महिलाएँ: पूर्वी जर्मनी की और भारत की


'बर्लिन से बब्‍बू को'- पहला पत्र - चौथा हिस्सा

यूरोप शब्द से ही हमारे यहाँ स्वच्छन्द सेक्स का अर्थ लिया जाता है। पर इस देश में इतना घूमने के बाद अभी तक हम लोगों ने एक भी महिला शराब में धुत्त या अर्ध नग्न नहीं देखी। खुले गले या खुली पीठ के कपड़े नहीं देखे। सड़कों पर लिपटे-चिपटे जोड़े या युगल नहीं नजर आते। कहीं कोई चूमा चाटी का दृश्य नहीं दिखाई पड़ा। महिलाएँ इस देश में 56 या 58 प्रतिशत हैं। पुरुषों का प्रतिशत कम है। यह युद्ध का अभिशाप है। पर नारी के प्रति पर्याप्त आदर इस समाज में है। किसी भी महिला को गहनों से लदी-फँदी नहीं देखी। एकाध अँगूठी किसी की ऊँगली में है तो अच्छा, नहीं तो नहीं। नाक, कान, हाथ, गले पहुँची, टखने सब बिना गहनों के। पत्थरों या बारीक मोतियों की या फिर ऊलजलूल धातुओं या डोरों की मालाएँ इधर की कम उम्र की लड़कियाँ पहन लेती हैं। पर वे भी नहीं के बराबर। पुरुष कोई गहना नहीं पहनते। जीवन के हर क्षेत्र में नारी आगे है। ट्राम चलाना, बस चलाना, हवाई अड्डा, फैक्ट्री, स्कूल, होटल, घर, जहाज, खेत सब कुछ नारी पूरी दबंगता से सम्हालती है। स्कूलों में उनका साम्राज्य है। खुलकर सिगरेट पीना और भोजन के समय शराब और बीयर पीना उनके लिये सामान्य बात है। खूब ठठाकर हँसना, विनोद करना और जीवन को पूरी जिम्मेदारी और उमंग से जीना यहाँ की जीवन पद्धति है। समाजवाद से आगे बढ़कर अब यह देश साम्यवाद की ओर चल पड़ा है।

पूरे देश में निरक्षरता का कोई दाग नहीं है। हर व्यक्ति पढ़ा लिखा है। पढ़ाई पूरी मुफ्त है। रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और चिकित्सा सहज सुलभ है। शिक्षा और अस्पताल सबको फ्री है। बीमारी का डर इतना है कि यदि आप मात्र संकेत कर दें कि आज कुछ तबीयत गड़बड़ है, बस! आप सीधे अस्पताल पहुँचा दिये जायेंगे। आपकी जाँच पड़ताल कोई 10-12 डॉक्टर करेंगे और इतनी विकट करेंगे कि आपको वे हर तरह बीमार सिद्ध करके छोड़ेंगे। और अस्पताल से छुट्टी? आपकी मर्जी से नहीं। डॉक्टर कहेगा तब आप मुक्त होंगे। आप पर हजारों रुपये खर्च कर देंगे। साधारण सर्दी या जुकाम का इलाज भी यहाँ राष्ट्रीय स्तर पर होता है।

सौन्दर्य, प्रणय व विवाह पर मैं बहुत थोड़े से कुछ कहूँगा। नारी यहाँ प्रायः  गोरी चमड़ी वाली तो है ही पर न उसके पास उत्तेजक सौन्दर्य है न वह मादक व माँसल। स्वप्निल तो है ही नहीं। वह ललना, बाला, रमणी, रम्भा, सुन्दरी, रूपसी, रूपा, कमनीया या कोमलांगी नहीं है। ऐसा सौन्दर्य नहीं देखा कि देखते ही आग लग जाये। मेरा अनुमान है कि औरत तब ही औरत होती होगी जबकि वह या तो शादी करे या पुरुष के साथ संसर्ग करे या पिर बच्चा जने। इन तीन स्थितियों के सिवाय यहाँ औरत एक भरपूर पुष्ट शरीर और वर्कर है। ऊँचाद्व पूरा शरीर, बेहद मोटे नितम्ब और भरे पूरे स्तन, भद्दी मोटी पिण्डलियाँ और भागती सी चाल। निर्द्ंद्व, निस्संकोच और निश्चिन्त है यहाँ की नारी। पुरुष से किसी क्ष्ोत्र में पीछे नहीं। हर जगह आगे और तनाव रहित। खुद कमाती है, खुद पूर्णतया सुरक्षित है।

शादी भी, तलाक भी
विवाह अमूमन शनिवार को होता है। पहिले गिरजाघरों में होते थे पर समाजवादी समाज रचना में गिरजा का स्थान चुपचाप रजिस्ट्रार ने ले लिया। शादी के लिये नगरपालिका सादा समारोह करती है। धूमधाम वाली बात नहीं। 10-15 लोग कुल आमन्त्रित होते हैं। चार-चार, पाँच-पाँच माह पहले रजिस्ट्रार से तारीख माँगना होती है। पर यदि शनिवार का मोह नहीं हो तो फिर कभी भी शादी हो सकती है। शनिवार और रविवार यहाँ सम्पूर्ण छुट्टी के दिन होते हैं। इसलिये शादी में सुविधा होती है। पर गिरजाघर में भी शादी होती ही है। कैथोलिक ईसाईयों के गिरजे यहाँ प्रोटेस्टेण्ट ईसाईयों की तुलना में कम हैं और उन्हें उतना सामाजिक या शासकीय आदर भी प्राप्त नहीं है। प्रोटेस्टेण्ट चूँकि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सन्तुलन बनाते-बिगाड़ते हैं इसलिये उनका पूरा ध्यान रखा जाता है। तलाक यहाँ बहुत आसान है। मियाँ-बीबी की नहीं बनी तो अलग हो गये। कोई शिकायत नहीं। बच्चे यदि माँ के साथ हैं तो खर्चा पिता देगा और यदि पिता के साथ गये तो माँ खर्चा देगी।

सेक्स माने, फूहड़ता नहीं
उन्मुक्त प्रणय का कोई फूहड़ दृष्य अभी तक मैंने नहीं देखा पर एक स्कूल में प्रश्न का सीधा उत्तर आया कि कोई 20 प्रतिशत बच्चे अपने स्कूली जीवन में ही यौन सम्बन्ध या प्रणय व्यापार कर लेते हैं। फूहड़ता से यह देश स्वयं को कितना बचाता है इसका एक दिलचस्प उदाहरण अगली घटना है। शाम को कोई 6 बजे यहाँ बाजार सामान्यतः बन्द हो जाते हैं। दुकानों पर कोई लोहे के शटर या दरवाजे नहीं होते। दीवाल साईज के बड़े-बड़े शीशे भरपूर प्रकाश में सारी रात अपने भीतर की वस्तुओं को दर्शाते रहते हैं। न कोई चौकीदार न पुलिस। शो रूम की हर चीज इत्मीनान से देखते घूमो। ऐसे में हम लोगों ने देखा कि एक दुकान का पारदर्शी शीशा कपड़े से ढका हुआ है। पर्दे की तरह। हमारी उत्सुकता जागी। पास गये।  बगल के शीशे के भीतर झाँका। देखा कि 5-6 आदमकद नारी मूर्तियाँ बिलकुल नंगी खड़ी हैं। यह शो रूम रेडीमेड कपड़ों का था और ये मूर्तियाँ उसी समय उस दुकान में सजावट के लिए लाई गई थीं। उन्हें जब तक कपड़े नहीं पहिनाये जाते, तब तक शीशे से उनका नग्न प्रदर्शन इस देश की शान के खिलाफ होता। इसलिये बड़ा पर्दा डालकर नग्नता को ढँक दिया गया।

पहला पत्र: पाँचवाँ हिस्सा निरन्तर


‘बर्लिन से बब्बू को’ - पहला पत्र: तीसरा हिस्सा यहाँ पढ़िए।
‘बर्लिन से बब्बू को’ - पहला पत्र: पाँचवाँ हिस्सा यहाँ पढ़िए।


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सत्ताओं से सवाल पूछना ही सच्ची राजनीति है

अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से सार्वजनिक रूप से सवाल करने और काम का हिसाब-किताब जानने की घटनाएँ बढ़ रही हैं। नेताओं-मन्त्रियों को मंच पर या तो चढ़ने ही नहीं दिया जा रहा या चढ़ गए तो बोलने नहीं दिया जा रहा। वे अपने मन की बात कहें उससे पहले लोग अपनी समस्याओं के समाधान के बारे में जवाब चाहते हैं। नेताओं को उल्टे पाँव लौटना पड़ रहा है। नेपानगर विधायक मंजू दादू, मण्डला के सांसद फग्गनसिंह कुलस्ते, खण्डवा सांसद नन्दकुमार सिंह चौहान, मुरैना सांसद अनूप मिश्रा, प्रदेश के नए-नए राज्य मन्त्री बालकृष्ण पाटीदार, देपालपुर विधायक मनोज पटेल, शहडोल सांसद ज्ञानसिंह, प्रदेश के खाद्य मन्त्री ओमप्रकाश धुर्वे से जुड़े ऐसे समाचार पढ़ने को मिले। 

ऐसे समाचार पढ़ कर अच्छा लगा। खुशी हुई। इसे व्यंग्य या तानाकशी मत समझिएगा। गम्भीरता से कह रहा हूँ, यह सब पढ़कर खुशी हुई। मुमकिन है, सारे मामलों में नेता गलत और लोग सही न हों। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि ये घटनाएँ राजनीतिक कारणों से नहीं हुईं। लोगों ने अपनी समस्याओं के बने रहने और नेता द्वारा चुनाव के बाद पलट कर न देखने पर नाराजी जताई। नेताओं से सवाल, हिसाब पूछनेवालों में नेताओं की पार्टी के ही लोग थे। लगभग प्रत्येक नेता ने इसे अपने विरोधियों की साजिश कह कर खारिज किया। लेकिन वे जानते थे कि सच क्या है।

यही वास्तविक राजनीति है - ‘अपने निर्वाचित प्रतिनिधि से सवाल पूछना, हिसाब माँगना।’ लेकिन दुर्भाग्य यह कि राजनीति के नाम पर इसे छोड़ कर बाकी सब कुछ हो रहा है। इसीलिए हम अपने ही चुने नेताओं से नफरत करते हैं। उन्हें गालियाँ देते हैं और राजनीति को सबसे गन्दी हरकत घोषित किए बैठे हैं। घोषित कर दिया है - राजनीति में भले लोगों के लिए जगह नहीं है। इसका विलोम सत्य है कि यदि कोई भला, सज्जन, ईमानदार आदमी चुनाव लड़ता है तो उसकी जमानत जप्त हो जाती है। मतदाता मुँह पर कहते हैं - ‘आप भले और ईमानदार आदमी हो। लेकिन आपको जीता कर क्या करेंगे सा’ब? आप तो हमारा कोई काम भी नहीं करा सकोगे।’ यह मैंने अपने कानों सुना। सन्देश साफ था - ‘अपनी ईमानदारी अपने पास रखिए। मेरा स्वार्थ सिद्ध कर सको तो वोट की बात करो।’ 

हमने दलगत राजनीति और सत्ता की राजनीति को राजनीति मान लिया है। यह गलत है। राजनीति सदैव ही शुद्ध, सात्विक और लोकहिताकरी होती है। लेकिन दलगत राजनीति सब मटियामेट कर देती है। सत्ता की राजनीति और कुछ नहीं, दलगत राजनीति का ही विस्तार है।

वास्तविक राजनीति, सत्य और नीति/नैतिकता की राजनीति होती है। गाँधी सत्य की राजनीति के पक्षधर थे और अनीति की राजनीति को पाप कहते थे।

निर्वाचित प्रतिनिधि ‘लोकसेवक’ होते हैं। जब तक विधायी सदन के सदस्य होते हैं, वेतन पाते हैं। ये ‘वेतनभोगी’ हैं। हम इन्हें चुनते हैं इसलिए इनके वेतन का भुगतान हम, जन सामान्य करते हैं। वे हमारे ‘वेतनभोगी सेवक’ हैं। उन्हें अपने स्वामियों के प्रति याने हम निर्वाचकों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। चुनाव जीतते ही, हमसे अपना वेतन लेनेवाला हमारा मालिक बन बैठता है। क्यों? क्योंकि हम अपने वोट की कीमत उससे पहले ही वसूल कर चुके हैं। हमारा यह भ्रष्ट आचरण ही राजनीति को गन्दी, घिनौनी बना देता है। 

यह राजनीति नहीं है। राजनीति होती है - ‘अनुचित का विरोध, प्रतिकार।’ लेकिन दलगत राजनीति इस ‘अनुचित’ की परिभाषा बदल देती है। दलगत राजनीति के चलते हमें ‘अपनेवाले का अनुचित’ कभी भी अनुचित नहीं लगता। हम ‘पार्टी लाइन’ के अन्ध समर्थक बन कर सारे भ्रष्टाचार, झूठ, अनैतिक कृत्य न केवल सहन करते हैं बल्कि उनका समर्थन भी करते हैं। जब ‘भ्रष्टाचार’, ‘उसका भ्रष्टाचार’ और ‘अपना भ्रष्टाचार’ की तराजू पर तुलने लगता है तो फिर सच की राजनीति तो कूड़ेदान में जानी ही है। हमने उसे वहीं फेंक दिया है और क्रन्दन कर रहे हैं। हम श्रेष्ठ पाखण्डी, श्रेष्ठ दोगले लोग हैं।

