चील कह रही है - मैं गोश्त नहीं खाऊँगी

वक्त कटी की बातें ‘महज बातें’ नहीं होतीं और फुरसती लोग फालतू नहीं होते। तनिक ध्यान से देखें, सोचें-विचारे तो लगेगा, इनके जरिए हमारा ‘लोक’ बड़ी ही प्रभावशीलता से जीवन के कड़वे यथार्थ उजागर करता है। 

दोपहर की वेला। एलआईसी दफ्तर में भोजनावकाश। हाथ में काम कुछ खास नहीं। प्रीमीयम जमा करने के लिए आए दोे ‘रिटायर्डों’ से साबका पड़ गया। दोनों ही परिचित और परिहासप्रिय। प्रीमीयम जमा करने के बाद मुझसे पूछा - ‘चाय पीएगा या पिलाएगा?’ इतने अपनेपन और अधिकार से अब कौन बात करता है? मैं निहाल हो गया। बोला - ‘केवल चाय ही क्यों? साथ में और कुछ भी। आपने मुझे इस काबिल तो कर ही दिया कि आपकी सेवा कर सकूँ।’ दोनों खुश हो गए। एक ने मेरी पीठ पर धौल मारी और धकिया कर, दफ्तर के सामने, सड़क पार, मनोज की चाय की दुकान की ओर ले चले।

मनोज दुकान पर नहीं था। वह आए तो चाय बनाए। मनोज गैरहाजिर तो भला कोई ग्राहक क्यों हो? सो, हम तीन के तीन, सुनसान दुकान की बेंच पर बैठ गए।

‘और क्या चल रहा है?, मानसून दगा दे रहा है, भादों अभी आधे से ज्यादा बाकी है लेकिन अगहन सा तप रहा है’ जैसी रस्मी बातों से होते-होते ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ वाले जुमले पर बात आ गई। दोनों खूब हँसे। एक बोला - ‘स्साले! नेता! अपने सिवाय सबको बेवकूफ समझते हैं। नहीं खाएँगे। मासूम बन कर बात करते हैं और सोचते हैं सब उनकी बातों पर आँख मूँद कर भरोसा कर लेंगे।’ मैं चुप रहा। बोलने पर कुछ महत्वपूर्ण से वंचित हो जाने का खतरा था। मुझे सम्बोधित करते हुए एक बोला - ‘चील कह रही है, मेरे घोंसले में गोश्त सुरक्षित रहेगा। अरे! एक-एक रैली में लाखों-करोड़ों खर्च हुए हैं और कह रहे हैं न खाऊँगा और न ही खाने दूँगा। ऐसा कहीं होता है? कहनेवाला जानता है कि वह सच नहीं बोल रहा लेकिन सुननेवाला भी नासमझ नहीं है, इतना भी विचार नहीं रहता इन लोगों को।’

फिर उन दोनों ने अपना-अपना एक-एक किस्सा सुनाया।

पहला किस्सा इस तरह था।

एक बहुत ही ‘चालू’ अफसर, एक ‘गृह वित्त (हाउसिंग फायनेन्स) कम्पनी’ के एरिया मैनेजर बन गए। सुविधा के लिए उनका नाम नेकीरमजी मान लें। नेकीरामजी वो आदमी जो साँस भी न तो मुफ्त में ले और न लेने दे। कम्पनी अच्छी-खासी दमदार। रोज, अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के विज्ञापन देनेवाली। लोगों की रेलमपेल हो गई। लेकिन ताज्जुब की बात कि कोई भी भ्रष्टाचार की शिकायत नहीं कर रहा। क्या नेकीरामजी बदल गए?

सीधे-सीधे उन्हीं से पूछ लिया - ‘क्या बात है? तबीयत तो ठीक है?’ नेकीरामजी ठठा कर हँसे और खुलकर बोले - ‘पहले कौन सी खराब थी जो अब ठीक होने का सवाल उठे? अब तो पहले से सौ गुना ज्यादा ठीक।’ पूछताछ के जवाब में उन्होंने रहस्य उजागर किया - “इण्डिविज्युअल एप्लीकेण्ट (व्यक्तिगत रूप से लोन माँगनेवाले) की तरफ देखता भी नहीं लेकिन ‘क्लस्टर फायनेन्स’ में कस कर वसूली करता हूँ।” ‘क्लस्टर फायनेन्स’ का मतलब नेकीरामजी ने बताया - बहुमंजिला इमारतों (मल्टियों) के फ्लेटों को लोन देना। ऐसा लोन मंजूर करने में खुले हाथों बटोरते हैं। एक-एक आदमी से बात करो तो मेहनत और वक्त तो ज्यादा लगेगा ही, बदनामी भी ज्यादा होगी। मल्टियों के फ्लेटों का लोन आठ, बारह, सोलह फ्लेटों के हिसाब से एक साथ होता है। एक ही आदमी से बातचीत करनी होती है और लेन-देन भी एक से ही होता है। यह आदमी या तो बिल्डर खुद होता है या उसका आदमी। सो, बदनामी के खतरे की कोई बात नहीं। पहली बात तो यह कि बड़े धन्धेवाला सड़क पर चिल्लाता नहीं और यदि वह चिल्लाता है तो सब ‘इण्डिज्युअल एप्लीकेण्ट’ उसे झूठा कहेंगे। कहेंगे - ‘हमसे तो एक पैसा नहीं लिया।’ नेकीरामजी ने कहा - ‘तुम वाकई में सठिया गये हो। कोई छोड़ता है भला? मैं दोनों हाथों से माल बटोर रहा हूँ और ईमानदार का ईमानदार बना हुआ हूँ।’

दूसरे का सुनाया किस्सा भी लगभग ऐसा ही था। पहलेवाला किस्सा तो रतलाम से बाहर का था लेकिन यह दूसरा रतलाम का ही था।

यह किस्सा इस तरह है -

कोई बीस-बाईस बरस पहले की बात है यह। मेरे एक परिचित रतलाम नगर निगम के कमिश्नर बन कर आए। आते ही उन्होंने मुझे फोन किया। अपने आने की खबर दी और फौरन मिलने के लिए बुलाया। 

मिलते ही नाराज हुए - ‘मेरे आने की खबर मिलने के बाद भी मिलने नहीं आए! बुरी बात है। मिलना-जुलना न सही, इतना तो विचार करते कि नई जगह में मैं रोटी कहाँ खाऊँगा! चलो। कोई बात नहीं। मेरे, आज शाम के भोजन की व्यवस्था तुम्हारे जिम्मे।’

बातों ही बातों में नगर निगम में भ्रष्टाचार की बात चली। उनसे पूछा - “आपकी ‘स्ट्रेटेजी’ क्या होगी?” तपाक से बोले - “वेरी सिम्पल! ‘फोर फिगर्स’ से कम नहीं लूँगा।” उन्होंने भी वही राज बताया - “थ्री फिगर्स’ वाले ज्यादा हैं। उन्हें छोड़ूँगा। वे मेरा गुण-गान करेंगे। मेरी ईमानदारी का ढिंढोरा पीटेंगे। उनसे हुए नुकसान की भरपाई ‘फोर फिगर्स’ वालों से करूँगा। मोटा आसामी गहरा होता है। जबान पर नहीं आता। छोटा आसामी जल्दी खुश और जल्दी गुस्सा होता है। छोटा आसामी मेरी पहचान बनाएगा और मोटा आसामी मुझे ‘राजी-खुशी’ जिन्दा रखेगा।”

अपना-अपना किस्सा सुनाकर दोनों ‘हो-हो’ करते हुए देर तक हँसते रहे। हँसी रुकी तो एक बोला - ‘ये तेरा चायवाला कब आएगा? अब तो हमने मेहनत भी कर ली और तेरा मनोरंजन भी। उसे देर हो तो सैलाना बस स्टैण्ड चल कर, कालू की चाय पी लेते हैं। गरमागरम कचोरी भी मिल जाएगी।’ मुझे लगा - जो कुछ मुझे मिला है उसके बाद, दोनों की कचोरी तो बनती ही बनती है।

अब हम तीनों, सैलाना बस स्टैण्ड पर, कालू की दुकान की ओर जा रहे थे। 

यह फोन एलआईसी ने नहीं किया है

मेरा कस्बा रतलाम, पूरा भारत बना हुआ है। मध्य प्रदेश के कस्बों/शहरों से ही नहीं, मुम्बई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, चैन्नई, अहमदाबाद आदि महानगरों से भी मेरे (मालवानिवासी) ग्राहकों/परिचितों के फोन आ रहे हैं। सबके सब, उन्हें आ रहे फोनों से परेशान हैं। कोई ताज्जुब नहीं कि आप (जो मेरे बीमा ग्राहक नहीं हैं) भी ऐसे ही फोनों से परेशान हों।

अचानक ही आपके फोन की घण्टी बजती है। एक अनजान/अपरिचित आवाज आपसे आपका नाम पूछती है। आप अपना नाम बताते हैं। उधर से सवाल आता है - “मैं एलआईसी कस्टमर केअर सेण्टर से बोल रहा/रही हूँ। आपने एलआईसी से जो पॉलिसी ले रखी है उस पर आपका पैंसठ हजार का (यह आँकड़ा कुछ भी हो सकता है) बोनस आपको भुगतान होने के लिए पेण्डिंग पड़ा है। आपको पता है?” आप मना करते हैं क्यों कि आपको सचमुच में पता नहीं। उसके बाद सामनेवाला शुरु हो जाता है - “आपकी फाइल मेरे सामने पड़ी है लेकिन कृपया अपना पॉलिसी नम्बर बताएँ ताकि कन्फर्म हो सके कि मैं सही आदमी से बात कर रहा/रही हूँ।” बस! यहीं से गड़बड़ होने की आशंका शुरु होती है। सामनेवाला/वाली लम्बी-चौड़ी बात करता/करती है और अन्ततः आपसे कहा जाता है - “अपना यह बोनस प्राप्त करने के लिए आपको सात हजार रुपये जमा कराने पड़ेंगे।” इसके बाद कुछ भी हो सकता है। क्या होगा? यह आप पर ही निर्भर है।

कभी कुछ दूसरे किस्म का सवाल आता है - “मैं आईआरडीए से बाल रहा/रही हूँ। आपने किसी प्रायवेट बीमा कम्पनी से कोई बीमा पॉलिसी ले रखी है?” आपका जवाब “हाँ” भी हो सकता है और “प्रायवेट कम्पनी से तो नहीं लेकिन एलआईसी से ले रखी है।” भी हो सकता है। उधर से आपकी चिन्ता की जाती है - “आपको इस बीमा कम्पनी से सर्विसिंग बराबर मिल रही है?” आप “हाँ” कहें या “नहीं”, उधर से अगला सवाल तो आना ही आना है जिसकी परिणति वही होती है - “आपको इतने रुपये जमा कराने पड़ेंगे।” 

यह सचमुच में सुखद है कि मेरे सारे के सारे ग्राहक सुरक्षित हैं। किसी का कोई नुकसान नहीं हुआ। किन्तु “पता नहीं कब, किसके साथ क्या हो जाए?” - यह आशंका मुझे बराबर घेरे रहती है। मैं अपनी ओर से यथासम्भव प्रत्येक ग्राहक से सम्पर्क कर, ऐसे फोनों से बचने के लिए कहता रहता हूँ।

