रिश्तों को बदरंग कर देता है अन्ध विश्वास

{साप्ताहिक उपग्रह (रतलाम) के 9 से 15 अप्रेल वाले अंक में प्रकाशित यह लेख मेरे धारदार बालसखा अर्जुन पंजाबी का है। नीमच और मन्दसौर जिले के पाँच-छः अखबार, अर्जुन के लिखे को सप्ताह में दो-तीन दिन छापते ही छापते हैं। उसके व्यंग्य, पढ़ने वाले को ‘अश्-अश्’ करने को विवश कर देते हैं।
यह लेख पढ़ कर मुझे आश्यर्च हुआ क्यों कि ज्योतिष और कुण्डली जैसी बातें उसके लेखन की विषय वस्तु कभी नहीं रही। लेख पढ़कर मेरी ‘छठवीं इन्द्री’ जाग्रत हो गई। मैंने अर्जुन को फोन लगाया तो आशा भाभी ने बताया कि वह जयपुर गया हुआ है। मुझे चैन नहीं पड़ा। मैंने मनासा में उसके आसपास के कुछ मित्रों के फोन घनघनाए। आठवें प्रयत्न में मुझे सफलता मिल गई।
यह लेख एक सत्य घटना से उपजा है। अर्जुन के (और मेरे भी) एक घनिष्ठ मित्र की बिटिया का रिश्ता (जातिगत स्तर पर आयोजित एक परिचय सम्मेलन में) तय हो ही गया था। लड़की-लड़के की आपसी पसन्द सहित सारी की सारी बातें सौ टका अनुकूल थीं। किन्तु बात ‘कुण्डली मिलान’ पर आकर अटक गई। लड़के की माँ इस मामले में ‘कोई भी जोखिम’ नहीं लेना चाहती थी और परिचय सम्मेलन में, लड़कीवालों के पास कुण्डली थी नहीं। उन्हें बाद में कुण्डली भेजी गई। दोनों कुण्डलियों का मिलान नहीं हुआ। सो लड़के की माँ ने क्षणांश का भी विलम्ब किए बिना इंकार कर दिया। लड़की वालों की छोड़िए, खुद लड़का और लड़के का पिता भी इस सम्बन्ध के लिए उतावले थे। दोनों ने रिश्ते के लिए जोर दिया किन्तु लड़के की माँ टस से मस नहीं हुई और लगभग बना-बनाया रिश्ता (ऐसा बना-बनाया कि केवल लग्न लिखे जाना ही बाकी रह गए थे) टूट गया।
यह लेख न केवल अर्जुन के गुस्से को प्रकट करता है अपितु परम्परा को रूढ़ी बनते देखने की विवशता से उपजी खीझ भी उजागर करता है। अर्जुन के इस लेख को यहाँ देने से मैं खुद को रोक नहीं पाया।}

मौजूदा विसंगत और विकट समय में लोगों ने दूसरों के लिए सोचना बन्द कर दिया है। बात कोई भी हो, मूल्यांकन का आधार 'आर्थिक' ही हो गया है और रिश्तों की ऊष्मा तथा मिठास मानो गुम हो गई है। अन्ध विश्वास ने इसमें आश्चर्यजनक योगदान दिया है।ऐसे अन्ध विश्वासों वाली बातें तो यद्यपि बहुत हैं पर ‘कुण्डली-मिलान’ इनमें यदि प्रमुख नहीं तो महत्वपूर्ण तो है ही।

आम आदमी के जीवन में सतत् बढ़ते जा रहे आर्थिक तनावों/दबावों और दिन-प्रति-दिन सिकुडती जा रही दुनिया में ‘कुण्डली मिलान’ एक मुद्दा तो हो सकता है पर इसे बुनियादी और एकमात्र निर्णायक मुद्दा मान लेना किसी भी तरह उचित नहीं है। सही अर्थों में यह भटकाव है, भूल है।कुण्डली का कोई गणितीय या वैज्ञानिक आधार होता तो अलग-अलग पण्डित इसका भाष्य अलग-अलग नहीं करते। यदि दो और दो यहाँ चार होते हैं तो लन्दन और अमेरिका में भी चार ही होंगे। पाँच या तीन नहीं होंगे। पर कुण्डली के मामले में ऐसा नहीं है। इसमें कहीं पाँच हो जाते हैं, कहीं तीन हो जाते हैं, और कहीं दो-एक ही रह जाते हैं।

