‘थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी अकल’ याने पेण्ट-शर्ट के भाव में सफारी


नकली दाँतों की जबानी सुनी मुनाफे की असलियत का मजा अपनी जगह रह गया और ‘यदि आदमी थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी अपनी अकल लगा ले तो मुनाफाखोरी से बच सकता है’ सुनकर उपजी जिज्ञासा मन पर हावी हो गई। झटपट चाय खतम की और कहा - ‘जरा, फटाफट बताइए तो कि यह थोड़ी सी अकल लगाने वाली बात क्या है?’ यादवजी बोले - “सुनाता हूँ। आपको सुनने में मजा आ रहा है तो मुझे भी सुनाने में मजा आ रहा है। जानता हूँ कि ये किस्से आप लिखेंगे ही लिखेंगे। बस! इतना ध्यान रखिएगा कि मेरी ‘थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी अकल’ से हताहत हुए पात्र का असली नाम उजागर नहीं करेंगे।”
                                                                                       
मैंने कहा - ‘वादा रहा। पक्का वादा। भरोसा रखिए।’

‘तो फिर सुनिए।’ कह कर यादवजी शुरु हो गए -

“बात कोई चालीस बरस पहले की है। 1971-72 के जमाने की। ‘सफारी’ फैशन में आई-आई ही थी। आते ही इसने धूम मचा दी थी। पेण्ट-शर्ट मानो पिछड़ेपन की निशानी बन गए थे। कपड़ों की दुकान छोटी हो या बड़ी, सब जगह सूटिंग क्लॉथ का कब्जा हो गया था। घर के बाहर चबूतरे पर सिलाई मशीन लेकर बैठनेवाले हमारे छगन से लेकर ‘रतलाम के एक मात्र शो रूम’ में बैठने वाले याकूब टेलर मास्टर तक, सब के सब मानो ‘सफारी-सेवक’ बन कर रह गए थे। किसी को सर उठाने की फुरसत नहीं। काम इतना कि सारे के सारे टेलर ‘झूठे-बलमा’ साबित होने लगे। एक भी माई का लाल ऐसा नहीं रहा जिसने, जिस दिन का वादा किया, उस दिन सफारी तैयार करके ग्राहक को दे दी हो। 

“उधर, सफारी कुछ इस तरह सर पर सवार हुई कि जिसे देखो, या तो सफारी में सजा हुआ चला आ रहा है या फिर सफारी का कपड़ा बगल में दबाए, दर्जी की दुकान की ओर भागा जा रहा है - कुछ इस तरह कि उससे पहले किसी और का नम्बर नहीं लग जाए। दर्जियों की बन आई थी। जो दुकानदार, आसपास के दुकानदारों से नजर बचाकर, दस दुकान आगे जाकर अकेला, चुपचाप चाय पीने जाया करता था, अब अपने ग्राहकों को जबरन चाय पिला रहा था। जो कभी थर्ड क्लास से आगे नहीं बढ़ा, वह फर्स्ट क्लास में सफर करने का हौसला करने लगा था। सफारी सिलाई के भाव, पेण्ट-शर्ट की सिलाई के मुकाबले एकदम दुगुने। अब, उस समय के भाव तो बराबर याद नहीं आ रहे पर आप मान लो कि पेण्ट-शर्ट की सिलाई सौ रुपये (पेण्ट की सिलाई साठ और शर्ट की सिलाई चालीस रुपये) तो सफारी की सिलाई दो सौ रुपये।

“मेरी हालत उस समय यूँ तो ठीक-ठीक ही थी किन्तु तब भी मुझे सफारी, अपनी चादर से बाहर लगती थी। लेकिन सफारी के आकर्षण से मैं खुद को नहीं बचा पाया। अपनी आत्मा की आवाज अनसुनी कर, जी कड़ा कर सफारी का कपड़ा खरीद ही लिया। कपड़ा भी ऐसा-वैसा चालू किसम का नहीं, मॉडेला सूटिंग का।

“अपनी हैसियत से आगे जाकर मँहगा कपड़ा तो मैंने खरीद लिया किन्तु सिलाई के दो सौ रुपये देने की न तो हिम्मत थी और न ही इच्छा। लेकिन यह भी तो नहीं हो सकता कि कपड़ा खरीद लो और सफारी नहीं सिलवाओ! तो, अब मुझे सफारी सिलवानी थी और दो सौ रुपयों में नहीं सिलवानी थी। यहीं मैंने अपनी ‘थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी अकल’ लगाई।  

“एक सावधानी मैंने यह बरती  कि सफारी का कपड़ा ‘वन पीस’ नहीं कटवाया। दुकानदार से कह कर दो टुकड़ों में लिया। एक टुकड़ा पेण्ट के लिए और दूसरा शर्ट के लिए।

