लाखों में एक : भाभी भी और रोग भी

मेरी भाभी नहीं रहीं। सोमवार, अठारह जुलाई को सुबह दस बजकर पैंतीस मिनिट पर उनका निधन हो गया। मेरा ई-मेल बॉक्स सम्वेदना सन्देशों से भरा पड़ा है। अनेक कृपालुओं ने मेरी भाभी के बारे में जानकारी चाही है।



भाभी को लेकर क्या लिखूँ और क्या नहीं - तय कर पाना मेरे लिए दुरुह नहीं, नितान्त असम्भव है। जो भी और जितना भी लिखूँ, स्थायी रूप से अधूरा ही होगा होगा। समन्दर को शब्दों में समेट पाना शायद अधिक सुगम होगा मेरे लिए। इतना ही कह सकता हूँ कि यदि वे दादा के जीवन में और हमारे परिवार में नहीं आई होतीं तो मैं यह ब्लॉग नहीं लिख रहा होता। तब मैं और मेरा पूरा परिवार सम्भवतः भीख ही माँग रहा होता।



उनका पूरा नाम श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी था। (‘था’ क्यों? यह नाम तो अब भी है!) इस तेईस अगस्त को वे अपनी आयु के बहत्तर वर्ष पूर्ण कर चुकी होतीं। जननी तो वे दो बेटों की थीं किन्तु हम तीन भाई-बहन (मैं और मेरी दो बहनें) भी उनकी सन्तान बने रहे। अपने दोनों बेटों से अधिक चिन्ता उन्होंने हम तीनों की की।



दादा से उनका विवाह कमोबेश ‘प्रेम विवाह’ जैसा ही था। जैसा कि दादा खुद बताते हैं, यह 1951-52 के आसपास की बात रही होगी। तब दादा अपने मूल नाम ‘नन्दराम दास’ के साथ ‘पागल’ उपनाम लगाकर कविताएँ लिखते थे। भाभी के पिताजी श्री सु. देव. सुन्दरम्, जावद (जिला-नीमच) में ‘नईदुनिया’ के न्यूज पेपर एजेण्ट थे। दादा की एक कविता ‘नई दुनिया’ में छपी जिसकी पहली पंक्ति थी - ‘मधुमास बीता जा रहा है, सजो बाले! सजो बाले!’ कविता के नीचे नाम छपा था - नन्दराम दास बैरागी ‘पागल’। भाभी ने (तब निश्चय ही वे मेरी भाभी नहीं थीं) अपने पिताजी से कहा कि यह कविता लिखनेवाला भी बैरागी है। न हो तो इसीसे उनका विवाह करा दिया जाए। लगभग तेरह वर्षीया अबोध किशोरी की यह इच्छा कैसे परवान चढ़ी, यह अपने आप में सम्पूर्ण स्वतन्त्र कथा है।


1953 में वे दादा की जीवन संगिनी बन कर हमारे परिवार में आईं। तब उनकी अवस्था 14 वर्ष और दादा की अवस्था 23 वर्ष थी। दादा कहते हैं कि तब मेरे गृह नगर मनासा की जनसंख्या लगभग 6 हजार रही होगी। 53 वर्ष पहले, उस बस्ती में वे ‘बिना घूँघट वाली पहली बहू’ बनकर आई थीं। दादा बताते हैं कि बारात की बस से उतर कर, वे दोनों जब बस अड्डे से ताँगे में बैठकर घर के लिए चले तो भाभी को देखने के लिए पूरे रास्ते भर, लोग-लुगाइयों की भीड़ से, गलियों-मुहल्लों के दोनों ओर के, ओटले-चबूतरे छोटे पड़ गए थे। तब ‘इज्जतदार, शरीफ और खानदानी’ महिलाएँ, खुले मुँह घर से बाहर नहीं निकलती थीं। लिहाजा, भाभी को लेकर वे सारी टिप्पणियाँ हुईं जो ऐसे में होनी थीं।

लेकिन मैं यह सब क्या ले बैठा? इस तरह तो पता नहीं मैं वह सब कब बता पाऊँगा जो बताने के लिए मैंने यह बात शुरु की है। अतीत को यहीं छोड़ कर मुझे ‘आज’ पर आ जाना चाहिए।


