लोकतन्त्र के मदारी

चुनाव के दिनों में ‘असामान्य ही सामान्य’ हो जाता है शायद। कहने वाले और सुनने वाले, दोनों ही इसके शिकार हो जाते हैं। शाश्वत सत्य की तरह स्थापित और जग जाहिर बातें भी इस तरह कही जाती हैं मानो कोई अजूबा प्रस्तुत किया जा रहा हो।


शुरुआत आडवाणी ने की और ‘क्रिया की समान तथा विपरीत प्रतिक्रिया‘ वाले, न्यूटन के नियम को चरितार्थ करते हुए अनुगमन किया सोनिया गाँधी ने।

आडवाणी ने कहा कि मनमोहन सिंह अपनी अकल से कोई निर्णय नहीं लेते। वे दस जनपथ के कहे अनुसार ही काम करते हैं। जवाब में सोनिया गाँधी ने आडवाणी को आरएसएस का गुलाम कहा।

इन दोनों ने कौन सी नई और अनूठी बात कही? केन्द्र में सरकार ‘संप्रग’ की है जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही है। सोनिया गाँधी, कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष तो हैं ही, वे ‘संप्रग’ की अध्यक्ष भी हैं। ऐसे में मनमोहन सिंह यदि सोनिया गाँधी की बात नहीं मानेंगे तो क्या मोहन भागवत की बात मानेंगे?

यही बात आडवाणी पर भी लागू होती है। हर कोई जानता है कि भाजपा की अपनी कोई औकात नहीं है। वह घोषित रूप से संघ का वह आनुषांगिक संगठन है जिसके माध्यम से संघ अपनी राजनीतिक इच्छाएँ पूरी कर रहा है। भाजपा में कोई भी तब तक ही प्रभावी हैसियत में रह सकता है जब तक कि संघ उसे टेड़ी नजरों से न देखे। भाजपा में सुखपूर्वक, निश्चिन्त राजनीतिक जीवन जीने के लिए संघ का अभय दान अनिवार्य और अपरिहार्य है। मुसलमानों को प्रभावित करने के लिए आडवाणी ने जिन्ना की मजार पर जाकर जिन्ना को ‘सेक्यूलर’ कहने पर जो प्रताड़ना और बहिष्कार झेली था वह सबने देखा है। भाजपा में तो मूत्र त्याग जैसी प्राकृतिक गतिविधियाँ सम्पन्न करने के लिए भी संघ की अनुमति आवश्यक होती है। ऐसे में यदि आडवाणी, संघ के गुलाम की तरह व्यवहार करें तो इसमें न तो किसी को अचरज होना चाहिए और न ही आपत्ति। वे संघ की गुलामी नहीं करेंगे तो क्या सोनिया गाँधी की गुलामी करेंगे?

मनमोहन सिंह और आडवाणी अपना-अपना काम न केवल पूरी निष्ठा से कर रहे हैं अपितु ऐसा करना दोनों की नियती भी है।

फिर भी, आडवाणी और सोनिया गाँधी इन बातों को ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे सड़क किनारे मजमा लगाए कोई मदारी ‘चुर घुसडूँ’ कहते हुए, बन्द मुट्ठी पर जादू का डण्डा घुमाते हुए कबूतर निकाल रहा हो।

लोगों को भी मजा आ रहा है। वे तो तमाशबीन हैं। सो, उन्हें भी तमाशा ही चाहिए।

लोकतन्त्र का तमाशा जारी है।

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5 लाख का बीमा लेना है। योजना और किश्त रकम बताएं

पौड़ी गढ़वाल से प्रदीपजी ने पूछा है - ‘मुझे 5 लाख का बीमा कराना हो तो छःमाही किश्त कितनी होगी और कौन सी स्कीम सबसे अच्छी होगी?’


इस प्रश्न का उत्तर अब मेरी आदत बन गया है क्योंकि बीमा एजेन्सी के मेरे अब तक के अठारह वर्षों में यह प्रश्न मुझसे सैंकड़ों बार पूछा जा चुका है।


इस प्रश्न का सीधा-सपाट उत्तर दे पाना किसी के लिए सम्भव नहीं होता।


किसे कितना बीमा लेना चाहिए अथवा किसे कितना बीमा दिया जा सकता है, इसके लिए कुछ आधारभूत सूचनाएँ आवश्यक होती हैं जिनके समुचित उत्तरों के बाद ही कोई परामर्श दिया जा सकता है।


ये सूचनाएँ इस प्रकार हैं -


-इस समय आपकी आयु क्या है?

-आपका वर्तमान व्यवसाय क्या है?

-इस समय आपकी सकल वार्षिक आय क्या है?

-आपकी आय की प्रकृति क्या है? स्थायी है अथवा अस्थायी?

-इस समय आपका और आपके परिजनों का कितना बीमा है?

-(यदि आपका और आपके परिजनों का बीमा है तो) इस समय आप प्रीमीयम के रूप में प्रति वर्ष कितनी रकम जमा करा रहे हैं?

-इस समय आपके पारिवारिक उत्तरदायित्व क्या हैं?

-नया बीमा लेने का उद्देश्य क्या है? (यथा, परिवार की आर्थिक सुरक्षा, आय कर नियोजन, भविष्य के लिए बचत, बच्चों की उच्च शिक्षा/विवाह हेतु व्यवस्था, किसी ऋण की जमानत के लिए आदि, आदि।)

-नये बीमे के लिए आप प्रति वर्ष कितनी रकम चुकाने की मानसिकता में हैं?

मुझे आपके बारे में उपरोक्त में से कोई भी जानकारी नहीं है। ऐसे में आपको सामान्य जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ। यह जानकारी 30 वर्ष की अवस्था वाले व्यक्ति के लिए है।


यदि आपका अब तक कोई बीमा नहीं है और आप केवल पारिवारिक सुरक्षा के लिए बीमा लेना चाहते हैं तो मेरा सुझाव है कि आप भारतीय जीवन बीमा निगम की ‘बन्दोबस्ती योजना’ (तालिका 14) में अपना बीमा कराएँ। चूँकि आपको आयु के 75 वर्ष तक के लिए बीमा मिल सकता है इसलिए आप पालिसी की अवधि 45 वर्ष रखें। अवधि की दीर्घता से घबराएँ नहीं। इसके बारे में आगे अलग से बता रहा हूँ।


5 लाख रुपये बीमाधन की वार्षिक किश्त रुपये 12,255 तथा छःमाही किश्त रुप्ये 6,226 होगी। ये किश्तें आपको 45 वर्षों तक चुकानी होंगी।


45 वर्ष बाद, जब आप आयु के 75 वर्ष पूरे कर चुके होंगे तब आपको लगभग रुपये 28,80,000 का भुगतान पालिसी की परिपक्वता राशि के रूप में मिलेगा। इस रकम में 5 लाख रुपये मूल बीमा धन, 45 वर्ष की अवधि के बानस की रकम 10 लाख 80 हजार रुपये तथा अन्तिम अतिरिक्त बोनस की रकम 13 लाख रुपये शामिल हैं। उपरोक्त में से बीमा धन 5 लाख रुपयों का भुगतान सुनिश्चित है जबकि बोनस की गणना मैंने 48 रुपये प्रति वर्ष प्रति हजार (अर्थात् 24 हजार रुपये प्रति वर्ष) के मान से की है तथा अन्तिम अतिरिक्त बोनस की गणना वर्तमान प्रचलित दर से की है। बोनस की रकम में कमी/वृध्दि हो सकती है।


इस पूरी समयावधि (45 वर्ष) में आपके जीवन पर 5 लाख रुपयों की बीमा सुरक्षा उपलब्ध रहेगी तथा इतनी ही रकम (अर्थात् 5 लाख रुपये) की ‘दुर्घटना हित लाभ सुरक्षा’ उपलब्ध रहेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि 45 वर्षों की इस समयावधि के दौरान सामान्य मृत्यु की दशा में पालिसीधारक के नामित व्यक्ति को 5 लाख रुपयों का (+ पालिसी प्रारम्भ होने से लेकर मृत्यु दिनांक तक की अवधि के बोनस की रकम का) भुगतान किया जाएगा। दुर्घटना मृत्यु की स्थिति में मूल बीमा धन के बराबर रकम (अर्थात् 5 लाख रुपये) का भुगतान नामित व्यक्ति को अतिरिक्त रूप से किया जाएगा।

आप जो प्रीमीयम चुकाएँगे उस पर आपको आय कर अधिनियम की धारा 80 सी के अन्तर्गत छूट मिलेगी तथा पालिसी से मिलने वाली रकम, आय कर अधिनियम की धारा 10 (10) (डी) के तहत आय कर से मुक्त होगी।


अब बात, पालिसी की अवधि 45 वर्ष की। सामान्यतः लोग अल्पावधि की बीमा पालिसियाँ लेने पर जोर देते हैं। यह ग्राहक के लिए गम्भीर घाटे का सौदा होता है।

मेरा सुनिश्चित मत है कि जीवन बीमा का निवेश ‘लाभ का सौदा’ नहीं होता। लाभ की तलाश वाले लोगों को जीवन बीमा की तरफ देखना ही नहीं चाहिए। किन्तु नाम मात्र की प्रीमीयम चुका कर लाखों की सुरक्षा प्राप्त करने की बात हो तो फिर जीवन बीमा का कोई विकल्प नहीं है। जीवन बीमा वस्तुतः ‘सुरक्षा का सौदा’ होता है। अर्थात् ‘रिस्क कवरेज’ का सौदा।

प्रथमतः तो हममें से हर कोई ‘लाभ’ को ही प्राथमिकता देगा। किन्तु यदि लाभ नहीं मिल रहा है तो फिर देखा जाना चाहिए कि हमें घाटा न हो। और यदि घाटा हो रहा हो तो लाभ में हो तो चलेगा, मूल में तो घाटा नहीं ही हो। ऐसे में बात जब ‘रिस्क कवरेज’ खरीदी की हो तो, ‘दीर्घावधि की खरीदी’ अन्ततः लाभ का सौदा बन कर सामने आती है।

अल्पावधि योजना में किश्त की रकम अधिक हो जाती है जबकि बोनस की रकम कम हो जाती है। इसलिए अल्पावधि योजनाएँ ग्राहक के लिए घाटे का सौदा होती हैं।

पालिसी अवधि के इन 45 वर्षों में यदि आपको बीच में धन की आवश्यकता अनुभव हो तो आप अपनी पालिसी पर लोन ले सकते हैं। ऐसे लोन पर वर्तमान में 9 प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज लिया जा रहा है। इस लोन की विशेषता यह है कि लोन लेने के बाद भी आपका रिस्क कवरेज कम नहीं होता। ब्याज की गणना छःमाही आधार पर की जाती है। लोन लेने की दशा में एक बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि ब्याज समय पर जमा करा दिया जाए। अन्यथा, ब्याज पर ब्याज लगना शुरु हो जाता है जिसके नकारात्मक प्रभाव पालिसी पर पड़ने की आशंका बन जाती है।

एक आशंका यह भी होती है कि आयु के उत्तरकाल में आय शून्य हो सकती है। तब पालिसी की किश्त जमा कराना असम्भव जैसा हो सकता है। ऐसी दशा में भी आप अपनी पालिसी पर प्रति वर्ष, किश्तों की रकम के बराबर लोन लेकर अपनी किश्तें आसानी से जमा करा सकते हैं और अपनी पालिसी को पूर्णावधि तक प्रभावी बनाए रखकर योजना के समस्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

आशा है, इस सामान्य प्रारम्भिक जानकारी से आपको कुछ सहायता मिली होगी।

मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप मुझे समस्त सूचनाएँ उपलब्ध करा दें। यदि आप ठीक समझें तो अपने एसटीडी कोड सहित अपना फोन नम्बर मुझे उपलब्ध करा दें। मैं अपनी ओर से आपसे सम्पर्क कर आपकी जिज्ञासा का समाधान करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करूँगा।

मुझे आत्मीय प्रसन्नता और सुख-सन्तोष मिलेगा, यदि मैं आपके लिए तनिक भी सहायक हो सका।
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किसकी कथा है यह?


कह नहीं सकता कि यह कथा सागर बाबू की है अथवा नहीं। किन्तु वे इस कथा के जनक-सूत्र अवश्य हैं। यह उनका वास्तविक नहीं, काल्पनिक नाम ही है।

