रूस की परम्‍परा के विपरीत व्‍यवहार

'बर्लिन से बब्‍बू को' - छठवाँ पत्र


बालकवि बैरागी मास्को हवाई अड्डे से
22 सितम्बर 76
रात्रि के 7.00 बजे

प्रिय बब्बू

प्रसन्न रहो।

आज दोपहर कोई 11.30 बजे बर्लिन में जिस समय हमारा दल होटल उन्तर डेन लिण्डन” को छोड़ रहा था, तब मैं उदास था, रुथ उदास थी, इमी उदास थी। यहाँ तक कि इरीस और डाक्टर गुन्थर तक एक उदासी में डूबे हुए दिखाई दे रहे थे। इनकी उदासियों पर मुझे कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन जब मैंने पाया कि हमारे हँसोड़ दुभाषिये मिस्टर क्लोफर, जिन्हें कि हम अत्यधिक प्यार के कारण मिस्टर लोफर” कहा करते थे, वे तक उदास हैं तो जी. डी. आर. में व्याप्त सम्वेदनाओं के प्रति मेरी धारणा बिलकुल बदल गई। लोग अक्सर कहा करते हैं कि साम्यवादी और समाजवादी व्यवस्था के अन्तर्गत हृदय की कोमल भावनाएँ नष्ट हो जाती हैं। पर हमारे पूरे दल और हमारे मेजबान देश की सभी व्यवस्थापक मनुष्य आकृतियों के चेहरों पर बहते हुए आँसू इस बात का विज्ञापन कर रहे थे कि मनुष्य मूलतः हृदय से शासित होता है। बुद्धि ऐसे क्षणों में पीछे रह जाती है। हृदय की तरलता का नाम ही आँसू है। हम सब रो रहे थे।

इस होटल में हम लोग कोई सात दिन रहकर होटल की व्यवस्था और व्यवस्थापक टुकड़ी से एक तरह से जुड़ से गये थे। सवाल यह नहीं था कि हम अपनी मातृभूमि को लौट रहे थे। सवाल यह था कि हम एक महान् देश से भाईचारा स्थापित करने में सफल होने के बाद अपने देश को लौटने के लिए उस देश को छोड़ रहे थे।

टिप! वह भी 20 प्रतिशत?

व्यवस्था के लिहाज से होटल “उन्तर देन लिण्डन” सबसे लचर और एक ऊब पैदा करने वाला होटल था। मैं तुम्हें लिख चुका हूँ कि पहले हम लोग आधुनिकतम होटल “होटल स्ताद बर्लिन” याने “बर्लिन के हृदय” में रुके। उसके बाद रोस्तोक में होटल “वारनो” में ठहरे और उसके बाद दो रातें बिताई हम लोगों ने यूसाडेल के “मित्रोपा मोटल” में। इन तीन के बाद हमारा साबका पड़ा होटल उन्तर देन लिण्डन” से। मैं ही नहीं हमारे पूरे दल का हर सदस्य “मित्रोपा” का गुलाम हो गया था। उस मोटल से ज्यादा अच्छी व्यवस्था किसी भी होटल में नहीं थी। जर्मन भाषा में “लिन्डन” का मतलब होता है एक तरह के नीबू का वृक्ष। “उन्तर देन लिण्डन” का पूरा मतलब होता है लिन्डन वृक्ष की छाया में। इस होटल में मेरा मन उस समय एकाएक खट्टा हो गया, जब मैंने देखा कि वहाँ के रेस्तराँ में एक बैरे ने टिप भी स्वीकार कर ली। हुआ ऐसा कि हमारे दल के दो-तीन सदस्यों को वहीं रेस्तराँ में बैठे हुए एक अपरिचित मित्र ने चाय-कॉफी और बीयर आदि पिलाई। जब बिल आया तो वह कुल बाईस मार्क का था। बाईस मार्क याने हमारा कोई 88 रुपया। किन्तु हमारे उस अपरिचित मित्र ने बैरे को तीस मार्क के नोट दिये और जब बैरे ने टिपियाना अन्दाज में फर्शी सलाम किया, तो मेरा सिर चकरा गया। यह अनुभव मेरे लिये बिलकुल नया था। आठ मार्क की टिप याने हमारे बत्तीस रुपये हो गए। जब मैंने गहरी छानबीन की तो मुझे पता चला कि पूरे बिल के बीस प्रतिशत से कम यदि यहाँ कोई टिप देता है तो बैरे उसे सलाम नहीं करते। इससे कम टिप को बैरा अपना अपमान मानता है। तुम जानते हो कि भारतीय अर्थों में बीस प्रतिशत एक बहुत बड़ी राशि मानी जाती है। किसी भी व्यवस्था का छिद्रान्वेषण करना मेरा लक्ष्य नहीं है किन्तु इस घटना ने मेरी मान्यता को एक धक्का जरूर दिया है। यह पढ़कर शायद तुम्हें भी न जाने कैसा लग रहा होगा।