2006 में भाभी को चिकनगुनिया हुआ जो 2007 में, ‘एप्लास्टिक एनीमिया’ में बदलगया। मोटे तौर पर इसे ’खून बनना बन्द हो जाना’ कहा जा सकता है जबकि चिकित्सा शास्त्र की शब्दावली में, ‘प्लेटलेट’ का बनना बन्द हो जाना कहा जाता है। इसका एक ही उपचार है - रोगी के शरीर को (जिस प्रकार खून दिया जाता है, उसी प्रकार) प्लेटलेट दिए जाएँ। रोग का और चिकित्सा दिशा (डायग्नोसिस तथा लाइन ऑफ ट्रीटमेण्ट) का निर्धारण ‘एम्स’ (दिल्ली) में हुआ जो भाभी की मृत्यु के अन्तिम क्षण तक जारी रहा।

प्लेटलेट चढ़ाने के लिए फरवरी में भाभी को इन्दौर स्थित बॉम्बे हास्पिटल में भर्ती कराया गया। खबर मिली तो मैं और मेरी उत्तमार्द्ध पहुँचे। दादा तो थे ही, मेरा छोटा भतीजा गोर्की और उसकी उत्तमार्द्ध मीरू (नीरजा) सेवा-सुश्रुषा में लगे हुए थे। भाभी के रोग की गम्भीरता का अनुभव मुझे गोर्की से पहली बार हुआ। मैंने गोर्की से पूछा - ‘भाभी पूरी तरह से कब ठीक हो जाएँगी?’ गोर्की ने सूनी आँखों से मुझे देखा और सपाट आवाज में बोला - ‘कभी नहीं।’ मुझे झटका लगा। कोई बेटा अपनी माँ के लिए ऐसा कैसे कह सकता है? मेरी शकल देख कर गोर्की बोला - ‘ऐसा है बब्बू भई (मेरा, घर का यही नाम है)! अभी साल में दो-तीन बार प्लेटलेट चढ़ रहे हैं। प्लेटलेट चढ़ाने का यह अन्तराल दिन-ब-दिन कम होता जाएगा और एक दिन वह आएगा जब शरीर इन प्लेटलेटों को स्वीकार करने से इंकार कर देगा। बस, उसी क्षण से भाभी की मृत्यु की प्रतीक्षा शुरु हो जाएगी।’



बिलकुल, शब्दशः यही हुआ। 5 जुलाई को गोर्की का फोन आया। वह उदयपुर से बोल रहा था। उसने कहा कि भाभी को गम्भीर हालत में सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है और ‘आप रतलाम में ही बने रहना।’ 10 जुलाई की रात को लगभग आठ बजे फिर गोर्की का और थोड़ी ही देर बाद मीरू का फोन आया। दोनों बता रहे थे कि भाभी को नीमच ले आए हैं। हालत ठीक नहीं है और मैं किसी भी क्षण, अप्रिय समाचार के लिए तैयार रहूँ। 15 जुलाई को हम पति-पत्नी भाभी से मिलने नीमच पहुँचे। वे अपनी सम्पूर्ण चेतना से हमसे मिलीं। बातें की। पूरा परिवार उनकी सेवा में लगा हुआ था। शाम को हम लोग लौट आए। 18 को सुबह लगभग ग्यारह बजे गोर्की का फोन आया। सुबकते हुए उसने कुल चार शब्द कहे - ‘बब्बू भई! आ जाओ।’ थोड़ी ही देर में मीरू फोन पर थी। उससे बोला नहीं जा रहा था। बमुश्किल बोली - ‘पापा से बात कीजिए।’ दादा ने कहा - ‘अभी दस पैंतीस पर सुशील चली गई। हम लोग मनासा के लिए निकल रहे हैं। तू सीधा वहीं पहुँच। अन्तिम संस्कार वहीं करेंगे।’ हम लोग पहुँचे तब तक अन्तिम चाल-चलावा कर, उनकी पार्थिव देह बरामदे में रख दी गई थी। मैंने देखा, भाभी के चेहरे पर पीड़ा का कोई चिह्न नहीं था। हमारा पूरा कुटुम्ब मौजूद था। लोगों का आना शुरु हो चुका था। दादा का फार्म हाउस छोटा पड़ गया था। कोई डेड़-दो हजार लोगों ने भाभी को अन्तिम बिदा दी।

