यह राधा नहीं नाचेगी - 1

 
खुश होनेवाले खुश हो जाएँ और दुःखी होनेवाले दुःखी। अपनी सीमाओं से परे जाकर मैं घोषणा कर रहा हूँ - नरेन्द्र मोदी इस देश के प्रधान मन्त्री नहीं बन रहे। मैं न तो कोई रहस्योद्घाटन कर रहा और न ही, चौंकानेवाली कोई अनूठी बात कह रहा। भारतीय राजनीति की नाम मात्र की समझ रखनेवाला सड़कछाप आदमी भी जानता है कि इस क्षण का सच तो यही है।

मोदी अनेक विशेषताओं के धनी हैं। जनमानस की नब्ज खूब अच्छी तरह टटोल लेते हैं। वक्तृत्व कौशल ऐसा कि घटिया से घटिया बात पर भी तालियाँ पिटवा लें। कहाँ, कब, क्या बोलना - यह तो भली प्रकार जानते ही हैं, यह और अधिक भली भाँति जानते हैं कि कहाँ, कब, क्या नहीं बोलना। यह गुण बहुत कम राजनेताओं में पाया जाता है। याददाश्त पर भरपूर जोर डालिए - आप पाएँगे कि अपने ‘कर्मों’ से भले ही वे विवादास्पद हुए किन्तु अपने किसी वक्तव्य से नहीं। ‘मीडिया ने मेरी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया’ वाला, राजनेताओं का प्रिय और पहचान बन चुका जुमला उनके मुँह से मैंने तो आज तक नहीं सुना। गुजरात में अपनी पार्टी को चुनाव जितवाने में उनकी महारत तो अब विश्व विख्यात हो चुकी है। व्यक्तिगत और परिजनों के भ्रष्टाचार के पारम्परिक आरोपों से वे अब तक बचे हुए हैं। ऐसी और कई बातें उनके पक्ष में जाती हैं।

लेकिन उनकी एक विशेषता ऐसी है जो इन सब पर न केवल भारी पड़ती है अपितु प्रधानमन्त्री बनने की उनकी समस्त सम्भावनाओं को नष्ट-प्रायः कर देती है। यह विशेषता है - अपने विरोधियों को निपटाना और ऐसा निपटाना कि वह (विरोधी) तो ‘अतीत की वस्तु’ बन ही जाए,  उसके (विरोधी के) तमाम समर्थक, भयाक्रान्त होकर, खुद का अस्तित्व बनाए रखने की चिन्ता करने लगें। भाजपा विरोधी तो उनकी इस विशेषता के शिकार हुए ही, भाजपा के भीतर मौजूद अपने विरोधियों को भी उन्होंने इसी तरह, समान रूप से निपटाया - बिना किसी भेद-भाव के। शंकर सिंह वाघेला ने तो काँग्रेस की छतरी में शरण ले ली किन्तु सुरेश देसाई और केशु भाई पटेल (दोनों ही, गुजरात के पूर्व मुख्यमन्त्री) जैसे दमदार नेताओं को अब तक जमीन नहीं मिल रही। संघ के प्रखर प्रचारक संजय जोशी को तो उन्होंने, पूरी दुनिया के सामने लगभग नंगा दौड़ते हुए दिखाकर ‘अन्तरराष्ट्रीय और ऐतिहासिक’ बना दिया। उनकी वह गत बना दी कि बेचारे को त्याग पत्र देना पड़ा।   

मोदी की यह विशेषता सामान्य भाजपाइयों को तो ‘कायल’ करती है किन्तु शीर्ष स्तर के भाजपाइयों को (विशेषकर उन भाजपाइयों को जो खुद को प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर बैठे देखना चाह रहे हैं) भयाक्रान्त बनाए रखती है। कोई ताज्जुब नहीं कि वे चैन की नींद भी न ले पा रहे हों। ऐसे तमाम भाजपाई, अपने सारे मतभेद भुलाकर, ‘दुश्मन का दुश्मन, अपना दोस्त’ के सिद्धान्त को अपनाकर मोदी को गुजरात तक ही सीमित रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। यह उनके (मोदी विरोधियों के) राजनीतिक भविष्य का (लगभग, जीवन-मरण जैसा) सवाल जो ठहरा!

यहाँ मुझे अनायास ही पूर्व केन्द्रीय मन्त्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मन्त्री, स्वर्गीय अर्जुनसिंहजी की याद हो आई है। अपनी बौद्धिकता, विद्वत्ता, अकादमिकता के कारण, कुशल राजनेताओंकी भीड़ में वे अलग से पहचाने जाते थे। जहाँ तक मेरी जानकारी है, समृद्ध निजी लायब्रेरी के मामले में वे, देश के सम्भवतः एकमात्र राजनेता थे। वे किताबें खरीदने के शौकीन थे और जब भी विदेश यात्रा से लौटते थे तो उनके सामान में पुस्तकों की पूरी एक खेप अवश्य होती थी। 

