घाटे के सौदे फायदेमन्द होते हैं

ये हैं, नीलू और बी डी। नीलू, मेरी छोटी बहन और बी डी याने बाबूदासजी बैरागी, मेरे जीजाजी। इन्हें यह ‘बी डी’ नाम मैंने ही दिया है। हम कक्षापाठी पहले रहे। जीजा-साले बाद
में बने। यह चित्र इनके विवाह की पचासवीं वर्ष गाँठ के अवसर का। दस मई 1968 को इनका विवाह हुआ था। विवाह की पचासवीं सालगिरह इन दोनों ने बहुत ही साधारण तरीके से अपने घर में ही मनाई। दोनों, मन्दसौर जिले की मल्हारगढ़ तहसील के गाँव बूढ़ा मे रहते हैं। बूढ़ा गाँव बहुत बड़ा तो नहीं है लेकिन भरपूर समृद्ध गाँव है। पाटीदार बहुल इस गाँव में, आज की तो मुझे नहीं मालूम लेकिन चालीस-बयालीस बरस पहले तक यहाँ, ट्रेक्‍टर ट्रालियाँ बनाने की कम से कम पैंतीस औद्योगिक इकाइयाँ थीं। मेरे पैतृक गाँव मनासा से बूढ़ा की दूरी मात्र तीस किलोमीटर है। 

दस मई के तीसरे दिन, तेरह मई को सुबह-सुबह बी डी ने नीलू से अचानक कहा - ‘चलो! भाई साहब (बालकविजी) से मिल आते हैं।’ नीलू तैयार नहीं थी। बोली कि पहले कहा होता तो चले चलते। लेकिन आज के लिए तो कुछ काम निकाल रखे हैं। आज नहीं, अगले रविवार को चलेंगे।

लेकिन वह अगला रविवार नहीं आया। अब कभी आएगा भी नहीं। उसी शाम सात बजते-बजते उसे दादा के निधन का समाचार मिल गया। रात के नौ बजने से पहले ही दोनों पति-पत्नी मनासा में दादा के शव के पास बैठे थे।

दादा के निधन से दुःखी तो हम सब हैं। अब भी हैं। लेकिन नीलू और बी डी तनिक अधिक दुःखी हैं। शायद आजीवन रहेंगे। जब-जब भी याद आएगा, तब-तब दुःखी होते रहेंगे - ‘काश! उस दिन मनासा चले गए होते! दादा से मुलाकात हो गई होती।’ ये दोनों शेष जीवन इसी कसक के साथ जीएँगे।

ये हैं श्री नरेन्द्र नाहटा। मेरे नरेन्द्र भाई सा’ब। मन्दसौर निवासी हैं। मनासा के विधायक और मध्य प्रदेश सरकार में मन्त्री रह चुके हैं। 

दादा के निधनोपरान्त उनके दाह संस्कार में और उठावने में आए तो आए ही। बाद में भी आए। हर बार खुद को कोस रहे थे। बता रहे थे कि वे हर महीने-दो महीने में दादा से मिलने नियमित रूप से मनासा आया करते थे। कह रहे थे - ‘मैं जब भी दादा से मिल कर जाता तो उनसे कुछ न कुछ ऐसी बात लेकर जाता था जो जिन्दगी भर काम आती है। इस बार ही ऐसा हुआ कि मैं आना टालता रहा और टालते-टालते तीन-साढ़े तीन महीने निकल गए। पहले की तरह ही वक्त पर आ जाता तो कुछ न कुछ मिल जाता। अब वह कभी नहीं मिलेगा।’ अब, जब भी कभी, कहीं दादा की बात चलेगी तब, कोई ताज्जुब नहीं कि नरेन्द्र भाई सा’ब को हर बार अपनी यह ‘चूक’ याद आ जाए।

यह चित्र मेरे छोटे बेटे तथागत और उसकी अर्द्धांगिनी नन्दनी का है। दस दिसम्बर 2017 को इनकी भाँवर पड़ी है। इनके विवाह में दादा आए थे और पूरे दो दिन हम सबके
साथ रहे थे। लेकिन ये दोनों चूँकि वर-वधू थे, इसलिए दादा के साथ बहुत ही कम उठ-बैठ पाए।