निजी बीमा कम्पनियों की तो मुझे नहीं पता किन्तु आप खातरी रखिए कि एलआईसी ऐसी कोई पूछताछ इस तरह से बिलकुल नहीं करती। न तो अब तक की है और न ही भविष्य में कभी करेगी। आपकी पॉलिसियों पर अर्जित बोनस की जानकारी, इस तरह तो कभी नहीं देगी।एलआईसी अपने ग्राहकों से “अधिकृत और औपचारिक रूप से” सम्पर्क करती है। आपके किसी भी भुगतान के बारे में वह आपको पत्र द्वारा सूचित करेगी। यह सूचना भी केवल सूचना देने के लिए नहीं होगी - निश्चय ही कोई कागजी खानापूर्ति करने के लिए होगी। उस दशा में, पत्र के साथ सम्बन्धित/आवश्यक कागज आपको भेजेगी। जरूरी हुआ तो यह पत्र ‘रजिस्टर्ड’ या ‘स्पीड पोस्ट’ से भेजा जाएगा। आपकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला तो सबसे पहले उस एजेण्ट को निर्देशित करेगी जिसने  आपको सम्बन्धित पॉलिसी बेची है। यदि उस एजेण्ट ने काम करना बन्द कर दिया है तो ही किसी अन्य एजेण्ट के जरिये आपसे सम्पर्क करेगी। लेकिन, आपका भुगतान करने के लिए आपसे किसी भी दशा में, किसी भी प्रकार का कोई भुगतान नहीं लिया जाएगा। इसके विपरीत, यदि आपका भुगतान समय पर न करने की चूक एलआईसी से हुई तो इस विलम्बित अवधि के लिए आप एलआईसी की निर्धारित दर से ब्याज प्राप्त करने के अधिकारी होंगे। किन्तु इसके लिए आपको लिखित (पत्र अथवा ई-मेल द्वारा) अनुरोध करना पड़ेगा। लेकिन भुगतान में विलम्ब यदि आपके कारण हुआ है तो यह आपको ही भुगतना पड़ेगा। ग्राहकों को उनके हक का भुगतान समय पर मिले, यह एलआईसी की पहली चिन्ता और पहली कोशिश होती है। इस सम्बन्ध में मेरी यह पोस्ट मेरी बात को अधिक प्रभावशीलता से स्पष्ट करती है।

एलआईसी या इरडा (आईआरडीए अर्थात् भारतीय बीमा विकास एवम् विनियामक प्राधिकरण), इस तरह से ग्राहकों से सम्पर्क नहीं करते। इरडा तो मेरे विचार से किसी भी ग्राहक से सीधा सम्पर्क नहीं करता। वह या तो बीमा कम्पनियों से सम्पर्क करता है या फिर विज्ञापनों के जरिए बीमाधारकों को अपना सन्देश पहुँचाता है। व्यक्तिगत रूप से वह उन्हीं ग्राहकों से सम्पर्क करता है जो अपनी किसी शिकायत या समस्या के निदान के लिए उससे सम्पर्क करता है।

ऐसे टेलिफोन प्रायः ही दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद से आते हैं। इन नम्बरों पर आप पलट कर फोन करें तो वे ‘नो रिप्लाय’ होंगे।

ऐसे टेलिफोनों से खुद भी बचें और अपने परिजनों, परिचितों, मित्रों को भी बचाएँ। अपनी कोई सूचना, कोई आँकड़ा, कोई नम्बर, कोई तारीख बिलकुल ही नहीं बताएँ - अपनी जन्म तारीख भी नहीं। अपना समय नष्ट न करें। हाँ, गृहिणियाँ इनकी सबसे आसान शिकार होती हैं। शायद, ‘अपनी गृहस्थी’ को आर्थिक रूप से अधिकाधिक शक्तिशाली और खुशहाल देखने के मोह में वे जल्दी लालच में आ जाती हैं। इसलिए अपनी-अपनी गृहिणी-उत्तमार्द्धों को विस्तार से समझा कर आगाह कर दें। अधिक अच्छा होगा कि आप खुद और आपकी उत्तमार्द्ध, ऐसे फोनों के जवाब में धमकी दें कि आपने सामनेवाले का नम्बर देख लिया है और आप पुलिस में रिपोर्ट करने जा रहे हैं।

एक कहावत है - “जब तक एक भी मूर्ख मौजूद है, हजार धूर्त भूखे नहीं मरेंगे।”

मैं, एलआईसी का एक बहुत ही छोटा अभिकर्ता हूँ। एलआईसी की ओर से बात करने के लिए अधिकृत बिलकुल ही नहीं हूँ। फिर भी यदि आपको लगे कि मैं आपके लिए उपयोगी हो सकता हूँ तो मुझे निस्संकोच और साधिकार मेरे मोबाइल नम्बर 098270 61799 पर सम्पर्क करें। आप मुझे मेरे ई-मेल bairagivishnu@gmail.com पर भी सन्देश दे सकते हैं। मैं अपनी सूझ-समझ और क्षमतानुसार आपकी सहायता करने की कोशिश करूँगा। 

हक से नावाकिफ











अपरिहार्य कारणों से मुझे यह पोस्‍ट हटानी पडी है।

ठगी का आतंक

हकीम लुकमान का कहा सब जानते और मानते हैं - ‘शक का कोई ईलाज नहीं होता।’ लेकिन जब इस शक से भय उपजे और वह आतंक में बदल जाए तब? तब वह शायद मनोविज्ञान के विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए एक सुन्दर प्रकरण होगा।

वासु भाई गुरबानी से कल शाम सुने किस्से के बाद से ही मैं यह  सोच रहा हूँ।

किस्सा सौ टका सच है। केवल पात्रों के नामों और घटनास्थल में बदलाव कर दिया है।

यह कोई पैंतालीस-पचास बरस पहले की बात है। तब दशमलव प्रणाली शुरु तो हो चुकी थी लेकिन आना-पाई, गज, सेर-पाव-छटॉंक ही चलन में थे। एक हुआ करते थे कन्हैया सेठ। चोरी-चकारी का माल औने-पौने दामों में खरीदकर उसे ठीक-ठीक मुनाफा लेकर बेच देना उनका धन्धा था।

एक बार उनके हत्थे कपड़ों की एक गाँठ चढ़ गई। उसमें रेमण्ड के कट पीस थे तो देहातियों के परिधान की छींटों के कपड़े भी थे। रेमण्ड के कट पीस आसानी से बिकनेवाली चीज थे जबकि छींट के लिए ग्राहक मिलना तनिक मुश्किल। उन्हें मालूम हुआ कि नोलाईपुरा में मोहन नामका एक कारीगर है जो देहातियों/आदिवासियों के लिए कपड़े सिलता है।

एक थैली में छींट के कपड़ों के कुछ नमूने लेकर कन्हैया सेठ मोहन के पास पहुँचे। कपड़ा बताया। मोहन ने कहा कि कपड़ा अच्छा है। कन्हैया सेठ ने पूछा - ‘बाजार में क्या भाव से मिल जाता होगा?’ मोहन ने अनुमान बताया - ’यही कोई डेड़ रुपये गज के आसपास में मिल जाएगा।’ कन्हैया सेठ ने पूछा - ‘तेरे काम में आ जाएगा?’ मोहन ने एक बार फिर कपड़े को देखा। इस बार तनिक अधिक ध्यान से देखा, हाथ से उसका पोत टटोला और कहा - ‘हाँ। मेरे काम आ जाएगा।’ कन्हैया सेठ ने पूछा - ‘बोल खरीदेगा?’ जवाब आया - ‘हाँ। ले लूँगा।’ कन्हैया सेठ ने कहा - ‘बोल! क्या भाव लेगा?’ मोहन ने पल भर विचार किया और बोला - ‘एक रुपये छे आने।’ कन्हैया सेठ ने फौरन लापरवाही से कहा - ‘उठा ले।’ मोहन अचकचा गया। उसने घूर कर कन्हैया सेठ को देखा। पल भर ठिठका और बोला - ‘कपड़ा भाई को दिखाकर एक बार उससे पूछना पड़ेगा।’

मोहन गया और लौट कर बोला - ‘ भाई सवा रुपये बोल रहा है।’ कन्हैया सेठ ने उसी लापरवाही से कहा - ‘अच्छा। चल। सवा रुपये में उठा।’ मोहन पहले अचकचाया था, इस बार तनिक घबरा गया। उसने अविश्वासभरी नजरों से कन्हैया सेठ को देखा और बोला - ‘लेकिन भाई ने कहा है कि एक बार पिताजी से जरूर पूछ लेना।’

इस बार पिताजी से पूछ कर लौटे मोहन ने कहा - ‘पिताजी तो एक रुपया दो आने गज का भाव बता रहे हैं।’ अपनी लापरवाही और फुर्ती कायम रखते हुए कन्हैया सेठ ने कहा - ‘चल! एक रुपया दो आने में उठा।’ सुनकर मोहन मानो ढेर हो गया। उसकी साँस बढ़ गई। अविश्वास की जगह शक ने ले ली। हकलाते हुए बोला - ‘घर में थोड़ी पूछताछ और कर लूँ।’

और इस तरह एक के बाद एक, पूछताछ करते-करते मोहन, दस आना गज के भाव पर आ गया। कन्हैया सेठ ने फिर वही लापरवाही और फुर्ती बरती - ‘और कितना भाव-ताव करेगा यार मोहन! चल, दस आना गज में उठा।’ सुनकर मोहन मानो दहशत में आ गया। उसकी कनपटियों पर पसीना चुहचुहा आया, आँखें इतनी बड़ी-बड़ी हो गईं मानो फटकर बाहर ही आ जाएँगी। पहले तो हकला भी रहा था लेकिन अब तो उसकी बोलती बन्द हो गई - मालवी में जिसे ‘डिक्की बँधना’ (घिग्घी बँधना) कहते हैं, वही। मोहन मानो तन्द्रिल हो गया हो - मन्त्रबिद्ध, वशीभूत। अपनी जी-जान लगा कर जब बोला तो स्वरों के बजाय ‘गों-गों’ की आवाज सुनाई दी। बड़ी मुश्किल से उसने जो कहा वह था - ‘अभी पैसे नहीं हैं।’

पता नहीं कन्हैया सेठ सहज थे या गम्भीर या वे अब मोहन से खेल रहे थे। बोले - ‘तो घबराता क्यों है? पैसे कल दे देना। कल नहीं हो तो परसों दे देना।’ सुनकर मानो मोहन को रुलाई छूट आई हो, कुछ इस तरह से बोला - ‘नहीं सेठ! बात कुछ और ही है। मुझे कपड़ा नहीं खरीदना।’ कह कर अपनी दड़बेनुमा दुकान में, दोनों टाँगों के बीच ठुड्डी टिकाकर, उकड़ू बैठ, जोर-जोर से बीड़ी फूँकने लगा। उसकी नजर नीची और साँस की आवाज से मानो नोलाईपुरा गूँज जाएगा।

कन्हैया सेठ हैरत से मोहन को देखने लगे। चुपचाप। निःशब्द। मोहन को मानो कन्हैया सेठ की नजरें खुद पर चुभती लगीं। उसने सर उठाकर देखा। कन्हैया सेठ को अपनी ओर ताकते हुए देख, कुछ इस तरह मानो फाँसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के लिए रिरिया रहा हो, हाथ जोड़कर, माथे तक ले जाते हुए बोला - ‘जाओ सेठ। माफ करो। मुझे छोड़ दो।’ कन्हैया सेठ कुछ नहीं बोले। उसी तरह, मोहन को हैरत से देखते हुए चले गए। उनके जाते ही मोहन में जान तो आ गई लेकिन हाथ-पाँव साथ नहीं दे रहे थे। बड़ी मुश्किल से उसने सामान का समेटा किया और भरी दुपहरी दुकान मंगल कर घर चला गया। सुनने में आया कि उसे रात भर तेज बुखार रहा। अगले दिन भी वह बहुत देर से दुकान पर आया लेकिन एकदम लस्त-पस्त। 

शाम होते-होते किस्सा पूरे नोलाईपुरा को मालूम हो गया। कोई मजे लेने के लिए तो कोई सचमुच में सहानुभूति जताते हुए जानना चाह रहा था कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक रुपया छे आने से शुरु होकर दस आना गज तक आने के बाद भी मोहन ने कपड़ा क्यों नहीं खरीदा जबकि हर भाव उसी ने बताया और कन्हैया सेठ ने आँख मूँद कर माना। मोहन ने कहा - ‘आप ही बताओ। ऐसा भी कहीं होता है कि कोई व्यापारी एक बार भी भाव-ताव नहीं करे? जो भाव आप बताओ वह भाव झट से माने ले? कोई ऐसा करे तो बात साफ है कि सामनेवाला आपको ठगने पर तुला हुआ है। दस आना गज का भाव लेकर कन्हैया सेठ मुझे ठगना चाहता था। यह तो रामजी ने अकल दे दी और मैं बच गया।’

बाद में मालूम हुआ कि वही कपड़ा कन्हैया सेठ ने उसी दिन, एक रुपया दो आना गज के भाव से बेच दिया था।

मोहन ने सुना तो चहक कर बोला - ‘देखा! मैं तो बच गया लेकिन वो बेचारा तो ठगा गया। कन्हैया सेठ से भगवान बचाए।’

आज चिकने घड़ों की बातें कर ली जाये !

