जरूर आना मेरी शोक सभा में

जगत् की प्रशंसा प्राप्त करने के लिए मरना आवश्यक है या मरने के बाद आदमी पूरी दुनिया के लिए प्रशंसनीय हो जाता है? मरने के बाद जिसकी प्रशंसा में हमारे गले रुँध जाते हैं और वाणी विगलित हो जाती है, उसके जीते जी, हम उसकी प्रशंसा, अभिनन्दन क्यों नहीं करते? ये और ऐसी ही कुछ बातें मेरा पीछा कर रही थीं जब मैं स्वर्गीय सरदार हरदयालसिंहजी वाधवा की शोक-सभा से लौट रहा था।
हरदयालसिंहजी के बारे में काफी कुछ कह सकता हूँ और वह सब कहने के बाद भी काफी कुछ कहने को रह जाएगा। इसलिए इतना ही कि उनकी मृत्यु से वे लोग भी प्रभावित हुए जो उन्हें नहीं जानते थे और वे भी जिन्हें हरदयालसिंहजी भी नहीं जानते थे।
किसी भी व्यक्ति के प्रति पूर्णतः निरपेक्ष होकर सोच पाना हमारे लिए न तो सम्भव है और न ही ऐसा करने की हमारी इच्छा ही होती है। अपने साथ किए गए उपकारों को याद रखने में हमारी नानी मरती है जबकि कटु व्यवहार को हम सपने में भी नहीं भूल पाते। यह अनुपात सौ और एक का भी हो तो सदैव ही सौ पर एक भारी पड़ता है। सामनेवाले ने हमारे बताए सौ काम कर दिए और एक नहीं किया तो हम उस एक को ही याद करते हैं और उसीके लिए सामनेवाले को कोसेंगे।
किसी का अपने से बेहतर होना भी हमें कम ही रास आता है। ऐसे बेहतरों के सामने हम, चाहें न चाहें, हीनता बोध से ग्रस्त हो ही जाते हैं जिसे छुपाने के लिए श्रेष्ठता बोध प्रकट करने की मूर्खतापूर्ण चेष्टा करते हैं जो अन्ततः हमारे हीनता बोध का ही प्रकटीकरण होता है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि अपने से बेहतर की प्रशंसा करने का साहस हम नहीं जुटा पाते। हमें लगता है कि सामनेवाले की प्रशंसा करने में हमारी हेठी हो जाएगी, हम छोटे हो जाएँगे।
यह भी होता है कि किसी का हमारे साथ रहना, हमारे आसपास होना भी हमें उसकी प्रशंसा करने से रोकता है क्योंकि हमें उसकी अनेक कमजोरियों, कमियों की जानकारी होती है - बिलकुल पति-पत्नी की तरह। अपने साथ, अपने आसपास रहनेवाले की अच्छाइयाँ हमें याद नहीं रह पाती हैं। इसलिए जब किसी अपनेवाले की प्रशंसा कोई अनजान, अपरिचित, पराया करता है तो हमारी आँखें फैल जाती हैं और हम ‘आप उसे नहीं जानते। हमसे पूछो क्यों कि हम भुगत रहे हैं’ जैसे जुमले कह कर अपनी झेंप मिटाते हैं। हमारे बच्चे इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। हमारे बच्चे हमारा बताया काम टाल जाते हैं जबकि पड़ौस वाले अंकल/आण्टी द्वारा बताया वही काम दौड़ कर करते हैं। कारण - जिस काम के लिए हम अपने बच्चों की झूठी प्रशंसा भी नहीं करते उसी काम के लिए अंकल/आण्टी उनकी तारीफों के पुल बाँध देते हैं।