अपराध केवल अपराध होता है। ‘इसका’ या ‘उसका’ नहीं होता। लेकिन जब लालच, स्वार्थ और सुविधा के लिए पैमाने बदल लिए जाते हैं तो मण्डी में गुनाहगारों का ही मोल बढ़ेगा। 

अचानक ही एक आपबीती याद आ गई।

6 जून को राहुल गाँधी मन्दसौर पहुँचे थे। उसी दिन मैंने जो लिखा था वह सात जून को यहीं, ब्‍लॉग पर भी दिया था। मैंने लिखा था - ‘हर कोई जानता है कि राहुल सत्ता में नहीं है। वे तत्काल कुछ नहीं कर सकते। केवल ढाढस बँधा सकते हैं। यह भी सब जानते हैं कि नेता जितना कहता है, उतना कभी नहीं करता। फिर भी मृतकों के परिजन यदि घण्टों पहले पहुँच कर प्रतीक्षा करते हैं तो इसका एक ही मतलब होता है कि उनकी बात किसी ने सुनी नहीं। वे केवल अपने मन का गुबार निकालना चाहते थे। इसीलिए राहुल जब सामने आए तो उनसे लिपट कर रोने लगे। इन्हें शिवराज का काँधा मिल जाता तो ये राहुल के पास क्यों जाते?’ यह लेख मैंने फेस बुक पर भी दिया था। एक टिप्पणी आई - ‘हे राम ......विलाप ठीक है लेकिन कंधा तो ठीक होना चाहिए 70 साल में किसान की लंगोटी पूरी धोती नहीं बनी साहब।’ यह एक राजनीतिक टिप्पणी थी। मैंने जवाब दिया - ‘बहुत सही कहा। यह संयोग ही है कि इन 70 वर्षों में राज्य के मौजूदा शासकों के 15 वर्ष भी मौजूद हैं। हमने सरकार में बदलाव काहे के लिए किया - हालात में बदलाव के लिए या हालात के दोहराव के लिए?’ उधर से प्रतिप्रश्न आया - ‘क्या सत्ताएँ एक सी सूरत की नहीं होतीं? आपका उत्तर हाँ आता है तो अपने लिए आशीर्वाद मानूँगा और ना आता है तो मैं इस बहस से स्वयं को स्वतः अलग कर लूँगा।’ यह एक सशर्त टिप्पणी थी। जब बात अपनी जवाबदेही पर आए तो ‘आपने अपनी पत्नी को पीटना छोड़ा या नहीं?’ जैसे सवाल पूछना शुरु कर दो। जवाबदेही से मुँह चुराने का यही वह बिन्दु है जहाँ से राजनीति गन्दी और घिनौनी हो जाती है। मैंने जवाब दिया - ‘सत्ताएँ स्वयम् नहीं आतीं। हम उन्हें लाते हैं। जैसे हम हैं, वैसी ही सत्ताएँ हैं। यदि हमें सत्ताएँ एक सी लगती हैं तो यह हमारी राजनीतिक चेतना के स्वर्गवास की सूचना है। सत्ता केवल सत्ता होती है। लेकिन जब वह ‘हमारी’ और ‘उनकी’ में बदल जाती है तो निष्पक्ष दृष्टिकोण की अपेक्षा आत्म वंचना होती है। वस्तुपरक भाव से देखना आसान नहीं है। मैं यह कठिन काम करने की भरसक कोशिश कर रहा हूँ। मेरे लिए सत्ता केवल सत्ता है। चूँकि इसे मैं लाया हूँ इसलिए इसकी सेहतमन्दी मेरी जवाबदारी है। वही निभाने की कोशिश है। ‘वहाँ कौन है?’ इससे पहले मेरी चिन्ता है - ‘वहाँ, वह क्या कर रहा है।’ राजनीति, दलगत राजनीति और सत्ता की राजनीति में बड़ा भेद है। मैं राजनीति में विश्वास करता हूँ और सब इसमें विश्वास करें, इसे जरूरी मानता हूँ।’ इसका जवाब आना ही नहीं था। नहीं आया।

हमारी संसदीय लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का आधार राजनीति है। हम सबको ‘राजनीतिक’ होना ही पड़ेगा। ‘राजनीतिक’ होने का अर्थ ‘राजीतिज्ञ’ होना नहीं हैं। 

राजनीतिक बनना, अपनी आजादी और लोकतन्त्र के प्रति  हमारी जिम्मेदारी है। राजनीति का मतलब है, अपने सेवकों से सवाल पूछना, उनको सौंपे गए काम का हिसाब माँगना और उनकी अनुचित बात/हरकत पर अंगुली उठाना, उन्हें नियन्त्रित करना। वे हमारे वेतनभोगी सेवक हैं। हमारे स्वामी नहीं। 

जिन लोगों ने नेताओं से सवाल पूछ कर अपनी राजनतिक जिम्मेदारी और भूमिका निभाई, उन्हें सलाम। ईश्वर करे, उनका यह आचरण संक्रमण की तरह पूरे देश में फैले।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे, भोपाल, 28 जून 2018

बहुत मँहगा है पूर्वी जर्मनी

'बर्लिन से बब्‍बू को' : पहला पत्र - तीसरा हिस्सा

एक प्राकृतिक विरोधाभास है यहाँ की धरती पर। यहाँ मिट्टी तो है पर धूल नहीं। न कोई गर्द और न कोई गुबार। कपड़े झाड़ने या झटकने की नौबत ही नहीं। जूतों पर ब्रश मार लो। पालिश बेशक 15 दिन में करो। धूप का तो प्रश्न ही त्यौहार की तरह पैदा होता है। पसीना कारखानों में बहता है। सामान्य दिनचर्या में नहीं। सूरज निकल आये तो लोग पुलकित हो उठते हैं। हमेशा बदराया मौसम रहता है।

दायें से चलिये

ट्राफिक नियम बिलकुल उलटे हैं। यहाँ बाँयें चलो वाली स्थिति नहीं है। सदा दायें चलो, कीप राईट। हम लोगों की आदत है बाँये चलने की। हमसे सड़कों पर झुण्ड के झुण्ड टकरा जाते हैं। कारें, बसें, ट्रामें सब दाहिने चलते हैं। फुटपाथों पर भी यही नियम लागू होता है। सड़कों पर पगडण्डी वाली प्रथा यहाँ कतई नहीं होती। आपको सड़क पार करनी है तो वहीं से कर सकेंगे जहाँ उसे पार करने के निशान बने हुए हैं। हम जिस तरह से कन्धे और शरीर रगड़ कर कहीं से भी रास्ता बना लेते हैं वैसा यहाँ असम्भव है। एक ही उदाहरण इसका पर्याप्त है। हमारे सहयात्री श्री शर्मा की नींद रात को कोई 3.30 बजे खुली। वे कमरे की खिड़की में खड़े हो गये। देखा कि दो कारें ट्राफिक के सिगनल पर खड़ी हैं। सारी सड़क सुनसान थी, पर सिगनल पर लाल बत्ती जल रही थी। जब तक हरी बत्ती नहीं जली, वे कारें वहीं खड़ी रहीं। सिगनल मिलते ही चल दी। अनुशासन का चरम होता है ऐसा क्षण। मेरे पाठक इस बात को गप मानेंगे। पर यह सच है कि इस देश में अभी तक हम लोगों ने एक भी कार या बस का हार्न नहीं सुना। कोई हार्न नहीं बजाता। 60-70 किलोमीटर फी घण्टे से कम कोई कार या बस चल ही नहीं सकती। हार्न का प्रयोग बहुत ही अधिक इमर्जेन्सी हो तो किया जाता है। हार्न की बात तो दूर रही पर रोस्तोक जैसे दो लाख की आबादी वाले शहर में कोई कुत्ता भौंकता नहीं सुना। कभी पशु की आवाज नहीं सुनी और न कहीं कोई हाथापाई, गाली-गलौच या कहासुनी का दृष्य ही देखा। अनुशासन के दूसरे उदाहरण हैं होटल और रेस्तराँ। भीतर जब तक कुर्सी खाली नहीं होती, लोग बाहर क्यू बनाए खड़े रहते हैं। कोई उतावलापन नहीं, कोई भीड़ वाली धक्का-मुक्की नहीं, कोई बेसब्री नहीं।

मुझे नाई बनना पड़ा

दिनचर्या हमारी बहुत टाईट है। सुबह 7 बजे से रात 10.30 बजे तक बराबर व्यस्त रहता है पूरा दल। जिन लोगों को बिस्तर में बड़े सबेरे चाय पीने की आदत भारत में थी वे यहाँ एक ही दिन में सुधर गये। कोई बेड टी यहाँ नहीं मिलती। नाश्ता भयंकर मिलता है। शाकाहारी और सामिष दोनों ही तरह के नाश्ता एवम् भोजन की व्यवस्था है। मक्खन, शहद, चीज, पनीर, दूध, दही और फल इतने शुद्ध, ताजा और स्वादिष्ट होते हैं कि बयान नहीं किया जा सकता। शाकाहारी लोगों को असुविधा अवश्य हो जाती है पर वैसी कोई बात नहीं है कि ‘अब क्या होगा?’ बीयर और शराब पानी के बदले पी जाती है। जो मेरी तरह बीयर और शराब भी नहीं लेते, उनके लिये फलों का रस मटके भर-भर कर मिल जाता है। पर जीवस्तर मँहगा और बहुत ऊँचा है। चाय यहाँ भारत और श्रीलंका से आती है। काफी बहुत पी जाती है। काफी का एक प्याला भारतीय हिसाब से 12 रुपयों से कम का नहीं होता। हमारा 3.75 रुपया या 4 रुपये यहाँ के एक मार्क के बराबर होते हैं। यदि मेरे नाश्ते का हिसाब लगाया जाय तो मैं प्रतिदिन सुबह नाश्ता में कोई 30 या 40 भारतीय रुपये तक खा जाता हूँ। दोपहर का भोजन अलग। शाम की चाय पीने का कोई रिवाज नहीं है। रात का खाना फिर भयंकर। खातिरदारी इतनी होती है कि खाते-खाते आदमी थक जाता है। मेरा अनुमान है कि हमारा हर एक सदस्य (शाकाहारी) प्रतिदिन कम से कम 100 रुपये तो खा ही जाता होगा। होटल के कमरे का किराया अलग। हाँ, धोबी या लाण्ड्री का नाम तक लेने की हिम्मत नहीं होती हमारी। एक कुरता, पायजामा धुलाकर लोहा (इस्तरी/प्रेस) करवाने का मतलब है 50-60 रुपये लग जाना। प्रवास में मैं अपने चड्डी बनियान खुद धोया करता हूँ। वह आदत यहाँ वरदान हो गई। कपड़े दो दिन तक सामान्यतया नहीं सूख पाते। एक दिन सोचा कि कटिंग बनवा लूँ। सैलून में पूछा तो ज्ञात हुआ कि बाल बनवाने पर भारतीय 30 रुपये खर्च हो जायेगा। मैं खुद ही अपने बाथरूम में कैंची-कंघा लेकर अपनी कटिंग बनाने पर जुट गया और हमारे मित्र देखते रह गये कि मैंने अपने बाल आराम से बना लिये। आदमी जब खुद बूट पालिश करके मोची नहीं हो जाता, तो अपने बाल बना लेने से नाई किस तरह हो जायेगा? खुद के कपड़े धोने से कौन धोबी हो जाता है?

पहला पत्र: चौथा हिस्सा निरन्‍तर




‘बर्लिन से बब्बू को’ - पहला पत्र: दूसरा हिस्सा यहाँ पढ़िए

‘बर्लिन से बब्बू को’ - पहला पत्र: चौथा हिस्सा यहाँ पढ़िए।


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तलाश किसी रोते हुए बच्चे की

बर्लिन से बब्‍बू को - पहला पत्र: दूसरा हिस्सा

पहली रात हम लोग बर्लिन के एक आधुनिकतम होटल ‘होटल स्ताद बर्लिन’ (बर्लिन का हृदय) में ठहराये गये। 37 मंजिले इस होटल की 29वीं मंजिल पर मैं कमरा नम्बर शून्य आठ में था। 2000 बिस्तरों वाले इस होटल को यहाँं का विशेष दर्जा दिया गया है। चार तरह के होटल होते हैं इस देश में। प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, तीसरी श्रेणी और सर्वोपरि विशेष श्रेणी। मेरे बापदादे भी ऐसे बिस्तरों पर नहीं सोये होंगे। हाँ तू, तेरे बच्चे और भतीजे सोयें तो मुझे खुशी होगी। इतने आरामदेह और नरमतम बिस्तरों पर सोना मेरे भाग्य में तो है, पर मुझे नींद नहीं आ पती है इन पर।

शायद तुझे पता नहीं होगा कि अगस्त 76 के अन्तिम सप्ताह में जब मैं विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिये मॉरीशस में था तब वहाँ धोती, कुर्ता और जाकेट पहने घूमता था। पर यहाँ बर्लिन और रोस्टोक की सड़कों पर मैं अकेला भारतीय हूँ जो चुस्त पायजमा, कुर्ता, जाकेट पहने घूमता हूँ। जब हम लोग बस में या होटल में होते हैं तब तो सब कुछ एयर कण्डीशन होता है इसलिये सामान्य कपड़ों से काम चल जाता है। पर ज्यों ही बस या होटल से बाहर निकले कि तेज हवा और दगाबाज सर्दी की लहरें चमड़ी के भीतर घुस जाती हैं। अच्छा हुआ जो मैं चेस्टर लेता आया। खादी के इस ओव्हरकोट ने जान बचा दी। वैसे मैं अपनी बसन्ती लुंगी, बसन्ती कुर्ता और ऊपर भगवा ऊनी शाल ओढ़े भी हर जगह घूम लेता हूँ। मुझे देखते ही ‘इन्डिया इन्दिया’ की आवाजें शुरु हो जाती हैं। हमारे व्यवस्थापक साथी डॉ. गुन्थर, श्रीमती रुथ, श्रीमती एन और दुभाषिये श्री क्लोफर खूब मजा लेते हैं।