दादा के बारे में नन्दनी की जानकारियाँ शून्यवत हैं। उसने कहा कि विवाह के बाद उसे दादा के बारे में बहुत सारी बातें सुनने को मिल रही हैं। लेकिन वह कुछ नहीं जानती। उसने कहा - ‘पापाजी! मुझे ताऊजी के बारे में कुछ बताइए ना!’ मैंने कहा कि मैं कितना भी बता दूँ, कम ही होगा। मैंने उसे सलाह दी - ‘तुम दोनों कम से कम दो दिनों के लिए दादा के पास मनासा जाओ। उनके साथ रहो। उनसे बातें करो। उन्हें लोगों से बातें करते देखो-सुनो। तुम्हें काफी कुछ जानने-समझने को मिलेगा। वह जानना-समझना तुम्हारे लिए नींव का काम करेगा क्योंकि वह सब तुम खुद देखोगी-सुनोगी। उसके बाद जब-जब तुम्हें कुछ जानना हो तो अपन बात करते रहेंगे।’ नन्दनी को यह बात जम गई थी। उछल कर बोली थी - ‘हाँ पापाजी! यही ठीक रहेगा। जल्दी ही यह विजिट मेनेज करते हैं।’ लेकिन पेकेजवाली नौकरियाँ हमारे बच्चों को अपने लिए और अपनेवालों के लिए वक्त कहाँ देती हैं? सो, ये दोनों, दो दिनों के लिए दादा के पास जाते उससे पहले ही दादा अपने 'चार दिन' पूरे कर चले गए। नन्दनी अब बात-बात में कहती है - ‘आपके कहते ही हम चले जाते तो कितना अच्छा होता पापाजी!’ दादा को लेकर अब उसके पास इस एक वाक्य के अलावा शायद ही कुछ बचा हो। 

इन तीन मामलों के बाद चौथा मामला मैं खुद हूँ। तीन दिन पहले मैंने उपाध्याय सर के निधन पर अपनी बात कही थी। मेरी वह बात मेरे आलस्य की आत्म स्वीकृती थी। जनवरी 2017 में उपाध्याय सर से मुलाकात क फौरन बाद यदि मैंने वह सब लिख दिया होता तो आज मैं अपराध बोध से ग्रस्त नहीं होता। लेकिन मैं हर बार टालता गया और खुद ही अपराधी बन बैठा। अब मैं आजीवन खुद को सजा देता रहूँगा।

ऐसे अनेक छोटे-छोटे पछतावे हममें से प्रत्येक के पास हैं। ये पछतावे हम ही जुटाते हैं। मन जब भी कुछ कहता है, माँगता-सलाह देता है तो मस्तिष्क उसे परे धकेल देता है। विवेक पर बुद्धि भारी पड़ जाती है। बाद में, जब रेत मुट्ठियों से फिसल चुकी होती है तो हम अपने खाली हाथ देखते हुए खुद को कोसते रह जाते हैं।

दिल की सुन लेने पर, मुमकिन है, ‘दो-पैसों’ का नुकसान हो जाए लेकिन जो दौलत हासिल होगी, वह अनमोल ही होगी।

आईए! दिल की सुनें। कभी-कभी घाटे के सौदे भी बड़े फायदेमन्द होते हैं। जिन्‍दगी को कसकते रहने से बचाते हैं।
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अवकाश गृह के अजूबे


बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - तीसरा हिस्सा

अपने कामगारों, किसानों और बुद्धिजीवियों की सुख सुविधा का सारा माध्यम यहाँ की ट्रेड यूनियनें हैं। हर व्यक्ति को वर्ष में 13 दिन का सवेतन अवकाश मिलता है। इस अवकाश को ये लोग समुद्र के किनारे बने होलीडे होम्स (अवकाश गृहों) में पूरी मस्ती के साथ बिताते हैं। कल शनिवार को हम लोगों को ऐसे ही एक हालीडे होम में ले जाया गया। अकेले रोस्तोक प्रान्त के पास छुट्टियाँ मनाने के लिये ऐसे 35 हजार शेडों की व्यवस्था है। एक शेड में दो व्यक्ति आराम से पाँव पसार कर समुद्र के किनारे स्नानावकाश, मालिश और धूपस्नान का आनन्द लेते हैं। 13 दिनों के लिये प्रति व्यक्ति केवल 75 मार्क याने 300 भारतीय रुपये चुकाने होते हैं। बच्चे के 30 मार्क अलग। इस तरह यदि पति, पत्नि और एक बच्चा अवकाश मनाने आयें तो उन्हें 720 भारतीय रुपयों में पूरे 13 दिन तक हर सुविधा (खाना, पीना, नाश्ता, स्नान, शेड और होटल) ट्रेड यूनियन देती है। यह घर से भी सस्ता होता है। शेड का तात्पर्य है छायादार छोटी सी गुमटी। समुद्री हवा से बचने के लिए शेड की पीठ समुद्र की तरफ करके, सूर्य की ओर मुँह करे, पति पत्नि या प्रेमी युगल केवल स्नान के कपड़ों में सारा दिन समुद्र स्नान और धूप स्नान का आनन्द लेते हैं। कल हम लोगों ने कोई 6 या 7 हजार जोड़े इस तरह एक साथ देखे। मक्खन की तरह गोरी काया वाली इतनी महिलाओं और पुरुषों को करीब-करीब 90 फीसदी नग्न देखने का यह हमारा पहला अवसर था। कई मित्रों की बाँछे खिल गईं पर कई की घिग्गी बँध गई। निस्संकोच जोड़े अपने कलापों में लगे हुए थे। हमें इस अवकाशगृह के डायरेक्टर ने कहा कि आप चाहें जिससे, चाहें जो बात कर सकते हैं पर बात कौन कर सकता था! इन अवकाश गृहों में युवा विद्यार्थियों का प्रवेश बिना किसी झिझक के वर्जित है। उनके लिए अलग से अवकाश गृह बने हुए हैं। इस अवकाश गृह का चरम अभी आगे है। डायरेक्टर ने बताया कि समुद्री हवा में नमक के कारण प्रायः यहाँ चर्म रोग बहुत हो जाते हैं। इसलिए कई नर-नारी अपने चर्म रोगों का ईलाज करवाने, डॉक्टरों की सलाह से यहाँ भेजे जाते हैं। डायरेक्टर महोदय ने एक लकड़ी के बाड़े की तरफ इशारा किया। समुद्र तट से बिलकुल लगा यह बाड़ा एक दम सामान्य था पर जब उसके भीतर धूप ले रहे और खेलते कूदते सैंकड़ों स्त्री पुरुषों को हमने देखा तो हमारे दीदे फटे रह गये। सैकड़ों स्त्री पुरुष चर्म रोग का अद्भुत ईलाज कर रहे थे। उनके पास नाम मात्र को भी कपड़ा नहीं था। अद्भुत संकोचहीनता थी। अविश्वसनीय दृश्य था। इतने, बिलकुल नंगे लोग इस तरह उछलते-कूदते जीवन में किसी भी भारतीय ने नहीं देखे होंगे। ओफ! क्या नजारा था! वे अपनी दुनिया में मस्त थे। हम काठ होते जा रहे थे।

इस अवकाश गृहों में दो मौसम अवकाश मनाने के होते हैं। एक शरदावकाश और दूसरा ग्रीष्मावकाश। अगली योजना में कोई 50 लाख लोगों के लिए इस तरह के अवकाश गृहों का प्रावधान किया जा रहा है। अभी यह संख्या शायद 10 लाख तक ही सीमित है। 

