दलाल केवल दलाल नहीं होता

दलाल कथा-01

हर बार की तरह यह वाकया भी, यादवजी ने माणक चौकवाली अपनी दुकान पर ही सुनाया।

हुआ यूँ कि हिन्दी के प्रति मेरे आग्रह के मजे लेने के लिए यादवजी ने अचानक पूछ लिया - “आप खुद को ‘अभिकर्ता’ कहते हो। हिन्दी में अभिकर्ता को क्या कहते हैं?” मैंने हँस कर कहा - “अभिकर्ता को हिन्दी में अभिकर्ता ही कहते हैं क्यों कि अभिकर्ता हिन्दी शब्द ही है।” यादवजी तनिक झुंझला कर बोले - ‘वो तो मुझे भी मालूम है। लेकिन वो तो आपकी हिन्दी में है। हम आम लोगों की हिन्दी में बताइए।’ मैंने कहा - ‘दलाल कहते हैं।’ यादवजी चिहुँक कर बोले - “अरे! मैं भी कमाल करता हूँ। आप तो एलआईसी के एजेण्ट हैं और एजेण्ट को दलाल ही कहते हैं, यह तो मैं खूब अच्छी तरह जानता हूँ। आपके इस ‘अभिकर्ता’ ने मुझे चक्कर में डाल दिया।” पल भर के लिए खुद पर हँस कर बोले - ‘दलाल होना आसान नहीं। दलाल केवल दलाल नहीं होता। दलाल से पहले वह एक ईमानदार आदमी और ईमानदार पेशेवर होता है।’ मैंने कहा - ‘आपने सूत्र तो बता दिया। इसे सोदाहरण, व्याख्या सहित समझाइए।’ यादवजी उत्साह से बोले - ‘यह आपने खूब कही। आपको दलालों के कुछ सच्चे किस्से सुनाता हूँ जिन्हें सुनकर आप दलाल होने का मतलब और महत्व आसानी से समझ सकेंगे।’ कह कर उन्होंने एक के बाद एक, तीन किस्से सुनाए।

लेकिन किस्से सुनने से पहले, रतलाम के सन्दर्भ में दलाल को लेकर तनिक लम्बी भूमिका।

रतलाम केवल सोना और सेव के लिए ही नहीं जाना जाता। यह ब्याज के धन्धे के लिए भी जाना जाता है। ब्याज यहाँ के मुख्य धन्धों में से एक है। कम से कम तीन ऐसे परिवारों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जो केवल ब्याज की आय पर निर्भर हैं। वास्तविकता तो भगवान ही जाने लेकिन कहा-सुना जाता है यहाँ गुवाहाटी और चैन्नई तक का पैसा ब्याज पर लगा हुआ है। लेकिन मुख्यतः, रतलाम की ही पूँजी ब्याज के लिए लेन-देन में काम आती है। यह ब्याज का धन्धा पूरी तरह से दलालों के सहारे ही चलता है। 

जैसा कि कहा है, लगभग सारी पूँजी रतलाम की ही है तो उसका लेन-देन भी रतलाम के लोगों में ही होता है। जब रतलाम के लोगों में ही लेन-देन होना है तो फिर दलाल की जरूरत भला क्योंकर होती है? जवाब है - ‘ब्याज पर दी गई पूँजी की सुरक्षित वापसी के लिए।’ ‘उधारी मुहब्बत की कैंची है।’ इस वाक्य के ‘चिपकू’ (स्टीकर) किसी जमाने में पान की दुकानों पर प्रमुखता से नजर आते थे। वही बात यहाँ भी लागू होती है। किसी अपनेवाले को उधार दी गई पूँजी वापस माँगना तनिक कठिन हो जाता है। सम्बन्ध बिगड़ने की आशंका बनी रहती है। इसीलिए दलाल काम में आता है। दलाल को ‘तिनके की ओट’ कह सकते हैं। देनेवाले को खूब पता होता है कि उसका पैसा किसके पास जा रहा है। यही दशा लेनेवाले की भी होती है। किन्तु बीच में दलाल होने से लिहाज बना रहता है। कभी-कभी स्थिति ऐसी रोचक और अविश्वसनीय भी हो जाती है कि पति से छुपाकर की गई पत्नी की  बचत की रकम, उसके पति को ही ब्याज पर चढ़ जाती है। 

अब, यादवजी के निर्देशानुसार, तमाम किस्सों के तमाम पात्रों की पहचान छुपाते हुए पहला किस्सा। 

फकीरचन्दजी रतलाम के अत्यन्त प्रतिष्ठित, विश्वसनीय, अग्रणी दलाल थे। साख इतनी कि व्यापारी एक बार खुद पर अविश्वास करले लेकिन फकीरचन्दजी पर नहीं। फकीरचन्दजी का बीच में होना याने समय पर ब्याज मिलने की और निर्धारित समयावधि पर पूँजी की वापसी की ग्यारण्टी। 