यह जगजाहिर बात है कि वे अत्यधिक महत्वाकांक्षी थे और इन्दिरा, राजीव की हत्या के बाद खुद को प्रधानमन्त्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानते थे। लेकिन स्थितियाँ उनके प्रतिकूल रहीं। उन्होंने काँग्रेस से नाता तोड़ने का फैसला किया। ‘गाँधी परिवार विहीन काँग्रेस’ के उस संक्षिप्त काल खण्ड में अनेक काँग्रेसी, अर्जुनसिंहजी के आसपास जुटे तो सही किन्तु उनका नेतृत्व स्वीकार करना तो दूर रहा, कोई उनके नाम से अपनी पहचान बनाने को भी तैयार नहीं हुआ। सबको लग रहा था कि अर्जुनसिंह नामक बरगद के नीचे उनकी तो पहचान ही गुम हो जाएगी। सब मानो दहशतजदा हों। हालत यह हुई कि उन्हें ‘तिवारी काँग्रेस’ के नाम से पार्टी बनानी पड़ी। दिल्लीवाले आज भी कहते हैं कि इस पार्टी में केवल नाम ही नारायण दत्त तिवारी का था - सारे साधन/संसाधन अर्जुनसिंहजी के ही थे।

बहेलिये के जाल में फँस चुकी चिड़ियाएँ, एक जुट होकर जिस तरह बहेलिये का जाल ले उड़ी थीं, उसी तरह, अपने सर पर मँडराए (राजनीतिक भविष्य के नष्ट हो जाने के) खतरे को दूर करने के लिए अनेक भयभीत लोग एकजुट होकर उस खतरे के लिए खतरा बन सकते हैं। मोदी को भी ऐसे अनेक भयभीत एकजुट भाजपाइयों का खतरा बना हुआ है।

लेकिन पोस्ट के शीर्षक ‘यह राधा नहीं नाचेगी’ से इन सारी बातों का क्या रिश्ता? है साहब! रिश्ता है। यह रिश्ता इस पोस्ट की अगली कड़ी में बताऊँगा।

(यहॉं प्रस्‍तुत समस्‍त चित्र गूगल से लिए गए हैं। इनका उपयोग किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं किया जा रहा है। यदि आपत्ति हो तो सूचित करें। उस दशा में इन्‍हें अविलम्‍ब हटा लिया जाएगा।)

10 comments:

  1. राजनीति की चाल, हमें कभी समझ न आयी..

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  2. आपकी बात पूरी तरह से सही है..... पर क्या इस देश के नेता कभी केवल स्वार्थ के सिवा भी कुछ सोच पायेंगें ? जिसे देश चलाना है उसकी योगता और क्षमता को तो मान दिया ही जाना चाहिए

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  3. mujhko bhi assa hi lagta akhir me bjp ke log modi ji ka daba gol karne wale hai.agli kadi ka intjar rahega...............

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  4. फेस बुक पर श्री सुरेशचन्‍द्रजी करमरकर, रतलाम की टिप्‍पणी -

    नरेन्‍द्र मोदीजी का नाम चुनाव तक ही है। पी एम तो कोई दूसरा ही बनेगा। सांसद संख्‍या बढाने के लिए मोदी का नाम जरूरी है। मैं आपको एक बात और बताऊँ - मोदीजी भी यह जानते हैं कि वे पी एम नहीं बन सकते।

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  5. Andarkhaane ki itni gahri, gambheer aur mahatwapoorna jaankaariyan .......Badhai !Party ne Daujee ki kshamtaaon ka bharpoor Dohan to kiya par kabhi unhe khaas bhaav diya ho,nahi lagtaa.

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    1. निजी तौर पर मैं अर्जुनसिंहजी की राजनीतिक शैली से बहुत कम अवसरों पर सहमत हो पाया किन्‍तु उनकी अकादमिकता, उनकी बौध्दिकता और उनका अल्‍पभाषी होना मुझे सदैव ही प्रभावित तथा आकर्षित करता रहा।

      यह संयोग ही है कि मुझे कुछ ऐसी जानकारियॉं हैं जो सम्‍भवत: बहुत कम लोगों को होंगी। किन्‍तु वे सारी बातें यदि अर्जुनसिंहजी के सामने नहीं कही जा सकतीं तो उनकी पीठ पीछे भी नहीं कही जानी चाहिए और मरणोपरान्‍त तो बिलकुल ही नहीं। मेरे संस्‍कार इसकी अनुमति नहीं देते।

      यदि प्रसंग बना तो उनके दो भाषणों पर मैं कभी लिखूँगा अवश्‍य। एक भाषण एक परिसर में दिया हुआ और दूसरा एक आम सभा में। ये दोनों ही भाषण उनकी अकादमिकता और बौध्दिकता को तो रेखांकित करते ही हैं, लोक-उद्बोधनों के दौरान उनके अनुपम आत्‍म विश्‍वास के परिचायक भी हैं।

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  6. Yah ek badiya sampadkiya hai. Shaandaar. Meri badhaee!

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  7. जब तक प्रधान मंत्री पद के लिए सीधे चुनाव इस देश मे नही होते,तब तक तो आपकी बात बिलकुल सही है ।

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