ऐसे होती है धरम की मुफ्त सेवा

वे दोनों तनिक सहमते हुए आए थे। बोले - ‘आप से थोड़ी बात करनी है। लेकिन डर लग रहा है। कहीं आप बात बात सबके सामने नहीं कर दो।’ मुझे हँसी आ गई। पूछा - ‘बात मेरे काम की है या तुम्हारे काम की?’ सहमी आवाज में एक बोला - ‘बात है तो हमारे ही काम की।’ मैंने कहा - ‘तो फिर रहने दो। तुम्हारे काम की तुम जानो।’ दोनों सकपका गए। दूसरा बोला - ‘वो ऐसा है कि है तो हमारे काम की लेकिन थोड़ी-थोड़ी आपके काम की भी है।’ मैंने कहा - ‘तो फिर मुझे उतनी ही बता दो जो मेरे काम की है।’ जवाब आया - ‘देखो सा’ब! हम पहले ही डरे हुए हैं। ऐसी बातें करके आप हमें और मत डराओ।’ अब मैं जोर से हँसा - ‘यार! तुम लोग साफ-साफ बात करो। लेकिन यदि तुम केवल मुझे कहने या बताने आए हो तो रहने दो। इसके बाद भी मुझे बताओगे तो मैं वादा नहीं करता कि तुम्हारी बात अपने तक ही रखूँगा।’ 

दोनों ने आँखों ही आँखों में बात की, फैसला लिया। दूसरा बोला - ‘देखो सा’ब! आए तो आपको सुनाने ही हैं। सुना कर ही जाएँगे। आपको जो करना हो वो कर लेना। लेकिन आपको हमारे बच्चों की सौगन्ध, आप हमारा नाम किसी को मत बताना।’ मानो उनके खानदान पर अहसान कर रहा होऊँ, कुछ इस तरह कहा - ‘हाँ। ये वादा मैं करता हूँ। तुम्हारा नाम नहीं बताऊँगा लेकिन तुम्हारा नाम, पता और मोबाइल नम्बर अपने पास लिख कर जरूर रखूँगा। सुनकर दोनों के हाथ-पाँव फूल गए। घबरा कर पूछा - ‘क्यों? वो किस लिए?’ जोर से हँसते हुए मैंने कहा - ‘डरो मत यार! यदि तुम्हारी बात में काम का मसाला हुआ और मुझे कुछ  पूछताछ करनी पड़ी तो तुमसे फोन करके पूछ लूँगा। इसलिए।’ दोनों की घबराहट कम हुई। मैंने अर्द्धांगिनीजी को आवाज लगा कर उनके लिए पानी और चाय के लिए कहा और उनसे बोला - ‘अब फटाफट अपने काम की बात मुझे बता दो। जरा साफ-साफ बताना। खुलकर।’ 

बिना किसी क्रम के, टुकड़ों-टुकड़ों में, एक दूसरे की बात पूरी करते हुए  उन्होंने जो बताया उसका सार था कि वे मेरा, 14 जून वाला, ‘बिच्छू पण्डित’ का लेख पढ़ कर आए थे। दोनों ही रतलाम की श्री सनातन धर्म सभा के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उनकी संस्था और  महारुद्र यज्ञ समिति, प्रत्येक अधिक मास में, त्रिवेणी मेले में नौ दिवसीय ग्यारह कुण्डी यज्ञ कराती हैं। यज्ञ करानेवाले पण्डितों के व्यवहार से वे परेशान रहते हैं लेकिन कर कुछ नहीं पाते। ‘आपको तो एक बिच्छू पण्डित की बात मालूम हुई। लेकिन ये ग्यारह के ग्यारह बिच्छू पण्डित से कम नहीं हैं। हमें तो सा‘ब पूरे नौ दिन इन ग्यारह बिच्छू पण्डितों को झेलना पड़ता है।’ 