श्रेष्‍ठी समाज के प्रतिष्ठित सागर बाबू अपने कस्बे के अग्रणी व्यापारी हैं। व्यवहार के साफ और बात के धनी। उन्होंने दन्त कथाओं को भी परास्त कर रखा है। वह कथा आपने सुनी/पढ़ी ही होगी जिसमें एक साहूकार, एक व्यक्ति की मूँछ का बाल, राजी-राजी गिरवी रख लेता है। मूँछों के स्वामी की स्थापित प्रतिष्ठा के चलते ही यह सम्भव हो सका था। किन्तु सागर बाबू इस लोक कथा से कोसों आगे हैं। उनकी अनुपस्थिति में भी कोई उनका नाम लेकर कुछ कह दे तो उस पर सन्देह करने का साहस पूरे कस्बे में कोई नहीं कर पाता। लोक प्रतिष्ठा ने सारे प्रतिमान/कीर्तिमान सागर बाबू के पर्याय बने हुए हैं। इन्हीं सागर बाबू की भागीदारी में जीतू ने व्यापार किया था।
जीतू ने अपनी आयु के बीस वर्ष पूरे किए ही थे कि वज्राघात हो गया। उसके पिता का आकस्मिक देहावसान हो गया। घर में कुल तीन सदस्य - जवान विधवा माँ, कोई सवा साल बड़ा भाई और खुद जीतू। घर का कोई खानदानी पेशा नहीं। जीतू की यारी-दोस्ती श्रेष्ठी परिवारों के लड़कों से थी। यह शायद सोहबत का ही असर रहा कि व्यापार-व्यवहार की कुशलताएँ, ब्राह्मण कुल में जन्मे जीतू की सहचरियाँ बन गईं। जीतू के पिता और सागर बाबू घनिष्ठ मित्र थे। (वैसे भी उस छोटे से कस्बे में ऐसा कोई नहीं जो सागर बाबू का घनिष्ठ मित्र न हो।) सो, माँ और बड़े भाई से सलाह कर, स्वीकृती प्राप्त कर जीतू ने परिवार की जमा पूंजी समेट कर सागर बाबू की भागीदारी में व्यापार शुरु कर दिया। भागीदारी को लिखित रुप देने का विचार क्षणांश को भी, किसी के भी मन में नहीं आया। सागर बाबू के प्रति लोक आस्था के चलते इसकी आवश्यकता भी किसी ने अनुभव नहीं की। जीतू ने सागर बाबू में अपने पिता को देखा और कस्बे में जिसने भी सुना, खुश ही हुआ कि चलो, जीतू को कोई लाइन मिल गई।
जीतू का अनवरत-अथक परिश्रम, सागर बाबू का नाम, सितारों का साथ और ईश्वर की अनुकम्पा का सकल परिणाम यह हुआ कि आशा और अपेक्षा से बहुत ही कम समय में मुनाफे का आँकड़ा, सात अंकों की भारी-भरकम संख्या में बदल गया। जीतू को तो मानो पर ही लग गए। कल्पनातीत और अपेक्षातीत सफलता ने उसके आत्म विश्वास को सहसगुना कर दिया। वह दीन-दुनिया को भूल कर व्यापार में ही डूब गया।
सब कुछ ठीक ही चल रहा था। कुछ समय बाद परिवार ने तय किया कि अब भागीदारी से मुक्त होकर खुद का व्यापार शुरु किया जाए। सो, जब सालाना हिसाब किताब हुआ तो जीतू ने अपनी इच्छा और परिवार का निर्णय बता कर सागर बाबू से अपने हिस्से की रकम माँगी।
यही वह क्षण था जिसमें वह अघटित घटित हो गया जिस पर बाकी दुनिया तो ठीक, खुद सागर बाबू भी शायद ही विश्वास कर पाते। सागर बाबू ने रुपये देने से दो टूक इंकार ही नहीं किया, जीतू के साथ किसी भी भागीदारी से ही इंकार भी कर दिया।
जीतू के पाँवों के नीचे की धरती सरक गई। उसने तो सागर बाबू में अपने पिता को ही देखा था! वह मानो मूक-बधिर हो गया। समूचा ब्रह्माण्ड उसे रसातल में जाता दिखाई दे रहा था। अपना वर्तमान ही नहीं, समूचा भविष्य चौपट नजर आ रहा था। वह क्या करे? किससे कहे और क्या कहे? भले ही पूरा कस्बा जानता हो कि जीतू ने सागर बाबू की भागीदारी में व्यापार किया है किन्तु यदि सागर बाबू इससे इंकार करें तो सब उनकी ही बात मानेंगे।
सागर बाबू के यहाँ से जीतू अपने घर कैसे लौटा, जीतू को आज तक पता नहीं। किस्सा सुनकर माँ और भाई को विश्वास ही नहीं हुआ कि सागर बाबू ऐसा कर सकते हैं। तीनों ही अवसाग्रस्त थे। एक दूसरे की शकल देखे जा रहे थे, बोल कोई नहीं रहा था। जीतू बताता है - ‘वे क्षण हमारे जीवन के सबसे भारी क्षण थे। पिता के अकस्मान निधन से उपजी अनिश्चितता इस बार उससे सौ गुना अधिक विकराल बन कर सामने खड़ी हो गई थी।’
ऐसे विकट समय में तीनों ने अपने ब्राह्मण संस्कारों का सहारा लिया और तय किया कि यह बात किसी से नहीं कहेंगे और किसी से कोई शिकायत भी नहीं करेंगे। लेकिन तय करना जितना आसान रहा, उस पर अमल करना उससे करोड़ों गुना अधिक दुरुह था। किन्तु अन्ततः परिवार ने खुद को इस सदमे से उबार ही लिया।
जीतू बताता है कि उसके परिवार की चुप्पी समूचे कस्बे में बोलने लगी और ऐसी बोलने लगी कि सागर बाबू का बाहर निकलना कुछ दिनों के लिए तो बन्द ही हो गया। उनके सामने तो कोई कुछ नहीं कहता था किन्तु पीठ पीछे कोई भी चुप नहीं रहता था। बात जब निकलती है तो दूर तलक जाती ही है। फिर, सागर बाबू तो दूर भी नहीं थे। कस्बे में ही तो थे! सो उन तक क्यों नहीं पहुँचती? लेकिन अपने जीवन के सम्भवतः इस एकमात्र आपवादिक स्खलन को स्वीकार कर पाने का साहस वे खो चुके थे। सो, यदि कभी किसी ने कुछ पूछा भी तो या तो चुप ही रहे या फिर ऐसा कुछ कहा जिसका कोई अर्थ नहीं होता।
जीतू और उसके परिवार ने भले ही सन्तोष कर लिया था किन्तु बात मन से निकल नहीं रही थी। सो, एक दिन जीतू अपनी जन्म कुण्डली लेकर अपने कस्बे से कोई पैंतीस किलोमीटर दूर, जिला मुख्यालय वाले कस्बे में जाकर अपने पिता के परम मित्र ज्ञान सिंहजी से मिला।

ज्ञान सिंहजी जन्मना क्षत्रिय हैं और क्षत्रिय गर्व से अभिभूत भी। किन्तु सादगी, विनम्रता, दृढ़ता के मानवाकार और विप्र आचरण के अनुपम उदाहरण। वे जिला शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और ज्योतिष में यथेष्ठ हस्तक्षेप रखते हैं। जीतू का समूचा परिवार उन्हें अपने कुटुम्ब का वरिष्ठ और परम् हितैषी मानता है। वे भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं।


जीतू ने अपनी जन्म कुण्डली ज्ञान सिंहजी को दी, पूरा किस्सा सुनाया और आगत की आहट सुननी चाही। ज्ञान सिंहजी ने ध्यान से पत्रिका देखी, देर तक देखी और एक तरफ रख दी। जीतू की प्रश्नाकुल दृष्टि ज्ञान सिंहजी की आँखें में गड़ी हुई थी। अपनी रकम डूबने से अधिक वेदना उसे इस बात की थी कि सागर बाबू जैसा आदमी उसके साथ धोखा कैसे कर सकता है? ज्ञान सिंहजी ने भेदती नजरों से जीतू को देखा। अपनी आँखें बन्द कीं, मानो ध्यान में जा रहे हों। लम्बी साँस ली और अध्र्द निर्लिप्त नेत्र मुद्रा में रहते हुए उस दिन, उस समय उन्होंने जीतू से जो कुछ कहा, वह इस क्षण तक जीतू के जीवन की सर्वाधिक मूल्यवान जीवनी-शक्ति बना हुआ है।

जैसा कि मुझे जीतू ने बताया, ज्ञान सिंहजी ने कहा कि सागर बाबू ने तो कुछ भी गलत नहीं किया। उन्होंने तो वही किया जो उनकी प्रकृति था। यह तो जीतू की ही गलती रही जो उसने सागर बाबू को भला, ईमानदार, विश्वसनीय और पितृतुल्य माना। उन्होंने तो जीतू से नहीं कहा था कि वह यह सब माने? यह जीतू की अपनी प्रकृति रही कि उसने सागर बाबू को वैसा माना और तदनुसार ही उनके साथ व्यवहार किया। ज्ञान सिंहजी ने कहा - ‘लोग तुम्हारी अपेक्षा और धारणा के अनुरुप खुद को कभी नहीं बदलेंगे। तुम्हार नियन्त्रण केवल तुम तक ही सीमित है। यह तो तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तुम उन्हें भली प्रकार देखो और फिर उनके बारे में धारणा बना कर तदनुसार उनसे व्यवहार करो। जो भी करना है, तुम्हें ही करना है। सामने वाले को बदलने की तुम्हारी कोई भी कोशिश अन्ततः तुम्हारे लिए ही त्रासदायी होगी।’

जीतू ने कहा - ‘विष्णु भैया! वह दिन और आज का दिन। अब मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं होती। मेरे साथ यदि कुछ अवांछित होता है तो उसके लिए मैं खुद को ही जिम्मेदार मानता हूँ, किसी दूसरे को नहीं। अब जब भी कभी मैं किसी से धोखा खाता हूँ तो अपनी ही गलती मानता हूँ कि मैंने ही सामने वाले का आकलन करने में चूक की थी और उसी का दण्ड मुझे मिला।’

सागर बाबू बाबू आज भी अपने कस्बे में अपना काम कर रहे हैं। कहना न होगा कि इस अपवाद ने उनकी लोक आस्था को स्थायी रूप से खण्डित किया। ज्ञानसिंहजी इस समय 83 वर्ष की अवस्था में पूर्णतः स्वस्थ, सक्रिय हैं। अपना सारा काम खुद करते हैं। फिटनेस के मामले में वे अपनी उम्र के तमाम लोगों से मीलों आगे हैं। जीतू इस समय शारजाह में एक भारतीय अन्तरराष्ट्रीय कम्पनी में वाइस प्रेसीडेण्ट के पद पर कार्यरत है। बड़ा भाई भारत सरकार के एक सर्वाधिक विश्वसनीय उपक्रम में, मुम्बई में पदस्थ उच्चाधिकारी है। दोनों के पास कोई कमी नहीं है। किन्तु माँ को अब भी चैन नहीं मिल पा रहा है। दोनों भाई चाहते हैं कि ‘माँ मेरे ही पास रहे।’ सो, माँ मुम्बई और शारजाह के बीच ‘शटल’ बनी हुई है।

इतना सब लिख देने के बाद भी इस आलेख का शीर्षक मेरे लिए प्रश्न ही बना हुआ है। यह किसकी कथा है? सागर बाबू की? जीतू की? या गीता का तत्व ज्ञान देने वाले ज्ञान सिंहजी की?


सदैव की तरह इस बार भी मैं आप पर ही निर्भर हूँ।


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(बाँया चित्र ज्ञान सिंहजी का और दाहिना चित्र जीतू का)
सम्‍‍पर्क : ज्ञान सिंहजी - ०७४१२ २४१७२७
जीतू : 00971-5-2180198 ई-मेल : jvaidya@eim.ae
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वह रोहित की सगी माँ ही थी

शाम हुई नहीं थी। होने ही वाली। दिन भर का थका मैं, घर लौटा था। कपड़े बदल कर पाँव फैलाए ही थे कि दरवाजे पर रोहित प्रकट हुआ। बिना किसी भूमिका के, हाँफता-हाँफता बोला - ‘मेरी मम्मी की पालिसी चालू कर दो और वारिसों में मेरा नाम भी जोड़ दो।’ मुझे सम्पट नहीं पड़ी। समझ ही नहीं पाया कि वह चाहता क्या है। मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा। उत्तर में उसने प्रश्न किया - ‘आपने मेरी मम्मी का बीमा कर रखा है ना?’ मैंने कहा - ‘कर रखा है नहीं, कर रखा था।’ रोहित बोला -‘हाँ। वही तो!’ मैंने पूछा - ‘तो?’ तनिक झुंझला कर रोहित बोला -‘तो क्या? उसी की तो बात कर रहा हूँ! उसे ही चालू कर दो और वारिसों में मेरा नाम भी जोड़ दो।’

मैंने कहा - ‘बन्द पॉलिसी चालू करना मेरे हाथ में नहीं है। वैसे भी आज दफ्तर बन्द हो चुका है और पॉलिसी चालू करने के लिए तुम्हारी मम्मी का मेडिकल कराना पड़ेगा। बकाया सारी किश्तें जमा करानी पडेंगी। उसके बाद ही पॉलिसी चालू हो सकेगी। यह सब एक दिन में तो हो नहीं पाएगा। और हो भी गया तो अब यह कल ही होगा।‘ रोहित झुंझला गया। बोला - ‘मेडिकल तो उसका कई दिनों से हो रहा है और रही बकाया किश्तों की बात? सो बताओ, कितने रुपये जमा कराने पड़ेंगे? मैं अभी आपको दे देता हूँ। साथ लेकर आया हूँ।’

मैं चकरा गया। मैंने पूछा -‘मेडिकल रोज हो रहा है से क्या मतलब?’ रोहित का उत्तर था - ‘आपको पता नहीं? मम्मी को केंसर हो गया है। साल भर से जयपुर में इलाज चल रहा था। वहाँ डॉक्टरों ने जवाब दे दिया और कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता, घर ले जाओ। परसों ही हम सब जयपुर से लौटे हैं और मम्मी को जिला अस्पताल में भरती कर रखा है। वहाँ भी डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। घर ले जाने को कह दिया है। पापा और भैया मम्मी को घर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। मैं उन्हें बताए बिना आपके पास आया हूँ। आप फटाफट मम्मी की पॉलिसी चालू कर दो और वारिसों में मेरा नाम भी जोड़ दो। मम्मी मरने ही वाली है। आप देर मत करो।’

मनुष्य प्रकृति के अनुरूप जितने भी भाव और विचार हो सकते हैं, वे सब के सब अन्धड़ बन कर मेरे मन-मस्तिष्क में घुस बैठे। मैं तय नहीं कर पा रहा था कि रोहित से कैसा व्यवहार करुँ? उसे प्रताड़ित करुँ? पुचकारुँ? सहानुभूति या दया भाव जताऊँ? उसका गला दबा कर उसकी हत्या कर दूँ? जूते मारता-मारता, मेरे घर से उसके घर तक ले जाऊँ और उसकी मरणासन्न माँ को सारी बात बताऊँ? अपना सर पीट लूँ? अपने बाल नोच लूँ? जोर-जोर से रोऊँ? याने कि एक बात मन में आकर मुझे सलाह दे, मैं किसी निष्कर्ष पर पहुँचूँ, उससे पहले ही दूसरी बात सामने आ खड़ी हो रही थी। मुझे सामने खड़े रोहित की नहीं, उसकी माँ की शकल नजर आ रही थी। उस माँ की शकल, जिसे मरता छोड़ कर रोहित दौड़ा-दौड़ा मेरे पास चला आया था-माँ के लिए जीवन माँगने नहीं, मर रही माँ को खनकदार रुपयों में बदलने में मेरी मदद माँगने के लिए।

शायद ईश्वर ही मेरी सहायता कर रहा था। मैंने अपने आप को, संयत स्वरों में कहते सुना - ‘रोहित! फौरन घर जा। तेरी माँ अन्तिम साँस ले, उससे पहले उससे दो बोल बोल ले, दो बोल सुन ले। उसकी आँखें तुझे तलाश रही होंगी। उसके प्राण तुझमें अटके होंगे। जा। सब काम छोड़ कर, उल्टे पाँवों अपनी माँ के पास जा।’

मेरी आशा और अपेक्षा के विपरीत रोहित मानो आपे से बाहर हो गया। चिल्लाते हुए, मुझे लगभग डाँटते हुए बोला - ‘मुझे मालूम है कि मेरी माँ मर रही है। मैं नहीं जाऊँगा तो भी वह बचेगी नहीं। आप मुझे उपदेश मत दो। मुझे मालूम है, मेरी मम्मी का, एक लाख का बीमा है। आप तो पॉलिसी फौरन चालू करो और वारिसों में मेरा नाम जोड़ो। कितने रुपये देने हैं और कहाँ दस्तखत करने हैं, यह बताओ।’

मैंने अपनी असमर्थता बताई तो इस बार रोहित हत्थे से उखड़ गया। अपनी पूरी शक्ति लगा कर बोला -‘दो साल की किश्तें भरी हैं। तीन साल से किश्तें नहीं भरी तो इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम मेरी माँ के एक लाख रुपये डकार जाओ। वह पैसा तो मेरा है। मैं लेकर रहूँगा। आप अपना काम करो। पॉलिसी चालू करो और वारिसों में मेरा नाम जोड़ो।’

यह सब मेरे लिए न केवल अप्रत्याशित था अपितु असहनीय भी था। मैं फूट पड़ा। अपने अब तक के जीवन में मैंने किसी को इतना प्रताड़ित नहीं किया, इतना भला-बुरा नहीं कहा, जितना उस शाम मैंने रोहित को किया/कहा।

रोहित को मुझसे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा और अनुमान नहीं रहा होगा। वह घबरा गया और सचमुच में उल्टे पाँवों पीछे हटने लगा-मुझे कोसते हुए।

