विजय में बदली जा सकती है हिन्दी की पराजय

विजय में बदली जा सकती है हिन्दी की पराजय
- डॉक्टर जयकुमार जलज

(ख्यात भाषाविद् जलजजी का यह आलेख 14 सितम्बर 2003 को नईदुनिया (इन्दौर) में प्रकाशित हुआ था। तनिक संशोधनों और परिवर्द्धनों सहित जलजजी का यह आलेख अभी-अभी,  11 सितम्बर 2014 को साप्ताहिक उपग्रह (रतलाम) में प्रकाशित हुआ है। ग्यारह वर्षों के अन्तराल में स्थितियाँ, सुधरी तो बिलकुल ही नहीं, और अधिक खराब ही हुई हैं। जलजजी की कृपापूर्ण अनुमति से यह आलेख यहाँ प्रस्तुत है।)

यह सच्चाई कितनी ही अपमानजनक और पीड़ादायक क्यों न हो, पर अब इसे स्वीकार कर लेना चाहिए कि आजाद भारत में हिन्दी, अंग्रेजी से पराजित हो गई है। जो काम अंग्रेेजों के शासनकाल में नहीं हो सका वह अब हो गया। हमारे क्रिकेट खिलाड़ी दैनिक जीवन में भले ही मातृ-भाषा में बोलते हों, पर टीवी पर या सम्वाददाताओं से बात करते वक्त भारत में भी सिर्फ अंग्रेजी में ही बोलते हैं। फिल्मों में धड़ल्ले से हिन्दी सम्वाद बोलकर हिन्दी की रोटी खाने वाले अभिनेताओं, अभिनेत्रियों की भी यही स्थिति है। दरअसल कुछ वर्षों से अंग्रेजी ‘स्टेटस सिम्बॉल’, रुतबे का प्रतीक बन गई है।

आखिर इस स्थिति तक हम पहुँचे कैसे? आजादी मिलने के बाद जो समस्याएँ लम्बित रहीं उनमें कश्मीर की और भाषा की समस्या प्रमुख है। इन दोनों समस्याओं की लीपापोती करके यह मान लिया गया कि इससे काम चल जाएगा लेकिन इससे समाधान नहीं हुआ। इन दोनों समस्याओं को हल करने के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत थी। उसके अभाव में वही हो सकता था जो हुआ। कश्मीर की तरह भाषा की समस्या को भी अपरिभाषित, अमूर्त मानदण्डों के हवाले कर दिया गया। कहा गया, जब तक हिन्दी समर्थ नहीं हो जाती, राजभाषा के रूप में अंग्रेजी जारी रहेगी। हिन्दी के सामर्थ्य का प्रमाण पत्र क्या होगा? कौन देगा यह प्रमाण पत्र? कैसे देगा? सामर्थ्य को कैसे नापा जाएगा? इन प्रश्नों पर विचार ही नहीं किया गया।

फिर भी आजादी के बाद आरम्भिक वर्षों  में विभिन्न विषयों में मौलिक लेखन आरम्भ हो गया था। कक्षाओं में विभिन्न विषयों को पढ़ाने के लिए हिन्दी में पाठ्य-पुस्तकें उपलब्ध होने लगी थीं। अगर इस क्षेत्र को माँग और पूर्ति की शक्तियों के हवाले छोड़ दिया जाता तो धीरे-धीरे हिन्दी माध्यम की मौलिक किताबों से बाजार पट जाते। लेकिन इसी बीच विभिन्न सरकारें अनुवाद की योजनाओं के साथ इस मैदान में कूद पड़ीं। विषय विशेषज्ञों का, जिन्हें अनुवाद का कार्य सौंपा गया, विषय पर तो अधिकार था, हिन्दी पर नहीं। कभी -कभी एक ही किताब के विभिन्न हिस्से विभिन्न विशेषज्ञों को सौंपे गए। अनुवाद की भाषा की आलोचना हुई तो सरकारों ने उनके साथ हिन्दी विद्वानों को भी संयुक्त करना शुरु किया।

समय सीमा में काम पूरा करने के बन्धन, पारिश्रमिक पर दृष्टि, एक किताब के विभिन्न हिस्सों के अलग-अलग भाषा शैली के अलग-अलग विशेषज्ञों द्वारा किए गए अनुवाद नेे और उसके अलग-अलग भाषा संशोधकों ने अनुवाद को छात्रों के लिए कठिन बना दिया। कहीं-कहीं यह नियम भी रहा कि अनुवाद पर विशेषज्ञ अनुवादक और उसके हिन्दी संशोधनकर्ता का नाम नहीं दिया जाएगा। इससे उन्हें लापरवाही बरतने की पुख्ता छूट मिल गई। जवाबदेही नहीं रही। अपयश का डर नहीं रहा। कोई भाषा कुछेक कठिन शब्दों या पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग से कठिन नहीं बनती। गलत वाक्य रचना, परसर्गों के यथास्थान अप्रयोग, क्रियाओं के लापरवाह प्रयोग आदि के कारण कठिन बनती है। इन कारणों से और स्रोत भाषा की प्रकृति को अनुवाद की भाषा पर हावी होने देने तथा शब्द-शब्द अनुवाद से इन अनुवादों की भाषा छात्रों के लिए ही नहीं शिक्षकों के लिए भी कठिन हो गई। मूल अंग्रेजी ग्रन्थ अपेक्षाकृत सरल लगने लगे। काश! हिन्दी संशोधकों ने अनुवाद की भाषा की इन कठिनाइयों को दूर करने में जरूरी परिश्रम किया होता। काश! अपने आलस्य से होने वाली भारी हानि का अन्दाजा उन्होंने लगाया होता।

एक विसंगति और हुई। छोटी कक्षाओं का शिक्षा माध्यम जहाँ हिन्दी था वहीं बड़ी कक्षाओं का अंग्रेजी। माध्यम को अंग्रेजी से हिन्दी करने का काम उत्‍तरोत्‍तर किया जाना चाहिए था। पर वह प्रायः नहीं हुआ। छात्रों और पालकों ने स्वभावतः यह महूसस किया कि जब बड़ी कक्षा की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से ही करनी है तब उसे छोटी कक्षा से ही क्यों न माध्यम बनाया जाए? फलस्वरूप छोटी कक्षाओं में भी अंग्रेजी माध्यम और अंग्रेजी की माँग बढ़ने लगी। उसकी पूर्ति के लिए विभिन्न शहरों/कस्बों में एक के बाद एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल खुलने लगे। शिक्षा माध्यम के सम्बन्ध में सरकारों की ढुलमुल नीति के कारण हिन्दी पाठ्य पुस्तकों के लेखन/प्रकाशन में निजी क्षेत्र ने शुरु में जो उत्साह दिखाया था वह शीघ्रतापूर्वक ठण्डा पड़ गया।

आज जो पीढ़ियाँ देश की प्रमुख कार्यशील जनसंख्या हैं और उद्योग-धन्धों, व्यापार, कार्यालयों, प्रतिष्ठानों आदि में काबिज हैं, वे वे ही हैं जो पिछले कुछ वर्षों में अंग्रेजी माध्यम से अपनी पढ़ाई पूरी करके आई हैं। इसलिए नहीं कि वे अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर निकली हैं बल्कि इसलिए कि पुरानी पीढ़ी के नेपथ्य में चले जाने के बाद उन्हें मंच पर आना ही था। उनके आने से स्वभावतः पूरा परिदृश्य अंग्रेजीमय हो गया है। अगर ये पीढ़ियाँ हिन्दी माध्यम से पढ़कर आई होतीं तो आज हिन्दी का वैसा पराभव नहीं दिखाई देता जैसा दिख रहा है। हिन्दी के इस पराभव के लिए न तो किसी जमाने में हुआ हिन्दी विरोधी आन्दोलन दोषी है और न अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार। इसके लिए हम ही दोषी हैं। हिन्दी की पराजय हमारी अपनी करनी का फल है।

पिछले साठ सालों में अन्य राज्यों की तुलना में हिन्दी भाषी राज्य आर्थिक रूप से निरन्तर पिछड़ते रहे हैं। सम्भ्रान्त वर्ग इन्हें गायपट्टी/गोबरपट्टी के नाम से अभिहित करने में भी संकोच नहीं करता। दुर्भाग्य से इस पिछड़ेपन को भी हिन्दी से जोड़कर देखा जाने लगा। इसलिए यह मिथ्या धारणा बलवती होती गई कि आर्थिक तरक्की हिन्दी से सम्भव नहीं है। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के चलते भी अंग्रेजी की अनिवार्यता रेखांकित की जा रही है। यह भुुलाया जा रहा है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ यहाँ माल बेचने आ रही हैं, सिर्फ अपने दफ्तर खोलने नहीं। उन्हें हिन्दी प्रदेश के रूप में विशाल उपभोक्ता बाजार दिखाई दे रहा है। अगर हिन्दी भाषी ग्राहकों में माल की खपत करनी है तो उनसे हिन्दी में ही तो व्यवहार रखना होगा। कम्पनियाँ अपनी प्रचार सामग्री को हिन्दी में ही तो प्रस्तुत करेंगी। हिन्दी भाषी क्षेत्र में अपनी पैठ और पकड़ बनाने के लिए वे हिन्दी भाषी अमले को ही तो अपनी नौकरी में रखना चाहेंगी! आखिर टीवी चैनलों ने हिन्दी प्रसारणों को अधिकाधिक समय देना क्यों शुरू कर दिया है? लेकिन यह धारणा बनाई जा रही है कि अगर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में नौकरी लेनी है तो हिन्दी में नहीं, अंग्रेजी में महारत हासिल करनी होगी।

अब कुछ वर्षों से ये कम्पनियाँ उचित ही यह समझने लगी हैं कि भारतीयों को अपनी भाषा से कुछ लेना देना नहीं है। इसलिए वे चीनी, अरबी आदि भाषाओं के तो सॉफ्टवेयर बनवाती हैं, हिन्दी के नहीं। वे जानती हैं कि भारत में अंग्रेजों का राज भले ही न हो, अंग्रेजी का राज तो बरकरार ही नहीं मजबूत भी हो गया है।

भाषा के मामले  में आज हम जिस मुकाम पर खड़े हैं, उसमें पहली जरूरत यह है कि हम अपनी आत्ममुग्धता और जय-जयकार से बाहर निकलें। यह स्वीकार करें कि आजाद भारत में हिन्दी, अंग्रेजी से पराजित हो गई है। अब हमें वहीं से तमाम शुरुआत करनी होगी जहाँ से साठ साल पहले करनी थी। किसी देश की अर्थव्यवस्था में जो महत्व आधारभूत ढाँचे या अधोसंरचना का है उसकी भाषा के लिए वही महत्व विभिन्न कक्षाओं के विभिन्न विषयों की पाठ्यपुस्तकों और शिक्षा माध्यम का है। अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पढ़कर और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा पाकर निकली आज की 25 से 50 साल उम्र वाली पीढ़ियाँ ही इस समय समाज की प्रमुख क्रियाशील जनसंख्या हैं। इस जनसंख्या को अब हिन्दी की ओर मोड़ना कठिन है। हमें अपना ध्यान उन पीढ़ियों पर केन्द्रित करना होगा जो आज आरम्भ कर रही हैं और 20-25 साल बाद हमारे समाज की प्रमुख क्रियाशील जनसंख्या में बदल जाएँगी।