कोई इस बात पर विश्वास नहीं करेगा कि इन चार दिनों में हमने एक साल से लेकर दस साल तक के सैकड़ों बच्चे देखे हैं पर एक भी बच्चा रोता हुआ नहीं देखा। हम लोग ढूँढ रहे हैं कि कोई बच्चा रोता हुआ मिल जाये। अविश्वसनीय लगता होगा पर यह सच है कि इस देश में पाँचवीं से सातवीं तक की कक्षाओं में यौन सम्बन्धी सारा पाठ्यक्रम पढ़ा दिया जाता है। यौनाचार बच्चों को फूहड़ता की तरफ तब नहीं धकेल पाता।

दूसरे विश्व युद्ध की तबाही का यह देश जीवित प्रमाण है। पर अटूट संकल्प शक्ति, दृढ़ निश्चय, उत्कृष्ट राष्ट्रीय चरित्र, अनुपम अनुशासन और महान नवनिर्माण का भी यह देश अद्भुत सम्मिश्रण है। भूख, गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद यहाँ कहानियों में भी स्थान नहीं पाते। तस्करी और काला बाजारी यहाँ 1945 से पूर्व की घटनाएँ हैं। देश बना 1945 में। हिटलर और नाजियों ने यातना शिविरों में जिन दो करोड़ लोगों को जीवित जला दिया और भून दिया उसमें इस देश के केवल 10 लाख तो बच्चे ही थे। महिलाएँ और जवान तथा बूढ़े अलग। सब कुछ कल्पनातीत है। यातना का अनुमान पुस्तकों से नहीं लग पाता। हम लोगों ने एक यातना शिविर को देखा। आज वह अजायबघर है। शिविर की दीवार के उस पार आज सोवियत सेना का शिविर है। पर जो कुछ भी मैं देख पाया उससे मेरी कलम से एक कविता, आँखों से आँसू और कलेजे से चीख एक साथ निकल पड़ी। वह कविता वहीं के विजिटर्स रजिस्टर में मैं छोड़ आया हूँ। बच्चों पर यह देश उतना ही ध्यान देता है जितना एक मुर्गी अपने अण्डे पर या एक गाय अपने वत्स पर। राजमहलों में जो सुविधा राज पुत्रों को नसीब नहीं होती वह यहाँ बच्चों को दी जाती है। वस्तुतः बच्चे पढ़ते हैं, पढ़ाये नहीं जाते। पाठ्यक्रम ही ऐसा होता है। एक 10 वर्षीय बालक ने जब अपनी कक्षा में हमारे दल के सदस्यों से हाथ मिलाकर ‘इन्दिरा गाँधी को अभिवादन’ कहा तो सारा दल मुग्ध रह गया। हर बच्चा उत्फुल्ल, ताजा और किलकता मिलता है। उसकी किलकारियों से ही आभास हो जाता है कि इस बच्चे का भविष्य सौ फीसदी सुरक्षित है।

पहला पत्र: तीसरा हिस्सा निरन्तर



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पूर्वी जर्मनी : कैसा है यह देश?

बर्लिन से बब्‍बू को - पहला पत्र: पहला हिस्सा

(इस अंश में - 'गुलाब बा' याने उस समय हमारे घर/मकान के रखवाले। 'पिया' याने मेरी भाभीजी, श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी। 'पप्‍पू' याने दादा का साला, घन सच्चिदानन्‍द बैरागी। 'गोर्की' याने दादा का छोटा बेटा, मेरा छोटा भतीजा।)

रोस्टोक (पूर्वी जर्मनी से)
8 सितम्बर 76
शाम 4 बजे।

प्रिय बब्बू,

प्रसन्न रहो,

किसी भी देश के बारे में इतनी जल्दी कुछ लिख देना अच्छी बात नहीं होती। कुल जमा 4 दिन हुए हैं मुझे यहाँ पहँचे। याने कि 4 दिनों में क्या कुछ देखा होगा? पर मैं जानता हूँ कि तू और तेरे आसपास के सभी साथी मित्र, मेरे परिचित और हितैषी, मेरे पाठक और श्रोता, मुझ पर श्रद्धा रखने वाले और मुझ से ईर्ष्या करने वाले अनुयायी और विरोधी सभी की दिलचस्पी इस बात में अवश्य होगी कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ,क्या कर रहा हूँ और यह देश कैसा है? यहाँ का जन-जीवन, संस्कृति, राजनीति और स्तर किस तरह का है? कई प्रश्न होंगे जो उत्तर चाहते होंगे। मेरे पत्र की प्रतीक्षा तुम सब लोगों को होगी।

मैं कहाँ से शुरु करूँ? एक गुबार सा मेरी कलम की नोक पर उतर कर रास्ता चाहता है। जी. डी. आर. (जिसे हम पूर्वी जर्मनी भी कहते हैं) एक यूरोपीय देश है और 1945 में हिटलर की पराजय के बाद यह देश अस्तित्व में आया। यह तो सर्व विदित है। आबादी यहाँ की कुल एक करोड़ 80 लाख है। पूर्वी बर्लिन इसकी राजधानी (आबादी 11 लाख) होती है। भारत का क्षेत्रफल इससे 33 गुना अधिक है। उधर बँटवारे में पश्चिम जर्मनी जो गया तो अपने साथ कोई सवा छः करोड़ की आबादी भी लेे गया। पश्चिम जर्मनी एक पूँजीवादी देश है। 100 फीसदी अमेरिकन प्रभुत्ववाला। जबकि जिस देश में मैं घूम रहा हूँ वह जी. डी. आर. (जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक) याने जर्मन समाजवादी गणतन्‍त्र अर्थात पूर्वी जर्मनी कहलाता है। यह वही देश है जिसके खिलाड़ियों ने अभी मान्ट्रियल ओलम्पिक की पदक तालिका में रूस के बाद सीधा दूसरा स्थान प्राप्त करके दुनिया को अवाक् कर दिया है। जिस समय मैं यह पत्र तुझे लिख रहा हूँ, यहाँ शाम के 4 बजे रहे हैं। भारत में इस समय रात के 8.30 बजे होंगे। मैं कल्पना कर रहा हूँ कि पिताजी सो गये होंगे। माँ गुलाब बा को हिदायतें दे रही होगी। पप्पू दुकान से लौट आया होगा। पिया रात का खाना खाने की तैयारी रही होगी। और गोर्की? वह पढ़ने का बहाना बनाते हुए रेडियो बजा रहा होगा। रहा सवाल तेरा, तो तू ‘दशपुर-दर्शन’ के लिए समाचारों को अन्तिम रूप दे रहा होगा।

4 अगस्त की सुबह 9 बजे भारतीय समय 4.30 बजे प्रातः हम सकुशल बर्लिन उतरे। शिष्ट मण्डल में कुल 14 मित्र हैं। इन 14 में से 5 लोग हम सीधे काँग्रेस से आते हैं। भू. पू. संसद सदस्या श्रीमती फूलरेणु गुप्ता (बंगाल) हमारे पूरे शिष्ट मण्डल की नेता हैं। शेष 4 में वर्तमान संसद सदस्य श्री दिनेश गोस्वामी (आसाम) श्री प्रफुल्ल गड़ई (महा सचिव, प्रदेश काँग्रेस उड़ीसा) श्री गुप्ता (भू. पू. सदस्य दिल्ली महा पालिका) और मैं हूँ। बाकी जो 9 मित्र हैं वे अलग-अलग स्थानों और निकायों से हैं। इस पूरे शिष्ट मण्डल का प्रवर्तन किया है भारत-जी. डी. आर. मैत्री संघ दिल्ली ने। दूसरों की तो मैं नहीं कहता पर मुझमें रुचि सीधे यहाँ वालों की थी। मेरा नाम पहला नाम था जिस पर इन्दिराजी ने सहमति दी ऐसा मुझे दिल्ली में बता दिया गया था। श्री के.एन. सेठ नामक एक पत्रकार किन्हीं अज्ञात कारणों से नहीं आ सके और चण्डीगढ़ के श्री बंसल पारिवारिक कारणों से ठहर गये। शेष सदस्य हैं प्रो. पाण्डेय (राजस्थान), श्री गोपाल प्रसाद (बिहार), श्री राव (आन्ध प्रदेश), श्री रेड्डी (रिटायर्ड जज मद्रास हाय कोर्ट), श्री श्रीधरन (दल के सचिव), श्री रामनाथन (बंगलौर के वकील), श्री खरसाटी (रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर, मेघालय), प्रो. श्री भट्टाचार्य (आसाम, राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक), श्री शर्मा (दिल्ली के एक रिटायर्ड प्राचार्य)। सभी सदस्यों की अपनी-अपनी योग्यता है।

इस दल में नेपाल के एक साथी और श्रीलंका के दो भाई भी यहाँ शामिल हो गये हैं। इन 17 सदस्यों को 4 सितम्बर से 22.9.76 तक का बिलकुल व्यवस्थित कार्यक्रम दे दिया गया है। याने अब भारत में मेरा आना 23-9-76 को या फिर 30-9 को ही सम्भव होगा। 23-9 से 27-9 तक के मेरे साहित्यिक कार्यक्रम उधर भारत में तय हैं। केवल 26-27-28 के कार्यक्रमों का पक्का प्रस्ताव मुझे दिल्ली में मिलना है। शायद मिल जाय। 23-24-25 एवम् 29 के मार्यक्रम मेरे तय हैं। और यदि 1-10 को मुझे दिल्ली बोलना ही पड़ा तो फिर मैं 3-10 को मनासा पहुँच पाऊँगा। खैर, ये सब बातें बात की हैं। बात यहाँ से चल रही थी-

पहला पत्र: दूसरा हिस्सा निरन्तर


बर्लिन से बब्‍बू को -  ब्‍लॉग पर प्रकाशन की भूमिका

बर्लिन से बब्‍बू को - पहला पत्र: दूसरा हिस्सा यहॉं पढिए

इण्‍टरनेट  पर सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय व समृद्ध ई-पत्रिका ‘रचनाकार’ 
ने भी इस पत्र काेे प्रकाशित किया है। इसे  यहाँ पढ़ा जा सकता है।



बर्लिन से बब्बू को: एक जिद का पूरी होना



 ‘बर्लिन से बब्बू को’ के बारे में मेरी यह बात तनिक लम्बी ही  होगी। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि कृति के मुकाबले उसके निर्माण का ब्यौरा लम्बा हो जाता है। नाक पर नथनी भारी हो जाती है। कोई महत्वपूर्ण उल्लेख छूट न जाए इस भावना के अधीन अधिकाधिक जानकारियाँ, सन्दर्भ और नाम देने का मोह मैं छोड़ नहीं पा रहा हूँ। 


दादा श्री बालकवि बैरागी, सितम्बर 1976 में तत्कालीन पूर्वी जर्मनी की यात्रा पर गए थे। तब मैं मन्दसौर में, दैनिक ‘दशपुर दर्शन’ का सम्पादन कर रहा था। दादा की यह दूसरी विदेश यात्रा थी। इससे पहले वे मारीशस की यात्रा कर चुके थे और ‘धरती रामगुलाम’ की शीर्षक से उनकी मारीशस यात्रा के संस्मरण प्रकाशित हो चुके थे।

यात्रा के दौरान दादा संस्मराणात्मक पत्र मुझे लिखेंगे, यह शायद उन्होंने भी नहीं सोचा था। जाने से पहले उन्होंने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था। यह विचार उनके मन में निश्चय ही, यात्रा शुरु करते समय या पूर्वी जर्मनी में उतरने के बाद आया होगा। भारत लौटने के बाद भी उन्होंने इस बारे में कभी, कुछ नहीं बताया।

जब मुझे पहला पत्र मिला तो, मुझे अच्छा तो लगा लेकिन मैं चौंका भी था। इतना सब मुझे बताने का उनका क्या मकसद हो सकता है? पहले पत्र को मैंने दो-तीन बार पढ़ा और पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा, दादा की भावना हो न हो लेकिन मेरी सोच-समझ पर उन्हें कहीं न कहीं यह विश्वास तो है कि मैं इन पत्रों को अपने तक ही सीमित नहीं रखूँगा। मेरे अनुमान की पुष्टि उनके तीसरे और चौथे पत्र में बड़े ही सहज भाव से होती है। उनका तीसरा पत्र पढ़ने के बाद अपनी सम्पादकीय सूझ-बूझ पर मेरा भरोसा बढ़ा ही।

