2005 में लिख दिया था 2026 का सच।
यहाँ प्रस्तुत कविता श्री गौरीशंकरजी दुबे का कृपा-प्रसाद है। मूलतः सीतामऊ (जिला-मन्दसौर) के निवासी दुबेजी जीवन के 87वें बरस (29 अप्रेल 1940) में चल रहे हैं। आंचलिकता और आंचलिक इतिहास पर इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस क्षेत्र में ‘आधिकारिता’ (अथॉरेटी) की हैसियत रखते हैं। इतिहासविद् और इतिहासवेत्ता के विशेषणों से अलंकृत हैं। किन्तु खुद को छात्र, जिज्ञासु और शोधार्थी ही मानते हैं। उम्र के इस मुकाम पर भी लगतार सक्रिय बने हुए हैं। खुद का लिखा भी छापते हैं और दूसरों का ‘अच्छा और पठनीय लिखा’ भी संग्रहित करके छापते हैं।
दुबेजी को धन्यवाद देते हुए, ‘नईदुनिया’ के 2005 के दीपावली विशेषांक में छपी, दादा की इस कविता का आनन्द लीजिए।
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रोपणी का रोना
ये लगाएँ पौधा और पनप जाए?
असम्भव।
इनकी बनाई सड़कें, उखड़ गईं
इनके बनाए पुल,
झेल नहीं पाए पहली ही बरसात
इनके बनाए बाँधों की क्या बात
बह गए बेचारे, अपनी किस्मत के मारे।
इनकी रोकी नदियाँ, आवारा हो गईं,
उनकी बदगुमाँ लहरों में, बीसों बस्तियाँ सो गईं!
इनके बनाए कानून, इन्हीं ने तोड़े
अपने अनुशासन के कान, इन्हीं ने मरोड़े।
असम्भव।
इनकी बनाई सड़कें, उखड़ गईं
इनके बनाए पुल,
झेल नहीं पाए पहली ही बरसात
इनके बनाए बाँधों की क्या बात
बह गए बेचारे, अपनी किस्मत के मारे।
इनकी रोकी नदियाँ, आवारा हो गईं,
उनकी बदगुमाँ लहरों में, बीसों बस्तियाँ सो गईं!
इनके बनाए कानून, इन्हीं ने तोड़े
अपने अनुशासन के कान, इन्हीं ने मरोड़े।
इनके जलाए दीवे, समारोहों के चलते ही बुझ जाते हैं,
पता नहीं लोग इनके स्वागत में
स्वागत गीत क्यों गाते हैं।
ये हाथों से काम करते नहीं, कामों में हाथ डालते हैं
और जिस भी काम में हाथ डालते हैं उसे
पताल तक खँगालते हैं।
ऐसा ही करते-करते हाथ धोे लिए इन्होंने हाथों से
और हो गए हैं इनके हाथ ‘करकमल’
न रहे वे असल न रहे अमल।
कर्मठता का गला घोंटना इनके हाथों का खेल है,
जब हाथ-हाथ नहीं रहें तब होते ऐसे ही तुफैल हैं।
विडम्बना यह कि इनके ‘करकमल’
कोहनी से ऊपर उठते नहीं
नमस्कार तक में - बस बार-बार पहुँच जाते हैं तुम्हारी झूलती झलकती जेबों तक।
एक तुम्हारे हाथ- जो कि यकीनन हाथ हैं
हमेशा जुड़े रहते हैं इनकी अभ्यर्थना में
और पहुँचते नहीं इनकी ऐबों तक।
जब वृक्षारोपण के लिए उन्होंने रोपणी को थामा
तो चीख निकल गई रोपणी की
“दूर रखो मुझे इन ‘करकमलों’ से
न मैं पौधा बन पाऊँगी न वृक्ष।न आएँगे मुझ पर फूल
और, फलों का तो सवाल ही नहीं।
न कोई मुझे सींचेगा न सम्हालेगा,
इन्हीं का पाला कोई आवारा साँड मुझे खा लेगा।
सपनों सहित मैं मर जाऊँगी,
अपना रोना रोने, मैं किस माली के घर जाऊँगी?
मेरे कौमार्य और मेरी सतवन्ती कोख को बचाओ
हजारों वर्ष की उम्र लेकर आई हूँ-
तुम्हारी बहू-बेटी हूँ,
मेरी हत्या का कलंक अपने माथे पर मत लगाओ।”
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