आज चिकने घड़ों की बातें कर ली जाये !

 
श्रीमुकेश नेमा का यह व्यंग्य मुझे आज सुबह वाट्स एप पर मिला। मुझे बहुत अच्छा लगा। लगा कि इसे अधिकाधिक लोगों तक पहुँचना चाहिए। मुकेश भाई से पूछा - “इसे मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित करने की अनुमति देंगे?” अविलम्ब उत्तर मिला - “इसमें पूछना क्या है? आपका यह ‘सर्वाधिकार’ हमेशा सुरक्षित है।” मुकेश भाई वर्तमान में, मध्य प्रदेश शासन के आबकारी विभाग में उपायुक्त के पद पर ग्वालियर में पदस्थ हैं। चित्र में, अपनी ‘सदैव स्मिता’ उत्तमार्द्ध श्रीमती राजेश्वरी नेमा के साथ मुकेश भाई।


अब, घड़े तो आप और हम सब हैं ही। लेकिन घड़े होने का आनन्द ही तब है जब वो चिकना हो।

चिकने होने के सैकडों लाभ हैं। आप हर किसी की पकड़ से बाहर होते हैं, चिकना होना आपको फिसल जाने में मदद करता है, कोई आपका इस्तेमाल नहीं कर सकता पर आप जिस किसी की भी जेब से मनचाहा निकाल सकते हैं, आप इत्मीनान से बिना कुछ किये, तर माल सूँतते रह सकते हैं, बिना किसी के काम आये सबका इस्तेमाल कर सकते हैं और बिना हाथ पाँव हिलाये, मौज भरी चिकनाई के मज़े लेना आपके लिये खेल सा हो जाता है। आप और ज्यादा चिकने होते चले जाते हैं।

महाकवि भवानीप्रसाद मिश्र भले ही कह गये हों कि दुख आदमी को माँजता है लेकिन यह उक्ति चिकने घड़ों पर लागू नहीं होती। यहाँ सुख आपको माँजता है तथा और अधिक चिकने होने में आपकी मदद करता है। आपके व्यक्तित्व को एक ऐसी गरिमामय आभा प्रदान करता है कि लोगों को आपके बारे में काम का आदमी होने की गलतफहमी होने लगती है।

किन्तु इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि चिकना घड़ा होना आसान है। ऐसा सोचना, गलती करना है। इस चिकनत्व को प्राप्त हो जाना बड़े-बड़े हठयोगियों के लिये भी अत्यन्त कठिन है। यह इतना ही आसान होता तो फिर हो चुके चिकने घड़ों को सेवादारों के टोटे पड़ सकते थे। इस श्रेणी में शामिल हो जाने के लिये भारी कोशिशों की दरकार होती है। 

चिकना घड़ा होने के लिये आपको अथक कोशिशेे करनी पड़ेंगी। सबसे पहले आप को इज्जत, मान-अपमान टाईप की फिज़ूल चीज की चिन्ता से अपने आपको दूर रखना होगा। किसी की मदद करना सख्त मना है। किसी की वाजिब बात मान लेना और भी बुरा हो सकता है। आपके दोनों कानों के बीच हाई-वे होना ही चाहिये ताकि ईमानदारी, सच्चाई, मेहनत, भलमनसाहत जैसै शब्द एक कान में पड़ते ही सरपट दूसरे कान से बाहर हो सकें। यह तय करके चलना होता है कि आसपास जो भी बिखरा पड़ा है वो हमारे बाप का माल है। आपकी हरकतें ऐसी होनी चाहिये कि लोग आपके बारे में यह तय करने में मजबूर हो जाये कि यार इससे कोई उम्मीद करना बेकार है। इसका कुछ नहीं किया जा सकता। आपकी बातचीत में कुछ ऐसा शनित्व होना होना चाहिये कि सुनने वाला फौरन इस नतीजे पर पहुँच जाये कि ये दुष्ट अपनी बात मनवाये बिना मानेगा नही और कुछ ले देकर इसकी बात मानकर इससे पिण्ड छुड़ा लेने में ही भलाई है।

वैसे कुछ भाग्यशाली घड़े जन्मजात भी चिकने होते हैं। ऐसा तब ही होता है जब आप सोने-चाँदी के घड़ों के खानदान से हों। मिट्टी मिली पैदाईश वाले घड़ों के लिये चिकना होना थोड़ा कठिन ही होता है। 

यदि आप जन्म से ही इस चिकनत्व को प्राप्त कर चुके हैं तो हृदय से मेरा अभिवादन स्वीकार करें। यदि नहीं हैं तो मन पक्का करके, थोड़ी कोशिशें करके, चिकनों के इस दिन दूने रात चौगुने फैलते पन्थ में अपनी जगह बना सकते हैं।

धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं


गुड्डू (अक्षय छाजेड़) ने कही खेत की। मैंने सुनी खलिहान की। पहले गुड्डू ने और फिर मैंने, अपना-अपना माथा ठोका और हँसे। हमने हँसना नहीं चाहिए था। बात हँसने की नहीं, दुःखी होने की थी। लेकिन हम दोनों ही हँसे।

यह कल, रविवार अपराह्न लगभग साढ़े तीन बजे की बात है। राखी का दिन था। उत्तमार्द्धजी मायके गई हुई थीं। मैं घर में अकेला था। दूरदर्शन पर आ रही फिल्म ‘मैं कलाम हूँ’ देख रहा था। पड़ौस से गुड्डू आया और तनिक गम्भीर मुद्रा में बोला - “धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं।” मैं चौंका। मुझे झटका लगा। धारवाजी को यह क्या सूझी?

धारवाजी मेरे पड़ौस में, बगलवाली गली में रहते हैं। सेवा निवृत्त शिक्षक हैं। अवस्था 75-80 बरस के आसपास है। थोड़ा कम सुनते हैं। वे मेरी सुबह का हिस्सा हैं। रोज सुबह उन्हें, स्नान कर, पण्डित शैलीवाली एकलंगी धोती पहने, उघड़े बदन पीपल को जल चढ़ाने जाते और लौटते हुए देखने से मेरा दिन शुरु होता है। सीधे आदमी हैं। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। अपने रास्ते जाते हैं, अपने रास्ते आते हैं। न तो विवाद पैदा करते हैं और न ही किसी विवाद का हिस्सा बनते हैं। गए कुछ दिनों से वे नजर नहीं आ रहे। पूछताछ में मालूम हुआ कि उनकी तबीयत नरम-गरम चल रही है।

हमारे नगर निगम का  चाल-चलन भी देश के बाकी नगर निगमों जैसा ही है - अपने आप में मगन और नागरिक समस्याओं से बेपरवाह। लेकिन हमारी कॉलोनी की सड़कों की दशा यदि बेहतर नहीं तो ‘ठीक-ठीक’ तो है ही। ऐसी तो बिलकुल ही नहीं कि लोग परेशान हों और चिल्लाने लगें। फिर, धारवाजी तो नेतागिरी करते नहीं! उनका एक भतीजा भाजपा का एक ‘ठीक-ठीक असरवाला’ स्थानीय नेता है। यदि धारवाजी को कुछ ऐसा लगा तो भला इस उम्र में खुदा को गेंती-फावड़ा हाथ में लेने की क्या जरूरत आ पड़ी? अपने भतीजे का उपयोग कर लेते!

एक पल में ये सारी बातें मेरे दिल-दिमाग में घूम गईं। मैंने तनिक घबरा कर गुड्डू से कहा - ‘उन्हें रोको भाई! यह सब करने की उनकी उम्र नहीं है। और फिर वे बीमार भी चल रहे हैं। कहीं, कुछ हो गया तो खुद भी परेशान होंगे और परिवारवाले भी परेशान होंगे।’

मेरी बात सुनकर गुड्डू ने हैरत से मेरी ओर देखा। पूछा - ‘किस बात से रोकूँ?’ 

अब मैंने गुड्डू को हैरत से देखा और प्रति-प्रश्न किया - ‘किस बात से? अरे भाई! सड़क सुधारने से! अभी  तुमने कहा न कि धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं!’ 

‘मैंने कब कहा कि धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं?’ मेरे चेहरे पर समझदारी और सावधानी तलाशते हुए गुड्डू ने सवाल के जवाब में सवाल किया।

‘तो फिर क्या कहा तुमने?’

जैसा कि मैंने शुरु में ही कहा, गुड्डू ने माथा ठोक लिया। बोला - ‘मैंने क्या कहा और आपने क्या सुना! मैंने कहा कि धारवाजी स्वर्ग सिधार गए हैं।’

और जैसा कि मैंने शुरु में कहा, इस बार मैंने माथा ठोक लिया। पहले हँसी आई फिर झेंप। इससे पहले, मेरी दशा देख कर गुड्डू भी हँस चुका था।

गुड्डू तो संजीदा ही आया था। गड़बड़ मैंने ही कर दी थी। अपनी झेंप से उबर कर अगले ही पल मैं भी संजीदा हो गया। गुड्डू ने बताया - पाँच बजे अन्तिम यात्रा निकलेगी।

मुझे इस अन्तिम यात्रा में शरीक होना ही था। ‘राम नाम सत्य है’ के मद्धम स्वरों के बीच, अर्थी के पीछे-पीछे चलते हुए मुझे एक बार फिर ‘धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं’ याद आ गया। मुझे फिर हँसी आ गई। इस बार झेंप नहीं आई। समानान्तर विचार मन में आया - धारवाजी ने अपनी सड़क सुधार ली। वे मुझे आगाह कर रहे हैं। कह रहे हैं कि मैं अपनी सड़क सुधार लूँ।

बहुत मुश्किल है कार से उतरना



अब सब कुछ सहज था और गुल्लू भैया बेलौस। अपनी रवानी को बरकरार रखते हुए उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई -

“आजादी के फारन बाद का वह वक्त कुछ अलग ही किस्म का था। गाँधी-नेहरू ने हमें ‘सिविलियन’ बना दिया था लेकिन हम रियाया ही बने हुए थे। अंग्रेज जा चुके थे लेकिन उनके होने का अहसास मानो फिजाँ में घुला हुआ था। एक दौर जा रहा था और दूसरा आ रहा था। बदलाव की अजीब कसमसाहट पूरे माहौल में घुली हुई थी। समाजवाद अजूबा था लेकिन हर कोई उसका जिक्र करने को उतावला लगता था। इस सबके बीच जमींदारों/जागीरदारों की धमक और रईसों की ठसक वैसी की वैसी बनी हुई थी। कार तो बहुत बड़ी बात थी, ताँगा रखना भी रईसी की निशानी थी। निजी कारें और ताँगे अंगुलियों पर गिने जा सकते थे। 

“उन दिनों 12,000 रुपयों में नई फिएट कार आती थी। पौने दो रुपयों में एक गैलन, याने करीब पाँच लीटर पेट्रोल मिलता था। ढाई-तीन सौ रुपयों में कार मेण्टेन का जा सकती थी।

“लेकिन हमारे घर में कार नहीं थी। ताँगा था। मुझे अच्छी तरह अहसास था कि हम कार रख सकते हैं लेकिन वालिद ने इस बारे में कभी सोचा भी हो - ऐसा कभी नहीं लगा। इसके बरखिलाफ मेरी हसरत थी कि हमारी अपनी कार हो।

“अपनी इस हसरत को मैं ज्यादा दबा नहीं पाया। एक दिन मैंने अपने वालिद से कह ही दिया - ‘पप्पा! अपन कार क्यों नहीं खरीद लेते? ताँगे की वजह से बदबू भी आती है और चारे-चन्दी का कचरा भी होता है। सईस के नखरे उठाने पड़ते हैं। रख-रखाव में भी मुश्किल आती है। हिसाब-किताब करेंगे तो सब मिलाकर कार, ताँगे के मुकाबले अपने को सस्ती ही पड़ेगी।’

“मेरी बात सुनकर वालिद हँस दिए। बोले - ‘बात तो तू सही कह रहा है गुल्लू। ताँगे और कार का तेरा हिसाब भी ठीक है। अपन कार खरीद भी सकते हैं। आज ही खरीद सकते हैं। लेकिन एक ही बात मुझे रोकती है बेटा!’