किन्तु मेरा दुर्भाग्य अभी शेष था। मुझे कोसने के साथ-साथ अब रोहित अपनी माँ को भी कोस रहा था। मालवा में विधवा स्त्री के लिए अपमानजनक सम्बोधन ‘राँड’ प्रयुक्त किया जाता है। अपनी माँ को कोसते-कोसते रोहित भूल गया कि उसके पिता जीवित है और उसकर माँ सुहागिन है। वह कह रहा था - ‘राँड से हजार बार कहा था कि किश्तें टेम पर भरती रह। पॉलिसी बन्द मत कर। राँड ने नहीं सुनी। वह तो मर गई और मरते-मरते एक लाख का सदमा और दे गई।’

रोहित चला गया। मुझे और अपनी माँ को कोसते हुए। मैं उसे अपनी मर रही माँ के लिए क्रन्दन करते, विलाप करते देखना चाह रहा था। चाह रहा था कि अपनी माँ की मृत्यु की कल्पना मात्र से वह मूर्छित हो जाए और उसे, उसके घर तक पहुँचाने का श्रम मुझे करना पड़े। किन्तु उसके चेहरे पर ऐसा कुछ भी नहीं था। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अपनी मरणासन्न माँ के प्रति कोई बेटा ऐसा भाव, ऐसा व्यवहार कर सकता है। उसके चेहरे और जबान पर अपनी माँ के लिए धिक्कार-भाव और श्राप थे।

अगले दिन, रोहित की माँ के अन्तिम संस्कार के दौरान मालूम हुआ कि रोहित जब मेरे घर आया था तब उसकी माँ मर चुकी थी। उसके पिता और बड़ा भाई, मृत देह को अस्पताल से घर ले जाने का उपक्रम कर रहे थे। उसी समय सबकी नजरें बचा कर रोहित मेरे घर आया था। पॉलिसी में, नामित व्यक्ति के स्थान पर उसके बड़े भाई का नाम था। अस्पताल से उसकी अकस्मात अनुपस्थिति को सबने ‘माँ की मृत्यु से आहत, व्याकुल-व्यथित पुत्र की अनुपस्थिति’ मान लिया था।

इस घटना को आठ वर्ष पूरे हो रहे हैं। रोहित अब भी यदा कदा मुझे मिल जाता है। हम दोनों में देखा-देखी से अधिक कुछ नहीं होता। बस! अन्तर इतना ही होता है कि उसकी नजरों में नफरत होती है और मेरी नजरों में भय और विस्मय।

आठ बरस बाद भी मुझे यह लिखने में अपना सम्पूर्ण आत्म बल जुटाना पड़ रहा है कि मरने वाली स्त्री सचमुच में रोहित की सगी माँ ही थी-उसे जन्म देने वाली।

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रिश्तों को बदरंग कर देता है अन्ध विश्वास

{साप्ताहिक उपग्रह (रतलाम) के 9 से 15 अप्रेल वाले अंक में प्रकाशित यह लेख मेरे धारदार बालसखा अर्जुन पंजाबी का है। नीमच और मन्दसौर जिले के पाँच-छः अखबार, अर्जुन के लिखे को सप्ताह में दो-तीन दिन छापते ही छापते हैं। उसके व्यंग्य, पढ़ने वाले को ‘अश्-अश्’ करने को विवश कर देते हैं।
यह लेख पढ़ कर मुझे आश्यर्च हुआ क्यों कि ज्योतिष और कुण्डली जैसी बातें उसके लेखन की विषय वस्तु कभी नहीं रही। लेख पढ़कर मेरी ‘छठवीं इन्द्री’ जाग्रत हो गई। मैंने अर्जुन को फोन लगाया तो आशा भाभी ने बताया कि वह जयपुर गया हुआ है। मुझे चैन नहीं पड़ा। मैंने मनासा में उसके आसपास के कुछ मित्रों के फोन घनघनाए। आठवें प्रयत्न में मुझे सफलता मिल गई।
यह लेख एक सत्य घटना से उपजा है। अर्जुन के (और मेरे भी) एक घनिष्ठ मित्र की बिटिया का रिश्ता (जातिगत स्तर पर आयोजित एक परिचय सम्मेलन में) तय हो ही गया था। लड़की-लड़के की आपसी पसन्द सहित सारी की सारी बातें सौ टका अनुकूल थीं। किन्तु बात ‘कुण्डली मिलान’ पर आकर अटक गई। लड़के की माँ इस मामले में ‘कोई भी जोखिम’ नहीं लेना चाहती थी और परिचय सम्मेलन में, लड़कीवालों के पास कुण्डली थी नहीं। उन्हें बाद में कुण्डली भेजी गई। दोनों कुण्डलियों का मिलान नहीं हुआ। सो लड़के की माँ ने क्षणांश का भी विलम्ब किए बिना इंकार कर दिया। लड़की वालों की छोड़िए, खुद लड़का और लड़के का पिता भी इस सम्बन्ध के लिए उतावले थे। दोनों ने रिश्ते के लिए जोर दिया किन्तु लड़के की माँ टस से मस नहीं हुई और लगभग बना-बनाया रिश्ता (ऐसा बना-बनाया कि केवल लग्न लिखे जाना ही बाकी रह गए थे) टूट गया।
यह लेख न केवल अर्जुन के गुस्से को प्रकट करता है अपितु परम्परा को रूढ़ी बनते देखने की विवशता से उपजी खीझ भी उजागर करता है। अर्जुन के इस लेख को यहाँ देने से मैं खुद को रोक नहीं पाया।}

मौजूदा विसंगत और विकट समय में लोगों ने दूसरों के लिए सोचना बन्द कर दिया है। बात कोई भी हो, मूल्यांकन का आधार 'आर्थिक' ही हो गया है और रिश्तों की ऊष्मा तथा मिठास मानो गुम हो गई है। अन्ध विश्वास ने इसमें आश्चर्यजनक योगदान दिया है।ऐसे अन्ध विश्वासों वाली बातें तो यद्यपि बहुत हैं पर ‘कुण्डली-मिलान’ इनमें यदि प्रमुख नहीं तो महत्वपूर्ण तो है ही।

आम आदमी के जीवन में सतत् बढ़ते जा रहे आर्थिक तनावों/दबावों और दिन-प्रति-दिन सिकुडती जा रही दुनिया में ‘कुण्डली मिलान’ एक मुद्दा तो हो सकता है पर इसे बुनियादी और एकमात्र निर्णायक मुद्दा मान लेना किसी भी तरह उचित नहीं है। सही अर्थों में यह भटकाव है, भूल है।कुण्डली का कोई गणितीय या वैज्ञानिक आधार होता तो अलग-अलग पण्डित इसका भाष्य अलग-अलग नहीं करते। यदि दो और दो यहाँ चार होते हैं तो लन्दन और अमेरिका में भी चार ही होंगे। पाँच या तीन नहीं होंगे। पर कुण्डली के मामले में ऐसा नहीं है। इसमें कहीं पाँच हो जाते हैं, कहीं तीन हो जाते हैं, और कहीं दो-एक ही रह जाते हैं।

'गुण मिलान' के मामले में कुछ दिन पहले तक कहा जा रहा था कि कम से कम सत्‍तर प्रतिशत गुण तो मिलने ही चाहिए। अब यह अनिवार्यता तीस प्रतिशत पर आकर टिक गई है। ‘मांगलिक-अमांगलिक’ देखने को लेकर कहीं कहा जाता है कि 20 वर्ष की आयु के बाद इस देखने का कोई अर्थ नहीं है तो कहीं यह आयु 25 वर्ष तक की छूट दे रही है। कहीं मांगलिक के ‘परिहार’ हैं कहीं उन्हें नहीं माना जाता।

एम.एससी. कर, सी.बी.एस.ई. पाठ्यक्रम की कक्षाएँ पढ़ा रही एक युवती की कुण्डली देख कर पण्डित ने कह दिया कि ‘काल सर्प योग’ है। किन्तु वही कुण्डली जब जाने माने ज्योतिषाचार्य श्री राधाकिशन श्रीमाली को दिखाई (और काल सर्प योग वाली बात बताई) तो उन्होंने छूटते ही कहा - ‘किस पण्डित ने कहा है कि काल सर्प योग है? इन पण्डितों से कहो, भैय्या! सौ पाँच सौ लेना है तो यूँ ही ले लो पर ऐसे गुमराह मत करो।’

यह मामला बताता है कि कुण्डली मिलान अवैज्ञानिक है। और यदि इससे अलग हटकर और कुछ है भी तो इसका सही भाष्य नहीं है। सटीक कुछ भी नहीं है।इसमें विचारने की बात यह भी है कि संसार के मुश्किल से दो प्रतिशत लोग ही ‘कुण्डली-मिलान’ को आधार बनाते हैं। क्या शेष, अधिसंख्य लोग, अकाल और अप्रत्याशित मौत मर रहे हैं? वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। ये तमाम 98 प्रतिशत लोग वे हैं, जो अपनी नींद सोते हैं, अपनी नींद जागते हैं। विचारों के खुले आकाश में, अपनी जिन्दगी जीते हैं, उधार की नहीं। वे नाड़ी दोष, गण दोष, नवम् पंचम, बैर योनी, गृह मैत्री दोष, नक्षत्र दोष, कालसर्प दोष, मंगल दोष से घिरे किसी चक्रव्यूह में अपने ‘रिश्तों के अभिमन्यु' को नहीं भेजते हैं। वे इस बात से वाकिफ हैं कि दुर्योधन- शकुनी-कर्ण-जयद्रथ-दुःशासन से सज्जित यह चक्रव्यूह षड़यन्त्रपूर्वक अभिमन्यु को घेर लेता है। अभिमन्यु उसमें जा तो सकता है, उसे तोड़कर बाहर नहीं आ सकता। कुण्डली मिलान भी ऐसा ही मामला है। इसमें जाने या न जाने तक आप स्वतन्त्र हैं। बाद में नहीं। चिन्तन करें और निर्णय लें।

‘कुण्डली-भीरु’ बनना ठीक नहीं। एक हद तक उस पर भरोसा किया जा सकता है किन्तु ‘वहम्’ की सीमा तक चले जाना घातक है। ‘वहम्’ तो ऐसा मानसिक रोग है जिसमें व्यक्ति अपनी ही रसोई में गिरने वाले बर्तन से पैदा हुई आवाज से भी बुरी तरह चैंक जाता है। बर्तन गिरना ‘अप्रत्याशित’ है, पर है स्वाभाविक। जीवन में घटित ‘अनहोनी-अप्रत्याशित’ भी स्वाभाविक है। उसे ग्रहों के खेल मान लेना अन्धविश्वास है। हमें इससे उबरना होगा। ईश्वरवादी बनना होगा।

इसमें तथ्यपरक एक और बात यह है कि जब ऐसा कुण्डली मिलान नहीं किया जाता था तो रिश्तों में आज की बनिस्बत अधिक मेल था। न यूँ बेटियाँ तिल-तिल जल रही थीं, न बहुएँ आग में जलती थीं, न रिश्ते टूटते थे इस कदर, न इतने ‘तलाक’ होते थे। ‘कुण्डली मिलान’ ने ‘बेमेल-अनचाहे रिश्तों को जन्म दिया है। कटुता को बढ़ाया है।

रिश्तों के लिए पुनः विचारें। ईश्वर पर, संयोग पर भरोसा करें। और बनने दें उस रिश्ते को, जो मन को, आत्मा को ठीक लग रहा है। बनने दें उस बात को जो प्रथम दृष्टि में ही सुकून दे रही है। जँच रही है। भा गई है। बनने दें उस बात को जो ईश्वर की मर्जी से बन रही है। रिश्ते जब ऊपर से बनकर आते हैं, तो बनाने दें उस ऊपर वाले को। ये रिश्ते ऐसे होंगे जिन्हें हम अपनी बुद्धि की अपेक्षा संयोग के हाथों, विश्वास के हाथों सौंपेंगे। वे न केवल बेहतर होंगे, सुख, समृद्धि, सुकून, सन्तोष, सौभाग्य दायक भी सिद्ध होंगे।

तय करें कि हम कुण्डली मिलान को सतही तौर पर रखेंगे। ईश्वर के मिलान पर भरोसा ज्यादा करें। तब हम लौट सकेंगे उस खुशनुमा समय की ओर जिसमें रिश्तों में भरपूर प्रेम-प्यार था, तालमेल था, सौहार्द्र भाव था, दोस्ती थी, एक-दूसरे की मर्यादा को कायम रखने का भाव था। रिश्तेदारी में भाईचारा और सगापन था। ऐसे ही शीतल भावों में पल्लवित रिश्तों की फसल उगाएँ। हर जंजीर, हर बन्धन, हर जकड़न, हर कैद की सलाखों से बाहर आकर मुक्त विचारों के आकाश में रिश्तों की फसल को यदि लहलहाना है तो खुले विचार-खुले दिल को रिश्ते की बुनियाद बनाएँ। सतही मुद्दों को प्रमुख न बनाएँ । तब ही बनेगी बात। तब बनेंगे रिश्ते। अस्तु।

सम्‍‍पर्क : अर्जुन पंजाबी, 'आशा भवन', गोविन्‍‍द कॉलोनी, रानी लक्ष्मीबाई मार्ग, मनासा-458110 (जिला-नीमच)(मध्य प्रदेश)। फोन - 07412 242007 मोबाइल - 094240 66651

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समनुदेशन अर्थात् बीमा पालिसी को मूल्यवान सम्पत्ति का दर्जा

हममें से अधिकांश इस बात पर आश्चर्य ही करेंगे कि जीवन बीमा पालिसी को ‘मूल्यवान सम्पत्ति’ की तरह भी प्रयुक्त किया जा सकता है। किन्तु, जीवन बीमा क्षेत्र में यह अत्यन्त सहज और प्रचलित वास्तविकता है। इसका ज्ञान उस प्रत्येक पालिसीधारक को हो चुका होगा जिसने किसी वित्तीय संस्था से साधारण ऋण अथवा गृह ऋण लिया होगा।


जब कोई व्यक्ति किसी उद्यम, उपक्रम के लिए अथवा मकान खरीदने/बनाने के लिए किसी वित्तीय संस्था से ऋण लेता है तो वह संस्था प्रतिभूति (जमानत अथवा सिक्यूरिटी) के बतौर तत्सम्बन्धित उपक्रम/उद्यम की परिसम्पत्तियों/मकान को अपने पक्ष में गिरवी रखती हैं। अनेक वित्तीय संस्थाएँ, जीवन बीमा पालिसी को ‘सम पार्श्‍व प्रतिभूति’ (कोलेटरल सिक्यूरिटी) के रूप में गिरवी रखवाती हैं।

ऋण चुकाने से पहले ही यदि दुर्भाग्यवश ऋणधारक की मृत्यु हो जाए तो उसके परिवार पर दोहरा संकट आ जाता है। पहला संकट-घर के लिए रोजी-रोटी कमाने वाला नहीं रहता। और दूसरा संकट-लिया गया ऋण चुकाने का कानूनी उत्तरदायित्व, मृतक के विधिक उत्तराधिकारियों पर आ जाता है।
ऐसे समय में, गिरवी रखी गई जीवन बीमा पालिसी ही ऋण वसूली के लिए सबसे पहले काम में आती है। पालिसी से मिलने वाली रकम का समायोजन, बकाया ऋण राशि में किया जाता है। यदि पालिसी से मिली रकम, शेष ऋण राशि से अधिक है तो ऋण राशि वसूलने के बाद बाकी रकम, ऋणधारक के परिजनों को लौटा दी जाती है। यदि पालिसी से मिली रकम, शेष ऋण रकम से कम है तो,तत्सम्बन्धित उद्यम/उपक्रम की गिरवी रखी गई परिसम्पत्तियों/मकान को बेच कर शेष ऋण की वसूली की जाती है। इसके बाद भी यदि ऋण शेष रहता है तो उसकी वसूली उसके विधिक उत्तराधिकरियों से की जाती है।

