‘ये’ निषेध हमारे चरित्रहीन होने के प्रमाण पत्र

जब-जब भी लड़कियों/महिलाओं पर ऐसे ‘शील रक्षक’ प्रतिबन्ध लगते हैं तब-तब, हर बार मुझे लगता रहा है मानो मुझे चरित्रहीन, दुराचारी, कामुक, परस्त्रीगामी होने का प्रमाण-पत्र दे दिया गया हो।

स्त्रियों के प्रति अपने दृष्टिकोण और व्यवहार को लेकर हम अत्यधिक सीनाजोर, निर्लज्ज और पाखण्डी समाज के रूप में सामने आ रहे हैं। अपनी उक्तियों में हम धर्मग्रन्थों के सुभाषित उद्धृत कर नारी को सर्वोच्च सम्मान दिए जाने की गर्जना करते हैं किन्तु आचरण ठीक उलटा करते हैं। दुहाई तो हम ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवा’ की देते हैं किन्तु औरत आज भी पुरुष के पैरों की जूती बनी हुई है। अपनी आधी आबादी से हमने उसका सब कुछ हड़प कर अपने कब्जे में कर लिया है। हमें जन्म देने वाली स्त्री को हम न तो बुध्दिमान मानते हैं और न ही विवेकवान। चूँकि समाज के नियन्ता हम पुरुष ही हैं सो ‘समझदारी’ पर हम पुरुषों ने एकाधिकार कर लिया है और ‘इज्जत’ की सारी जिम्मेदारी स्त्रियों को सौंप दी है। इसी के चलते, ‘वो तो औरत थी पर तुम तो समझदार थे’ जैसे जुमले हमें रंच मात्र भी असहज नहीं करते। यही वह कारण भी है जिसके चलते बलात्कृत स्त्री को जमाने भर के लांछन सहन करने पड़ते हैं और बलात्कारी को शूरवीर की तरह देखा जाता है। डकैती के मामले में हमारी सहानुभूति लुटने वाले के साथ होती जबकि बलात्कार के मामले में हम स्त्री को ही अपराधी देखते हैं।


महिलाओं को लेकर हमारे सोच को जन्म से ही एक सुनिश्चित साँचे में ढाल दिया जाता है। सारे निषेध, सारी अनिवार्यताएँ स्त्री पर आरोपित की जाती हैं और पुरुष को सबसे मुक्त रखा जाता है क्योंकि समाज के नियम, कानून, कायदे हम पुरुष ही तय करते हैं। लाख कोशिशों के बाद भी मैं आज तक एक भी व्रत-उपवास ऐसा तलाश नहीं कर पाया हूँ जो पुरुषों के लिए अनिवार्य किया गया हो। हमने न केवल मान रखा है बल्कि साबित भी कर रखा है कि ‘स्त्री’ की स्वतन्त्र सत्ता होती ही नहीं है। उसका कोई ‘व्यक्ति रूप’ भी हो सकता है, यह हमारी कल्पना से परे है। स्त्री हमारे लिए केवल ‘वस्तु’ है और ‘वस्तु’ भी केवल ‘भोग्या’ रूप में। इसी के चलते ‘शुचिता’ (और विशेषतः ‘योनि शुचिता’) स्त्री के लिए पहली शर्त है। किन्तु यह निर्धारण करते समय हम यह जानबूझकर भूल जाते हैं कि कोई भी स्त्री केवल अपने दम पर कैसे अपनी शुचिता भंग कर सकती है? उसके शील भंग के लिए किसी पुरुष की भागीदारी अनवार्य होती है। किन्तु शुचिता का मैदान हमने पुरुषों के लिए निस्सीम छोड़ रखा है और स्त्री-शुचिता को तंग परिधि में घेर रखा है। मैं किसी ऐसी स्त्री की तलाश में हूँ जो किसी पुरुष के सहयोग के बिना कलंकित हुई हो।


स्त्री के बिना पुरुष का जीवन अधूरा है, यह कोई नई बात नहीं है। किन्तु हमारे अधूरेपन को समाप्त करने वाली, हमें पूर्णता प्रदान करने वाली स्त्री को हम उसका वाजिब स्थान देने के बारे में कभी नहीं सोचते। ऐसा सोच तो हमारे अचेतन से भी धकेल दिया गया है। श्रेय के सारे हिमालय हमारे और फजीहत के सारे उखेड़े (कूड़ा स्थल) स्त्री के। लोक व्यवहार में प्रयुक्त की जाने वाली गालियों पर तनिक सावधानी से ध्यान दीजिए, निन्यानबे प्रतिशत गालियाँ ‘स्त्री केन्द्रित’ हैं। गोया स्त्री, स्त्री न होकर गाली ही हो गई।

इतिहास साक्षी है कि जिस समाज ने अपनी आधी आबादी को सम्मान दिया गया, राष्ट्र निर्माण में उसकी भागीदारी ली गई उसने सफलता के झण्डे गाड़े और जहाँ-जहाँ स्त्री को वंचित, उपेक्षित, तिरस्कृत किया गया वहाँ प्रगति का पहिया धीमा ही हुआ है। लिहाजा, यदि स्त्री के लिए कोई निषेध आरोपित किया जा रहा हो तो उससे पहले पुरुषों को अपनी गरेबान में झाँकना चाहिए। यदि हम कहते हैं कि युवतियों के परिधान यौनोत्तेजित करते हैं तो शुरुआत तो हमारे संयम से होनी चाहिए! इसके समानान्तर कड़वी सचाई यह है कि हममें से प्रत्येक, अपनी सहधर्मिणी को तो ‘सीता’ और पड़ौसी की पत्नी को ‘रम्भा’ देखना चाहता है। ऐसा सोचते समय हममें से प्रत्येक यह भूल जाता है कि उसकी सहधर्मिणी भी किसी की पड़ोसन है। हमारा यह व्यवहार सचमुच में विचित्र है कि बीमार तो हम हैं और इलाज कराते हैं स्त्री का!