“वालिद की बात ने मेरे कान खड़े कर दिए। वे कार खरीदने से इंकार नहीं कर रहे थे। मेरी बात की ताईद भी कर रहे थे। मुझे लगा, किसी बहुत ही मामूली बात को लेकर वालिद ने कार खरीदने का फैसला रोक रखा है। मैंने पूछा - ‘कौन सी बात पप्पा?’

“मेरी बात के जवाब में मेरे वालिद ने जो कहा, उसने मेरी आँखें खोल दीं, जिन्दगी जीने का सलीका और जिन्दगी के मायने समझा दिए। बहुत ही लाड़ से बोले - ‘बेटा! मेरी बात समझने की कोशिश करना। कार में चढ़ना, बैठना तो बहुत आसान है लेकिन उसमें से उतरना बहुत ही मुश्किल है।’

“कह कर वालिद अपने काम में लग गए। मेरी ओर देखा भी नहीं। उन्हें लगा होगा कि उनकी बात से मैं दुःखी, पेरशान हुआ हूँगा। लेकिन वे मुझे देखते तो यकीनन बेहद खुश होते। मेरी शकल मानो मेरी नहीं रह गई थी। कोई दूसरा ही चेहरा मेरे चेहरे पर चस्पा हो गया था जिसे मैं खुद देखता तो खुद को ही नहीं पहचान पाता। उस दिन उनका बेटा गुल्लू,  गुलाम हुसैन एक बार फिर पैदा हुआ। यह गुलाम हुसैन, पहलेवाले गुलाम हुसैन से एकदम जुदा, दूसरे ही मिजाज का, दूसरी ही रंगत का गुलाम हुसैन था। आज जो मैं आपके सामने हूँ, आपसे बात कर रहा हूँ, जिसकी बातों को आप डूब कर सुन रहे हैं, वह वही दूसरा गुलाम हुसैन हूँ।”

गुल्लू भैया एकदम चुप हो गए। कुछ इस तरह मानो, पुराने जमाने के किसी सिनेमा घर में, प्रोजेक्टर पर चल रही फिल्म एक झटके से टूट गई हो। कुछ पल सन्नाटा, अँधेरा। सिर्फ प्रोजेक्टर के चलने की घर्राहट। ऐसा झटका, जिसके लिए मैं कतई तैयार नहीं था। मैं वाकई में अकबका गया था।

वे तो अपने में ही थे। मुझे अपने में लौटने में कुछ क्षण लगे। गुल्लू भैया अपनी सहज हँसी हँस रहे थे। मेरे हाथ थपथपा कर बोले - “मैंने अपना काम कर दिया। आपका कर्ज चुका दिया। ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ दे दीजिए।”

मैंने कहा - ‘वो तो अब देना ही रहा लेकिन एक बात बताईए। आपने कार खरीदी या नहीं?’ गुल्लू भैया बोले - ‘हाँ, हाँ। खरीदी क्यों नहीं? खरीदी।’ मैंने पूछा - ‘कब खरीदी और कौन सी खरीदी? और खरीद रखी है तो आप तो मुझे कभी कार में नजर नहीं आए? हमेशा पैदल ही नजर आते हैं?’ गुल्लू भैया ने जवाब दिया - ‘यह तो याद नहीं कि कब खरीदी। रियाज बता देगा। एक सेकण्ड हेण्ड मारुति-800 खरीद रखी है। मुझे तो जरूरत पड़ती नहीं। आना-जाना ही कितना है? घर से दुकान और दुकान से घर। आप यूँ मान लें कि उतरने की जोखिम से बचने के लिए मैं कार में बैठने की जोखिम नहीं लेता। बच्चों को कभी-कभार जरूरत पड़ जाती है तो वापर लेते हैं।’

गुल्लू भैया मुझे अभी भी ‘अजूबा’ लग रहे थे। मैंने हिम्मत करके पूछा - ‘जमाना बदल गया है गुल्लू भैया। कहाँ से कहाँ पहुँच गया है। आपके वालिद की बातें आपके वालिद के साथ चली गईं। जरा ठाठ-बाट से रहिए।  लोग आपको कंजूस-मक्खीचूस समझते होंगे।’

जवाब में पहले तो गुल्लू भैया ख्ुालकर, ठठाकर हँसे। फिर तनिक रुककर, संजीदा होकर बोले - ‘मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आप भी इस फिक्र को ताक पर रख दें कि लोग क्या कहेंगे। लोगों को जो समझना हो, समझें। जो कहना हो, कहें। आप क्या समझते हैं कि मैं नहीं जानता कि जमाना बदल गया है? हाँ बैरागीजी! जमाना बदल गया है। बहुत बदल गया है। पूरी तरह बदल गया है। एक शेर आज के बदले जमाने की हकीकत बयाँ करता है -

ऐ जौक-ए-इनकिसार कोई और मशगला।
कहने लगे हैं लोग शराफत को बुजदिली।’

इसके बाद क्या कहना रहा? क्या सुनना रहा?

इजाजत लेकर गुल्लू भैया के दफ्तर से लौटा तो मुझसे तनकर नहीं चला जा रहा था। मैं झुक कर चल रहा था। 




सूट को धक्के : लंगोटी की शाही अगवानी

अपने बेटों रियाज (बांये) और जफर(दाहिने) केसाथ गुल्‍लू भैया

‘चाय-पानी’ के बाद हम दोनों ही सामान्य और ताजादम हो चुके थे। भावावेग छँट चुका था और हम दोनों ही तैयार थेे - ‘कहने-सुनने’ के लिए। 

गुल्लू भैया को सुनते हुए मुझे एक अखबारी शीर्षक (शायद ‘जनसत्ता’ का) याद आता रहा - “बोले तो बहुत लेकिन कहा कुछ नहीं।” पल-पल लगता रहा कि गुल्लू भैया ने जो बोला, कहा उससे कहीं ज्यादा और वह भी ऐसा जो, जैसा कि मैंने शुरु में ही कहा, उतना ही जरूरी जितना कि पौधों-पत्तों के लिए क्लोरोफिल। 

“यह आजादी मिलने के बाद की बात है। रतलाम में एक क्लब बना था - सज्जन क्लब। रतलाम के महाराजा सज्जनसिंहजी के नाम पर यह क्लब उनकी बहन, रतलाम की राजकुमारी गुलाब कुँवरने स्थापित किया था। रेल्वे के और राज्य सरकार के राजस्व विभाग के अफसर ही सदस्य ही इसके सदस्य बन सकते थे। शहर के गिने-चुने, नामचीन लोगों को इसकी सदस्यता मिली थी। मेरे वालिद इस क्लब के संस्थापक सदस्य थे। 

वालिद के कारोबार का लेना-देना केवल रेल्वे से था लेकिन कलेक्टर समेत, राजस्व विभाग के तमाम आला अफसरों से भी वालिद का मेलजोल था। उस वक्त के कलेक्टर से उनकी दोस्ती भाईचारे की शकल ले चुकी थी।

“इन्हीं कलेक्टर साहब के तबादले की खबर आई ही थी कि उन्हीें दिनों बैरिस्टर साहब (रतलाम के पहले और तब से लेकर अब तक के एकमात्र ‘बैरिस्टर’, अब्बासी साहब) का मुम्बई जाने का कार्यक्रम बना। मुम्बई तक बॉम्बे हुआ करता था। अनेक विदेशी वस्तुओं पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था। विदेशी कपड़े भी उनमें शरीक थे। मेरे वालिद कलेक्टर को कोई ‘अच्छी सी गिफ्ट’ देना चाहते थे। उन्होंने बैरिस्टर साहब से कहा कि मुमकिन तो वे, विदेशी कपड़े का (इंगलैण्ड/मेनचेस्टर का बना) कोई अच्छा सा ‘सूट पीस’ लेते आएँ।

“वालिद को, बैरिस्टर साहब से यह कहते हुए सुनकर मेरा भी जी हो आया। मैंने वालिद से कहा - ‘पप्पा! एक सूट पीस मेरे लिए भी मँगवा दीजिए।’ वालिद ने मुझे जिस नजर से देखा, वह मैं इस लमहे तक नहीं भूल पाया हूँ। वह नजर मझे अब तक अपने चेहरे पर बनी हुई लग रही है। तब भी नहीं समझ पाया था और इस पल तक नहीं समझ पा रहा हूँ कि उस नजर में क्या था - मुहब्बत, रहम, करुणा, फिक्र, निराशा, गुमान या झंुझलाहट? ये सब या इनमें से कोई एक? एक पल इसी नजर से मुझे देखा और मक्खन सी आवाज में बोले - ‘गुल्लू! बेटा! तूने माँगा तो भी क्या माँगा? एक सूट पीस। बस? तू तो मेरा बेटा है। मेरा खून है। तू तो मेरी उम्मीदों में से एक है। मेरा नाम रोशन करनेवाला। तेरे लिए एक सूट पीस कहाँ लगता है? जब मैं मुँहबोले भाई, कलेक्टर के लिए एक सूट पीस मँगवा सकता हूँ तो तेरे लिए नहीं मँगवा सकता?’

“मुझे लगा, वालिद ने मेरी बात मान ली है और अब मेरा सूट पीस पक्का। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। वालिद ने इसके बाद जो कुछ कहा, उसने जिन्दगी को लेकर मेरा नजरिया बदल दिया। मेरी जिन्दगी सँवार दी। अपने बेटे के आनेवाले कल को लेकर फिक्रमन्द एक बाप अपने बेटे को इससे बहेतरीन और क्या दे सकता है? सुन कर मुझे भी लगा, अपने आप पर झेंप भी आई कि यार! गुल्लू! तूने माँगा तो भी क्या माँगा - एक सूट पीस? बस! 

“वालिद ने कहा - ‘मन में से यह बात निकाल दे बेटा कि कपड़ों से आदमी की इज्जत, औकात बनती या बिगड़ती है या कि कम-ज्यादा होती है। सूट तो गाँधीजी ने भी पहना था। लेकिन हुआ क्या? जिसकी सल्तनत में सूरज नहीं डूबता था, उस सल्तनत की महारानी के, दो टके के नौकर ने गाँधीजी को रेल के डब्बे में से फेंक दिया था। अगर सूट की ही अहमियत होती तो ऐसा नहीं होना चाहिए था। लेकिन ऐसा ही हुआ। इसके बर-खिलाफ जब गाँधीजी ने कमीज पहननी छोड़ दी, धोती भी आधी ही कर ली तब उसी महारानी ने, खुद चलकर, लन्दन के हवाई अड्डे पर ऐसे, ‘अधनंगे’ गाँधी की अगवानी की। सूट ने, दो टके नौकरों से धक्के दिलवाए और खादी की लंगोटी ने महारानी को झुका दिया।’

“वालिद की यह बात सुनकर मुझे ध्यान आया कि मेरे वालिद ने भी लट्ठे का कमीज-पायजामा पहन रखा है और यही उनकी रोजमर्रा की ड्रेस भी है। जो आदमी, एक अफसर को मेनचेस्टर के कपड़े का सूट पीस गिफ्ट देने की बात कह रहा है, वह आदमी खुद लट्ठा पहने हुए है! मैं एक झटके से धरती पर आ गया। मेरे चेहरे पर एक रंग आ रहा था, दूसरा जा रहा था। पता नहीं यह खुद की बात पर पछतावा था या ऐसे ऊँचे खयालातवाले का बेटा होने का गुमान!

