Thursday, April 9, 2009

समनुदेशन अर्थात् बीमा पालिसी को मूल्यवान सम्पत्ति का दर्जा

हममें से अधिकांश इस बात पर आश्चर्य ही करेंगे कि जीवन बीमा पालिसी को ‘मूल्यवान सम्पत्ति’ की तरह भी प्रयुक्त किया जा सकता है। किन्तु, जीवन बीमा क्षेत्र में यह अत्यन्त सहज और प्रचलित वास्तविकता है। इसका ज्ञान उस प्रत्येक पालिसीधारक को हो चुका होगा जिसने किसी वित्तीय संस्था से साधारण ऋण अथवा गृह ऋण लिया होगा।


जब कोई व्यक्ति किसी उद्यम, उपक्रम के लिए अथवा मकान खरीदने/बनाने के लिए किसी वित्तीय संस्था से ऋण लेता है तो वह संस्था प्रतिभूति (जमानत अथवा सिक्यूरिटी) के बतौर तत्सम्बन्धित उपक्रम/उद्यम की परिसम्पत्तियों/मकान को अपने पक्ष में गिरवी रखती हैं। अनेक वित्तीय संस्थाएँ, जीवन बीमा पालिसी को ‘सम पार्श्‍व प्रतिभूति’ (कोलेटरल सिक्यूरिटी) के रूप में गिरवी रखवाती हैं।

ऋण चुकाने से पहले ही यदि दुर्भाग्यवश ऋणधारक की मृत्यु हो जाए तो उसके परिवार पर दोहरा संकट आ जाता है। पहला संकट-घर के लिए रोजी-रोटी कमाने वाला नहीं रहता। और दूसरा संकट-लिया गया ऋण चुकाने का कानूनी उत्तरदायित्व, मृतक के विधिक उत्तराधिकारियों पर आ जाता है।
ऐसे समय में, गिरवी रखी गई जीवन बीमा पालिसी ही ऋण वसूली के लिए सबसे पहले काम में आती है। पालिसी से मिलने वाली रकम का समायोजन, बकाया ऋण राशि में किया जाता है। यदि पालिसी से मिली रकम, शेष ऋण राशि से अधिक है तो ऋण राशि वसूलने के बाद बाकी रकम, ऋणधारक के परिजनों को लौटा दी जाती है। यदि पालिसी से मिली रकम, शेष ऋण रकम से कम है तो,तत्सम्बन्धित उद्यम/उपक्रम की गिरवी रखी गई परिसम्पत्तियों/मकान को बेच कर शेष ऋण की वसूली की जाती है। इसके बाद भी यदि ऋण शेष रहता है तो उसकी वसूली उसके विधिक उत्तराधिकरियों से की जाती है।

कई प्रकरणों में, ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ, उद्यम/उपक्रम की परिसम्पत्तियों/मकान के अतिरिक्त किसी सुदृढ़ आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति की जमानत भी माँगती हैं। यदि ऐसी जमानत ली गई है तो ऋण वसूली के लिए उस जमानतदार पर भी विधिक उत्तरदायित्व आता है।

स्पष्ट है कि जिस जीवन बीमा पालिसी को बहुत ही हलके से लिया जाता है वही जीवन बीमा पालिसी ऐसी आकस्मिक विकट आपदा के समय सबसे बड़ी और सबसे पहली सहायक पसिम्पत्ति बन कर सामने आती है। किन्तु ऐसा तभी हो पाता है जब जीवन बीमा पालिसी का ‘समनुदेशन’ कराया गया हो। यह ‘समनुदेशन’ ही जीवन बीमा पालिसी को ‘मूल्यवान सम्पत्ति’ का स्वरूप प्रदान करता है।

अंग्रेजी के ‘असाइनमेण्ट’ का कानूनी अनुवाद है-समनुदेशन। आसानी से समझने के लिए इसे ‘गिरवीनामा’ भी कहा जा सकता है जो इसका भावानुवाद होगा, विधिक अनुवाद नहीं। इसलिए याद रखिएगा कि यदि आप जीवन बीमा कार्यालय में जाकर ‘मुझे अपनी पालिसी गिरवी रखनी है’ अथवा ‘मुझे पालिसी पर गिरवीनामा अंकित करवाना है’ कहेंगे तो आपके काम में देर हो सकती है। किन्तु यदि आप ‘मुझे अपनी पालिसी असाइन करनी है’ अथवा ‘मुझे अपनी पालिसी पर असाइनमेण्ट अंकित करवाना है’ कहेंगे तो आपका काम जल्दी हो सकेगा।

जैसा कि शुरु में कहा गया है, आपकी जीवन बीमा पालिसी वह मूल्यवान सम्पत्ति है जिसे ऋण लेने के लिए प्रतिभूति (जमानत) के रूप में गिरवी रखा जा सकता है। जीवन बीमा पालिसी को गिरवी रखने की इस प्रक्रिया को ही समनुदेशन अथवा असाइनमेण्ट कहा जाता है।