इन्हीं फकीरचन्दजी को बुलाकर सेठ मधुसूदनजी ने कुछ रकम दी। एक अपनेवाले को ब्याज पर देने के लिए। फकीरचन्दजी ने कहा कि मधुसूदनजी का वह अपनेवाला तो सप्ताह भर के लिए बाहर गया हुआ है। तब तक रकम पर ब्याज नहीं मिलेगा। मधुसूदनजी ने कहा - ‘रकम आपके पास ही रहने दो। वह आए तब दे देना। ब्याज की चिन्ता नहीं।’ 

आठवें दिन शाम को फकीरचन्दजी, सेठ मधुसूदनजी की पेढ़ी पर पहुँचे। थैली में से रकम निकाली  और सेठ मधूसदनजी ओर बढ़ा दी। मधुसूदनजी ने रकम नहीं ली। पूछा - ‘क्यों? वो नहीं आया?’ फकीरचन्दजी बोले - ‘आ गए। आज सुबह ही आ गए। उन्हीं की दुकान से आ रहा हूँ।’ सेठ मधुसूदनजी ने हैरत से पूछा - ‘वहीं से आ रहे हो और रकम मुझे दे रहे हो? यह रकम तो उसे ही देनी थी!’ फकीरचन्दजी गम्भीरता से बोले - ‘हाँ। आपको वापस सौंप रहा हूँ। नहीं दी। मैं तो दूँगा भी नहीं। आपको, उन्हीं को दिलवाना हो तो किसी दूसरे दलाल से दिला दो।’

सेठ मधुसूदनजी को झटका सा लगा। जिसे रकम दिलवा रहे थे, वो अपनेवाला जरूरतमन्द था।  हैरत से बोले - ‘क्यों? ऐसी क्या बात हो गई?’ गम्भीरता यथावत् बनाए रखते हुए फकीरचन्दजी बोले - ‘ऐसी बात हो गई तभी तो रकम नहीं दी। आपको लौटाने आया हूँ!’ 

फकीरचन्दजी ने बताया कि वे रकम लेकर सामनेवाले की दुकान पर पहुँचे। वे दुकान के सामने, सड़क पर ही खड़े थे और दुकान में जा ही रहे थे कि वो दुकानदार, रकम लेने के लिए दुकान से उतर कर सड़क पर, फकीरचन्दजी के पास आ गया। अनुभवी फकीरचन्दजी ने पल भर में उस सामनेवाले को तौल लिया और बहाना बना कर, बिना रकम दिए सेठ मधुसूदनजी के पास आ गए। 

फकीरचन्दजी ने कहा -‘सेठजी! दलाली मेरा धन्धा है। मुझे तो आपसे और उनसे दलाली मिल ही रही थी। लेकिन मुझे गैरवाजिब व्यवहार की दलाली नहीं चाहिए। जो व्यापारी ब्याज की, उधार की पूँजी लेने के लिए गादी से उतर कर दलाल के पास सड़क पर आ जाए, वह व्यापारी पानीदार नहीं। ऐसे व्यापारी से मैं तो लेन-देन नहीं करता। मेरी दलाली की पूँजी डूबे, ऐसी दलाली मुझे नहीं करनी। मुझे आपकी पूँजी की नहीं, दलाली के मेरे धन्धे की इज्जत की फिकर है। मैं दिवालियों का नहीं, साहूकारों का दलाल हूँ।’

कह कर फकीरचन्दजी ने रकम सेठ मधुसूदनजी को थमाई, आत्म-सन्तोष की लम्बी साँस ली और नम्रतापूर्वक नमस्कार कर विदा ली।

यादवजी बोले - ‘यह किस्सा सेठ मधुसूदनजी ने मेरे पिताजी को सुनाया था और पिताजी ने मुझे।’ मैंने पूछा - ‘सेठजी ने आपके पिताजी को केवल किस्सा ही सुनाया था? फकीरचन्दजी के बारे में कुछ नहीं कहा?’ यादवजी बोले - “ठीक यही सवाल मैंने पिताजी से पूछा था। उन्होंने कहा - ‘मधुसूदनजी ने कहा था - ऐसे दलाल केवल दलाल नहीं होते। वे तो सेठों के भी सेठ होते हैं।”

किस्सा सुनाकर यादवजी भेदती नजरों से मुझे देखने लगे। कुछ इस तरह कि मुझे घबराहट होने लगी। मेरी बेचारगी देख ठठाकर हँसे और बोले - ‘घबराइए नहीं। किस्से को खुद पर मत लीजिए। आप बीमा कम्पनी के दलाल हैं, ब्याज का व्यवहार करनेवाले, व्यापारियों के दलाल नहीं।’ मेरी साँस में साँस आई। मेरी हालत यह हो गई कि मैं पानी माँग गया। 

यादवजी ने मेरे लिए पहले पानी मँगवाया और हम दोनों के लिए चाय। चाय खत्म कर, ताजा दम हो, उन्होंने दूसरा किस्सा शुरु किया।

वह दूसरा किस्सा अगली बार। 
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3 comments:

  1. धन्यवाद नीरु बाबा।

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  2. दादा बहुत अच्छा लिखा है लेकिन दाद देना होगी दलाल के चरित्र की जिसने पैसे की बजाय साख को तावोज्जो दी।सुंदर

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