औरत की दोस्त होती है औरत

मेरी धारणा है कि बुराई के मुकाबले अच्छाई ही ज्यादा है किन्तु जिक्र सदैव बुराईवाले अपवादों का ही होता है। तब हमें लगता है, हमारे चारों ओर बुराई ही बुराई है। लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं।

औरतों की बदहाली की बात जब भी होती है तब ‘औरत ही औरत की दुश्मन होती है।’ वाला जुमला कम से कम एक बार तो सुनने को मिल ही जाता है। लेकिन मुझे सदैव लगता रहा है कि ऐसा केवल अपवादस्वरूप हर होता है। मेरी धारणा है कि ‘औरत ही औरत की मित्र होती है।’ मेरी धारणा को बलवती करता एक उदाहरण मुझे कल ही मिला। 

बड़े बेटे वल्कल का, पूना से, वाट्स एप पर भेजा (यहाँ प्रस्तुत) यह सन्देश मुझे बिलकुल ही समझ नहीं पड़ा। पूछने पर उसने जो कुछ बताया वह मुमकिन है, वह सबके लिए नया न हो, मेरे लिए तो नया और कुछ सीमा तक अनूठा  ही रहा। इसने ‘औरत की दोस्त होती है औरत’ की मेरी धारणा भी मजबूत की। 

वल्कल ने बताया कि परस्पर परिचित कुछ महिलाओं ने ’पुला’ (पुणे लेडीज) नाम से, वाट्स एप पर ग्रुप बना रखा है। इस ग्रुप में महिलाओं के ऐसे ही अन्य ग्रुपों से तनिक हटकर भी कुछ होता है। ये महिलाएँ अपनी गृहस्थी से अलग हटकर चलाए जा रहे अपने उपक्रम की जानकारी देती हैं। यह उपक्रम यदि किसी के लिए उपयोगी/सहयोगी होता है तो वे इसे काम में लेकर प्रति शुक्रवार अपनी-अपनी समीक्षा प्रस्तुत करती हैं। उदाहरणार्थ, हमारी बहू प्रशा बच्चों के काम आनेवाला कुछ सामान बेचती है। उसने अपने इस काम की जानकारी ‘पुला’ पर दी। ग्रुप की एक महिला को, अपने परिचित परिवार के दो वर्षीय एक बच्चे के लिए भेंट देने के लिए प्रशा का बनाया ‘भीम कम्बल’ उपयुक्त लगा। उस महिला ने फोन पर अपना आर्डर दिया। सम्भवतः भेंट दिया जानेवाला प्रसंग तनिक जल्दी रहा होगा। उस महिला ने अपनी ‘तत्काल आवश्यकता’ जताई। प्रशा ने उस महिला की आवश्यकतानुसार समय पर कम्बल पहुँचा दिया। अगली ‘शुक्रवार समीक्षा’ में प्रशा को यह प्रशंसा टिप्पणी प्राप्त हुई।

वल्कल के मुताबिक ऐसे ग्रुप कॉलोनी, मुहल्ला स्तर पर बने हुए हैं। मुमकिन है, अपने-अपने वर्गीय-स्तर के मुताबिक महिलाओं ने नगर स्तर पर भी ऐसे  ग्रुप बना रखे हों। महिलाएँ परस्पर खरीददारी कर एक-दूसरे के उपक्रम को सहयोग कर, आर्थिक सम्पन्नता में भी भागीदारी करती हैं। सामान की यह खरीदी-बिक्री, ग्रुप के प्रभाव क्षेत्र के अनुसार कॉलोनी, मुहल्ला और नगर स्तर पर होती है। किन्तु मेरे हिसाब से यह बात आर्थिक सम्पन्नता से कहीं आगे बढ़कर महिलाओं में आत्म विश्वास, खुद की क्षमता पर भरोसे की भावना जगाती-बढ़ाती होगी और फुरसत के समय को ‘उत्पादक समय’ में बदलने को प्रेरित करती होगी। 

वल्कल ने बताया कि ऐसे ग्रुपों पर महिलाएँ अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशने की कोशिशें भी करती हैं। उदाहरणार्थ, कोई महिला अपने बच्चे के स्कूल से सन्तुष्ट नहीं है तो वह अपनी बात यहाँ कहती है। मालूम होता है कि वह अकेली उस समस्या से नहीं जूझ रही। तब ऐसी ‘समान पीड़ित’ महिलाएँ एकजुट होकर स्कूल प्रबन्धन से, अपने ग्रुप की जानकारी देकर बात करती हैं। स्कूल प्रबन्धन को महिलाओं की यह सामूहिकता भयभीत करती है। उन्हें लगता है कि ग्रुप की महिलाओं के जरिए, पूरे शहर में उनकी बदनामी न हो जाए। लिहाजा वे बात अनसुनी नहीं कर पाते। कोई महिला अपने बच्चों का स्कूल बदलना चाहती है तो उसे अन्य स्कूलों के बारे में फौरन ही जानकारी मिल जाती है। 

मैंने अब तक सोशल मीडिया की बुराइयों और उससे उपजे कष्टों के बारे में खूब सुना था। कुछ मामलों में भुक्त-भोगी भी हूँ। किन्तु ऐसे सार्थक सदुपयोग के बारे में पहली ही बार जाना। इसीलिए, यह सब यहाँ बताने से खुद को रोक नहीं पाया। 

यह सब पढ़कर आपको प्रशा के बेचे जानेवाले सामान के बारे में कोई उत्सुकता हो तो उससे मोबाइल नम्बर पर 90096 47745 सम्पर्क कर विस्तार से जाना जा सकता है। मैं भी उससे पूछूँगा। नहीं जानता कि वह क्या-क्या सामान बेचती है। 
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2 comments:

  1. WA aur FB dOno ke fayde nuksan dOno hai,yah user par nirbhar hai,wo ise kaise use karta hai. Pune ki in mahilaon ko badhaee.

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  2. होता ये है कि आदमी का कोई दुर्गुण सामने आने पर कहा जाता है वह आदमी ऐसा है ,जब कि औरत का दुर्गुण सामने आने पर ठप्पा लगा दिया जाता है सारे स्त्रीत्व पर कि औरतें ऐसी होती हैं.

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