“लेकिन वालिद ने अभी आधी बात ही कही थी। बाकी आधी बात उन्होंने जो कही, वही मेरी जिन्दगी की बात बन कर रह गई। वालिद बोले - ‘बेटा! कपड़े या कहो तो ये सारी चीजें, ये सारी धन-दौलत तो आनी जानी है। इनसे यदि पहचाने जाओगे तो जब ये नहीं होंगी तो जाहिर है तब तुम्हें कोई नहीं पहचानेगा। तो हमने खुद में कोई ऐसी बात पैदा करनी चाहिए जो हमारी पहचान बने और ऐसी पहचान बने कि जो भी हम पहनें, उसकी इज्जत हो।’

“वह दिन और आज का दिन। पप्पा आज दुनिया में नहीं हैं। 1975 में, 84 बरस की उम्र में उनका इन्तकाल हुआ। तब मैं कोई 42 बरस का रहा होऊँगा। लेकिन इस वाकये के बाद, तब पप्पा की मौजूदगी में और 1975 से, उनकी गैर मौजूदगी में, मैं उनकी बात पर अमल करने की कोशिशें कर रहा हूँ। मैं खुद अपने बारे में क्या कहूँ? मुझे तो एक पल भी नहीं लगा कि मैं पप्पा की बात को हकीकत में बदल पाया हूँ। मुझे तो अपनी हर कोशिश नाकामयाब लगती है। मुझे दूर से देखनेवाले ही मेरी हकीकत जानते होंगे।”

गुल्लू भैया की बात रुकी तो मैंने पाया कि टेबल पर हम दोनों के हाथ गुँथे हुए हैं। पता नहीं कब उन्होंने मेरे हाथ, अपने हाथों में ले लिए थे। अपने आप में लौटने में हमें कुछ पल लगे। हमने अपने-अपने हाथ खींचे। उन्होंने सूनी लेकिन चश्म-ए-नम से मुझे देखा। 

मैं कुछ कहने की हालत में नहीं था। जी कर रहा था, कहूँ कि उनकी कोशिशों की कामयाबी न तो नाप सकता हूँ न ही गिन सकता हूँ। लेकिन कुछ तो ऐसा उन्होंने खुद में पैदा किया ही है जिसके चलते मैं उनसे यह सब सुनने के लिए उनसे इसरार कर रहा हूँ। उनकी आँखें मुझे सवालिया लग रही थीं। 

बमुश्किल मैंने कहा - “गुल्लू भैया! आपका शुक्रिया अदा करने के सिवाय मेरे पास कुछ नहीं है आपसे कहने के लिए। लेकिन यदि आपका इसरार है तो सुनी-सुनाई चार पंक्तियों  से शायद मेरे जजबात आप तक पहुँचें -

जिन्हें हम कह नहीं सकते,
जिन्हें तुम सुन नहीं सकते,
वही कहने की बातें हैं,
वही सुनने की बाते हैं।”

गुल्लू भैया खुश हो गए। बोले - “तो अब मेरी बाकी बातों पर भी ये सतरें लागू कर लीजिए और अपना वक्त जाया होने से बचा लीजिए।”

मैं घबरा गया। हड़बड़ा कर बोला - “क्या गजब कर रहे हैं आप? बेवकूफी का जवाब बेवकूफी नहीं होता। एक पैदायशी बैरागी आपके सामने बैठा है और आप अपने दरवाजे से उसे ऐसे का ऐसा बैरागी ही जाने देंगे? मेरी नहीं तो अपनी तो परवाह कीजिए! लोग क्या कहेंगे?”

गुल्लू भैया ठठा कर हँसे। उनके ठहाके ने सारा भारीपन, सारी नमी एक झटके में धो-पोंछ दी। बोले - “यह परवाह तो आप भी मत कीजिए कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन बेफिकर रहिए। एक और बात कहने का आपका कर्जा मुझ पर है। कम से कम वह तो कहूँगा ही।”

मुझे तसल्ली हुई।

और उसके बाद मिला मुझे दूसरा जीवन सूत्र। लेकिन वह अगली कड़ी में। 

पार्टनरशिप डीड वो बनवाए जो चोर हो



मैं मुश्किल में हूँ। 

चाह रहा हूँ कि गुल्लू भैया की बातें उन्हीं की जबानी कहूँ। लेकिन गुल्लू भैया ने जो कुछ कहा, वह मुझे न तो शब्दशः याद है और न ही मैंने उनके नोट्स लिए, इसलिए ऐसा करना न तो सम्भव है और न ही उचित। लेकिन यदि मैं अपनी जबान में वह सब कहूँ तो मुझे खुद को लग रहा कि बात लम्बी भी हो जाएगी और शायद बनावटी भी। सो, गुल्लू भैया से माफी माँगते हुए और आप सबकी ‘जबरिया अनुमति’ लेते हुए, सुनी-सुनाई सारी बातों को गुल्लू भैया की जबानी ही पेश कर रहा हूँ।

जो कुछ गुल्लू भैया ने कहा, वह कुछ इस तरह था -

“जब से मैंने होश सम्हाला, अपने वालिद (अब स्वर्गीय श्री एहमद अली स्टेशनवाला) को रतलाम के ‘मुकाम और मरतबा  हासिल’ कारोबारियों में पाया। वे केवल रेलवे के ठेके लेते थे। स्टेशनवाले इलाके मे ही मिठाइयों की एक दुकान थी। बयाना (राजस्थान) के रहनेवाले गिरिराजजी शर्मा उसके मालिक थे। वे ‘गिरिराज महाराज’ के नाम से ही जाने और पुकारे जाते थे। वे मेरे वालिद के बेहद करीबी दोस्त थे।

“एक बार रेल्वे की कोयला चूरी का टेण्डर निकला। मेरे वालिद ने बातों ही बातों में गिरिराज महाराज से कहा कि यह ठेका लेना मुनाफे का सौदा होगा। यदि वे (गिरिराज महाराज) चाहें तो इसमें भागीदार बन जाएँ। वालिद ने तो एक मशवरा दिया था। लेकिन, पता नहीं महाराज ने क्या सुना, क्या समझा कि सीधे बयाना गए और वहाँ की अपनी सारी जमीन-जायदाद-दुकान वगैरह बेच कर स्थायी रूप से रतलाम आ गए। 

“खैर, वालिद की और गिरिराज महाराज की भागीदारी में काम शुरु हुआ और खुदा के करम से नतीजे उम्मीद के मुताबिक मिले। काम धीरे-धीरे बढ़ने लगा और इतना बढ़ा कि रतलाम से बाहर शामगढ़ (म.प्र.), कोटा, गंगापुर (दोनों राजस्थान) और आगरा तक एस्टिब्लिशमेण्ट कायम करने पड़े।

“लेकिन वालिद ने सब जगहों पर अकेले काम नहीं किया। जहाँ-जहाँ काम किया, वहाँ-वहाँ भागीदारी फर्म या कम्पनी बनाई और सब जगहों पर स्थानीय लोगों से भागीदारी की। इस तरह वालिद चार कम्पनियों में भागीदार रहे। कम्पनियों में भागीदारों की तादाद हालात और सहूलियत के मुताबिक रही। एक कम्पनी में सबसे ज्यादा 13 भागीदार रहे तो एक कम्पनी में सबसे कम चार।  

“इन भागीदारी कम्पनियों की दो बातें आज के जमाने में यकीन से परे लगेंगी। पहली बात यह कि चारों कम्पनियों में केवल वालिद ही दाउदी बोहरा थे। बाकी सबके सब हिन्दू भागीदार थे। और दूसरी बात इससे भी अधिक अहम, काबिले गौर और मुश्किल-यकीन वाली है। इन कम्पनियों की पार्टनरशिप डीडें तभी बनवाईं गईं जब कानूनी तौर पर (और खास कर इनकम टैक्स के लिए) जरूरी हुआ।

“एक वाकये से बात शायद ज्यादा साफ होगी।

“आजादी के बाद जब इनकम टैक्स लागू हुआ तो इन्दौर से पेण्डसे वकील साहब ने रतलाम आकर यहाँ, इन्दौर धर्मशाला में मुकाम जमाया। उन्होंने वालिद से मुलाकात की। सारी बातें समझाईं। जब कागज-पत्तर की बात आई तो पेण्डसे साहब ने पार्टनरशिप डीड की कॉपी माँगी। वालिद ने बताया कि पार्टनरशिप डीड न तो बनवाई गई है और न ही बनवाई जाएगी। पेण्डसे साहब ने कहा कि अब तक नहीं बनी है तो अब बनवानी पड़ेगी। पेण्डसे साहब की यह बात वालिद को अच्छी नहीं लगी। तुनक कर बोले - ‘जो चोर हो वो पार्टनरशिप डीड बनवाए। हम पार्टनरों में से कोई भी चोर नहीं है।’ वालिद की जिद के चलते अपनी बात समझाने में पेण्डसे साहब को काफी मुश्किल आई। उन्हें कहना पड़ा कि वे (मेरे वालिद) रतलाम के, अपने भरोसे के वकील से उनकी (पेण्डसे साहब की) बात की ताईद कर लें। आखिरकार वालिद को पार्टनरशिप डीड बनवानी ही पड़ी लेकिन यह काम करने में उन्हें बड़ी तकलीफ हुई।

“गिरिराज महाराज से वालिद की पार्टनरशिप, कहने भर को पार्टनरशिप थी। दोनों परिवारों की दोस्ती पूरे रतलाम में अजूबा थी। ‘स्टेशनवाला’ और ‘शर्मा’ सरनेम के कारण ही दोनों परिवार अलग थे लेकिन हालत यह थी कि दोनों ने एक ही कुटुम्ब बन कर व्यवहार किया। महाराज के यहाँ जब भी शादी-ब्याह का मौका आया तो समधियों की मिलनी-रस्म के लिए  महाराज ने सबसे पहले मेरे वालिद को पटले पर खड़ा किया। और हमारे यहाँ जब भी ऐसा मौका आया, तब गिरधारी महाराज को यही इज्जत दी गई।”

इन दोनों परिवारों की भागीदारी तीन पीढ़ियों तक चली। रियाज और जफर (रियाज को आप पहली कड़ी में जान चुके हैं। जफर, गुल्लू भैया का छोटा बेटा है।) बताते हैं कि गिरिराज महाराज के पोते और ये दोनों भाई (एहमदअली साहब के पोते) साथ-साथ भगीदार रहे। आज यह भागीदारी अस्तित्व में नहीं हैं लेकिन इसकी वजह कोई विवाद या असहमति नहीं। इस भागीदारी में जो कारोबार किया जाता था, वह कारोबार ही बन्द हो गया। लिहाजा, भागीदारी फर्म विसर्जित करनी पड़ी।

गुल्लू भैया बोलेे - “लेकिन खुदा का करम है कि दोनों परिवारों का नाता आज भी जस का तस बना हुआ है। आप भी दुआ कीजिए कि हमारा यह रिश्ता बना रहे और इसे किसी की नजर न लगे।”

इस मुकाम पर आते-आते गुल्लू भैया तनिक भावुक हो गए। जो कुछ सुना, वह मुझे भी भावाकुल कर गया। जानने-सुनने की मेरी प्यास, तलब की हदें छू रहीं थीं। लेकिन मुझे लगा, गुल्लू भैया कहीं इस दशा में न आ जाएँ कि मेरा मकसद अधूरा रह जाए। इसी स्वार्थ के चलते बोला - ‘अब थोड़ा रुकिए। मुझे एक ग्लास पानी पिलवाइए और चाय भी।’

गुल्लू भैया ‘नम हँसी’ हँस दिए। बोले - ‘मुझे सम्हाल रहे हैं? शुक्रिया।’ 

उन्होंने चाय-पानी के लिए रियाज को निर्देशित किया। हम दोनों के बीच खामोशी पसर गई थी। मुझे तो कुछ बोलना था ही नहीं। मैं चुप था। लेकिन गुल्लू भैया!  वे भी चुप थे। कुछ इस तरह मानो अगली बात कहने के लिए खुद को तैयार और ताजा दम कर रहे हों। 

यह चुप्पी टूटी तो मुझे मानो जीवन सूत्र मिल गए। 

क्या थे वे जीवन सूत्र? जी तो कर रहा है कि मैं बिना रुके अपनी बात कहूँ। लेकिन इस क्षण मैं भी सहज-सामान्य नहीं रह गया हूँ। 


गुल्लू भैया नहीं, उनकी बातें हैं जरूरी

ये हैं हमारे गुल्लू भैया। पूरा नाम गुलाम हुसैन स्टेशनवाला। बहत्तर बरस की उम्र में चल रहे इस आदमी को जानना हममें से किसी के लिए जरूरी नहीं। वक्त की बर्बादी ही होगी। लेकिन इनकी बातें सुनने के बाद यह तय है कि जो कुछ ये बताते हैं, उसे जानना हम सबके लिए जरूरी है। खास कर आज के हालात में उतना ही जरूरी जितना कि पौधों-पत्तों की हरियाली के लिए क्लोरोफिल।