 
श्रीमुकेश नेमा का यह व्यंग्य मुझे आज सुबह वाट्स एप पर मिला। मुझे बहुत अच्छा लगा। लगा कि इसे अधिकाधिक लोगों तक पहुँचना चाहिए। मुकेश भाई से पूछा - “इसे मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित करने की अनुमति देंगे?” अविलम्ब उत्तर मिला - “इसमें पूछना क्या है? आपका यह ‘सर्वाधिकार’ हमेशा सुरक्षित है।” मुकेश भाई वर्तमान में, मध्य प्रदेश शासन के आबकारी विभाग में उपायुक्त के पद पर ग्वालियर में पदस्थ हैं। चित्र में, अपनी ‘सदैव स्मिता’ उत्तमार्द्ध श्रीमती राजेश्वरी नेमा के साथ मुकेश भाई।


अब, घड़े तो आप और हम सब हैं ही। लेकिन घड़े होने का आनन्द ही तब है जब वो चिकना हो।

चिकने होने के सैकडों लाभ हैं। आप हर किसी की पकड़ से बाहर होते हैं, चिकना होना आपको फिसल जाने में मदद करता है, कोई आपका इस्तेमाल नहीं कर सकता पर आप जिस किसी की भी जेब से मनचाहा निकाल सकते हैं, आप इत्मीनान से बिना कुछ किये, तर माल सूँतते रह सकते हैं, बिना किसी के काम आये सबका इस्तेमाल कर सकते हैं और बिना हाथ पाँव हिलाये, मौज भरी चिकनाई के मज़े लेना आपके लिये खेल सा हो जाता है। आप और ज्यादा चिकने होते चले जाते हैं।

महाकवि भवानीप्रसाद मिश्र भले ही कह गये हों कि दुख आदमी को माँजता है लेकिन यह उक्ति चिकने घड़ों पर लागू नहीं होती। यहाँ सुख आपको माँजता है तथा और अधिक चिकने होने में आपकी मदद करता है। आपके व्यक्तित्व को एक ऐसी गरिमामय आभा प्रदान करता है कि लोगों को आपके बारे में काम का आदमी होने की गलतफहमी होने लगती है।

किन्तु इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि चिकना घड़ा होना आसान है। ऐसा सोचना, गलती करना है। इस चिकनत्व को प्राप्त हो जाना बड़े-बड़े हठयोगियों के लिये भी अत्यन्त कठिन है। यह इतना ही आसान होता तो फिर हो चुके चिकने घड़ों को सेवादारों के टोटे पड़ सकते थे। इस श्रेणी में शामिल हो जाने के लिये भारी कोशिशों की दरकार होती है। 

चिकना घड़ा होने के लिये आपको अथक कोशिशेे करनी पड़ेंगी। सबसे पहले आप को इज्जत, मान-अपमान टाईप की फिज़ूल चीज की चिन्ता से अपने आपको दूर रखना होगा। किसी की मदद करना सख्त मना है। किसी की वाजिब बात मान लेना और भी बुरा हो सकता है। आपके दोनों कानों के बीच हाई-वे होना ही चाहिये ताकि ईमानदारी, सच्चाई, मेहनत, भलमनसाहत जैसै शब्द एक कान में पड़ते ही सरपट दूसरे कान से बाहर हो सकें। यह तय करके चलना होता है कि आसपास जो भी बिखरा पड़ा है वो हमारे बाप का माल है। आपकी हरकतें ऐसी होनी चाहिये कि लोग आपके बारे में यह तय करने में मजबूर हो जाये कि यार इससे कोई उम्मीद करना बेकार है। इसका कुछ नहीं किया जा सकता। आपकी बातचीत में कुछ ऐसा शनित्व होना होना चाहिये कि सुनने वाला फौरन इस नतीजे पर पहुँच जाये कि ये दुष्ट अपनी बात मनवाये बिना मानेगा नही और कुछ ले देकर इसकी बात मानकर इससे पिण्ड छुड़ा लेने में ही भलाई है।

वैसे कुछ भाग्यशाली घड़े जन्मजात भी चिकने होते हैं। ऐसा तब ही होता है जब आप सोने-चाँदी के घड़ों के खानदान से हों। मिट्टी मिली पैदाईश वाले घड़ों के लिये चिकना होना थोड़ा कठिन ही होता है। 

यदि आप जन्म से ही इस चिकनत्व को प्राप्त कर चुके हैं तो हृदय से मेरा अभिवादन स्वीकार करें। यदि नहीं हैं तो मन पक्का करके, थोड़ी कोशिशें करके, चिकनों के इस दिन दूने रात चौगुने फैलते पन्थ में अपनी जगह बना सकते हैं।

धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं


गुड्डू (अक्षय छाजेड़) ने कही खेत की। मैंने सुनी खलिहान की। पहले गुड्डू ने और फिर मैंने, अपना-अपना माथा ठोका और हँसे। हमने हँसना नहीं चाहिए था। बात हँसने की नहीं, दुःखी होने की थी। लेकिन हम दोनों ही हँसे।

यह कल, रविवार अपराह्न लगभग साढ़े तीन बजे की बात है। राखी का दिन था। उत्तमार्द्धजी मायके गई हुई थीं। मैं घर में अकेला था। दूरदर्शन पर आ रही फिल्म ‘मैं कलाम हूँ’ देख रहा था। पड़ौस से गुड्डू आया और तनिक गम्भीर मुद्रा में बोला - “धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं।” मैं चौंका। मुझे झटका लगा। धारवाजी को यह क्या सूझी?

धारवाजी मेरे पड़ौस में, बगलवाली गली में रहते हैं। सेवा निवृत्त शिक्षक हैं। अवस्था 75-80 बरस के आसपास है। थोड़ा कम सुनते हैं। वे मेरी सुबह का हिस्सा हैं। रोज सुबह उन्हें, स्नान कर, पण्डित शैलीवाली एकलंगी धोती पहने, उघड़े बदन पीपल को जल चढ़ाने जाते और लौटते हुए देखने से मेरा दिन शुरु होता है। सीधे आदमी हैं। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। अपने रास्ते जाते हैं, अपने रास्ते आते हैं। न तो विवाद पैदा करते हैं और न ही किसी विवाद का हिस्सा बनते हैं। गए कुछ दिनों से वे नजर नहीं आ रहे। पूछताछ में मालूम हुआ कि उनकी तबीयत नरम-गरम चल रही है।

हमारे नगर निगम का  चाल-चलन भी देश के बाकी नगर निगमों जैसा ही है - अपने आप में मगन और नागरिक समस्याओं से बेपरवाह। लेकिन हमारी कॉलोनी की सड़कों की दशा यदि बेहतर नहीं तो ‘ठीक-ठीक’ तो है ही। ऐसी तो बिलकुल ही नहीं कि लोग परेशान हों और चिल्लाने लगें। फिर, धारवाजी तो नेतागिरी करते नहीं! उनका एक भतीजा भाजपा का एक ‘ठीक-ठीक असरवाला’ स्थानीय नेता है। यदि धारवाजी को कुछ ऐसा लगा तो भला इस उम्र में खुदा को गेंती-फावड़ा हाथ में लेने की क्या जरूरत आ पड़ी? अपने भतीजे का उपयोग कर लेते!

एक पल में ये सारी बातें मेरे दिल-दिमाग में घूम गईं। मैंने तनिक घबरा कर गुड्डू से कहा - ‘उन्हें रोको भाई! यह सब करने की उनकी उम्र नहीं है। और फिर वे बीमार भी चल रहे हैं। कहीं, कुछ हो गया तो खुद भी परेशान होंगे और परिवारवाले भी परेशान होंगे।’

मेरी बात सुनकर गुड्डू ने हैरत से मेरी ओर देखा। पूछा - ‘किस बात से रोकूँ?’ 

अब मैंने गुड्डू को हैरत से देखा और प्रति-प्रश्न किया - ‘किस बात से? अरे भाई! सड़क सुधारने से! अभी  तुमने कहा न कि धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं!’ 

‘मैंने कब कहा कि धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं?’ मेरे चेहरे पर समझदारी और सावधानी तलाशते हुए गुड्डू ने सवाल के जवाब में सवाल किया।

‘तो फिर क्या कहा तुमने?’

जैसा कि मैंने शुरु में ही कहा, गुड्डू ने माथा ठोक लिया। बोला - ‘मैंने क्या कहा और आपने क्या सुना! मैंने कहा कि धारवाजी स्वर्ग सिधार गए हैं।’

और जैसा कि मैंने शुरु में कहा, इस बार मैंने माथा ठोक लिया। पहले हँसी आई फिर झेंप। इससे पहले, मेरी दशा देख कर गुड्डू भी हँस चुका था।

गुड्डू तो संजीदा ही आया था। गड़बड़ मैंने ही कर दी थी। अपनी झेंप से उबर कर अगले ही पल मैं भी संजीदा हो गया। गुड्डू ने बताया - पाँच बजे अन्तिम यात्रा निकलेगी।

मुझे इस अन्तिम यात्रा में शरीक होना ही था। ‘राम नाम सत्य है’ के मद्धम स्वरों के बीच, अर्थी के पीछे-पीछे चलते हुए मुझे एक बार फिर ‘धारवाजी सड़क सुधार रहे हैं’ याद आ गया। मुझे फिर हँसी आ गई। इस बार झेंप नहीं आई। समानान्तर विचार मन में आया - धारवाजी ने अपनी सड़क सुधार ली। वे मुझे आगाह कर रहे हैं। कह रहे हैं कि मैं अपनी सड़क सुधार लूँ।

बहुत मुश्किल है कार से उतरना



अब सब कुछ सहज था और गुल्लू भैया बेलौस। अपनी रवानी को बरकरार रखते हुए उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई -

“आजादी के फारन बाद का वह वक्त कुछ अलग ही किस्म का था। गाँधी-नेहरू ने हमें ‘सिविलियन’ बना दिया था लेकिन हम रियाया ही बने हुए थे। अंग्रेज जा चुके थे लेकिन उनके होने का अहसास मानो फिजाँ में घुला हुआ था। एक दौर जा रहा था और दूसरा आ रहा था। बदलाव की अजीब कसमसाहट पूरे माहौल में घुली हुई थी। समाजवाद अजूबा था लेकिन हर कोई उसका जिक्र करने को उतावला लगता था। इस सबके बीच जमींदारों/जागीरदारों की धमक और रईसों की ठसक वैसी की वैसी बनी हुई थी। कार तो बहुत बड़ी बात थी, ताँगा रखना भी रईसी की निशानी थी। निजी कारें और ताँगे अंगुलियों पर गिने जा सकते थे। 