इन पत्रों के प्रकाशन का निर्णय लेने में मैंने किसी से परामर्श नहीं किया। हाँ, यह तय किया कि इस प्रकाशन का निमित्त  और इससे मिलनेवाले यश का स्वामी ‘दशपुर दर्शन’ बने, ताकि उसकी आय और प्रसार में भी वृद्धि हो। एक सम्पादक यही तो चाहता है कि उसका अखबार अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे, अधिकाधिक पढ़ा जाए! इस मोह को कुछ और बातों ने ताकत दी। जैसे कि  मैं एक अखबार का सम्पादक हूँ, मेरे मालिक के पास छापाखाना है। मेरा मालिक दादा का अभिन्न मित्र है। दोनों एक ही पार्टी के सक्रिय, अग्रणी कार्यकर्ता हैं। आदि-आदि।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जैसा मैंने सोचा था। ‘दशपुर दर्शन’ के माध्यम से इन पत्रों के प्रकाशन का निर्णय जब मैंने अपने मालिक श्री सौभाग भाई को बताया तो उन्होंने मंजूरी तो दी लेकिन साफ कह दिया कि इसके लिए वे कोई आर्थिक वजन नहीं उठाएँगे। इस प्रकाशन का खर्च मुझे ही जुटाना होगा। मेरे लिए यह अत्यन्त दुसाध्य काम था। लगभग असम्भव। विज्ञापन जुटाने का गुण मुझमें आज तक नहीं आ पाया। एक क्षण लगा कि यह विचार ही छोड़ हूँ। लेकिन एक जिद मन में उभर आई - ‘पत्र तो छपेंगे।’ तब तक तीन पत्र आ चुके थे।

मैंने अपने गुरु (अब स्वर्गीय) श्री हेमेन्द्र कुमारजी त्यागी और कई मित्रों से विस्तार से बात की। अपनी भावना और सौभाग भाई की बात बताई। सबने पत्रों को बार-बार पढ़ा। अकेले में भी और सामूहिक रूप से भी। सबने कहा - ‘पत्र छपने चाहिएँ। छपेंगे। आगे बढ़ा जाए। जो होगा, देखा जाएगा।’  

सौभाग भाई ने बजट बताया और हम सब शुरु हो गए।

तीन पत्र हमारे हाथ में थे। पत्रों से यह तो लग रहा था कि दादा और पत्र लिखेंगे जरूर। लेकिन ‘कितने पत्र लिखेंगे?’, ‘लिखेंगे तो हम तक कितने पहुँचेंगे?’, ‘कब पहुँचेंगे?’,  ‘बादवाला पत्र तो मिल गया लेकिन उससे पहलेवाला नहीं मिला तो क्या करेंगे?’ जैसे सवालों का जवाब हममें से किसी के पास नहीं था। लेकिन तय हो चुका था - छापना है। 

प्रकाशन का नामकरण करने में न तो समय लगा, न ही कठिनाई हुई। सब कुछ साफ था - ‘दादा ने लिखे हैं। बर्लिन से लिखे हैं। बब्बू को (मेरा, घर का नाम बब्बू ही है) लिखे हैं। इसके बाद क्या सोचना! यही नाम हो सकता है - बर्लिन से बब्बू को।’ 

अखबार में पहली घोषणा से ही पाठकों में मानो बिजली का करण्ट दौड़ गया। पाठकों ने जताया कि उन्हें हमसे अधिक उतावली थी। लेकिन हमें धैर्य बरतना था। ऐसे नितान्त व्यक्तिगत और आत्मपरक पत्रों में सम्पादन की सामान्यतः न तो आवश्यकता होती है और न ही कोई गुुंजाइश। लेकिन जब वैयक्तिकता सार्वजनिकता से जुड़ती है तो फिर सम्पादन की आवश्यकता स्वतः पैदा हो जाती है। हम सौभाग भाई की ‘पेढ़ी’ का उपयोग कर रहे थे। यह हमारी जिम्मेदारी थी कि उन्हें कोई खरोंच न आए। 

किताब का अन्तरवर्ती मुख पृष्ठ
ये पत्र जब पुस्तकाकार में आए तो सम्पादक मण्डल में चार नाम छपे - त्यागीजी, राजा दुबे, विजय बैरागी और मैं। लोगों ने कभी मजाक में तो कभी तंज कसते हुए पूछा - ‘इसमें सम्पादन जैसा क्या था जो इतने लोगों को मेहनत करनी पड़ी? चलो करनी पड़ी तो भी बैरागी दादा के लिखे का सम्पादन! आप चारों उनसे अधिक विद्वान् हो गए?’ हमारे पास न तब जवाब था न मेरे पास अब जवाब है। बस! इतना ही कह पा रहा हूँ कि हाँ, सम्पादन की जरूरत थी। दादा के मूल पत्रों में उप शीर्षक नहीं थे। उप शीर्षक देना तय हुआ। सारे उप शीर्षक राजा दुबे ने दिए। 

पत्र छपने शुरु हुए तो पूरे जिले में मानो कोई छोटा-मोटा लोकोत्सव शुरु हो गया हो। लोगों ने इन्हें हाथों-हाथ लिया। प्रशंसाभरे, उत्साहवर्द्धक पत्रों का ढेर लग गया। कुछ इतना कि एक दिन खुद पोस्ट मास्टर सा’ब आकर बता गए - ‘आपके पत्रों के लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ रही है।’ हमारी प्रसार संख्या में भी यथेष्ठ बढ़ोतरी हुई। 

हमने पूरी सुविचारित योजना बनाकर ये पत्र पाठकों तक पहुँचाए। अखबार के साथ 8×5.5 इंच के आठ पेज का एक पन्ना छापते थे जिसे मोड़कर पुस्तकाकार दिया जा सकता था। कोशिश रहती थी कि जैसे-जैसे विज्ञापन मिलते जाएँ, वैसे-वैसे पन्ने देते जाएँ। ऐसा किया भी। लेकिन विज्ञापनों की प्रतीक्षा में पन्ने रोके नहीं। जब तक पत्र हमारे हाथ में आते रहे, पन्ने बराबर जारी करते रहे। तब ट्रेडल मशीन पर अखबार छपता था और चित्रों के ब्लॉक इन्दौर से बनवाने पड़ते थे। लेकिन इन दोनों कारणों से प्रकाशन नहीं रुका। पाठकों को प्रतीक्षा तब ही करनी पड़ी जब डाक की गड़बड़ के कारण  हमें पत्र नहीं मिले। लेकिन सन्तोष की बात यह रही कि दादा के भेजे सारे सात पत्र हमें मिल गए। एक पत्र हमें दादा के भारत लौटने के बाद मिला।

पत्र प्रकाशन में व्यवधान पर पाठकों की अधीरता भरे पत्र हमें (इन पत्रों के प्रकाशन के) अपने निर्णय पर आत्मसन्तोष प्रदान करते रहे।

अन्ततः सारे पत्र प्रकाशित हुए। आवरण पृष्ठों सहित पूरी किताब 108 पृष्ठों की बनी। हमें पूरे पृष्ठ के अठारह, आधे पृष्ठ के चौदह और चौथाई पृष्ठ के तीन विज्ञापन मिले। फिर भी आर्थिक सन्दर्भों में यह घाटे का ही सौदा रहा। लेकिन इनके प्रकाशन से उपजा आत्म सन्तोष मेरे लिए आज भी अमूल्य है। किसी भी प्रकाशन की यह मेरी पहली इच्छा और कोशिश थी जो साकार हुई। दादा को छापने का निमित्त बनने के सुख-सन्तोष का मोल तो मेरी मृत्युपर्यन्त अकूत ही रहेगा। 

हमने इस प्रकाशन का कोई समारोह नहीं किया। घर-घर में, पाठकों ने ही पुस्तक तैयार कर ली थी। हमने अपने लिए अतिरिक्त प्रतियाँ छपवाई थीं। अखबारी कागजवाली प्रतियाँ ज्यादा थीं। कुछ प्रतियाँ अच्छे, सफेद कागज पर थीं। यूँ तो हमने एक प्रति का मूल्य बीस रुपये रखा था लेकिन एक भी प्रति नहीं बिकी। सब मुफ्त में ही बँटी। कुछ इस तरह कि अच्छे, सफेद कागज पर छपी एक भी प्रति हमारे परिवार में ही उपलब्ध नहीं है। पुस्तक में प्रकाशित चित्रों को मैं ब्लॉग पर भी देना चाहता था लेकिन अखबारी कागजवाली प्रति पर छपे चित्रों में शकलें ही नजर नहीं आ रहीं। अच्छे, सफेद कागजवाली प्रति की तलाश खूब की। फेस बुक पर भी माँगी। लेकिन अब तक नहीं मिली। फिर भी, अखबारी कागज पर छपे तीन चित्र ऐसे मिल गए हैं जिनमें शकलें पहचान में आती हैं और जिन्हें कम खराब’ कहा जा सकता है। पुणेवाले डॉक्टर रतनलालजी सोनग्रा ने कहा है कि दादा ने इसकी एक प्रति उन्हें दी थी। वे उसे तलाश करेंगे। मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा हूँ उन्हें यह प्रति मिल जाए और यह प्रति अखबारी कागजवाली नहीं, अच्छे, सफेद कागजवाली हो। 

दादा के लोक सभा सदस्यतावाले काल में किसी प्रकाशक ने यह किताब ‘एक बैरागी बर्लिन में’ शीर्षक से छापी थी। लेकिन उसमें चित्र नहीं थे।

इन पत्रों को ब्लॉग पर प्रकाशित करने की तैयारी सितम्बर 2009 में ही हो गई थी। सबसे बड़ा काम था टाइपिंग का। भाई श्री पुरुषोत्तम लोहाना, सितम्बर 2009 में ही यह विकट काम कर चुके थे। उन्होंने अपना पारिश्रमिक भी अब तक नहीं लिया है। मैं चित्रों के मोह में उलझा रहा। खूब हाथ-पैर मारे। पर असफल ही रहा। कुछ तो कोशिशों के बाद की प्रतीक्षा, कुछ इधर-उधर और टटोलने का जतन और कुछ आलस्य। इन सबके चलते ब्लॉग पर प्रकाशन टलता रहा। दादा से जब भी बात की, उन्होंने सदैव ही निर्लिप्त भाव से कहा - ‘तू जाने और तेरा काम।’ लेकिन उनके जाने के बाद इन्हें ब्लॉग पर देते समय मेरे आँसू थम नहीं रहे। दादा इन्हें मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित देखते तो उन्हें अतिरिक्त प्रसन्नता ही होती और खूब होती। वे यकीनन बच्चों की तरह खुश होते। लेकिन उनकी यह खुशी मेरे भाग्य में नहीं रही। मैंने ही खुद से छीनी।

इन्हें पढ़ने से पहले कुछ बातों पर यदि ध्यान देंगे तो बड़ी कृपा होगी।

1975 से लेकर अब तक अन्तरराष्ट्रीय राजनीति और दशा में बदलाव आ गया है। तब जर्मनी विभाजित तथा। आज एक है। वहाँ की उस समय की राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक, सामाजिक नीतियाँ बदल गई हैं। ऐसे में इन पत्रों को किसी देश के आन्तरिक और/या अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के सन्दर्भों से जोड़ना समीचीन नहीं होगा। इन्हें लेखकीय  और पाठकीय दृष्टि से देखते हुए इनका आनन्द लेना बेहतर होगा। यात्रा के दौरान किसी देश के बारे में जानना, उसके नागरिकों, उसकी सामाजिकता, अपने देश के प्रति नागरिकों की भावना, वहाँ के मजदूर-किसान, उनका आचरण, महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों के साथ किया जानेवाला व्यवहार, वहाँ के जीवन मूल्य जैसे अनगिनत कारकों को टटोलना आदि बातें इन पत्रों की दर्शनीयता है। दो देशों के बीच सेतु का काम करनेवाले मैत्री संघों के कामकाज में दोनों देशों की राजनीतिक विचारधारा मुख्य आधार होती है। प्रतिनिधि मण्डलों के सदस्यों का चयन भी इन्हीं आधारों पर होता ही है। लेकिन जब कोई सदस्य कलमकार भी हो तब उसकी नजर और उसकी अभिव्यक्ति में सामंजस्य बैठाना चुनौती बन जाता है। कलमकार को केवल वही नहीं दिखता जो उसे दिखाया जाता है। जो उससे छुपाया जाता है, राजनयिक शिष्टाचार और सीमाएँ निभाते हुए वही सब उजागर करने का कौशल उसे बरतना पड़ता है। ये पत्र दादा की राजनीति और कलम की बेहतरीन जुगलबन्दी का बेहतरीन नमूना है - ऐसा मुझे तब भी लगता था और अब भी लग रहा है। 

इन पत्रों का आनन्द लेने के लिए या तो इनके काल में ठहरना पड़ेगा या फिर उसे साथ बनाए रखना पड़ेगा। वर्तमान से उनकी मुठभे शायद ‘बासमती भात में कंकर’ की स्थिति बना दे।

इस सबसे हटकर और इस सबसे पहले इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि अपने पूर्वनिर्धारित अति व्यस्त कार्यक्रम के बीच दादा ने ये पत्र कितनी कठिनाई, कितने परिश्रम से लिखे होंगे? इसके लिए उन्होंने अपनी, आहार-निद्रा जैसी दैनन्दिन चर्या के समय में ही कटौती की होगी। उनके लिखे वे मूल पत्र मेरे पास नहीं हैं। लेकिन एक भी पत्र में काटा-पीटी या ‘ओव्हर राइटिंग’ नहीं थी। दादा कभी भी ‘नोट्स’ बनाकर नहीं लिखते थे। ऐसे में बरबस ही यह बात मन में आती है कि लिखने से पहले किस तरह उन्होंने कागज से पहले ये पत्र अपने मन में लिखें होंगे? आज की पीढ़ी तो हाथों से इतना लिखने की कल्पना भी नहीं कर सकगी। भाई लोहानाजी ने एमएस वर्ड डाक्यूमेण्ट की, 65 पृष्ठों की जो फाइल मुझे दी है वह 25,423 शब्दों की, 23,08,760 केबी की है। 

