मुझे ही लड़नी होगी, अपनी यह लड़ाई

वे उम्र में मुझसे दो बरस बड़े, रेल्वे के सेवा निवृत्त कर्मचारी हैं। ‘तू-तड़ाक’ से ही बतियातेे हैं। मैं ‘आप’ से नीचे नहीं उतर पाया। बरसों का हमारा परिचय अनौपचारिकता में बदल गया किन्तु हम दोनों एक-दूसरे के घर नहीं गए। मैं अपने धन्धे के कारण दिन भर बाहर ही रहता हूँ। सो उनसे बाहर ही मिलना हो जाता है। वे सुबह कोई दस-साढ़े दस बजे तक भोजन कर घर से निकल जाते हैं। मिलनेवालों के घर, छापामार शैली में पहुँच कर चौंकाने में उन्हें मजा आता है। मैं पूछता हूँ-ऐसा क्यों करते हैं? जवाब मिलता है-अचानक पहुँचने से सामनेवाले को सम्हलने का मौका नहीं मिलता। उसकी असलियत मालूम हो जाती है। उनकी यह आदत मुझे अच्छी नहीं लगती। मेरा अच्छा न लगना और उनका अपनी आदत न बदलना, दोनों अपनी-अपनी जगह कायम हैं।

आज वे अकस्मात मेरे घर आ गए। मैं अपने घर में बने देवस्थान पर, ‘पाठ-मुद्रा’ में सुन्दरकाण्ड पढ़ कर उठ ही रहा था। मुझे इस तरह और देवस्थान देखकर वे चौंके। अत्यधिक असहजता से, तनिक मुश्किल से बोले-यह क्या? तुमने तो चारों धाम स्थापित कर रखे हैं! कोई जवाब दिए बिना मैं अगले कमरे में आ गया। मेरे पीछे-पीछे वे भी।
उनकी असहजता और चौंकना मुझे बहुत स्वाभाविक लगा। मैंने कहा-अब कहिए। तनिक कठिनाई से बोले-तुम तो पक्के धार्मिक हो! मैंने कहा-अब तक क्या मानते थे? बोले-बातें तो तुम हमेशा हिन्दू धर्म के विरोध की करते, लिखते हो। मैं बोला-अपने जानते तो मैंने ऐसा कभी नहीं किया। आपने ऐसा कैसे मान लिया? वे बोले-मैंने जब भी हिन्दू धर्म-रक्षा की और मुसलमानों, इसाइयों को मार भगाने की बात की तब तुमने हर बार विरोध किया! मैंने कहा-वो तो मैं अब भी करता हूँ और आगे भी करता रहूँगा। 

उन्हें हैरत हुई और चिढ़ भी। मैंने पूछा-आपकी उलझन, क्या है? तनिक झुंझलाकर बोले-तुम मेरी बात या तो समझ नहीं रहे या जानबूझकर समझना नहीं चाहते हो। मैंने कहा-तो आप खुल कर समझाते क्यों नहीं? वे बोले-तुम हिन्दू हो? मैंने कहा-हाँ। फिर पूछा-हिन्दू धर्म मानते हो। मैंने कहा-हाँ। वे उकता कर बोले-तो फिर हिन्दू धर्म का विरोध क्यों करते हो? दूसरेे धर्मों में जो कट्टरता, खराबियाँ हैं, उनका विरोध क्यों नहीं करते? मैंने कहा-मुझे तो अपने धर्म की ही इतनी चिन्ता बनी रहती है कि दूसरों के धर्म की ओर ध्यान देने की फुरसत ही नहीं मिलती। वे हैरत से बोले-क्या मतलब? मैंने कहा-सीधी बात है, मुझे दूसरों के धर्म से कोई लेना-देना नहीं। मेरा धर्म कहता है कि मैं अपने ही अन्दर झाँकूँ और अपनी आत्मा को निर्मल, निष्‍कलुष बनाऊँ। मैंने जितना भी देखा, पढ़ा, सुना और समझा उसका एक ही मतलब निकला कि मैं अपने धर्म से मतलब रखूँ, अपने धर्म का पालन करूँ, दूसरों के नहीं, अपने दोष देखूँ और आत्म परिष्कार करूँ। मैं शायद उनके मनमाफिक उत्तर नहीं दे रहा था। तनिक आवेश में बोले-तुम कैसे हिन्दू हो? घर में तो भजन-पूजन, सुन्दरकाण्ड पाठ करते हो और बाहर मुसलमानों का समर्थन! मैंने कहा-मैंने कब मुसलमानों का समर्थन किया? मैं तो धर्मोपदेश पर अमल करने की कोशिश करता हूँ। मेरा धर्म आत्म-प्रशंसा और पर-निन्दा का निषेध करता है। मैं तो सीधी बात कहने और सीधे रास्ते चलने की कोशिश करता हूँ। 