'गुण मिलान' के मामले में कुछ दिन पहले तक कहा जा रहा था कि कम से कम सत्‍तर प्रतिशत गुण तो मिलने ही चाहिए। अब यह अनिवार्यता तीस प्रतिशत पर आकर टिक गई है। ‘मांगलिक-अमांगलिक’ देखने को लेकर कहीं कहा जाता है कि 20 वर्ष की आयु के बाद इस देखने का कोई अर्थ नहीं है तो कहीं यह आयु 25 वर्ष तक की छूट दे रही है। कहीं मांगलिक के ‘परिहार’ हैं कहीं उन्हें नहीं माना जाता।

एम.एससी. कर, सी.बी.एस.ई. पाठ्यक्रम की कक्षाएँ पढ़ा रही एक युवती की कुण्डली देख कर पण्डित ने कह दिया कि ‘काल सर्प योग’ है। किन्तु वही कुण्डली जब जाने माने ज्योतिषाचार्य श्री राधाकिशन श्रीमाली को दिखाई (और काल सर्प योग वाली बात बताई) तो उन्होंने छूटते ही कहा - ‘किस पण्डित ने कहा है कि काल सर्प योग है? इन पण्डितों से कहो, भैय्या! सौ पाँच सौ लेना है तो यूँ ही ले लो पर ऐसे गुमराह मत करो।’

यह मामला बताता है कि कुण्डली मिलान अवैज्ञानिक है। और यदि इससे अलग हटकर और कुछ है भी तो इसका सही भाष्य नहीं है। सटीक कुछ भी नहीं है।इसमें विचारने की बात यह भी है कि संसार के मुश्किल से दो प्रतिशत लोग ही ‘कुण्डली-मिलान’ को आधार बनाते हैं। क्या शेष, अधिसंख्य लोग, अकाल और अप्रत्याशित मौत मर रहे हैं? वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। ये तमाम 98 प्रतिशत लोग वे हैं, जो अपनी नींद सोते हैं, अपनी नींद जागते हैं। विचारों के खुले आकाश में, अपनी जिन्दगी जीते हैं, उधार की नहीं। वे नाड़ी दोष, गण दोष, नवम् पंचम, बैर योनी, गृह मैत्री दोष, नक्षत्र दोष, कालसर्प दोष, मंगल दोष से घिरे किसी चक्रव्यूह में अपने ‘रिश्तों के अभिमन्यु' को नहीं भेजते हैं। वे इस बात से वाकिफ हैं कि दुर्योधन- शकुनी-कर्ण-जयद्रथ-दुःशासन से सज्जित यह चक्रव्यूह षड़यन्त्रपूर्वक अभिमन्यु को घेर लेता है। अभिमन्यु उसमें जा तो सकता है, उसे तोड़कर बाहर नहीं आ सकता। कुण्डली मिलान भी ऐसा ही मामला है। इसमें जाने या न जाने तक आप स्वतन्त्र हैं। बाद में नहीं। चिन्तन करें और निर्णय लें।

‘कुण्डली-भीरु’ बनना ठीक नहीं। एक हद तक उस पर भरोसा किया जा सकता है किन्तु ‘वहम्’ की सीमा तक चले जाना घातक है। ‘वहम्’ तो ऐसा मानसिक रोग है जिसमें व्यक्ति अपनी ही रसोई में गिरने वाले बर्तन से पैदा हुई आवाज से भी बुरी तरह चैंक जाता है। बर्तन गिरना ‘अप्रत्याशित’ है, पर है स्वाभाविक। जीवन में घटित ‘अनहोनी-अप्रत्याशित’ भी स्वाभाविक है। उसे ग्रहों के खेल मान लेना अन्धविश्वास है। हमें इससे उबरना होगा। ईश्वरवादी बनना होगा।