ब्लॉग पर देते समय मैंने भी कुछ बदलाव किए हैं। पुस्तक में दिए सारे गीत हटा दिए हैं। ऐसा करना, इनकी पठनीयता में कहीं भी बाधक नहीं बना। दो वाक्य हटा दिए हैं। हमारे कुटुम्ब में, सर्वाधिक मानसिक तादात्म्य हम दोनों भाइयों में ही था। यह बात दादा खुद ही कहते थे। उसी आधार पर कह पा रहा हूँ कि मेरे इस दुस्साहसिक हस्तक्षेप पर दादा को कोई आपत्ति नहीं होती। इसके अतिरिक्त मैंने ‘प्रजातन्त्र’ को ‘लोकतन्त्र’ से विस्थापित कर दिया है। मेरा मानना है कि ‘प्रजा’ के आते ही ‘राजा’ अपने आप ही चला आता है। हम गणतान्त्रिक लोकतन्त्र में जी रहे हैं। राजा और प्रजा शब्द मुझे अवमाननाकारक लगते हैं। विश्वास करता हूँ कि मेरे इस हस्तक्षेप को पाठकों का भी स्वीकार मिलेगा।

इतना कुछ कहने के बाद भी लग रहा है कि काफी-कुछ कहना बाकी है। लेकिन अभी इतना ही। बस।

कल से  इन पत्रों को पढ़ि‍ए।
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‘बर्लिन से बब्बू को’ के कृपालु विज्ञापनदाता - 1. माइक्रो केमिकल्स (इण्डिया), मन्दसौर 2. संजय प्रिण्टर्स, मन्दसौर 3. पगारिया इंजीनीयर्स, नारायण गढ़ 4. अन्नपूर्णा टाकीज, मनासा 5. ठेकेदार किशन भाई वर्मा, नीमच 6. सन्तोषमल राजमल खाबिया मनासा/रामपुरा 7. रुलियामल लालचन्द अग्रवाल, नीमच 8. नरेन्द्र कुमार अग्रवाल एण्ड ब्रदर्स, पीपल्या मण्डी 9. रामगोपाल आशाराम मन्त्री, माहेश्वरी पूड़ी भण्डार, श्री राम लघु उद्योग, मनासा 10. दिलीप कुमार चिमनलाल बधवा, मनासा 11. दी जीवाजीराव शुगर कं. लि. दलौदा 12. ग्रामीण सेवा सहकारी समिति मर्या. चंदवासा 13. प्रकाशचन्द्र माँगीलाल हींगड़, सूरजमल बापूलाल हींगड़, मनासा 14. लक्ष्मी रेडियो एण्ड इलेक्ट्रिक कं., मनासा 15. दलित वर्ग संघ, मनासा 16. गाईड टेलर्स, मनासा 17. दुरग पुस्तकालय, मनासा 18. संकल्प (उदीयमान साहित्यकारों की संस्था), मनासा 18. प्रेस क्लब, मन्दसौर 19. नारायण एजेन्सीज, मन्दसौर 20. जीवनदास तुलसीराम पंजाबी, श्री लालजी बस सर्विस, मनासा 21. युवक काँग्रेस, बरखेड़ा राठौर (शामगढ़) 22. बटवाल ब्रदर्स, पीपल्या मण्डी 23. रमेशचन्द्र महेशचन्द्र अग्रवाल, मन्दसौर 24. बापूलाल जिनेन्द्रकुमार मानावत, जिनेन्द्रकुमार रमेशचन्द्र मानावत, मनासा 25. भवानीलाल नन्दलाल पामेचा, विजय ट्रेडिंग कं. मनासा, पामेचा वस्त्र भण्डार, पीपल्या मण्डी 26. भारत वॉच सर्विस, मनासा 27. अजीतकुमार बम्ब एण्ड कं., मनासा 28. मुस्लिम अंजुमन कमेटी, मनासा 29. सुरेश इलेक्ट्रिकल इण्डस्ट्रीज, नीमच 30. बीस सूत्री आर्थिक सहायता परिवार सहायक संस्था, मनासा 31. बंशीलाल धनोत्या एडव्होकेट, रतनलाल बम्ब एडव्होकेट, जिनेन्द्रकुमार मानावत, मनासा 32. राजस्थान खांडसारी शुगर मिल्स, माँडल (भालवाड़ा) 33. बापूलाल केशरीमल एण्ड कं., मनासा 34. विश्वनाथ राठी, एडव्होकेट, राठी इंजीनियर्स, मनासा 35. जय अम्बे इलेक्ट्रिक मोटर रिवाईण्डर्स, भाटखेड़ी (मनासा)


बर्लिन से बब्‍बू को - पहला पत्र : पहला हिस्‍सा 

यह पत्र और इन पत्रों की भूमिका, इण्टरनेट पर सर्वाधिक प्रसारित,लोकप्रिय व 
समृद्ध ई-पत्रिका ‘रचनाकार’ने भी प्रकाशित की है। इसे  यहाँ पढ़ा जा सकता है।



ईश्वर ने कहा -‘ऐसा ही लिखते रहो’

बीस जून बुधवार का लगभग पूरा दिन रोते-रोते ही बीता। दशा और मनोदशा कुछ ऐसी हो गई कि ‘सुबह सवेरे’ के लिए अपने स्तम्भ की सामग्री भी नहीं दे पाया। उल्लेखनीय बात यह रही कि रोने की शुरुआत दुःख से हुई और समापन सुख से। इसी कारण यह सब लिखने की स्थिति बनी।

दादा श्री बालकवि बैरागी के निधन पर अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कृपालु अब भी आ रहे हैं। लेकिन वे प्रायः शाम/रात को आ रहे हैं। लेकिन बुधवार को यह आगमन सुबह से शुरु हो गया। ये सब  आत्मीय, अन्तरंग। परिजन समान। दादा को याद करते हुए लगभग सबके सब रोने लगे। मुझे तो उनसे पहले ही रोना आ गया। इनमें से एक बाबू भी रहा। वह अपनी अर्द्धांगिनी सुमिता के साथ आया था। उसकी दशा देख कर रोना कई गुना अधिक हो गया। वह पार्किंसन्स का मरीज हो गया है। वह देख नहीं पाता, स्पष्ट बोल नहीं पाता। अपने सारे कामों के लिए पराश्रित हो गया है। बाबू को मैंने सदैव दबदबे, रौब और एकछत्र शासक, नियन्त्रक की स्थिति, मुद्रा और दशा में देखा है। उसे ऐसी पराधीन दशा में देखना मेरे लिए मर्मान्तक पीड़ादायक होता है। मैं उससे आमने-सामने होने से बचता हूँ। लेकिन यह ऐसा प्रसंग था कि वह मुझ तक आने से खुद को रोक नहीं पाया। वह और सुमिता लगभग आधा घण्टा बैठे। लेकिन उसके जाने के बाद मैं अकेले में देर तक रोता रहा। ईश्वर सब पर कृपा करे।

लेकिन दिन ढलते-ढलते ईश्वर (यह ‘ऊपरवाला’ नहीं, धरती का, रतलाम में रहनेवाला ईश्वर है) आया तो उसकी बातों ने मानो चमत्कारी प्रभाव किया। वातावरण और मन हलका ही नहीं हुआ, विगलित और प्रफुल्लित कर गया। उसके जाने के बाद भी देर तक रोता रहा। लेकिन ‘उस’ रोने में  और ‘इस’ रोने में धरती-आकाश का अन्तर रहा। 

ईश्वर का उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग पर 24 दिसम्बर 2009 को
किया था। वह आलेख, साप्ताहिक उपग्रह के मेरे स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में ‘छत्तीसवीं कौम’ शीर्षक से छपा था। ईश्वर ने ‘उपग्रह’ की प्रति अब भी सम्हाल रखी है। दस बरस से अधिक का वक्त हो गया है, बिजली से जुड़े मेरे सारे काम ईश्वर ही कर रहा है।

कोई दो बरस पहले वह आया था तो बातों-बातों में कहा था - ‘बाबूजी! आपके उस लेख ने मेरा बड़ा फायदा किया।’ मैंने ध्यान नहीं दिया था। यही माना था कि उस लेख का हवाला देकर लोगों ने उसकी प्रशंसा की होगी। लेकिन कुछ दिनों पहले उसने जब वही बात दोहराई तो मैंने पूछा - ‘कैसे? क्या फायदा हुआ?’ ईश्वर ने जवाब दिया - ‘बैंकवाले मेरा लोन पास नहीं कर रहे थे। मैंने आपका लेख बताया तो उन्होंने एक झटके में मेरा लोन पास कर दिया।’ मुझे अविश्वास और अचरज हुआ। भला बैंक का कोई अफसर किसी के लिखे के आधार पर लोन देता है? लिखे का ऐसा और इतना असर कैसे होने लगा! मैंने अविश्वास से देखते हुए कहा - ‘ऐसे नहीं। पूरी बात बता।’

ईश्वर ने जो कुछ कहा, वह लगभग इस तरह था -

“मैंने बैंक में लोन की अर्जी लगा रखी थी। बैंकवाले टल्ले दे रहे थे। मैं हर साल तीस-चालीस हजार का इनकम टैक्स भर रहा हूँ। अपने केदार वकील साब (रतलाम के अग्रणी प्रतिष्ठित आय कर सलाहकार श्री केदार अग्रवाल) के पास मेरी फाइल है। मैंने कहा कि मेरे गए पाँच-सात साल के इनकम टेक्स के सर्टिफिकेट देख लो। केदार सा’ब पूछ लो। लेकिन बैंकवाले मानने को तैयार नहीं। कहने लगे कि हम जानते हैं कि ऐसे सर्टिफिकेट कैसे बनते हैं। 

“बैंकवाले मेरी कोई बात सुनने को तैयार नहीं। और तो और, मेरी खेती के कागज भी देखने को तैयार नहीं। मैं कुछ भी कहूँ तो एक ही बात कहें - ‘इतनी बड़ी रकम यूँ ही दे दें?’ (ईश्वर ने लोन की रकम बताई तो मेरे भी हाथ-पाँव फूल गए। वह रकम मेरी तो सोच के भी बाहर थी। लोन की रकम और बैंक का नाम यहाँ जाहिर करने की इजाजत मेरा विवेक मुझे नहीं दे रहा।) जब मुझे लगा कि ये मुझे लोन नहीं देंगे और मुझे दूसरा बैंक देखना पड़ेगा तो मैंने कहा - ‘सिटी के बड़े-बड़े लोग मेरी और मेरे काम की बड़ाई करते हैं। मुझ पर लेख छापते हैं। और एक आप हो कि मुझ पर भरोसा ही नहीं करते!’

“मेरी बात बैंकवाले सा’ब को मजाक लगी। बोले - ‘अच्छा! अब तू इतना बड़ा आदमी हो गया कि तेरे पर लेख छपने लगे? जरा हम भी तो देखें कि किसने तेरा अभिनन्दन-पत्र छापा?’ मैंने कहा - ‘मुझे थोड़ा टाइम दो सा’ब! मैं घर से अखबार लाकर दिखाता हूँ।’

“मैं भाग कर घर आया। अखबार मैंने सम्हाल ही रखा था। निकाला और उल्टे पाँव बैंक पहुँचा और उनको अखबार पकड़ा दिया। उन्होंने अखबार देखा। उलटा-पलटा। सात बरस पुरान अखबार था बाबूजी! सा’ब ने आपका लेख पढ़ा। आपने तीन मिस्त्रियों के किस्से छापे थे। मेरा किस्सा सबसे पहला था। सा’ब ने ध्यान से पूरा लेख पढ़ा। फिर मेरी ओर देखा। उनकी तो नजरें ही बदल गई थी बाबूजी! खुश होकर बोले - ‘किसी मेकेनिक पर ऐसा लेख पहली बार देखा। जा! तेरा लोन पास किया।’ और बाबूजी! उन्होंने तो सच्ची में लोन पास कर दिया। एक झटके में। अब बताओ बाबूजी! आपके लेख से मेरा फायदा हुआ कि नहीं?”