'यह' शर्मनाक कमजोरी यहाँ भी

लिखते हुए मैं लज्जा महसूस कर रहा हूँ कि जी. डी. आर. जैसे देश में सिगरेट “रिश्वत” का सबसे बड़ा “प्रकार” है। जिस होटल में तुम्हें कमरा नहीं मिले, उसमें सिगरेट का पैकेट देखते-देखते आलीशान कमरे खुलवा देता है। शर्त यही है कि पैकेट में पूरी बीस सिगरेट होनी चाहिये। चेकोस्लोवाकिया और हंगरी जैसे देशों के बारे में भी मैंने जी. डी. आर. में यही सुना है। पता नहीं सिगरेट इन देशों की इतनी बड़ी कमजोरी क्यों है? ऐसी सूचनाओं से मैं पाता हूँ कि सिगरेट का धुँआ वहाँ केवल सिगरेट का धुँआ नहीं है वरन् साम्यवादी व्यवस्था की कठोरता का धुँआ है। मनुष्य चाहे इस व्यवस्था में हो या उस व्यवस्था में, कहीं न कहीं कमजोर जरूर है और कोई न कोई चीज उसकी कमजोरी को हर जगह अपने-अपने स्तर से उभार ही देती है।

रूस की परम्परा के विपरीत व्यवहार

बर्लिन से मास्को तक उड़ान कुल दो घण्टे की है। हम लोग जी. डी. आर.  की हवाई सेवा “इन्टरफ्लूग” से उड़े। विमान आरामदेह था कर्मचारी चुस्त और परिचारिकाएँ आकर्षक। तुम्हारे लिये यह जानकारी नई होगी कि जब हम बर्लिन से मास्को आते हैं तो उड़ान का समय तो होता है कुल दो घण्टे, पर मास्को आते आते घड़ियाँ चार घन्टे का समय बता देती हैं। बर्लिन और मास्को के समय के बीच में दो घण्टे का फर्क है। इसका दिलचस्प पहलू यह है कि जब हम बर्लिन से दो बजे उड़े तो मास्को छह बजे पहुँचे जबकि आकाश में कुल दो घण्टे हम लोगों को रहना पड़ा। इससे भी ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि अगर, तुम मास्को से बर्लिन की तरफ उड़ोगे तो जितने बजे मास्को से उड़ोगे उतने ही बजे बर्लिन उतरोगे। याने यदि तुम मास्को से 8 बजे चले तो दो घण्टे उड़ने के बाद भी बर्लिन आठ ही बजे पहुँच जाओगे क्योंकि बर्लिन की घड़ियाँ मास्को से दो घण्टे पीछे चलती हैं। सीधा सा नियम यह है कि जब पूरब से पश्चिम को उड़ेंगे तो उस समय, समय कम होगा और जब पश्चिम से पूरब उड़ोगे तो समय ज्यादा। खैर, मास्को हवाई अड्डे पर हमारी जो दुर्दशा हुई है, उसे मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा।

चूँकि हम “इन्टरफ्लूग” का टिकिट लिए हुए थे इसलिये रूस की हवाई सर्विस “एरोफ्लोट” का कहना था कि हवाई अड्डे पर चाय-कॉफी, खाना-पीना आदि की व्यवस्था “इन्टरफ्लूग” को करनी होगी। यह पत्र लिखते-लिखते मैं सोच रहा हूँ कि यहाँ से रात को 10.30 पर हमें उड़ना है। शाम 6 बजे से हम यहाँ बैठे हैं। इन साढ़े चार घण्टों में हमारे पूरे दल का क्या होगा? अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के मुताबिक शहर से मिलने के लिये कोई हम तक आ भी नहीं सकता था। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा याने पौण्ड या डालर हममें से किसी के पास नहीं है। पानी पीने तक की परेशानी है। चाय-कॉफी तो बहुत दूर की बात है। शायद हवाई जहाज में कुछ मिले।

मास्को हवाई अड्डे पर कर्मचारियों का व्यवहार हमारे साथ रूस की परम्परा के बिलकुल विपरीत है। खासकर एक महिला जो कि अन्तर्राष्ट्रीय मुसाफिरों को सूचनाएँ दे रही है, उसका व्यवहार अत्यन्त आपत्तिजनक है। उसने जिस तरह, जिस तेवर से हमारे संसद सदस्य श्री दिनेश गोस्वामी से बात की, उसे भारत में हम लोग “बद्तमीजी” कहा करते हैं। पता नहीं रूस की सरकार को ऐसी उद्दण्ड, अशोभन और अविवेकपूर्ण महिलाओं को हवाई अड्डे जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर रखने की क्या आवश्यकता थी। इस महिला के पास न भाषा थी न आचरण।
मास्को हवाई अड्डा इस समय भारतीय यात्रियों की चहल पहल से भरा पड़ा है। कोई सौ डेढ़ सौ भारतीय यात्री संसार के विभिन्न केन्द्रों से यहाँ आकर अपने-अपने गन्तव्यों की ओर जाने के लिये सूचनाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चे बिलकुल भारतीय स्वरों में किलोलें कर रहे हैं और उनके डैडी-मम्मी उन्हें ठीक उसी तरह डाँट फटकार रहे हैं, जैसा कि हम लोग अपने घरों में अपने बच्चों को डाँटा-फटकारा करते हैं। आज बम्बई के लिये एयर इण्डिया की उड़ान भी है। भारतीय यात्रियों की अधिकता का  यह भी एक कारण है।