साठ साल पहले की तुलना में आज यह काम ज्यादा कठिन है। तब के छात्रों की पीढ़ियाँ हिन्दी को ‘आजादी की लड़ाई की भाषा और देश भक्ति का प्रतीक’ मानती थीं। वे हानि उठाकर भी उसका झण्डा ऊँचा रखना चाहती थीं। आज के छात्रों की पीढ़ियाँ केरियर, व्यवसाय, प्रतिस्पर्धा को लेकर अधिक चिन्तित हैं और स्वभावतः उन्हें ही अधिक महत्व दे रही हैं। क्या केन्द्र और राज्य सरकारें उन्हें आश्वस्त कर सकेंगी कि हिन्दी और हिन्दी माध्यम की पढ़ाई उन्हें अंग्रेजी से, जो आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में भी शामिल नहीं है, वरीयता नहीं तो कम से कम अवसर की समानता तो प्रदान करेंगी ही? यूपीएससी के सीसेट प्रश्नपत्र में यह समानता न होने से ही तो भारतीय भाषाओं के छात्र उसका विरोध कर रहे हैं! अंग्रेजी में रचे गए प्रश्नपत्र के हिन्दी मशीनी अनुवाद को बड़े से बड़ा हिन्दीदाँ भी नहीं समझ सकता। अर्थबोध के लिए सिर्फ व्याकरणिक नियमों की समझ ही पर्याप्त नहीं होती। अगर टैबलेट कम्प्यूटर, को गोली कम्प्यूटर, स्टील प्लाण्ट को इस्पात पौधा कहा जाएगा तो परीक्षार्थी को क्या अर्थबोध होगा? क्यों न सीसेट का प्रश्नपत्र अगली बार हिन्दी में बने और उसका अनुवाद अँग्रेजी में हो? क्या हिन्दी सेवा संस्थाएँ और व्यक्ति, हिन्दी की अधोसंरचना को अपने एजेण्डे में शामिल करेंगे? यह सम्भव हो सका तो भी इसके परिणाम आने में बीस एक साल का समय लग जाएगा। जो नुकसान हो चुका, हो चुका है। उसकी भरपाई नहीं हो सकती। इस बात की भी जरूरत है कि सूचना प्रौद्योगिकी को हिन्दी के अनुकूल बनाया जाए और हिन्दी राज्यों की सरकारें अपना तमाम काम हिन्दी में करके दिखाएँ। यह सिद्ध करके दिखाएँ कि हिन्दी में कामकाज से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं। आवेश, आलस्य और बड़बोलेपन की अपनी कार्य संस्कृति का परित्याग करते हुए आर्थिक क्षेत्र में भी उन्हें बढ़त प्राप्त करनी होगी। यह कष्ट उन करोड़ों बच्चों के लिए उठाना होगा जिनकी अधिकांश आबादी गाँवों और गरीबी में है। उनकी मौलिक प्रतिभा का वास्तविक विकास हिन्दी में ही सम्भव है। वे ही इस नई सदी का इतिहास रचेंगे और हिन्दी की पराजय को विजय में बदलेंगे ।
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जलजजी का डाक का पता :  30, इन्दिरा नगर, रतलाम - 457001
जलजजी का ई-मेल पता  :   jaykumarjalaj@yahoo.com

हिन्दी : अपनों के अत्याचार

 हिन्दी का रास्ता आसान नहीं रह गया है। इसे दोहरा संघर्ष करना पड़ रहा है - चतुर, चौकन्ने अंग्रेजीपरस्तों से और अपने ही असावधान, आलसी, क्रूर सपूतों से। तय कर पाना मुश्किल लगता है कि किससे पहले निपटा जाए या किससे पहले बचा जाय?

यहाँ दी गई कतरन देखिए। यह उस अध्यापिका का वक्तव्य है जो बच्चों को हिन्दी पढ़ाती रही है। मध्य प्रदेश में अध्यापकों की सेवा निवृत्ति आयु, अन्य शासकीय कर्मचारियों से दो वर्ष अधिक है। सारे कर्मचारी 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं जबकि अध्यापक 62 वर्ष की आयु में। मोटे तौर पर माना जा सकता है कि इस अध्यापिका ने 35 बरस बच्चों को पढ़ाया।  कल्पना ही की जा सकती है कि इस अध्यापिका ने बच्चों को कैसी हिन्दी सिखाई/पढ़ाई होगी! यह भी तय है कि ‘ऐसी हिन्दी’ पढ़ानेवाली यह एकमात्र अध्यापिका नहीं ही होगी। पूरी जमात ऐसी भले ही न हो लेकिन हाँडी का चाँवल तो है ही।

इस समय मुझे मेरे छोटे बेटे का एक कक्षापाठी याद आ रहा है। इस समय उसकी अवस्था 26 वर्ष से अधिक नहीं होगी। कोई दो बरस पहले, एक दिन वह अचानक फेस बुक पर प्रकट हुआ और अपनी सत्रह कविताओं की पहली खेप मुझे अर्पित कर कहा - ‘अंकल! ये मेरी कुछ कविताएँ हैं। इन्हें जरा देख लीजिएगा।’ मुझे अच्छा तो लगा लेकिन कुछ ही देर तक। पहली कविता की पहली ही पंक्ति से, वर्तनी की अशुद्धियों का क्रम जो जारी हुआ तो एक कविता पूरी पढ़ने में मुझे रोना आ गया। शेष कविताएँ नहीं पढ़ सका! अगले दिन उसने (फेस बुक पर ही) पूछा - ‘मेरी कविताएँ देखी अंकल? कैसी लगी?’ मैंने उत्तर दिया - ‘एक कविता ही पढ़ पाया। वह भी बड़ी मुश्किल से। वर्तनी की अशुद्धियों ने जी खट्टा कर दिया। पहले अपनी वर्तनी सुधारो। उसके बाद ही कविता लिखना।’ उसने ‘दन्न’ से पूछा - ‘ये वर्तनी क्या होता है अंकल?’ मेरी घिग्घी बँध गई। अपनी बुद्धि, शक्ति और सामर्थ्यानुसार उसे समझाया। उसने जवाब दिया - ‘आप जो कह रहे हैं वह सीखने में तो बहुत टाइम लग जाएगा अंकल! मुझे तो अपनी नौकरी से ही फुरसत नहीं मिल पाती। यह नया काम सीखने के लिए मुझे टाइम नहीं है।’ मैंने यही कहा कि इस दशा में वह मुझे अपनी कविताएँ न भेजे।

उसने मेरा कहा मानने का उपकार तो कर लिया किन्तु उसका ‘कविता-कर्म’ न केवल निरन्तर है बल्कि हिन्दी साहित्य की कई संस्थाएँ और मंच उसे सम्मानित कर चुके हैं। उसकी उम्र और कविता लिखने की गति देखते हुए लगता है कि वह यदि ‘सबसे कम उम्र में सर्वाधिक सम्मान पानेवाला हिन्दी कवि’ बन जाए तो ताज्जुब नहीं। हाँ, वर्तनी के प्रति उसकी असावधानी पूर्ववत बनी हुई है। मैं तय नहीं कर पा रहा कि किस पर गुस्सा अधिक करूँ - इस बच्चे पर या इसे सम्मानित करने वाली साहित्यिक संस्थाओं/मंचों पर?

मुझे एक और ‘कवि’ याद आ रहे हैं। उम्र में मुझसे छोटे थे। अब दिवंगत हो चुके हैं। ऐसे में उनका नाम देना अशालीन होगा। मैं अपना काम कर रहा था। वे अपनी कविता-डायरी में व्यस्त थे। अचानक ही पूछा - “भाई साब! ये ‘सैलाब’ क्या होता है?” मैंने कहा - ‘सामान्य अर्थ तो बाढ़ या पानी का उफान होता है। लेकिन यदि वाक्यों में प्रयोग करके पूछो तो अधिक स्पष्ट बता सकूँगा।” अपनी डायरी में नजर गड़ाए बोले - ‘वाक्यों में प्रयोग तो मैंने कर लिया। तुक भी मिल गई। आप तो बस इसका अर्थ बता दीजिए।’ मैं क्या जवाब देता? बताने के लिए मेरे पास बचा ही क्या था?

‘अपनी हिन्दी’ के प्रति हिन्दीवालों के व्यवहार का एक और नमूना। साथवाला चित्र देखिए। एक अखबार में छपा यह विज्ञापन कल, 12 सितम्बर 2014 का ही है। इस अखबार की जड़ें राजस्थान में हैं। इसके संस्थापकजी को ‘हिन्दी-पुरुष के रूप में जाना जाता था। पत्रकारिता के पुरोधा बताते हैं कि अपने इसी अखबार की हिन्दी को ‘निर्दोष और अनुकरणीय’ बनाने के लिए उन्होंने अखबार में एक स्वतन्त्र विभाग बनाकर कुछ लोग नियुक्त किए थे। संस्थापकजी तो दिवंगत हो चुके हैं। उनके सुपुत्र ही अब इसके स्वामी और नियन्त्रक हैं। वे खुद ‘स्थापित हिन्दी साहित्यकार’ हैं और ‘श्रेष्ठ हिन्दी सेवी’ के रूप में एकाधिक राज-पुरुषों के हाथों, देश के विभिन्न स्थानों में राजकीय और साहित्यिक/सामाजिक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। हिन्दी साहित्य की लगभग समस्त विधाओं में इनका हस्तक्षेप है। इनकी, कम से कम एक दर्जन पुस्तकें तो प्रकाशित हो चुकी हैं। इन पुस्तकों के विज्ञापन भी इनके इसी अखबार में छपते हैं।

पाँच बरस पहले, 12 सितम्बर 2009 को इस अखबार का, मेरे कस्बे का संस्करण शुरु हुआ था। छपता तो अब भी इन्दौर में ही है किन्तु मेरे कस्बे के लिए अलग से पन्नों की व्यवस्था है। कल, इस अखबार के, मेरे कस्बेवाले संस्करण के पाँच बरस पूरे हुए। छठवाँ वर्ष शुरु हुआ। उसी प्रसंग पर यह सूचना, मेरे कस्बे के पन्नेवाले हिस्से के मुखपृष्ठ पर छपी थी। यह अखबार हिन्दी का है, हिन्दी (क्षमा करें, ‘हिंग्लिश’) में छपता है, इसके संस्थापक ‘हिन्दी-पुरुष’ थे, इसके वर्तमान स्वामी ‘श्रेष्ठ हिन्दी सेवी’ हैं, इसका दावा है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ (दोनों हिन्दी प्रदेशों में) इसके 46 लाख पाठक हैं। लेकिन अपना छठवाँ स्थापना दिवस याद करने, इस प्रसंग पर गर्वित होने और अपने पाठकों को बताने के लिए इस अखबार को अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ा।

क्या कहा जाए? क्या-क्या कहा जाए? किससे, किस-किससे कहा जाए? कब तक कहा जाए? अंग्रेजीपरस्तों पर गुस्सा किया जाए या नहीं? किया जाए तो क्यों किया जाए? मेरे पास अपने ही सवालों का जवाब नहीं है। अचानक ही मुझे एक शेर याद आ गया है। सम्भव है, शब्दशः इस स्थिति पर लागू न हो किन्तु अंशतः ही सही, मेरी बात प्रकट तो करता ही है -

दोस्तों से जान पे सदमे उठाए इस कदर।
दुश्मनों से बेवफाई का गिला जाता रहा।

अब भगतसिंह की बारी है?

गाँधी और भगतसिंह को परस्पर विरोधी की तरह चित्रित/निरूपित किया जाता है। लेकिन सचाई इसके ठीक विपरीत है। दोनों ही एक दूसरे के मुक्त-कण्ठ प्रशंसक थे। यदि प्रशंसक नहीं भी थे तो, बैरी तो नहीं ही थे।

आज का भारत, निश्चय ही न तो गाँधी के सपनों का भारत है न ही शहीद-ए-आजम भगतसिंह के सपनों का। उन्हीं भगतसिंह के साथ हो रहे व्यवहार से मैं आज दो सवालों के बीच फँस गया। तय नहीं कर पा रहा कि कौन सा सवाल सही है।

पहला सवाल - क्या यह अच्छा ही हुआ कि अंग्रेजों ने भगतसिंह को फाँसी दे दी और उन्हें (भगतसिंह को) आज के भारत को देखने के दारुण दुःख से बचा दिया?

दूसरा सवाल - क्या यह अच्छा नहीं होता कि भगतसिंह आज हमारे बीच होते तो उनके नाम पर जो कुछ किया जा रहा है, वह नहीं होने देते और अपने सपनों का भारत बनाते?