कई प्रकरणों में, ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ, उद्यम/उपक्रम की परिसम्पत्तियों/मकान के अतिरिक्त किसी सुदृढ़ आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति की जमानत भी माँगती हैं। यदि ऐसी जमानत ली गई है तो ऋण वसूली के लिए उस जमानतदार पर भी विधिक उत्तरदायित्व आता है।

स्पष्ट है कि जिस जीवन बीमा पालिसी को बहुत ही हलके से लिया जाता है वही जीवन बीमा पालिसी ऐसी आकस्मिक विकट आपदा के समय सबसे बड़ी और सबसे पहली सहायक पसिम्पत्ति बन कर सामने आती है। किन्तु ऐसा तभी हो पाता है जब जीवन बीमा पालिसी का ‘समनुदेशन’ कराया गया हो। यह ‘समनुदेशन’ ही जीवन बीमा पालिसी को ‘मूल्यवान सम्पत्ति’ का स्वरूप प्रदान करता है।

अंग्रेजी के ‘असाइनमेण्ट’ का कानूनी अनुवाद है-समनुदेशन। आसानी से समझने के लिए इसे ‘गिरवीनामा’ भी कहा जा सकता है जो इसका भावानुवाद होगा, विधिक अनुवाद नहीं। इसलिए याद रखिएगा कि यदि आप जीवन बीमा कार्यालय में जाकर ‘मुझे अपनी पालिसी गिरवी रखनी है’ अथवा ‘मुझे पालिसी पर गिरवीनामा अंकित करवाना है’ कहेंगे तो आपके काम में देर हो सकती है। किन्तु यदि आप ‘मुझे अपनी पालिसी असाइन करनी है’ अथवा ‘मुझे अपनी पालिसी पर असाइनमेण्ट अंकित करवाना है’ कहेंगे तो आपका काम जल्दी हो सकेगा।

जैसा कि शुरु में कहा गया है, आपकी जीवन बीमा पालिसी वह मूल्यवान सम्पत्ति है जिसे ऋण लेने के लिए प्रतिभूति (जमानत) के रूप में गिरवी रखा जा सकता है। जीवन बीमा पालिसी को गिरवी रखने की इस प्रक्रिया को ही समनुदेशन अथवा असाइनमेण्ट कहा जाता है।


समनुदेशन कौन कर सकता है?
वह प्रत्येक पालिसीधारक जो पूर्ण वयस्क हो, जो भारतीय कानूनों के अनुसार अनुबन्ध करने की पात्रता रखता हो और जिसमें पालिसी निहित (वेस्ट) हो चुकी हो, अपनी पालिसी पर समनुदेशन कर सकता है।


किसके पक्ष में किया जा सकता है समनुदेशन?
सामान्यतः यह (समनुदेशन) किसी ऐसी वित्तीय संस्था के पक्ष में ही किया जा सकता है जिससे, पालिसीधारक ऋण ले रहा है। किसी व्यक्ति के पक्ष में समनुदेशन सामान्यतः नहीं ही होता है। जीवन बीमा पालिसी चूँकि ‘परिवार के बीमा हित (इंश्योरेबल इण्टरेस्ट)’ को ध्यान में रख कर ली जाती है इसलिए, जीवन बीमा पालिसियों की खरीदी-बिक्री को निरुत्साहित करने के लिए, व्यक्ति के पक्ष में समनुदेशन न करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है तथा अतिरिक्त सतर्कता बरती जाती है।


समनुदेशन कैसे होता है?
इसकी एक सुनिश्चित प्रक्रिया है।
समनुदेशन के लिए पालिसीधारक अपनी बीमा कम्पनी को लिखित सूचना (नोटिस) देता है जिसमें समनुदेशन का कारण तथा जिसके पक्ष में समनुदेशन किया जाना है उस संस्था का नाम/पता सूचित करता है।
इस सूचना के साथ ही, समनुदेशन की इबारत मूल पालिसी पर लिख/टाइप कर, मूल पालिसी अभिलेख, बीमा कम्पनी को प्रस्तुत करनी पड़ेगी। भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा जारी किए गए पुराने पालिसी अभिलेखों में तो पर्याप्त खाली स्थान उपलब्ध होता है किन्तु इन दिनों जारी किए जा रहे पालिसी अभिलेखों में ऐसा खाली स्थान नहीं है। जिन पालिसी अभिलेखों में खाली स्थान नहीं है ऐसे प्रकरणों में, समनुदेशन की इबारत, 20 (बीस) रुपयों के अन्यायिक (नान ज्युडिशियल) स्टाम्प पेपर पर अंकित कर प्रस्तुत करनी पड़ेगी।
इस सूचना के आधार पर बीमा कम्पनी अपने अभिलेखों में इस समनुदेशन की प्रविष्टि कर, इसे पंजीबध्द करेगी और मूल पालिसी उस वित्तीय संस्था को पंजीकृत डाक से भेज देगी जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है। यदि समनुदेशन, स्टाम्प पेपर पर अंकित किया गया है तो वह स्टाम्प पेपर भी पालिसी अभिलेख का भाग बन जाएगा और मूल पालिसी अभिलेख के साथ वह स्टाम्प पेपर भी भेजा जाएगा।
समनुदेशन पंजीयन के लिए पालिसीधारक को 250 रुपये (दो सौ पचास रुपये) का शुल्क चुकाना पड़ेगा।

पालिसी और पालिसीधारक पर समनुदेशन के क्या प्रभाव पड़ेंगे?

इसके दो प्रत्यक्ष और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रभाव होते हैं
पहला - समनुदेशन पंजीकृत होते ही, पालिसी पर से पालिसीधारक के समस्त अधिकार समाप्त हो जाते हैं और समनुदेशित पालिसी उस वित्तीय संस्था की सम्पत्ति हो जाती है जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है। अर्थात् पालिसी से मिलने वाले समस्त लाभ और समस्त प्रतिफल उस वित्तीय संस्था को मिलेंगे जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है।

वह संस्था चाहे तो ऐसी पालिसी को अभ्यर्पित (सरेण्डर) कर सकती है अथवा किसी अन्य संस्था के पक्ष मे समनुदेशन कर सकती है।
दूसरा - समनुदेशन के प्रभाव में आते ही, पालिसीधारक द्वारा पालिसी पर कराया गया नामन (नामीनेशन) स्वतः निरस्त हो जामा है।

समनुदेशन के बाद रिस्क कवर की स्थिति क्या होगी?
समनुदेशन से रिस्क कवर की स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता है। समनुदेशन के बाद भी रिस्क कवर उसी व्यक्ति (बीमित व्यक्ति) का होगा जिसके जीवन पर पालिसी ली गई है।

समनुदेशन के बाद यदि बीमित व्यक्ति किश्तें जमा कराना बन्द कर दे तो?
अपनी जीवन बीमा पालिसी की किश्तें जमा करना या न करना, पालिसी को प्रभावी बनाए रखना या समय पूर्व ही बन्द कर देना, पालिसीधारक का अधिकार है। किन्तु ऐसा बिलकुल ही नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह न केवल आत्मघाती अपितु आश्रित परिवार के लिए भी अत्यधिक घातक होता है।
जीवन बीमा पालिसी के पूरे लाभ तभी मिलते हैं जब कि उसे उसकी पूरी अवधि के लिए प्रभावी बनाए रखा जाए। जो पालिसी समनुदेशित की जा चुकी है, उसे प्रभावी बनाए रखना तो और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।
इस आशंका को ध्यान में रखकर, ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ विभिन्न व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करती हैं। कुछ संस्थाएँ, बीमित व्यक्ति की बीमा किश्तें खुद ही जमा कर, किश्तों की रकम, ऋणधारक के नाम लिख देती हैं। कुछ वित्तीय संस्थाएँ ऋणधारक से लिखित अनुबन्ध कराती हैं कि वह निर्धारित समयावधि में अपनी प्रीमीयम किश्तें जमा कर उनकी रसीदें ऋणदाता वित्तीय संस्था को नियमित रूप से प्रस्तुत करेगा। इस शर्त का उल्लंघन करने पर वित्तीय संस्थाएँ, ऋणधारक पर आर्थिक दण्ड भी आरोपित करती हैं।

ऋणधारक बीमित व्यक्ति द्वारा समय पर किश्तें जमा न कराने के कारण, पालिसी कालातीत (लेप्स) हो जाने की दशा में ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ, समूची ऋण राशि की एकमुश्त वसूली जैसी कानूनी कार्रवाई करने के अधिकार भी अपने पास सुरक्षित रख सकती हैं।

यदि कोई बीमित/पालिसीधारक, बीमा कम्पनी को सूचित किए बिना ही पालिसी किसी को समनुदेशित कर दे तो?

ऐसा हो सकता है और ऐसा होने पर बीमा कम्पनी को कोई आपत्ति नहीं होगी। किन्तु जब भी पालिसी के लाभों अथवा प्रतिफल के भुगतान की स्थिति बनेगी तब बीमा कम्पनी उसी व्यक्ति को भुगतान करेगी जिसका उल्लेख इस हेतु, बीमा कम्पनी के अभिलेखों में किया गया है।ऐसे प्रकरण में चूँकि समनुदेशन का पंजीयन बीमा कम्पनी के अभिलेखों में अंकित नहीं है इसलिए पालिसी से मिलने वाला भुगतान या तो पालिसीधारक को किया जाएगा अथवा मृत्यु दावे की स्थिति में पालिसी में नामित व्यक्ति को किया जाएगा।

बीमा कम्पनी को सूचित किए बिना और बीमा कम्पनी के अभिलेखों में पंजीयन कराए बगैर किया गया समनुदेशन, पालिसीधारक और समनुदेशित के बीच का मामला है जिससे बीमा कम्पनी का कोई लेना-देना नही है। समनुदेशित को भुगतान की जिम्मेदारी बीमा कम्पनी पर तब ही आती है जब समनुदेशन बीमा कम्पनी के अभिलेखों में पंजीकृत किया गया हो।

क्या अवयस्क के जीवन पर जारी जीवन बीमा पालिसी भी समनुदेशित की जा सकती है?
हाँ, की जा सकती हैं। ऐसा सामान्यतः, बच्चों की उच्च शिक्षा हेतु लिए जाने वाले ‘शिक्षा ऋण’ के लिए किया जाता है। ऐसे प्रकरणों समनुदेशन की सारी औपचारिकताएँ, बीमा प्रस्तावक (जो कि अवयस्क बच्चे का पिता अथवा माता में से कोई एक होता है) पूरी करेगा और अवयस्क बच्चा इस पूरी प्रक्रिया से दूर ही रहेगा। ऐसे प्रकरण में समनुदेशन करने वाले (अर्थात् बच्चे के पिता अथवा माता) को यह यह लिखित वचन देना होगा कि इस ऋण राशि का उपयोग पूर्णतः बच्चे के लिए, बच्चे के हित में ही किया जाएगा।

सम्पूर्ण ऋण चुका देने के बाद पालिसी की स्थिति क्या होगी और पालिसीधारक को तत्काल ही क्या करना चाहिए - यह सब अगली किसी किश्त में।

(‘समनुदेशन’ अत्यन्त विस्तृत विषय है। यहाँ उन्हीं बातों को प्रस्तुत किया गया है जो सर्वाधिक व्यवहार में हैं।)
कृपया सदैव की तरह याद रखिएगा कि ये जानकारियाँ मेरे अधिकतम और श्रेष्ठ ज्ञान के आधार पर प्रस्तुत हैं। इन्हें कृपया भारतीय जीवन बीमा निगम की अधिकृत जानकारियाँ न समझें।
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मेरी आपबीती और बिट्टू की हाँ

बिट्टू कहने भर को बिट्टू है। उसे सचमुच में बिट्टू मत मान लीजिएगा। यदि माता-पिता का कहा मान उसने विवाह कर लिया होता तो अब तक तो वह खुद कम से कम एक बिट्टू (या बिट्टी) का पिता बन चुका होता।

बिट्टू इस समय पचीसवें में चल रहा है। आज के जमाने के हिसाब से कोई बहुत ज्यादा उम्र नहीं है उसकी। आज कल के बच्चे 28/30 के आसपास ही विवाह के बारे में सोचते/करते हैं। इस लिहाज से तो बिट्टू सचमुच में ‘बच्चा’ ही कहा जा सकता है। किन्तु उसके माता-पिता के हिसाब से तो साल दो साल पहले ही उसका विवाह हो जाना चाहिए था। दो साल पहले ही, पढ़ाई समाप्त होते ही, बिट्टू की नौकरी लग चुकी है। ढंग की तनख्वाह (महीने के तीस-पैंतीस हजार रुपये) पा रहा है। वैसे भी घर में कोई कमी नहीं है। फिर, वह परिवार का बड़ा बेटा है! सो, उसने अब तनिक भी देर किए बिना विवाह के लिए हाँ कर देना चाहिए।

बिट्टू और उसके माता-पिता के बीच यही सब बातें चल रहीं थीं जब मैं बिट्टू के घर पहुँचा। नहीं, बिट्टू से मिलने नहीं गया था। उसके माता-पिता से मिलना था। पहुँचते ही लगा कि गलत समय पर आ गया हूँ। जी तो किया कि उल्टे पाँव लौट जाऊँ किन्तु वैसा कर पाना सम्भव नहीं रह गया था। सो, मुझे बैठना ही पड़ा। बैठ गया। तय किया था कि चुपचाप तीनों की बातें सुनूँगा। बोलूँगा कुछ भी नहीं। किन्तु जब आप, उपस्थित लोगों में उम्र में सबसे बड़े हों, एक बेटे को पढ़ा-लिखा कर उसका विवाह कर चुके हों और सामने वाले के परिवार में घर के बड़ों की तरह व्यवहार/सम्मान पाते हों तो आपको चुप कौन बैठने देगा? ऐसे वक्त तो आप सबसे बड़े सहायक बन कर सामने आते हैं! सो, वहाँ ‘अयाचित, अनपेक्षित’ पहुँचा मैं, अब ‘परिवार के बड़े-बूढ़े’ की भूमिका में भी था। बिट्टू के माता-पिता ने कहा - ‘हम तो समझा-समझा कर थक गए। आप ही इसे समझाइए।’


सहायता के लिए उनका आग्रह तो मुझे उचित लगा किन्तु बिट्टू को नासमझ मानने की उनकी समझ मुझे उचित नहीं लगी। हम अपने बच्चों को शायद कभी भी बड़ा नहीं होने देते। वे बड़े हो जाते हैं किन्तु हम उन्हें सदैव ‘शिशुवत्’ ही मानना चाहते हैं। जो बिट्टू किसी बहु राष्ट्रीय कम्पनी में अपने अनुभाग का प्रभारी है, तीस-पैंतीस हजार रुपयों वाली नौकरी कर रहा है, पाँच-सात अधीनस्थों से काम ले रहा है उसे नासमझ मान लेना अपने आप में समझदारी कैसे हो सकती है? हमारे बच्चे हमारा लिहाज पाल कर हमारे सामने चुप रहते हैं तो यह उनकी संस्कारशीलता है, नासमझी नहीं। हाँ, बिट्टू तनिक अपरिपक्व भले ही हो सकता है। मैं उसे नासमझ मानने के लिए पल भर को भी तैयार नहीं हुआ।