ईश्वर जैसे-जैसे किस्सा सुनाता जा रहा था, वैसे-वैसे मेरी देह पर मानो चीटियों के रेंगने की गति बढ़ती जा रही थी। किस्से की वास्तविकता और बैंक अफसर के मन की बात ऊपरवाला ही जाने। मेरे सामने बैैठा धरतीवाला यह ईश्वर मुझे सचमुच में ऊपरवाला ईश्वर ही नजर आ रहा था। वह मेरे सामने, मेरी आँखों में आँखें डाल कर, मुझे ही सारी बात सुना रहा था और मैं बेभान, लगभग संज्ञा-शून्य बैठा था। वह कृतज्ञ और उपकृत भाव से मुझे देख रहा था। लेकिन मैं उसे नहीं देख पा रहा था। उसकी शकल धुँधलाती जा रही थी। मैं बोल नहीं पा रहा था। मुझे लग रहा था, मैं बुक्का फाड़कर रोने लगूँगा। मैं रोना नहीं चाहता था। कम से कम, उसके सामने तो नहीं ही। उसके सामने रोने में मुझे अपनी हेठी लग रही थी।

तनिक मुश्किल से मैंने खुद को संयत किया। याद आया, घर में बूँदी के लड्डू रखे हैं। मैंने डिब्बा उसके सामने बढ़ाया - ‘तेरी बात ने तबीयत खुश कर दी ईश्वर। ले! मुँह मीठा कर।’ उसने आज्ञाकारी भाव से लड्डू उठाया। तनिक संकोच से, लेकिन प्रमेपूर्वक खाया। मैंने उसे बिदा किया - ‘भगवान तुझ पर ऐसी ही कृपा बनाए रखे। लेकिन याद रखना! इसमें मेरा कुछ नहीं। यह तेरी मेहनत, तेरी ईमानदारी और मेरी भलमनसाहत का ही फल है। ऐसा ही बना रहना।’

विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर वह चला गया। मैं अन्दर आया। दरवाजा बन्द करते-करते मेरी रुलाई फूट पड़ी। उसे लगा, वह मेरी वजह से निहाल हो गया। लेकिन सच तो यह है कि वह साक्षात ईश्वर ही था जो मुझे निहाल कर गया।

मैं देर तक रोता रहा। रोना रुका तो विचार आने लगे। लगभग साठ-पैंसठ बरस से, अपने स्कूली दिनों से लिख रहा हूँ। दो-एक छुटपुट ऐसे प्रसंग आए थे जिनमें मेरे लिखने से कथा नायकों को सहायता मिली थी। लेकिन वह लापरवाही की उम्र थी। उन घटनाओं का नोटिस ही नहीं लिया। लेकिन इस घटना ने मुझे झकझोर दिया। 

मुझे लग रहा है, ईश्वर को लोन की पात्रता है, यह अनुभव तो बैंक अफसर को, ईश्वर के कागज देख कर, पहली ही नजर में हो गया होगा। लेकिन ईश्वर के रहन-सहन, उसके पास कोई सिफारिश न होना, उसकी अतिशय विनम्रता ने बैंक अफसर को आश्वस्त नहीं किया होगा। वह आँकड़ों से अलग और आगे बढ़कर ईश्वर की (लोन लौटाने की) विश्वसनीयता टटोल रहा होगा। मेरे लेख ने शायद उसे ईश्वर को भरोसेदार आदमी मानने की जमीन दे दी होगी। ईश्वर को लोन तो उसकी पात्रता और अधिकार के आधार पर ही मिला। लेकिन मेरे लिखे ने उसके लोन केस में वह उपलब्ध करा दिया जो कागजों में नहीं आ सकता था।

मैं प्रायः ही, ऐसी ‘छोटी-छोटी’ बातों को उठाता रहता हूँ। इसके पीछे मेरा यह सोच है कि जिसे हम ‘छोटी सी बात’ मान कर उपेक्षित कर देते हैं वह वस्तुतः छोटी नहीं होती। 

मुझे यह भी लगता है कि हमारे मन से प्रशंसा भाव तिरोहित होता जा रहा है। किसी की प्रशंसा करने में हमें अपनी हेठी लगती है। लगता है, हम छोटे हो जाएँगे। सम्भवतः इसी के चलते हम बुरी खबरों से घिर गए हैं। लगता है, दुनिया में अच्छाई, भलाई रही ही नहीं। जबकि ऐसा नहीं है।

धरतीवाले इस ईश्वर ने मेरे इसी सोच को ताकत दी। हम किसी के लिए सहायक हो जाएँ, यही बहुत बड़ी बात है। और यदि किसी के लिए उपयोगी हो जाएँ तो क्षणांश को ही सही, जीवन सफल और धन्य लगता है। मैं जीवन की इसी, क्षणांश की सफलता और धन्यता से खुश हूँ। 

धरतीवाले इस ईश्वर का काम तो होना ही था। मेरा लिखना तो बहुत ही छोटा निमित्त बना। ऊपरवाले ईश्वर ने मुझे यह निमित्त बना कर मुझ पर केवल कृपा ही नहीं की, सम्भवतः अपनी इच्छा भी जताई - ऐसा ही लिखते रहो।

मुझे यह इच्छा-पालन करना ही है।
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ये पण्डित डुबो देंगे धर्म को

बिच्छू पण्डित का बड़ा दबदबा है। आतंकित रहते हैं लोग उनसे। लेकिन उनके बिना काम नहीं चलता। मुहूर्त निकालने-साधने और अनुष्ठान, धार्मिक, मांगलिक प्रसंगों के क्रिया-कर्मों में न तो कोई समझौता करते हैं न ही यजमान या उसके परिजनों का हस्तक्षेप स्वीकार करते हैं। बुरी तरह से डाँट देते हैं। किसी का लिहाज नहीं करते और न ही जगह, मौका देखते हैं। परशुराम के अवतार हो जाते हैं। कहते हैं - ‘धर्म के मामले में कोई समझौता नहीं चलेगा।’  उनके इस स्‍वभाव के कारण ही लोगों ने उनका यह नामकरण किया  है। बिच्छू पण्डित की उपस्थिति का मतलब ही है कि सब कुछ मुहूर्त में और शास्त्रानुसार, विधि-विधान से पूरा होगा। लोग उनसे डरते हैं लेकिन अपने काम उन्हीं से कराते हैं। यजमानी ही उनकी रोजी-रोटी है। दक्षिणा जरूर यजमान की श्रद्धा अनुसार होती है लेकिन अपना पारिश्रमिक खुद ही तय करते हैं।  

अर्चेन्द्र बड़ा भगत है बिच्छू पण्डित का। भगत नहीं, अन्ध-भगत है। उसे भी लग रहा है कि लोग धर्म विमुख हो रहे हैं और सनातन धर्म रसातल में जा रहा है। इसे बचाना जरूरी है। वह इसी काम में लगा रहता है। 

एक दिन अर्चेन्द्र के पिता ने घर पर ब्राह्मण-भोज आयोजित करने की भावना प्रकट की। अर्चेन्द्र ने फौरन हाँ भरी और कहा - ‘ब्राह्मण भोज से एक दिन पहले घर पर यज्ञ-हवन करा लेते हैं और ब्राह्मण-भोजवाले दिन, भोजन से पहले किसी विद्वान् ब्राह्मण का एक व्याख्यान भी करा लेते हैं।’ पिताजी निहाल हो गए। विचार को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी और छूट अर्चेन्द्र को दे दी।

व्याख्यान आयोजनों में उपस्थिति को लेकर अर्चेन्द्र के अनुभव बहुत अच्छे नहीं थे। यह उपक्रम किसी तिथि या प्रसंग से जुड़ा हुआ तो था नहीं। सो, उपस्थिति अधिकाधिक रहे, इस लक्ष्य से अर्चेन्द्र ने तय किया, घर पर किया जानेवाला हवन शनिवार को और व्याख्यान तथा भोजन रविवार को। 

अपनी योजना लेकर अर्चेन्द्र बिच्छू पण्डित के पास पहुँचा। पूरी बात सुनकर पण्डितजी ने पंचांग खोला। पन्ने पलटे। कभी कागज पर लिख कर तो कभी अंगुलियों पर, कोई बीस-बाईस मिनिट तक गणना की और घोषणा की - ‘शनिवार को तो हवन सम्भव ही नहीं।’ अर्चेन्द्र आसमान से धरती पर आ गिरा। उसने बिच्छू पण्डित को समझाने की कोशिश की कि न तो कोई मंगल आयोजन है न ही कोई मुहूर्त साधना है। बस! हवन मात्र करना है। सुबह न हो तो शाम को कर लेंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता। बिच्छू पण्डित ने कुपित नेत्रों से अर्चेन्द्र को देख और एक के बाद एक कई ग्रहों और योगों का हवाला देते हुए कहा कि जिस शनिवार की बात अर्चेन्द्र कर रहा है उस शनिवार को तो हवन करने का सोचा भी नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि बहुत ही आवश्यक है तो शनिवार से पहलेवाले गुरुवार को हवन कराया जा सकता है। सुन कर अर्चेन्द्र पशोपेश में पड़ गया। हवन गुरुवार को याने व्याख्यान शुक्रवार को और शुक्रवार तो अच्छा-भला कामकाजी दिन! सुननेवाले कैसे आएँगे? व्याख्यान तो फ्लाप हो जाएगा! उसने बिच्छू पण्डित से चिरौरी की - ‘गुरु! जरा एक बार और ध्यान से देख लो! कोई रास्ता निकलता हो।’ सुन कर बिच्छू पण्डित आपे से बाहर हो गए। मानो अर्चेन्द्र को धक्के देकर फेंक देंगे, कुछ इस तरह कहा - ‘तू तो मुझे जानता है! मैं धरम के काम में समझौता नहीं करता। फौरन निकल जा यहाँ से।’

बिच्छू पण्डित का स्वभाव जानता था अर्चेन्द्र। इसलिए उसने बुरा नहीं माना। मरी-मरी आवाज में कहा - ‘ठीक है गुरु! गुरुवार को हवन करवा देना।’ बिच्छू पण्डित खुश हो गए। हवन की पूरी रूपरेखा और पारिश्रमिक की रकम तय कर अर्चेन्द्र लौट आया। पिताजी को बताया। हवन गुरुवार को हो या शुक्रवार को। पिताजी को कोई फर्क नहीं पड़ना था। 

पूरा खाका अर्चेन्द्र के मन में शुरु से ही साफ था। व्याख्यान हेतु विद्वान् ब्राह्मण से उसने पहले की कच्ची बात कर रखी थी। तारीख तय होते ही बात पक्की कर दी। ताबड़तोड़ निमन्त्रण पत्र छपवाए। फोन और वाट्स एप पर सबको खबर कर दी। अपनी व्यवस्थाओं को लेकर वह पहले ही क्षण से निश्चिन्त था। अब उसने पूरा ध्यान, व्याख्यान में अधिकाधिक उपस्थिति पर केन्द्रित कर दिया। 

वह इसी काम में लगा था कि वह हो गया जिसने अचेन्द्र के विश्वास के वट-वृक्ष को जड़ सहित उखाड़ दिया।

जिस गुरुवार को हवन होना तय हुआ था, उससे पहलेवाले रविवार को बिच्छू पण्डित का फोन आया। वे कह रहे थे कि शनिवार को हवन सम्भव है। अर्चेन्द्र चाहे तो वे शनिवार को हवन करा देंगे। अर्चेन्द्र उलझन में पड़ गया। बात तो उसके मन की थी लेकिन कमान से तीर छूट चुका था। अब बदलाव मुमकिन नहीं था। अर्चेन्द्र ने कहा - ‘अब तो कुछ नहीं हो सकता गुरु! निमन्त्रण बँट गए, हलवाई और भोजन की जगह तय हो गई। लेकिन यह गुंजाइश कैसे निकल आई गुरु? उस दिन तो आपने साफ कह दिया था कि शनिवार को कोई हवन ही नहीं हो सकता। अब कैसे हो गया?’ बिच्छू पण्डित ने ‘वो ऐसा है। वो वैसा है! वो उस दिन उधर ध्यान नहीं गया।’ जैसे जवाब दिए। लेकिन अर्चेन्द्र के गले नहीं उतरी। उसने कहा - ‘गुरु! आपसे ऐसी चूक हो ही नहीं सकती। आपने तो उस दिन आधे घण्टे तक पंचाग उल्टा-पुल्टा था और ढेर सारी गणनाएँ की थीं। आधा घण्टा कम नहीं होता गुरु! कोई गुंजाइश होती तो आप बता देते। कोई दूसरा पंचाग तो नहीं देख लिया?’ जवाब में सफाइयाँ देने की रौ में बहकर बिच्छू गुरु ने एक बात ऐसी कह दी कि अर्चेन्द्र चेतनाविहीन, जड़ हो गया। बिच्छू पण्डित ने कहा - ‘ये सब तो देखने में मैं चूका ही लेकिन अभी-अभी खबर मिली कि उस शनिवार को मैंने बड़नगर में जो हवन कराने की हाँ भर रखी थी, वह प्रोग्राम केंसल हो गया है। अब मैं शनिवार को फ्री हूँ। चाहो तो शनिवार को हवन करा लो।’

अर्चेन्द्र को काटो तो खून नहीं। उसके जी में आया कि फोन में ही हाथ डालकर बिच्छू गुरु की गर्दन मरोड़ दे। कोई ग्रह और कोई कुयोग आड़े नहीं आ रहा था। उस दिन उन्हें बड़नगर जाना था इसलिए उस शनिवार को हवन का होना ही निषिद्ध कर दिया! सारा मामला बिच्छू पण्डित के पारिश्रमिक का था। वे धरम के काम में समझौता नहीं करते लेकिन अपने पारिश्रमिक की मोटी रकम के लिए धरम की बलि चढ़ा सकते हैं। अर्चेन्द्र तो समझ रहा था कि सनातन धर्म ही उनका धर्म है। लेकिन अब वे ही बता रहे हैं कि उनका धर्म तो उनके पारिश्रमिक की रकम है। अर्चेन्द्र ने खुद पर काबू किया। यह कह कर फोन बन्द कर दिया कि हवन तो गुरुवार को ही होगा। वे समय पर आ जाएँ।

गुरुवार को हवन और शुक्रवार को व्याख्यान तथा भोजन हो गया। अर्चेन्द्र की मेहनत रंग लाई। उपस्थिति उसकी अपेक्षानुरूप ही रही। पिताजी प्रसन्न हुए। उनकी आत्मा तृप्त हुई उन्होंने अर्चेन्द्र को खूब आशीष दिए।

यह सब मुझे सुनाने अर्चेन्द्र आया था। बहुत गुस्से में था। बिच्छू पण्डित को भारी-भारी गालियाँ दे रहा था। मैं बार-बार उसे समझाऊँ और वह हर बार पटरी से उतर जाए। कोई बीस-पचीस मिनिट बैठ कर (और बिच्छू पण्डित का वाचिक दाह संस्कार कर) लौटा। जाते-जाते कह गया - ‘ये स्साले पण्डित! इन्हें न भगवान पर भरोसा न ही भाग्य पर। अपने पुरुषार्थ पर भी भरोसा नहीं। जब बिच्छू गुरु ही ऐसा करें तो बाकी की क्‍या बात करें? ये करेंगे धरम की रक्षा? ये तो धरम को बेच खाएँगे। डुबो देंगे सनातन धर्म को।’

मैं क्या कहता? कहता भी तो किससे? अर्चेन्द्र तो जा चुका था।
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(इस प्रसंग के दोनों पात्र जीवित हैं और रतलाम में ही हैं। अर्चेन्द्र की सुरक्षा और बिच्छू पण्डित के कोप के भय से नाम बदल दिए हैं। भय यह भी रहा कि बिच्छू पण्डित मुझ पर मानहानि का मुकदमा न लगा दें। इन दिनों ऐसे मुकदमों का मौसम जो आया हुआ है। ) 

उन्होंने मुझे मन भर गुलाब जामुन खिलाए

मेरे ‘खाद्य मन्त्रीजी’ रोते-रोते हॉल में घुसे। उन्हें चलने में तकलीफ होती है। वकील बेटे जीतेन्द्र का सहारा ले, रोते-रोते ही हॉल पार किया और मेरे सामने बैठ गए। मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर, रोते रहे। वे कुछ बोलने की कशिश कर रहे थे लेकिन बोल नहीं पा रहे थे। हिचकियों के बीच, टुकड़ों-टुकड़ों मे बोले - ‘क्या यार! दादा सच्ची में चले गए?’