लेकिन यही बात अन्तिम सच नहीं है। सिक्के का दूसरा पहलू भी तो होता है! ऐसा भी होता है कि अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट भूमिका निभानेवाले व्यक्ति अपने व्यक्तिगत आचरण में अत्यन्त निकृष्ट होते हैं। मैं मालवा के ऐसे रचनाकार को जानता हूँ जिनके उल्लेख के बिना समकालीन हिन्दी कविता का इतिहास अधूरा रहेगा। किन्तु व्यक्ति के रूप में वे निहायत ही घटिया हैं। सामनेवाले पर हावी होने, उसे नीचा दिखाने में उन्हें स्वर्गीय सुख मिलता है। उन्हें किसी आयोजन में मुख्य अतिथि या अध्यक्ष के रूप में आमन्त्रित करने पर वे वाहन तथा सम्मान की माँग करने में चौथे दर्जे के घटिया अंग्रेज अफसर को भी पीछे छोड़ देते हैं। लोग उन्हें ‘उत्कृष्ट रचनाकार और निकृष्ट व्यक्ति’ निरुपित करते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर अपने नगर को पहचान दिलानेवाले एक प्रखरवक्ता को अपने नगर से बाहर ही सम्मान मिलता है। अपनी गली में कोई उनसे बात करना पसन्द नहीं करता। अपने पड़ौसियों को वे तुच्छ, हेय, कीड़े-मकोड़ों की तरह देखते और व्यवहार करते हैं। सवा घण्टे के अपने व्याख्यान में पौन घण्टा खुद पर ही बोलते हैं और शेष आधे घण्टे में अपने विरोधियों को निपटाते हैं। उनके नगर के एक परिचित से जब मैंने इन प्रखर वक्ता की प्रशंसा कर उन्हें ‘आपके नगर का गौरव’ कहा तो परिचित बोले - ‘आप उन्हें अपने साथ रतलाम ले जाईए। वहीं बसा लीजिए।’
लेकिन मरने के बाद ये सारी बातें गौण हो जाती हैं। जो रहा ही नहीं, उससे कैसी दुश्मनी और कैसा बैर भाव? इसी ‘भारतीय संस्कारशीलता’ के चलते हम निकृष्ट की भी प्रशसंा करते हैं और अपने हीनता बोध के कारण, उत्कृष्ट की जीते जी प्रशंसा नहीं करते।
निष्कर्ष पर पहुँचते-पहुँचते मुझे राहत तो मिलने लगी किन्तु अपनी गरेबान में झाँकते ही
घबराहट होने लगी। मेरे मरने के बाद मेरे बारे में क्या कहा जाएगा? फब्तियाँ कसने, उपहास करने, पत्थर-मार जवाब देने, नीम जबान से पलटवार करने के सिवाय मैंने अब तक और किया ही क्या है? अपनी ही खिल्ली उड़ाते हुए विचार आया - जैसे कुछ लोग जीते-जी अपना मृत्यु भोज करते हैं, उसी तरह क्यों न मैं, अपनी शोक सभा करवा लूँ? इसी क्षण टेलीफोन घनघनाया। इन्दौर से सरोज भाई (प्रो. सरोज कुमार) बोल रहे थे। ‘कचंन को कसौटी से भय’ आलेख के लिए पीठ भी थपथपा रहे थे और उसमें किए गए व्यर्थ उल्लेखों पर अप्रसन्नता भी जता रहे थे। (यह आलेख ‘उपग्रह’ में प्रकाशित हुआ था जिसके कुछ अंश मैंने यहाँ हटा दिए हैं। सरोज भाई उन्हीं अंशों पर मुझे हड़का रहे थे।) बातों ही बातों में मैंने अपनी शोक सभावाली बात कही तो बोले - ‘अपना फैक्स नम्बर दो। मेरी एक कविता तुम्हें भेजता हूँ जो तुम्हारे इस विचार में सहायक होगी।’
‘मरणोपरान्त’ शीर्षकवाली, ‘गागर में सागर’ या कि ‘सतसैया के दोहरे’ को चरितार्थ करनेवाली यह कविता, वह सब कुछ कह देती है जो मैं यह पूरी रामायण बाँचने के बाद भी नहीं कह पाया -