“एक शाम मैं ‘पेण्ट पीस’ लेकर परशुराम की दुकान पर पहुँचा। आप उसे और उसकी दुकान को जानते हो। दो बत्ती पर ही उसकी दुकान है। रतलाम के बड़े लोगों के और सरकारी अफसरों के कपड़े उसी के यहाँ सिलते थे। इस बात का उसे बड़ा ठसका रहता था। सीधे मुँह बात नहीं करता था। मेरा दोस्त तो नहीं था लेकिन उससे अच्छा-भला मिलना-जुलना था। मैंने उसे कपड़ा दिया और कहा - ‘एक पेण्ट बनवानी है। थोड़ी जल्दी चाहिए।’ पता नहीं कैसे उसने मेरा लिहाज कर लिया। बोला - ‘सिल तो दूँगा लेकिन थोड़ा वक्त लगेगा। देख ही रहे हो कि सफारियों का ढेर लगा है।’ मैंने कहा - ‘खींच-तान कर थोड़ा वक्त निकाल ले और पेण्ट सिल दे भैया!’ शायद मेरी तकदीर अच्छी थी। बोला - ‘ला! कपड़ा दे।’ कपड़ा हाथ में लेते ही बोला - ‘मॉडेला सूटिंग? क्या बात है यार! उसने कपड़ा नापा। फिर मेरा नाप लिया और बोला - ‘अच्छा। तीन दिन बाद आ जाना।’ मैंने पूछा - ‘कितने रुपये लेकर आऊँ?’ उसने, दुकान की दीवार पर टँगी रेट लिस्ट की ओर इशारा किया और बोला - ‘लिखा तो है! साठ रुपये।’ मैंने कहा - ‘एडवांस दूँ?’ परशुराम हँस दिया। बोला - ‘तुझ से क्या एडवांस लेना। हाँ, जब आए तो भुगतान लेकर जरूर आना।’

“तीन दिनों बाद मैं पहुँचा। मुझे ताज्जुब हुआ यह देखकर कि मेरी पेण्ट तैयार थी। मैंने साठ रुपये दिए। अपनी पेण्ट ली। उसकी घड़ी खोलकर, हवा में लहराकर देखी। तबीयत खुश हो गई। परशुराम की सिलाई की बात ही न्यारी थी! परशुराम को धन्यवाद देकर मैं घर चला आया। 

“कोई तीन सप्ताह बाद मैं फिर परशुराम की दुकान पर पहुँचा - अपना शर्ट पीस लेकर। कहा - ‘फिर तकलीफ देने आया हूँ। शर्ट सिलवानी है।’ इस बार फिर उसने दरियादिली दिखाई। सहजता से कपड़ा लिया। उसे नापा। मेरा नाप लिया और बोला - ‘इस बार थोड़ा वक्त लगेगा। हफ्ते भर बाद आना।’ मैंने कहा - ‘ठीक है। लेकिन एक रिक्वेस्ट है। शर्ट में दोनों ओर जेब लगा देना।’ मेरी बात सुनकर उसने एक बार फिर कपड़ा नापा और दो जेबवाली बात रजिस्टर में लिखते हुए बोला - ‘लगा दूँगा।’ इस बार मैंने ‘कितने रुपये लेकर आऊँ?’ वाला सवाल नहीं पूछा। चला आया।

आठवें दिन उसकी दुकान पर पहुँचा तो देख कि मेरी शर्ट तैयार ही नहीं थी, दो जेब लगाने के अलावा, मेरी उम्मीद से आगे बढ़कर उसने सफारी शर्ट वाली कुछ डिजाइनिंग भी कर दी थी। मेरी बाँछें खिल गईं किन्तु मैं सामान्य ही बना रहा।

“चालीस रुपये चुका कर मैंने शर्ट लेने के लिए हाथ बढ़ाया। परशुराम ने मेरी ओर शर्ट बढ़ाई और अचानक ही चिहुँक गया। शर्ट थामे उसका हाथ जैसे हवा में ही टँगा रहा गया। कभी शर्ट को तो कभी मुझे देखते हुए बोला - ‘तू तो बड़ा उस्ताद निकला रे यादव! मैं सारी दुनिया को झक्कू टिका रहा हूँ और तेने तो मुझे ही झक्कू टिका दिया! तेने तो आधे दाम में सफारी सिलवा ली!’ मैंने सामान्य और सहज बने रहते हुए कहा - ‘ऐसी तो कोई बात नहीं भैया। पहले पेण्ट बनवाई थी। अब पैसे आ गए तो शर्ट भी बनवा ली।’ मेरे हाथ में शर्ट थमाते हुए परशुराम बोला - ‘ले! पहले तो अपनी शर्ट पकड़। बैठ।  ईमान से बता, सच्ची में तेने मुझे बेवकूफ नहीं बनाया?’ बात ईमान की थी और वह भी चालीस बरस पहले के जमाने में! मैं झूठ नहीं बोल सका। कहा - ‘हाँ। यह सब मैंने जानबूझकर, सोच-समझकर ही किया। सफारी के नाम पर पेण्ट शर्ट की सिलाई के दो सौ रुपये देना मुझे गवारा नहीं हुआ। इसीलिए यह सब किया।’ परशुराम जस का तस बना रहा। न तो गुस्सा हुआ और न ही नाराज। थोड़ी देर मुझे घूरता रहा। फिर हँस दिया। बोला - ‘ तू बहुत शाणा (सयाना) है। अकलमन्द भी और चालाक भी। आज तेने मुझे रंगे हाथों पकड़ लिया। अब एक बात ध्यान रखना। तेने मेरे साथ जो खेल खेला है, इसका जिक्र कभी, किसी से मत करना। तुझे तेरी रोजी की कसम। वरना मेरा बहुत नुकसान हो जाएगा। अब तुझसे क्या कहूँ! इस सफारी ने एक साल भर में मेरा मकान दो मंजिला कर दिया है। कसम खा कि यह बात तू किसी को नहीं बताएगा।’ मैंने कसम खाई। वह फिर हँस दिया। मैं चलने लगा तो हाथ पकड़कर मुझे बैठा लिया। बोला - ‘चल! तेरी इस बदमाशी का जश्न मना लें। चाय पीकर जा।’