‘खाद्य मन्त्रीजी’ याने श्रीमाणक मेहता। मैं उन्हें गए पैंसठ बरस से जानता हूँ, जब वे तहसील कार्यालय में बाबू बनकर मनासा में आए थे। 1953 में। वे दादा की मित्र मण्डली में थे। मैं उनके बारे में कुछ नहीं जानता था। बस, यही कि वे दादा के मित्र हैं। मैं उन्हें ‘माणक भई’ कहता था। ‘खाद्य मन्त्रीजी’ तो बरसों बाद कहना शुरु किया। सन् 1980 में। तब मुझे भी रतलाम आए तीन बरस हो चुके थे।

इस मित्र मण्डली में कुल सात सदस्य थे। मालवा अंचल में बारहसिंघा प्रजाति का एक जानवर होता है - जरख। लोक व्यहार में उसे जरखड़ा कहते हैं। इसका अपभ्रंश रुप वरख/वरखड़ा/वरगड़ा है। यह जानवर नुकसान ज्यादा करता है। दादा की मित्र मण्डली को मनासा के लोग परिहासपूर्वक ‘हाता वरगड़’ याने ‘सात जरख’ कहते थे। लेकिन ये कहने भर को ‘हाता वरगड़’ थे। किसी का नुकसान नहीं करते थे। 

तनिक मुश्किल से माणक भाई का रोना थमा। वे अतीत को याद करने लगे। मण्डली के सातों सदस्य अपने काम से काम रखते। ये सात सदस्य थे - माणक मेहता, बालकवि बैरागी, सोहन मास्टर (सोहनलाल नागदा), मदन लाल व्यास, नन्दू व्यास (नन्दकुमार व्यास), बादर (बहादुर हुसैन) और फिद्दी (फिदा हुसैन)। माणक भई तहसील/कचहरी में और मदनलालजी व्यास कोर्ट में बाबू थे। दादा, जमनालालजी जैन वकील साहब के मुंशी थे। सोहन मास्टर, जैसा कि नाम से ही साफ था, मास्टर थे। नन्दकुमारजी व्यास कोर्ट और कचहरी के डाक्यूमेण्ट/पीटिशन रायटर थे। बादर भाई बस कण्डक्टर थे। फिद्दी भैया बस मालिक थे और खुद बस चलाते थे। मनासा में कोर्ट और कचहरी एक ही मैदान में है। सो, माणक भई, मदनजी व्यास और दादा दिन भर एक ही परिसर में रहते थे। सोहन मास्टर सा‘ब अपने स्कूल से निपट कर वहीं पहुँच जाया करते थे। बादर भाई और फिद्दी भैया शाम को फुरसत पाते थे। 

माणक भाई शुरु में दादा को दादा नहीं, ‘बैरागी’ कहते थे। माणक भाई ने कहा - “वो मुझे माणक कहते थे और मैं उन्हें बैरागी कहता था। जब मनासा में था तब दादा राजनीति में लगभग नहीं के बराबर थे। मैं मनासा से निकला उसके बाद दादा की राजनीतिक सक्रियता बढ़ी। उनकी राजनीतिक पहचान बनती और बढ़ती जा रही थी। साथ ही साथ वे बालकवि के रूप में स्थापित और लोकक्रिय होते जा रहे थे। उनका कद दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। हम जब भी मिलते, दादा तो सामान्य ही रहते लेकिन मुझे संकोच होने लगा - इतने लोगों के बीच उन्हें ‘ऐ बैरागी!’ कैसे कहूँ? इस बीच 1965 में मैं राजस्व विभाग से खाद्य विभाग में आ गया। 1967 में दादा विधायक बन गए और संसदीय सचिव भी। 1969 में वे राज्य मन्त्री बन गए। अब मुझे अधिक संकोच होने लगा। मैं उन्हें केवल ‘बैरागी’ सम्बोधित करूँ तो लोग क्या कहेंगे? उनका मन्त्री होना और मेरा कर्मचारी होना तो कभी आड़े नहीं आया लेकिन मैं खुद ही संकोचवश उन्हें दादा कहने लगा। लेकिन फर्क केवल सम्बोधन में आया। हमारे रिश्ते और व्यवहार में तिल भर भी फर्क नहीं आया। मैं उनका वही ‘माणक’ बना रहा और वे मेरे वही ‘बैरागी’ बने रहे।” 

याद करते-करते माणक भई फिर सिसकने लगे। बोले - “राजनेता और मन्त्री तो वे बहुत बाद में बने। लेकिन उससे पहले, जब-जब मुझे नौकरी में संकट आया, हर बार मेरे संकट मोचक बने। मुझे उनका बड़ा भरोसा था - कुछ भी होगा तो निपट लेंगे। दादा जो हैं!”

1980 में दादा खाद्य राज्य मन्त्री बनाए गए। माणक भई खाद्य निरीक्षक थे। एक दिन अचानक उनसे मुलाकात हो गई। वे बहुत नहीं, बहुत-बहुत-बहुत खुश थे। मैंने पूछा - ‘क्या बात है दादा? प्रमोशन हो गया क्या?’ मानो पूरी दुनिया मुझ पर न्यौछावर कर देंगे, कुछ इस अन्दाज में बोले - ‘अपने तो सारे प्रमोशन हो गए। दादा मन्त्री बन गए। यही अपना प्रमोशन है।’ मैंने कहा - ‘आप तो ऐसे कह रहे हो जैसे आप खुद खाद्य मन्त्री हो गए हो!’ माणक भाई बोले - ‘बिलकुल ठीक। अपन ही फूड मिनिस्टर हैं।’ मैंने टोका - ‘आप तो दादा को जानते हो। वो गैरवाजिब काम करेंगे नहीं और आपको छूट नहीं देंगे कि आप उनके नाम पर अफसरी करो।’ माणक भाई लहलहाते हुए, बेलौस मुद्रा मे बोले - ‘गैरवाजिब! अरे अपन को तो वाजिब काम के लिए भी कहने की जरूरत पहले भी नहीं पड़ी तो अब क्या पड़ेगी! मन्त्री तो दादा आज बने हैं। लेकिन पहले से ही ऐसा होता आ रहा है कि दादा को जैसे ही मालूम होता कि माणक तकलीफ में है, खुद ही दौड़े चले आते। और रही बात उनके नाम पर अफसरी करने की, तो ये तेने सोच भी कैसे लिया? मुझे अपनी नौकरी करनी है। मेरी वजह से दादा पर अंगुली भी उठ गई तो फिर क्या नौकरी की? लेकिन अपन को मन्त्री मानने से कौन रोक सकता है?’ उसी दिन से मैंने माणक भाई को ‘खाद्य मन्त्रीजी’ कहना शुरु कर दिया।

कुछ दिनों बाद माणक भई के घर गया। मुझे आया देख वे फिर भावाकुल हो गए। सामान्य हुए तो बोले - ‘मेरे पास हम सातों दोस्तों का एक फोटू है।’ कह कर उन्होंने तत्काल मुझे फोटू थमा दिया। मैं चौंका। यही फोटू मैंने दादा के एलबम में देखा था। बोले - ‘यह 14 मार्च 1954 का फोटू है।’ मैं पहली ही नजर में सबको पहचान गया। 

कुर्सियों पर बैठे हुए बाँये से - बालकवि बैरागी, मदनलाल व्यास, नन्द कुमार व्यास। 
खड़े हुए बाँये से - सोहनलाल नागदा (सोहन मास्टर), बहादुर हुसैन (बादर भाई), फिदा हुसैन (फिद्दी) और माणक मेहता।

मैंने कुरेदा - ‘दादा को लेकर कोई ऐसी याद, कोई ऐसी बात जो भूल नहीं पाए।’ माणक भाई तपाक से बोले - “हैं तो बहुत सारी लेकिन एक बात ऐसी रही कि उसके बाद मैंने कान पकड़ लिए कि दादा से कभी कोई फरमाइश नहीं करूँगा।

“मैं धोबी गली और गणेशपुरा गली वाले चौराहे पर, बद्री काका की दुकान के सामने झँवर सेठ के मकान में रहता था। कचहरी जाने के लिए गणेशपुरा गली, चौपड़ गट्टा पार कर, चारभुजा मन्दिर गली होते हुए जाता था। गणेशपुरा गली में लच्छा बा’ कँदोई (लक्ष्मीनारायणजी विजयवर्गीय हलवाई) की, मिठाइयों की दुकान थी। लच्छा बा’ घुटनों तक की धोती और लट्ठे की, बिना बाँहों की बनियान पहने बैठे रहते थे। वे खूब मोटे थे। ऐसा लगता था मानो अपनी बनाई मिठाइयाँ चखने के नाम पर पहले खुद पेट भर खाकर बैठे हों। उनके गुलाब जामुन  प्रसिद्ध थे। सुबह कचहरी जाते वक्त गरमा-गरम गुलाब जामुनों से भरी कढ़ाई मेरी नजरें खींच लेती थी। मावे और घी की खुशबू परेशान कर देती थी। लेकिन मँहगाई का जमाना और बाबू की नौकरी! बस! देख कर ही तसल्ली कर लेता था।

“एक दिन मुझसे रहा नहीं गया। मैंने दादा से कहा - ‘क्या यार! अपन भी कभी मन भर के गुलाब जामुन खा सकेंगे?’ दादा यारबाज ही नहीं, मस्तमौला भी थे। मुझे लेकर फौरन लच्छा बा’ की दुकान पर पहुँचे। लच्छा बा’ से बोले - ‘काकाजी! इसे मन भर गुलाब जामुन खिलाओ।’ लच्छा बा’ चौंके और डाँटते हुए बोले - ‘मन भर गुलाब जामुन कभी देखे भी हैं? मन भर देखे तो नहीं और बापड़े (बेचारे) मन भर खाने को चले।’ उस जमाने में तौल की इकाई छटाँक, पाव, सेर, मन होता था। चार छटाँक का एक पाव, चार पाव का एक सेर, चालीस सेर का एक मन। लच्छा बा’ उसी मन की समझे। दादा ने हँस कर कहा - ‘अरे! काकाजी! वो मन नहीं, आदमी का मन। गुलाब जामुन खाते-खाते जब तक माणक का मन नहीं भर जाए, तब तक इसे गुलाब जामुन खिलाओ।’ अब लच्छा बा’ समझे और दो-दो छँटाक गुलाब जामुन हमें थमा दिए। मेरा तो पेट और मन उसी में भर गया। लेकिन दादा ने मेरी नहीं सुनी। लच्छा बा’ ने फिर दो छँटाक गुलाब जामुन दे दिए। मुझसे खाया नहीं जाए। इधर दादा हैं कि ‘इसे और दो! और दो’ कहे जा रहे। मैं गुलाब जामुन मुँह में डालूँ और वह अन्दर जाने के बजाय बाहर आए। लच्छा बा’ को मुझ पर दया आ गई। उन्होंने दादा को डाँटा। तब कहीं मुझे मुक्ति मिली। उस दिन के बाद दादा से कभी कोई फरमाइश की भी तो खूब सोच-समझ कर बोला।”

माणक भाई मीठे-मादक अतीत में गुम थे। मुझे लौटना था। मैंने खँखार कर उनकी तन्द्रा भंग की। कहा - ‘आपके पास तो ढेर सारे किस्से होंगे। लेकिन मुझे जाना है। यह फोटू मुझे दे दीजिए। इसे स्केन करके लौटा दूँगा।’

