भारतीय लोकतन्त्र पर 'संघ' की अकृपा

भाजपा से जसवन्तसिंह के निष्कासन पर केन्द्रित समाचारों और विश्लेषणों के घटाटोप ने मुझे तनिक परेशान किए रखा। वास्तविकता की बारीक किन्तु तीखी किरण सबको नजर तो आती रही किन्तु उस पर उस पर यथेष्ठ चर्चा बहुत ही कम हुई। शायद इसलिए कि उसमें नया कुछ भी नहीं था।


मैं बार-बार और बराबर अपने इस विश्वास को दुहराता रहा हूँ भारतीय लोकतन्त्र को स्वस्थ बनाए रखने के लिए ‘सुदृढ़ भाजपा’ आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य है। कांगे्रस के बाद भाजपा ही सर्वाधिक व्यापकता वाली पार्टी है। किन्तु इसका ‘संघ’ का आनुषंगिक संगठन होना इसकी सबसे बड़ी ‘दुर्भाग्यपूर्ण खराबी’ है। यह सचमुच में खेदजनक है जब-जब भी भाजपा के राजनीतिक पार्टी बनने के अवसर आए, तब-तब, हर बार संघ ने इस सम्भावना की भ्रूण हत्या कर दी। ताजा लोकसभा चुनावों के बाद इस बार मिला यह अवसर अधिक सम्भावनाएँ लिए था और उम्मीद की जा रही थी कि भाजपा में बैठे ‘राजनीतिक तत्व’ अपनी पार्टी को संघ के कब्जे से छुड़ाने का साहस दिखाएँगे। किन्तु वैसा कुछ भी नहीं हो सका और भाजपा एक बार फिर ‘संघ की सम्पत्ति’ बन कर ही रह गई। इस सबमें, जसवन्त सिंह तो केवल एक ‘कमजोर कड़ी’ से कहीं आगे बढ़ कर, संघ के लिए ‘सर्वाधिक आसान और साट टारगेट’ साबित हुए। चूँकि वे संघ की पृष्ठ भूमि वाले नहीं हैं सो उन्हें निशाने पर लेने में संघ को रंच मात्र भी असुविधा नहीें हुई। यदि जसवन्त सिंह भी ‘संघ-सुत’ या फिर ‘संघ-अनुकूल’ होते तो वे भी वरुण गाँधी की तरह न केवल निरापद अपितु ‘संघ संरक्षित’ भी रहते। वरुण की ‘महान और ऐतिहासिक घोषणाओं’ से पार्टी ने खुद को अलग कर लिया था। जसवन्त सिंह के निष्कर्षों से भी पार्टी ने खुद को असम्बध्द कर लिया था। किन्तु वरुण को कोई आँच नहीं आई और आँखों में आँसू और जबान पर कराहें लिए, अपना दुखड़ा सुनाने के लिए जसवन्त सिंह को ढूँढने पर भी ठौर-ठिकाना नहीं मिल रहा है। वरुण की ‘आग उगलती बातें’ संघ की वैचारिकता के न केवल अनुकूल थी बल्कि उसे पुष्ट पर भी करती थीं जबकि जसवन्त सिंह ने संघ की परवाह ही नहीं की।