“उन दिनों 12,000 रुपयों में नई फिएट कार आती थी। पौने दो रुपयों में एक गैलन, याने करीब पाँच लीटर पेट्रोल मिलता था। ढाई-तीन सौ रुपयों में कार मेण्टेन का जा सकती थी।

“लेकिन हमारे घर में कार नहीं थी। ताँगा था। मुझे अच्छी तरह अहसास था कि हम कार रख सकते हैं लेकिन वालिद ने इस बारे में कभी सोचा भी हो - ऐसा कभी नहीं लगा। इसके बरखिलाफ मेरी हसरत थी कि हमारी अपनी कार हो।

“अपनी इस हसरत को मैं ज्यादा दबा नहीं पाया। एक दिन मैंने अपने वालिद से कह ही दिया - ‘पप्पा! अपन कार क्यों नहीं खरीद लेते? ताँगे की वजह से बदबू भी आती है और चारे-चन्दी का कचरा भी होता है। सईस के नखरे उठाने पड़ते हैं। रख-रखाव में भी मुश्किल आती है। हिसाब-किताब करेंगे तो सब मिलाकर कार, ताँगे के मुकाबले अपने को सस्ती ही पड़ेगी।’

“मेरी बात सुनकर वालिद हँस दिए। बोले - ‘बात तो तू सही कह रहा है गुल्लू। ताँगे और कार का तेरा हिसाब भी ठीक है। अपन कार खरीद भी सकते हैं। आज ही खरीद सकते हैं। लेकिन एक ही बात मुझे रोकती है बेटा!’

“वालिद की बात ने मेरे कान खड़े कर दिए। वे कार खरीदने से इंकार नहीं कर रहे थे। मेरी बात की ताईद भी कर रहे थे। मुझे लगा, किसी बहुत ही मामूली बात को लेकर वालिद ने कार खरीदने का फैसला रोक रखा है। मैंने पूछा - ‘कौन सी बात पप्पा?’

“मेरी बात के जवाब में मेरे वालिद ने जो कहा, उसने मेरी आँखें खोल दीं, जिन्दगी जीने का सलीका और जिन्दगी के मायने समझा दिए। बहुत ही लाड़ से बोले - ‘बेटा! मेरी बात समझने की कोशिश करना। कार में चढ़ना, बैठना तो बहुत आसान है लेकिन उसमें से उतरना बहुत ही मुश्किल है।’

“कह कर वालिद अपने काम में लग गए। मेरी ओर देखा भी नहीं। उन्हें लगा होगा कि उनकी बात से मैं दुःखी, पेरशान हुआ हूँगा। लेकिन वे मुझे देखते तो यकीनन बेहद खुश होते। मेरी शकल मानो मेरी नहीं रह गई थी। कोई दूसरा ही चेहरा मेरे चेहरे पर चस्पा हो गया था जिसे मैं खुद देखता तो खुद को ही नहीं पहचान पाता। उस दिन उनका बेटा गुल्लू,  गुलाम हुसैन एक बार फिर पैदा हुआ। यह गुलाम हुसैन, पहलेवाले गुलाम हुसैन से एकदम जुदा, दूसरे ही मिजाज का, दूसरी ही रंगत का गुलाम हुसैन था। आज जो मैं आपके सामने हूँ, आपसे बात कर रहा हूँ, जिसकी बातों को आप डूब कर सुन रहे हैं, वह वही दूसरा गुलाम हुसैन हूँ।”

गुल्लू भैया एकदम चुप हो गए। कुछ इस तरह मानो, पुराने जमाने के किसी सिनेमा घर में, प्रोजेक्टर पर चल रही फिल्म एक झटके से टूट गई हो। कुछ पल सन्नाटा, अँधेरा। सिर्फ प्रोजेक्टर के चलने की घर्राहट। ऐसा झटका, जिसके लिए मैं कतई तैयार नहीं था। मैं वाकई में अकबका गया था।

वे तो अपने में ही थे। मुझे अपने में लौटने में कुछ क्षण लगे। गुल्लू भैया अपनी सहज हँसी हँस रहे थे। मेरे हाथ थपथपा कर बोले - “मैंने अपना काम कर दिया। आपका कर्ज चुका दिया। ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ दे दीजिए।”

मैंने कहा - ‘वो तो अब देना ही रहा लेकिन एक बात बताईए। आपने कार खरीदी या नहीं?’ गुल्लू भैया बोले - ‘हाँ, हाँ। खरीदी क्यों नहीं? खरीदी।’ मैंने पूछा - ‘कब खरीदी और कौन सी खरीदी? और खरीद रखी है तो आप तो मुझे कभी कार में नजर नहीं आए? हमेशा पैदल ही नजर आते हैं?’ गुल्लू भैया ने जवाब दिया - ‘यह तो याद नहीं कि कब खरीदी। रियाज बता देगा। एक सेकण्ड हेण्ड मारुति-800 खरीद रखी है। मुझे तो जरूरत पड़ती नहीं। आना-जाना ही कितना है? घर से दुकान और दुकान से घर। आप यूँ मान लें कि उतरने की जोखिम से बचने के लिए मैं कार में बैठने की जोखिम नहीं लेता। बच्चों को कभी-कभार जरूरत पड़ जाती है तो वापर लेते हैं।’

गुल्लू भैया मुझे अभी भी ‘अजूबा’ लग रहे थे। मैंने हिम्मत करके पूछा - ‘जमाना बदल गया है गुल्लू भैया। कहाँ से कहाँ पहुँच गया है। आपके वालिद की बातें आपके वालिद के साथ चली गईं। जरा ठाठ-बाट से रहिए।  लोग आपको कंजूस-मक्खीचूस समझते होंगे।’

जवाब में पहले तो गुल्लू भैया ख्ुालकर, ठठाकर हँसे। फिर तनिक रुककर, संजीदा होकर बोले - ‘मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आप भी इस फिक्र को ताक पर रख दें कि लोग क्या कहेंगे। लोगों को जो समझना हो, समझें। जो कहना हो, कहें। आप क्या समझते हैं कि मैं नहीं जानता कि जमाना बदल गया है? हाँ बैरागीजी! जमाना बदल गया है। बहुत बदल गया है। पूरी तरह बदल गया है। एक शेर आज के बदले जमाने की हकीकत बयाँ करता है -

ऐ जौक-ए-इनकिसार कोई और मशगला।
कहने लगे हैं लोग शराफत को बुजदिली।’

इसके बाद क्या कहना रहा? क्या सुनना रहा?

इजाजत लेकर गुल्लू भैया के दफ्तर से लौटा तो मुझसे तनकर नहीं चला जा रहा था। मैं झुक कर चल रहा था। 




सूट को धक्के : लंगोटी की शाही अगवानी

अपने बेटों रियाज (बांये) और जफर(दाहिने) केसाथ गुल्‍लू भैया

‘चाय-पानी’ के बाद हम दोनों ही सामान्य और ताजादम हो चुके थे। भावावेग छँट चुका था और हम दोनों ही तैयार थेे - ‘कहने-सुनने’ के लिए। 

गुल्लू भैया को सुनते हुए मुझे एक अखबारी शीर्षक (शायद ‘जनसत्ता’ का) याद आता रहा - “बोले तो बहुत लेकिन कहा कुछ नहीं।” पल-पल लगता रहा कि गुल्लू भैया ने जो बोला, कहा उससे कहीं ज्यादा और वह भी ऐसा जो, जैसा कि मैंने शुरु में ही कहा, उतना ही जरूरी जितना कि पौधों-पत्तों के लिए क्लोरोफिल। 

“यह आजादी मिलने के बाद की बात है। रतलाम में एक क्लब बना था - सज्जन क्लब। रतलाम के महाराजा सज्जनसिंहजी के नाम पर यह क्लब उनकी बहन, रतलाम की राजकुमारी गुलाब कुँवरने स्थापित किया था। रेल्वे के और राज्य सरकार के राजस्व विभाग के अफसर ही सदस्य ही इसके सदस्य बन सकते थे। शहर के गिने-चुने, नामचीन लोगों को इसकी सदस्यता मिली थी। मेरे वालिद इस क्लब के संस्थापक सदस्य थे। 

वालिद के कारोबार का लेना-देना केवल रेल्वे से था लेकिन कलेक्टर समेत, राजस्व विभाग के तमाम आला अफसरों से भी वालिद का मेलजोल था। उस वक्त के कलेक्टर से उनकी दोस्ती भाईचारे की शकल ले चुकी थी।

“इन्हीं कलेक्टर साहब के तबादले की खबर आई ही थी कि उन्हीें दिनों बैरिस्टर साहब (रतलाम के पहले और तब से लेकर अब तक के एकमात्र ‘बैरिस्टर’, अब्बासी साहब) का मुम्बई जाने का कार्यक्रम बना। मुम्बई तक बॉम्बे हुआ करता था। अनेक विदेशी वस्तुओं पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था। विदेशी कपड़े भी उनमें शरीक थे। मेरे वालिद कलेक्टर को कोई ‘अच्छी सी गिफ्ट’ देना चाहते थे। उन्होंने बैरिस्टर साहब से कहा कि मुमकिन तो वे, विदेशी कपड़े का (इंगलैण्ड/मेनचेस्टर का बना) कोई अच्छा सा ‘सूट पीस’ लेते आएँ।

“वालिद को, बैरिस्टर साहब से यह कहते हुए सुनकर मेरा भी जी हो आया। मैंने वालिद से कहा - ‘पप्पा! एक सूट पीस मेरे लिए भी मँगवा दीजिए।’ वालिद ने मुझे जिस नजर से देखा, वह मैं इस लमहे तक नहीं भूल पाया हूँ। वह नजर मझे अब तक अपने चेहरे पर बनी हुई लग रही है। तब भी नहीं समझ पाया था और इस पल तक नहीं समझ पा रहा हूँ कि उस नजर में क्या था - मुहब्बत, रहम, करुणा, फिक्र, निराशा, गुमान या झंुझलाहट? ये सब या इनमें से कोई एक? एक पल इसी नजर से मुझे देखा और मक्खन सी आवाज में बोले - ‘गुल्लू! बेटा! तूने माँगा तो भी क्या माँगा? एक सूट पीस। बस? तू तो मेरा बेटा है। मेरा खून है। तू तो मेरी उम्मीदों में से एक है। मेरा नाम रोशन करनेवाला। तेरे लिए एक सूट पीस कहाँ लगता है? जब मैं मुँहबोले भाई, कलेक्टर के लिए एक सूट पीस मँगवा सकता हूँ तो तेरे लिए नहीं मँगवा सकता?’

“मुझे लगा, वालिद ने मेरी बात मान ली है और अब मेरा सूट पीस पक्का। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। वालिद ने इसके बाद जो कुछ कहा, उसने जिन्दगी को लेकर मेरा नजरिया बदल दिया। मेरी जिन्दगी सँवार दी। अपने बेटे के आनेवाले कल को लेकर फिक्रमन्द एक बाप अपने बेटे को इससे बहेतरीन और क्या दे सकता है? सुन कर मुझे भी लगा, अपने आप पर झेंप भी आई कि यार! गुल्लू! तूने माँगा तो भी क्या माँगा - एक सूट पीस? बस! 