भगतसिंह के बारे में मैं नाम मात्र को ही जानता हूँ। सुना अधिक। पढ़ा बहुत कम। लेकिन दो बातें अवश्य पढ़ी हैं। पहली तो यह कि वे नास्तिक/अनीश्वरवादी थे। और दूसरी यह कि वे जात-पाँत में भरोसा बिलकुल ही नहीं करते थे।

पहली बात तो उनके उस लेख से मालूम हुई जो उन्होंने अपने नास्तिक होने को लेकर लिखा था। जाति-पाँति न माननेवाली बात उस घटना से मालूम हुई जो उन्होंने अपनी अन्तिम इच्छा के रुप में व्यक्त की थी।

अपनी अन्तिम इच्छा उन्होंने बताई थी कि फाँसी पर चढ़ने से पहले वे अपनी ‘बेबे’ (पंजाबी में माँ को ‘बेबे’ ही सम्बोधित किया जाता है) के हाथ की बनी रोटी खाना चाहते थे। जेलर परेशान हो गया था। इतने कम समय में भगतसिंह की माँ को कैसे बुलाया जाए? भगतसिंह ने तब कहा था कि ‘बेबे’ से उनका मतलब उस महिला से था जो उनके शौचालय की साफ-सफाई करती थी। भगतसिंह की सीधी-सपाट व्याख्या थी - माँ ही अपने बच्चों का मल-मूत्र साफ करती है। इसी व्याख्या से उन्होंने जेल में, उनके शौचालय की साफ-सफाई करनेवाली महिला को अपनी ‘बेबे कहा और माना था।

भगतसिंह की बात सुनकर वह महिला संकुचित हो गई थी। उसके मन पर हावी ‘जाति-बोध’ के चलते वह भगतसिंह के लिए रोटी बनाने को तैयार नहीं थी। लेकिन भगतसिंह की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा। उसने रोटी बनाई और भगतसिंह ने बड़े प्रेम से खाई।

आज,  ग्यारह सितम्बर 2014 को मैंने भगतसिंह की इन दोनों बातों को दफन होते देखा।

एक साहित्यिक संस्था ने भगतसिंह की मूर्ति, एक सार्वजनिक उद्यान में स्थापित करवाई। उद्यान नगर निगम ने विकसित किया और मूर्ति का मूल्य इस साहित्यिक संस्था ने चुकाया। आयोजन इसी उद्यान में था लेकिन मेजबानी इस साहित्यिक संस्था की थी। मुख्य अतिथि हमारे नगर के विधायक थे। वे भाजपाई हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता हमारे महापौरजी ने की। वे भी भाजपाई हैं। मंच यद्यपि साहित्यिक संस्था का था और पीछे बैनर भी इस संस्था का ही था लेकिन मंच पर संस्था का कोई प्रतिनिधि नहीं था। कुल सात लोग कुर्सियों पर विराजमान थे जिनमें विधायक, महापौर, भाजपा के जिलाध्यक्ष, भाजपा युवामोर्चा के जिलाध्‍यक्ष, क्षेत्रीय पार्षद (वे भी भाजपाई) और भाजपा के दो कर्मठ कार्यकर्ता शामिल थे। ऐसा लग रहा था मानो इस साहित्यिक संस्था ने भाजपा का, वार्ड स्तरीय भाजपा सम्मेलन आयोजित किया हो।

मेरे प्रदेश के मुख्यमन्त्री 18 सितम्बर को मेरे कस्बे में आ रहे हैं। उसी तैयारी के लिए जिला प्रशासन द्वारा आयोजित बैठक में भाग लेने के लिए विधायक और महापौर को जाना था। दोनों को जल्दी थी। वे भगतसिंह को जल्दी से जल्दी निपटा कर मुख्यमन्त्री को सँवारने में लगना चाह रहे थे। दोनों ने संक्षेप में अपनी-अपनी बात कही। महापौर ने अपने  कार्यकाल की उपलब्धियाँ गिनवाईं (उनका कार्यकाल इसी दिसम्बर में समाप्त हो रहा है)। उन्होंने भगतसिंह का उल्लेख केवल यह कह कर किया कि उनकी मूर्ति का अनावरण है। 

विधायक ने भगतसिंह का उल्लेख कुछ अधिक वाक्यों में किया। भगतसिंह को अपनी राजनीतिक विचारधारा के आदर्श के रूप में उल्लेखित किया। कहा कि भगतसिंह के सपनों का भारत उनकी पार्टी ही बना सकती है और बनाएगी भी। उन्होंने महापौर से अधिक समय नहीं लिया।

दोनों भले ही बहुत कम बोले लेकिन स्वागत-अभिनन्दन के कारण कार्यक्रम काफी लम्बा खिंच गया था। स्थिति यह हो गई थी कि तय करना मुश्किल हो गया था कि किसे अधिक जल्दी है - विधायक, महापौर को या श्रोताओं को?

कार्यक्रम तो निपट गया लेकिन मैं अपने ही दो सवालों में उलझ गया। भगतसिंह के सपनों का भारत बनाने का दावा वे लोग कर रहे हैं जो ‘भगवा, भगवान और हिन्दू धर्म’ की डोर थामे सरकार में बैठे हैं। हिन्दू धर्म का आधार तो वर्णवादी व्यवस्था है! भगवान की दुहाइयाँ देनेवाले और अपने व्यवहार से वर्णवादी व्यवस्था को मजबूत करने में व्यस्त लोग भला भगतसिंह के सपनों का भारत कैसे बनाएँगे? मुझे भगतसिंह की जाति नहीं मालूम। लेकिन क्या हमें, आनेवाले दिनों में भगतसिंह के बारे में कुछ इस प्रकार सुनने को मिलेगा - ‘खत्री-शिरोमणी, हिन्दू धर्म के गर्व पुरुष, अमर शहीद भगतसिंह।’

गाँधी को काँग्रेसियों ने निपटा दिया। हालत यह कर दी कि अब गाँधी और गाँधीवाद से मुक्ति पाने की आवाजेें उठने लगी हैं। लेकिन यह स्थिति आने में 65 बरस लग गए। किन्तु लगता है, संघ परिवार भगतसिंह को उससे कहीं अधिक जल्दी निपटा देगा। भारत के शहीद-ए-आजम को दस-पाँच बरस में ही ‘खत्री शिरोमणी और हिन्दू धर्म का गर्व पुरुष’ बना देगा। 

यह सच है कि संघ परिवार के पास, स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने की कोई विरासत नहीं है। वह अपने लिए किसी महापुरुष की तलाश में जुटा हुआ है। पहले कुछ हद तक लाल बहादुर शास्त्री और अब सरदार पटेल के जरिए वह अपनी टोपी में कुछ पंख खोंस रहा है। लेकिन क्या इसके लिए यह जरूरी है कि भगतसिंह की विशालता और व्यापकता को संकुचित, सीमित कर दिया जाए? समन्दर को नाले में बदल दिया जाए?

गाँधी को हम नहीं बचा पाए। लगता है, भगतसिंह भी गाँधी-गति को प्राप्त हो जाएँगे।

मैं अब भी अपने दोनों सवालों में उलझा हुआ हूँ। 

सरकारी दफ्तर में जाने से पहले

सरकारी दफ्तर में जाने से पहले
- मुकेश नेमा
(मुकेश भाई को आप यहॉं पढ चुके हैं।)

मैं कोई उपदेश नहीं दे रहा। मैं तो फकत बस इतना ही चाहता हूँ कि किसी सरकारी दफ्तर में अपना काम करवाने के लिये पहली बार जाने के पहले आप वहाँ के बारे में, वहाँ के कायदों, चाल-चलन के बारे मे थोड़ा बहुत जान लें। ऐसे ही मुँह उठाये ऐसी खतरनाक जगह पर जाने से आप दिक्कत में पड़ सकते हैं। सरकारी आदमियों और सरकारी दफ्तर के बारे में अता पता करके जाना ही ठीक रहता है। इससे आपको ही सुविधा ही होगी। आपको अचानक कोई धक्का नहीं लगेगा और आप जैसे नासमझ से जूझने में, दफ्तरों में काम करने वाले भले लोगों का वक्त भी ख़राब नहीं होगा। 

पहले तो यह समझिये कि सरकारी दफ्तर कैसे होते हैं और क्यों होते हैं? सरकारी दफ्तर, आम तौर पर किसी पुरानी, रोती-पीटती सी इमारत में, ऊँघते-अनमने लोगों का जमावड़ा होता है। ये लोग किसी आने वाले की औकात देख कर तय करते है कि क्या ज्यादा फायदेमन्द होगा - ऊँघते रहना या चौकन्ना हो जाना? आमतौर पर यह जमावड़ा कुछ भी नहीं करता और करता है तो वो करता है जो उसे नहीं करना चाहिये। अधिक सरल तरीके से इसे ऐसे समझिये कि सरकार ने हर सरकारी दफ्तर को आम आदमी की किसी खास जरूरत के मद्देनजर किसी खास काम को करने लिये बनाया हुआ होता है। पर सरकारी आदमी अपनी पूरी ताकत इस बात के लिये लगा देते हैं कि कम से कम हमें वो काम तो नहीं ही करना है जिसकी हमें तनख्वाह मिल रही है। वे तयशुदा काम को न करने के लिये इतने कट्टरधर्मी होते हैं कि आपको ऐसा लग सकता है कि हो ना हो ये भले लोग ‘यही सब’ करने के लिये यहाँ बैठाये गये हैं। ये सारे लोग सावधान रहते हैं कि कहीं ऐसा ना हो कि कोई शातिर आम आदमी अपना काम करवा कर फटाफट निकल ले और बाहर, जमाने भर में गाना गाता, बेइज्जती करता फिरे कि यहाँ इस दफ्तर मंे सब ऐसे ही हैं, सब कुछ आसान सा ही है। आप खुद सोचिये, किसी भी सरकारी आदमी के लिये यह कितनी शरम की बात है कि उसे ‘ऐसा-वैसा लुंजपुंज टाईप का’ समझ लिया जाये? यदि कोई दफ्तर में हँसता हुआ आये और मुस्कराता हुए चल दे तो यह तो किसी भी स्वाभिमानी सरकारी बाबू के लिये सरासर डूब मरने जैसी बात है! यदि आने वाले को ऐसे ही चले जाने देना है तो फिर सरकारी दफ्तर का और वहाँ बाबू होने का मतलब ही क्या रह जायेगा?

