तथा पूर्ण नियन्त्रण में है । स्थानीय समाचार न मिलने के दुख के मुकाबले अशुध्‍द और गलत हिन्दी से बचने का सुख कहीं अधिक है ।

केबल वाले को प्रति माह भुगतान करने के बाद भी पावती न मिलने और कर-चोरी में भागीदार होने के अपराध बोध से मुक्ति तो मुझे आठ अक्टूबर से ही मिल चुकी थी । उससे उपजा सुख प्रति माह घना होता जा रहा है ।

एक बड़ी असुविधा अवश्‍य मुझे हो रही है । ‘सहारा-समय’ और ‘ई-टीवी’ के मध्य प्रदेश के चैनल मुझे नहीं मिल पा रहे हैं । चुनावी समय में यह कमी तनिक अधिक खल रही है । इसके लिए मैं सम्बन्धित कम्पनी से निरन्तर सम्पर्क कर रहा हूँ । जानता हूँ कि यह उलझा हुआ, तकनीकी मामला है । लेकिन ‘एक ही बात बार-बार कहने से कभी न कभी तो सुनवाई होगी ही’ वाली आशा मुझे बराबर थामे हुए है । बिना थके, बिना ऊबे, निरन्तर प्रयास करने में, बीमा ऐजण्ट की मेरी मानसिकता और आदत बहुत बड़ी सहायक हो रही है - मेरा नियन्त्रण केवल प्रयत्नों पर है, परिणाम पर नहीं ।

यदि कोई मेरा मन्तव्य जानना चाहे तो मैं पहली ही बार में कहूँगा - फौरन ही डीटीएच लगवा लीजिए । मेरी उक्त पोस्ट, स्थानीय साप्ताहिक उपग्रह में भी छपी थी । उससे प्रेरित होकर अब तक कम से कम नौ लोगों ने फोन पर मुझे बताया है उन्होंने केबल से मुक्ति पा ली है । कुछ लोग ऐसे भी होंगे जिन्होंने डीटीएच लगवा लिया होगा लेकिन जिनकी खबर मुझे नहीं है ।

डीटीएच में सुख अधिक है, दुख कम । मैं इसकी अनुशंसा करता हूँ ।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्‍य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्‍य भेजें ! मेरा पता है - विष्‍णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर-19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001

8 comments:

  1. आपके शहर में डी टी एच की कितनी कम्पनियाँ हैं ? एक केन्द्रीय कानून है (केबल वालों के लिए) कि दूरदर्शन को प्राइम बैण्ड में दिखाना ही होगा।क्या यह डी टी एच पर लागू नहीं है ?

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  2. मेरे शहर में दूरदर्शन का डीटीएच प्‍लस, डिश टीवी (जिसका मैं ग्राहक हूं), टाटा स्‍काय और बिग टीवी मौजूद हैं । अन्‍यों का तो पता नहीं किन्‍तु मुझे दूरदर्शन की नेशनल चैनल मिल रही है । हां, इसकी प्रादेशिक चैनल नहीं मिल रही । डी डी इण्डिया भी मिल रही है । कुछ दिनों पहले तक डी डी भारती मिल रही थी, अब नहीं मिल रही ।

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  3. स्थान स्थान की बात है जैसे आपका रक्त उबाल खाता था स्थानीय चैनल की वाचक-वाचिकाओं को देखकर कुछ वैसा ही हमारा खून भी उबाल खाता था इन देसी चैनलों के रिपोर्टरस को खबर देते हुए।

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  4. लगता है डीटीएच पर जाना ही होगा।

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  5. आपने सही कहा. इसमे कोई परेशानी नहीं है. लेकिन ये लोग नई नई सुविधाएँ लाते जाएँगे और हर ऐसी सुविधा के लिए अलग धन राशि की माँग होगी.

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  6. घाटे में कमी भी मुनाफा’ मानी जाती है-हा हा!! मजेदार.

    डी टी एच के अपने फायदे हैं.

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  7. dth per vichar karlate he
    regards

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  8. बधाई हो वैरागी जी! सही कहते हैं कि "patience pays"

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