“वालिद ने कहा - ‘मन में से यह बात निकाल दे बेटा कि कपड़ों से आदमी की इज्जत, औकात बनती या बिगड़ती है या कि कम-ज्यादा होती है। सूट तो गाँधीजी ने भी पहना था। लेकिन हुआ क्या? जिसकी सल्तनत में सूरज नहीं डूबता था, उस सल्तनत की महारानी के, दो टके के नौकर ने गाँधीजी को रेल के डब्बे में से फेंक दिया था। अगर सूट की ही अहमियत होती तो ऐसा नहीं होना चाहिए था। लेकिन ऐसा ही हुआ। इसके बर-खिलाफ जब गाँधीजी ने कमीज पहननी छोड़ दी, धोती भी आधी ही कर ली तब उसी महारानी ने, खुद चलकर, लन्दन के हवाई अड्डे पर ऐसे, ‘अधनंगे’ गाँधी की अगवानी की। सूट ने, दो टके नौकरों से धक्के दिलवाए और खादी की लंगोटी ने महारानी को झुका दिया।’

“वालिद की यह बात सुनकर मुझे ध्यान आया कि मेरे वालिद ने भी लट्ठे का कमीज-पायजामा पहन रखा है और यही उनकी रोजमर्रा की ड्रेस भी है। जो आदमी, एक अफसर को मेनचेस्टर के कपड़े का सूट पीस गिफ्ट देने की बात कह रहा है, वह आदमी खुद लट्ठा पहने हुए है! मैं एक झटके से धरती पर आ गया। मेरे चेहरे पर एक रंग आ रहा था, दूसरा जा रहा था। पता नहीं यह खुद की बात पर पछतावा था या ऐसे ऊँचे खयालातवाले का बेटा होने का गुमान!

“लेकिन वालिद ने अभी आधी बात ही कही थी। बाकी आधी बात उन्होंने जो कही, वही मेरी जिन्दगी की बात बन कर रह गई। वालिद बोले - ‘बेटा! कपड़े या कहो तो ये सारी चीजें, ये सारी धन-दौलत तो आनी जानी है। इनसे यदि पहचाने जाओगे तो जब ये नहीं होंगी तो जाहिर है तब तुम्हें कोई नहीं पहचानेगा। तो हमने खुद में कोई ऐसी बात पैदा करनी चाहिए जो हमारी पहचान बने और ऐसी पहचान बने कि जो भी हम पहनें, उसकी इज्जत हो।’

“वह दिन और आज का दिन। पप्पा आज दुनिया में नहीं हैं। 1975 में, 84 बरस की उम्र में उनका इन्तकाल हुआ। तब मैं कोई 42 बरस का रहा होऊँगा। लेकिन इस वाकये के बाद, तब पप्पा की मौजूदगी में और 1975 से, उनकी गैर मौजूदगी में, मैं उनकी बात पर अमल करने की कोशिशें कर रहा हूँ। मैं खुद अपने बारे में क्या कहूँ? मुझे तो एक पल भी नहीं लगा कि मैं पप्पा की बात को हकीकत में बदल पाया हूँ। मुझे तो अपनी हर कोशिश नाकामयाब लगती है। मुझे दूर से देखनेवाले ही मेरी हकीकत जानते होंगे।”

गुल्लू भैया की बात रुकी तो मैंने पाया कि टेबल पर हम दोनों के हाथ गुँथे हुए हैं। पता नहीं कब उन्होंने मेरे हाथ, अपने हाथों में ले लिए थे। अपने आप में लौटने में हमें कुछ पल लगे। हमने अपने-अपने हाथ खींचे। उन्होंने सूनी लेकिन चश्म-ए-नम से मुझे देखा। 

मैं कुछ कहने की हालत में नहीं था। जी कर रहा था, कहूँ कि उनकी कोशिशों की कामयाबी न तो नाप सकता हूँ न ही गिन सकता हूँ। लेकिन कुछ तो ऐसा उन्होंने खुद में पैदा किया ही है जिसके चलते मैं उनसे यह सब सुनने के लिए उनसे इसरार कर रहा हूँ। उनकी आँखें मुझे सवालिया लग रही थीं। 

बमुश्किल मैंने कहा - “गुल्लू भैया! आपका शुक्रिया अदा करने के सिवाय मेरे पास कुछ नहीं है आपसे कहने के लिए। लेकिन यदि आपका इसरार है तो सुनी-सुनाई चार पंक्तियों  से शायद मेरे जजबात आप तक पहुँचें -

जिन्हें हम कह नहीं सकते,
जिन्हें तुम सुन नहीं सकते,
वही कहने की बातें हैं,
वही सुनने की बाते हैं।”

गुल्लू भैया खुश हो गए। बोले - “तो अब मेरी बाकी बातों पर भी ये सतरें लागू कर लीजिए और अपना वक्त जाया होने से बचा लीजिए।”

मैं घबरा गया। हड़बड़ा कर बोला - “क्या गजब कर रहे हैं आप? बेवकूफी का जवाब बेवकूफी नहीं होता। एक पैदायशी बैरागी आपके सामने बैठा है और आप अपने दरवाजे से उसे ऐसे का ऐसा बैरागी ही जाने देंगे? मेरी नहीं तो अपनी तो परवाह कीजिए! लोग क्या कहेंगे?”

गुल्लू भैया ठठा कर हँसे। उनके ठहाके ने सारा भारीपन, सारी नमी एक झटके में धो-पोंछ दी। बोले - “यह परवाह तो आप भी मत कीजिए कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन बेफिकर रहिए। एक और बात कहने का आपका कर्जा मुझ पर है। कम से कम वह तो कहूँगा ही।”

मुझे तसल्ली हुई।

और उसके बाद मिला मुझे दूसरा जीवन सूत्र। लेकिन वह अगली कड़ी में। 

पार्टनरशिप डीड वो बनवाए जो चोर हो



मैं मुश्किल में हूँ। 

चाह रहा हूँ कि गुल्लू भैया की बातें उन्हीं की जबानी कहूँ। लेकिन गुल्लू भैया ने जो कुछ कहा, वह मुझे न तो शब्दशः याद है और न ही मैंने उनके नोट्स लिए, इसलिए ऐसा करना न तो सम्भव है और न ही उचित। लेकिन यदि मैं अपनी जबान में वह सब कहूँ तो मुझे खुद को लग रहा कि बात लम्बी भी हो जाएगी और शायद बनावटी भी। सो, गुल्लू भैया से माफी माँगते हुए और आप सबकी ‘जबरिया अनुमति’ लेते हुए, सुनी-सुनाई सारी बातों को गुल्लू भैया की जबानी ही पेश कर रहा हूँ।

जो कुछ गुल्लू भैया ने कहा, वह कुछ इस तरह था -

“जब से मैंने होश सम्हाला, अपने वालिद (अब स्वर्गीय श्री एहमद अली स्टेशनवाला) को रतलाम के ‘मुकाम और मरतबा  हासिल’ कारोबारियों में पाया। वे केवल रेलवे के ठेके लेते थे। स्टेशनवाले इलाके मे ही मिठाइयों की एक दुकान थी। बयाना (राजस्थान) के रहनेवाले गिरिराजजी शर्मा उसके मालिक थे। वे ‘गिरिराज महाराज’ के नाम से ही जाने और पुकारे जाते थे। वे मेरे वालिद के बेहद करीबी दोस्त थे।

“एक बार रेल्वे की कोयला चूरी का टेण्डर निकला। मेरे वालिद ने बातों ही बातों में गिरिराज महाराज से कहा कि यह ठेका लेना मुनाफे का सौदा होगा। यदि वे (गिरिराज महाराज) चाहें तो इसमें भागीदार बन जाएँ। वालिद ने तो एक मशवरा दिया था। लेकिन, पता नहीं महाराज ने क्या सुना, क्या समझा कि सीधे बयाना गए और वहाँ की अपनी सारी जमीन-जायदाद-दुकान वगैरह बेच कर स्थायी रूप से रतलाम आ गए। 

“खैर, वालिद की और गिरिराज महाराज की भागीदारी में काम शुरु हुआ और खुदा के करम से नतीजे उम्मीद के मुताबिक मिले। काम धीरे-धीरे बढ़ने लगा और इतना बढ़ा कि रतलाम से बाहर शामगढ़ (म.प्र.), कोटा, गंगापुर (दोनों राजस्थान) और आगरा तक एस्टिब्लिशमेण्ट कायम करने पड़े।

“लेकिन वालिद ने सब जगहों पर अकेले काम नहीं किया। जहाँ-जहाँ काम किया, वहाँ-वहाँ भागीदारी फर्म या कम्पनी बनाई और सब जगहों पर स्थानीय लोगों से भागीदारी की। इस तरह वालिद चार कम्पनियों में भागीदार रहे। कम्पनियों में भागीदारों की तादाद हालात और सहूलियत के मुताबिक रही। एक कम्पनी में सबसे ज्यादा 13 भागीदार रहे तो एक कम्पनी में सबसे कम चार।  

“इन भागीदारी कम्पनियों की दो बातें आज के जमाने में यकीन से परे लगेंगी। पहली बात यह कि चारों कम्पनियों में केवल वालिद ही दाउदी बोहरा थे। बाकी सबके सब हिन्दू भागीदार थे। और दूसरी बात इससे भी अधिक अहम, काबिले गौर और मुश्किल-यकीन वाली है। इन कम्पनियों की पार्टनरशिप डीडें तभी बनवाईं गईं जब कानूनी तौर पर (और खास कर इनकम टैक्स के लिए) जरूरी हुआ।

“एक वाकये से बात शायद ज्यादा साफ होगी।

“आजादी के बाद जब इनकम टैक्स लागू हुआ तो इन्दौर से पेण्डसे वकील साहब ने रतलाम आकर यहाँ, इन्दौर धर्मशाला में मुकाम जमाया। उन्होंने वालिद से मुलाकात की। सारी बातें समझाईं। जब कागज-पत्तर की बात आई तो पेण्डसे साहब ने पार्टनरशिप डीड की कॉपी माँगी। वालिद ने बताया कि पार्टनरशिप डीड न तो बनवाई गई है और न ही बनवाई जाएगी। पेण्डसे साहब ने कहा कि अब तक नहीं बनी है तो अब बनवानी पड़ेगी। पेण्डसे साहब की यह बात वालिद को अच्छी नहीं लगी। तुनक कर बोले - ‘जो चोर हो वो पार्टनरशिप डीड बनवाए। हम पार्टनरों में से कोई भी चोर नहीं है।’ वालिद की जिद के चलते अपनी बात समझाने में पेण्डसे साहब को काफी मुश्किल आई। उन्हें कहना पड़ा कि वे (मेरे वालिद) रतलाम के, अपने भरोसे के वकील से उनकी (पेण्डसे साहब की) बात की ताईद कर लें। आखिरकार वालिद को पार्टनरशिप डीड बनवानी ही पड़ी लेकिन यह काम करने में उन्हें बड़ी तकलीफ हुई।

“गिरिराज महाराज से वालिद की पार्टनरशिप, कहने भर को पार्टनरशिप थी। दोनों परिवारों की दोस्ती पूरे रतलाम में अजूबा थी। ‘स्टेशनवाला’ और ‘शर्मा’ सरनेम के कारण ही दोनों परिवार अलग थे लेकिन हालत यह थी कि दोनों ने एक ही कुटुम्ब बन कर व्यवहार किया। महाराज के यहाँ जब भी शादी-ब्याह का मौका आया तो समधियों की मिलनी-रस्म के लिए  महाराज ने सबसे पहले मेरे वालिद को पटले पर खड़ा किया। और हमारे यहाँ जब भी ऐसा मौका आया, तब गिरधारी महाराज को यही इज्जत दी गई।”

