एके साधे सब सधे

(भारतीय जीवन बीमा निगम के अधिकारियों, कर्मचारियों और अभिकर्ताओं को समृद्ध करने के लिए ‘निगम’ अपनी मासिक गृह-पत्रिका ‘योगक्षेम’  प्रकाशित करता है। उसी में प्रकाशनार्थ मैंने दिनांक 13 दिसम्बर 2013 को यह आलेख भेजा था। उसके बाद एक बार याद भी दिलाया था किन्तु अब तक कोई जवाब नहीं मिला। निश्चय ही इसे प्रकाशन योग्य नहीं समझा गया होगा। मेरे मतानुसार यह आलेख मुझ जैसे छोटे, कस्बाई अभिकर्ताओं के लिए तनिक सहयोगी और उपयोगी हो सकता है। इसी भावना से इसे अब अपने ब्लॉग पर दे रहा हूँ। इसके अतिरिक्त इसका न तो कोई सन्दर्भ है, न उपयोगिता और न ही प्रसंग।)




एक लोकोक्ति है कि लोग अपनी गलतियों से सीखते हैं। किन्तु समझदार वे होते हैं जो दूसरों की गलतियों से सीखते हैं। मैं, भारतीय जीवन बीमा निगम के मुझ जैसे तमाम अभिकर्ताओं को न्यौता दे रहा हूँ - मेरी गलतियों से सीखकर समझदार होने के लिए। 

महानगरों की स्थिति तो मुझे नहीं पता किन्तु कस्बाई स्तर पर हमारे अभिकर्ता साथी एकाधिक संस्थाओं की एजेन्सियाँ लिए होते हैं। ‘निगम’ का अभिकर्ता बनने के शुरुआती कुछ बरसों तक मैं भी यही करता था। किन्तु मैंने, एक के बाद एक बाकी सारे काम छोड़ दिए और केवल ‘एलआईसी एजेण्ट’ ही बन कर रह गया। 

मैंने पाया कि ऐसा करने के बाद न केवल मेरी आय बढ़ी बल्कि मेरी सार्वजनिक पहचान और प्रतिष्ठा (वह जैसी भी है) में मेरी अपेक्षा से अधिक बढ़ोतरी हुई। 
मेरे पास भारतीय यूनिट ट्रस्ट, डाक घर और साधारण बीमा (जनरल इंश्योंरेंस) कम्पनी की भी एजेन्सी थी। मेरी बात को किसी संस्था की आलोचना न समझी जाए किन्तु मेरा अनुभव रहा है कि ग्राहक सेवाओं के मामले में ‘निगम’ से बेहतर कोई संस्था नहीं। हर कोई जानना चाहेगा कि मैंने शेष तीनों एजेन्सियाँ क्यों छोड़ीं। मैं भी बताने को उतावला बैठा हुआ हूँ।

मैंने काम शुरु किया उस समय मेरे कस्बे में भारतीय यूनिट ट्रस्ट का कार्यालय नहीं था। तब यह इन्दौर में था - मेरे कस्बे से सवा सौ किलोमीटर दूर। एक निवेशक के नाम की वर्तनी (स्पेलिंग) दुरुस्त कराने में मुझे सात महीनों से अधिक का समय लग गया और इस दौरान मैंने  प्रति माह कम से कम चार-चार पत्र लिखे। याने प्रति सप्ताह एक पत्र। ग्राहक का नाम तो आखिरकार दुरुस्त हो गया किन्तु ग्राहक की नजरों में मेरे लिए विश्वास भाव में बड़ी कमी आई। वह जब भी मिलता, कहता - ‘क्या! बैरागी सा’ब! मेरा नाम दुरुस्त कराने में यह हालत है तो अपना भुगतान लेने में तो मुझे पुनर्जन्म लेना पड़ जाएगा! ऐसे में आपसे बीमा कैसे लें?’ ऐसे प्रत्येक मौके पर मुझे  चुप रह जाना पड़ता था। अन्ततः नाम ही दुरुस्त नहीं हुआ, मैं भी दुरुस्त हो गया।  मैंने वह एजेन्सी छोड़ दी।