अब उनका धीरज छूटता लगा। बोले-तुम जैसे लोगों के कारण तो हिन्दू धर्म नष्ट हो जाएगा। हिन्दुओं के देश में हम हिन्दू ही अल्पसंख्यक हो जाएँगे। मुसलमान हम पर राज करेंगे। हमें गुलाम बना लेंगे। मेरी हँसी चल गई। बोला-कमाल करते हैं आप! ऐसे-कैसे नष्ट हो जाएगा? अपने धर्म की शक्ति पर आपको विश्वास हो-न-हो, मुझे तो है। आप ही तो कहते हैं कि अपना धर्म सनातन है! प्रलय तक रहेगा। और रही मुसलमानों की हम पर राज करने की बात तो हम मुगलों की गुलामी झेल चुके हैं लेकिन आज भी वैसे के वैसे ही बने हुए हैं। आप बेकार ही परेशान हो रहे हैं। अरे! जब मुगलों के राज में भी भारत को मुसलमान राष्ट्र नहीं बनाया जा सका तो अब क्या बनेगा? उनकी अधीरता बढ़ गई। तनिक तैश में बोले-और वो जो मुसलमानों के छोरे हमारी लड़कियों को भगा-भगा कर ले जाते हैं? उनसे शादी करने के नाम पर उन्हें मुसलमान बना देते हैं। वो? मेरी हँसी फिर चल गई। वे चिढ़ गए। उनकी चिढ़ की परवाह किए बिना मैंने कहा-ये तो राजी-बाजी के सौदे हैं भाई साहब! इन्हें धर्म से मत जोड़िए। अपनी सल्तनतें बचाने के लिए हमने तो अपनी बेटियाँ तश्तरी में रख कर मुगलों को परोसी हैं। देश के अनेक बड़े लोग अन्तरधर्मी विवाह किए बैठे हैं। धर्म का ठेका लेनेवालों की बहन-बेटियाँ मुसलमानों के घर की जीनत बनी हुई हैं तो अनेक मुसलमान महिलाएँ हिन्दुओं की वंश-बेल बढ़ा रही हैं। आपके ही एक पट्ठे की मुसलमान बीबी के बनाए पकौड़े मैंने आपके साथ खाए हैं। एक अन्तरधर्मी विवाह में मैं खुद ही एक मुसलमान लड़की का धर्म-पिता बना बैठा हूँ और बरसों से बेटी-दामाद को नेग चुकाए जा रहा हूँ। 

वे ‘निरुत्तर’ से आगे, ‘अवाक्’ की स्थिति में आ गए। थोड़ा सोच कर बोले-और वो जो धर्मान्तरण करवा रहे हैं! उसका क्या? क्या वो ऐसे ही चलने दें? मैंने कहा-किसीका जबरिया धर्मान्तरण केवल अपराध ही नहीं, आपने आप में अधार्मिक दुष्कृत्य है। धर्म प्रचार सब करें। किन्तु जबरिया धर्मान्तरण की अनुमति तो मैं नहीं देता। मैं ऐसा पाप कर्म न तो कभी करूँगा और नहीं उसमें कभी शरीक होऊँगा। वे प्रसन्न हो गए। बोले-वो तुमने रायगढ़वाले दिलीपसिंह जू देवजी का नाम तो सुना ही होगा। उन्होंने हिन्दू धर्म की बड़ी सेवा की। इसाइयों ने हजारों हिन्दुओं का धर्म बदल दिया। जूदेवजी ने ऐसे अनेक लोगों की हिन्दू धर्म में वापसी कराई। उसे तुम क्या कहोगे? मैंने कहा-यदि उन सबने दोनों ही बार अपनी इच्छा से धर्मान्तरण किया है तो किसी को भला कोई आपत्ति क्यों और कैसे हो सकती है? उनकी प्रसन्नता बढ़ गई। बोले-याने कि यह तो मानते हो कि धर्मान्तरण करवाया जा रहा है। मैंने कहा-हाँ। ऐसे छुटपुट समाचार, कभी सच्चे तो कभी झूठे आते रहते हैं। वे बोले-तो क्या चुप बैठे रहना चाहिए? मैंने कहा-बिलकुल नहीं। हमें चौबीसों घण्टे चौकन्ने और सक्रिय रहकर यह जानने की कोशिश करते रहना चाहिए कि आखिर वे क्या कारण हैं कि हमारे हिन्दू भाई दूसरे धर्म की शरण लेते हैं। जब वे कारण ही नहीं रहेंगे तो धर्मान्तरण अपने आप ही रुक जाएगा। 

वे फिर अवाक् मुद्रा में बैठ गए। मैंने कहा-भाई साहब! मैं आपको समझाऊँ तो छोटे मुँह बड़ी बात होगी। लेकिन अपने धर्म की रक्षा हम दूसरों के धर्म का विरोध कर, उसे घृणित बताकर, उसके खिलाफ नफरत फैलाकर कभी नहीं कर सकते। प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसका धर्म उसकी जिम्मेदारी है। मैं अपनी इसी जिम्मेदारी को निभाने की कोशिश करता हूँ जिसे आप मेरा हिन्दू धर्म विरोध कहते हैं। मेरे धर्म को विकृतियों से बचाना मेरी जिम्मेदारी है। मेरे लिए मेरा धर्म दुनिया का सबसे सुन्दर धर्म है। इसका अर्थ यह नहीं कि मैं दूसरों के धर्म को असुन्दर या घिनौना साबित करूँ। मुझे हिन्दू और हिन्दू धर्म विरोधी माननेवाले आप जैसे लोग प्रचण्ड बहुमत में हैं और मैं अल्पसंख्यकों में अल्पसंख्यक। यह मेरी अपनी लड़ाई है जो मुझे ही लड़नी है। बोलना और लिखना ही मेरे हथियार हैं। मैं इन्हीं का उपयोग कर सकता हूँ। सो कर रहा हूँ और आगे भी करता रहूँगा।