इन दोनों परिवारों की भागीदारी तीन पीढ़ियों तक चली। रियाज और जफर (रियाज को आप पहली कड़ी में जान चुके हैं। जफर, गुल्लू भैया का छोटा बेटा है।) बताते हैं कि गिरिराज महाराज के पोते और ये दोनों भाई (एहमदअली साहब के पोते) साथ-साथ भगीदार रहे। आज यह भागीदारी अस्तित्व में नहीं हैं लेकिन इसकी वजह कोई विवाद या असहमति नहीं। इस भागीदारी में जो कारोबार किया जाता था, वह कारोबार ही बन्द हो गया। लिहाजा, भागीदारी फर्म विसर्जित करनी पड़ी।

गुल्लू भैया बोलेे - “लेकिन खुदा का करम है कि दोनों परिवारों का नाता आज भी जस का तस बना हुआ है। आप भी दुआ कीजिए कि हमारा यह रिश्ता बना रहे और इसे किसी की नजर न लगे।”

इस मुकाम पर आते-आते गुल्लू भैया तनिक भावुक हो गए। जो कुछ सुना, वह मुझे भी भावाकुल कर गया। जानने-सुनने की मेरी प्यास, तलब की हदें छू रहीं थीं। लेकिन मुझे लगा, गुल्लू भैया कहीं इस दशा में न आ जाएँ कि मेरा मकसद अधूरा रह जाए। इसी स्वार्थ के चलते बोला - ‘अब थोड़ा रुकिए। मुझे एक ग्लास पानी पिलवाइए और चाय भी।’

गुल्लू भैया ‘नम हँसी’ हँस दिए। बोले - ‘मुझे सम्हाल रहे हैं? शुक्रिया।’ 

उन्होंने चाय-पानी के लिए रियाज को निर्देशित किया। हम दोनों के बीच खामोशी पसर गई थी। मुझे तो कुछ बोलना था ही नहीं। मैं चुप था। लेकिन गुल्लू भैया!  वे भी चुप थे। कुछ इस तरह मानो अगली बात कहने के लिए खुद को तैयार और ताजा दम कर रहे हों। 

यह चुप्पी टूटी तो मुझे मानो जीवन सूत्र मिल गए। 

क्या थे वे जीवन सूत्र? जी तो कर रहा है कि मैं बिना रुके अपनी बात कहूँ। लेकिन इस क्षण मैं भी सहज-सामान्य नहीं रह गया हूँ। 


गुल्लू भैया नहीं, उनकी बातें हैं जरूरी

ये हैं हमारे गुल्लू भैया। पूरा नाम गुलाम हुसैन स्टेशनवाला। बहत्तर बरस की उम्र में चल रहे इस आदमी को जानना हममें से किसी के लिए जरूरी नहीं। वक्त की बर्बादी ही होगी। लेकिन इनकी बातें सुनने के बाद यह तय है कि जो कुछ ये बताते हैं, उसे जानना हम सबके लिए जरूरी है। खास कर आज के हालात में उतना ही जरूरी जितना कि पौधों-पत्तों की हरियाली के लिए क्लोरोफिल।

गुल्लू भैया से मेरी दोस्ती तो कभी नहीं रही। जान-पहचान भी नहीं। बस! दुआ-सलाम का रिश्ता रहा। उनसे मिलना-जुलना भी बस इतना ही था जितना टाला जाना नामुमकिन होता। उनके बेड़े बेटे रियाज से मेरा मिलना-जुलना था। उससे मिलने जाता तो गुल्लू भैया से भी मिलना पड़ता - बिलकुल उसी तरह और उतना ही कि जिस तरह और जितना अपने मिलनेवाले के पिता से मिलना ही पड़ता है। मेरी मुश्किल यह कि उम्र में रियाज मुझसे छोटा और मैं गुल्लू भैया से। रियाज समझे कि मैं उसके पिता के मिलनेवालों में शरीक हूँ और गुल्लू भैया मुझे रियाज के मिलनेवालों में समझे।

कशमकशवाली मेरी इस दशा के बीच गुल्लू भैया मुझे हर बार, बार-बार, लगातार एक अबूझ पहेली लगते रहे। कारण रहा - उनकी आर्थिक हैसियत और उनके रहन-सहन में जमीन-आसमान का अन्तर। “खानदानी रईस” गुल्लू भैया कि आर्थिक हैसियत ऐसी कि मुझ जैसे सौ-पचास बैरागी एक झटके में खरीद लें (मेरी इस बात को मुहावरा ही समझा जाए। जानता हूँ कि मुझ जैसे एक भी बैरागी को खरीदने का ‘मूर्खतापूर्ण अपव्यय’ गुल्लू भैया तो क्या, कोई नासमझ भी नहीं करेगा)। (मैंने जब गुल्लू भैया से कहा कि मैं यह खरीदनेवाली बात लिखूँगा तो घबराकर, दोनों कान छूकर बोले - “अरे! अरे!! ऐसा गजब बिलकुल मत करना। मैं तो खुद अपने दीन-ओ-ईमान के हाथों बिका हुआ आदमी हूँ।”) लेकिन रहन-सहन ऐसा कि उनके सामने बैरागी भी बिड़ला लगे। मैंने उनको सदैव पैदल चलते ही देखा। कभी-कभार सायकिल पर। और बहुत हुआ तो भूले-भटके स्कूटर पर। कभी खुद चलाते हुए तो कभी अपने बेटे के पीछे बैठे हुए। उनका यह ‘चाल-चलन’ ही उन्हें अबूझ पहेली बनाता रहा मेरे लिए।

लेकिन जैसा कि हम सब कहते हैं - हर बात की एक हद होती है। सो, एक दिन मेरे धीरज ने अपनी हद छोड़ दी। लिहाज और तमीज को खूँटी पर टाँग कर, उन्हें रास्ते चलते रोक कर पूछ ही लिया - “यह क्या चक्कर है गुल्लू भैया?” मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ कि मेरे सवाल पर गुल्लू भैया को बिलकुल ही ताज्जुब नहीं हुआ। हँस दिए। कुछ इस तरह मानो बरसों से मेरे इस सवाल की प्रतीक्षा कर रहे थे। बोले - “यहीं, सड़क पर खड़े-खड़े जानना चाहेंगे या कहीं बैठकर, तसल्ली से बात करें?” मुझे राहत भी मिली और ताज्जुब भी हुआ। राहत इस बात से कि उन्हें मेरा सवाल बुरा, अटपटा नहीं लगा और ताज्जुब यह जानकर हुआ कि वे लिहाज करने की सीमा तक मेरा सम्मान करते हैं।

अब, जब जवाब गुल्लू भैया से हासिल करना था तो जाहिर है कि उनकी सुविधा ही पहली और आखिरी शर्त थी। बोले - “चलिए! दफ्तर चलते हैं। वहीं बैठकर बातें करते हैं। कोशिश करूँगा कि आपको तसल्ली हो जाए।” मैं स्कूटर पर था और गुल्लू भैया पैदल। मैंने कहा - “बैठिए।” उन्हें क्षण भर को उलझन हुई लेकिन बिना ना-नुकुर किए बैठ गए।

दफ्तर पहुँच कर हम दोनों ने अपनी-अपनी जगह ली। गुल्लू भैया बोले - “बात लम्बी हो सकती है। सब कुछ आज ही जानना चाहेंगे या किश्तों में?” फुरसत में तो हम दोनों ही नहीं थे लेकिन उस क्षण का सच यह था कि इधर मैं सब कुछ जानने के लिए अगली साँस भी लेने को तैयार नहीं तो उधर गुल्लू भैया भी मानो एक ही साँस में सब कुछ कह देने का तैयार हो गए हों। 

और गुल्लू भैया ने बोलना शुरु किया तो लगा वे वहाँ नहीं थे। उन्होंने बात शुरु तो की मेरी आँखों में आँखें डालकर। लेकिन कुछ ही पलों में मुझे लगा, मैं उनके सामने हूँ ही नहीं। वे, मानो मेरे आर-पार देखकर किसी और की बातें किसी और को सुना रहे हों।

वही सब ऐसा है जो आज के हालात में हम सबके लिए निहायत ही जरूरी है। बिलकुल उतना ही जरूरी जितना कि पौधों-पत्तों की हरियाली के लिए क्लोरोफिल। लेकिन आज सब कुछ कहने लगूँगा तो बात लम्बी हो जाएगी।

किन्तु गुल्लू भैया ने सब कुछ कहने की इजाजत नहीं दी। दो ही बातों की इजाजत दी। वे ही दो बातें कहूँँगा। लेकिन अभी नहीं। 


कुछ अटपटा लेकिन तसल्लीदायक

इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं कीथी।


‘आइए! रोगी के लिए निर्धारित कुर्सी पर विराजिए।’ कह कर डॉक्टर सोनगरा खुद ही चौंक गए। कुछ आह्लादित, कुछ विस्मित हो, कुछ इस तरह कि मानो खुद से ही सवाल पूछ रहे हों, बोले - ‘अरे! मैं  ऐसी हिन्दी बोल सकता हूँ? मुझे याद है यह सब?’

वे (डॉक्टर सोनगरा नहीं, मेरे ‘वे’) आयु में तो मुझसे छोटे हैं किन्तु ज्ञान और बौद्धिकता में हिमालय। हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान्। सो, वे मेरे प्रिय भी हैं और आदरणीय भी। उनके घर पर बैठ, उनकी मेजबानी का सुख-आनन्द ले रहा था। एक सज्जन पधारे। वे मेरे इन प्रिय-आदरणीय को सवैतनिक सेवा का प्रस्ताव लेकर आये थे। शर्त थी - सारा काम अंग्रेजी में करना पड़ेगा। मेरे इन प्रिय-आदरणीय का, हिन्दी में आधिकारिक हस्तक्षेप जताने की ललक में कह बैठा - ‘तब तो ये शायद ही आपके लिए उपयोगी हों। हाँ! हिन्दी में इनके मुकाबले का अपने कस्बे में कोई नहीं।’ मैं उनके घर बैठा था, प्रस्ताव उनसे किया गया था। मेरे बोलने का न तो प्रसंग था न ही औचित्य। उनके प्रति मोहग्रस्त हो, उन्हें हिन्दी का निष्णात विद्वान् साबित करने के मोहवश मैं आपराधिक मूर्खता कर बैठा हूँ, तब इसका अनुमान भी नहीं हुआ। मेरा इतना कहने के बाद किसी के लिए कुछ कहना शेष नहीं रह गया था। प्रस्ताव, चर्चा होने से पहले ही निरर्थक हो चुका था।

मैं घर लौटा तो उत्तमार्द्ध ने बताया कि उनका फोन आया था। कहा था कि आते ही उनसे बात करूँ। मैंने वही किया। वे अप्रसन्न, खिन्न, क्षुब्ध और कुपित थे। उन्हें इस बात से अपनी हेठी लगी कि मैंने अंग्रेजी पर उनके अधिकार को संदिग्ध बना दिया था। उनके कोप का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मैं कुछ कहता और क्षमा-याचना करता, इससे पहले ही उन्होंने फोन बन्द कर दिया। मुझे मर्मान्तक पीड़ा हुई - यह मैंने क्या कर दिया? जो मेरे आत्मीय हैं, उन्हीं को पीड़ा पहुँचा दी? उन्हीं की अवमानना कर दी? वह भी, उनके ही घर में, उनकी श्रीमतीजी की उपस्थिति में? मैं रात भर सो नहीं पाया। उनसे बात करने का साहस तो मुझमें रहा ही नहीं।

उसके बाद कैसे, क्या हुआ, यह अपने आप में स्वतन्त्र आख्यान है। किन्तु दो महीने से अधिक का समय हो गया, मैं उनसे बात करने का साहस अब तक नहीं जुटा पाया हूँ। उन्होंने बड़प्पन बरता, स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश की किन्तु मैं इस क्षण तक सहज नहीं हो पाया हूँ। अब तक अपराध-बोध से ग्रस्त ही हूँ।

किन्तु महत्वपूर्ण बात यह कि अंग्रेजी पर समुचित अधिकार न होने की बात वे एकाधिक बार मुझसे कह चुके थे। अंग्रेजी की अनिवार्यता की शर्तवाला ऐसा ही एक प्रस्ताव पहले उनके पास आया था तो उन्होंने सामनेवाले से साफ कहा था कि वे अंग्रेजी में न तो धाराप्रवाह बोल सकते हैं न ही लिख सकते हैं। हिन्दी में उनकी प्रतिष्ठा को दृष्टिगत रखते हुए उनकी यह बात मान ली गई थी। यह संयोग या दुर्योग रहा कि वह प्रस्ताव परवान नहीं चढ़ पाया।

यह प्रसंग मुझे याद आया तो मैं उलझन में पड़ गया - ‘जो बात वे खुद कहते रहे हैं, वही बात मैंने कही तो उन्हें बुरा क्यों लगा?’