समनुदेशन कौन कर सकता है?
वह प्रत्येक पालिसीधारक जो पूर्ण वयस्क हो, जो भारतीय कानूनों के अनुसार अनुबन्ध करने की पात्रता रखता हो और जिसमें पालिसी निहित (वेस्ट) हो चुकी हो, अपनी पालिसी पर समनुदेशन कर सकता है।


किसके पक्ष में किया जा सकता है समनुदेशन?
सामान्यतः यह (समनुदेशन) किसी ऐसी वित्तीय संस्था के पक्ष में ही किया जा सकता है जिससे, पालिसीधारक ऋण ले रहा है। किसी व्यक्ति के पक्ष में समनुदेशन सामान्यतः नहीं ही होता है। जीवन बीमा पालिसी चूँकि ‘परिवार के बीमा हित (इंश्योरेबल इण्टरेस्ट)’ को ध्यान में रख कर ली जाती है इसलिए, जीवन बीमा पालिसियों की खरीदी-बिक्री को निरुत्साहित करने के लिए, व्यक्ति के पक्ष में समनुदेशन न करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है तथा अतिरिक्त सतर्कता बरती जाती है।


समनुदेशन कैसे होता है?
इसकी एक सुनिश्चित प्रक्रिया है।
समनुदेशन के लिए पालिसीधारक अपनी बीमा कम्पनी को लिखित सूचना (नोटिस) देता है जिसमें समनुदेशन का कारण तथा जिसके पक्ष में समनुदेशन किया जाना है उस संस्था का नाम/पता सूचित करता है।
इस सूचना के साथ ही, समनुदेशन की इबारत मूल पालिसी पर लिख/टाइप कर, मूल पालिसी अभिलेख, बीमा कम्पनी को प्रस्तुत करनी पड़ेगी। भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा जारी किए गए पुराने पालिसी अभिलेखों में तो पर्याप्त खाली स्थान उपलब्ध होता है किन्तु इन दिनों जारी किए जा रहे पालिसी अभिलेखों में ऐसा खाली स्थान नहीं है। जिन पालिसी अभिलेखों में खाली स्थान नहीं है ऐसे प्रकरणों में, समनुदेशन की इबारत, 20 (बीस) रुपयों के अन्यायिक (नान ज्युडिशियल) स्टाम्प पेपर पर अंकित कर प्रस्तुत करनी पड़ेगी।
इस सूचना के आधार पर बीमा कम्पनी अपने अभिलेखों में इस समनुदेशन की प्रविष्टि कर, इसे पंजीबध्द करेगी और मूल पालिसी उस वित्तीय संस्था को पंजीकृत डाक से भेज देगी जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है। यदि समनुदेशन, स्टाम्प पेपर पर अंकित किया गया है तो वह स्टाम्प पेपर भी पालिसी अभिलेख का भाग बन जाएगा और मूल पालिसी अभिलेख के साथ वह स्टाम्प पेपर भी भेजा जाएगा।
समनुदेशन पंजीयन के लिए पालिसीधारक को 250 रुपये (दो सौ पचास रुपये) का शुल्क चुकाना पड़ेगा।

पालिसी और पालिसीधारक पर समनुदेशन के क्या प्रभाव पड़ेंगे?

इसके दो प्रत्यक्ष और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रभाव होते हैं
पहला - समनुदेशन पंजीकृत होते ही, पालिसी पर से पालिसीधारक के समस्त अधिकार समाप्त हो जाते हैं और समनुदेशित पालिसी उस वित्तीय संस्था की सम्पत्ति हो जाती है जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है। अर्थात् पालिसी से मिलने वाले समस्त लाभ और समस्त प्रतिफल उस वित्तीय संस्था को मिलेंगे जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है।

वह संस्था चाहे तो ऐसी पालिसी को अभ्यर्पित (सरेण्डर) कर सकती है अथवा किसी अन्य संस्था के पक्ष मे समनुदेशन कर सकती है।
दूसरा - समनुदेशन के प्रभाव में आते ही, पालिसीधारक द्वारा पालिसी पर कराया गया नामन (नामीनेशन) स्वतः निरस्त हो जामा है।

समनुदेशन के बाद रिस्क कवर की स्थिति क्या होगी?
समनुदेशन से रिस्क कवर की स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता है। समनुदेशन के बाद भी रिस्क कवर उसी व्यक्ति (बीमित व्यक्ति) का होगा जिसके जीवन पर पालिसी ली गई है।