सो मैंने कहा कि मैं उसे समझाने या उपदेश देने की मूर्खता तो नहीं कर पाऊँगा किन्तु आपबीती अवश्य सुनाना चाहूँगा। बिट्टू को बड़ी राहत मिली, यह उसके चेहरे पर पढ़ा जा सकता था। वैसे भी उपदेश की अपेक्षा किसी की आपबीती सुनना अधिक रोचक होता है।

मैं शुरु हो गया।

बिट्टू की तरह ही मैं भी विवाह न करने पर अड़ा हुआ था। बड़ा अन्तर यह था कि मैं बेरोजगार था जब मुझ पर विवाह करने का दबाव बनाया जा रहा था। मेरा आत्मा इसके लिए तैयार नहीं था। अन्ततः, मैं विवाह के लिए जब तैयार हुआ तब मेरी उम्र 29 वर्ष थी। विवाह के चार वर्ष बाद (अर्थात् जब मैं 33 वर्ष का था तब) मेरे बड़े बेटे का जन्म हुआ और उसके नौ वर्ष बाद (मेरी आयु के 42वें वर्ष में) मेरे छोटे बेटे का। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, वैसे-वैसे माँ-बाप बूढ़े होते ही हैं। किन्तु मेरे साथ यह तनिक अधिक गति से हो रहा था क्यों कि विवाह देर से किया और छोटा बेटा तो उसके भी 13 वर्ष बाद हुआ।

बड़े बेटे के विवाह के उत्तरदायित्व से मैं गत वर्ष (अर्थात् अपनी आयु के 61वें वर्ष में) निवृत्त हुआ हूँ। छोटा बेटा इस समय इंजीनीयरिंग के तीसरे सेमेस्टर में पढ़ रहा है। अर्थात् उसकी इंजीनीयरिंग पूरी होने में अभी कम से कम ढाई वर्ष तथा उसके बाद कोई भी स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए और दो वर्ष लगेंगे। उसके बाद उसका विवाह करना होगा। लेकिन यदि उस समय वह काम-काज से नहीं लगा तो वह भी मेरी ही तरह विवाह से इंकार करेगा और मैं उसे मना नहीं कर पाऊँगा। यह सब मेरा न्यूनतम उत्तरदायित्व है। यदि पढ़ाई पूरी होते-होते उसे नौकरी मिल भी गई और वह तत्काल ही विवाह के लिए राजी हो गया तो भी उस समय मेरी उम्र कम से कम 67 वर्ष के आसपास होगी।


मेरे सहपाठियों में से दो स्वर्गवासी हो चुके हैं और शेष समस्त ‘रिटायर्ड लाइफ’ बिता रहे हैं। अपने नातियों-पोतों के साथ खेल रहे हैं। उन्हें या तो कहानियाँ सुना रहे हैं या उन्हें स्कूल ला-ले जा रहे हैं। बहुत हुआ तो घर के लिए सब्जी ला दी या टेलिफोन, बिजली, पानी के बिल भरने का काम कर दिया। जबकि मुझे तो तब तक लगातार कमाते रहने के लिए हाथ पैर मारने पड़ेगें। फिर, मँहगाई जिस तरह दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है उसके चलते मेरी आय का प्रत्येक आँकड़ा हर बार छोटा ही बना रहेगा! याने, जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे मुझे और ज्यादा तथा और अधिक गति से काम करते रहना पड़ेगा जबकि शरीर बराबर प्रतिवाद करता रहेगा।मैंने कहा कि तब मुझे मेरे माता-पिता की बातें नासमझी लगती थीं किन्तु अब (इन सारी वास्तविकताओं का अनुमान करते हुए) मैं अनुभव करता हूँ कि वह मेरी नासमझी थी। निस्सन्देह, बारोजगार होने के बाद ही विवाह करने का मेरा आग्रह अनुचित बिलकुल ही नहीं था लेकिन अब लग रहा है कि मैंने तब, माता-पिता के पहली बार कहने पर ही विवाह कर लेना चाहिए था। मैंने कहा कि मैं यह नहीं कहता कि बिट्टू को फौरन विवाह कर लेना चाहिए किन्तु मेरी कहानी पर उसने विचार अवश्य करना चाहिए। मैंने कहा-सही समय पर सही निर्णय लेना तो समझदारी होती ही है किन्तु दूसरे की मूर्खता से सबक लेना उससे भी बड़ी समझदारी होती है।


मैं आपबीती सुना रहा था, उपदेश बिलकुल नहीं दे रहा था। किन्तु मैं देख रहा था मेरी आपबीती को उपदेश की तरह सुना जा रहा था। बिट्टू अविश्वास से मेरी ओर देखे जा रहा था। मैं तो अपनी आपबीती सुना रहा था किन्तु उसे लग रहा था कि मैं अपनी गलती का सार्वजनिक स्वीकार कर रहा हूँ। उसके चेहरे पर प्रसन्नता चमक रही थी। शायद यह जानकर कि जिसे वह समझदार और प्रबुध्द मानता है वह आदमी भी गलती कर चुका है। उसकी प्रसन्नता में घुला हुआ विजय भाव भी मैं पढ़ पा रहा था जो अपने माता-पिता से कहता प्रतीत हो रहा था कि कहाँ तो आप मुझे गलत साबित कर रहे थे और यहाँ तो जिसे आपने मुझे समझाने का काम सौंपा है, वह अपनी गलती स्वीकार कर रहा है। भला, एक गलत आदमी मुझे क्या समझाएगा?

बिट्टू की यह मनोदशा अनुभव कर मुझे प्रसन्नता तो हुई, हँसी भी आई। हमारे बच्चे! निस्सन्देह वे समझदार होते हैं किन्तु इतने भी नहीं कि अपने बूढ़ों के आत्म स्वीकार में लिपटी लम्पटता को समझ सकें। मेरी आपबीती सुनने के बाद, अपने माता-पिता से कुछ कहने के बजाय उसने मुझसे कहा - ‘ताऊजी! आपने यह सब कहा है तो मैं एक बार फिर विचार करूँगा।’ सुनकर उसके माता-पिता बहुत खुश नहीं हुए। वे तत्काल ही स्पष्ट स्वीकृती चाह रहे थे। किन्तु वे कर भी क्या सकते थे?

यह सब 30 मार्च की शाम की बात है। कल शाम बिट्टू के माता-पिता का फोन आया। कह रहे थे कि बिट्टू ने विवाह के लिए हाँ कर दी है। कोशिश है कि इसी मई में विवाह हो जाए। कोशिशें कामयाब हो गईं तो मुझे बारात में चलने के लिए अभी से तैयार रहना चाहिए।

धन्यवाद देते हुए वे कह रहे थे - आपकी आपबीती ने हमारी बड़ी सहायता की।
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मित्रों ने पढ़ाया पाठ

एक अठवाड़े से अधिक हो गया। न तो कुछ लिखा और न ही कुछ पढ़ा। और तो और, ई-मेल से मिलने वाले चिट्ठों पर भी टिप्पणी नहीं कर पाया। बेटे की, मँहगी पढ़ाई वाले कम से कम चार और वर्ष तथा उसके बाद उसके विवाह के उत्तरदायित्व से चिन्तित एक बूढ़ा पिता और एक लालची बीमा एजेण्ट जितना व्यस्त होना चाहिए था, लगभग उतना ही व्यस्त मैं भी रहा - 31 मार्च की भागदौड़ में।

इस बीच एक दुर्घटना का शिकार भी हो गया। आहत और क्षत-विक्षत तो हूँ किन्तु तन से नहीं। मन से।

राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवार चयन में ‘जीतने की सम्भावना’ को एकमात्र आधार बनाने के कारण अनेक अवांच्छित लोग विधायी सदनों में पहुँच जाते हैं। इन्हें रोकने के लिए मतपत्र अथवा इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प उपलब्ध कराने के लिए चलाए जा रहे अभियान से मैं भी जुड़ा हूँ। निर्वाचन आयोग ने यह सुझाव, भारत सरकार को भेज भी दिया है। किन्तु इसे स्वीकार कर लिया जाएगा, इसमें हर किसी को सन्देह ही है। ऐसे में, मताधिकार कानून की धारा 49 (ओ) का प्रचार-प्रसार अपने कस्बे में व्यापक स्तर पर कर सकूँ, इस हेतु अत्यधिक उत्साहित और प्रयत्नरत था। मन-मस्तिष्क में पूरी योजना स्पष्ट थी। रोटरी, लायंस, जैन सोश्यल ग्रुप, इण्डियन मेडिकल एसोसिए‍शन जैसे समस्त प्रतिष्ठित और सूचीबध्द संगठनों की मासिक बैठकों में जाकर, इस प्रावधान की जानकारी देना और लोगों से आग्रह करना कि वे मतदान केन्द्र पर जाकर, मतदान न करने का अपना निर्णय अंकित कराने की प्रक्रिया पूरी करें। यह भी सोचा था कि इस हेतु शाम को छोटी-छोटी नुक्कड़ सभाएँ की जाएँ।

मैं इस सबमें आगे बिलकुल ही नहीं रहना चाहता था। चाहता था कि अधिकाधिक लोग इससे जुड़ें। संगठनों की बैठक में भी दो-तीन लोग पहुँचें। एक बोले, बाकी दोनों उसे मानसिक मजबूती देते रहें। नुक्कड़ सभाओं को लेकर भी यही विचार था। अभियान की प्रारम्भिक जानकारी लोगों को देने के लिए अखबारों में रख कर पर्चे पहुँचाना भी तय हो गया था। पर्चों के खर्च की भी व्यवस्था कर ली गई थी। पर्चा लिखवाने का काम एक मित्र के जिम्मे किया गया था-काम बाँटने और अधिकाधिक लोगों की भागीदारी प्राप्त करने की सद्इच्छा से। पर्चा किससे लिखवाना है, यह भी सुस्पष्ट था।

किन्तु इनमें से कुछ भी नहीं हो सका। जिन मित्रों को काम दिया था, उन सबने आश्चर्यजनक रूप से उदासीनता जताई। मजे की बात यह है कि ये तमाम मित्र वर्तमान त्रासदियों, विसंगतियों और प्रदूषित राजनीतिक परिस्थितियों पर जोरदार बहसें करते हैं और ‘हालात फौरन बदले जाने चाहिए’ जैसे जुमले कहते नहीं थकते। मुझे इन सब पर बड़ा भरोसा था। इन सबकी बातों को मैं इनकी पीड़ा और मन में छायी बेचैनी मानता था। किन्तु इनमें से एक को भी इस काम के लिए फुरसत नहीं मिली। सबके सब एक साथ, समान रूप से उदासीन और निस्पृह रहे। मैं ने जब भी बात की तो इन सबने ऐसे बात की मानो यह सब मेरा निजी काम (जैसे कि मेरे बेटे या बेटी की शादी) है जिसमें ये सब सहयोग कर मुझे और मेरे कुटुम्ब को उपकृत कर रहे हों। जिन मित्र के जिम्मे पर्चा लिखवाने का काम था, उन्हें जब तीसरी बार याद दिलाया तो निर्विकार भाव से बोले - ‘अरे! दादा, मैं तो भूल ही गया।’ उनका यह उत्तर मेरे लिए किसी जवान मौत से उपजे सदमे से कम नहीं था।

मेरा विचार क्रियान्वित नहीं हो पाया इससे अधिक वेदना मुझे इस बात से हुई कि जो लोग परिवर्तन की चाह रख कर निजी बहसों में झण्डाबरदारी करते रहे, काम करने के नाम पर उनमें से एक ने भी गम्भीरता और ईमानदारी नहीं बरती। किसी के पास इस काम के लिए समय नहीं था। कोई भी अपनी दुकान से उतरने को या कि घर के काम से समय निकालने को क्षण भर भी तैयार नहीं था। सबके सब ईमानदारी से बेईमानी बरत गए।

हमारे लोकतन्त्र का यही सबसे बड़ा संकट है। लोग इसे बेहतर स्थितियों में देखना तो चाहते हैं किन्तु सहयोग करते रहते हैं इसे बदतर बनाने में। कोई भी, कुछ भी खोने को तैयार नहीं। आर्थिक हित छोड़ दीजिए, मेरे मित्र तो समय और श्रम देने को भी तैयार नहीं हुए।

सदमे के पहले क्षण तो मुझे सब पर गुस्सा ही आया किन्तु अगले ही क्षण अपनी मूर्खता पर हँसी आ गई। उन बेचारों ने तो वही किया जो उनका स्वभाव था। मैं ने उन्हें जिम्मेदार और प्रयत्नवादी, परिवर्तनवादी मान लिया, उनसे अपेक्षा कर ली, यह मेरा ही तो अपराध था! उन ‘बेचारों’ का क्या दोष?