ख़ुदा ना खास्ता, हमारे दफ्तर कभी ऐसे ईमानदार टाईप के, नियमानुसार काम करने वाले हो जायें तो हमारे बाबू ऐसे बकवास दफ्तर में टाईम खराब करने के बजाय किसी बड़े आदमी के बँगले के लॉन की घास छीलना ज्यादा बेहतर समझेगें। अब, चूँकि कोई भी सरकारी बाबू घास छीलना नहीं चाहता इसलिये वो आने वालों को छीलता है। खाली वक्त में आने वालों को छीलने के लिये नये नये तरीके इजाद करता रहता है ताकि उसके और उसके ऑफिस के होने की वजहें और हैसियत बनी रहे।

वैसै सरकारी बाबुओं की, सालों-साल से, इस दिशा में की जा रही मेहनत से इतना तो हो ही गया है कि आजकल हमारे देश में इन दफ्तरों में आने वाला कोई भी शरीफ आदमी फौरन और फोकट में अपना काम करवाने की जिद करता ही नहीं है। वह ऐसी कोई अहमकाना जिद करने की हिम्मत कर भी ना सके, इसलिये सरकारी दफ्तरों का माहौल पर्याप्त डरावना बनाये रखा जाता है, छोटे अँधेरे कमरे, मन मार कर, बीमार, मद्धिम पीली रोशनी में जलते मनहूस बल्ब, कमरों में बिखरी पड़ी गन्दगी, चारों तरफ झूलते मकड़ी के जाले ,टूटा-चरमराता फर्नीचर, धूल खाती फाइलें और इन फाइलों के पीछे पान की पीक बहाते सफेद बालों वाले बाबू। ये सब मिल कर वह हाहाकारी दृश्य रच देते हैं कि आने वाले की हिम्मत वैसे ही टूट जाए। इन सारी ‘व्यवस्थाओं’ के बावजूद यदि आने वाला नियमानुसार काम करवाने की जिद पर अड़ा रहता है तो हमारे अनुभवी बाबू उसकी अनदेखी करके उसे इशारों-इशारों मे समझाने की कोशिश करते हैं और यदि फिर भी वो नहीं मानता तो बेचारे बाबूओं को उसकी लानत-मलामत करनी ही पड़ती है। 

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं हमारे बाबू काम करते ही नहीं। करते हैं। ख़ूब करते हैं। पर तभी करते हैं जब आप इन कामों के लिये इन दफ्तरों में काम करने के लिये नियत मार्गदर्शक सिद्धान्तों, शर्तों का पालन करने के लिये राजी हों। आपके राजी होने पर ही आपको समझदार माना जायेगा वरना यह तय मानिये कि नासमझों को सरकारी बाबू मुँह लगा कर अपना समय बर्बाद नहीं किया करते। चूँकि वक्त तो आपके पास भी नहीं होगा और काम तो आपको करवाना ही करवाना है! इसलिये किसी से फोन करवा कर अपनी सिफारिश करवाने जैसी हिमाकत न ही करें तो अच्छा है। ऐसी ‘ओछी हरकत’ करने वालों को सरकारी दफ्तरों में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। और यदि किसी ऑफिस से आपको बार-बार काम करवाना है तो किसी दंबग या किसी नेताजी को साथ ले जाना तो अपने होने वाले काम की हत्या कर देने जैसा ही होगा। आपको इन सभी गलतियों से बचना चाहिये। 

यह सब ब्यौरा केवल इसलिये है ताकि आप कम से कम सरकारी दफ्तर में अपनी उपस्थिति पर्यन्त सावधान और समझदार बने रहें। मैं उम्मीद करता हूँ कि यह सब पढ़कर आप ऐसे नाज़ुक वक्त में इन सब बातों का ध्यान रखेंगे (और मेरे प्रति कृतज्ञ भी बने रहेंगे)।

ग्राहक सेवा याने सीनाजोर कृतघ्नता

यह एक बीमा कम्पनी और उसके ग्राहक के बीच का एक मामला मात्र नहीं है। यह मामला है - ‘ग्राहक ही भगवान है’ की भारतीय संस्कारशीलता और ‘ग्राहक कभी गलती नहीं करता’ की पाश्चात्य आदर्शवादिता को घोलकर पी जाने की ‘सीनाजोर कृतघ्नता’ का।

मैं अक्षय छाजेड़ के ठीक पड़ौस में रहता हूँ। एक दीवार है हमारे बीच में। अक्षय ने, सरकारी बीमा कम्पनी युनाइटेड इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी से, दो मेडीक्लेम बीमा पॉलिसियाँ ले रखी हैं - एक अपने वृद्ध पिताजी के लिए और एक खुद के परिवार (खुद, पत्नी और दो बच्चों) के लिए। बीमा कम्पनी के कानूनों के चलते उसे दो पॉलिसियाँ लेनी पड़ती हैं। वर्ना, पिताजी कोई अलग परिवार नहीं हैं। 

दोनों ही पॉलिसियाँ पुरानी हैं। 05 दिसम्बर 2013 को अक्षय ने दोनों पालिसियों का नवीकरण (रिन्यूअल) कराया तो अनुभव किया कि एक पॉलिसी में उससे 1,533/- रुपये अधिक लिए गए हैं - 7,658/- रुपयों के स्थान पर 9,191/- रुपये। इसके अतिरिक्त अक्षय ने देखा कि एक पॉलिसी में ‘नो क्लेम बोनस’ की छूट 9 प्रतिशत है और दूसरी में 5 प्रतिशत।

22 दिसम्बर 2013 को अक्षय को जैसे ही यह भान हुआ, उसने उसी दिन अपनी गणना प्रस्तुत करते हुए, ई-मेल के जरिए, कम्पनी के रतलाम शाखा कार्यालय को (जहाँ से अक्षय ने पॉलिसियाँ ली थीं) से कहा कि उससे ली गई प्रीमीयम की तथा नो क्लेम बोनस की छूट की दरों में विसंगति की पुनर्गणना करे और यदि वास्तव में कम्पनी से चूक हुई है तो उससे ली गई अधिक रकम वापस करे। शाखा कार्यालय ने चुस्ती-फुर्ती बरती और अक्षय का मेल, समस्त सम्बन्धितों को अग्रेषित (फारवर्ड) कर दिया। अपनी इस कार्रवाई की सूचना कम्पनी ने अक्षय को भी दी।

लेकिन वह दिन और आज का दिन, स्थिति में रत्ती भर बदलाव नहीं आया है। अक्षय ने मार्च 2014 में उन समस्त लोगों को, जिन-जिन को कम्पनी के शाखा कार्यालय ने अक्षय का मेल अग्रेषित किया था और ग्राहक सेवा विभाग (कस्टमर केअर सेल) को ‘स्मरण-मेल’ किया किया। लेकिन इस बार तो किसी ने पावती देने का न्यूनतम शिष्टाचार भी नहीं निभाया।

कम्पनी का शाखा कार्यालय अक्षय की नौकरी वाले दफ्तर के रास्ते में ही पड़ता है। सो, जब भी सुविधा मिलती है, अक्षय बीमा कम्पनी के दफ्तर चला जाता है। शाखा प्रबन्धक से लेकर सेवक तक, सब अक्षय से भली-भाँति परिचित हैं। शुरु-शुरु में, गर्मजोशी से ‘आईये! आईये!!’ से अक्षय की अगवानी की जाती थी जो धीरे-धीरे ‘आप क्यों अपना वक्त खराब करते हैं? हम देख रहे हैं ना? आपका काम हो जाएगा।’ से होते-होते ‘अरे! आप फिर आ गए? आपको एक बार बता तो दिया है कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है! जो भी करना है, ऊपरवालों को करना है! जैसे ही कोई खबर आएगी, आपको खबर कर देंगे।’ जैसे झुंझलाहट भरे जवाब को पार करते हुए ‘आप ग्राहक हैं साहब! आपको कुछ भी कहने का हक है। हमें तो सुनना ही सुनना है।’ जैसे बेशर्म जवाब पर आकर ठहर गई है। यह आखिरीवाला जुमला कहते हुए शाखा प्रबन्धक की मुख मुद्रा और कहने की शैली कुछ ऐसी होती है मानो कह रहा हो ‘तेरी बात चुपचाप सुनना मेरी मजबूरी है। अगर नौकरी की मजबूरी नहीं होती तो अभी, दो जूते मारकर, धक्के देकर निकलवा देता।’ और शायद यह भी कि ‘तुम कैसे बेवकूफ और घटिया आदमी को कि हजार-दो हजार की रकम के लिए मरे जा रहे हो! हमें परेशान किए जा रहे हो! इतना भी बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं है तो अगली बार से हमारे पास मत आना। किसी और कम्पनी से बीमा करा लेना।’ 

आज अक्षय बेबस खड़ा है। कम्पनी का शाखा कार्यालय ‘आवक-जावक बाबू’ की तरह काम कर रहा है, अपनी तरफ से कुछ नहीं कर रहा। ऊपरवालों के पास ऐसे हजारों ‘केस’ हैं। हजारों की इस भड़ में अक्षय तो ‘पिद्दी का शोरबा’ भी नहीं है। कम्पनी, पहले लाखों की प्रीमीयम देनेवाले ‘जबरे’ ग्राहकों के दावे निपटाएगी। अक्षय जैसे ग्राहक तो, कम्पनी के कर्मचारियों/अधिकारियों की केवल ‘सेलेरी’ जुटाते हैं। सुविधाओं और ग्लेमर की चकाचौंध भरी जिन्दगी तो इन ‘जबरे’ ग्राहकों के दम पर ही जी जा सकती है। सो, ‘रोजी-रोटी’ देनेवाले की अनदेखी, अवमानना की जा रही है और मलाई देनेवालों को हाथों-हाथ लिया जा रहा है। 

अक्षय के सामने एक ही रास्ता है - उपभोक्ता संरक्षण फोरम का दरवाजा खटखटाने का। पहली नजर में हर कोई कह रहा है कि अक्षय की जीत पक्की है। कम्पनी सौ जूते भी खाएगी और सौ प्याज भी। याने, ज्यादा ली गई रकम भी लौटाएगी, उस पर ब्याज भी देगी और अखबारबाजी के जरिए अपनी फजीहत भी कराएगी। वह सब मंजूर है। मंजूर नहीं है तो बस! एक औसत ग्राहक को सन्तोषजनक समाधान उपलब्ध कराना मंजूर नहीं है।

बीमा उद्योग को निजी क्षेत्र की कम्पनियों के लिए खोल देने के बाद सरकारी बीमा कम्पनियों को भीषण, गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा से जूझना पड़ रहा है। सरकार, बीमा क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बढ़ाने के लिए पण-प्राण से कटिबद्ध है। बीमा क्षेत्र को बचाने के लिए तमाम श्रम-संगठन एकजुट हो, सड़कों पर आने की तैयारी करते नजर आ रहे हैं। लेकिन जमीनी वास्तविकता इस सबको पाखण्ड साबित कर रही है। सरकारी कम्पनियों के लोग अपने ‘अन्नदाता ग्राहक’ को किस तरह निजी कम्पनियों की ओर धकेल रहे हैं - यह बात, अक्षय के इस छोटे से नमूने से समझी जा सकती है। 

मेरी पीड़ा केवल यही नहीं है। पीड़ा यह भी है कि एक जमाने में मुझे इसी कम्पनी से रोजी-रोटी मिलती थी। मैं भी कभी इस बीमा कम्पनी का एजेण्ट था। पर्दे के पीछे रहकर मैं भी यथा-शक्ति, यथा-सम्भव अक्षय की सहायता और कम्पनी की छवि बचाने की कोशिशें कर रहा हूँ। लेकिन साफ लग रहा है कि अकेला अक्षय ही नहीं, कम्पनी के लिए मैं भी ‘पिद्दी का शोरबा’ भी नहीं ही हूँ।
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बीबीयों की सराय?

22 अगस्त की अपराह्न मैंने फेस बुक पर, अपनी दीवाल पर निम्नांकित टिप्पणी लिखी -

“आज ‘दूरदर्शन नेशनल’ पर दोपहर में, ‘बाम्बे टाकिज’ कार्यक्रम देखने का मौका मिला।

“कार्यक्रम की सूत्रधार देवीजी निश्चय ही ‘एंग्लो इण्डियन’ थीं। उन्हें हिन्दी बोलने में बड़ी तकलीफ हो रही थी। उनकी प्रस्तुति में अंगरेजी शब्दों की भरमार थी।

“ऐसे प्रस्तोताओं से बचा जाना चाहिए। ‘दूरदर्शन’ की पहुँच दूर-दराज के गाँवों तक है। सहज हिन्दी बोलनेवाले प्रस्तोता अधिक उपयोगी और प्रभावी होंगे।”

मेरी इस टिप्पणी पर, फेस बुक पर जो टिप्पणियाँ आईं वे तो अपनी जगह किन्तु 24 अगस्त की शाम तक मुझे दिल्ली से चार फोन आए। फोन करनेवाले चारों ही सज्जन किसी न किसी रूप में ‘दूरदर्शन’ से जुड़े थे। एक सज्जन तो सप्ताह में कम से कम चार बार ‘दूरदर्शन’ जाते ही हैं।

इन चारों से, प्रत्येक से लगभग पाँच-पाँच मिनिट बात हुई। चारों ने जो कुछ कहा उसने मुझे अचरज में ही डाला। लेकिन मैंने इन सबकी बातें एक कान से सुनीं और दूसरे कान से निकाल दीं।

किन्तु कल, शनिवार को आए एक फोन ने मेरा ध्यानाकर्षित किया। इन सज्जन ने कोई आठ मिनिट मुझसे बात की और आप बीती सुनाई। 

मुझे नहीं पता कि इन सबने जो कुछ कहा वह सब, वैसा ही सच है जैसा उन्होंने कहा या कि ‘दूरदर्शन’ में सब कुछ वैसा ही होता है। लेकिन ‘कुछ न कुछ’ नहीं हो तो भी ‘कुछ’ तो है ही। बिना आग के भला धुँआ होता है?