और मैं लौट आया। मेरे खाद्य मन्त्रीजी, माणक भई को उनकी यादगाह में। मेरे दादा और उनके बैरागी के साथ छोड़कर।
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आभार - मैंने 'सोलह पाव का एक सेर' लिख दिया था। श्रीयुत के. डी. शर्मा ने टोका  - 'एक सेर में सोलह नहीं, चार पाव होते थे।' टोकते ही अपनी चूक अनुभव हुई। तत्‍काल दुरुस्‍ती की। बहुत-बहुत आभार शर्माजी। शर्माजी सहित तमाम कृपालुओं से आग्रह है - मुझ पर नजर बनाए रखिएगा और मुझे दुरुस्‍त करते रहिएगा। 

तू चन्दा मैं चाँदनी - 3

(दादा श्री बालकवि बैरागी के आकस्मिक निधन के बाद, फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ के उनके गीत ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ की बहुत चर्चा हुई। इस गीत से जुड़ा यह संस्मरण ‘एकोऽहम्’ पर    20 जुलाई  2007 को प्रकाशित हो चुका है। तब ब्लॉग जगत में मेरी उम्र कुल दो माह की थी। तब मैं, लेख में न तो फोटू लगाना जानता था न ही परमा लिंक। मित्रों के आग्रह पर इस लेख को मैं एक बार फिर दे रहा हूँ - दादा के निधन के बाद बनी स्थितियोंनुसार संशोधन, सम्पादन सहित।)



मनासा लौटने के बाद भी मुम्बई से दादा का सम्पर्क बना रहा। तब तक दादा को कवि सम्मेलनों के न्यौते मिलने लगे थे और वे मंच लूटने के लिए पहचाने जाने लगे थे। उनकी मालवी रचना ‘पनिहारी’ लोगों के दिलों पर तब से ही राज करने लगी थी। उन्हें ‘मालवी का राजकुमार’ कहा जाने लगा था। इसी क्रम में उनका सम्पर्क बालाघाट के अग्रणी खनिज व्यवसायी ‘त्रिवेदी बन्धुओं’, भानु भाई त्रिवेदी और मुकुन्द भाई त्रिवेदी से हुआ। इनकी रुचि फिल्मों में थी ही। नितिन बोस निर्देशित फिल्म ‘नर्तकी’ के निर्माता ये ‘त्रिवेदी बन्धु’ ही थे।

मुकुन्द भाई त्रिवेदी स्वतन्त्र रूप से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आना चाह रहे थे। सो, फिल्म बनना तय हुआ। मामला बातों से कागजों पर उतरना शुरु हुआ। गीत लिखने का जिम्मा दादा को मिला। ‘इन्द्रधनुष फिल्म्स’ बैनर तले बनी इस फिल्म के निदेशक थे बलवन्त दवे। स्पेशल इफेक्ट्स भी उन्हीं ने दिए थे। यह एक स्टण्ट/हॉरर/थ्रिलर श्याम-श्वेत फिल्म थी। नाम था - ‘गोगोला’। ऐसी फिल्मों की कहानी जैसी होती है, वैसी ही इस फिल्म की भी थी। उन दिनों के स्टण्ट फिल्मों के सुपरिचित नायक आजाद इस फिल्म के नायक और तबस्सुम इसकी नायिका थीं। संगीत का जिम्मा ‘रॉय और फ्रेंक’ को सौंपा गया। इनमें से कोई एक (सम्भवतः फ्रेंक), प्रख्यात संगीतकार रवि के सहायक थे। दादा की यह पहली फिल्म थी जिसके सारे के सारे गीत दादा ने लिखे थे। 

फिल्म बनी, सेंसर हुई और जैसे-तैसे प्रदर्शित भी हुई। उन दिनों रेडियो सीलोन से, सवेरे-सवेरे पन्द्रह मिनिट का कार्यक्रम (सम्भवतः सवेरे सात बजे) ‘एक ही फिल्म के गीत’ आया करता था। जिस दिन इस कार्यक्रम में ‘गोगोला’ के गीत बजे उस पूरे दिन हम सब लोग मानो नशे में रहे। फिल्म में चार गीत थे और यह संयोग ही था कि उस कार्यक्रम में चार गीत ही बजाए जाते थे। याने उस कार्यक्रम में, ‘गोगोला’ के सारे के सारे गीत बजे। इनमें से एक गीत (जो वस्तुतः गजल था) उन दिनों लोकप्रिय गीतों के दायरे में शामिल हुआ था। गीत का मुखड़ा था -

‘जरा कह दो फिजाओं से हमें इतना सताए ना।
तुम्हीं कह दो हवाओं से तुम्हारी याद लाए ना।’

इसे मुबारक बेगम और तलत महमूद ने गाया था। (दादा के आकस्मिक निधन के फौरन बाद, विविध भारती के सुपरिचित, लोकप्रिय उद्घोषक श्री युनूस खान ने दादा को इसी गीत से याद किया।) कुछ ही दिनों बाद ‘गोगोला’ के रेकार्ड दादा के पास आए। हमारे घर में रेकार्ड प्लेयर नहीं था। ऐसे समय में माँगने की आदत खूब काम आई। मैं ने एक रेकार्ड प्लेयर जुगाड़ा और पूरे चौबीस घण्टे वे रेकार्ड बजा-बजा कर सुनता रहा। शुरु-शुरु के कुछ घण्टों तक तो सबने आनन्द लिया लेकिन जल्दी ही वह नौबत आ गई कि मेरी पिटाई हो जाए। मुझे मन मार कर रुकना पड़ा।
गोगोला का पोस्टर 


यह फिल्म इन्दौर के महाराजा सिनेमा में लगी थी। इन्दौर के लोग इस बात की ताईद करेंगे कि इन्दौर के सिनेमाघरों में महाराजा सिनेमा श्रेष्ठता क्रम में अन्तिम स्थान पाता था। इस सिनेमा घर में फिल्म प्रदर्शित होना ही फिल्म के स्तर पर टिप्पणी होता था और यहाँ लगने वाली फिल्मों का दर्शक वर्ग स्थायी और चिर परिचित होता था। इसके बावजूद, फिल्म तो देखनी ही थी। सो दादा और उनके दो मित्र श्री कृष्ण गोपालजी आगार और श्री मदन मोहन किलेवाला, दादा की पहली फिल्म ‘गोगोला’ देखने हेतु इन्दौर के लिए चले। ये दोनों महानुभाव अब इस दुनिया में नहीं हैं। कृष्ण गोपालजी रहते तो मनासा में थे किन्तु व्यापार करते थे नीमच की मण्डी में। उन्हें मनासा का नगर सेठ होने का रुतबा हासिल था। वे प्रतिदिन नीमच आना-जाना करते थे। वे मनासा के एकमात्र ‘कार स्वामी’ हुआ करते थे। किलेवालाजी नीमच निवासी ही थे। वे न्यू इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी के विकास अधिकारी थे। वे फर्राटेदार, धमकदार, धमाकेदार अंग्रेजी बोलते थे। रहन-सहन और जीवन शैली बिलकुल अंग्रेज की तरह। उनसे वे लोग भी जलते और चिढ़ते थे जिनका उनसे कभी कोई लेना-देना न तो रहा और न ही रहनेवाला था। नीमच में उनकी अलग ही पहचान थी।दादा, कृष्ण गोपालजी को ‘केजी’ और किलेवालाजी को ‘एमएम’ के सम्बोधनों से पुकारते थे। कभी-कभी वे इन्हें ‘कनु’ और ‘मनु’ भी कहते । लेकिन ‘केजी’ और ‘एमएम’ ही इनकी पहचान बन गये थे। ‘केजी’ बहुत ही कम बोलने वाले, मानो संकोची हों या आत्म केन्द्रित जब कि ‘एमएम’ चुप्पी के बैरी। ये दोनों दादा के अन्तरंग मित्र थे, सुख-दुख के संगाती और अपनी सम्पूर्ण आत्मीयता और ममत्व से दादा की चिन्ता करने वाले लोग थे। इनका विछोह दादा के लिए आज मृत्युपर्यन्त मर्मान्तक बना रहा।

किलेवालाजी के बेटे सुदेश किलेवाला के सौजन्य से प्राप्त इस चित्र में सबसे बाँयेवाले सज्जन को मैं नहीं पहचान पाया। उनके पास, काला चश्मा लगाए किलेवालाजी (याने दादा के 'एमएम' या 'मनु') , फिर दादा, उनके पास बापूलालजी जैन, फिर कृष्णगोपालजी आगार (याने दादा के 'केजी' या 'कनु') और सबसे अन्त में हस्तीमलजी जैन वकील साहब। सबसे बाँयेवाले सज्जन के अतिरिक्त सब अब दिवंगत हैं।


इन्हीं दोनों के साथ दादा इन्दौर रवाना हुए। बल्कि कहा जाना चाहिए कि ये दोनों दादा को, दादा के गीतों वाली फिल्म दिखाने और खुद देखने, दादा को इन्दौर ले गए। कार, ‘केजी’ की ही होनी थी। यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि इन्हें ‘गोगोला’ देखने की खुशी ज्यादा थी या महाराजा सिनेमा में इस फिल्म के रिलीज होने का गम। दादा को ऐसी बातों से सामान्यतः कोई अन्तर नहीं पड़ता था। वे अपने को हर हाल में, हर दशा में बहुत जल्दी समायोजित कर लेते थे। अभावों को कुशलतापूर्वक जीने का अभ्यास उनके बड़े काम आता था। लेकिन ‘केजी’ और ‘एमएम’ के लिए महाराजा सिनेमा में प्रवेश करना इज्जत हतक से कम नहीं था। फिर भी अपने यार की खातिर इन दोनों ने, महाराजा सिनेमा को इज्जत बख्शने का ऐतिहासिक उपकार किया। फिल्म में देखने के नाम पर केवल गीतों का फिल्मांकन देखना था। लेकिन सारे के सारे गीत एक साथ तो आते नहीं। सो दोनों मित्र खुद को सजा देते हुए, कसमसाते हुए बैठे रहे। फिल्म समाप्त हुई। तीनों बाहर आए और मुकाम पर चलने के लिए कार में बैठे। कार सरकी ही थी कि ‘एमएम’ ने कुछ ऐसा कहा - “यार! बैरागी! ‘गोगोला’ देखनी थी सो देख ली  फिल्म में तो कोई दम है नहीं। गीतों की तारीफ क्या करना! लेकिन मजा तो तब आए जब तुम्हारा गीत लता गाए और उस पर वहीदा नाचे।” ‘केजी’ मुस्कुरा दिए। दादा कुछ नहीं बोले। महाराजा सिनेमा के दर्शकों की टिप्पणियाँ उनके कानों में शायद तब भी गूँज रहीं थीं। अपनी बात का ऐसा ‘कोल्ड रिस्पांस’ पा कर ‘एमएम’ को अच्छा तो नहीं लगा लेकिन चुप रहने के सिवाय वे और कर भी क्या सकते थे? सो, ‘एमएम’ की बात आई-गई हो गई। तीनों मित्र लौटे और अपने-अपने काम में लग गए।

लेकिन जब ‘उस सुबह’ दादा को, भोपाल में लताजी का फोन मिला और लताजी से बात कर दादा जैसे ही सामान्य-संयत हुए, वैसे ही उन्हें ‘एमएम’ की बात याद आ गई। वे भावावेग में रोमांचित हो गए। तब तक ‘रेशमा और शेरा’ की कास्टिंग सार्वजनिक हो चुकी थी और सबको पता था कि वहीदाजी इसकी नायिका हैं। ‘एमएम’ ने इच्छा प्रकट की थी या भविष्यवाणी की थी? दादा ने हाथों-हाथ ‘एमएम’ को फोन लगाया। ‘एमएम’ ‘नाइट लाईफ’ जीने वाले, 'आजाद हिन्‍दुस्‍तान में अंग्रेज आदमी' थे और उठने के मामले में ‘सूरजवंशी’। सो, दादा का फोन उन्होंने चिढ़ कर ही उठाया लेकिन जब किस्सा-ए-फोन सुना तो ऐसे चहके मानो सवेरे-सवेरे उनके घर, वंश वृध्दि का मंगल बधावा आ गया हो।

‘रेशमा और शेरा’ तीनों ने जब देखी और ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ पर वहीदाजी की भाव प्रवण भंगिमाएँ देखीं तो उनकी क्या दशा रही होगी, यह कल्पना करने का कठिन काम आप खुद कर लीजिए। वह प्रसंग उनके लिए आजीवन ज्यों का त्यों जीवन्त बना रहा। तीनों के गले रुँधे हुए थे और ‘एमएम’ खुद को, बार-बार चिकोटी काट-काट कर अपने होने को अनुभव कर रहे थे।

बात यहीं समाप्त हो जानी चाहिए। लेकिन एक और बात बताने से मैं अपने आपको को रोक नहीं पा रहा हूँ। सबके लिए यह बात बासी हो सकती है किन्तु यहाँ प्रासंगिक है।

आज की लोकप्रिय और स्थापित गायिका सुनिधि चौहान का रिश्ता भी ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ से है। मुझे यह तो याद नहीं आ रहा कि किस टी वी चैनल ने कौन सी प्रतियोगिता आयोजित की थी। किन्तु उस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पा कर ही सुनिधि चौहान ने पार्श्व गायन के क्षेत्र में प्रवेश किया था। प्रतियोगी के रूप में सुनिधि ने जो गीत गा कर प्रथम स्थान पाया था वह दादा का यही गीत था - तू चन्दा मैं चाँदनी।
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