गुल्लू भैया से मेरी दोस्ती तो कभी नहीं रही। जान-पहचान भी नहीं। बस! दुआ-सलाम का रिश्ता रहा। उनसे मिलना-जुलना भी बस इतना ही था जितना टाला जाना नामुमकिन होता। उनके बेड़े बेटे रियाज से मेरा मिलना-जुलना था। उससे मिलने जाता तो गुल्लू भैया से भी मिलना पड़ता - बिलकुल उसी तरह और उतना ही कि जिस तरह और जितना अपने मिलनेवाले के पिता से मिलना ही पड़ता है। मेरी मुश्किल यह कि उम्र में रियाज मुझसे छोटा और मैं गुल्लू भैया से। रियाज समझे कि मैं उसके पिता के मिलनेवालों में शरीक हूँ और गुल्लू भैया मुझे रियाज के मिलनेवालों में समझे।

कशमकशवाली मेरी इस दशा के बीच गुल्लू भैया मुझे हर बार, बार-बार, लगातार एक अबूझ पहेली लगते रहे। कारण रहा - उनकी आर्थिक हैसियत और उनके रहन-सहन में जमीन-आसमान का अन्तर। “खानदानी रईस” गुल्लू भैया कि आर्थिक हैसियत ऐसी कि मुझ जैसे सौ-पचास बैरागी एक झटके में खरीद लें (मेरी इस बात को मुहावरा ही समझा जाए। जानता हूँ कि मुझ जैसे एक भी बैरागी को खरीदने का ‘मूर्खतापूर्ण अपव्यय’ गुल्लू भैया तो क्या, कोई नासमझ भी नहीं करेगा)। (मैंने जब गुल्लू भैया से कहा कि मैं यह खरीदनेवाली बात लिखूँगा तो घबराकर, दोनों कान छूकर बोले - “अरे! अरे!! ऐसा गजब बिलकुल मत करना। मैं तो खुद अपने दीन-ओ-ईमान के हाथों बिका हुआ आदमी हूँ।”) लेकिन रहन-सहन ऐसा कि उनके सामने बैरागी भी बिड़ला लगे। मैंने उनको सदैव पैदल चलते ही देखा। कभी-कभार सायकिल पर। और बहुत हुआ तो भूले-भटके स्कूटर पर। कभी खुद चलाते हुए तो कभी अपने बेटे के पीछे बैठे हुए। उनका यह ‘चाल-चलन’ ही उन्हें अबूझ पहेली बनाता रहा मेरे लिए।

लेकिन जैसा कि हम सब कहते हैं - हर बात की एक हद होती है। सो, एक दिन मेरे धीरज ने अपनी हद छोड़ दी। लिहाज और तमीज को खूँटी पर टाँग कर, उन्हें रास्ते चलते रोक कर पूछ ही लिया - “यह क्या चक्कर है गुल्लू भैया?” मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ कि मेरे सवाल पर गुल्लू भैया को बिलकुल ही ताज्जुब नहीं हुआ। हँस दिए। कुछ इस तरह मानो बरसों से मेरे इस सवाल की प्रतीक्षा कर रहे थे। बोले - “यहीं, सड़क पर खड़े-खड़े जानना चाहेंगे या कहीं बैठकर, तसल्ली से बात करें?” मुझे राहत भी मिली और ताज्जुब भी हुआ। राहत इस बात से कि उन्हें मेरा सवाल बुरा, अटपटा नहीं लगा और ताज्जुब यह जानकर हुआ कि वे लिहाज करने की सीमा तक मेरा सम्मान करते हैं।

अब, जब जवाब गुल्लू भैया से हासिल करना था तो जाहिर है कि उनकी सुविधा ही पहली और आखिरी शर्त थी। बोले - “चलिए! दफ्तर चलते हैं। वहीं बैठकर बातें करते हैं। कोशिश करूँगा कि आपको तसल्ली हो जाए।” मैं स्कूटर पर था और गुल्लू भैया पैदल। मैंने कहा - “बैठिए।” उन्हें क्षण भर को उलझन हुई लेकिन बिना ना-नुकुर किए बैठ गए।

दफ्तर पहुँच कर हम दोनों ने अपनी-अपनी जगह ली। गुल्लू भैया बोले - “बात लम्बी हो सकती है। सब कुछ आज ही जानना चाहेंगे या किश्तों में?” फुरसत में तो हम दोनों ही नहीं थे लेकिन उस क्षण का सच यह था कि इधर मैं सब कुछ जानने के लिए अगली साँस भी लेने को तैयार नहीं तो उधर गुल्लू भैया भी मानो एक ही साँस में सब कुछ कह देने का तैयार हो गए हों। 

और गुल्लू भैया ने बोलना शुरु किया तो लगा वे वहाँ नहीं थे। उन्होंने बात शुरु तो की मेरी आँखों में आँखें डालकर। लेकिन कुछ ही पलों में मुझे लगा, मैं उनके सामने हूँ ही नहीं। वे, मानो मेरे आर-पार देखकर किसी और की बातें किसी और को सुना रहे हों।

वही सब ऐसा है जो आज के हालात में हम सबके लिए निहायत ही जरूरी है। बिलकुल उतना ही जरूरी जितना कि पौधों-पत्तों की हरियाली के लिए क्लोरोफिल। लेकिन आज सब कुछ कहने लगूँगा तो बात लम्बी हो जाएगी।

किन्तु गुल्लू भैया ने सब कुछ कहने की इजाजत नहीं दी। दो ही बातों की इजाजत दी। वे ही दो बातें कहूँँगा। लेकिन अभी नहीं। 


कुछ अटपटा लेकिन तसल्लीदायक

इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं कीथी।


‘आइए! रोगी के लिए निर्धारित कुर्सी पर विराजिए।’ कह कर डॉक्टर सोनगरा खुद ही चौंक गए। कुछ आह्लादित, कुछ विस्मित हो, कुछ इस तरह कि मानो खुद से ही सवाल पूछ रहे हों, बोले - ‘अरे! मैं  ऐसी हिन्दी बोल सकता हूँ? मुझे याद है यह सब?’

वे (डॉक्टर सोनगरा नहीं, मेरे ‘वे’) आयु में तो मुझसे छोटे हैं किन्तु ज्ञान और बौद्धिकता में हिमालय। हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान्। सो, वे मेरे प्रिय भी हैं और आदरणीय भी। उनके घर पर बैठ, उनकी मेजबानी का सुख-आनन्द ले रहा था। एक सज्जन पधारे। वे मेरे इन प्रिय-आदरणीय को सवैतनिक सेवा का प्रस्ताव लेकर आये थे। शर्त थी - सारा काम अंग्रेजी में करना पड़ेगा। मेरे इन प्रिय-आदरणीय का, हिन्दी में आधिकारिक हस्तक्षेप जताने की ललक में कह बैठा - ‘तब तो ये शायद ही आपके लिए उपयोगी हों। हाँ! हिन्दी में इनके मुकाबले का अपने कस्बे में कोई नहीं।’ मैं उनके घर बैठा था, प्रस्ताव उनसे किया गया था। मेरे बोलने का न तो प्रसंग था न ही औचित्य। उनके प्रति मोहग्रस्त हो, उन्हें हिन्दी का निष्णात विद्वान् साबित करने के मोहवश मैं आपराधिक मूर्खता कर बैठा हूँ, तब इसका अनुमान भी नहीं हुआ। मेरा इतना कहने के बाद किसी के लिए कुछ कहना शेष नहीं रह गया था। प्रस्ताव, चर्चा होने से पहले ही निरर्थक हो चुका था।

मैं घर लौटा तो उत्तमार्द्ध ने बताया कि उनका फोन आया था। कहा था कि आते ही उनसे बात करूँ। मैंने वही किया। वे अप्रसन्न, खिन्न, क्षुब्ध और कुपित थे। उन्हें इस बात से अपनी हेठी लगी कि मैंने अंग्रेजी पर उनके अधिकार को संदिग्ध बना दिया था। उनके कोप का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मैं कुछ कहता और क्षमा-याचना करता, इससे पहले ही उन्होंने फोन बन्द कर दिया। मुझे मर्मान्तक पीड़ा हुई - यह मैंने क्या कर दिया? जो मेरे आत्मीय हैं, उन्हीं को पीड़ा पहुँचा दी? उन्हीं की अवमानना कर दी? वह भी, उनके ही घर में, उनकी श्रीमतीजी की उपस्थिति में? मैं रात भर सो नहीं पाया। उनसे बात करने का साहस तो मुझमें रहा ही नहीं।

उसके बाद कैसे, क्या हुआ, यह अपने आप में स्वतन्त्र आख्यान है। किन्तु दो महीने से अधिक का समय हो गया, मैं उनसे बात करने का साहस अब तक नहीं जुटा पाया हूँ। उन्होंने बड़प्पन बरता, स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश की किन्तु मैं इस क्षण तक सहज नहीं हो पाया हूँ। अब तक अपराध-बोध से ग्रस्त ही हूँ।

किन्तु महत्वपूर्ण बात यह कि अंग्रेजी पर समुचित अधिकार न होने की बात वे एकाधिक बार मुझसे कह चुके थे। अंग्रेजी की अनिवार्यता की शर्तवाला ऐसा ही एक प्रस्ताव पहले उनके पास आया था तो उन्होंने सामनेवाले से साफ कहा था कि वे अंग्रेजी में न तो धाराप्रवाह बोल सकते हैं न ही लिख सकते हैं। हिन्दी में उनकी प्रतिष्ठा को दृष्टिगत रखते हुए उनकी यह बात मान ली गई थी। यह संयोग या दुर्योग रहा कि वह प्रस्ताव परवान नहीं चढ़ पाया।

यह प्रसंग मुझे याद आया तो मैं उलझन में पड़ गया - ‘जो बात वे खुद कहते रहे हैं, वही बात मैंने कही तो उन्हें बुरा क्यों लगा?’

मैंने खूब सोचा। उनकी नाराजी को कोई कारण मुझे नजर नहीं आ रहा था। बार-बार एक ही बात पर आकर मेरा मन ठहरता रहा - “हो न हो, उन्हें इस बात का बुरा लगा कि दूसरे के सामने उन्हें ‘अंग्रेजी में अज्ञानी’ साबित कर दिया गया।” और कोई कारण मुझे न तब अनुभव हुआ और न ही अब अनुभव हो रहा है।

यह बात मेरे मन से निकल ही नहीं पाई। हमें हिन्दी का ज्ञान न हो, यह तो हमारे लिए शर्म की बात हो सकती है। किन्तु हमें अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है, यह बात हमारे लिए लज्जाजनक कैसे हो सकती है? वह भी उस आदमी के लिए जो हिन्दी और संस्कृत पर अपनी आधिकारितकता के लिए पूरे कस्बे में ही नहीं, समूचे मालवांचल में जाना-पहचाना, सराहा जाता हो, सम्मानित किया जाता हो?

दो-ढाई महीनों से यह बात मुझे साल रही थी। सोचा, अंग्रेजी न जानने को लेकर जब आचंलिक स्तर पर हिन्दी का एक महारथी, सारस्वत-पुरुष अचेतन में इस तरह हीनता-बोध से ग्रस्त हो सकता है तो बेचारे एक औसत पढ़े-लिखे आदमी की मनोदशा क्या होगी? मेरी खुद की अंग्रेजी ऐसी नहीं कि मैं खुद को अंग्रेजी का जानकार कह सकूँ। किन्तु ‘अंग्रेजी अज्ञान’ को लेकर ऐसा हीनता-बोध मुझमें क्षणांश को भी नहीं उपजा। 

सो मैंने, पाँच दिन पहले, जेब पर लगाई जा सकनेवाली, प्लास्टिक की एक पट्टी बनवाई - ‘मुझे अंग्रेजी नहीं आती।’ दुकानदार ने कहा कि सामेवार को पट्टी मिल जाएगी। सोमवार की शाम को मुझे अपने डॉक्टर के पास जाना था। वहाँ जाने से पहले, दुकानदार से यह पट्टी बनाकर ली। अपनी कमीज पर लगाई और डॉक्टर की सेवा में उपस्थित हो गया। मेरी कमीज पर लगी पट्टी का असर डॉक्टर पर क्या हुआ, यह मैं शुरु में ही बता चुका हूँ।

दो दिनों से मैं यह पट्टी लगाए हुए पूरे कस्बे में आ-जा रहा हूँ। लोग हैरत से देख रहे हैं। छुटपुट पूछताछ हो रही है। लेकिन बात मुकाम पर पहुँचती लग रही है। अलग-अलग स्थानों पर दो युवकों और एक दुकानदार ने कहा कि मेरी इस ‘हरकत’ से उन्हें ताकत मिली है। हिन्दी के एक व्याख्याता ने मानो स्वीकारोक्ति की - ‘हम सब जानते हैं कि हम अंग्रेजी नहीं जानते लेकिन यह जताने पर तुले हुए है कि हम अंग्रेजी जानते हैं।लेकिन ऐसा जताने की कोई जरूरत नहीं है, यह  बात आपकी कमीज पर लगी यह पट्टी देख कर समझ में आई।’ 

नहीं जानता कि आनेवाले दिनों में क्या होगा। लेकिन आज तो मैं, पूरे कस्बे में ‘देखने की चीज’ बना हुआ हूँ।

मुझे तसल्ली तो हो ही रही है, मजा भी आ रहा है।

इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी।


मेहरबाँ कैसे कैसे

“कौन सा आयोजन कर रहे हैं? कब कर रहे हैं?”

