हाजी मस्तान की हलाल की कमाई


‘वन्स अपऑन ए टाइम इन मुम्बई’ से चर्चा में आए, अपने समय के ख्यात तस्कर (अब स्वर्गीय) हाजी मस्तान से जुड़ा यह ऐसा संस्मरण है जिसे पढ़ने के बाद यह तय करना तनिक कठिन हो जाएगा कि उसे क्या समझा जाए - व्यक्तिगत रूपसे ईमानदारी बरतनेवाला ‘खुदा का नेक बन्दा’ या चापलूसी को धकेल कर अपनी जेब बचाने के लिए सतत् सन्नद्ध, चौकन्ना आदमी?

यह उस काल खण्ड की सत्य घटना है जब हाजी मस्तान तस्करी से तौबा कर भला आदमी बनने के उपक्रम कर रहा था। इस घटना से जुड़े कम से कम तीन व्यक्ति आज रतलाम में जीवित हैं। उन्हीं में से एक ने मुझे यह किस्सा सुनाया। वादाखिलाफी का गुनहगार होने से बचने के लिए इस किस्सागो का नाम न बताना मेरी मजबूरी है।

भला आदमी बननेवाले दौर में हाजी मस्तान रतलाम भी आया था। उसके आने की खबर पर्याप्त समय पहले ही रतलाम पहुँच चुकी थी। मस्तान के चाहनेवालों और उसका ‘आर्थिक सदुपयोग’ करनेवालों में उत्साह था। माणक चौक में महालक्ष्मी मन्दिर के पास स्थित मस्जिद के कायापलट के लिए लोगों से चन्दा इकट्ठा किया जा रहा था। चन्दा लेनेवाले, रोज शाम मुहल्लों में, घर-घर जाकर, सामनेवाले की हैसियत से अधिक रकम लेने की कोशिश कर रहे थे। चूँकि ‘नेक काम’ के लिए लेना था इसलिए दिल खोल कर माँग रहे थे। खुद के लिए माँगते तो सौ बार सोचते। लेकिन यहाँ तो मामला खुदा के घर का था। सो, सब कुछ उत्साह और प्रसन्नता से चल रहा था।

मस्तान के आने की खबर इसी दौर में आई। सुनकर चन्दा इकट्ठा करनेवालों के मन में आशा की किरण फूटी। आपस में बात तो बाद में की, बिना बात किए ही सबने मान लिया - मस्तान याने खुले हाथों चन्दा मिलने का भरोसा। उस समय मस्तान का तो नाम ही काफी था।

सो, मस्तान के रतलाम आने पर उसका जोरदार स्वागत किया गया। जरूरी-गैर जरूरी तौर पर उसके लिए कार्यक्रम आयोजित किए गए। खूब फूल-हार किए गए। इस सबमें, ‘उस जमाने में’ रतलाम के लोगों ने मस्तान पर कोई पाँच हजार रुपये खर्च कर दिए। इसी क्रम में, निर्माणाधीन मस्जिद का दौरा भी करवाया गया। रतलाम प्रवास की पूरी समयावधि में मस्तान ने अपेक्षा से अधिक गम्भीरता जताई। मस्जिद से बाहर आते-आते बातों ही बातों में निर्माण कार्य का अनुमानित खर्च भी बता दिया गया। ऐसे क्षणों में कोई लाख छुपाना चाहे तो भी मन्तव्य छुपता नहीं। सो, बहुत ही जल्दी मस्तान को अहसास हो गया कि उससे अच्छी-खासी आर्थिक अपेक्षा की जा रही है। किन्तु उसने रतलाम के लोगों को बोलने का मौका नहीं दिया। अपनी ओर से पूछा - ‘इस काम में आप लोग मुझसे भी कुछ उम्मीद कर ही रहे होंगे?’ सुननेवालों की तो मन की मुराद पूरी हो गई! मस्तान ने कहा - ‘आप लोग बॉम्बे तशरीफ लाईए। वहीं बात करेंगे।’

काम मस्जिद के लिए चन्दा लेने का और न्यौता मस्तान का! वह भी सपनों के शहर मुम्बई का! मानो, धकापेल मच गई। मुम्बई जानेवाले पाँच लोगों के नाम तय करने में जमात को अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ी।

बमुश्किल तय किए पाँचों लोग रतलाम से सवेरेवाली ट्रेन से निकले और शाम को मुम्बई पहुँचे। मस्तान ने गर्मजोशी से स्वागत किया और कहा - ‘आज आप आराम कीजिए। रात को क्या बात हो पाएगी? कल ही बात करेंगे।’

ठाठें मार रहे उत्साह से सराबोर पाँचों ने अपनी हैसियत से तनिक अधिक मँहगी होटल में डेरा डाला और खान-पान भी इसी के मुताबिक तनिक अधिक खुले हाथों ही किया।