सो, इस समय मैं इस सदमे से तो उबर अवश्य गया हूँ किन्तु आगे कैसे क्या करना है, यह स्पष्ट नहीं है। कृपालु मित्रों ने यह तो जता ही दिया कि जो भी करना है, मुझे अपने अकेले के दम पर ही करना है।

देखता हूँ, कितना कुछ कर पाता हूँ। कर भी पाता हूँ या नहीं?
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रिंग टोन में गुम भगतसिंह

23 मार्च की शाम मुझे एक असहज अनुभव हुआ।

शहीद-ए-आजम भगतसिंह के बलिदान दिवस पर आयोजित एक छोटे से समारोह में शामिल होने का अवसर मिला। श्रोताओं की अधिकतम संख्या एक सौ रही होगी। इनमें भी बूढ़े अधिक थे। युवा कम। बूढ़े लोग खुद से तथा अपने अतीत से मोहग्रस्त और आत्म-मुग्ध थे तो युवा लगभग निस्पृह या कि तटस्थ मुख-मुद्रा में।

मैं पहुँचा तब तक कार्यक्रम प्रारम्भ हो चुका था। स्थानीय विधायकजी का उद्बोधन चल रहा था। वे पहली बार विधायक बने हैं किन्तु वे पहले से ही ‘वाक् पटु और व्याख्यान निष्णात’ हैं, यह पूरा कस्बा जानता है। अब तो वे विधायक हो गए हैं! सो, लोगों को लगता है कि अब तो उन्हें प्रत्येक विषय पर अधिकारपूर्वक बोलने की सुविधा भी प्राप्त हो गई है जबकि मैं इसे निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की अपरिहार्य और कभी व्यक्त न की जा सकने वाली विवशता मानता हूँ। वे लाख कहें कि विषय से उनका कभी साबका नहीं पड़ा किन्तु लोग उन्हें जबरन ठेल ले जाते हैं और बेचारों को कुछ इस तरह बोलना पड़ता है जो उनके अज्ञान को भली प्रकार ढका रहने दे।

‘लेट कमर आल्वेज सफर्स’ वाली बात मुझ पर शब्दशः लागू हुई और मुझे सबसे पीछे वाली पंक्ति में जगह मिल पाई, वह भी एक कृपालु के सौजन्य से। लाउडस्पीकर की व्यवस्था नहीं थी। किन्तु चारों ओर ऊँची दीवारों वाली चैहद्दी के कारण उद्बोधन को सुनने मे कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए थी, फिर भी हो रही थी। क्यों हो रही थी? यह आगे स्पष्ट हो सकेगा।

हमारे विधायकजी ने भगतसिंह के असेम्बली में बम फेंकने के पराक्रम सहित कुछ कामों को भारतीयता की आधारभूत अवधारणाओं से जुड़ा और उसी से प्ररित प्रतिपादित किया। श्रोताओं ने इस पर तालियाँ बजाईं।

विधायकजी के बाद वे सज्जन बोले जिनके साथ मैं गया था और जिन्हें मैं मुख्य अतिथि मानने की भूल कर बैठा था। वे प्रखर समाजवादी हैं और उन्होंने गाँधी, भगतसिंह और लोहिया के बीच तादात्म्य स्थापित करने की सराहनीय कोशिश की तथा वर्तमान स्थितियों में इन तीनों की प्रासंगिकता तथा आवश्यकता जताई।

इस बीच, मंचासीन एक वयोवृध्द समाजसेवी ने भी सम्बोधित किया जो मुझे सुनाई नहीं पड़ा। हमारी महापौर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में भगतसिंह पर कुछ कहने के बजाय, ‘ऐसे महापुरुषों की जयन्तियाँ’ (आयोजन भगतसिंह की जयन्ती का नहीं, उनकी शहादत को याद करने का था) मनाए जाने पर जोर दिया। उनका भाषण तीसरी-चौथी कक्षा के स्कूली छात्र जैसा था।


मैंने प्रत्येक वक्ता को यथासम्भव सम्पूर्ण सतर्कता से सुनने का प्रयास किया किन्तु पूरी तरह सफल नहीं हो पाया। कारण? वही, जो आजकल प्रत्येक अयोजन में सबसे बड़ा व्यवधान बन कर उभरता है - मोबाइल फोन। जब शहीद-ए-आजम के पराक्रम का बखान किया जा रहा था, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जा रही थी तब, प्रत्येक वक्ता के भाषण के दौरान किसी न किसी के मोबाइल की घण्टी बराबर बजती रही। घण्टी भी सामान्य घण्टी जैसी नहीं, अलग-अलग फूहड़ फिल्मी गानों वाली घण्टी। कभी ‘इश्क की गलियों में नो एण्ट्री’ वाली तो कभी, न समझ में आने वाले किसी अंग्रेजी गीत की धुन बजी।

लेकिन इससे अधिक क्षोभजनक और आश्चर्यजनक बात यह रही कि जब भी घण्टी बजी तब प्रत्येक बार मोबाइलधारी सज्जन ने न केवल सहजतापूर्व अपितु अधिकारपूर्वक, मुक्त कण्ठ, मुक्त स्वरों में सामने वाले से बात की। एक ने भी अपने आसपास बैठे लोंगों की न तो चिन्ता की और न ही उनकी नजरों में कोई खेद-भाव नजर आया। घण्टी बजी, उन्होंने मोबाइल जेब से निकाला, कुछ देर तक ‘कालिंग नम्बर’ देखा, सामनेवाले को पहचानलेने की खातरी होने के बाद बात की और उतनी ही सहजता से मोबाइल जेब में रख लिया। एक सज्जन कुछ आँकड़े बोल रहे थे। वास्तविकता क्या रही होगी यह तो वे दोनों बात करने वाले और ईश्वर ही जाने किन्तु मुझे लगा कि वे किसी खाईवाल को सट्टे के अंक लिखवा रहे थे। किन्तु केवल श्रोता ही क्यों? आयोजकों में से एक सज्जन खुद भी, चहलकदमी करते हुए, अत्यन्त सहजभाव से और पूरी तन्मयता से मोबाइल पर बात कर रहे थे।

भगतसिंह, उनकी शहादत और देश प्रेम की बात छोड़ भी दें तो भी सार्वजनिक शिष्टाचार निभाने की आवश्यकता किसी एक ने भी अनुभव नहीं की। अनुभव करते भी कैसे? इसके लिए जो ‘नागर संस्कार’ या कि ‘नागरिकता बोध’ चाहिए, उसका तो अर्थ भी किसी को मालूम नहीं होगा।

इन्हीं सारी बातों ने मुझे असहज किया। ऐसे क्षणों में मैं बहुत ही जल्दी आपे से बाहर हो जाता हूँ किन्तु उस समय मैं चुप ही रहा। कैसे और क्यों रह पाया? इस क्षण तक नहीं समझ पा रहा हूँ। शायद इसलिए कि आयोजक न केवल मेरे अग्रजवत थे अपितु वे सब मेरे प्रति अत्यधिक कृपाभाव और आत्मीयता रखते हैं, मेरी चिन्ता करते हैं और एक अभिनन्दन पत्र देने के उपक्रम में उन्होंने मुझे भी शरीक कर, मेरा मान बढ़ाया।


भगतसिंह, उनकी शहादत, देश प्रेम, देश के लिए मर मिटना जैसी बातें अब केवल कहने-सुनने तक ही रह गई हैं। हर कोई भगतसिंह की प्रश्ंासा कर रहा था, उनके होने पर खुद को गर्वित अनुभव कर रहा था और उनके जज्बे की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव कर रहा था किन्तु वक्ताओं और श्रोताओं में से एक भी ऐसा नहीं था जो भगतसिंह को अपने आचरण में उतारने को तैयार हो। हममें से प्रत्येक चाह रहा था कि उसका पड़ौसी भगतसिंह बन जाए। पड़ौसी का पड़ौसी भी यही चाह रहा था। हम सब अपने आसपास भगतसिंह की तलाश कर रहे थे किन्तु अपने अन्दर झाँकने को कोई भी तैयार नहीं था। झाँकते तो खुद से ही शर्मिन्दा होना पड़ता।

इस समय जब मैं यह सब लिख रहा हूँ, 25 मार्च की सवेरे के पांच बजने वाले हैं। याने, आयोजन से लौटे मुझे कोई बयालीस घण्टे हो रहे हैं। इस समय मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा है कि भारत के स्वतन्त्र होने से पहले ही भगतसिंह ने फाँसी का फन्दा चूम लिया। अन्यथा, वे इस समारोह में (या ऐसे ही किसी समारोह में) होते और अपनी यह दुर्दशा देखते तो इस बार वे अवश्य ही ऐसा बम विस्फोट करते जिसमें सारे के सारे श्रोता/वक्ता घटनास्थल पर ही मारे जाते। उन्होंने तो अपनी मौत को भी देश के युवाओं को प्रेरित करने वाली घटना माना था। किन्तु उनकी मौत की तो बात छोड़िए, आज के युवाओं को तो भगतसिंह के नाम पर या तो मनोज कुमार याद आते हैं या सनी देओल या फिर ‘रंग दे बसन्ती’ का कोई अभिनेता।


ऐसे में भगतसिंह का नाम और उनके पराक्रम का बखान यदि, फिल्मों के फूहड़ गानों वाली रिंग टोनों के बीच गुम हो रहा हो तो आश्चर्य और दुख क्यों?

किन्तु मैं फिर भी असहज बना हुआ हूँ। अब तक भी।
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भारतीयता ही बचा सकती है मन्दी की मार से

(इस आलेख की प्रेरणा ज्ञानदत्तजी पाण्डेय की पोस्ट मन्दी से और बाद में उन्हीं के ब्लाग पर प्रकाशित श्री जी. विश्वनाथजी की जी विश्वनाथ: मंदी का मेरे व्यवसाय पर प्रभाव पोस्ट से मिली है। सो इसे, इन दोनों की ‘पुछल्ला पोस्ट’ मानी जाए तो मुझे न तो आपत्ति होगी न ही अचरज।)

मन्दी के दौर का शोर अब उतना नहीं सुनाई दे रहा जितना कुछ दिनों पहले तक सुनाई दे रहा था। शायद इसलिए कि या तो हम लोगों ने इसकी आदत डाल ली है या फिर इसे अपरिहार्य मान, इसे सर-माथे कबूल कर लिया है। मेरे कस्बे में इससे प्रभावित लोगों की संख्या अंगुलियों पर गिनी जाने वाली है। किन्तु मेरे परिचय क्षेत्र में यह संख्या तनिक अधिक बड़ी है। ऐसे लोगों में मेरे बेटे के मित्र ही हैं। मेरा बेटा एक विदेशी कम्पनी के हैदराबाद कार्यालय में पदस्थ है और उसके साथी भारत तथा दुनिया के अन्य देशों में कार्यरत हैं। इनमें से कुछ से मेरी ‘चेटिंग’ होती रहती है तथा अधिसंख्य के बारे मे इन्हीं से जानकारी मिलती रहती है।

कोई डेड़ महीना पहले तक सबके सब घबराए हुए थे। हर कोई आशंकित था कि अगले दिन उसकी नौकरी बचेगी भी या नहीं। मुझे आर्थिक क्षेत्र की गतिविधियों का विश्लेषण करना नहीं आता। किन्तु ‘जीवन बीमा व्यवसाय’ के कारण इन गतिविधियों के निष्कर्षों की जानकारियाँ प्रायः ही मिलती रहती हैं। गिनती की ये जानकारियाँ इतनी सटीक होती हैं कि इनके के दम पर मैं अपने ग्राहकों पर प्रभाव जमाने में सदैव ही सफल हुआ हूँ।

निष्कर्षों की इसी श्रृंखला में मुझे बताया गया (भरोसा दिलाया गया) कि जिस स्तर की नौकरियों में मेरा बेटा और उसके मित्र लगे हुए हैं उस स्तर की नौकरियों पर कोई असाधारण खतरा बिलकुल ही नहीं है। नौकरी किसी की नहीं जाएगी। हाँ, यह हो सकता है कि इन बच्चों के वेतन कम कर दिए जाएँ या फिर, इसी वेतन में इनके काम के घण्टों में वृध्दि कर दी जाए। कोई अपरिहार्य और असाधारण स्थिति में ही किसी की नौकरी खतरे में पड़ सकती है। मुझे कहा गया कि मैं अपने बेटे को और उसके मित्रों को अपने सम्पूर्ण आत्म विश्वास से कह दूँ कि उनमें से किसी की नौकरी नहीं जाएगी।

डरा हुआ तो मैं भी था। अभी भी हूँ ही। बेटे के बेरोजगार होने से नहीं अपितु, उसके बेरोजगार हो जाने से उसके मन में उपजने वाली निराशा/हताशा के भय से। फिर भी मैंने अपने स्वरों में अधिकाधिक आत्म विश्वास का (स्वीकार करता हूँ कि 'सम्पूर्ण आत्म विश्वास' का नहीं) पुट देते हुए बेटे को भरोसा दिलाया। उसे आगाह भी किया कि उसका वेतन कम हो सकता है। कहा कि अपने तमाम मित्रों तक मेरी यह बात पहुँचाए और चाहे तो मेरा नाम ले कर पहुँचाए। पता नहीं, मेरी बात पर मेरे बेटे को विश्वास हुआ या नहीं किन्तु जब मैंने उससे कहा ‘घबराना मत। यह एक ‘टेम्परेरी फेज’ है और हम सब तुम्हारे साथ हैं’ तो सुनकर उसकी आवाज मे जो बदलाव आया उससे लगा कि उसे मेरी पहली वाली बात पर भले ही भरोसा न हुआ हो किन्तु बाद वाली बात से अवश्य उसे राहत मिली है। बाद में उसके दो-तीन मित्रों ने भी मुझसे सम्‍पर्क किया और मेरी बातें सुनकर ‘थैंक्यू अंकल! आपकी बातों से कान्फिडेन्स बढ़ा’ जैसी बातें कहीं।

इसी मुद्दे पर सोचते-सोचते अचानक ही मेरा ध्यान एक आर्थिक विशेषज्ञ की उस टिप्पणी पर गया जिसमें कहा गया था कि भारतीयों की अल्प बचत की मानसिकता के कारण हमारी अर्थ व्यवस्था डूबने से बच गई। इस टिप्पणी का सन्देश था कि अल्प बचत की विभिन्न योजनाओं में मध्यमवर्गीय भारतीयों द्वारा जमा कराई गई रकम से सरकार को वह आर्थिक मजबूती मिली जिसके कारण वह नाम मात्र के दो आर्थिक पेकेज देकर ही मुक्त हो गई। यदि हमारे मध्यमवर्गीय भारतीय भी ‘खाओ, पीओ और खुश रहो’ वाली पाश्चात्य अवधारणा को अंगीकार कर लेते तो हमारी हालत तो अमरीका से भी गई गुजरी हो चुकी होती।
इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि वैश्वीकरण और उदारीकरण के लाभों के नाम पर हमारे असंख्य युवकों को भरी-भरकम वेतन वाली नौकरियाँ मिली हैं। इन युवकों में ऐसे युवक बड़ी संख्या में हैं जो निम्न मध्यम वर्ग से आए हैं और जिन्होंने इतने भारी भरकम वेतन की कल्पना भी कभी नहीं की थी। दूर क्यों जाऊँ? मेरे बेटे के पहले वेतन की रकम, मेरी पत्नी के वर्तमान वेतन की रकम से अधिक थी जबकि मेरी पत्नी की नौकरी को इक्कीसवाँ वर्ष चल रहा है। ऐसे परिवरों के बच्चों ने यदि धरती छोड़ दी हो या कि ‘खाओ, पीओ और खुश रहो’ वाली अवधारणा को अपना लिया हो तो ताज्जुब नहीं।
अचानक धनवान बन रहे ऐसे युवकों की संख्या बढ़ ही रही है। वेतन के लिफाफे की मोटाई से इनके पालकों की आँखें फट रही हैं और बोलती बन्द हो रही है। ऐसे पालक अपने बच्चों को कोई ‘आर्थिक परामर्श’ देने का अधिकार और साहस, दोनों ही खो रहे हैं। सो, ऐसे युवकों के लिए ‘आर्थिक स्वतन्त्रता’ का अर्थ ‘आर्थिक स्वच्छन्दता’ होने लगा है। वे बचत बिलकुल ही नहीं कर रहे हैं और बिना बात के, अनावश्यक चीजें खरीद रहे हैं। मेरे एक मित्र के बेटे के पास लगभग 25 टी शर्ट ऐसे हैं जिनकी तह भी उसने, खरीदने के बाद से अब तक नहीं खोली है। मेरे मित्र, उसके पिता ने दारिद्र्य का चरम देखा है। वह गर्मियों की छुट्टियों में मजदूरी कर, अपने स्कूल की, साल भर की फीस जुटाता था फिर भी उसे ‘पूअर ब्वायज फण्ड’ से मदद लेनी पड़ती थी। नई किताबें तो वह कभी नहीं खरीद पाया था। ऐसे पिता के बेटे द्वारा की गई ऐसी खरीदी, इन युवकों का चारित्रिक प्रतिनिधित्व ही करती है।

सो, मुझे लगा कि मन्दी के इस दौर में हमारी पारम्परिक भारतीय (आप इसे मध्यवर्गीय मानसिकता की) दो अवधारणाएँ मुझे समस्या का ‘शर्तिया निदान’ लगीं। पहली है-नियमित और निरन्तर बचत करो। तथा दूसरी है - अपनी आवश्यकताएँ कम रखो।