“कोई आयोजन नहीं कर रहा।

“अकेले नहीं कर रहे तो आप कुछ लोग मिल कर कर रहे हैं?”

“नहीं। न तो मैं अकेला कोई आयोजन कर रहा हूँ और न ही हम कुछ लोग मिल कर कोई आयोजन कर रहे हैं।”

“तो फिर किसी संस्था के किसी आयोजन की तैयारी कर रहे हैं?”

“नहीं। किसी संस्था के किसी आयोजन की भी तैयारी नहीं कर रहा हूँ।”

“तो फिर यह लिस्ट किसलिए?”

“कौन सी लिस्ट?”

“यही। पतों और मोबाइल नम्बरों सहित नामों की लिस्ट। आपके टेबल पर पड़ी है।”

“अच्छा! वह लिस्ट? वह तो बस! यूँ ही।”

“वाह! यूँ ही कैसे? इस लिस्ट में कुछ नाम कटे हुए हैं और कुछ पर टिक का निशान लगा हुआ है!”

“यह लिस्ट मैंने नहीं बनाई।” 

“आपने नहीं बनाई? तो किसने बनाई?”

“पाठकजी ने बनाई।”

“पाठकजी ने? अपने पासवाले रमेशजी पाठक ने?”

“नहीं। रमेशजी पाठक ने नहीं।”

“तो फिर कौन से पाठकजी ने बनाई?”

“प्रोफेसर अभय पाठक ने।”

“क्यों? उन्होंने क्यों बनाई?” 

“मेरे कहने से बनाई।”

“क्यों? आप कोई आयोजन कर रहे हैं?”

“मैंने पहले ही कहा न! मैं कोई आयोजन नहीं कर रहा।”

“तो फिर आपने लिस्ट क्यों बनवाई?”

“कभी, कोई आयोजन करें तो किस-किस को बुलाएँ, इसलिए बनवाई।”

“अच्छा। इसका मतलब है कि पाठकजी कोई आयोजन नहीं कर रहे।”

“मुझे नहीं पता कि पाठकजी कोई आयोजन कर रहे हैं या नहीं।”

“नहीं। नहीं। मेरा मतलब है   कि पाठकजी ने यह लिस्ट अपने किसी आयोजन के लिए नहीं बनाई।”

“हाँ। मैंने पहले ही कहा है कि पाठकजी ने यह लिस्ट मेरे कहने से बनाई।”

“अच्छा। लेकिन इसमें तो कुल तेईस ही नाम हैं। आयोजन में इतने ही लोगों को बुलाएँगे?”

“यह तो तय नहीं कि कितने लोगों को बुलाएँगे लेकिन तेईस से ज्यादा ही लोगों को बुलाएँगे।”

“तो पाठकजी ने इतने ही नाम क्यों लिखे? और इसमें मेरा नाम तो है ही नहीं।”

“उनसे कहा था कि वे उन लोगों की सूची बनाकर दें जो उनके सम्पर्क में हैं।”

“अच्छा। लेकिन इसमें मेरा नाम क्यों नहीं है? मैं भी तो उनके सम्पर्क में हूँ!”

“आपका नाम मेरी लिस्ट में है।” 

“क्या मतलब? आप दो लोग मिल कर लिस्ट बना रहे हैं?”

“केवल दो नहीं। हम पाँच-सात लोग मिल कर लिस्ट बना रहे हैं।”

“पाँच-सात लोग मिल कर? क्यों भला?”

“हर आदमी के अपने-अपने सम्पर्क होते हैं। कई नाम ऐसे होते हैं जो सबकी लिस्ट में मिल जाएँगे। लेकिन सबके नाम सबकी लिस्ट में नहीं मिलेंगे। तो, इस तरह नाम छाँट कर एक बड़ी और व्यापक लिस्ट तैयार हो जाएगी।”

“अच्छा। तो इसका मतलब है कि आप लोग कोई आयोजन करनेवाले हो।”

“नहीं। हम लोग कोई आयोजन नहीं कर रहे।”

“तो फिर लिस्ट बनाने की हम्माली क्यों कर रहे हैं?”

“कहा ना? कभी, कोई आयोजन करना पड़े तो अधिकाधिक लोगों को बुलाया जा सके, इसलिए।”

“लेकिन किसी आदमी के यहाँ कोई काम पड़ता है तो वह अपने नाते-रिश्तेदारों को, व्यवहारवालों को, दोस्तों को, मिलनेवालों को ही बुलाता है।”

“हाँ। आपने ठीक कहा।”

“तो फिर इस लिस्ट का मतलब? आपने अभी कहा कि आप लोग जो लिस्ट बनाओगे उसमें ऐसे लोगों के नाम भी होंगे जिन्हें आप नहीं जानते और जिनसे आपका कोई लेना-देना, कोई व्यवहार नहीं है?”

“हाँ। ऐसे नाम तो होंगे ही। इसीके लिए तो सबसे अपनी-अपनी लिस्ट बनाने को कहा है।”

“आपकी बात समझ में नहीं आई।” 

“कौन सी बात समझ में नहीं आई?”

“यही कि अपने घर पर काम होने पर अपने नाते-रिश्तेदारों को, व्यवहारवालों को, मिलनेवालों को, दोस्तों को ही बुलाते हैं।”

“हाँ। ठीक तो है!

“तो फिर इस लिस्ट का मतलब?”

“यह लिस्ट हममें से किसी के यहाँ होनेवाले पारिवारिक काम के लिए नहीं है।”

“कमाल है! तो फिर किसलिए है?”

“कभी कोई साहित्यिक, ललित कलाओं से जुड़ा कोई आयोजन हो तो उसमें बुलाने के लिए।”

“हत्त-तेरे की! आप भी कमाल करते हो! पहले ही बता देते!”

“कमाल तो आप कर रहे हैैं। आप जो-जो सवाल पूछते रहे, वही-वही जवाब तो मैंने दिए!”

“नहीं। आपने घुमा-फिरा कर जवाब दिया।”

“नहीं। मैंने तो, जैसा आपने गाया, वैसा ही बजाया।”

“नहीं! नहीं! आप मेरे मजेे ले रहे थे।”

“आप खुद को ‘मजा लेनेवाली चीज’ समझते हैं?”

“फिर? आप फिर मेरे मजे ले रहे हैं।”

“नहीं। मैं तो आपके आरोप पर अपना स्पष्टीकरण दे रहा हूँ।”

“आप भी बस! आपसे तो बात करना ही बेकार है।”

“इतनी सी बात आपको इतनी सारी बातें करने के बाद समझ में आई?”

“फिर? आप कभी चुप भी रहेंगे?”

“मैं चुप रहूँगा तो आप इसी बात पर नाराज हो जाएँगे कि मैं आपके सवालों के जवाब क्यों नहीं दे रहा।”

“आप से तो भगवान बचाए। गुनहगार मैं ही हूँ।”

“इसमें गुनहार होने न होने की बात बीच में कहाँ आ गई?”

“येल्लो! मेरी मति मारी गई जो आपसे बहस कर रहा हूँ।”

“आप भले ही कर रहे हों, मैं तो बहस नहीं कर रहा। मैं तो आपके सवालों के जवाब दे रहा हूँ।”

“अच्छा। आप जीते। मैं हारा। अब तो आप खुश?”

“तो आप मुझे खुश करने के लिए अब तक यह सब कर रहे थे? मैं तो आपके आने से ही खुश हो गया था।”

“हे! भगवान! प्राण लेंगे क्या?”

“आपसे मिल कर, आपको देखकर मुझे सदैव ही खुशी होती है। आप ही बताइए, जिससे खुशी मिलती है, उसके प्राण लिए जाते हैं?”

“आपके हाथ जोड़े। मैं चलता हूँ। जितनी देर बैठूँगा, उतनी ही अपनी फजीहत करवाऊँगा। नमस्कार।”

“कहाँ चल दिए? आपने मेरी बात तो सुनी ही नहीं!”

“हें! तो मैं अब तक क्या कर रहा था?”

“अब तक आप मुझसे सवाल कर रहे थे। अपनी बात कहे जा रहे थे।”

“हे! भगवान! फिर मैं ही दोषी? चलिए। कहिए। क्या कहना है?”

“बस। यही कि ऐसी ही एक सूची आप भी बना कर दे दीजिएगा - आपके मिलनेवालों के नाम, पतों और मोबाइल नम्बरों सहित।”

“अरे! जब आप लोग.........नहीं। नहीं। दे दूँगा। जल्दी ही दे दूँगा। बनते कोशिश कल ही दे दूँगा। बस? नमस्कार।”

“नमस्कार। फिर आइएगा।

(वे थोड़ी ही देर पहले गए हैं। कुछ काम से आए थे। मेरी टेबल पर रखे कागजों को उलटना-पलटना और खोद-खोद कर पूछताछ करना उनकी आदत है। इसी के चलते उन्हें एक सूची नजर आ गई। उसके बाद जो हुआ, वही आपने पढ़ा। इस चक्कर में वही काम भूल गए जिसके लिए आए थे।)

अपन तो बिन्दास चलाते हैं अंकल!

लोग अलग-अलग, घटनाएँ भी अलग-अलग किन्तु सन्देश एक ही। कुछ इस तरह जैसे धर्म, पन्थ अलग-अलग लेकिन सबका सन्देश एक ही। घटनाओं, व्यक्तियों, प्रस्तुतियों की विविधता ही इसे रोचक बनाए रखती है। 
कल भी ऐसा ही हुआ।

बीमा-सम्भावनाएँ तलाशता हुआ एक जगह, जवान इकलौते बेटे के पिता से गपिया रहा था। पिता खुद के बजाय बेटे का बीमा कराना चाह रहा था। मैं जोर दे रहा था कि वह खुद का ही बीमा कराए क्योंकि घर के लिए रोटी वही कमा रहा है। बेटा तो अभी पढ़ रहा है। पढ़-लिख कर काम-धन्धे से लग जाए, खाने-कमाने लगे तो उसका बीमा करा ले। अभी बेटा जिम्मेदारी बना हुआ है। वे बेटे का ही बीमा कराना चाह रहे थे। बेटा बाहर था। कुछ ही देर में आनेवाला था। सो हम इधर-उधर की बातें करने लगे।

बात शुरु हुई थी एक जवान बेटे से और पहुँच गई उस जवान बेटेवाली पूरी पीढ़ी तक। वे अत्यधिक खिन्न और क्षुब्ध थे। उनके मतानुसार आज के नौजवान पूरी तरह बिगड़ चुके हैं। मनमानी करते हैं। बड़ों की इज्जत नहीं करते। आँख की शरम खो दी है इन्होंनें। किसी की परवाह नहीं करते। इनके माँ-बाप भी इन्हें कुछ नहीं कहते। 

मैंने हर बार टोका-रोका। कहा कि ये बच्चे अपनी मर्जी से दुनिया में नहीं आए हैं। इन्हें हम ही दुनिया में लाए हैं और ये ही हमारा आनेवाला कल हैं। हमें इन्हीं के कन्धों पर जाना है। हम अपने वक्त में ठहरे हुए हैं। यदि चलकर इनके वक्त में आएँ तो ये ही बच्चे हमें भले लगने लगेंगे। ये वैसे ही बने हैं और बन रहे हैं जैसा हमने इन्हें बनाया है और बना रहे हैं। ये ही हमारी सेवा करेंगे और हमारा नाम रोशन करेंगे। हमें इन पर भरोसा करना चाहिए। 

मेरी टोक-रोक का उन पर कोई असर नहीं हुआ। वे अपनी बातों पर अड़े हुए रहे। बोले - “दूसरी बातें छोड़ो। आपने इन्हें फटफटी (मोटर सायकिल) चलाते देखा? कभी देखो। अन्धे होकर चलाते हैं। किसी की परवाह नहीं करते। ऐसे तेज चलाते हैं जैसे जंगल में चला रहे हों। कोई मरता हो तो मर जाए। इन्हें परवाह नहीं। और इनके हार्न सुने? कान के परदे फट जाएँ। और, कोई सामने हो और बजाए तो ठीक। लेकिन ये तो बिना बात के ही बजाते रहते हैं। जैसे बिना बात के हार्न बजाने के इन्हें पैसे मिल रहे हों।”

यह बात मेरे मन की थी। मैं ने उत्साह से उनकी इस बात का समर्थन किया - “हाँ! आपकी यह बात तो ठीक है।” उन्होंने मुझे फौरन ही पकड़ लिया। मुझे निर्देश देते हुए सवाल किया - “तो फिर आप ही क्यों नहीं कुछ करते हो? आपका तो अफसरों के बीच उठना-बैठना है। उनसे कहो कि इन स्सालों को पकड़े। दो लप्पड़ लगाएँ। कम से कम हजार-पाँच सौ का जुर्माना ठोके। इन्हें होश में लाए। इनके माँ-बाप को लाइन हाजिर करे। उन्हें भी तो पता लगे कि उनके पूत क्या कर रहे हैं?”