‘तुम जरूर आना मेरी शोक-सभा में,
मेरे शोक के लिए नहीं,
तो अपने किसी शौक के बतौर।
तुम्हें मजा आएगा मेरी शोक-सभा में,
जैसा मुझे आता रहा है ऐसे अवसरों पर।
शादी-ब्याह के जलसे और
शोक-सभाएँ अगर न हों
तो लोग तरस जाएँ,
मिलने-जुलने-बतियाने को।
तुम जरूर आना मेरी शोक-सभा में,
तभी मैं इत्मीनान से मर सकूँगा।
क्या तुम नहीं चाहोगे कि वह शख्स
इत्मीनान से मर तो सके,
जो इत्मीनान से जिन्दा रहना चाहता था?
तुम नहीं आए तो, शोक
साकार नहीं हो पाएगा सभा में,
शोक से ज्यादा जरूरी है शाक-सभा,
शोक तो घर-घर के मना लेंगे
पर सभा असम्भव है तुम्हारे बिना।
एक ही तो बची है अब जगह
जहाँ इंसान अपने बारे में
इतने सारों के बीच
अपनी तारीफ के
दो शब्द सुन पाता है,
मरणोपरान्त ही सही।
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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे इंपतंहपअपेीदन/हउंपसण्बवउ पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी।
यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।
यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें। यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें। मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

9 comments:

  1. मरणोपरान्त तो अपनी प्रशंसा सुनने के लिये कोई जीवित नहीं रहता है, कर्म ऐसे हों कि लोग जीते जी सराहें।

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  2. प्रवीण भाई की बात प्रभावशाली है , म्रत्यु के बाद अक्सर लोग खानापूरी के लिए जाते हैं ! किसी शोक सभा में शोकाकुल लोग कभी नज़र नहीं आते , प्रणाम करके भोजन करे और घर जाएँ ....
    इंसान जो जीते जी लोगों का सम्मान अर्जित करले, लोग अपने घर से भी उसे हार्दिक श्रद्धांजलि देंगे !
    शुभकामनायें आपको

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  3. शोक सभाएं होती तो हैं प्रभावशाली और कुछ हद तक प्रेरक भी. असर होता है और कभी मुखर भी हो जाता है.

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  4. प्रभावशाली पोस्ट। आभार।

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  5. `उसके जीते जी, हम उसकी प्रशंसा, अभिनन्दन क्यों नहीं करते?'

    एक बार कोई कर सकता है, अब रोज़ रोज़ का रिकार्ड कौन बजाए :)

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  6. @सीएम प्रसादजी,
    कडाके की सर्दी है-सात डिग्री के आसपास। साढे नौ बज रहे हैं। पूरा मोहल्‍ला सन्‍नाटे में डूबा है। मरी श्रीमतीजी गहरी नींद में हैं। मैं सिस्‍टम पर बैठा, काम निपटा रहा हूँ।

    आपकी टिप्‍पणी के दूसरे वाक्‍य ने मेरा बुरा हाल कर दिया है। हँसी रुक नहीं रही है। इस आनन्‍द को अकेले झेलने में बडी तकलीफ हो रही है। आपने तो निहाल कर दिया। आपके इस वाक्‍य को मैं जगह-जगह, बार-बार प्रयुक्‍त करूँगा। वाह। वाह। क्‍या बात है।

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  7. अरे क्यो झुठ बुलवाना चाहते हो जी... यहां ना जिन्दो की कोई तारिफ़ करता हे ना मरने के पशचात ही, वो तो मरने वाले से डर कर तारीफ़ करते हे कि कही भुत बन कर साला चिपक ही ना जाये.

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  8. वाह! नीचे यह भी हो - बिट्टू, बबलू, गुड़िया का अनुरोध - मेरे दद्दू की शोक शभा में जुलूल, जुलूल आना!

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.