दादा का दिया नारा, संघ-भाजपा का सहारा

यह नारा, जो पूरे भारत मे प्रसिद्ध हुआ और जिस नारे के सहारे कइयों की कश्तियाँ पार लग गईं, आया कहाँ से? मेरे मनासा से। 

सुना तो काफी पहले था कि यह नारा मेरे शहर मनासा की ही एक हस्ती ने दिया है। लेकिन, एक ही शहर में रहते हुए 39 सालों में उनसे कभी मिला नहीं था। बहुत सुना  था उनके बारे में। जब भी बाहर कहीं जाता तो मनासा का नाम सुनते ही सहयात्री बोलते - ‘अच्छा! वो बालकवि बैरागी वाला मनासा!’ गौरव महसूस होता था अपने आप पर कि मैं भी उसी मनासा का रहनेवाला हूँ जो बैरागी दादा के नाम से पहचाना जाता है। भले ही मैं उनसे मिला नहीं था और न ही वो मुझे पहचानते थे लेकिन फिर भी कुछ डींगें हाँक दिया करता था और दादा की जगह मुन्ना भैया की बहादुरी के किस्से (जो अपने कॉलेज के छात्र जीवन में देखे थे) सुना कर जताता कि हाँ मैं उनके परिवार को बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। हमारे मनासा की पहचान, मालवा की शान, राष्ट्र का गौरव, ख्यातनाम कवि, हिन्दी के माथे की बिन्दी, वरिष्ठ काँग्रेसी एवं पूर्व सांसद श्री बालकवि बैरागी वह हस्ती हैं, जिन्हें हम सभी ‘बैरागी दादा’ के नाम से जानते हैं, और जिन्हें ‘बचपन से लेकर पचपन तक’ का व्यक्ति ‘दादा’ ही कहता है।

पहली बार आज उस हस्ती से मिलने पहुँच गया। बहाना था दिवाली की शुभ-कामना देने का। मन में कई जिज्ञासाएँ थीं। कई प्रश्न थे जिन्हें शान्त करना था। 

दादा से मुलाकात हुई। शुभकामनाओं एवं आशीर्वाद के बाद दादा ने मिठाई खिलाई। और फिर मैं जम गया कुर्सी पर दादा के सामने। मैंने बातों की शुरुआत की - “दादा मैंने परसों यूट्यूब पर कुमार विश्वास के 5 प्रोग्रामों के वीडियो देखे। उनमें से तीन में उन्होंने आपका नाम लेकर आपकी ‘काजल के पर्वत पर चढ़ना’ वाली कविता सुनाई।” 

वे मेरी बात का जवाब देते कि कुछ लोग मिलने आ गए। बातों की कड़ी टूट गई । दादा उनसे बात करने लगे। लोग आते रहे, जाते रहे। मैं लगा हुआ था, दादा को सुनने में। 

उनसे कई विषयों पर बात हुई। एक विषय खत्म होता नहीं कि मैं दूसरा विषय छेड़ देता। इस दरमियान मैंने अनुभव किया कि दादा अपने आप में  एक विश्वविद्यालय हैं और सामने बैठा मैं एक अबोध, अज्ञानी नर्सरी का छात्र। अरे हाँ! एक और बात बता दूँ आपको कि दादा वो शख्सियत हैं जिन पर देश के कई विश्वविद्यालयों के छात्र पी. एच-डी कर चुके हैं।

आखिर में मैंने दादा से कहा - ‘दादा एक जिज्ञासा है। मैंने सुना है कि राम मन्दिर आन्दोलन में आपने कोई नारा दिया था?’ दादा ने बताया कि अस्सी के दशक में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी ने सुरेश पचौरीजी से बोला कि राम जन्म-भूमि आन्दोलन को और गति प्रदान करने के लिये बैरागी दादा से कोई अच्छा-सा नारा लिखवा दें। यह बात पचौरीजी ने दादा को बताई। दादा ने स्वरूपानन्द जी को नारा लिख कर दिया - ‘बच्चा-बच्चा राम का। जन्म-भूमि के काम का।।’

स्वरूपानन्दजी ने इस नारे के 25000 बेनर चित्रकूट में लगवाए। इन बेनरों से ही यह नारा, स्वरूपानन्दजी के यहाँ से होता हुआ पूरे देश में फैला। संघ समेत तमाम हिन्दूूवादी संगठनों और बीजेपी ने इसे अपना लिया और देश के बच्चे-बच्चे की जुबाँ पर आ गया। दादा ने बताया - ‘नारा देने के कुछ समय बाद हरिद्वार की आमसभा में स्वरूपानन्दजी ने 10000 लागों की उपस्थिति में बताया कि जिन्होंने यह नारा दिया है वो ये बैठे हैं बैरागीजी।’ 

लेकिन जो ये नारा लगाते हैं उन्हें आज तक पता नहीं है कि ये नारा मेरे मनासा के वरिष्ठ-काँग्रेसी एवं महान कवि दादा बाल कवि बैरागी की कलम से निकला हुआ है और उसी नारे का सहयोग लेकर एक पार्टी राजनीतिक दरिद्रता से निकलकर सत्ता के तरणताल में गोते लगा रही है। शायद ये तो लिखने वाले ने भी नही सोचा होगा कि रामभक्ति मे लीन होकर जो शब्द वो दे रहा है वे ही शब्द किसी पार्टी के लिये राजनीति और सत्ता की मजबूत और पुख्ता सीढ़ियाँ साबित होंगी।

आज देख लिया दादा आपकी कलम से निकले राम-नाम में कितनी ताकत थी।

भैया दीपकजी गेहलोत! दादा से मुलाकात करवाने के लिये आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।
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(मनासा निवासी श्री शकील शेख ने यह आलेख 20 अक्टूबर 2017 को, फेस बुक पर अपनी वॉल पर दिया था। वाक्य रचना और वर्तनी में तनिक सुधार के बाद यहाँ साभार प्रस्तुत है।)

3 comments:

  1. बहुत ही अनुकरणीय एवं शानदार

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (20-07-2018) को "दिशाहीन राजनीति" (चर्चा अंक-3038) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. प्रेरक प्रस्तुति

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