इसमें तथ्यपरक एक और बात यह है कि जब ऐसा कुण्डली मिलान नहीं किया जाता था तो रिश्तों में आज की बनिस्बत अधिक मेल था। न यूँ बेटियाँ तिल-तिल जल रही थीं, न बहुएँ आग में जलती थीं, न रिश्ते टूटते थे इस कदर, न इतने ‘तलाक’ होते थे। ‘कुण्डली मिलान’ ने ‘बेमेल-अनचाहे रिश्तों को जन्म दिया है। कटुता को बढ़ाया है।

रिश्तों के लिए पुनः विचारें। ईश्वर पर, संयोग पर भरोसा करें। और बनने दें उस रिश्ते को, जो मन को, आत्मा को ठीक लग रहा है। बनने दें उस बात को जो प्रथम दृष्टि में ही सुकून दे रही है। जँच रही है। भा गई है। बनने दें उस बात को जो ईश्वर की मर्जी से बन रही है। रिश्ते जब ऊपर से बनकर आते हैं, तो बनाने दें उस ऊपर वाले को। ये रिश्ते ऐसे होंगे जिन्हें हम अपनी बुद्धि की अपेक्षा संयोग के हाथों, विश्वास के हाथों सौंपेंगे। वे न केवल बेहतर होंगे, सुख, समृद्धि, सुकून, सन्तोष, सौभाग्य दायक भी सिद्ध होंगे।

तय करें कि हम कुण्डली मिलान को सतही तौर पर रखेंगे। ईश्वर के मिलान पर भरोसा ज्यादा करें। तब हम लौट सकेंगे उस खुशनुमा समय की ओर जिसमें रिश्तों में भरपूर प्रेम-प्यार था, तालमेल था, सौहार्द्र भाव था, दोस्ती थी, एक-दूसरे की मर्यादा को कायम रखने का भाव था। रिश्तेदारी में भाईचारा और सगापन था। ऐसे ही शीतल भावों में पल्लवित रिश्तों की फसल उगाएँ। हर जंजीर, हर बन्धन, हर जकड़न, हर कैद की सलाखों से बाहर आकर मुक्त विचारों के आकाश में रिश्तों की फसल को यदि लहलहाना है तो खुले विचार-खुले दिल को रिश्ते की बुनियाद बनाएँ। सतही मुद्दों को प्रमुख न बनाएँ । तब ही बनेगी बात। तब बनेंगे रिश्ते। अस्तु।

सम्‍‍पर्क : अर्जुन पंजाबी, 'आशा भवन', गोविन्‍‍द कॉलोनी, रानी लक्ष्मीबाई मार्ग, मनासा-458110 (जिला-नीमच)(मध्य प्रदेश)। फोन - 07412 242007 मोबाइल - 094240 66651

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4 comments:

  1. हमारे पुरखों ने हजारों कुण्डलियाँ मिला दीं पर उन की सब की शादियाँ बिना कुंडली मिलाए हुई थीं, और सभी सफल दाम्पत्य थे।

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  2. कुंडली मिलन की परंपरा को एकदम अवैज्ञानिक कहने के पक्ष में हम नहीं हैं. यदि कोई एक पंडित समस्या बता रहा हो तो दो तीन से पूछताछ कर सकते हैं. क्या हम डॉक्टरों के साथ ऐसा नहीं करते? कुंडली पर यदि विश्वास न हो तो सब से अच्छी बात होगी परन्तु एक बार देख लेने के बाद फिर उसे त्याग दिया जावे यह भी उचित नहीं है. हमारे यहाँ प्रारंभिक बातचीत में ही इस बात पर स्पष्टीकरण ले लिया जाता है. समाजों के द्वारा आयोजित होने वाले मिलन समारोहों के लिए भी पहले से तय हो जाना चाहिए की कुंडली मिलान नहीं किया जायेगा. मात्र आपसी पसंद के आधार पर रिश्ते जुडें.

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  3. नीम हकीम ख़तरा ए जान । ज्ञान-विज्ञान तो सभी अच्छे हैं ,मगर उसके सही जानकार मिलें तब ।

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