स्त्री का महत्व अनुभव करने के लिए अपने अतीत को खँगालें तो पाएँगे कि हमारे समस्त महापुरुषों को उनकी माता के नाम से सम्बोधित किया जाता था। जैसे कौन्तेय, कुन्ती पुत्र, गांधरी पुत्र, राधेय, कौशल्या नन्दन, यशोदा नन्दन आदि आदि। इतिहास साक्षी है कि ‘पुरुष’ का वंश चलाकर उसकी मान-मर्यादा बनाए रखने और बढ़ाने की कीमत हर बार ‘स्त्री’ न ही चुकाई, पुरुष ने नहीं।

प्रकृति ने मातृत्व सुनिश्चित किया है, पितृत्व नहीं। पितृत्व तो विश्वास भाव है। लगता है, यहीं पर ‘पुरुष’ का अहम् आहत हुआ होगा और उसने ‘पितृत्व के विश्वास’ को ‘सुनिश्चितता’ में बदलने के लिए ही अभिलेखों में सन्तान के नाम के साथ पिता का नाम लिखने की परम्परा शुरु की होगी।

इस मामले में मैं पूरी तरह से स्त्रियों के समर्थन में खड़ा हूँ। हमने ‘स्त्री’ के प्रति अकूत आभार और कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए जिसने हमें जन्म दिया, हमें पाला-पोसा बड़ा किया, हममें पूर्णता और सामाजिक सम्मान प्रदान किया, सदैव नेपथ्य में रहकर, खुद को होम करके हमें प्रमुखता/प्रधानता प्रदान की। अपने जीवन से स्त्री को निकाल दें तो जीवन न केवल नीरस और रंगहीन हो जाएगा बल्कि हम नितान्त असफल भी हो जाएँगे।

यह ‘स्त्री’ ही है जो हमें ‘हम’ बनाए हुए है।
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6 comments:

  1. bahut prabhaavit kiya aapke aalekh ne...........
    sachmuch stree ko aaj ke daur me bhi bhogyaa samajhnaa aur apni koi vastu jaisa samajhnaa na keval asamajik kritya hai balki sharmnaak bhi hai...is gandgi bhari maansiktaa ko door karne k liye purush varg ko aage aana hi hoga.......

    badhaai aapke is vichaarpoorna aalekh k liye........

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  2. aapko net par dekha kar prasannta hoi.

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  3. वैज्ञानिक बताएँगे कि स्त्री में पुरुष का कोई अंश नहीं होता परंतु हर पुरुष में स्त्री के अंश पाए जाते हैं. अर्धनारीश्वर की परिकल्पना का शायद यही आधार भी है. बावजूद इसके स्त्रियों के प्रति पुरुषों का व्यवहार चकित करने वाली है. बहुत दिनों बाद आप का आलेख पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया. आभार.

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  4. बैरागी जी,
    आपने मेरे मन की हर बात को इतने अच्छे ढंग से रखा है कि मन प्रसन्न हो गया। हमने स्त्री की शान में एक श्लोक लिखा और उसे घर की चारदीवारी में बन्द कर दिया कि बस अब देवी बनके ही रहो।

    इस लेख को पढकर शायद अन्य लोगों के भी जटिल, स्थिर विचारों में बदलाव की लहर आये।

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  5. विष्णु जी,
    बहुत सही कहा आपने. इस विषय पर मैं भी आपसे पूर्ण सहमति रखता हूँ.

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  6. बहुत खूब श्री विष्णु बैरागी जी लेकन में आप की कुछ बात से में सहमत नहीं हु !!
    आप ने कहा है !!\/
    //मैं किसी ऐसी स्त्री की तलाश में हूँ जो किसी पुरुष के सहयोग के बिना कलंकित हुई हो।//
    जी समलैंगिक इसका उदहरण है !!!
    में मानता हु पुरुष भी इसका उदहरण है !!
    लकेन पुरुष को हीई दोष देना कहा तक उचित है ??
    लकेन जब स्त्री का ही चरित्र खराब हो तो पुरुष पर ही सयम की बाधा क्यों ??
    क्या चरित्र की सारी परिभाषा केवल पुरुष पर ही लागु है स्त्री चरित्र की परिभाषा कुछ नहीं ??
    //प्रत्येक, अपनी सहधर्मिणी को तो ‘सीता’ और पड़ौसी की पत्नी को ‘रम्भा’ देखना चाहता है।//
    आप कृपया मुज सीता और रम्भा चरित्र का उलख कर के बत्तया ग ??


    आप का नया पाटक नटखट मनीष :) !!


    manish.kingh44@gmail.com

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