बाँटने का सुख : उफ्! इतना?

‘बाँटने का सुख अवर्णनीय होता है।’ यह बात, कुछ बार लिखी, असंख्य बार कही और उससे कहीं अधिक बार सुनी। किन्तु इसे जाना आज ही। अभी-अभी।

गजल सम्राट जगजीत सिंह के जन्म दिन प्रसंग पर, ‘कलर्स’ चैनल ने आज दोपहर एक बजे एक कार्यक्रम प्रसारित किया। (यह कार्यक्रम, आज शाम सात बजे पुनर्प्रसारित होगा।) इसकी जानकारी मुझे दो दिन पहले ही हो चुकी थी। तय हो चुका था कि सारे काम छोड़ कर इसे देखेंगे। मुझे तो कुछ काम था नहीं, किन्तु उत्तमार्द्ध फुरसत में नहीं थी। उन्होंने दो काम एक साथ करने का निर्णय लिया। कार्यक्रम शुरु होने से पहले ही वे गेहूँ बीनने का बिखेरा कर, काम में लग गई थीं।

कार्यक्रम शुरु हुआ और पहले ही क्षण से मन मोहने लगा। कुछ इतना और ऐसे कि उत्तमार्द्ध के हाथ रुक गए और वे पसारा छोड़ कर कार्यक्रम देखने बैठ गईं। कुछ ही मिनिट हुए थे कि फोन घनघनाया। इन्दौर से धर्मेन्द्र रावल बोल रहा था। फोन कान से लगाते ही मुझे मालूम हो गया कि धर्मेन्द्र भी यह कार्यक्रम देख रहा है और हो न हो, यह कार्यक्रम देखने की कहने के लिए ही उसने फोन किया हो। उसने पूछा - ‘क्या कर रहे हो?’ मैंने कहा - ‘वही, जो करने की सिफारिश करने के लिए तुमने फोन किया है।’ वह खुश हो गया। मैं भी खुश हो गया कि मैंने उसके मन की बात भाँप ली थी। ‘चलो! पहले कार्यक्रम का आनन्द ले लें। बाद में बात करेंगे।’ कह कर हम दोनों ने फोन बन्द कर दिया।

फोन का चोंगा रखते ही मेरी ट्यूब लाइट चमकी - ‘जो नेक काम धर्मेन्द्र ने किया, वह मुझे क्यों नहीं सूझा?’ और मैं शुरु हो गया। जैसे-जैसे नाम याद आते गए, वैसे-वैसे मित्रों को फोन करने लगा। रतलाम और बाहर के कोई तीस-पैंतीस मित्रों को फोन किया। कुछ तो पहले से ही यह कार्यक्रम देख रहे थे किन्तु अधिकांश को मुझसे ही जानकारी मिली। इसी बीच यह सूचना मैंने फेस बुक पर भी दी। कोई पाँच-सात मित्रों ने नोटिस लिया। इनमें से भी कुछ पहले से ही देख रहे थे और कुछ ने, मेरी सूचना के बाद देखना शुरु किया।

किन्तु यह पोस्ट लिखने का सबब तो कार्यक्रम समाप्त होने के बाद बना। कार्यक्रम समाप्त होते ही एक के बाद एक, मित्रों के फोन आने लगे। मुझसे सूचना मिलने के बाद जिन्होंने कार्यक्रम देखा, उन सबके फोन आए। सब कार्यक्रम की प्रशंसा कर रहे थे और गद्गद भाव से धन्यवाद दे तो दे ही रहे थे, कह रहे थे - ‘मजा आ गया। आगे भी ऐसा ही करते रहना।’

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। सूचना पानेवाले इतने खुश होंगे, यह तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था! मैंने किया ही क्या था? धर्मेन्द्र ने जो सूचना मुझे दी थी, वही तो मैंने आगे बढ़ाई थी? अपने घर में बैठे रहकर कुछ फोन ही तो किए थे? किन्तु सबको कितना सुख मिला? मेरी जेब से तो कुछ नहीं गया किन्तु मित्रों को कितना आनन्द आया? कितना सुख मिला? इसका कोई आर्थिक मूल्यांकन सम्भव है? कदापि नहीं। यह तो अगणनीय, अकल्पनीय, अवर्णनीय है - केवल अनुभव किया जा सकनेवाला।

मैं दूसरों के आनन्द का निमित्त बना - यह विचार ही मुझे झुरझुरी दे गया।

इतना कुछ कहने के बाद भी मुझे लग रहा है कि मेरी बात पूरी नहीं हो पा रही है।

बाँटने का सुख! उफ्! इतना?  

2 comments:

  1. आज सहसा वह कार्यक्रम देखने लगा, आनन्द आ गया।

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  2. sukhad pal....aanand dugana.....

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