इन सबकी बातों का निष्कर्ष था कि ‘दूरदर्शन’, केन्द्र सरकार के अफसरों (खास कर आईएएस अफसरों) की बीबीयों का शरणस्थल या तो बन गया है या बनता जा रहा है। 

इनमें से तीन ने तो कुछ सम्वादों के नमूने दिए। जैसे - 

- मिसेस ने फाइन आर्ट्स में पीजी कर रखा है। उनके लिए थोड़ा स्पेस बनाइये ना! 

- मेडम से तो आपकी मुलाकातें होती रहती हैं। उनसे खूब डिस्कशन भी होता रहता है आपका। आपके यहाँ तो किसी न किसी टॉपिक पर डिस्कशन्स होते ही रहते हैं। उन्हें पेनेलिस्ट या प्रजेण्टर बनाने की आपने कभी सोचा ही नहीं। थिंक टू डू ए फेवर।

- मिसेस एस्थेटिक टेस्टवाली हैं। आर्ट, कल्चर और लिटरेचर में अच्छा-खासा दखल है। उनके लिए कुछ कीजिए भाई!

कभी-कभी उल्टा होता है। याने, किन्हीं खास अफसरों को खुश करने के लिए ‘दूरदर्शन’ के कुछ लोग उनकी सद्गृहस्थ पत्नियों को जबरिया प्रेजेण्टर बना देते हैं।

लेकिन कल आए फोन ने तो सब गड़बड़ ही कर दिया। फोन करनेवाले सज्जन केन्द्र एक सरकार के एक उपक्रम में पदस्थ हैं और अपने विषय के विशेषज्ञ की हैसियत रखते हैं। उनके विषय पर बात करने के लिए ‘दूरदर्शन’ ने उन्हें बुलाया था। वे तो पूरी तैयारी से पहुँचे थे किन्तु उनसे बात करनेवाली देवीजी का, कैमरे का सामना करने का यह पहला ही मौका था। ‘दूरदर्शन’ का सपोर्टिंग स्टाफ पसीना-पसीना हो गया लेकिन उनसे बोला ही नहीं जा रहा था। सवाल पूछना तो दूर रहा, उनसे तो सवाल पढ़े भी नहीं जा रहे थे। समय तेजी से बीत रहा था लेकिन होने के नाम पर कुछ भी नहीं हो रहा था।  इन विशेषज्ञजी का धीरज छूट गया। आगे जो हुआ, वह कुछ इस तरह था -

“मेरे पास बहुत ही सीमित समय था। अपने बाकी अपाइण्टमेण्ट निपटाने के लिए मुझे जल्दी लौटना था। लेकिन उधर देवीजी के बोल नहीं फूट रहे थे। आखिरकार मैंने रास्ता बताया। बोला कि देवीजी भले ही पूछ नहीं पा रही हैं लेकिन सवाल तो लिखे हुए हैं ही। उन सवालों के हिसाब से मेरे जवाब रेकार्ड कर लें और मुझे छुट्टी दे दें। बाद में इन देवीजी से सवाल रेकार्ड कर लें और बाकी काम सम्पादक पर छोड़ दें।

“प्रोड्यूसर को मेरी बात जँच गई। मेरे जवाब रेकार्ड कर लिए गए। मैं लौट आया। दो दिन बाद मुझे उस कार्यक्रम प्रसारण की सूचना मिली तो मैं धड़कते दिल से देखने बैठा - कहीं ऐसा न को कि सवाल कुछ हो और जवाब कुछ और। लेकिन सम्पादक ने सब कुछ सम्भाल लिया।”

अब, जब-जब भी ‘दूरदर्शन’ देखता हूँ तो मुझे ‘दूरदर्शन’ के प्रतीक चिह्न पर ‘दूरदर्शन’ के बजाय ‘बीबीयों की सराय’ लिखा नजर आता है।


लोक कल्याणकारी योजना का आतंक

प्रधानमन्त्री जन-धन योजनाका स्वरूप और अन्तिम लक्ष्य अभी तक स्पष्ट नहीं है किन्तु बैंकरों में इसका आतंक छाया हुआ है। प्रधानमन्त्री मोदी ने पन्द्रह अगस्त को लाल किले से दिए अपने भाषण में इस योजना की घोषणा की थी। इस योजना की विधिवत औपचारिक शुरुआत 28 अगस्त को हो रही है। अखबारों में जो विज्ञापन आए हैं उनमें भी कोई बहुत बड़ी बात नजर नहीं आती सिवाय इसके कि प्रत्येक परिवार को बैंकिंगसे जोड़ा जाए। लेकिन इसमें ऐसा कुछतो है जिसके लिए जीजान लगाकरभाग-दौड़ की जा रही है।
 
कल रविवार था किन्तु मेरे कस्बे के लगभग तमाम बैंक कल दिन भर और रात लगभग नौ बजे तक खुले रहे। इन्दौर में बसे, अधिकारी स्तर के कई लोग शनिवार को इन्दौर नहीं जा सके। उन्हें हड़काकररोक दिया गया। अधिकारी संवर्ग के कुछ लोग अपनी-अपनी बैंकों में बैठे थे तो कुछ लोग गाँवों में डेरा डाले हुए थे। प्रत्येक बैंक को उन गाँवों की सूची दे दी गई थी जहाँ के निवासियों के खाते खुलवाने थे। इन्हें कहा गया था कि ये गाँवों में जाएँ और लोगों के खाते खुलवाने की अपनी कोशिशों के प्रमाण भी प्रस्तुत करें। अखबारों में इनके समाचार भी छपवाएँ। लिहाजा ये बैंक अधिकारी अपने-अपने बैंक के बैनर साथ ले गए थे। इन्होंने वहाँ मजमा जमाया, लोगों को इकट्ठा किया और फोटू खिंचवाए।
 
प्रत्येक बैंक को खाते खुलवाने की न्यूनतम संख्या दे दी गई है। मेरे कस्बे में शुक्रवार, 22 अगस्त से ही विभिन्न बैंकों ने अपने-अपने दफ्तरों के बाहर बैनर सहित स्टाललगा दिए थे।
 
मुझे जब यह जानकारी मिली तो जानबूझकर बैंकों में गया। रविवार था लेकिन, जहाँ-जहाँ मैं गया, तमाम बैंक आबादतो थे लेकिन गुलजारनहीं थे। दहशत और गुस्सा और मातमी उदासी पसरी हुई थी। मालूम हुआ कि स्थानीय स्तर पर ही नहीं, लगभग प्रत्येक बैंक के उच्चाधिकारी भी हलकान हुए, ‘मानीटरिंगकर रहे हैं। फोन पर फोन आ रहे हैं। केवल खाते खोलने के लिए ही नहीं, ‘रविवार को भी खाते खोले गए हैंयह रेकार्ड पर जताना/बताना भी जरूरी है। लिपिकीय स्तर के कुछ निष्ठावान कर्मचारी भी जुटे हुए थे। उच्चाधिकारियों के निर्देश थे - दिन भर गाँवों में रह कर खाते खोलो और रात में तमाम नए खातों को कम्प्यूटर में दर्ज कर प्रोग्रेस रिपोर्टभेजने के बाद ही घर जाओ।
 
दो मजेदार नमूने इस अभियान के आतंककी कहानी अधिक प्रभावशीलता से कहते मिले। पहले नमूने में एक अधिकारी ने अपने भरोसे के एक कार्यकर्ताको, ‘प्रति खाता दस रुपयेके भाव से यह काम सौंप दिया। यह कार्यकर्ताभी उत्साही है। इसने रविवार को ही, एक ही गाँव के 73 लोगों के न केवल फार्म भरवा लिए हैं बल्कि फार्माें की औपचारिकताओं के लिए तमाम कागज भी जुटा लिए हैं। उसने भरोसा दिलाया है - आप बेफिकर रहो साब! आपका टारगेट पूरा कर दूँगा।अब स्थिति यह है कि उच्चाधिकारी इस बैंक के स्थानीय अधिकारी की मानीटरिंग कर रहे हैं और यह अधिकारी इस कार्यकर्ता की।
 
दूसरा नमूने को व्यंग्यभी कहा जा सकता है और कारुणिक विडम्बनाभी। अपराह्न चार बजे के आसपास मैं एक बैंक में पहुँचा तो शाखा प्रबन्धकजी ने असमंजसी मुद्रामें मेरी अगवानी की। मुझे कुछ पूछना नहीं पड़ा। उनकी शकल ही काफी-कुछ कह रही थी। मैंने पूछा - कैसा चल रहा है?’ बोले - आप ही बताओ कि मैं रोऊँ या हँसूँ? आर. एम. साहब कह रहे हैं - यार! तुम फार्म बाद में भरवाना। पहले कम्प्यूटर में सारे खाते खोल लो और फौरन जानकारी भेजो। ऊपरवाले साँस नहीं लेने दे रहे हैं।
एक बात मैंने तेजी से अनुभव की कि प्रायः सारे के सारे अधिकारी केवल अधिकाधिक खाते खोलने के ही दबवा में नहीं हैं, वे इस योजना के (अब तक) अघोषित लक्ष्य का अनुमान कर भयभीत हुए जा रहे हैं। इस योजना के विज्ञापन में ‘6 माह तक खाते के संतोषजनक परिचालन के बाद ओवरड्राफ्ट की सुविधा वाली बात से सभी बैंक अधिकारी भयभीत और नाखुश हैं। अलग-अलग चर्चाओं में सबने एक ही बात कही कि 6 महीनों के बाद प्रत्येक खाताधारक को रुपये 5,000/- के ओवर ड्राफ्ट की सुविधा दी जानी है। यह ऐसा उधार होगा जो कभी नहीं चुकाया जाएगा। एनपीए के विशाल आकार से जूझ रहे बैंकों के लिए यह ऐसा खतरा है जिसकी जानकारी उन्हें है तो सही किन्तु बचाव का कोई उपाय, इनमें से किसी के पास नहीं है। यही डर इन सबको खाए जा रहा है।
 

इस योजना के लक्ष्य तो 28 अगस्त को ही मालूम हो सकेंगे लेकिन यदि मेरे कस्बे को पैमाना बनाऊँ तो इस क्षण का निष्कर्ष तो यही है कि अन्धों का हाथीबनी इस योजना ने बैंक अधिकारियों का खाना-पीना-सोना हराम कर रखा है।
 

आम आदमी की ‘जीवन रक्षक’

अभी-अभी, 19 अगस्त 2014 को भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने ‘जीवन रक्षक’ (तालिका 827) नाम से नई बीमा योजना बाजार में प्रस्तुत की है। एलआईसी की मौजूदा बीमा योजनाओं के मुकाबले इसे ‘आम आदमी की बीमा पॉलिसी’ कहा जा सकता है।

इस पॉलिसी की प्रमुख बातें इस प्रकार है -

- अपनी आयु के 08 वर्ष पूर्ण कर चुके व्यक्तियों से लेकर 55 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति यह पॉलिसी ले सकते हैं।
(यहाँ 55 वर्ष का अर्थ है, जिसकी आयु आज 55 वर्ष, 05 महीने और 29 दिन है।)