बात मेरी समझ में नहीं आई। मैंने तनिक झल्ला कर कहा - ‘मैंने पहले ही कहा है, साफ-साफ बात करो। मुझे घुमा फिरा कर बात करना पसन्द नहीं।’ मेरे तेवर देख दोनों असहज हो गए। एक बोला - “वो! सा’ब! ऐसा है कि व्यवस्था में राई बराबर भी कमी हो जाए तो ये पण्डित माथे आ जाते हैं। आँखें दिखाने लगते हैं। कहते हैं - ‘हम अपना काम छोड़ कर आते हैं। धरम का काम है। समिति से एक पाई भी नहीं लेते हैं। तुम्हें केवल व्यवस्था करनी है। तुमसे वो भी नहीं होती? फिर तुम्हारी समिति किस काम की? फोकट में वाहवाही लूटते हो।’ मैंने पूछा - ‘क्या सच्ची में समिति उन्हें दक्षिणा नहीं देती?’ वे बोले - ‘हाँ सा’ब। वो लोग समिति से कोई दक्षिणा नहीं लेते।’ मैंने पूछा - ‘तो फिर झगड़ा किस बात का? सही तो कहते हैं वो! तुम लोगों को बुरा क्यों लगता है?’ वे मानो मेरे इसी सवाल की राह देख रहे थे। फौरन बोले - ‘येई तो वो बात है सा’ब जो बताने आए हैं। वो समिति से दक्षिणा नहीं लेते लेकिन हर एक पण्डित एक हजार रुपये रोज से कम नहीं उठाता। फिर भी हमें आँखें दिखाते हैं। हम कुछ भी कहते हैं तो वही, ‘हम अपना काम छोड़ कर फोकट में धरम का काम करने आते हैं।’ की बात सुनाते हैं।”

उनकी बात मेरे सर के ऊपर से निकल गई। मेरी शकल देख कर एक बोला - ’वो ऐसा है सा’ब कि मेले में दूर-दूर से तो धार्मिक-दानी लोग आते ही हैं, आसपास के गाँवों के लोग टुल्लर के टुल्लर आते हैं। ये आनेवाले यज्ञ को तो भेंट चढ़ाते ही हैं, अपनी-अपनी हैसियत से यज्ञ करानेवाले सारे पण्डितों को भी दान-दक्षिणा देते हैं। सौ-सौ रुपये देनेवाले तो दिन में पाँच-सात आ ही जाते हैं। इसके अलावा कभी कोई धोतियाँ दे जाता है तो कोई शालें दे जाता है। कभी कोई कुर्तों का कपड़ा दे जाता है। कभी मौसमी फलों की थैलियाँ तो कभी मिठाई के डब्बे। एक साल एक आदमी चाँदी के सिक्के दे गया था। इन पण्डितों को ये चीजें और दक्षिणा नजर नहीं आतीं। हमने एक बार कहा भी कि यदि फोकट में ही धरम सेवा कर रहे हो तो ये दान-दक्षिणा भी मत लो। समिति को दे दो। हमने जैसे ही कहा तो वे गुर्रा कर लाल-लाल आँखें दिखाने लगे। कहने लगे कि यह समिति ने थोड़ी ही दिया है! यह तो श्रद्धालु भक्त दे जाते हैं। इसका समिति से क्या लेना-देना?’ 

दोनों की बातों से लग रहा था कि तकनीकी रूप से पण्डित सही थे और व्यावहारिक रूप से ये दोनों सही थे। लेकिन मैं फिर भी समझ नहीं पाया कि वे मुझसे क्या चाहते थे। मैंने अपनी उलझन बताई तो उन्होंने अपने वाद का मुद्दा पेश किया - ‘वो! ऐसा है सा’ब कि उन पण्डितों को हमें ही झेलना पड़ता है। वे हमारी टप्पल में टींचे मारते हैं। हमें इस तरह सुनाते हैं जैसे वे हमारे खानदान पर एहसान कर रहे हों। हम इनके तानों से आजीज आ गए सा’ब। हम इसीसे मुक्ति चाहते हैं।’ मुझे अचरज हुआ। कहा - ‘समितिवालों से क्यों नहीं कहते? उनसे कहो। वे जरूर कोई रास्ता निकालेंगे।’ जवाब आया - ‘समितिवाले तो सा’ब ऐन टेम पर ही आते हैं और हार-फूल करके चले जाते हैं। हम कहते हैं तो सुनते नहीं।’ उनकी आँखों से लग रहा था कि वे सच ही बोल रहे थे। मैंने कहा - ‘एक काम करो। इन पण्डितों को मिलनेवाले फायदे रतलाम के दस-बीस दूसरे पण्डितों को गिनवाओ और उनसे कहो कि अगली बार वे सबके सब समिति से कहें कि वे भी समिति से बिना किसी दान-दक्षिणा के धरम की सेवा करना चाहते हैं। इसके साथ ही साथ समितिवालों को भी बराबर वास्तविकता बताते रहना। मुझे लगता है कि यदि तुम ईमानदारी से मेहनत करोगे तो तुम्हारा काम हो जाएगा।’