डाक घर के साथ मेरा अनुभव तनिक विचित्र रहा। डाक घर के बचत बैंक पोस्ट मास्टर मेरे पड़ौसी थे। हम दोनों रोज सुबह, अपना-अपना अखबार बदल कर पढ़ते थे। कभी मेरे यहाँ नल में पानी नहीं आता तो मैं उनके नल का उपयोग करता और कभी उनके नल में पानी नहीं आता तो वे मेरे नल से पानी लेते। किन्तु मेरे अचरज का ठिकाना नहीं रहा जब मेरे सगे भतीजे के एक निवेश की परिपक्वता राशि का भुगतान मुझे करने से उन्होंने इंकार कर दिया - वह भी तब जबकि मेरे पास मेरे भतीजे द्वारा मेरे पक्ष में दिया गया आवश्यक, औपचारिक अधिकार-पत्र था। कुछ देर तो मुझे लगा कि वे मुझसे परिहास कर रहे हैं। किन्तु वे तो गम्भीर थे! स्थिति यह हो गई कि मुझे लिहाज छोड़ कर, शिकायत करने की धमकी देनी पड़ी। मुझे भुगतान तो मिल गया किन्तु इस घटना के बाद से हम दोनों के बीच की अनौपचारिकता, सहजता समाप्त हो गई और हम अपने-अपने अखबार से ही काम चलाने को मजबूर हो गए। मेरे मन में विचार आया कि जो साहब मुझे और मेरे बारे में व्यक्तिगत रूप से भली प्रकार जानते हैं, जब वे भी मुझे, मेरे भतीजे का भुगतान करने में कठिनाई अनुभव कर रहे हैं तो किसी सामान्य ग्राहक का भुगतान कराने में, एक अभिकर्ता के रूप में मेरी दशा क्या होगी? ऐसी घटनाओं का प्रभाव मेरे दूसरे कामकाज पर अच्छा नहीं पड़ेगा। मुझे ग्राहकों से हाथ धोना पड़ जाएगा। मेरा मोह भंग हो गया और मैंने उस एजेन्सी को नमस्कार कर लिया।

साधारण बीमा (जनरल इंश्योरेंस) कम्पनी से मेरा ऐसा कोई अप्रिय अनुभव तो नहीं रहा किन्तु दावा भुगतान को लेकर वहाँ की कार्यप्रणाली ने मुझे निरुत्साहित कर दिया। मैंने देखा कि अपने दावों का भुगतान प्राप्त करने के लिए ग्राहकों को बार-बार चक्कर काटने पड़ते हैं। कुछ मामलों में मैंने पाया कि ग्राहक जब भी अपना भुगतान लेने आता तब उसे कोई न कोई कागज लाने के लिए कह दिया जाता। इसके सर्वथा विपरीत, ‘निगम’ ने मेरी आदत खराब कर रखी थी। मेरी इस बात से तमाम अभिकर्ता और अन्य लोग भी सहमत होंगे कि दावा भुगतान को ‘निगम; सर्वाेच्च प्राथमिकता देता है और स्थिति यह है कि हम ग्राहकों को ढूँढ-ढूँढ कर भुगतान करते हैं। कई बार तो ग्राहक को पता ही नहीं होता कि उसे कोई बड़ी रकम मिलनेवाली है। ऐसे पचासों भुगतान का माध्यम तो मैं खुद बना हूँ जो पालिसियाँ मैंने नहीं बेचीं और जिनका अता-पता मेरे शाखा कार्यालय ने मुझे दिया, मैंने सारी औपचारिकताएँ पूरी करवाईं और ग्राहक को भुगतान कराया। ऐसे प्रत्येक मामले में ग्राहक ने मुझे बार-बार धन्यवाद दिया तो दिया ही, दुआएँ भी दीं। मुझे लगा कि एक ओर कहाँ तो हम भुगतान करने के लिए उतावले रहते हैं और कहाँ दूसरी ओर ग्राहक चक्कर लगाता रहता है! मुझे लगा कि कभी मेरा कोई ग्राहक नाराज हो गया तो उसका प्रतिकूल प्रभाव मेरी, जीवन बीमा एजेन्सी पर पड़ सकता है और मुझे व्यावसायिक नुकसान हो सकता है। यह ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी। यह विचार आते ही मैंने चुपचाप वह एजेन्सी भी छोड़ दी।