मास्को हवाई अड्डा संसार का विशालतम हवाई अड्डा है। तुम विश्वास नहीं करोगे कि यहाँ सैकड़ों, हजारों हवाई जहाज इस तरह खड़े हुए हैं कि जैसे मन्दसौर रेलवे स्टेशन पर ताँगे खड़े रहते हैं। फर्क यही है कि ताँगे एक दूसरे से सट कर खड़े रहते हैं और ये हवाई जहाज ठीक अपने मुकामों पर खड़े हैं। जहाँ बैठकर मैं तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूँ उस लाउन्ज के पारदर्शी शीशे में से जहाँ तक मेरी नजर जाती है, मैं दूर दूर तक केवल हवाई जहाज देख पा रहा हूँ। इधर दूसरी तरफ मुँह करने का मन नहीं करता, क्योंकि उधर फिर वही महिला घूम रही है, जिससे हम लोग परेशान भी हैं, और आतंकित भी।

यदि इस महिला का आवागमन नहीं होता तो मेरी टेबल से कोई सौ कदम दूर हवाई अड्डे की इतनी बड़ी दूकान है कि उसमें घूमते-फिरते हम लोग आसानी से 4 घण्टे बिता देते। यदि दुकान में नहीं भी जाते तो पास ही टेलीविजन पर रोचक और समझ में आने वाली रूसी फिल्में चल रही हैं। पर हमारे दल का हर सदस्य भूखा है, प्यासा है, खिन्न है, क्षुब्ध है और अवसाद से भरा बैठा है। केवल भारत लौटने की ललक में हम इस हवाई अड्डे की सारी वहशत को पी गये हैं। जो हवाई जहाज यहाँ से हमें लेकर चलेगा, वह भारतीय समय के मुताबिक रात 12-30 बजे उड़ेगा, जबकि मास्को में कुल 10 ही बज रहे होंगे। बड़ी सुबह हम लोग दिल्ली पहुँच जाएँगे।

पता नहीं मैं घर कब पहुँचता हूँ? पर मिस्टर सेठ, मिस्टर शर्मा, मिस्टर गुप्ता, ये लोग बड़े खुश हैं कि वे बड़ी सुबह अपने परिवार वालों से मिल लेंगे। मुझे इनसे ईर्ष्या नहीं है। पर इतने लम्बे अन्तराल के बाद वापिस स्वदेश लौटने पर यदि हवाई अड्डे पर कोई अपना नहीं मिलता तो उदासियाँ सौ गुना बढ़ जाती हैं। मैं जानता हूँ कि मुझे लेने पालम पर कोई नहीं आएगा, तो भी मैं भीड़ में, उस अनजानी भीड़ में “पिया” को ढूँढूँगा, गोर्की को तलाश करूँगा, तुझे देखने का असफल प्रयत्न करूँगा और फिर एक लम्बी साँस छोड़कर उस भीड़ में खो जाऊँगा। शायद मेरी यात्राओं का यही एक सनातन समापन होता आया है और यह अब भी होगा।

हर तीसरे मिनिट एक हवाई जहाज हवा में

हवाई अड्डे के सूचना पट पर हमारी उड़ान की सूचना आने को ही है। इस पट पर देखकर मैं कह सकता हूँ कि मास्को हवाई अड्डे से औसतन हर आठवें मिनट एक अन्तर्राष्ट्रीय उड़ान होती है। रूस की घरेलू उड़ानों का सिलसिला अलग है याने यदि बारीकी से हम देखें तो मैं सोचता हूँ कि मास्को हवाई अड्डा हर तीसरे मिनिट एक हवाई जहाज को आकाश में उछाल देता होगा। हवाई अड्डे की सारी व्यवस्था आधुनिकतम है और मशीनें बेहद निर्मम। चेकिंग अत्यन्त सख्त और सब कुछ बिना किसी लिहाज के। कील-कील को मेटल डिटेक्टर और एक्स-रे मशीन के नीचे से गुजरना पड़ता है। किसी किस्म के चकमे की कोई गुंजाइश नहीं। हवाई अड्डे की सारी व्यवस्था प्रत्यक्षरूपेण महिलाओं के हाथ में है। हो सकता है कि बड़े पदों पर वहाँ पुरुष भी होंगे। पर मास्को हवाई अड्डे पर जाते समय भी वहाँ की महिला कर्मचारियों ने मिस्टर शर्मा और मिस्टर सेठ के साथ कोई अच्छा सलूक नहीं किया था।

आशा करता हूँ कि वहाँ सब अच्छे होंगे। मैं सो फीसदी स्वस्थ हूँ। सबको मेरा प्रणाम कहना। अब मैं दिल्ली उतरते ही तुझे एक पत्र और लिखूँगा। बस।

भाई 
बालकवि बैरागी 

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आगे - सातवाँ पत्र 





2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (21-07-2018) को "गीतकार नीरज तुम्हें, नमन हजारों बार" (चर्चा अंक-3039) (चर्चा अंक-2968) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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