उन्होंने दोनों हाथों से अपना माथा थाम लिया। विचारमग्न हो गए। मैंने चाय की मनुहार की। बोले-अब तो पीनी ही पड़ेगी। तुमने कुनैन जो दे दी है। 
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(शीर्षक, कुमार अम्बुज की एक कविता पंक्ति है।)

16 comments:

  1. इन लड़ने वालों को इतना आसानी से समझ क्यों नहीं आता, धर्म जो कठिन बनाने को क्यों अपना धर्म बनाये हुवे हैं।
    काश की देश पहले आता, दिल में भी और दिमाग में भी। कुछ और ही तस्वीर होती मेरे देश के तकदीर की।

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  2. ...........aisa tab hota hai............jab hum khud se sawal au jawab karte hain............
    "is-se adhik dharm ki aur paribhasha kya hoga"...................pranam.

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26 -05-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2354 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद।

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    2. बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  4. आज की बुलेटिन अमर क्रांतिकारी रासबिहारी बोस और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद।

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    2. बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  5. बहुत ही बढ़िया सर.... ऐसी कहानिया मुझे बहुत अच्छी लगती है और मई इनको रोजाना पढता हूँ. मई न्यूज़ लिखता हूँ ऐसी १ न्यूज़ मेरे द्वारा है जो की पोस्ट की गयी है १ हिंदी साईट पर :

    यूपी पुलिस ने राहुल गांधी के नौकर होने को किया वेरिफाई

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  6. बहुत बहुत धन्यवाद सर

    मुझे ऐसी रोचक और मजेदार कहानिया और पोस्ट पढ़े मे बहुत आनंद आता है| मे भी ऐसी रोचक पोस्ट लिकता हू जैसे की - ऐसा बच्‍चा जिसमें हैं महिला-पुरुष दोनों के गुप्‍तांग

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  7. पता नहीं ए बात क्यों नहीं समझी जाती कि कट्टरता का जवाब हर बार कट्टरता नहीं होती है. आपके नायक मजबूत हिंदू समाज चाहते हैं और इसके लिए मानते हैं कि हिन्हुओ को कट्टर होना चाहिए. शायद इसलिए कि मुस्लिम कट्टरता देख कर वे सोचते हैं कि जब वे मजबूत हैं तो हिंदू भी हो जायेंगे ....... लेकिन यह भ्रम है . दोनों धर्मों की प्रकृति में बड़ा अंतर है . मुस्लिम जब कट्टर होते हैं तो एक होते हैं, मजबूत होते हैं. लेकिन हिंदू कट्टर होंते हैं तो चार वर्णों और उसके बाद सैकड़ों जातियों में बाँट जाते हैं. हिन्दुओ को मजबूत होना है तो उन्हें उदार होना पड़ेगा . दुनिया की किसी भी कट्टरता का जवाब हिंदुओं की उदारता से ही संभव है. १३२ करोड़ की जनसँख्या में १०० करोड़ से अधिक हिंदू है ..... लेकिन क्या वास्तव में वे बहुसंख्यक हैं ?? बैरागी जी , जाति प्रथा के कारण जिन्हें चट्टान की तरह होना था वे बालू रेत की तरह हैं. हजारों साल की की गुलामी के बाद भी हमें यह बात समझ में नहीं आई है या फिर हम इतने संकुचित मानसिकता के लोग हैं कि समझना नहीं चाहते. ..... आपकी पीड़ा बहुत गंभीर है बैरागी जी, लेकिन फ़िलहाल तो कोई उम्मीद दिखती नहीं है .... बल्कि आसार तो और बिगड के नजर आ रहे हैं .

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    1. सबसे पहले तो आपका आभार। आपकी टिप्पणी से इस पोस्ट का मान बढ़ा।

      जातिवाद को लेकर आपने सतह के नीचे की अत्यन्त महत्वपूर्ण बात कही है, किसी सूत्र की तरह। कृपया अनुमति दें कि मैं उसका उपयोग अपनी आवश्यकतानुसार कर लूँ।

      पुनः आभार।

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  8. विष्णु बैरागी जी आपने बहुत ही अच्छे तरीके से बताया है किस प्रकार से अपने धर्म में ध्यान देना चाहिए न कि दूसरे के धर्म को देख्नना चाहिए इसी तरह ही लोगों की सोच में परिवर्तन हो सकता है आप ऐसे सुन्दर लेखों को अब
    शब्दनगरी पर भी लिख सकते हैं वहां पर भी धर्म वृक्ष जैसे लेख पढ़ व लिख सकते हैं. . . . . . .

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.