कार आने से पहले स्कूटर पर बैठ गए, बोले- ‘चल! अकादमी छोड़ दे।’

-डॉ. शिव चौरसिया

यह सितम्बर 2011 की बात है। दादा कालिदास अकादमी के ‘संजा लोकोत्सव’ का शुभारम्भ करने आए हुए थे। फ्रीगंज की एक होटल में उन्हें ठहराया गया था। भोजन के बाद उन्हें अकादमी पहुँचना था। ड्राइवर कार लाता इसके पहले वे मेरे स्कूटर पर बैठ गए। बोले - ‘चल! अकादमी छोड़ दे।’  शहर के साहित्यकारों ने इस मौके के फोटो भी खींचे जो सोशल मीडिया पर खूब चर्चित रहे। 

बैरागीजी सरलता के मानवाकर थे। करीब दस साल पहले की बात है। वे मेरे घर आए। उन्हें अन्दर बैठने को कहा तो बोले - ‘दरी लेकर आओ। बाहर धूप में बैठेंगे।’ वे बाहर, धूप में दरी पर ही बैठे। जब नाश्ता आया तो बोले- ‘ये बाजारू चीजें नहीं, घर का बना जो हो वह लेकर आओ।’

तत्कालीन मुख्यन्त्री कैलाशनाथ काटजू के सामने भी उन्होंने कविताएँ गाईं थी। एक बार काटजूजी ने उनकी अनुपस्थिति में लोगों से पूछा- ‘अरे वह बाल कवि कहाँ है?’ बस उसी दिन से वे नन्दरामदास बैरागी से ‘बालकवि बैरागी’ हो गए। 

1967 में हम लोग मनासा गए थे। उस समय उनका मकान बन रहा था तब बिना प्लास्टर का मकान दिखाते हुए बोले- ‘सरस्वती की कृपा से ही यह घर बन पाया है।’ वे हमेशा कहते थे- ‘इस देश ने मुझ मँगते को मन्त्री बना दिया।’ 

बैरागी समाज का होने से बचपन में ‘सीताराम’ कहते घर-घर जाते थे। इसी दौरान कविता लिखनी और गानी शुरु की। संसद में वे अपनी बात कविताओं में रखते थे। राजमाता सिन्धिया ने संविद सस्कार बनने पर उन्हें मन्त्री पद देने के लिए बुलाया। लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया।

1977 के पाकिस्तान युद्ध के समय उनकी कविता ‘जबकि नगाड़ा बज ही गया है, सरहद पर शैतान का, नक्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का’ को खूब पसन्द किया गया। 

वे विधायक, संसदीय सचिव, मन्त्री, लोक सभा सदस्य, राज्यसभा सदस्य जैसे पदों पर रहे लेकिन उनका मालवीपन और सरल सौम्य स्वभाव हमेशा बना रहा। उन्हें मिलनेवाले हर पत्र का वे हाथ से लिख कर जवाब देते थे। उन्होंने फिल्मों में भी गीत लिखे लेकिन जीवन, रहन-सहन का स्तर वही बना रहा। कवि सम्मेलन के लिए यदि तारीख देदी तो फिर वे, कितना भी पैसा मिले, दूसरे को वह तारीख नहीं देते थे। यही उनकी प्रामाणिकता थी।

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(डॉक्टर शिव चौरसिया उज्जैन में रहते हैं। दादा के आत्मीय रहे हैं। दादा जब-जब भी उज्जैन की बात करते थे तब-तब, हर बार मैंने,दादा को शिव दादा का उल्लेख करते ही करते हुए ही सुना। मालवी के प्रति शिव दादा का समर्पण अनुपम है। वे मालवी में लिखते तो हैं ही, परस्पर संवाद भी मालवी में ही करते हैं।

दादा श्री बालकवि बैरागी के ‘बालकवि’ नामकरण को लेकर सबके पास अपने-अपने संस्मरण हैं। वास्‍तविकता यह है कि उनका यह नामकरण किया तो काटजूजी ने ही लेकिन किया, मनासा में, एक आम सभा में।

दैनिक भास्कर में, 2011 में छपे इस संस्मरण की कतरन उज्जैन से श्री प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने उपलब्ध कराई है। शैलेन्द्रजी उज्जैन में विक्रम विश्व विद्यालय में प्रोफेसर, हिन्दी अध्ययनशाला के अध्यक्ष, कला संकायाध्यक्ष और कुलानुशासक हैं। स्‍कूटर पर शिव दादा के पीछे बैठे दादा श्री बालकवि बैरागी का यह फोटू भी शैलेन्द्रजी ने ही लिया था।

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