गुजरात सरकार द्वारा जसवन्त सिंह की किताब पर पाबन्दी लगाना भी बड़े ढोंग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि कांगे्रसियों ने भी इस पाबन्दी की माँग की। दोनों का तर्क एक ही है - पटेल पर लगे आक्षेपों से गुजरात का जनमानस उद्वेलित होगा। यह लचर से भी अधिक, बल्कि सर्वाधिक लचर तर्क है। गाँधी भी तो गुजरात में ही पैदा हुए थे? गाँधी को भारत विभाजन का खलनायक बनाने में संघ ने कौनसी कमी रखी? उनके विरुद्ध क्या-क्या नहीं कहा गया? जो कुछ कहा गया, वह सब न केवल किताबों में सुरक्षित है बल्कि संघ के प्रकाशनों में अधिकृत रूप से उपलब्ध है। और तो और, ‘गाँधी हत्या’ को तो संघ परिवार गर्वपूर्वक ‘गाँधी वध’ कहता है और इस शीर्षक वाली किताबें गुजरात में ही बरसों से उपलब्ध हैं। गाँधी को ऐसे घिनौने स्वरूप में प्रस्तुत करने वाले प्रकाशनों से जब गुजरात के लोग उद्वेलित नहीं हुए तो सरदार के नाम पर यह चिन्ता ढोंग के सिवाय और कुछ भी नहीं। वस्तुतः सरदार पटेल ‘संघ’ के लिए ‘राष्ट्रीय भावनाओं के व्यापार के श्रेष्ठ औजारों में से एक’ हैं। भला कोई अपनी बिक्री पर आँच कैसे आने दे सकता है? मजे की बात यह है कि जिन सरदार की दृढ़ता की दुहाई देकर यह सब किया गया उन्हीं सरदार को, ‘नेहरू के दबाव में संघ पर प्रतिबन्ध लगाने वाला’ भी कह दिया गया और ऐसा कहने से पहले तनिक भी विचार नहीं किया गया। रही बात, कांगे्रसियों की, तो उन्होंने तो यह सब केवल वोट की राजनीति के लिए किया। सरदार के नाम पर वे एक भी वोट खोने की जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं।


ल्ेकिन मूल बात वही कि संघ ने भाजपा को अपने नियन्त्रण से मुक्त नहीं किया। नागरिकों में अब उन लोगों की उपस्थिति बढ़ती जा रही है जिन्हें भारत विभाजन और हिन्दू राष्ट्र जैसे मसलों की या तो जानकारी नहीं है या फिर इनमें उनकी रुचि नहीं है। हिन्दुत्व का पटाखा भी ताजा लोकसभा चुनावों में ‘फुस्स’ हो चुका है। अपनी वैचारिकता की दुहाई दे रहे संघ को यह बात समझ लेनी चाहिए कि विकास, प्रगति जैसे कारकों से वैचारिकता का कोई लेना देना नहीं है। उसके सपनों का ‘हिन्दू राष्ट्र’ अब कभी साकार न होने वाला ऐसा कागजी मुहावरा बन कर रह गया है जिसकी खिल्ली उड़ाने का दौर जल्दी ही शुरु हो जाएगा। कहने को तो प्रति पाँच वर्ष में ‘संघ’ पुनरवलोकन करता है किन्तु लगता नहीं कि वह वास्तविकताओं को अनुभव कर उन्हें स्वीकार भी करता है।


ऐसे में, भारतीय लोकतन्त्र की सेहत के लिए यह सामयिक अपरिहर्याता है कि संघ, भाजपा को मुक्त कर दे। वह खुद को सांस्कृतिक संगठन कहता है लेकिन भली प्रकार जानता है कि ऐसा संगठन बने रहकर वह अपने लक्ष्य कभी भी हासिल नहीं कर पाएगा। क्योंकि उसे भली प्रकार मालूम है कि देश जिस रास्ते पर चल पड़ा है वहाँ केवल राजनीति के माध्यम से ही अपने लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। इसी ऊहापोह में वह भाजपा को कभी तो छुट्टा छोड़ देता है तो कभी नकेल कस लेता है। इससे दोनों की फजीहत हो रही है। सम्भवतः यह ठीक क्षण है जब संघ भाजपा का नाम अपने आनुषांगिक संगठनों की सूची से निकाल दे।


ऐसा करने से वह जहाँ दोहरे आचरण के आरोप से मुक्त होगा वहीं भारतीय लोकतन्त्र में यह उसका अप्रतिम योगदान होगा।

-----


आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

6 comments:

  1. Just install Add-Hindi widget button on your blog. Then u can easily submit your pages to all top Hindi Social bookmarking and networking sites.

    Hindi bookmarking and social networking sites gives more visitors and great traffic to your blog.