दोनों खुश हो गए। एक बोला - ‘अरे सा’ब! ये बात हमारे दिमाग में क्यों नहीं आई। आपके यहाँ से निकलते ही हम तो इसी काम पर लग जाएँगे। पण्डित बदलें या न बदलें लेकिन इन ग्यारह बिच्छू पण्डितों की बोलती जरूर बन्द हो जाएगी।’

इस बीच चाय आ ही चुकी थी और वे पी ही चुके थे। वे जाने लगे तो मैंने कहा -‘लेकिन अगली बार जब यज्ञ हो तो मुझे बताना जरूर कि क्या हुआ। नहीं बताओगे तो ये सारी बातें तुम्हारा नाम लेकर सबको बता दूँगा।’

इस बार वे डरे नहीं। जोर से हँसे और कोहनियों तक हाथ जोड़, कर चले गए।
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पूजा कर्मठता की, पद की नहीं


बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - दूसरा हिस्सा

खेतों में इस समय यहाँ मक्का की फसल खड़ी है। मेरी-तेरी छाती बराबर ऊँची फसल होगी। कच्ची मक्का यहाँ सूअरों की खिलाई जाती है। उनके खाने से जो बच जाती है वह सूखने पर घर आती है और फिर उसे विशेष तौर पर भून कर नमकीन बनाकर काजूनुमा फूलों की तरह खाया जाता है या फिर सलाइयों जैसे मुरमुरे लम्बे बिस्कुट बनाकर चाय काफी और शराब के साथ सेवन किया जाता है।

पशुओं में अभी तक कुत्तेे, बिल्ली, सुअर, घोड़े और गायें ही हमें यहाँ देखने को मिली। गायें यहाँ सफेद या लाल नहीं होतीं। वे काली, कबरी, कजरी और कपिला होती हैं। सींग  छोटे, सामने की ओर और पैने। एक भी गाय दुबली या मरियल नहीं देखी। खूब दूध देती है। थन भरे और फटते से दिखाई पड़ते हैं। दूध उतना ही स्वस्थ और नीरोग। मैं साँझ सवेरे डटकर दूध पीता हूँ। 24 अगस्त की शाम को डाक्टर संघई साहब की मशीन पर 67 किलो तुलकर बस में बैठा था। कल शाम को यहाँ तुला तो 69 किलो उतरा हूँ। कुल 19 दिन की खुराक, भ्रमण और आत्म सन्तोष का यह पुरुस्कार मिला। शाकाहारी भोजन यद्यपि इतना रुचिकर नहीं होता, तो भी इतना पुष्ट होता है कि जिस समय हमारी शिष्ट मण्डल यहाँ पहिले दिन खाना खाने बैठा था तब शाकाहारी के नाम पर हम कुल तीन व्यक्ति थे। पर आज? 15 में से 9 शाकाहारी टेबल पर बैठते हैं। मजा तब आता है जब कि अण्डा शाकाहारियों को भी परोस दिया जाता है। हम केवल दो व्यक्ति हैं जो अण्डा भी नहीं खाते। सारी प्लेटें फिर से लगाई जाती हैं। अण्डे की सामग्री हटाई जाती है। शाकाहारियों को उबली सब्जियाँ और ब्रेड, मक्खन आदि मिलता है। दूध, दही खूब खाओ। सामिष लोग यहाँ के मांस से ऊब गये। मछली, मुर्गी तो खाते ही हैं यहाँ ‘बीफ’, जिसे गौमांस कहते हैं खूब खाया जाता है। जब खाना शुरु होता है तब आनन्द यह आता है कि शाकाहारी लोग तो सामिष भोजन की चर्चा करते हैं और सामिष लेने वाले शाकाहारी भोजन की बातें करते पाये जाते हैं। व्यवस्थापकों सहित यह दल  कोई 22 लोगों का है पर इन 22 ही लोगों को होटल में एक ही कन्या बिना किसी हड़बड़ी और तनाव के हँसते-मुस्कुराते आराम से खाना खिला देती है। इन कन्याओं की संख्या कभी तीन से अधिक नहीं बढ़ी। शराब भी ये ही प्रस्तुत करती हैं।