पहली अवधारणा पर मुझे कुछ ऐसा सूझा - नियमित बचत भी ऐसी हो कि आप तत्काल उसका उपयोग कर सकें। अर्थ जगत की भाषा में जिसे ‘केश लिक्विडिटी’ कहते हैं, वही। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आजकल बच्चे नौकरी पर लगते ही उससे फौरन ही असन्तुष्ट हो जाते हैं और बेहतर नौकरी की तलाश में जुट जाते हैं। यह सहज मनोवृत्ति बन गई है। इस तलाश की जानकारी यदि वर्तमान नियोक्ता को हो जाए तो वह, कानूनी सुरक्षा अपनाते हुए फौरन ही नौकरी से निकाल देता है। यदि दुर्भाग्य से ऐसा हो गया तो आपकी केश लिक्विडिटी आपको आपका अवमूल्यन होने से बचाएगी। अपनी चाहत के वेतन और शर्तों वाली नई नौकरी पाने के लिए आप प्रतीक्षा कर सकते हैं। यदि केश लिक्विडिटी नहीं होगी तो आपको तत्काल ही नौकरी की आवश्यकता होने के कारण सम्भव है, आपको पहले वाले वेतन से कम वेतन वाली नौकरी स्वीकार करनी पड़े। यह स्थिति आपको सदैव ही कचोटती रहेगी और आपका आत्म विश्वास हिल जाएगा। किन्तु यदि आपके हाथ में लाख-दो लाख रुपये हैं तो आप दो-चार महीने रुक कर प्रतीक्षा कर सकते हैं। मन्दी के नाम पर भी यदि आपकी नौकरी जाती है तब भी यह केश लिक्विडिटी आपको सर्वाधिक सहायक होगी।
दूसरी अवधारणा आपको हर हाल में खुश बने रहने में सहायक होगी। अपनी आवश्यकताएँ कम रखने से आपको बचत करने में अपने आप ही सहायता मिलेगी। आप हर हाल में मस्त रहेंगे और जिन्दगी का आनन्द लेते रहेंगे। वर्ना भगवान न करे कि आज आप ए.सी. में हैं और कल कूलर को भी तरसें!
मैंने ये दोनों बातें मेरे बेटे को बताईं और समझाईं। मुझे यह अनुभव कर अच्छा लगा कि उसे दोनों ही बातें न केवल तत्काल ही समझ में आ गईं अपितु वह इन उसने भरोसा दिलाया कि वह इन दोनों पर अमल भी करेगा। मेरे पास कोई कारण नहीं है कि उसके भरोसा दिलाने पर भरोसा न करूँ।
मुझे लगता है कि अवधारणागत स्तर पर यदि हम भारतीय बने रहें तो कोई भी संकट हमें डिगा नहीं सकता। किन्तु यदि हम ‘देस’ में रहकर ‘परदेस’ के रंग-ढंग अपनाएँगे तो वर्णसंकर हो जाने के संकट झेलने और भुगतने को अभिशप्त होंगे ही।

मुझे यह ठीक वैसा ही लग रहा है कि हम अंग्रेजी वापरें, अंग्रेजीयत नहीं। वैश्वीकरण, उदारीकरण से मिले अवसरों के लाभ तो उठाएँ किन्तु भारतीय बन कर और भारतीय बने रहकर ही।
मुमकिन है, मेरी सोच आधी-अधूरी हो। फिर भी मैं, मन्दी के मारों को अपनी यह, बिना माँगी सलाह दे रहा हूँ।
मानें तो आपकी मर्जी। न मानें तो ‘व्हाट गोज आफ माई फादर’?
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आप तो लोगों की लुगाइयाँ बिकवाते हैं

यह कथा उसी लोकविश्वास को प्रगाढ़ करती है कि व्यक्ति सारी दुनिया की अनदेखी-अनसुनी कर सकता है किन्तु ‘अपने’ की एक बात उसके जीवन को और जीवन-दिशा को बदल देती है।


कथा के नायक का वास्तविक नाम न देना और सुविधा के लिए कोई नाम अवश्य देना मेरी विवशता है। इसी के चलते मानलें कि इस कथा के नायक मलयजी हैं। वे पुलिस में उप निरीक्षक (सब इन्सपेक्टर) थे और पदोन्नत होकर निरीक्षक के रूप् में काल कवलित हुए।

आयु में वे मुझसे कोई 12-15 वर्ष बड़े थे। उनसे परिचय भी पुराना था किन्तु सम्पर्कों में प्रगाढ़ता बीमा के कारण ही आई। नौकरी के दौरान उनका लक्ष ‘पैसा’ ही रहा। किन्तु सफलता भी उनके चरण-चुम्बन करती रही। मेरे सम्पर्क क्षेत्र में वे अब तक के इकलौते व्यक्ति हैं जो ‘प्रचण्ड रिश्वतखोर’ और ‘प्रचण्ड सफल’ एक साथ थे। मेरे लिए यह तय कर पाना अब तक दुरुह बना हुआ है कि उन्होंने रिश्वत अधिक ली अथवा सफलता अधिक अर्जित की? वे इस सीमा तक ‘रिश्वत आग्रही’ थे कि ‘तू तेरी लुगाई को बेच कर पैसे ला, इससे मुझे क्या?’ वाला वाक्य उनके मुँह से मैंने एकाधिक बार सुना था। ऐसा ‘रिश्वत आग्रही’ अपराधियों से भी इसी सीमा तक चिढ़ता था। उनका बस चलता तो वे दुनिया को ‘अपराधी विहीन’ कर देते। निश्चय ही उन पर कोई दैवी कृपा ही रही होगी कि वे सर्वथा विपरीत सत्यों को समानरूप से साधते रह पाते थे। मैंने उनसे उनकी इस सफलता का रहस्य जब-जब भी जानना चाहा, उन्होंने एक ही उत्तर दिया - ‘मैं दोनों कामों में पूरी ईमानदारी बरतता हूँ।’


उन्हें लेकर मैं सदैव सम्भ्रम में ही बना रहा। उनकी ‘रिश्वतखोर’ की छवि, मेरी सार्वजनिक छवि को नकारात्मक रूप से प्रभावित न कर दे, इस आशंका से मैं सदैव भयभीत बना रहा। सो उनसे तभी मिलता जब कोई मतलब होता। वे इस बात को खूब अच्छी तरह समझते थे और कहते थे -‘तू नहीं मिलना चाहे तो मत मिल। किन्तु मैं तुझसे मिलना चाहूं, तुझसे मिलने आऊँ, इस पर तो तेरा कोई बस नहीं है।’ सो, सम्पर्क की प्रगाढ़ता का समूचा यश उन्हीं के खाते में रहा।


वे तीन बेटियों के बाप थे। तीनों का विवाह कर चुके थे। प्रचण्ड रिश्वतखारी के कारण तीनों ही विवाह भरपूर ‘शान-बान’ से सम्पन्न हुए। घर में कहीं कोई कमी नहीं थी। पुत्र नहीं था किन्तु इस बात का मलाल उन्हें तनिक भी नहीं था। वे ‘शिव आराधक’ थे। कहते थे ‘भोले की इच्छा है कि मैं पुत्रविहीन रहूँ। दुखी होकर अपने आराध्य का अपमान कैसे कर सकता हूं?’


वार-त्यौहार पर तीनों बेटियों का आना-जाना बना रहता। कभी तीनों एक साथ आ जातीं तो कभी एक-एक कर। दामाद भी प्रायः ही सुसराल सुख भोगने आते। किन्तु बेटी-दामाद के आने का वास्तविक अर्थ हर बार उनके जाने के बाद ही मालूम हो पाता। विभिन्न दुकानदार आकर बताते कि इस बार बिटिया और कुँवर साहब इतनी-इतनी खरीदी कर गए हैं। यह खरीदी हर बार हजारों में ही होती। मलयजी भी हँसते-हँसते दुकानदारों का भुगतान करते। एक बार भी किसी भी बेटी-दामाद से खरीदी की पुष्टि कभी नहीं की।


स्थानान्तर उनकी नौकरी का अपरिहार्य हिस्सा था। सो, उनका स्थानान्तर हो गया। मेरे कस्बे से कोई 160 किलो मीटर दूर। जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, शुरु-शुरु में फोन सम्पर्क अधिक (प्रायः नियमित) बना रहा। धीरे-धीरे कम होता चला गया जो ‘प्रासंगिक’ की सीमा तक सिमट गया। किन्तु उनकी श्रीमतीजी के फोन बराबर आते रहे। वे मुझे भला आदमी आदमी मानने का भ्रम पाल बैठी थीं।


उनके स्थानान्तर के कोई पौने दो वर्ष बाद की बात है यह। उनकी श्रीमतीजी का फोन आया। बिना किसी भूमिका के कहा - ‘भैया! फौरन चले आओ।’ वे अत्यधिक घबराई हुई थीं। मैंने पूछा - ‘सब ठीक-ठाक तो है? कोई गड़बड़ तो नहीं है?’ वे बोलीं -‘कुछ भी ठीक नहीं है। पूछताछ मत करो। फौरन चले आओ। रोटी वहाँ खाओ तो पानी यहाँ आकर पीना।’


घबराहट तो मुझे भी हो ही गई थी। किन्तु पूछताछ किए बिना जाना नहीं चाहता था। मालूम हुआ कि मलयजी ने दो दिनों से खुद को कमरे में बन्द कर रखा। रोटी-पानी बन्द रखी है। आवाज देने पर जवाब भी नहीं दे रहे। कमरे की खुली खिड़की से उन्हें देख पाना सम्भव हो रहा है। वे बिस्तर पर लेटे हुए हैं। कभी हिचकियाँ ले-ले कर तो कभी सिसकियाँ भर कर रोए जा रहे हैं। उन पर चैबीसों घण्टे नजर रखी जा रही है। तसल्लीबख्श बात यही थी कि वे आत्महत्या का प्रयास करते नजर नहीं आए। लेकिन ‘कब क्या कर बैठें?’ की आशंका तो बराबर बनी हुई है।

मैं सचमुच में भाग कर पहुँचा-अपने सारे काम छोड़कर। उनकी श्रीमतीजी ने मेरे नमस्कार करने पर बिलकुल ही ध्यान नहीं दिया। बोलीं--‘दरवाजा खुलवाओ।’ मैंने अपना नाम बता कर आवाज लगाई। उन्होंने तत्काल ही दरवाजा खोल दिया और इससे पहले कि मैं कमरे में प्रवेश करता, वे मुझे बाँहों में भींचकर, दहाड़ें मार-कार कर रोने लगे। दरवाजे पर उनकी श्रीमतीजी सहित कुछ पुलिसकर्मी एकत्र हो गए थे। सबके सब मलयजी को इस दशा में देखे जा रहे थे-भौंचक और किंकत्र्तव्यविमूढ़ होकर।


इसी दशा में, कमरे की देहलीज पर ही कुछ मिनिट बीत गए। उनका रोना जब कम हुआ तो मैंने कहा -‘क्या हुआ?’मुझे आलिंगनबध्द दशा में ही वे कमरे में ले आए। फिर मुझे छोड़कर, सबकी ओर देखे बिना ही कमरे का दरवाजा किया। पहले खुद पलंग पर बैठे। फिर मुझे बैठने को कहा। उन्हें संयत होने में सचमुच में अपेक्षा से अधिक समय लगा। हम दोनों में बात शुरु हुई।

मालूम हुआ कि सबसे छोटी बेटी रचना दो दिन पहले ही लौटी है। दामाद सहित ही आई थी इस बार थी। तीनों बेटियों में वही सबसे अधिक प्रिय थी मलयजी को। वे उसे अपनी बेटी कम और मित्र अधिक मानते थे। घर की और मन की जो बात पत्नी से भी नहीं कह पाते थे, रचना से कह देते थे। अपनी उसी ‘प्रियतम’ बेटी का एक वाक्य मलयजी के ह़रदय को बेध गया। उन्होंने सहज ही कहा था कि वे पति-पत्नी बाजार से जो भी खरीदी करें तो करें, कोई बात नहीं। किन्तु जाने से पहले यदि बताते जाएँ कि उन्होंने बाजार मे कितनी उधारी की है तो अच्छा होगा। पिता की यह इच्छा रचना को अपनी हेठी लगी और उसने कुछ ऐसा कहा -‘तो पापा अब मुझे हिसाब देकर जाना पड़ेगा? आपको क्या फर्क पड़ता है अगर दुकानदार हजार-पाँच सौ की ठगी कर ले? आपको कौन सा अपनी गाँठ से पैसा देना पड़ रहा है? आप तो लोगों की लुगाइयाँ बिकवा कर पैसे लेते हो!’ यह कह कर रचना तो ‘यह जा, वह जा’ हो गई और थोड़ी ही देर बाद बेटी-दामाद अपने निर्धारित कार्यक्रमानुसार अपने घर लौट गए।

रचना के जाने के बाद से ही मलयजी ने खुद को कमरे में बन्द कर लिया। उन्होंने कहा कि सारी दुनिया उन्हें रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी और ‘लोगों की लुगाइयाँ बिकवानेवाला’ कहती है, उन्होंने किसी की परवाह नहीं की। किन्तु जिन बच्चों के लिए यह सब किया, वे ही बच्चे आज उनके मुँह पर ही यह सब कह गए और यह कहते हुए उन्हें पल भर भी विचार नहीं आया कि बाप पर क्या गुजरेगी। बच्चे जिस बाप की इज्जत न करें, उस बाप को तो डूब मरना चाहिए। किन्तु मलयजी का विवेक नष्ट नहीं हुआ था। वे आत्महत्या को ईश्वर के प्रति अपराध मानते रहे हैं। आत्महत्या के प्रत्येक प्रकरण में उन्होंने आत्महन्ता को ‘खुद तो हरामखोर मर गया और अपने घरवालों की जिन्दगी नरक बना गया’ जैसी बातें कर खूब कोसा है और जी भर कर गालियाँ दी हैं। रचना की बात उनसे अब भी सहन नहीं हो पा रही थी। वे ‘कुछ’ करना चाह रहे थे किन्तु कुछ सूझ नहीं पड़ रहा था। उन्होंने मुझसे कहा - ‘तू ही बता। मैं क्या करूँ कि इस जिल्लत से निजात मिल सके?’