मैंने सरकार का बचाव किया। बोला - “सरकार क्या-क्या करे? माँ-बाप यदि अपने बच्चों को समझाएँ तो शायद बात बन जाए।”

सरकार की तरफदारी पर वे भड़क गए। तैश में बोले - “सरकार क्या-क्या करे से क्या मतलब आपका? सरकार नहीं करेगी तो कौन करेगा? और सरकार क्यों नहीं करे? करना पड़ेगा। हम सरकार को टैक्स देते हैं। और माँ-बाप की तो आप बात ही मत करो। आजकल की हालत आप देख रहे हो? काम-धन्धे से ही फुरसत नहीं मिलती। घर चलाएँ, काम-धन्धा करें या बच्चों को समझाएँ?”

उनके गुस्से ने मेरी आवाज धीमी कर दी। धीमी आवाज में ही प्रतिवाद करने की कोशिश की - “लेकिन सबसे पहले खतरा तोे अपने बच्चे की जान पर ही आता है। माँ-बाप की जिम्मेदारी तो बनती है। और किसी बात के लिए नहीं, अपने बच्चे की सलामती के लिए ही सही, माँ-बाप ने टोकना, समझाना तो चाहिए। इतना फर्ज तो बनता है।” मानो मेरी हर बात खारिज पर तुल गए हों, कुछ इस तरह बोले - “माँ-बाप क्या समझाएँ? उन्हें तो एक-दूसरे से ही फुरसत नहीं। एक-दूसरे में मगन रहते हैं। एक-दूसरे से फुरसत मिले तो बच्चों से बात करें।”

हमारा यह सम्वाद और चलता लेकिन रोक लग गई। बी. कॉम. प्रथम वर्ष में पढ़ रहा उनका बेटा दनदनाता हुआ दरवाजे पर रुका। उसे देखकर मेरा ‘दुर्जन’ प्रसन्न हो गया। वह बजाज कम्पनी की पल्सर मोटर सायकिल पर दनदनाता हुआ आया था और उसने किसी फिल्मी नायक की तरह एकदम ब्रेक लगा कर गाड़ी रोकी थी। उसे देखकर उनका गुस्सा तिरोहित हो गया। एकदम प्रेमल हो गए। “आजा! आजा!! अभी तेरी ही बात कर रहे थे। तेरा बीमा करा रहे हैं। जहाँ बैरागीजी कहें वहाँ दस्तखत कर दे और जो कागज माँगें, ला दे।”

‘दुर्जन’ को धकेल कर मेरा बीमा एजेण्ट आगे आया। कागजी खानापूर्ति की। कागज-पत्तर और पहली किश्त की रकम जेब के हवाले की। 

‘बीमा एजेण्ट’ का काम पूरा होते ही मेरा ‘दुर्जन’ हरकत में आ गया। अज्ञानी बन कर बच्चे से पूछा - “ये तो वही बाइक है ना जो बहुत तेज स्पीड से चलती है?” “हाँ अंकल। वही है। पल्सर। जोरदार बाइक है।” उसने गर्व और उत्साह से जवाब दिया। मेरे ‘दुर्जन’ ने फिर अज्ञानी का अभिनय करते हुए दुष्टतापूर्वक (और दुराशयतापूर्वक) पूछा - “तो सिटी में चलाने में तो तकलीफ आती होगी। अपने यहाँ तो लोगों में ट्रेफिक सेंस है ही नहीं?” मेरी बात को जोरदार धक्के से परे हटाते हुए लापरवाही से बोला - “अरे! बिलकुल नहीं अंकल! कोई प्रॉब्लम नहीं आती। सत्तर-अस्सी से कम पर इसे चलाई तो फिर इसे चलाने का मतलब ही नहीं। अपन तो बिन्दास चलाते हैं।” मेरा ‘दुर्जन’ खुश हो गया। चहक कर बोला - “इतनी स्पीड से चलाता है तो गाड़ी के ओरिजनल हार्न से काम चल जाता है?” मेरा सवाल उसे मूर्खतापूर्ण लगा। तनिक अचरज से बोला - “कैसी बात कर दी अंकल आपने? ओरिजनल हार्न की आवाज से कोई हटता है? इसमें तो तेज आवाजवाला ‘लाउड हार्न’ लगाना ही पड़ता है। ऐसा कि दो किलो मीटर आगे जानेवाला भी सुन ले और हट जाए।”

मेरे ‘दुर्जन’ का अभीष्ट पूरा हो चुका था। जैसे कोई ‘परम ज्ञान’ मिल गया हो, इस तरह उपकृत मुद्रा में उसे धन्यवाद दिया और अपना सयानापन जताते हुए सलाह दी - “वाह! यार नीलेश! क्या बात कही! मजा आ गया। फिर भी, अपना ध्यान रखना भई। कहीं, कुछ ऊँचा-नीचा न हो जाए।” मेरी अनदेखी करते हुए, लापरवाही से ‘थैंक्यू अंकल’ कहते हुए वह, जिस तरह दनदनाता घर के दरवाजे पर आया था, उसी तरह, दनदनाते हुए अन्दर चला गया।

मैंने उसके पिता की ओर देखा। उनकी दशा देखकर मेरा ‘दुर्जन’ भी परास्त हो गया।

मेरा काम तो पहले ही चुका था। रही बात उनके बातों के जवाब की? तो यह काम उनका बेटा मुझसे बेहतर ढंग से कर चुका था।  

भ्रष्टाचार से मुक्ति : पहले आप

“माननीय बैरागीजी! यूपीए सरकार के टू जी, थ्री जी, सी डब्ल्यू जी, कोलगेट जैसे घपलों और भ्रष्टाचार पर आपकी क्या राय है? कृपया बताने का कष्ट करें।”

विधान सभा चुनावों के दौरान 2013 में यह सवाल मेरे उन कृपालु ने (फेस बुक पर) पूछा था जो आयु में मुझसे छोटे हैं। एक तो आयु और दूसरे उनकी संस्कारशीलता। इसलिए वे मेरा बहुत लिहाज करते हैं और शायद इसीलिए यह सवाल मुझसे आमने-सामने नहीं पूछ सके होंगे। इसका समानान्तर सच यह है कि मुझे वे मुझसे बेहतर मनुष्य लगते हैं इसलिए मैं उनका लिहाज करता हूँ और इसीलिए मैं भी आमने-सामने उत्तर नहीं दे पाया। फेस बुक पर ही दे पाया। (वैसे भी, जिस मंच पर सवाल पूछा गया हो, जवाब भी उसी मंच पर दिया जाना चाहिए।)

सवालों की सापेक्षिकता मुझे हर बार पेरशान करती है। हमारे राजनेताओं और राजनीतिक दलों के व्यवहार की विसंगतियाँ और विराधोभास सदैव ही मुझे आकर्षित करते रहे हैं। अब भी करते ही हैं। कथनी और करनी में अन्तर कौन राजनेता और कौन राजनीतिक दल नहीं करता? किन्तु यह संयोग ही है कि केवल भाजपाई, भाजपा और संघ परिवार ही आदर्शों का बघार सबसे ज्यादा लगाते हैं और खुद के सिवाय बाकी सबको भ्रष्ट, बेईमान और अराष्ट्रवादी साबित करने को उतावली बरतते हैं। सो, उनकी विसंगतियों और विरोधाभासों पर बारीक-बारीक चुटकियाँ लेते रहता हूँ। मेरे इन कृपालु को मेरी ऐसी हरकतें पसन्द नहीं आतीं। इसीलिए उन्होंने मुझे घेरने की यह कोशिश की। 

मुझे अच्छा भी लगा और उनकी मासूमियत पर हँसी भी आई। मैंने सहज भाव से जवाब दिया - “यूपीए सरकार के टू जी, थ्री जी, सी डब्ल्यू जी, कोलगेट जैसे घपलों और भ्रष्टाचार पर मेरी राय बिलकुल वही है जो एनडीए सरकार के कार्यकाल में और भाजपा शासित राज्य सरकारों के कार्यकाल में हुए घोटालों, घपलों और भ्रष्टाचार पर रही है। मेरी इस राय पर आपकी राय क्या है, यह जानने की उतावली मुझे बनी रहेगी। कृपया याद रखकर सूचित अवश्य करें।”

मैं जानता था कि उनकी राय मुझे कभी नहीं मिलेगी। मिल भी नहीं सकती थी। इस सवाल-जवाब (और मेरे अनुत्तरित सवाल) के बाद उनसे दो-तीन बार मुलाकात हुई। उनकी दशा देखकर मैं दुःखी हो गया। वे एक बार भी सहज और सामान्य होकर नहीं मिले। बात करते हुए वे ‘नत दृष्टि’ रहे। ऐसा मैंने कभी नहीं चाहा था।

केवल भ्रष्टाचार-घपलों को लेकर ही नहीं, प्रायः प्रत्येक अनुचित के प्रति हमारा, ऐसा सापेक्षिक दृष्टिकोण और व्यवहार ही हमारे मौजूदा संकटों का एकमात्र कारण लगता है मुझे। भ्रष्टाचार केवल भ्रष्टाचार होता है। अनुचित केवल अनुचित होता है। उसके प्रति सापेक्षिक दृष्टिकोण और व्यवहार बरतना अपने आप में भ्रष्टाचार और अनुचित है - ऐसी मेरी सुनिश्चित धारणा है। ऐसे सवाल पूछकर हम क्या जताना चाहते हैं? या तो यह कि चूँकि मेरे पूर्ववर्तियों/विरोधियों ने भ्रष्टाचार और अनुचित किया है इसलिए मुझे भी भ्रष्टाचार और अनुचित करने दिया जाए या फिर यह कि इसी तर्क पर मेरे भ्रष्टाचार, मेरे अनुचित की अनदेखी की जाए, उसे सहजता से स्वीकार किया जाए और उसकी अनदेखी की जाए। 

यह सापेक्षिक दृष्टिकोण मेरे गले नहीं उतरता। मेरा नियन्त्रण केवल मुझ पर है। सामनेवाले को तो छोड़ दीजिए, मेरी उत्तमार्द्ध और मेरे बच्चों पर भी मेरा नियन्त्रण नहीं है। ऐसे में, जो भी करना है, मुझे ही करना है और मुझ से ही करना है। सामनेवाले के अनुचित को, भ्रष्टाचार को मैं तभी अनुचित और भ्रष्टाचार साबित कर पाऊँगा जब मैं खुद भ्रष्टाचार और अनुचित नहीं करूँ। यदि मैं भी उसके जैसा ही करता हूँ तो उसमें और मुझमें फर्क ही क्या है? उसके भ्रष्टाचार, उसके अनुचित को मैं कैसे गलत कह सकूँगा और कैसे उसका विरोध कर सकूँगा?