- इस पॉलिसी में पूर्व दिनांकन (बेक डेटिंग) की सुविधा भी उपलब्ध है। अर्थात् इस पॉलिसी को खरीदें भले ही आज किन्तु इसका प्रारम्भ दिनांक 01-04-2014 से भी लिया जा सकता है। इसका लाभ यह है कि जो आदमी आज 55 वर्ष 06 महीने से अधिक आयु का हो चुका है (ऐसा आदमी एलआईसी के हिसाब से 56 वर्ष का हो कर यह पॉलिसी लेने की पात्रता खो चुका है), वह भी उस पिछली तारीख से यह बीमा ले सकता है जिस तारीख को वह 55 वर्ष 05 माह 29 दिन की सीमा में आ जाता हो।

- पूर्व दिनांकन की सुविधा लेने पर प्रीमीयम की रकम पर 9.5 प्रतिशत की साधारण दर से ब्याज देय होगा।

 - पॉलिसी की अवधि न्यूनतम 10 वर्ष और अधिकतम 20 वर्ष होगी। 

इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पॉलिसी के अन्तर्गत एक व्यक्ति को अधिकतम 2,00,000/- रुपयों का ही बीमा मिल सकेगा। इस भ्रम मे बिलकुल न रहें कि दो-दो लाख की, एक से अधिक पॉलिसियाँ ली जा सकेंगी। अधिकतम बीमा धन की यह सीमा ‘प्रति जीवन’ है, ‘प्रति पॉलिसी’ नहीं। हमें बताया गया है कि इस आशय की सूचना, आपको जारी की जानेवाली रसीद पर भी अंकित होगी और पॉलिसी पर भी। यदि आपने जाने-अनजाने (किसी एजेण्ट की चूक से भी) इस योजना के तहत दो लाख रुपयों से अधिक का बीमा ले लिया तो भुगतान (यह भुगतान पॉलिसी पूरी होने पर मिलनेवाला हो या मृत्यु होने पर मिलनेवाला) केवल दो लाख रुपयों का (और पात्रता होने पर लॉयल्टी एडीशन) ही मिलेगा।

- प्रीमीयम का भुगतान पूरी पॉलिसी अवधि तक करना होगा। अर्थात्, जितने वर्षों के लिए पॉलिसी ली है, उतने वर्षाें तक प्रीमीयम चुकानी पड़ेगी।

- पॉलिसी की पूर्णावधि आयु 70 वर्ष है। अर्थात् आयु के 70 वर्ष तक के लिए ही यह पॉलिसी मिल सकेगी। अर्थात्, 55 वर्ष के व्यक्ति को अधिकतक 15 वर्ष की अवधि के लिए यह पॉलिसी मिल सकेगी।

- प्रीमीयम का भुगतान वार्षिक, अर्द्ध वार्षिक, तिमाही, वेतन से/ईसीएस से मासिक रूप से किया जा सकेगा।

- न्यूनतम बीमा धन 75,000/- रुपये तथा अधिकतक बीमा धन 2,00,000/- रुपये है। बीमा-धन, 5000/- रुपयों के गुणक में होगा। अर्थात् 75,000/- के बाद 80 हजार, 85 हजार आदि आदि।

- 50 पैसे प्रति हजार बीमा धन की दर से ‘दुर्घटना हित लाभ’ उपलब्ध है।

- तीन वर्षों की प्रीमीयम चुकाने के बाद इस पॉलिसी पर लोन लिया जा सकेगा, सरेण्डर भी किया जा सकेगा।

- इस पॉलिसी में वार्षिक बोनस का प्रावधान नहीं है। किन्तु पूर्णावधि पर ‘निष्ठा आधिक्य’ (लॉयल्टी एडीशन) का भुगतान किया जाएगा।

- पाँच वर्ष पूरे हो जाने के बाद (अर्थात् पाँच वर्षों की प्रीमीयम जमा करने के बाद) ही पॉलिसी को ‘निष्ठा आधिक्य’ की पात्रता प्राप्त होगी। 

- प्रीमीयम की रकम पर सेवा कर तथा सर चार्ज अलग से देय होगा। पहले वर्ष इनकी दर 3.09 प्रतिशत होगी। बाद के वर्षों में यह दर 1.545 प्रतिशत होगी।

- प्रीमीयम की रकम पर आय कर की धारा 80-सी के अन्तर्गत कर-छूट मिलेगी।

- सेवा कर तथा सर चार्ज की रकम पर आय-कर-छूट नहीं मिलेगी।

- पॉलिसी से मिलनेवाली रकम, आय कर अधिनियम की धारा 10 (10)-डी के अन्तर्गत कर-मुक्त होगी।

प्राप्तियाँ

पॉलिसी से मिलनेवाला भुगतान निम्नानुसार होगा -

- पूर्णावधि (अर्थात् पॉलिसी पूरी होने) पर बीमा धन तथा लायल्टी एडीशन की रकम मिलेगी।

- पॉलिसी अवधि पूरी होने से पहले मृत्यु की दशा में बीमा धन तथा लॉयल्टी एडीशन की रकम का भुगतान, नामित व्यक्ति (नामिनी) को किया जाएगा।

- दुर्घटना मृत्यु की दशा में बीमा धन की दोगुनी रकम तथा लॉयल्टी एडीशन की रकम का भुगतान, नामित व्यक्ति (नामिनी) को किया जाएगा। 

- किन्तु लॉयल्टी एडीशन की रकम का भुगतान तभी किया जा सकेगा जबकि पॉलिसी पाँच वर्ष चल चुकी होगी। क्योंकि जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, पॉलिसी को लॉयल्टी एडीशन की पात्रता, पॉलिसी के पाँच वर्ष पूरे करने के बाद ही प्राप्त होगी।

- अर्थात्, यदि किसी पॉलिसीधारक की मृत्यु, पॉलिसी के पाँच वर्ष पूरे होने से पहले होती है तो उसके नामिनी को केवल बीमा धन की रकम का भुगतान होगा और यदि मृत्यु दुर्घटना से हुई होगी तो यह भुगतान, बीमा धन की दोगुनी रकम के बराबर होगा।
विशेषता
- चूँकि इस पॉलिसी में वार्षिक बोनस का प्रावधान नहीं है इसलिए इसकी प्रीमीयम, एलआईसी की मौजूदा अन्य पॉलिसियों की प्रीमीयम की अपेक्षा उल्लेखनीय रूप से कम है।

- न्यूनतम बीमा धन 75,000/- रुपये होने से (और, जैसा कि कहा गया है,  प्रीमीयम भी कम होने से) वे लोग भी बीमा सुरक्षा प्राप्त कर सकेंगे जो अभी एलआईसी की कोई अन्य पॉलिसी नहीं ले पा रहे हैं। एलआईसी की मौजूदा तमाम पॉलिसियों में कम से कम 1,00,000/- का बीमा लेना अनिवार्य है और चूँकि उनमें वार्षिक बोनस का प्रावधान है, इसलिए उनकी प्रीमीयम अपेक्षया तनिक अधिक आती है। इन दो कारणों से ही इसे ‘आम आदमी की बीमा पॉलिसी’ कहा जा सकता है।

उदाहरण 

30 वर्ष की आयु वाले एक व्यक्ति ने 2,00,000/- रुपये बीमा धन की ‘जीवन रक्षक’ पालिसी ली।

- उसकी वार्षिक प्रीमीयम पहले वर्ष रुपये 7,058/- तथा अगले 19 वर्षों के लिए रुपये 6,952/- प्रति वर्ष होगी। इन दोनों ही रकमों में, सेवा कर तथा सर चार्ज की रकम शामिल है।

- पॉलिसी पूरी होने पर, मेरे हिसाब से मिलनेवाला सम्भावित भुगतान 2,50,000/- रुपये (2,00,000/- रुपये मूल बीमा धन तथा 50,000/- रुपये लॉयल्टी एडीशन) होगा।

- उपरोक्त रकम में बीमा धन 2,00,000/- का भुगतान सुनिश्चित है जबकि 50,000/- रुपयों का लॉयल्टी एडीशन का भुगतान अनुमानित है।

- हिसाब करें तो पायेंगे कि इस आदमी ने 20 वार्षिक किश्तों में कुल 1,40,046/- चुकाए। अर्थात् बीमा धन से 60 हजार रुपये कम (अर्थात् बीमा धन की 70 प्रतिशत रकम) दिए जबकि प्राप्तियाँ, जमा की गई रकम से लगभग एक लाख रुपये अधिक हो रही है।

- यदि, दुर्भाग्यवश इस आदमी की मृत्यु, पॉलिसी के पाँच वर्ष पूरे होने के बाद किसी भी समय होती है तो भी उसके नामिनी को लगभग इतनी ही रकम मिलेगी। और यह मृत्यु यदि दुर्घटना से हुई तो इसमे दो लाख रुपये और जुड़ जाएँगे।

- यदि यह मृत्यु, पॉलिसी के पाँच वर्ष पूरे होने से पहले हुई तो नामिनी को बीमा धन की रकम मिलेगी। दुर्घटना मृत्यु की दशा में, बीमा धन की दोगुनी रकम मिलेगी।

लॉयल्टी एडीशन की गणना

लॉयल्टी एडीशन की गणना मैंने अत्यधिक कंजूसी से की है। एलआईसी की, लॉयल्टी एडीशन के प्रावधानवाली मौजूदा पॉलिसियों में, 10 वर्ष की अवधिवाली पॉलिसियों के लिए 250 रुपये प्रति हजार बीमा धन के हिसाब से (अर्थात्, एक लाख रुपये बीमा धन पर 25,000/- रुपये के हिसाब से) लॉयल्टी एडीशन का भुगतान किया गया है। 20 वर्षों की अवधि के लिए यह दर 600-700 रुपयों तक (अर्थात् एक लाख की पॉलिसी पर 70 हजार रुपये) की दर से भुगतान का प्रावधान है। चूँकि मैं तनिक ‘भयभीत’ आदमी हूँ इसलिए, ऊँची-ऊँची तथा लम्बी-चौड़ी बातें करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। लेकिन तय मानिए कि लॉयल्टी एडीशन की रकम, मेरी बताई गई, 250 रुपये प्रति हजार बीमा धन से अधिक ही होगी और अच्छी-खासी अधिक होगी। किन्तु, कानूनी नुक्तों के मद-ए-नजर, मेरी बताई दर को भी ग्यारण्टी बिलकुल न मानें। हाँ, बीमा धन की रकम की ग्यारण्टी तो बराबर है।

मेरी (बिना माँगी) सलाह है कि यदि आप कम से कम भाव में ‘जोखिम सुरक्षा’ खरीदने में विश्वास करते हैं तो आपके लिए यह निश्चय ही ‘उपयुक्त पॉलिसी’ है। खुद के लिए, अपने परिजनों के लिए तो लीजिए ही, अपने परिचितों, मित्रों को भी इसके लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करें। आपके संस्थान के और घरेलू कर्मचारियों के लिए भी यह आदर्श पॉलिसी है।

मैंने इसे ‘आम आदमी की बीमा पॉलिसी’ कहा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ‘खास आदमी‘ इसे नहीं ले सकते। वस्तुतः यह पॉलिसी आम-ओ-खास, सबके लिए समान रूप से आदर्श पॉलिसी भी है और समान रूप से उपलब्ध भी है। 

चील कह रही है - मैं गोश्त नहीं खाऊँगी

वक्त कटी की बातें ‘महज बातें’ नहीं होतीं और फुरसती लोग फालतू नहीं होते। तनिक ध्यान से देखें, सोचें-विचारे तो लगेगा, इनके जरिए हमारा ‘लोक’ बड़ी ही प्रभावशीलता से जीवन के कड़वे यथार्थ उजागर करता है। 