    Click here for Install Add-Hindi widget

    ReplyDelete
  2. हिन्दू एक राष्ट्रीयता थी, और अभी भी है। हज पर भारत और पाकिस्तान से जाने वाले सभी यात्री अभी भी हिन्दी ही कहाते हैं। लेकिन संघ और कुछ अन्य संगठनों ने इसे धर्म बना दिया। जिसे भारत की बहुमत जनता ने नकार दिया है। भारत में किसी भी धार्मिक राजनीति का कोई आधार नहीं हो सकता। राम तो भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा हैं इस कारण से इस नाम से राजनीति चल गई वरना वे तो दो सीट वाले हो ही गए थे।

    ReplyDelete
  3. अभी हमारा देश भेड़ों का एक विशाल समूह है, जिसे जो चाहे अपनी मर्जी से इधर-उधर हांक ले जाता है, देश के नागरिकों को भेड़ों के समूह से जिम्मेदार और राष्ट्र पर गर्व करने वाले नागरिक बनने का सफ़र अभी तय करना बाकी है, कांग्रेस तो यह काम 60 साल में भी नहीं कर पाई, दूसरे लोग अलग रास्तों से कोशिश कर रहे हैं, करने दीजिये, जब एक कोशिश असफ़ल होगी तो दूसरी करेंगे… सशक्त विपक्ष तो 2004 के चुनाव में भी नहीं था, न ही 2009 के चुनाव में फ़िर भी कांग्रेस जीती, अब यदि भाजपा शून्य भी जाये, तो हमें क्या फ़र्क पड़ने वाला है। संसद में अब बहुमत का राज चलता है, भाजपा की सुनता कौन है। यदि भाजपा को सत्ता नहीं मिली है, जनता ने उसे नकारा है तो अब संघ-भाजपा को अपना अन्दरूनी काम निपटा लेने दीजिये… अब इस बात पर फ़िक्र करने से क्या फ़ायदा कि सशक्त विपक्ष क्यों नहीं है? यदि भाजपा संघ की बात नहीं मानती तो वह स्वतन्त्र है अपनी सेकुलर" नीति अपनाने हेतु, और इस सेकुलर नीति ने दो चुनावों में क्या दिया है, यह सभी ने देखा है। चाहे भाजपा मुसलमानों को खुश करने के लिये लगातार 2 माह तक शीर्षासन भी कर ले तब भी मुसलमानों के वोट उसे नहीं मिलने वाले, लेकिन "सेकुलर" बनने के चक्कर में अपने परम्परागत वोट वह तेजी से खोती जा रही है, उसे यह समझ नहीं आ रहा। जिस बात से 2 सीटों से 190 सीटों तक पहुँचे थे, वही छोड़ दी तो फ़िर 116 पर आना ही था… अब कांग्रेस को हराने से पहले भाजपा को हराना अधिक आवश्यक है, ताकि वह सेकुलरिज़्म से पीड़ित कांग्रेस की "बी" टीम न बन जाये। कांग्रेस और 50 साल भी सत्ता में रह ले हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, न ही देश को, क्योंकि पिछले 60 साल में ही ऐसा क्या कर लिया कांग्रेस ने जो अगले 10-20 साल में कर लेगी। पहली प्राथमिकता भाजपा को सही "ठिकाने" लगाना, होना चाहिये…

    ReplyDelete
  4. भजपा को अपने को री-इन्वेण्ट करना ही होगा।

    ReplyDelete
  5. Dear DineshRai Dwiwedi Ji,
    Aapki yane aam hindu ki to ye soch hai par kya ek musalmaan bhi yahi sochta hai. Nahi kabhi nahi. ek musalmaan sirf Islam ko maanta hai phir aap jaise hindu kuch bhi kah le Hame Ram se kuch lena dena nahi hai. to aap Ram ko jabardasti kyon ham par laad rahe hai.

    Khuda aapko akl de to shayad hindu dharm ka bhi kuch bahala ho jayega varna ek baar phir aap musalmaano ki gulami karoge.

    ReplyDelete
  6. शकीला जी आख़िर अपने बता ही दिया कि मुसलमानो कि सोच क्या है हिंदुओं के बारे मे. काश हमारे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगो को भी कुछ अकल आ जाए तो आपके अनुसार हमारा भी कुछ भला हो जाएगा

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.