यदि हम सचमुच में सदाचारी, स्वच्छ देश और समाज चाहते हैं तो इसकी शुरुआत हमें खुद से ही करनी पड़ेगी। लेकिन हमारे तमाम नेता, तमाम राजनीतिक दल और उनके तमाम अन्ध-समर्थक इसका ठीक उलटा कर रहे हैं। वे दूसरे को सुधारने में दिन-रात लगे हुए हैं। वे या तो जानते नहीं या फिर जानबूझ कर जानना नहीं चाहते कि वे कभी सफल नहीं हो सकेंगे। यदि सामनेवाले को सुधरना होता तो आपके कहने की प्रतीक्षा करता? खुद ही सुधर जाता।

वे (और हम) सब जानते हैं कि सुधार की शुरुआत खुद से ही की जानी चाहिए। लेकिन उसके लिए अत्यधिक आत्म-बल, दृढ़ इच्छा शक्ति आवश्यक होती है। इसमें परिश्रम भी अधिक करना पड़ता है और काफी-कुछ छोड़ना पड़ता है। दूसरे को बिगड़ा हुआ कहना, उसे कटघरे में खड़ा करना, उसकी खिल्ली उड़ाकर उसकी अवमानना करना अधिक आसान और मजेदार होता है। सो, सब (‘सब’ याने हम सब) यही कर रहे हैं।

सुधरना तो सब चाहते हैं किन्तु बड़ी विनम्रता, शालीनता और संस्कारशीलता से कह रहे हैं - “हुजूर! पहले आप।” 

ऐसे मिलती है रेल

यह 1984 से 1989 के काल खण्ड की बात है। दादा (श्री बालकवि बैरागी) लोकसभा सदस्य थे। माधवराजी सिन्धिया केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में रेल्वे राज्य मन्त्री थे। गोरखपुर-बान्द्रा-गोरखपुर के बीच इन दिनों चल रही ‘अवध एक्सप्रेस’ तब कोटा तक ही आती थी। कोटा से रतलाम तक के अंचल के लोग इसे रतलाम तक बढ़ाने की माँग कर रहे थे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। दादा के संसदीय क्षेत्र मन्दसौर का एक बड़ा हिस्सा इस रेल खण्ड से जुड़ा हुआ था। दादा भी चाहते थे कि अवध एक्सप्रेस रतलाम तक बढ़ जाए और उनके क्षेत्र के हजारों लोगों को गोरखपुर-मुम्बई के लिए रेल सुविधा मिल जाए।

दादा बार-बार पत्र लिखते और हर बार उन्हें रटा-रटाया उत्तर मिल जाता। कभी प्रशासनिक कारणों से, कभी तकनीकी कारणों से, कभी परिचालन के लिए अनुकूल न होना बताते हुए तो कभी आवश्यक व्यवसाय न मिलने की बात कह कर असर्थता जता दी जाती। ऐसे बाठ-दस पत्र दादा के पास इकट्ठे हो गए थे।

एक बार, दिल्ली जाने के लिए दादा को रतलाम से रेल में बैठना था। मैं अपने कुछ मित्रों के साथ स्टेशन पर उनसे मिलने गया। मेरे मित्रों में दो मित्र श्री बाबूलाल वर्मा और श्री ओम प्रकाश शर्मा भी शामिल थे। दोनों ही रेल कर्मचारी थे। रेल मण्डल कार्यालय में पदस्थ थे और रेल कर्मचारियों के संगठन के प्रभावी कार्यकर्ता थे। बातों ही बातों में दादा ने तनिक झुंझलाहट से सारी बात बताई। सुन कर ओमजी ने कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है। अवध को रतलाम तक बढ़ाया जा सकता है। दादा चौंके। विस्तार से पूछताछ की। ओमजी ने कहा - ‘हम लोग कुछ कागज तैयार करके विष्णु भैया को दे देंगे और इन्हें सारी बात समझा देंगे। कागज मिलने पर आप इनसे बात कर लेना।’ दादा को विश्वास नहीं हुआ। मुझे भी नहीं हुआ। लेकिन ओमजी का कहा मानने में नुकसान भी कुछ नहीं था।

दादा को विदा करने के बाद, उसके ठीक बादवाले रविवार को वर्माजी और ओमजी ने मुझे बुलाया। वे दोनों रतलाम रेल मण्डल का ‘वर्किंग टाइम टेबल’ लिए बैठे थे। यह टाइम टेबल रेल परिचालन से जुड़े कर्मचारियों (यथा रेल चालक, गार्ड, नियन्त्रक आदि) के लिए होता है जिसमें रेलों की गति, कब-कहाँ किन ट्रेनों का क्रासिंग होगा, यात्रा मार्ग के किस खण्ड में कौन सा परिचालन निर्देश प्रभावी होगा जैसी जानकारियाँ होती हैं। हम तीनों, रेल मण्डल कार्यालय के ठीक सामने स्थित के सर्किट हाउस में बैठे। कोई 6 घण्टों के निरन्तर परिश्रम से इन दोनों मित्रों ने रतलाम से कोटा के बीच, प्रत्येक स्टेशन पर रुकनेवाली यात्री गाड़ी का वर्किंग टाइम टेबल बना कर दे दिया। टाइम टेबल के अनुसार रतलाम-कोटा भाग के लोगों को अवध एक्सप्रेस का कनेक्शन सुनिश्चित था। टाइम टेबल मुझे थमा कर दोनों ने मुझे वह ‘गुरु-ज्ञान‘ दिया जो मुझे दादा को बताना था।

मैंने कागज दादा को भेजे। कागज मिलते ही दादा ने मुझे फोन किया। वर्माजी और ओमजी ने जो कुछ मुझे समझाया था, वह मैंने ज्यों का त्यों दादा को सुना दिया और दोनों की हिदायत भी सुना दी - ‘माधवरावजी चाहे जो कहें, चाहे जो कहें, आपको एक ही बात कहनी है कि अवध एक्सप्रेस को रतलाम तक बढ़ाने की अपनी माँग आप वापस लेते हैं और आपका काम, कोटा में अवध एक्सप्रेस मिलानेवाली एक ‘लिंक ट्रेन’ से चल जाएगा।’

चौथे दिन दादा का फोन आया। वे रोमांचित थे। उन्होंने जो कुछ सुनाया वह अपने हमारे ‘लोकतन्त्र‘ की दारुण-दशा उजागर करता है।

दादा ने जो कुछ कहा वह कुछ इस तरह था -

माधवरावजी से समय लेकर उनसे मिलने गया। कहा कि अवध को रतलाम तक बढ़ाना तो मुमकिन है नहीं। इसलिए मैं अपनी वह माँग वापस लेता हूँ। आप बस! इतना कर दीजिए कि कोटा में अवध का कनेक्शन देने/लेने के लिए रतलाम-कोटा के बीच एक ‘लिंक ट्रेन’ दे दीजिए। आपकी और रेल प्रशासन की सुविधा के लिए मैं सम्भावित ‘वर्किंग टाइम टेबल’ भी तैयार करके लाया हूँ। यह कहते हुए मैंने अपना पत्र और वर्किंग टाइम टेबल माधवरावजी को थमा दिया।

माधवराजी ने कागज पलटे और ठठा कर हँस पड़े। बोले - ‘बैरागीजी! इस बार आप नींव के पत्थरों से बातें करके आये हैं। लग रहा है कि आपकी इमारत बन ही जाएगी।’ कह कर उन्होंने रेल्वे बोर्ड के चेयरमेन से फोन पर बात की। थोड़ी देर में चेयरमेन आ गए। माधवरावजी ने मेरे दिए कागज उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा - ‘अवध एक्सप्रेस को रतलाम बढ़ाने की अपनी माँग बैरागीजी ने छोड़ दी है। कह रहे हैं कि उनका काम तो एक लिंक ट्रेन से ही चल जाएगा। वर्किंग टाइम टेबल साथ लेकर आए हैं। आप देख लीजिए।’ 

चेयरमेन साहब ने कागज लिए। उन्हें पाँच-सात बार पलटा। वर्किंग टाइम टेबल को बार-बार देखा। अच्छे भले वातानुकूलित दफ्तर में भी उनके ललाट पर पसीना छलक आया। वे अपनी असहजता छुपा नहीं पाए। बड़ी मुश्किल से बोले - ‘सर! अपन लिंक ट्रेन कैसे दे सकते हैं? अपने पास एक्स्ट्रा रेक है कहाँ? इसके बजाय तो अवध को रतलाम तक बढ़ा देते हैं। अवध दोपहर में कोटा पहुँचती है और अगले दिन जाती है। रात भर कोटा में ही खड़ी रहती है।’ 

कुछ इस तरह कि मानो अपनी मर्जी के खिलाफ, मजबूरी में कोई समझौता कबूल कर रहे हों, माधवरावजी बोले - ‘इन्हें तो अवध चाहिए ही नहीं थी। ये तो लिंक ट्रेन माँगने आये थे। लेकिन आप इंकार कर रहे थे। कोई बात नहीं। आपकी बात मान लेते हैं। अवध को रतलाम तक बढ़ा देते हैं। नोट शीट भिजवा दीजिए और बैरागीजी को आप खुद ही कह दीजिए कि आप अवध को कोटा से रतलाम तक बढ़ा रहे हैं।’

रेल्वे बोर्ड के चेयरमेन की शकल देखने लायक हो गई थी। वे न तो माधवरावजी से नजरें मिला पा रहे थे और न ही मुझसे। बड़ी मुश्किल से, मुझसे मुखातिब हुए और बोले - ‘सर! आप बेफिक्र रहिए। ऑनरेबल मिनिस्टर साहब के आदेश के मुताबिक हम जल्दी ही अवध को रतलाम तक एक्सटेंण्ड कर देंगे।’ मैंने कहा - ‘अब तो देर होनी ही नहीं चाहिए। वर्किंग टाइम टेबल बना-बनाया आपके हाथों में है और आवश्यक निर्देश मन्त्रीजी ने दे ही दिए हैं। अब देर किस बात की?’ चेयरमेन साहब का गला सूख गया था। खँखार कर बोले - ‘सर! बहुत सारी बाते हैं। बट आई होप, विदइन ए मन्थ अवध रतलाम पहुँच जाएगी।’

मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अवध रतलाम तक बढ़ा दी गई है। स्थितियों में कहीं कोई अन्तर नहीं आया था। जो-जो कारण इंकार करने के आधार बताए गए थे वे सब जस के तस थे। लेकिन एक सेकण्ड में अवध रतलाम तक बढ़ा दी गई।

अब बाकी बातें आप खुद समझ लें। लेकिन कहानी का एक ‘ट्विस्ट’ अभी भी बाकी है।

जिस दिन अवध पहली बार रतलाम आई थी, उस दिन माधवरावजी खुद अवध में आये थे। रतलाम रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर 4 पर अच्छा-खासा जलसा हुआ। अपने ओजस्वी भाषण में माधवरावजी ने कहा कि अवध एक्सप्रेस को कभी का रतलाम तक बढ़ा दिया जाता लेकिन अब तक रतलाम में इसका वाशिंग प्लेटफार्म नहीं बना था। अब बन गया है तो अवध को रतलाम तक बढ़ा दिया गया है।

हकीकत यह थी जब माधवरावजी यह कारण बता रहे थे, उस क्षण तक रतलाम में अवध के लिए वाशिंग प्लेटफार्म बना ही नहीं था।

बूझिए कि अवध एक्सप्रेस को कोटा से रतलाम तक किसने बढ़ाया।

यन्त्रणा से मुक्ति

सोलह महीनों से अधिक हो गए मुझे तेजाब की नदी में तैरते-तैरते। अज्ञात अपराध-बोध से आकण्ठ ग्रस्त रहा इस दौरान। अपनी आस्थाओं, अपने मूल्यों, अपने विश्वास से विश्वास ही उठ गया था मेरा। ‘भलमनसाहत’, ‘नेकी’ जैसे जुमले मेरा मुँह चिड़ाते लगते रहे मुझे इस दौरान। दशा यह हो गई थी कि अपने आदर्शों, अपने  आशावाद पर मुझे शर्म आने लगी थी। खुद से ही नजरेें मिला पाना मुमकिन नहीं रह गया था। ये सोलह महीने मैं कैसे जी लिया? ताज्जुब है मुझे। लगा था कि अब शेष जीवन मुझे इसी तरह रहना है। निश्चय ही ईश्वर की कृपा मुझ पर बनी रही जो मैंने बुद्धि की बात नहीं सुनी। विवेक नियन्त्रित किए रहा और मैं आत्महत्या करने के, ईश्वर के प्रति अपराध से  बच गया। 