दोपहर की वेला। एलआईसी दफ्तर में भोजनावकाश। हाथ में काम कुछ खास नहीं। प्रीमीयम जमा करने के लिए आए दोे ‘रिटायर्डों’ से साबका पड़ गया। दोनों ही परिचित और परिहासप्रिय। प्रीमीयम जमा करने के बाद मुझसे पूछा - ‘चाय पीएगा या पिलाएगा?’ इतने अपनेपन और अधिकार से अब कौन बात करता है? मैं निहाल हो गया। बोला - ‘केवल चाय ही क्यों? साथ में और कुछ भी। आपने मुझे इस काबिल तो कर ही दिया कि आपकी सेवा कर सकूँ।’ दोनों खुश हो गए। एक ने मेरी पीठ पर धौल मारी और धकिया कर, दफ्तर के सामने, सड़क पार, मनोज की चाय की दुकान की ओर ले चले।

मनोज दुकान पर नहीं था। वह आए तो चाय बनाए। मनोज गैरहाजिर तो भला कोई ग्राहक क्यों हो? सो, हम तीन के तीन, सुनसान दुकान की बेंच पर बैठ गए।

‘और क्या चल रहा है?, मानसून दगा दे रहा है, भादों अभी आधे से ज्यादा बाकी है लेकिन अगहन सा तप रहा है’ जैसी रस्मी बातों से होते-होते ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ वाले जुमले पर बात आ गई। दोनों खूब हँसे। एक बोला - ‘स्साले! नेता! अपने सिवाय सबको बेवकूफ समझते हैं। नहीं खाएँगे। मासूम बन कर बात करते हैं और सोचते हैं सब उनकी बातों पर आँख मूँद कर भरोसा कर लेंगे।’ मैं चुप रहा। बोलने पर कुछ महत्वपूर्ण से वंचित हो जाने का खतरा था। मुझे सम्बोधित करते हुए एक बोला - ‘चील कह रही है, मेरे घोंसले में गोश्त सुरक्षित रहेगा। अरे! एक-एक रैली में लाखों-करोड़ों खर्च हुए हैं और कह रहे हैं न खाऊँगा और न ही खाने दूँगा। ऐसा कहीं होता है? कहनेवाला जानता है कि वह सच नहीं बोल रहा लेकिन सुननेवाला भी नासमझ नहीं है, इतना भी विचार नहीं रहता इन लोगों को।’

फिर उन दोनों ने अपना-अपना एक-एक किस्सा सुनाया।

पहला किस्सा इस तरह था।

एक बहुत ही ‘चालू’ अफसर, एक ‘गृह वित्त (हाउसिंग फायनेन्स) कम्पनी’ के एरिया मैनेजर बन गए। सुविधा के लिए उनका नाम नेकीरमजी मान लें। नेकीरामजी वो आदमी जो साँस भी न तो मुफ्त में ले और न लेने दे। कम्पनी अच्छी-खासी दमदार। रोज, अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के विज्ञापन देनेवाली। लोगों की रेलमपेल हो गई। लेकिन ताज्जुब की बात कि कोई भी भ्रष्टाचार की शिकायत नहीं कर रहा। क्या नेकीरामजी बदल गए?

सीधे-सीधे उन्हीं से पूछ लिया - ‘क्या बात है? तबीयत तो ठीक है?’ नेकीरामजी ठठा कर हँसे और खुलकर बोले - ‘पहले कौन सी खराब थी जो अब ठीक होने का सवाल उठे? अब तो पहले से सौ गुना ज्यादा ठीक।’ पूछताछ के जवाब में उन्होंने रहस्य उजागर किया - “इण्डिविज्युअल एप्लीकेण्ट (व्यक्तिगत रूप से लोन माँगनेवाले) की तरफ देखता भी नहीं लेकिन ‘क्लस्टर फायनेन्स’ में कस कर वसूली करता हूँ।” ‘क्लस्टर फायनेन्स’ का मतलब नेकीरामजी ने बताया - बहुमंजिला इमारतों (मल्टियों) के फ्लेटों को लोन देना। ऐसा लोन मंजूर करने में खुले हाथों बटोरते हैं। एक-एक आदमी से बात करो तो मेहनत और वक्त तो ज्यादा लगेगा ही, बदनामी भी ज्यादा होगी। मल्टियों के फ्लेटों का लोन आठ, बारह, सोलह फ्लेटों के हिसाब से एक साथ होता है। एक ही आदमी से बातचीत करनी होती है और लेन-देन भी एक से ही होता है। यह आदमी या तो बिल्डर खुद होता है या उसका आदमी। सो, बदनामी के खतरे की कोई बात नहीं। पहली बात तो यह कि बड़े धन्धेवाला सड़क पर चिल्लाता नहीं और यदि वह चिल्लाता है तो सब ‘इण्डिज्युअल एप्लीकेण्ट’ उसे झूठा कहेंगे। कहेंगे - ‘हमसे तो एक पैसा नहीं लिया।’ नेकीरामजी ने कहा - ‘तुम वाकई में सठिया गये हो। कोई छोड़ता है भला? मैं दोनों हाथों से माल बटोर रहा हूँ और ईमानदार का ईमानदार बना हुआ हूँ।’

दूसरे का सुनाया किस्सा भी लगभग ऐसा ही था। पहलेवाला किस्सा तो रतलाम से बाहर का था लेकिन यह दूसरा रतलाम का ही था।

यह किस्सा इस तरह है -

कोई बीस-बाईस बरस पहले की बात है यह। मेरे एक परिचित रतलाम नगर निगम के कमिश्नर बन कर आए। आते ही उन्होंने मुझे फोन किया। अपने आने की खबर दी और फौरन मिलने के लिए बुलाया। 

मिलते ही नाराज हुए - ‘मेरे आने की खबर मिलने के बाद भी मिलने नहीं आए! बुरी बात है। मिलना-जुलना न सही, इतना तो विचार करते कि नई जगह में मैं रोटी कहाँ खाऊँगा! चलो। कोई बात नहीं। मेरे, आज शाम के भोजन की व्यवस्था तुम्हारे जिम्मे।’

बातों ही बातों में नगर निगम में भ्रष्टाचार की बात चली। उनसे पूछा - “आपकी ‘स्ट्रेटेजी’ क्या होगी?” तपाक से बोले - “वेरी सिम्पल! ‘फोर फिगर्स’ से कम नहीं लूँगा।” उन्होंने भी वही राज बताया - “थ्री फिगर्स’ वाले ज्यादा हैं। उन्हें छोड़ूँगा। वे मेरा गुण-गान करेंगे। मेरी ईमानदारी का ढिंढोरा पीटेंगे। उनसे हुए नुकसान की भरपाई ‘फोर फिगर्स’ वालों से करूँगा। मोटा आसामी गहरा होता है। जबान पर नहीं आता। छोटा आसामी जल्दी खुश और जल्दी गुस्सा होता है। छोटा आसामी मेरी पहचान बनाएगा और मोटा आसामी मुझे ‘राजी-खुशी’ जिन्दा रखेगा।”

अपना-अपना किस्सा सुनाकर दोनों ‘हो-हो’ करते हुए देर तक हँसते रहे। हँसी रुकी तो एक बोला - ‘ये तेरा चायवाला कब आएगा? अब तो हमने मेहनत भी कर ली और तेरा मनोरंजन भी। उसे देर हो तो सैलाना बस स्टैण्ड चल कर, कालू की चाय पी लेते हैं। गरमागरम कचोरी भी मिल जाएगी।’ मुझे लगा - जो कुछ मुझे मिला है उसके बाद, दोनों की कचोरी तो बनती ही बनती है।

अब हम तीनों, सैलाना बस स्टैण्ड पर, कालू की दुकान की ओर जा रहे थे। 

यह फोन एलआईसी ने नहीं किया है

मेरा कस्बा रतलाम, पूरा भारत बना हुआ है। मध्य प्रदेश के कस्बों/शहरों से ही नहीं, मुम्बई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, चैन्नई, अहमदाबाद आदि महानगरों से भी मेरे (मालवानिवासी) ग्राहकों/परिचितों के फोन आ रहे हैं। सबके सब, उन्हें आ रहे फोनों से परेशान हैं। कोई ताज्जुब नहीं कि आप (जो मेरे बीमा ग्राहक नहीं हैं) भी ऐसे ही फोनों से परेशान हों।

अचानक ही आपके फोन की घण्टी बजती है। एक अनजान/अपरिचित आवाज आपसे आपका नाम पूछती है। आप अपना नाम बताते हैं। उधर से सवाल आता है - “मैं एलआईसी कस्टमर केअर सेण्टर से बोल रहा/रही हूँ। आपने एलआईसी से जो पॉलिसी ले रखी है उस पर आपका पैंसठ हजार का (यह आँकड़ा कुछ भी हो सकता है) बोनस आपको भुगतान होने के लिए पेण्डिंग पड़ा है। आपको पता है?” आप मना करते हैं क्यों कि आपको सचमुच में पता नहीं। उसके बाद सामनेवाला शुरु हो जाता है - “आपकी फाइल मेरे सामने पड़ी है लेकिन कृपया अपना पॉलिसी नम्बर बताएँ ताकि कन्फर्म हो सके कि मैं सही आदमी से बात कर रहा/रही हूँ।” बस! यहीं से गड़बड़ होने की आशंका शुरु होती है। सामनेवाला/वाली लम्बी-चौड़ी बात करता/करती है और अन्ततः आपसे कहा जाता है - “अपना यह बोनस प्राप्त करने के लिए आपको सात हजार रुपये जमा कराने पड़ेंगे।” इसके बाद कुछ भी हो सकता है। क्या होगा? यह आप पर ही निर्भर है।

कभी कुछ दूसरे किस्म का सवाल आता है - “मैं आईआरडीए से बाल रहा/रही हूँ। आपने किसी प्रायवेट बीमा कम्पनी से कोई बीमा पॉलिसी ले रखी है?” आपका जवाब “हाँ” भी हो सकता है और “प्रायवेट कम्पनी से तो नहीं लेकिन एलआईसी से ले रखी है।” भी हो सकता है। उधर से आपकी चिन्ता की जाती है - “आपको इस बीमा कम्पनी से सर्विसिंग बराबर मिल रही है?” आप “हाँ” कहें या “नहीं”, उधर से अगला सवाल तो आना ही आना है जिसकी परिणति वही होती है - “आपको इतने रुपये जमा कराने पड़ेंगे।” 

यह सचमुच में सुखद है कि मेरे सारे के सारे ग्राहक सुरक्षित हैं। किसी का कोई नुकसान नहीं हुआ। किन्तु “पता नहीं कब, किसके साथ क्या हो जाए?” - यह आशंका मुझे बराबर घेरे रहती है। मैं अपनी ओर से यथासम्भव प्रत्येक ग्राहक से सम्पर्क कर, ऐसे फोनों से बचने के लिए कहता रहता हूँ।

निजी बीमा कम्पनियों की तो मुझे नहीं पता किन्तु आप खातरी रखिए कि एलआईसी ऐसी कोई पूछताछ इस तरह से बिलकुल नहीं करती। न तो अब तक की है और न ही भविष्य में कभी करेगी। आपकी पॉलिसियों पर अर्जित बोनस की जानकारी, इस तरह तो कभी नहीं देगी।एलआईसी अपने ग्राहकों से “अधिकृत और औपचारिक रूप से” सम्पर्क करती है। आपके किसी भी भुगतान के बारे में वह आपको पत्र द्वारा सूचित करेगी। यह सूचना भी केवल सूचना देने के लिए नहीं होगी - निश्चय ही कोई कागजी खानापूर्ति करने के लिए होगी। उस दशा में, पत्र के साथ सम्बन्धित/आवश्यक कागज आपको भेजेगी। जरूरी हुआ तो यह पत्र ‘रजिस्टर्ड’ या ‘स्पीड पोस्ट’ से भेजा जाएगा। आपकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला तो सबसे पहले उस एजेण्ट को निर्देशित करेगी जिसने  आपको सम्बन्धित पॉलिसी बेची है। यदि उस एजेण्ट ने काम करना बन्द कर दिया है तो ही किसी अन्य एजेण्ट के जरिये आपसे सम्पर्क करेगी। लेकिन, आपका भुगतान करने के लिए आपसे किसी भी दशा में, किसी भी प्रकार का कोई भुगतान नहीं लिया जाएगा। इसके विपरीत, यदि आपका भुगतान समय पर न करने की चूक एलआईसी से हुई तो इस विलम्बित अवधि के लिए आप एलआईसी की निर्धारित दर से ब्याज प्राप्त करने के अधिकारी होंगे। किन्तु इसके लिए आपको लिखित (पत्र अथवा ई-मेल द्वारा) अनुरोध करना पड़ेगा। लेकिन भुगतान में विलम्ब यदि आपके कारण हुआ है तो यह आपको ही भुगतना पड़ेगा। ग्राहकों को उनके हक का भुगतान समय पर मिले, यह एलआईसी की पहली चिन्ता और पहली कोशिश होती है। इस सम्बन्ध में मेरी यह पोस्ट मेरी बात को अधिक प्रभावशीलता से स्पष्ट करती है।