दादा ने अद्भुत दृढ़ता दिखाई। उनकी आँखें एक पल को भी सजल नजर नहीं आई और न ही उनका गला रुँधा। उन्होंने कहा - ‘कोई रोना-धोना नहीं होगा। यह मृत्यु नहीं, महोत्सव है।’ अर्थी उठते समय, दादा की इकलौती साली चित्कार करने लगी तो गुस्से में दादा ने उसे ऐसा धकेला कि वह गिरते-गिरते बची। मेरी छोटी बहन नीलू भी क्रन्दन करने लगी तो दादा ने उसे ऐसा डाँटा कि वह नाराज होकर उठावने में शरीक नहीं हुई।


रात में दादा ने बताया कि 13 जुलाई को भाभी को फिर उदयपुर ले गए थे। प्लेटलेट चढ़ाने की प्रक्रिया शुरु की किन्तु शरीर ने अस्वीकार कर दिया। गोर्की की बात सच होने लगी। 14 को डॉक्टरों ने कहा - ‘बैरागीजी! इन्हें घर ले जाईए। अधिकतम 6 दिनों की बात है।’ किन्तु भाभी तो पाँचवें दिन ही चली गईं। अपने तईं मैं दादा कोजितना जानता हूँ, उसके मुताबिक तो भाभी का दाह संस्कार नीमच में ही हो जाना चाहिए था। दादा ने कहा - ‘यह सुशील की इच्छा थी। उसने कहा था - ‘आप मुझ ब्याह कर मनासा लाए थे। वहीं मेरा अन्तिम संस्कार करना।’


बातों ही बातों में दादा ने जब बताया कि यह रोग (एप्लास्टिक एनीमिया) लाखों में एक व्यक्ति को होता है तो मुझे झुरझुरी हो आई। मेरी भाभी लाखों में एक थी। उन्होंने रोग पाला तो वह भी लाखों में एक वाला!

15 comments:

  1. विनम्र श्रद्धांजलि.

    ReplyDelete
  2. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।

    ReplyDelete
  3. परिवार को बाँध कर रखने वाली महादेवी को सादर श्रद्धांजलि।

    ReplyDelete
  4. सुशील भाभी के बारे में जाना पर उनके जाने की बात पढकर दुख हुआ। ऊपर से दृढ रहे बालकवि जी की प्रतिक्रिया भी समझी जा सकती है। आपके कठिन समय में हम साथ हैं। विनम्र श्रद्धांजलि!

    ReplyDelete
  5. विनम्र श्रद्धांजली.

    -मंसूर अली हाशमी

    ReplyDelete
  6. विनम्र श्रद्धांजलि.

    कभी यह कहानी - "तेरह वर्षीया अबोध किशोरी की यह इच्छा कैसे परवान चढ़ी, यह अपने आप में सम्पूर्ण स्वतन्त्र कथा है।...."

    पढ़ना चाहेंगे. प्रतीक्षा रहेगी.

    ReplyDelete
  7. विनम्र श्रद्धांजली.

    ReplyDelete
  8. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।

    ReplyDelete
  9. आँखे भर आई हैं पर...बूँद गिरने नहीं दी है....ऐसी भाभी के महोत्सव पर ...विनम्र श्रद्धांजली....

    ReplyDelete
  10. विष्‍णु जी मेरी और से पूज्‍य भाभीजी को विनम्र श्रद्धांजलि । आदरणीय दादा बैरागी जी को सीहोर के उनके एक मित्र दादा नारायण कासट अपनी संवेदना भेज रहे हैं, जब उचित लगे तो दादा को श्री कासट की भावनाएं प्रदान कर दीजियेगा । आपके पूरे परिवार को परम पिता इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे और दिवंगत को अपनी ज्‍योति में विलीन करे यही प्रार्थना है । ऊं शांति: शांति: शांति: ।

    ReplyDelete
  11. भाभी को विनम्र श्रद्धांजलि!
    दादा स्थितप्रज्ञ रहे। उन के अंदर क्या चल रहा होगा? समझ सकता हूँ। भाभी के बारे में और अधिक जानने की इच्छा बनी रहेगी।

    ReplyDelete
  12. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।

    ReplyDelete
  13. विनम्र श्रद्धांजलि.

    ReplyDelete
  14. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे........

    ReplyDelete
  15. चंद्रकिशोर बैरागी , उज्जैन .July 28, 2011 at 10:55 AM

    विनम्र श्रद्धांजलि.....

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.