मैंने खूब सोचा। उनकी नाराजी को कोई कारण मुझे नजर नहीं आ रहा था। बार-बार एक ही बात पर आकर मेरा मन ठहरता रहा - “हो न हो, उन्हें इस बात का बुरा लगा कि दूसरे के सामने उन्हें ‘अंग्रेजी में अज्ञानी’ साबित कर दिया गया।” और कोई कारण मुझे न तब अनुभव हुआ और न ही अब अनुभव हो रहा है।

यह बात मेरे मन से निकल ही नहीं पाई। हमें हिन्दी का ज्ञान न हो, यह तो हमारे लिए शर्म की बात हो सकती है। किन्तु हमें अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है, यह बात हमारे लिए लज्जाजनक कैसे हो सकती है? वह भी उस आदमी के लिए जो हिन्दी और संस्कृत पर अपनी आधिकारितकता के लिए पूरे कस्बे में ही नहीं, समूचे मालवांचल में जाना-पहचाना, सराहा जाता हो, सम्मानित किया जाता हो?

दो-ढाई महीनों से यह बात मुझे साल रही थी। सोचा, अंग्रेजी न जानने को लेकर जब आचंलिक स्तर पर हिन्दी का एक महारथी, सारस्वत-पुरुष अचेतन में इस तरह हीनता-बोध से ग्रस्त हो सकता है तो बेचारे एक औसत पढ़े-लिखे आदमी की मनोदशा क्या होगी? मेरी खुद की अंग्रेजी ऐसी नहीं कि मैं खुद को अंग्रेजी का जानकार कह सकूँ। किन्तु ‘अंग्रेजी अज्ञान’ को लेकर ऐसा हीनता-बोध मुझमें क्षणांश को भी नहीं उपजा। 

सो मैंने, पाँच दिन पहले, जेब पर लगाई जा सकनेवाली, प्लास्टिक की एक पट्टी बनवाई - ‘मुझे अंग्रेजी नहीं आती।’ दुकानदार ने कहा कि सामेवार को पट्टी मिल जाएगी। सोमवार की शाम को मुझे अपने डॉक्टर के पास जाना था। वहाँ जाने से पहले, दुकानदार से यह पट्टी बनाकर ली। अपनी कमीज पर लगाई और डॉक्टर की सेवा में उपस्थित हो गया। मेरी कमीज पर लगी पट्टी का असर डॉक्टर पर क्या हुआ, यह मैं शुरु में ही बता चुका हूँ।

दो दिनों से मैं यह पट्टी लगाए हुए पूरे कस्बे में आ-जा रहा हूँ। लोग हैरत से देख रहे हैं। छुटपुट पूछताछ हो रही है। लेकिन बात मुकाम पर पहुँचती लग रही है। अलग-अलग स्थानों पर दो युवकों और एक दुकानदार ने कहा कि मेरी इस ‘हरकत’ से उन्हें ताकत मिली है। हिन्दी के एक व्याख्याता ने मानो स्वीकारोक्ति की - ‘हम सब जानते हैं कि हम अंग्रेजी नहीं जानते लेकिन यह जताने पर तुले हुए है कि हम अंग्रेजी जानते हैं।लेकिन ऐसा जताने की कोई जरूरत नहीं है, यह  बात आपकी कमीज पर लगी यह पट्टी देख कर समझ में आई।’ 

नहीं जानता कि आनेवाले दिनों में क्या होगा। लेकिन आज तो मैं, पूरे कस्बे में ‘देखने की चीज’ बना हुआ हूँ।

मुझे तसल्ली तो हो ही रही है, मजा भी आ रहा है।

इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी।


मेहरबाँ कैसे कैसे

“कौन सा आयोजन कर रहे हैं? कब कर रहे हैं?”

“कोई आयोजन नहीं कर रहा।

“अकेले नहीं कर रहे तो आप कुछ लोग मिल कर कर रहे हैं?”

“नहीं। न तो मैं अकेला कोई आयोजन कर रहा हूँ और न ही हम कुछ लोग मिल कर कोई आयोजन कर रहे हैं।”

“तो फिर किसी संस्था के किसी आयोजन की तैयारी कर रहे हैं?”

“नहीं। किसी संस्था के किसी आयोजन की भी तैयारी नहीं कर रहा हूँ।”

“तो फिर यह लिस्ट किसलिए?”

“कौन सी लिस्ट?”

“यही। पतों और मोबाइल नम्बरों सहित नामों की लिस्ट। आपके टेबल पर पड़ी है।”

“अच्छा! वह लिस्ट? वह तो बस! यूँ ही।”

“वाह! यूँ ही कैसे? इस लिस्ट में कुछ नाम कटे हुए हैं और कुछ पर टिक का निशान लगा हुआ है!”

“यह लिस्ट मैंने नहीं बनाई।” 

“आपने नहीं बनाई? तो किसने बनाई?”

“पाठकजी ने बनाई।”

“पाठकजी ने? अपने पासवाले रमेशजी पाठक ने?”

“नहीं। रमेशजी पाठक ने नहीं।”

“तो फिर कौन से पाठकजी ने बनाई?”

“प्रोफेसर अभय पाठक ने।”

“क्यों? उन्होंने क्यों बनाई?” 

“मेरे कहने से बनाई।”

“क्यों? आप कोई आयोजन कर रहे हैं?”

“मैंने पहले ही कहा न! मैं कोई आयोजन नहीं कर रहा।”

“तो फिर आपने लिस्ट क्यों बनवाई?”

“कभी, कोई आयोजन करें तो किस-किस को बुलाएँ, इसलिए बनवाई।”

“अच्छा। इसका मतलब है कि पाठकजी कोई आयोजन नहीं कर रहे।”

“मुझे नहीं पता कि पाठकजी कोई आयोजन कर रहे हैं या नहीं।”

“नहीं। नहीं। मेरा मतलब है   कि पाठकजी ने यह लिस्ट अपने किसी आयोजन के लिए नहीं बनाई।”

“हाँ। मैंने पहले ही कहा है कि पाठकजी ने यह लिस्ट मेरे कहने से बनाई।”

“अच्छा। लेकिन इसमें तो कुल तेईस ही नाम हैं। आयोजन में इतने ही लोगों को बुलाएँगे?”

“यह तो तय नहीं कि कितने लोगों को बुलाएँगे लेकिन तेईस से ज्यादा ही लोगों को बुलाएँगे।”

“तो पाठकजी ने इतने ही नाम क्यों लिखे? और इसमें मेरा नाम तो है ही नहीं।”

“उनसे कहा था कि वे उन लोगों की सूची बनाकर दें जो उनके सम्पर्क में हैं।”

“अच्छा। लेकिन इसमें मेरा नाम क्यों नहीं है? मैं भी तो उनके सम्पर्क में हूँ!”

“आपका नाम मेरी लिस्ट में है।” 

“क्या मतलब? आप दो लोग मिल कर लिस्ट बना रहे हैं?”

“केवल दो नहीं। हम पाँच-सात लोग मिल कर लिस्ट बना रहे हैं।”

“पाँच-सात लोग मिल कर? क्यों भला?”

“हर आदमी के अपने-अपने सम्पर्क होते हैं। कई नाम ऐसे होते हैं जो सबकी लिस्ट में मिल जाएँगे। लेकिन सबके नाम सबकी लिस्ट में नहीं मिलेंगे। तो, इस तरह नाम छाँट कर एक बड़ी और व्यापक लिस्ट तैयार हो जाएगी।”

“अच्छा। तो इसका मतलब है कि आप लोग कोई आयोजन करनेवाले हो।”

“नहीं। हम लोग कोई आयोजन नहीं कर रहे।”

“तो फिर लिस्ट बनाने की हम्माली क्यों कर रहे हैं?”

“कहा ना? कभी, कोई आयोजन करना पड़े तो अधिकाधिक लोगों को बुलाया जा सके, इसलिए।”

“लेकिन किसी आदमी के यहाँ कोई काम पड़ता है तो वह अपने नाते-रिश्तेदारों को, व्यवहारवालों को, दोस्तों को, मिलनेवालों को ही बुलाता है।”

“हाँ। आपने ठीक कहा।”

“तो फिर इस लिस्ट का मतलब? आपने अभी कहा कि आप लोग जो लिस्ट बनाओगे उसमें ऐसे लोगों के नाम भी होंगे जिन्हें आप नहीं जानते और जिनसे आपका कोई लेना-देना, कोई व्यवहार नहीं है?”

“हाँ। ऐसे नाम तो होंगे ही। इसीके लिए तो सबसे अपनी-अपनी लिस्ट बनाने को कहा है।”

“आपकी बात समझ में नहीं आई।” 

“कौन सी बात समझ में नहीं आई?”

“यही कि अपने घर पर काम होने पर अपने नाते-रिश्तेदारों को, व्यवहारवालों को, मिलनेवालों को, दोस्तों को ही बुलाते हैं।”

“हाँ। ठीक तो है!

“तो फिर इस लिस्ट का मतलब?”

“यह लिस्ट हममें से किसी के यहाँ होनेवाले पारिवारिक काम के लिए नहीं है।”

“कमाल है! तो फिर किसलिए है?”

“कभी कोई साहित्यिक, ललित कलाओं से जुड़ा कोई आयोजन हो तो उसमें बुलाने के लिए।”

“हत्त-तेरे की! आप भी कमाल करते हो! पहले ही बता देते!”

“कमाल तो आप कर रहे हैैं। आप जो-जो सवाल पूछते रहे, वही-वही जवाब तो मैंने दिए!”

“नहीं। आपने घुमा-फिरा कर जवाब दिया।”

“नहीं। मैंने तो, जैसा आपने गाया, वैसा ही बजाया।”

“नहीं! नहीं! आप मेरे मजेे ले रहे थे।”

“आप खुद को ‘मजा लेनेवाली चीज’ समझते हैं?”

“फिर? आप फिर मेरे मजे ले रहे हैं।”

“नहीं। मैं तो आपके आरोप पर अपना स्पष्टीकरण दे रहा हूँ।”

“आप भी बस! आपसे तो बात करना ही बेकार है।”

“इतनी सी बात आपको इतनी सारी बातें करने के बाद समझ में आई?”

“फिर? आप कभी चुप भी रहेंगे?”