मैं क्या कहता? मैं तो उनसे हर मामले में बहुत ही छोटा था। किन्तु उस क्षण वे मुझे ‘दुनिया का सबसे ज्यादा जरूरतमन्द व्यक्ति’ लगे। सो मैंने कहा कि मेरे पास एक उपाय है अवश्य किन्तु उस पर अमल कर पाना उनके लिए नितान्त असम्भव ही लग रहा है। मलयजी बोले -‘अभी तो तूने कुछ कहा नहीं है? मुझे तुझ पर पूरा विश्वास है। तू जो कहेगा, वही करुँगा। अपने ईष्ट भोल शंकर की साक्षी में तुझसे वादा करता हूँ। शर्त यही है कि मुझे इस जलालत से मुक्ति मिल जाए।’ मैंने कहा कि रिश्वतखोरी ही इस संकट के मूल में है, सो इस मूल को नष्ट करना ही एकमात्र उपाय नजर आता है जो उनकी नौकरी के चरित्र को देखते हुए नितान्त असम्भव है।


उन्होंने मुझसे दो बार और पूछा कि ऐसा करने से वास्तव में वे संकट मुक्त हो सकेंगे? मैंने कहा -‘मुझे तो पूरा विश्वास है।’ मलयजी ने कहा -‘तो तू भरोसा कर। शिव साक्षी में मैं इसी मिनिट से रिश्वतखोरी बन्द कर रहा हूँ।’ उनके स्वरों की दृढ़ता ने मेरे आत्मविश्वास को डिगा दिया। मुझे प्रसन्न होना चाहिए था किन्तु मुझे कँपकँपी हो आई। मैंने कहा- ‘तब आप नौकरी नहीं कर पाएँगे। इसलिए इसमें एक सुधार कर रहा हूँ कि आप अपनी ओर से रिश्वत माँगना बन्द कर दीजिएगा और यदि कोई स्वैच्छिक रूप से ‘शुकराना’ दे तो मना मत कीजिएगा।’ उन्होंने मेरे इस स्खलन को तत्काल ही भाँप लिया। बोले - ‘रिश्वत तो रिश्वत ही होती है। फिर भी तेरी सलाह व्यवहारहिक है। यही करूँगा। पक्का वादा। शिव साक्षी में वादा।’

यह सब होने के बाद, कोई तीसरे दिन उन्होंने अन्न-जल ग्रहण किया। रात को उन्होंने मेरी उपस्थिति में अपनी श्रीमतीजी को पूरी बात सुनाई और ‘सूखी तनख्वाह पर’ घर चलाने के लिए तैयार रहने की सूचना दे दी। अगली सवेरे मैं चला आया।

चला तो आया, किन्तु समूचा घटनाक्रम मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था। पल-प्रति-पल मैं भयभीत बना रहात। पता नहीं मलयजी पर क्या बीत रही होगी? वे अपनी नौकरी कैसे कर रहे होंगे? अब मैंने अपनी ओर से सम्पर्क करना शुरु कर दिया था-नित्य प्रायः ही। उनके स्वरों में एक बार भी निराशा, दुर्बलता, उपालम्भ अनुभव नहीं हुआ। सब ठीक ही चल रहा था। अपराधियों को तो वे पहले भी नहीं बख्शते थे। अब भी नहीं बख्श रहे हैं। सो, नौकरी में सफलता का ग्राफ अपनी वृध्दि नियमित बनाए हुआ था। जो भी अन्तर पड़ रहा था, आमदनी पर पड़ रहा था। मलयजी में आए परिवर्तन की जानकारी कानोंकान होते उनके समूचे कार्यक्षेत्र में अनपेक्षित तेजी से फैली। अपराधी अधिक भयभीत हुए। दौरों पर आने वाले उच्चाधिकरियों ने भी उनसे ‘अर्थापेक्षाएँ’ मानो शून्यवत कर लीं। इन सारी बातों से मलयजी का आत्मबल और बढ़ा। घटना के कोई सात माह बाद एक दिन उन्होंने टेलीफोन पर कहा -‘तेरी एक बात टाल दी है। अब शुकराना लेने के लिए आत्मा गवाही नहीं देती। वह भी बन्द कर दिया है।’ उनके स्वरों में मानो चौड़े पाट में बह रही गंगा की शान्त-गम्भीर सरसराहट थी और मेरी आँखें गंगा हुई जा रही थीं। बता रहे थे कि शुरु-शुरु के तीन-चार महीने अवश्य अर्थाभाव अनुभव हुआ किन्तु उम्मीद से अधिक जल्दी ही जीवनक्रम सामान्य हो गया। अब वे गहरी नींद सोते हैं।

और रचना सहित तीनों बेटी-दामादों का व्यवहार? उन्होंने बताया कि सबके सब अब भी पूर्वानुसार ही आते-जाते हैं लेकिन घर से बाहर कोई नहीं जाता। रचना को जैसे ही मालूम हुआ कि उसकी बात ने पिता की जीवन दिशा और दशा बदल दी है तो अपराधबोध से ग्रस्‍त हो, उसने अपनी दोनों बड़ी बहनों और तीनों दामादों को ‘हिदायत’ देकर दुरुस्त कर दिया। बेटी-दामाद के जाने के बाद कोई दुकानदार अब घर नहीं आता।

घटना के कोई सवा वर्ष बाद, एक विवाह प्रसंग में,उनकी पदस्थापना वाले कस्बे में फिर जाना हुआ। अकेला नहीं था, चार-पाँच मित्र भी साथ थे। सो तय किया था कि विवाह समारोह से निपट कर लौटते समय उनसे मिलूँगा। किन्तु वे तो मुझसे पहले ही विवाह समारोह में उपस्थित थे। मुझे देखते ही मेरी ओर लपके। मुझे लगा कि वे मुझे बाँहों में भर लेंगे। किन्तु वे तो एकदम मेरे पैरों की ओर झुकते नजर आए। मैंने घबराकर, सकपकाकर उन्हें अपनी बाँहों में थामा। बडी ही कठिनाई से कह पाया - ‘यह क्या कर रहे है? मुझे पाप में क्यों डाल रहे हैं?’ मुझे लगा था कि वे रोना शुरु कर देंगे। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। मेरे हाथों में थमे अपने हाथों को छुड़ाकर, अपने दाहिने हाथ से मेरी पीठ को घेरे में लेकर, अपने साथ मुझे आगे ले चलते हुए लोगों से बोले -‘यही है वो आदमी जिसकी बात मैं आपसे करता रहता हूँ। इसने मुझे जिन्दगी दी भी और सुधारी भी।’ इसके बाद जो कुछ हुआ हुआ उसका वर्णन यहाँ अनावश्यक ही है। बस इतना ही कि मैं न भोजन कर पाया और न ही व्यंजनों का स्वाद ले पाया। उस समय जो अनुभूति हुई वह आज भी मेरी धरोहर बनी हुई है।


नौकरी में रहते हुए ही गम्भीर ह़रदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई। अपनी सम्वेदनाएँ प्रकट करने मुझे जाना ही था। गया तब तक शोक निवारण तक की सारी उत्तरक्रियाएँ सम्पन्न हो चुकी थीं। सारे मेहमान लौट चुके थे। केवल रचना रुक गई थी। मैं लौटने लगा तो रचना मुझसे लिपट गई। बड़ी मुश्किल से उसने कहा - ‘पहली बार पापा को मैंने मार दिया था। तब मम्मी ने आपको खबर कर दी थी और आपने पापा को बचा लिया था। इस बार सब कुछ इतना एकाएक हुआ कि मम्मी को आपको बुलाने की याद आने का मौका भी नहीं मिला।

रोना तो मुझे भी आ ही रहा था। मलयजी की मृत्यु के कारण, रचना के लिपट कर रोने के कारण, रचना की कही बात के कारण। किन्तु उससे अधिक शायद इस बात के कारण कि मैंने मलयजी को शुकराना लेने की सलाह क्यों दी। वे तो मेरी सलाह के बाद पहले ही क्षण से रिश्वतखोरी को त्यागने को तत्पर थे। मेरे कारण ही वे कुछ और समय तक रिश्वतखोर बने रहने का वजन अपनी आत्मा पर झेलते रहे होंगे।

भला बताइए! ऐसी बातें याद करते समय, लिखते समय रोना क्यों नहीं आए?

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ये दादाजी चट्टे हैं

यह ‘चरित्र प्रमाण-पत्र’ मेरे लिए जारी किया जा रहा था। मेरे घर के ठीक बाहर ही। मुहल्ले के चार-पाँच बच्चे बातें कर रहे थे। उन्हीं में से एक कह रहा था - ‘ये दादाजी चट्टे हैं।’ मैं आगे वाले कमरे में बैठकर अपनी लिखा-पढ़ी कर रहा था। तभी बाहर से बच्चों के बीच से यह आवाज आई। मैं ने खिड़की का पर्दा, जरा सा सरका कर देखा। वे मेरे घर के बाहर, सड़क पर खड़े थे और सबका मुँह मेरे मकान की ओर था।

चट्टे याने चटोरे। एक बच्चा मुझे चटोरा घोषित कर रहा था और बाकी सब मानो मूक-सहमति दे रहे थे। मैं खिड़की से हट कर अपनी जगह बैठ कर काम करने लगा किन्तु कान बच्चों की बातों पर ही थे। उनके सम्वाद कुछ इस तरह थे -

‘तुझे कैसे मालूम?’

‘मुझे मालूम है। इन्हें आज जब मालूम पड़ा कि सन्तोष आण्टी ने कचौरियाँ बनाई हैं तो इन्होंने सन्तोष आण्टी से माँग कर कचौरियाँ खाईं।’

‘क्या बात करता है? दादाजी ने खुद माँगी?’

‘सच्ची। बड़ी-बड़ी विद्या की कसम। मैंने खुद देखा। मेरे सामने माँगी?’

‘शेम। शेम। मैं ऐसा कर लूँ तो मेरी मम्मी मेरी पिटाई उड़ा देती।’

‘और नहीं तो क्या? मेरी मम्मी तो कहती है कि कोई खाने को कहे तो पहली बार में तो उस चीज को दखना भी नहीं चाहिए। दूसरी बार कहे तो थोड़ी से लेनी चाहिए।’

‘हाँ। मेरी मम्मी भी यही कहती है।’

‘अच्छा बता! दादाजी ने कचौरियाँ माँगी कैसे?’

‘वो मेरी मम्मी और सन्तोष आण्टी गेट पर खड़ी-खड़ी बातें कर रही थीं। दादाजी ने अपने दरवाजे पर आए और सन्तोष आण्टी को आवाज लगा कर कचौरियाँ माँगी।’

‘एँ! आवाज लगा कर? जोर से आवाज लगा कर?’

‘येई तो! और आवाज भी इतनी जोर से लगाई कि सड़क पर खड़े सब लोगों ने सुनी।’

‘शेम! शेम! और सन्तोष आण्टी ने क्या कहा?’

‘कहा क्या? यही कि थोड़ी देर में भिजवाती हूँ।’

‘उन्हें (सन्तोष आण्टी को) बुरा नहीं लगा?’

‘येई तो कमाल है! बुरा लगना तो दूर उल्टे वो तो खूब खुश हो गई।’

‘हाँ, हाँ। कोई मेरी मम्मी से माँगता है तो वो भी खुश होती है कि देखो बड़े अकड़ते हैं लेकिन कितनी बेशर्मी से चीजें माँग लेते हैं।’

‘हाँ, मेरी मम्मी भी माँगने वाले के लिए ऐसा ही बोलती है।’

‘फिर सन्तोष आण्टी ने कचौरियाँ दी कि नहीं?’

‘अरे क्या बात करता है! सन्तोष आण्टी को भाग कर घर गईं। घर में जाकर फौरन बाहर आईं और अपने दरवाजे से ही जोर से आवाज लगा कर दादाजी को कहा कि अभी गरम-गरम उतरते ही भेजती हूँ।’

‘फिर! भेजीं?’

‘हाँ। मैंने देखा। सन्तोष आण्टी ने कटोरी में तीन कचौरियाँ भेजीं।’

‘फिर! दादाजी ने खाई कि नहीं? दादाजी क्या बोले?’

‘खाते कैसे नहीं? खाने के लिए ही तो मँगवाई थीं। वो कटोरी लेकर घर में चले गए। थोड़ी देर में मुँह पोंछते-पोंछते फिर दरवाजे पर आए और सन्तोष आण्टी को जोर से आवाज लगा कर कहा कि कचौरियाँ अच्छी बनाईं है।’

‘सन्तोष आण्टी ने कुछ कहा?’

‘हाँ यार! उन्होंने दादाजी को थैंक्यू कहा!’

क्या? सन्तोष आण्टी ने थैंक्यू कहा? थैंक्यू तो दादाजी को कहना चाहिए था!’

‘वोई तो! मुझे भी समझ में नहीं आया कि थैंक्यू सन्तोष आण्टी ने क्यों कहा? दादाजी ने क्यों नहीं कहा?’

‘शेम! शेम! याने दादाजी चट्टे ही नहीं, इन्हें मैनर्स भी नहीं आते।’

‘हाँ यार! और ये अपने को कितना टोकते रहते हैं?’

‘अब टोकने दो। अपन भी साफ-साफ कह देंगे कि आप चट्टे हो।’

और इस ‘सर्वानुमत निर्णय’ के साथ बच्चों की टोली आगे बढ़ गई।

बच्चों की बातें सुनकर मुझे बुरा तो बिलकुल ही नहीं लगा कि किन्तु यह अनुभव कर अटपटा अवश्य लगा कि हम बच्चों को शिष्ट बनाते-बनाते किस सीमा तक औपचारिक या कि असहज बना रहे हैं।

धुलेण्डी के दिन मुहल्ले के सब लोग एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाने जाते हैं। इसी क्रम में सब लोग, मेरे सामने रह रहे माँगीलालजी कुमावत के घर गए। उनकी श्रीमतीजी (जिन्हें पूरा मुहल्ला ‘बाईजी’ कह कर सम्बोधित करता है) ने सबके लिए कचौरियाँ बनाई थीं और कोशिश की थी सबको गरम-गरम कचौरियाँ खाने को मिलें।

मुझसे मिलने के लिए कुछ कृपालु आ गए थे। उनसे होली-मिलन कर मैं बाईजी के यहाँ पहुँचता, उससे पहले ही मिलन-मण्डली वहाँ से आगे बढ़ गई। यह देख मैं घर में ही रुक गया।श्रीमतीजी वहाँ से लौटीं तो दो कचौरियाँ लेकर। एक मेरे लिए और एक हमारे छोटे बेटे तथागत के लिए। हम दोनों को घर में उलझा देखकर श्रीमतीजी ने बाईजी की पुत्र-वधु सन्तोष से हम दोनों के लिए एक-एक कचौरी माँग ली थी।

कचौरी वास्तव में बहुत ही खस्ता और स्वादिष्ट थी। उस पर ‘गरम-गरम’ ने स्वाद और आनन्द कई गुना बढ़ा दिया। मैंने श्रीमतीजी से प्रशंसा की तो वे बोलीं कि सन्तोष ने मेरे इस आनन्द का पूर्वानुमान लगा रखा है और वह प्रसन्नतापूर्व प्रतीक्षा कर रही है कि यदि मुझे कचौरी पसन्द आए तो तदनुसार उसे सूचित करूँ ताकि वह और कचौरियाँ पहुँचाए।

और मैंने, अपने घर के दरवाजे पर खड़े होकर, ज्योति से बतिया रही सन्तोष से, आवाज लगा कर कचौरियाँ माँग लीं। सन्तोष मानो इसी की प्रतीक्षा कर रही थी। वह भाग कर घर गई और मेरे लिए गरम-गरम कचौरियाँ भिजवा दीं।

यह सब कुछ न केवल सहजता से हुआ अपितु पूरी-पूरी आत्मीयता और अनौपचारिकता से भी हुआ।

लेकिन बच्चों के लिए इस सबका अर्थ कुछ और ही था। निश्चय ही वे हतप्रभ और दुखी हुए क्योंकि मैं उनके लिए मैनरलेस और चटोरा आदमी साबित हुआ।

अब मैं सहजता और आत्मीयता से उजागर अपने चटोरेपन पर गुमान करूँ या मेरे व्यवहार से बच्चों के मन में उपजी हताशा पर दुखी होऊँ?
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