“उसने अपने हाथ काम छोड़ दिया। चाय मँगवाई। हम दोनों ने चाय पी। मैं चुपचाप बना रहा और वह मेरी ओर देख-देख कर मुस्कुराता रहा। मैं उठा तो परशुराम एक बार फिर जोर से हँसा और बोला - ‘यार! यादव! ये बात याद रहेगी। आज तेरे से ठगा कर मजा आ गया।’

“मैं चुपचाप चला आया और मोड़ पर आया (जब उसकी दुकान दिखनी बन्द हो गई) तो मेरी हँसी छूट गई। मैं अकेला ही हँसता रहा। जोर-जोर से। अकेला ही। बड़ी देर तक हँसता रहा। अपनी ‘थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी अकल’ लगाकर मैंने पूरे सौ रुपये बचा लिए थे और परशुराम से शाणा, अकलमन्द और चतुर होने का सर्टिफिकेट भी ले आया था। बस, मुझे तीन सप्ताह तक प्रतीक्षा करने का धैर्य रखना पड़ा।”

यादवजी रुके तो मेरी हँसी छूट गई। मैंने, कोहनियों तक हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्कार किया और पूछा - ‘परशुराम ने रोजी की कसम दिलाई थी लेकिन आपने तो पूरा किस्सा सुना दिया! भला क्यों?’ संजीदा होकर यादवजी बोले - ‘अब परशुराम वह परशुराम नहीं रहा। उसके दोनों बेटे विदेश में बस गए हैं। उसके माँगे बिना उसे रुपये भेज देते हैं - इतने कि उससे खर्च नहीं होते। दुकान पर तो वह आज भी बैठता है लेकिन दुकानदारी करने के लिए नहीं, वक्त काटने के लिए। और रही मुझे कसम देने की बात तो अब तो खुद परशुराम ही यह किस्सा मजे ले-ले कर, आने-जानेवालों को, मिलनेवालों को सुनाता है और खुद ही हँसता है।’

यादवजी से मिलना, छोड़ की ‘झन्नाट’ कचोरी खाना और ‘मूल्यवान परिसम्पत्तियों जैसे दो यादगार संस्मरण सुनना - सब कुछ हो चुका था। अब मेरे लिए कुछ भी नहीं बचा था वहाँ। सो मैंने भी अपनी ‘थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी अकल’ लगाई और यादवजी को धन्यवाद दे, नमस्कार कर चला आया।

11 comments:

  1. बैरागी जी सुप्रभात संग प्रणाम। सूरज की किरणों संग खुबसूरत संस्मरण मिला आभार। **mera widyalay**

    http://zaruratakaltara.blogspot.in/2013/02/blog-post_26.html

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  2. कान उधर से पकड़ने का फायदा।

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  3. सच में बहुत रोचक, अलग अलग का योग साथ से कम, वाह..

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  4. दो और दो पाँच . . . खूब रही

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  5. मैं आशा कर रहा था यादव जी सर्वकालिक आइडिया देंगे, लेकिन.....अब यह थो ऽ ऽ ऽ ड़ी समय पर उगे तो लाभ!! :) :)

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (06-02-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  7. इसे कहते हैं सेर को सवा सेर, या दाल में नमक ...

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  8. इस प्रसंग को पढ़कर आनंद आ गया । सेर को सवा सेर मिल ही जाता है । कभी-कभी ‘थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी अकल' बड़ा फायदा दे देती है,और हंसी और आनंद मुफ्त मे मिल जाता है ।

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  9. "बात ईमान की थी और वह भी चालीस बरस पहले के जमाने में! मैं झूठ नहीं बोल सका। कहा - ‘हाँ। यह सब मैंने जानबूझकर, सोच-समझकर ही किया।"

    ha-ha-ha-ha-ha......................पढ़कर वाकई मज़ा आया सर जी, बस थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी अकल’ लगाई और थोड़ा सा समय :)

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  10. rochak tarike se likhi gai rachna ko padhna man bhaya

    shubhkamnayen

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