अगली सुबह पाँचों मस्तान के दरबार में पहुँचे। मस्तान ने इस्तकबाल और आवभगत तो की किन्तु मेहमानों को गर्मजोशी महसूस नहीं हुई। मस्तान ने कहा - ‘आपको तकलीफ न हो तो शाम को चार बजे मिल लें।’ मेहमानों के बस में था ही क्या? तकलीफ तो हुई किन्तु किससे कहे और क्या कहे? मस्तान का कहा मानना मजबूरी थी। लेकिन मुम्बई में बिना माँगे मिली फुरसत ने सैर-सपाटे की सम्भावना पैदा कर दी। नतीजतन, घूमने-फिरने और भोजनादि पर दिन भर में भरपूर खर्चा हो गया।
पाँचों रतलामी, शाम चार बजे से थोड़ा पहले ही पहुँच गए। मुख्य काम यही तो था! भला इसमें देर कैसे करते?
मिजाजपुरसी के दौरान मस्तान ने पूछा - ‘आपकी वापसी का प्रोग्राम क्या है?’ जवाब मिला - ‘कल शाम चार बजेवाली गाड़ी से जाएँगे।’ मस्तान ने जवाब को हाथों-हाथ लिया। कहा - ‘फिर तो आप लोग कल दोपहर में दो बजे आ जाएँ। नमाज के फौरन बाद।’

मरता क्या न करता? कहा मानने के सिवाय और कोई रास्ता भी तो नहीं था। लेकिन एक बार फिर फुरसत भरी पूरी शाम मिल गई रतलामियों को। मस्तान की टाला-टोली से उपजी खिन्नता दूर करने की जुगत में मेहमानों ने सैर-सपाटे का सहारा लिया और उम्मीद से ज्यादा ही खर्चा भी कर लिया।

अगली दोपहर पाँचों ही लोग, होटल का भारी-भरकम बिल चुका कर मस्तान के दरबार मे पहुँचे। अपना बोरिया-बिस्तर साथ ही ले लिया था। मस्तान से चन्दा लेकर सीधे स्टेशन जो पहुँचना था!

कमरे में मस्तान अपनी टेबल के पीछे बैठा था और सामने कुर्सियों पर रतलाम से पहुँचे मेहमान। मस्तान ने बिना किसी भूमिका के बात शुरु की। बातें कुछ इस तरह से हुईं -
‘मुझे मस्जिद के लिए चन्दा देना है ना?’
‘जी हाँ।’
‘देखिए! मामला मस्जिद का है और मेरे काम-धाम के बारे में आप जानते ही हैं। जरा खुलकर बताइए कि इस नेक काम के लिए आप हराम का पैसा लेना पसन्द करेंगे या हलाल का?’
पाँचों को कोई जवाब नहीं सूझा। कभी एक दूसरे का तो कभी मस्तान का मुँह देखें! जवाब कौन दे? क्या पता, क्या नतीजा निकले? जवाब देने के लिए पाँचों के पाँचों, एक दूसरे की प्रतीक्षा करने लगे। कमरे में मौन छा गया। चुप्पी मस्तान ने ही तोड़ी। मुद्राविहीन मुद्रा में, निर्विकार भाव से बोला -‘जवाब दीजिए साहबान ताकि काम खतम हो। और आपको ट्रेन भी तो पकड़नी है?’

मुझे किस्सा सुना रहे बन्दे ने कहा - ‘बैरागीजी! हमारे बोल नहीं फूट रहे थे। गले से घरघराहट या गों-गों जैसी कुछ आवाज निकल रही थी। हम पाँचों को पहले ही लमहे में समझ आ गई थी कि मस्तान ने गहरी चाल चल दी है। वह चुपचाप रुपये दे देता तो हम जानने की कोशिश ही नहीं करते कि रुपये हराम के है या हलाल के। लेकिन जब उसने पूछा तो भला हराम का पैसा लेने की हाँ कौन भर सकता था? आखिरकार, हम सबमें जो उमरदार था, उसने जैसे-तैसे कहा - जाहिर है मस्तान साहब कि पैसा तो हलाल का ही लेंगे।’

मस्तान के चेहरे पर कोई हरकत नहीं हुई। वह निर्विकार ही बना रहा। सपाट आवाज में बोला -‘आप लोग सच्चे मुसलमान हैं। वरना तो भाई लोग इस बाबत सोचते ही नहीं।’ कह कर उसने अपनी टेबल की दराज खोली। हाथ डाला। हमारी जिज्ञासा चरम पर पहुँच गई थी। मस्तान से मिलनेवाली रकम का अनुमान हम पाँचों ही, अपने-अपने हिसाब से लगा रहे थे। हमारे दिलों की धड़कनें बढ़ गई थीं। देखें, मस्तान के हाथ में नोटों की कितनी बड़ी गड्डी या गड्डियाँ आती हैं!