अब मैं केवल एलआईसी का काम कर रहा हूँ। शुरु में तो मुझे लगा था कि मुझे नुकसान हुआ है किन्तु मेरी आय के आँकड़े मेरी इस धारणा पर मेरा मुँह चिढ़ाते हैं। मेरी आय प्रति वर्ष बढ़ी। लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि ग्राहक सेवाओं को लेकर मेरे ग्राहक मुझसे असन्तुष्ट नहीं हैं।

सारे काम छोड़कर एक ही काम करने के दो प्रभाव मैंने सीधे-सीधे अनुभव किए। पहला तो यह कि मैं अपने काम में अधिक दक्ष हुआ और दूसरा यह कि मेरे परिचय क्षेत्र में मुझे अतिरिक्त सम्मान से देखा जाने लगा। ग्राहकों से मेरा जीवन्त सम्पर्क बढ़ा और आज स्थिति यह है कि प्रति वर्ष मेरे ग्राहक बुला कर मुझे बीमा देते हैं। अपना परिचय देते हुए जब मैं कहता हूँ ‘‘मैं एलआईसी एजेण्ट हूँ और यही काम करता हूँ। इसके सिवाय और कोई काम नहीं करता।’ तो सामनेवाले पर इसका जो अनुकूल प्रभाव होता है उसे शब्दों में बयान कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं हो रहा।

यह सब देखकर और अनुभव कर मुझे अनायास ही कवि रहीम का दोहा याद आ गया -

         एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।
         जो तू सींचौ मूल को, फूले, फले, अघाय।।

अर्थात् थोड़े-थोड़े पाँच-सात काम करने की कोशिश में एक भी काम पूरा नहीं हो पाता। इसके विपरीत यदि कोई एक ही काम हाथ में लिया जाए तो वह पूरा होता है उसके समस्त लाभ भी मिलते हैं और इस सीमा तक मिलते हैं कि हमारी सारी आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं। 

इसी क्रम में मुझे कवि गिरधर की एक कुण्डली याद आ रही है जो हमारी मातृसंस्था ‘एलआईसी’ पर पूरी तरह लागू होती है। कुण्डली इस प्रकार है -

         रहिये लटपट काटि दिन, अरु घामे मा सोय।
         छाँह न वाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय।।
         जो तरु पतरो होय, एक दिन धोखा दैहे।
         जा दिन बहे बयारी, टूटी तब जर से जैहे।
         कह गिरधर कविराय, छाँह मोटे की गहिये।
         पाता सब झरि जाय, तऊ छाया में रहिये।।

अर्थात्, ‘चाहे तकलीफ में दिन काट लीजिए, चाहे धूप में सोना पड़े लेकिन किसी कमजोर-पतले वृक्ष की छाया में मत बैठिए। पता नहीं कब धोखा दे दे! किसी दिन आँधी में जड़ से उखड़ जाएगा। इसलिए किसी विशाल, मोटे, घनी वृक्ष की छाया में बैठिए। ऐसे वृक्ष के सारे पत्ते भी झड़ जाएँगे तो भी सर पर छाया बनी रहेगी।’ मुझे लगता है कि ‘आर्थिक सुरक्षा और संरक्षा’ के सन्दर्भों में कवि गिरधर एलआईसी की ओर ही इशारा कर रहे हैं।

पूर्णकालिक (फुल टाइमर) अभिकर्ता के रूप में काम करने का सुख और सन्तोष अवर्णनीय है। इससे क्षमता और दक्षता में वृद्धि होती है जिसका अन्तिम परिणाम होता है - आय में वृद्धि। लेकिन इससे आगे बढ़कर एक और महत्वपूर्ण काम होता है - अधिकाधिक लोगों तक पहुँचकर उन्हें बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराने का। 

यही तो ‘निगम’ का लक्ष्य है!
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(सर्वाधिकार लेखकाधीन।)


3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (19-12-2016) को "तुम्हारी याद स्थगित है इन दिनों" (चर्चा अंक-2561) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सत्य ,गम्भीर एव्म अनुकरनीय

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