समनुदेशन के बाद यदि बीमित व्यक्ति किश्तें जमा कराना बन्द कर दे तो?
अपनी जीवन बीमा पालिसी की किश्तें जमा करना या न करना, पालिसी को प्रभावी बनाए रखना या समय पूर्व ही बन्द कर देना, पालिसीधारक का अधिकार है। किन्तु ऐसा बिलकुल ही नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह न केवल आत्मघाती अपितु आश्रित परिवार के लिए भी अत्यधिक घातक होता है।
जीवन बीमा पालिसी के पूरे लाभ तभी मिलते हैं जब कि उसे उसकी पूरी अवधि के लिए प्रभावी बनाए रखा जाए। जो पालिसी समनुदेशित की जा चुकी है, उसे प्रभावी बनाए रखना तो और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।
इस आशंका को ध्यान में रखकर, ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ विभिन्न व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करती हैं। कुछ संस्थाएँ, बीमित व्यक्ति की बीमा किश्तें खुद ही जमा कर, किश्तों की रकम, ऋणधारक के नाम लिख देती हैं। कुछ वित्तीय संस्थाएँ ऋणधारक से लिखित अनुबन्ध कराती हैं कि वह निर्धारित समयावधि में अपनी प्रीमीयम किश्तें जमा कर उनकी रसीदें ऋणदाता वित्तीय संस्था को नियमित रूप से प्रस्तुत करेगा। इस शर्त का उल्लंघन करने पर वित्तीय संस्थाएँ, ऋणधारक पर आर्थिक दण्ड भी आरोपित करती हैं।

ऋणधारक बीमित व्यक्ति द्वारा समय पर किश्तें जमा न कराने के कारण, पालिसी कालातीत (लेप्स) हो जाने की दशा में ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ, समूची ऋण राशि की एकमुश्त वसूली जैसी कानूनी कार्रवाई करने के अधिकार भी अपने पास सुरक्षित रख सकती हैं।

यदि कोई बीमित/पालिसीधारक, बीमा कम्पनी को सूचित किए बिना ही पालिसी किसी को समनुदेशित कर दे तो?

ऐसा हो सकता है और ऐसा होने पर बीमा कम्पनी को कोई आपत्ति नहीं होगी। किन्तु जब भी पालिसी के लाभों अथवा प्रतिफल के भुगतान की स्थिति बनेगी तब बीमा कम्पनी उसी व्यक्ति को भुगतान करेगी जिसका उल्लेख इस हेतु, बीमा कम्पनी के अभिलेखों में किया गया है।ऐसे प्रकरण में चूँकि समनुदेशन का पंजीयन बीमा कम्पनी के अभिलेखों में अंकित नहीं है इसलिए पालिसी से मिलने वाला भुगतान या तो पालिसीधारक को किया जाएगा अथवा मृत्यु दावे की स्थिति में पालिसी में नामित व्यक्ति को किया जाएगा।

बीमा कम्पनी को सूचित किए बिना और बीमा कम्पनी के अभिलेखों में पंजीयन कराए बगैर किया गया समनुदेशन, पालिसीधारक और समनुदेशित के बीच का मामला है जिससे बीमा कम्पनी का कोई लेना-देना नही है। समनुदेशित को भुगतान की जिम्मेदारी बीमा कम्पनी पर तब ही आती है जब समनुदेशन बीमा कम्पनी के अभिलेखों में पंजीकृत किया गया हो।

क्या अवयस्क के जीवन पर जारी जीवन बीमा पालिसी भी समनुदेशित की जा सकती है?
हाँ, की जा सकती हैं। ऐसा सामान्यतः, बच्चों की उच्च शिक्षा हेतु लिए जाने वाले ‘शिक्षा ऋण’ के लिए किया जाता है। ऐसे प्रकरणों समनुदेशन की सारी औपचारिकताएँ, बीमा प्रस्तावक (जो कि अवयस्क बच्चे का पिता अथवा माता में से कोई एक होता है) पूरी करेगा और अवयस्क बच्चा इस पूरी प्रक्रिया से दूर ही रहेगा। ऐसे प्रकरण में समनुदेशन करने वाले (अर्थात् बच्चे के पिता अथवा माता) को यह यह लिखित वचन देना होगा कि इस ऋण राशि का उपयोग पूर्णतः बच्चे के लिए, बच्चे के हित में ही किया जाएगा।

सम्पूर्ण ऋण चुका देने के बाद पालिसी की स्थिति क्या होगी और पालिसीधारक को तत्काल ही क्या करना चाहिए - यह सब अगली किसी किश्त में।

(‘समनुदेशन’ अत्यन्त विस्तृत विषय है। यहाँ उन्हीं बातों को प्रस्तुत किया गया है जो सर्वाधिक व्यवहार में हैं।)
कृपया सदैव की तरह याद रखिएगा कि ये जानकारियाँ मेरे अधिकतम और श्रेष्ठ ज्ञान के आधार पर प्रस्तुत हैं। इन्हें कृपया भारतीय जीवन बीमा निगम की अधिकृत जानकारियाँ न समझें।
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3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप ने समनुदेशन से संबंधी जानकारी उपलब्ध करा कर बहुत ही उपयोगी काम किया है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत अच्छी जानकारी .

P.N. Subramanian said...

आप द्वारा दी जाने वाली जानकारियों से लोग लाभावन्वित हो रहे हैं इस बात की ख़ुशी है.

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