एलआईसी या इरडा (आईआरडीए अर्थात् भारतीय बीमा विकास एवम् विनियामक प्राधिकरण), इस तरह से ग्राहकों से सम्पर्क नहीं करते। इरडा तो मेरे विचार से किसी भी ग्राहक से सीधा सम्पर्क नहीं करता। वह या तो बीमा कम्पनियों से सम्पर्क करता है या फिर विज्ञापनों के जरिए बीमाधारकों को अपना सन्देश पहुँचाता है। व्यक्तिगत रूप से वह उन्हीं ग्राहकों से सम्पर्क करता है जो अपनी किसी शिकायत या समस्या के निदान के लिए उससे सम्पर्क करता है।

ऐसे टेलिफोन प्रायः ही दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद से आते हैं। इन नम्बरों पर आप पलट कर फोन करें तो वे ‘नो रिप्लाय’ होंगे।

ऐसे टेलिफोनों से खुद भी बचें और अपने परिजनों, परिचितों, मित्रों को भी बचाएँ। अपनी कोई सूचना, कोई आँकड़ा, कोई नम्बर, कोई तारीख बिलकुल ही नहीं बताएँ - अपनी जन्म तारीख भी नहीं। अपना समय नष्ट न करें। हाँ, गृहिणियाँ इनकी सबसे आसान शिकार होती हैं। शायद, ‘अपनी गृहस्थी’ को आर्थिक रूप से अधिकाधिक शक्तिशाली और खुशहाल देखने के मोह में वे जल्दी लालच में आ जाती हैं। इसलिए अपनी-अपनी गृहिणी-उत्तमार्द्धों को विस्तार से समझा कर आगाह कर दें। अधिक अच्छा होगा कि आप खुद और आपकी उत्तमार्द्ध, ऐसे फोनों के जवाब में धमकी दें कि आपने सामनेवाले का नम्बर देख लिया है और आप पुलिस में रिपोर्ट करने जा रहे हैं।

एक कहावत है - “जब तक एक भी मूर्ख मौजूद है, हजार धूर्त भूखे नहीं मरेंगे।”

मैं, एलआईसी का एक बहुत ही छोटा अभिकर्ता हूँ। एलआईसी की ओर से बात करने के लिए अधिकृत बिलकुल ही नहीं हूँ। फिर भी यदि आपको लगे कि मैं आपके लिए उपयोगी हो सकता हूँ तो मुझे निस्संकोच और साधिकार मेरे मोबाइल नम्बर 098270 61799 पर सम्पर्क करें। आप मुझे मेरे ई-मेल bairagivishnu@gmail.com पर भी सन्देश दे सकते हैं। मैं अपनी सूझ-समझ और क्षमतानुसार आपकी सहायता करने की कोशिश करूँगा। 

हक से नावाकिफ











अपरिहार्य कारणों से मुझे यह पोस्‍ट हटानी पडी है।

ठगी का आतंक

हकीम लुकमान का कहा सब जानते और मानते हैं - ‘शक का कोई ईलाज नहीं होता।’ लेकिन जब इस शक से भय उपजे और वह आतंक में बदल जाए तब? तब वह शायद मनोविज्ञान के विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए एक सुन्दर प्रकरण होगा।

वासु भाई गुरबानी से कल शाम सुने किस्से के बाद से ही मैं यह  सोच रहा हूँ।

किस्सा सौ टका सच है। केवल पात्रों के नामों और घटनास्थल में बदलाव कर दिया है।

यह कोई पैंतालीस-पचास बरस पहले की बात है। तब दशमलव प्रणाली शुरु तो हो चुकी थी लेकिन आना-पाई, गज, सेर-पाव-छटॉंक ही चलन में थे। एक हुआ करते थे कन्हैया सेठ। चोरी-चकारी का माल औने-पौने दामों में खरीदकर उसे ठीक-ठीक मुनाफा लेकर बेच देना उनका धन्धा था।

एक बार उनके हत्थे कपड़ों की एक गाँठ चढ़ गई। उसमें रेमण्ड के कट पीस थे तो देहातियों के परिधान की छींटों के कपड़े भी थे। रेमण्ड के कट पीस आसानी से बिकनेवाली चीज थे जबकि छींट के लिए ग्राहक मिलना तनिक मुश्किल। उन्हें मालूम हुआ कि नोलाईपुरा में मोहन नामका एक कारीगर है जो देहातियों/आदिवासियों के लिए कपड़े सिलता है।

एक थैली में छींट के कपड़ों के कुछ नमूने लेकर कन्हैया सेठ मोहन के पास पहुँचे। कपड़ा बताया। मोहन ने कहा कि कपड़ा अच्छा है। कन्हैया सेठ ने पूछा - ‘बाजार में क्या भाव से मिल जाता होगा?’ मोहन ने अनुमान बताया - ’यही कोई डेड़ रुपये गज के आसपास में मिल जाएगा।’ कन्हैया सेठ ने पूछा - ‘तेरे काम में आ जाएगा?’ मोहन ने एक बार फिर कपड़े को देखा। इस बार तनिक अधिक ध्यान से देखा, हाथ से उसका पोत टटोला और कहा - ‘हाँ। मेरे काम आ जाएगा।’ कन्हैया सेठ ने पूछा - ‘बोल खरीदेगा?’ जवाब आया - ‘हाँ। ले लूँगा।’ कन्हैया सेठ ने कहा - ‘बोल! क्या भाव लेगा?’ मोहन ने पल भर विचार किया और बोला - ‘एक रुपये छे आने।’ कन्हैया सेठ ने फौरन लापरवाही से कहा - ‘उठा ले।’ मोहन अचकचा गया। उसने घूर कर कन्हैया सेठ को देखा। पल भर ठिठका और बोला - ‘कपड़ा भाई को दिखाकर एक बार उससे पूछना पड़ेगा।’

मोहन गया और लौट कर बोला - ‘ भाई सवा रुपये बोल रहा है।’ कन्हैया सेठ ने उसी लापरवाही से कहा - ‘अच्छा। चल। सवा रुपये में उठा।’ मोहन पहले अचकचाया था, इस बार तनिक घबरा गया। उसने अविश्वासभरी नजरों से कन्हैया सेठ को देखा और बोला - ‘लेकिन भाई ने कहा है कि एक बार पिताजी से जरूर पूछ लेना।’

इस बार पिताजी से पूछ कर लौटे मोहन ने कहा - ‘पिताजी तो एक रुपया दो आने गज का भाव बता रहे हैं।’ अपनी लापरवाही और फुर्ती कायम रखते हुए कन्हैया सेठ ने कहा - ‘चल! एक रुपया दो आने में उठा।’ सुनकर मोहन मानो ढेर हो गया। उसकी साँस बढ़ गई। अविश्वास की जगह शक ने ले ली। हकलाते हुए बोला - ‘घर में थोड़ी पूछताछ और कर लूँ।’

और इस तरह एक के बाद एक, पूछताछ करते-करते मोहन, दस आना गज के भाव पर आ गया। कन्हैया सेठ ने फिर वही लापरवाही और फुर्ती बरती - ‘और कितना भाव-ताव करेगा यार मोहन! चल, दस आना गज में उठा।’ सुनकर मोहन मानो दहशत में आ गया। उसकी कनपटियों पर पसीना चुहचुहा आया, आँखें इतनी बड़ी-बड़ी हो गईं मानो फटकर बाहर ही आ जाएँगी। पहले तो हकला भी रहा था लेकिन अब तो उसकी बोलती बन्द हो गई - मालवी में जिसे ‘डिक्की बँधना’ (घिग्घी बँधना) कहते हैं, वही। मोहन मानो तन्द्रिल हो गया हो - मन्त्रबिद्ध, वशीभूत। अपनी जी-जान लगा कर जब बोला तो स्वरों के बजाय ‘गों-गों’ की आवाज सुनाई दी। बड़ी मुश्किल से उसने जो कहा वह था - ‘अभी पैसे नहीं हैं।’

पता नहीं कन्हैया सेठ सहज थे या गम्भीर या वे अब मोहन से खेल रहे थे। बोले - ‘तो घबराता क्यों है? पैसे कल दे देना। कल नहीं हो तो परसों दे देना।’ सुनकर मानो मोहन को रुलाई छूट आई हो, कुछ इस तरह से बोला - ‘नहीं सेठ! बात कुछ और ही है। मुझे कपड़ा नहीं खरीदना।’ कह कर अपनी दड़बेनुमा दुकान में, दोनों टाँगों के बीच ठुड्डी टिकाकर, उकड़ू बैठ, जोर-जोर से बीड़ी फूँकने लगा। उसकी नजर नीची और साँस की आवाज से मानो नोलाईपुरा गूँज जाएगा।

कन्हैया सेठ हैरत से मोहन को देखने लगे। चुपचाप। निःशब्द। मोहन को मानो कन्हैया सेठ की नजरें खुद पर चुभती लगीं। उसने सर उठाकर देखा। कन्हैया सेठ को अपनी ओर ताकते हुए देख, कुछ इस तरह मानो फाँसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के लिए रिरिया रहा हो, हाथ जोड़कर, माथे तक ले जाते हुए बोला - ‘जाओ सेठ। माफ करो। मुझे छोड़ दो।’ कन्हैया सेठ कुछ नहीं बोले। उसी तरह, मोहन को हैरत से देखते हुए चले गए। उनके जाते ही मोहन में जान तो आ गई लेकिन हाथ-पाँव साथ नहीं दे रहे थे। बड़ी मुश्किल से उसने सामान का समेटा किया और भरी दुपहरी दुकान मंगल कर घर चला गया। सुनने में आया कि उसे रात भर तेज बुखार रहा। अगले दिन भी वह बहुत देर से दुकान पर आया लेकिन एकदम लस्त-पस्त। 

शाम होते-होते किस्सा पूरे नोलाईपुरा को मालूम हो गया। कोई मजे लेने के लिए तो कोई सचमुच में सहानुभूति जताते हुए जानना चाह रहा था कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक रुपया छे आने से शुरु होकर दस आना गज तक आने के बाद भी मोहन ने कपड़ा क्यों नहीं खरीदा जबकि हर भाव उसी ने बताया और कन्हैया सेठ ने आँख मूँद कर माना। मोहन ने कहा - ‘आप ही बताओ। ऐसा भी कहीं होता है कि कोई व्यापारी एक बार भी भाव-ताव नहीं करे? जो भाव आप बताओ वह भाव झट से माने ले? कोई ऐसा करे तो बात साफ है कि सामनेवाला आपको ठगने पर तुला हुआ है। दस आना गज का भाव लेकर कन्हैया सेठ मुझे ठगना चाहता था। यह तो रामजी ने अकल दे दी और मैं बच गया।’

बाद में मालूम हुआ कि वही कपड़ा कन्हैया सेठ ने उसी दिन, एक रुपया दो आना गज के भाव से बेच दिया था।

मोहन ने सुना तो चहक कर बोला - ‘देखा! मैं तो बच गया लेकिन वो बेचारा तो ठगा गया। कन्हैया सेठ से भगवान बचाए।’