कोई एक सप्ताह पहले जब हकीकत मालूम हुई तो खुद से नजरें मिला पाया। सब कुछ पल भर में तिरोहित हो गया। मैं हलका हो गया। कुछ ऐसा और इतना मानो अन्तरिक्ष में भारहीनता की दशा में तैर रहा हूँ।

सन् 2007 की दूसरी छःमाही में उनसे सम्पर्क हुआ था। पहली ही मुलाकात में उन्होंने, सीधे-सीधे नहीं, भरपूर घुमाव देकर दो बातें जता दी थीं। पहली - वे मुझसे सम्पर्क बनाना, बढ़ाना और बनाए रखना चाहते हैं। दूसरी - उनकी आर्थिक हैसियत बहुत अच्छी नहीं है। पहली बात मैं नहीं जानता था। दूसरी जानता था-उनके जताने से पहले ही। आर्थिक हैसियत मेरे लिए कभी कोई समस्या या विषय नहीं रही। मैंने सातवीं कक्षा तक, दरवाजे-दरवाजे जाकर, मुट्ठी-मुट्ठी आटा माँगा है। 1991 में एक बार फिर भिक्षा वृत्ति की कगार पर आ खड़ा हुआ था। मित्रों ने सम्हाल लिया। सो, आर्थिक हैसियत मेरे लिए कभी मुद्दा रही ही नहीं। इसलिए उनसे सम्पर्क बनाने, बढ़ाने और बनाए रखने में मुझे कहीं कोई असुविधा नहीं हुई।

कोई छः महीनों बाद ही, मार्च 2008 में उनकी बेटी का ब्याह तय हो गया। उनकी बातों से लगा कि वे मुझसे कुछ अधिक और अतिरिक्त की अपेक्षा रखते हैं। ईश्वर ने हमें बेटी नहीं दी। इसी भावना के अधीन मैंने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर उनकी सहायता की। खुद से और खुद के सार्वजनिक सम्मान से अधिक चिन्ता उनकी और उनके सार्वजनिक सम्मान की की। चूँकि यह सब मैंने स्वेच्छा से ही किया था, सो यह खुद के सिवाय किसी और पर उपकार नहीं था। मेरे इस अति उत्साह से मेरे परिजन और मित्र विस्मित थे। वे मुझे बार-बार और निरन्तर रोकते-टोकते रहे। लेकिन मैं नहीं रुका। अपने मन की करता रहा। करके ही रहा। अपने परिजनों और मित्रों की नाराजी झेलकर यह सब किया मैंने। कुछ लोग तो अब तक नाराज हैं मुझसे।

सब कुछ राजी-खुशी, सानन्द, सोल्लास, निर्विघ्न निपट गया। बेटी, बाप के घर से अपने घर चली गई। मैं बहुत ही खुश था। मुझे किसी अच्छे काम में भागीदार होने का सौभाग्य दिया था ईश्वर ने।

सब कुछ ठीक-ठीक ही चल रहा था। पानी ठहरा हुआ था। सब कुछ धीर-गम्भीर, शान्त, आनन्ददायी।

किन्तु वक्त एक जैसा नहीं रहता। मार्च 2013 में एक दिन अचानक उन्होंने मुझे, मेरे ही घर में, मेरी उत्तमार्द्ध के सामने मुझे जी भर कर कोसा, उलाहने दिए, डाँटा-फटकारा। कोई बीस-पचीस मिनिट तक मेरी लू उतराई का समापन यह कह कर किया कि इन पाँच बरसों में उन्होंने हम लोगों को ‘अच्छी तरह से देख लिया’ और अब वे हमसे ‘भर पाए।’ 
मेरे लिए कुछ भी समझ पाना मुमकिन नहीं हो रहा था। मानों, बस! उन्हें कहना था। कह गए। 

वह दिन और कोई सप्ताह भर पहले तक का दिन। मैं, मैं नहीं रह गया। मुझे कोई कारण नजर नहीं आ रहा था कि वे मुझे यह सब सुना जाएँ। किसी भी स्त्री के लिए अपनी उपस्थिति में अपने पति की अवमानना देखना-सुनना सहज-सम्भव नहीं होता। सो, मेरी उत्तमार्द्ध मुझसे अधिक हतप्रभ, दुःखी, खिन्न, अप्रसन्न, आक्रोशित।

इन सोलह महीनों में मैं सचमुच में मानो जिन्दा लाश बन कर रह गया। अपने आप से नफरत हो गई। अज्ञात अपराध बोध चौबीसों घण्टों मन पर छाया रहा। परिजनों-मित्रों की नाराजी मोल लेकर की गई उनकी सहायता पर पछतावा होने लगा। तय कर लिया कि अब किसी की सहायता नहीं करनी। भाड़ में गई भल मनसाहत। भाड़ में गई नेकी। किसी का भला करने का जमाना नहीं रहा। पूरी दुनिया और अपना जीवन व्यर्थ लगने लगा। घर से बाहर तभी निकलना जब मजबूरी हो। न किसी से मिलने को मन हो न किसी उत्सव समारोह में जाने का। 

लिखना-पढ़ना लगभग ठप्प ही हो गया। (अन्तिम ब्लॉग पोस्ट 03 मई 2013 को लिखी थी।) किसी से बात करने की इच्छा न हो। कोई मिलने आए तो उससे मिलने को जी न करे। एलआईसी दफ्तर जाना मजबूरी। लेकिन जाने का मन न करे। जाऊँ तो सबसे इस तरह नजरें चुराऊँ मानो मैंने सबका कोई बहुत बड़ा नुकसान कर दिया हो। 

मैं अपनी जगह दुःखी और मेरी चिन्ता करनेवाले मुझसे अधिक दुःखी। जब मुझे ही कुछ समझ नहीं पड़ रहा हो तो  मैं औरों को क्या बताऊँ, क्या समझाऊँ? मेरे ब्लॉग गुरु श्री रवि रतलामी सबसे ज्यादा कुपित। मेरा लिखा हुआ पढ़ने को बेचैन रहनेवाला धर्मेन्द्र रावल लगभग रोज ही फोन करे - ‘कब तक निहाल हुए बैठे रहोगे। लिखना शुरु किया? नहीं किया? कब करोग? जल्दी करो।’ एलआईसी में मेरी चिन्ता करनेवाले राकेश कुमारजी समझा-समझा कर थक गए। जाने-अनजाने अनगिनत कृपालु लगातार पूछताछ करते रहे। अब भी कर रहे हैं। 

लेकिन जिस तरह मार्च 2013 में वक्त नहीं ठहरा। उसी तरह अभी-अभी कोई सप्ताह भर पहले ही वक्त फिर चंचल हो गया। 

‘उनके’ एक परिजन अकस्मात आए। उन्हें मालूम पड़ा तो दुःखी हो गए। उन्होंने बताया कि मेरी लू उतारनेवाले कृपालु अपनी आर्थिक दशा को लेकर सदैव हीनता-बोध से ग्रस्त रहते हैं। आर्थिक सन्दर्भों में उन्हें, जो भी उनसे तनिक बेहतर मिलता है, वे मान लेते हैं कि सामनेवाला उनका हक मारकर उनसे बेहतर बन गया है। आर्थिक सन्दर्भों में वे सदैव अतिरिक्त चौकन्ने और उग्र रहते हैं। इसी कारण उनकी उत्तमार्द्ध अपने माता-पिता की सम्पत्ति में से कुछ प्राप्त करने के लिए अपने भाइयों के साथ मुकदमेबाजी भी कर चुकी है। उनके इन परिजन ने जो बताया उससे लगा कि मैं बाकी सबसे अधिक अभागा रहा। 

उनकी बेटी के विवाह में मेरी भूमिका की, उनके परिजनों ने बड़ी प्रशंसा की। जब भी, कभी भी, किसी के भी सामने उनकी बेटी के विवाह की चर्चा हुई, तब-तब हर बार मेरी मुक्त-कण्ठ प्रशंसा हुई। उनके इन परिजन ने बताया - ‘आपकी प्रशंसा से वे उकता गए, अघा गए और अपनी आदत के मुताबिक इस सबको अपनी बेइज्जती मान बैठे और आपको निपटा गए।’ लेकिन ये परिजन यहीं नहीं रुके। उन्होंने अगली बात जो बताई वह मेरे लिए सर्वथा अकल्पनीय थी। इन परिजन ने बताया कि जैसा मेरे साथ किया गया उतना तो नहीें किन्तु कुछ-कुछ वैसा ही वे अन्य लोगों के साथ भी कर चुके हैं। जैसे ही उन्हें लगता कि जिन्होंने उनकी मदद की है उनके यहाँ कोई ऐसा प्रसंग आनेवाला है जिसमें उन्हें व्यवहार निभाना पड़ेगा। तो वे (इस व्यवहार निभाने में आनेवाले आर्थिक वजन से बचने के लिए) सामनेवाले से ‘तुम हमारे लिए मर गए और हम तुम्हारे लिए’ की सीमा तक झगड़ा कर लेते हैं। फिर, जैसे ही सामनेवाले के यहाँ प्रसंग पूरा हुआ नहीं कि महीने-बीस दिनों के बाद जाकर माफी माँग लेते हैं।

इन परिजन ने बताया - ‘उनकी बेटी के विवाह में आपने जो कुछ किया उसे वे कैसे भूल सकते हैं? लेकिन जैसा और जितना आपने किया, वह सब, वैसा का वैसा कर पाना उनके लिए, कम से कम आज तो सम्भव नहीं। उन्हें पता है कि आपके छोटे बेटे का विवाह कभी भी हो सकता है। तब वे क्या करेंगे? यही सोच कर उन्होंने आपको निपटा दिया होगा और आपसे भर पाए होंगे। आप देखना, आपके छोटे बेटे के विवाह के महीना-बीस दिन बाद वे आकर आपसे माफी माँग लेंगे।’ 

पता नहीं, इन परिजन ने कितना सच कहा। लेकिन ऐसी कुछ बातें मैं पहले भी सुन चुका था। उनका साला खुद आकर, उसके साथ हुए ऐसे ही दो-एक किस्से मुझे सुना गया था। इन परिजन की इन बातों ने मानो मुझे मेरी जिन्दगी लौटा दी। मुझे पहली बार अपने निर्दोष होने की प्रतीति हुई। मैं हलका हो गया। बहुत हलका। अन्तरिक्ष में भारहीनता की स्थिति में तैरता हुआ। अब मैं खुद से नजरें मिला पा रहा हूँ। मुझे भोजन में स्वाद आने लगा है। मुझे लग रहा है मानो मैं अभी, पाँच-सात दिन पहले ही पैदा हुआ हूँ।

इन परिजन से बात होने के अगले ही क्षण से मैं जड़ से चेतन हो गया था। उसी दिन से लिखना शुरु कर सकता था। किन्तु जानबूझकर रुक गया।

आज गुरु पूर्णिमा है। अपने ब्लॉग गुरु श्री रवि रतलामी को आज के दिन मैं अपनी इस शुरुआत से प्रणाम कर रहा हूँ। वे निश्चय ही प्रसन्न होंगे और मुझे क्षमा कर, मेरा यह प्रणाम स्वीकार करेंगे। राकेश कुमारजी को भी मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरी चिन्ता मुझसे अधिक करते हैं। उन्हें भी अच्छा लगेगा। वे मुझ पर कुपित तो नहीं किन्तु मुझसे खिन्न अवश्य हैं। यह शुरुआत उनकी इस खिन्नता को कम करेगी, यह आशा करता हूँ।

और रहा धर्मेन्द्र! तो तय है कि यह पोस्ट पढ़ते ही उसका फोन आएगा। कहेगा -‘बहुत हो लिए निहाल। अब लिखते रहना।’