“मैं चुप रहूँगा तो आप इसी बात पर नाराज हो जाएँगे कि मैं आपके सवालों के जवाब क्यों नहीं दे रहा।”

“आप से तो भगवान बचाए। गुनहगार मैं ही हूँ।”

“इसमें गुनहार होने न होने की बात बीच में कहाँ आ गई?”

“येल्लो! मेरी मति मारी गई जो आपसे बहस कर रहा हूँ।”

“आप भले ही कर रहे हों, मैं तो बहस नहीं कर रहा। मैं तो आपके सवालों के जवाब दे रहा हूँ।”

“अच्छा। आप जीते। मैं हारा। अब तो आप खुश?”

“तो आप मुझे खुश करने के लिए अब तक यह सब कर रहे थे? मैं तो आपके आने से ही खुश हो गया था।”

“हे! भगवान! प्राण लेंगे क्या?”

“आपसे मिल कर, आपको देखकर मुझे सदैव ही खुशी होती है। आप ही बताइए, जिससे खुशी मिलती है, उसके प्राण लिए जाते हैं?”

“आपके हाथ जोड़े। मैं चलता हूँ। जितनी देर बैठूँगा, उतनी ही अपनी फजीहत करवाऊँगा। नमस्कार।”

“कहाँ चल दिए? आपने मेरी बात तो सुनी ही नहीं!”

“हें! तो मैं अब तक क्या कर रहा था?”

“अब तक आप मुझसे सवाल कर रहे थे। अपनी बात कहे जा रहे थे।”

“हे! भगवान! फिर मैं ही दोषी? चलिए। कहिए। क्या कहना है?”

“बस। यही कि ऐसी ही एक सूची आप भी बना कर दे दीजिएगा - आपके मिलनेवालों के नाम, पतों और मोबाइल नम्बरों सहित।”

“अरे! जब आप लोग.........नहीं। नहीं। दे दूँगा। जल्दी ही दे दूँगा। बनते कोशिश कल ही दे दूँगा। बस? नमस्कार।”

“नमस्कार। फिर आइएगा।

(वे थोड़ी ही देर पहले गए हैं। कुछ काम से आए थे। मेरी टेबल पर रखे कागजों को उलटना-पलटना और खोद-खोद कर पूछताछ करना उनकी आदत है। इसी के चलते उन्हें एक सूची नजर आ गई। उसके बाद जो हुआ, वही आपने पढ़ा। इस चक्कर में वही काम भूल गए जिसके लिए आए थे।)

अपन तो बिन्दास चलाते हैं अंकल!

लोग अलग-अलग, घटनाएँ भी अलग-अलग किन्तु सन्देश एक ही। कुछ इस तरह जैसे धर्म, पन्थ अलग-अलग लेकिन सबका सन्देश एक ही। घटनाओं, व्यक्तियों, प्रस्तुतियों की विविधता ही इसे रोचक बनाए रखती है। 
कल भी ऐसा ही हुआ।

बीमा-सम्भावनाएँ तलाशता हुआ एक जगह, जवान इकलौते बेटे के पिता से गपिया रहा था। पिता खुद के बजाय बेटे का बीमा कराना चाह रहा था। मैं जोर दे रहा था कि वह खुद का ही बीमा कराए क्योंकि घर के लिए रोटी वही कमा रहा है। बेटा तो अभी पढ़ रहा है। पढ़-लिख कर काम-धन्धे से लग जाए, खाने-कमाने लगे तो उसका बीमा करा ले। अभी बेटा जिम्मेदारी बना हुआ है। वे बेटे का ही बीमा कराना चाह रहे थे। बेटा बाहर था। कुछ ही देर में आनेवाला था। सो हम इधर-उधर की बातें करने लगे।

बात शुरु हुई थी एक जवान बेटे से और पहुँच गई उस जवान बेटेवाली पूरी पीढ़ी तक। वे अत्यधिक खिन्न और क्षुब्ध थे। उनके मतानुसार आज के नौजवान पूरी तरह बिगड़ चुके हैं। मनमानी करते हैं। बड़ों की इज्जत नहीं करते। आँख की शरम खो दी है इन्होंनें। किसी की परवाह नहीं करते। इनके माँ-बाप भी इन्हें कुछ नहीं कहते। 

मैंने हर बार टोका-रोका। कहा कि ये बच्चे अपनी मर्जी से दुनिया में नहीं आए हैं। इन्हें हम ही दुनिया में लाए हैं और ये ही हमारा आनेवाला कल हैं। हमें इन्हीं के कन्धों पर जाना है। हम अपने वक्त में ठहरे हुए हैं। यदि चलकर इनके वक्त में आएँ तो ये ही बच्चे हमें भले लगने लगेंगे। ये वैसे ही बने हैं और बन रहे हैं जैसा हमने इन्हें बनाया है और बना रहे हैं। ये ही हमारी सेवा करेंगे और हमारा नाम रोशन करेंगे। हमें इन पर भरोसा करना चाहिए। 

मेरी टोक-रोक का उन पर कोई असर नहीं हुआ। वे अपनी बातों पर अड़े हुए रहे। बोले - “दूसरी बातें छोड़ो। आपने इन्हें फटफटी (मोटर सायकिल) चलाते देखा? कभी देखो। अन्धे होकर चलाते हैं। किसी की परवाह नहीं करते। ऐसे तेज चलाते हैं जैसे जंगल में चला रहे हों। कोई मरता हो तो मर जाए। इन्हें परवाह नहीं। और इनके हार्न सुने? कान के परदे फट जाएँ। और, कोई सामने हो और बजाए तो ठीक। लेकिन ये तो बिना बात के ही बजाते रहते हैं। जैसे बिना बात के हार्न बजाने के इन्हें पैसे मिल रहे हों।”

यह बात मेरे मन की थी। मैं ने उत्साह से उनकी इस बात का समर्थन किया - “हाँ! आपकी यह बात तो ठीक है।” उन्होंने मुझे फौरन ही पकड़ लिया। मुझे निर्देश देते हुए सवाल किया - “तो फिर आप ही क्यों नहीं कुछ करते हो? आपका तो अफसरों के बीच उठना-बैठना है। उनसे कहो कि इन स्सालों को पकड़े। दो लप्पड़ लगाएँ। कम से कम हजार-पाँच सौ का जुर्माना ठोके। इन्हें होश में लाए। इनके माँ-बाप को लाइन हाजिर करे। उन्हें भी तो पता लगे कि उनके पूत क्या कर रहे हैं?”

मैंने सरकार का बचाव किया। बोला - “सरकार क्या-क्या करे? माँ-बाप यदि अपने बच्चों को समझाएँ तो शायद बात बन जाए।”

सरकार की तरफदारी पर वे भड़क गए। तैश में बोले - “सरकार क्या-क्या करे से क्या मतलब आपका? सरकार नहीं करेगी तो कौन करेगा? और सरकार क्यों नहीं करे? करना पड़ेगा। हम सरकार को टैक्स देते हैं। और माँ-बाप की तो आप बात ही मत करो। आजकल की हालत आप देख रहे हो? काम-धन्धे से ही फुरसत नहीं मिलती। घर चलाएँ, काम-धन्धा करें या बच्चों को समझाएँ?”

उनके गुस्से ने मेरी आवाज धीमी कर दी। धीमी आवाज में ही प्रतिवाद करने की कोशिश की - “लेकिन सबसे पहले खतरा तोे अपने बच्चे की जान पर ही आता है। माँ-बाप की जिम्मेदारी तो बनती है। और किसी बात के लिए नहीं, अपने बच्चे की सलामती के लिए ही सही, माँ-बाप ने टोकना, समझाना तो चाहिए। इतना फर्ज तो बनता है।” मानो मेरी हर बात खारिज पर तुल गए हों, कुछ इस तरह बोले - “माँ-बाप क्या समझाएँ? उन्हें तो एक-दूसरे से ही फुरसत नहीं। एक-दूसरे में मगन रहते हैं। एक-दूसरे से फुरसत मिले तो बच्चों से बात करें।”

हमारा यह सम्वाद और चलता लेकिन रोक लग गई। बी. कॉम. प्रथम वर्ष में पढ़ रहा उनका बेटा दनदनाता हुआ दरवाजे पर रुका। उसे देखकर मेरा ‘दुर्जन’ प्रसन्न हो गया। वह बजाज कम्पनी की पल्सर मोटर सायकिल पर दनदनाता हुआ आया था और उसने किसी फिल्मी नायक की तरह एकदम ब्रेक लगा कर गाड़ी रोकी थी। उसे देखकर उनका गुस्सा तिरोहित हो गया। एकदम प्रेमल हो गए। “आजा! आजा!! अभी तेरी ही बात कर रहे थे। तेरा बीमा करा रहे हैं। जहाँ बैरागीजी कहें वहाँ दस्तखत कर दे और जो कागज माँगें, ला दे।”

‘दुर्जन’ को धकेल कर मेरा बीमा एजेण्ट आगे आया। कागजी खानापूर्ति की। कागज-पत्तर और पहली किश्त की रकम जेब के हवाले की। 

‘बीमा एजेण्ट’ का काम पूरा होते ही मेरा ‘दुर्जन’ हरकत में आ गया। अज्ञानी बन कर बच्चे से पूछा - “ये तो वही बाइक है ना जो बहुत तेज स्पीड से चलती है?” “हाँ अंकल। वही है। पल्सर। जोरदार बाइक है।” उसने गर्व और उत्साह से जवाब दिया। मेरे ‘दुर्जन’ ने फिर अज्ञानी का अभिनय करते हुए दुष्टतापूर्वक (और दुराशयतापूर्वक) पूछा - “तो सिटी में चलाने में तो तकलीफ आती होगी। अपने यहाँ तो लोगों में ट्रेफिक सेंस है ही नहीं?” मेरी बात को जोरदार धक्के से परे हटाते हुए लापरवाही से बोला - “अरे! बिलकुल नहीं अंकल! कोई प्रॉब्लम नहीं आती। सत्तर-अस्सी से कम पर इसे चलाई तो फिर इसे चलाने का मतलब ही नहीं। अपन तो बिन्दास चलाते हैं।” मेरा ‘दुर्जन’ खुश हो गया। चहक कर बोला - “इतनी स्पीड से चलाता है तो गाड़ी के ओरिजनल हार्न से काम चल जाता है?” मेरा सवाल उसे मूर्खतापूर्ण लगा। तनिक अचरज से बोला - “कैसी बात कर दी अंकल आपने? ओरिजनल हार्न की आवाज से कोई हटता है? इसमें तो तेज आवाजवाला ‘लाउड हार्न’ लगाना ही पड़ता है। ऐसा कि दो किलो मीटर आगे जानेवाला भी सुन ले और हट जाए।”

मेरे ‘दुर्जन’ का अभीष्ट पूरा हो चुका था। जैसे कोई ‘परम ज्ञान’ मिल गया हो, इस तरह उपकृत मुद्रा में उसे धन्यवाद दिया और अपना सयानापन जताते हुए सलाह दी - “वाह! यार नीलेश! क्या बात कही! मजा आ गया। फिर भी, अपना ध्यान रखना भई। कहीं, कुछ ऊँचा-नीचा न हो जाए।” मेरी अनदेखी करते हुए, लापरवाही से ‘थैंक्यू अंकल’ कहते हुए वह, जिस तरह दनदनाता घर के दरवाजे पर आया था, उसी तरह, दनदनाते हुए अन्दर चला गया।

मैंने उसके पिता की ओर देखा। उनकी दशा देखकर मेरा ‘दुर्जन’ भी परास्त हो गया।

मेरा काम तो पहले ही चुका था। रही बात उनके बातों के जवाब की? तो यह काम उनका बेटा मुझसे बेहतर ढंग से कर चुका था।