दण्डित हो रही भारत माता


दो दिन पहले, ‘नईदुनिया’ (इन्दौर) में छपा समाचार हमारी सरकारों के ‘कृषक हितकारी’ दावों की की और इस मामले में उनकी कथनी और करनी के अन्तर को उजागर करता है।


समाचार के अनुसार इन दिनों मालवा और निमाड़ अंचल के गाँवों में प्रतिदिन पन्द्रह घण्टों तक की बिजली कटौती हो रही है। इस कारण खेतों में ठीक से सिंचाई नहीं हो पा रही है और गेहूँ, चना सरसों, अफीम, अलसी, लहसुन सहित, शैशावस्था में आई हुई अनेक फसलें खतरे में आ गई हैं। बिजली की प्रतीक्षा में किसान ठण्डी रातों में ठिठुरते हुए बैठे रहते हैं। दूसरी ओर परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे विद्यार्थी भी परेशान हैं।


लेकिन महत्वपूर्ण बात यह नहीं है। महत्वपूर्ण बात है - बिजली कटौती के मामले में गाँवों के साथ किया जा रहा अन्याय। गाँवों में पन्द्रह घण्टों तक की कटौती की जा रही है (ट्रांसफार्मरों के खराब होने के कारण तीस गाँवों में चौबीस घण्टे बिजली नहीं आ रही है) जबकि जिला मुख्यालयों पर केवल चार घण्टों की बिजली कटौती की जा रही है। तहसील मुख्यालयों पर दस घण्टे कटौती की जा रही है। समाचार में तो नहीं कहा गया है किन्तु राजधानी भोपाल में कटौती बिलकुल ही नहीं हो रही है। जिन प्रदेशों में बिजली कटौती हो रही है, कमोबेश प्रत्येक राज्य में ऐसे ही पैमाने वापरे जा रहे हैं। शहरी और ग्रामीण आबादी में भेदभाव किया जा रहा है।


यही वह बिन्दु है जहाँ सरकारों और पार्टियों की दोहरी मानसिकता सामने आती है। गाँवों में बिजली उसी भाव से दी जा रही है जिस भाव से शहरों में दी जा रही है। बिजली प्रदाय के कानून एक समान हैं। फिर वह क्या कारण है कि गाँवों को दण्डित किया जा रहा है और शहरों को उपकृत?


गाँधी ने ग्राम स्वराज में भारत की आजादी देखी थी और दीनदयाल उपाध्याय ने ‘अन्त्योदय’ की अवधारणा दी थी। ये दोनों व्यक्ति क्रमशः कांग्रेस और भाजपा के पितृ पुरुष हैं जिनकी दुहाइयाँ देने और कसमें खाने में ये पार्टियाँ कोई मौका नहीं छोड़तीं।
गाँवों से शहरों की ओर, तेजी से हो रहे, आबादी के पलायन के बाद भी, आज भी भारत की 65 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में ही रह रही है। जहाँ सर्वानुमति न हो वहाँ बहुमत को आधार बनाया जाता है। यही लोकतन्त्र का सामान्य नियम है। किन्तु सुविधा से वंचित करने के मामले में इस लोकतान्त्रिक अवधारणा की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। गाँववालों का दोष शायद यही है कि वे बिखरे हुए, असंगठित हैं, इसीलिए वे परस्पर सम्वाद-सम्पर्क न कर पाते हैं। इसी कारण उनका असन्तोष सड़कों पर नहीं आ पाता। वे सरकारी सम्पत्ति को नुकसान नहीं पहुँचा पाते। नेताओं-अधिकारियों को उनकी औकात नहीं बता पाते। शहर के लोग बिना सम्वाद किए भी सड़कों पर आकर एकजुट हो जाते हैं और शासन-प्रशासन को अपने होने का अहसास करा देते हैं।


होना तो यह चाहिए कि पूरे प्रदेश में एक समान बिजली कटौती हो। किन्तु ऐसा नहीं हो रहा है।


‘भारत माता ग्राम वासिनी’ का मन्त्रोच्चार करनेवाले देश में भारत माता को दण्डित किए जाने की यह लज्जाजनक मिसाल है।
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2 comments:

  1. यह भेदभाव तो पूरे देश में हो रहा है।

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  2. जिसकी लाठी उसकी भैंस.

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