जैसे ही मस्तान का हाथ बाहर आया, हम पाँचों की नजरें फटी की फटी रह गईं। हम कभी मस्तान के हाथ को, कभी मस्तान के चेहरे को तो कभी एक दूसरे के चेहरे को देख रहे थे। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मस्तान हमें चन्दे में यह रकम दे रहा है।

मस्तान के दरबार में पाँचों रतलामियों की दशा पता नहीं कैसी हुई होगी। किन्तु किस्से के इस मोड़ पर आकर मेरा रोमांच चरम पर पहुँच गया। मेरा जी कर रहा था कि मैं किस्सागो के मुँह में हाथ डालकर किस्से का शेष भाग निकाल लूँ। मैं चुप नहीं रह सका। धड़धड़ाती धड़कनों और उखड़ती साँसों को नियन्त्रित करते हुए पूछा - ‘कितने नोट थे मस्तान के हाथ में?’

किस्सागो ने मेरी ओर तरस खाते हुए, अत्यन्त दया भाव से देखा और बोला - ‘बैरागीजी! मस्तान के हाथ का नोट देखकर हम पाँचों को गश आ गया। लगा कि धरती समन्दर में डूब रही है और हम भी उसी में समाते जा रहे हैं। बड़ी मुश्किल से हमने अपने आप को सम्हाला। मस्तान के हाथ में कुल जमा एक नोट था वह भी दो रुपये का।’

मैं मानो धड़ाम से जमीन पर गिरा। मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। मुझे पसीना आ गया। बिना विचारे मेरे मुँह से निकला - ‘क्या बात कर रहे हैं आप? ऐसा कैसे हो सकता है?’ मेरी दशा देखकर किस्सागो हँसा। बोला - ‘हो क्या सकता है बैरागीजी! यही हुआ।’ मैंने पूछा - ‘फिर?’ किस्सागो ने जवाब दिया -‘फिर क्या? हम अपने आप में लौटते उससे पहले ही मस्तान ने दो रुपये का वह नोट हमारी तरफ बढ़ाया और उसी सपाट आवाज में बोला - ‘मेरी हलाल की कमाई यही है। कबूल करने का करम फरमाईए। आप अगर हराम का पैसा लेने की बात करते तो आज मैं खुदा का गुनहगार हो जाता। आप लोगों ने आज मुझे दोजख से बचा लिया। आप वाकई में सच्चे मुसलमान हैं।’

किस्सागो कह रहा था - ‘बैरागीजी! हमें कुछ भी नहीं सूझ रहा था। अच्छी-खासी रकम की उम्मीद में हम अपनी औकात और हैसियत से कई गुना ज्यादा रकम मुम्बई में खर्च कर चुके थे। सोचा था, चन्दे की रकम ऐसी होगी कि आने-जाने का खर्चा चन्दे की रकम में से लेने की इजाजत जमात दे देगी। लेकिन यहाँ तो सब उल्टा हो गया था। पता नहीं मस्तान ने हमसे सच बोला था या हमसे खेल खेला था। अपने आप पर काबू पाने में हमें बहुत मेहनत लगी। मस्तान ने हमारा ही तीर हम पर चला दिया था। हम न तो कुछ बोल सकते थे और न ही कुछ कर सकते थे। जी तो किया कि दो रुपये का वह नोट उसके मुँह पर फेंक कर चले आएँ लेकिन लगा कि वह कहीं यह नोट भी वापस न रख ले। सो, भारी और बुझे मन से हमने दो रुपये का वह नोट लिया। मस्तान को शुक्रिया कहा और लौट आए।’

‘रतलाम आकर लोगों से क्या कहा आप लोगों ने?’ पूछने से रोक नहीं सका मैं अपने आप को।

‘कहते क्या? लौटते में हम पाँचों ने तय कर लिया था कि यह हकीकत जमात के दो-चार लोगों को ही बताएँगे ताकि मुट्ठी भी बँधी रहे और हम पाँचों की जग हँसाई भी न हो। यही किया भी। सयानों ने हमसे हमदर्दी जताई, ढाढस बँधाया और यह बात गिनती के लोगों के बीच ही रही।’

इसके बाद किस्सागो ने कहा तो बहुत कुछ किन्तु उस सबसे आपको क्या लेना?

बना लीजिए मस्तान के बारे में अपनी धारणा जो आप बनाना चाहें।

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8 comments:

  1. Bahut shaandar ..... tabhi naam hai Haaji Mastaan

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  2. haji mastan is a realy great man.........

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  3. vishal sahi bola haji mastan

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  4. बेवकूफ बना रहा था..२ रूपये तो रतलाम में ही दे सकता था ...उस्ताद आदमी था..ठगों को ठग लिया

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    1. aaisa lagata jaroor hai ki haji ne unahe sabak sikhane ki niyat se aaisa kiya....
      lekin asal me usaka karanama sadist jaisa hai...

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