इन 22 लोगों में हमारी बस का ड्रायवर भी शामिल है। कितना अच्छा लगता है जब नाश्ता करते समय और खाना खाते समय तथा घूमते, देखते समय ड्रायवर भी साथ ही खाता-पीता और बैठता है। व्यवस्थापक दल में दो तो दुभाषिये हैं। एक श्री क्लोफर, मूलतः आस्ट्रियन। खूब हँसोड़ और विनोदी। जी. डी. आर. के ट्रांसलेशन ब्यूरो में चीफ ट्रांसलेटर हैं। अनुवाद इतना सजीव और विनोदपूर्ण करते हैं कि सुनने वाले बाग-बाग हो जाते हैं। दूसरी हैं श्रीमती ईरीज कोबा। कल तक हम उसे कुमारी समझते थे। वह श्रीमती निकली। नई-नई अनुवादिका है। सीख रही है। फिर है
श्रीमती रुथ के साथ दादा। चित्र भोजन के समय का है। श्रीमती रुथ ने मनुहार की 'कोनिया लीजिए।'
दादा ने जवाब दिया - 'धन्‍यवाद। मैं शराब नहीं पीता।' कोनिया वहां की स्‍थानीय शराब है।

व्यवस्थापिका श्रीमती रुथ और श्रीमती ईमी। गये पत्र में मैं श्रीमती ईमी को श्रीमती एन लिख गया था। डॉ. गुन्थर अगली व्यवस्था के लिए बर्लिन चले गये हैं। और प्रथम मानो या अन्तिम सदस्य है हमारा ड्रायवर। इस देश में काम और कर्मठता की पूजा होती है। पदों की नहीं। डॉ. गुन्थर इस दल के सर्वोच्च आफिसर हैं पर हम लोग बड़े से बड़े पदासीन लोगों से मिले तब भी हमारा ड्रायवर साथ था। आज इस काउन्टी के उपाध्यक्ष की बराबरी में उनका व हमारा ड्रायवर इत्मीनान से खाना खा रहा था। मनुष्य यहाँ समानता का व्यवहार पाते हैं और करते हैं। यदि तनख्वाह से ही मामला जाँचा जाय तो हमारे बस ड्रायवर की तनख्वाह है 650 मार्क याने 2600 भारतीय रुपये। सामान्य जीवन में यह देश व्यक्ति को पद से नहीं नापता।

ए! हुण! कमलापति फिनिश......

दादा श्री बालकवि बैरागी के निधन के बाद शोक प्रकट
करने के लिए आनेवालों का ताँता सुबह से रात तक लगा रहता था। दिन में देहातों के लोग अधिक आते तो सूरज ढलने के बाद स्थानीय लोग। इनमें से कुछ प्रतिदिन आते। ऐसे आनेवालों में हम परिजनों के बाल सखा, कक्षापाठी, पारिवारिक स्तर पर अन्तरंग लोग देर रात तक बैठते। तब, शोक के बीच हास-परिहास भी जगह बना लेता था।

ऐसा ही एक प्रसंग गोर्की, मेरे छोटे भतीजे ने सुनाया। उसने अपनी ओर से आगे रहकर नहीं, रामप्रसाद कसेरा से गपियाते हुए अचानक ही सुनाया।

मुझे नहीं पता कि रामप्रसाद कसेरा और गोर्की सहपाठी हैं या नहीं। लेकिन यह पता है कि दोनों अच्छे मित्र हैं। गोर्की जब भी मनासा आता है तो रामप्रसाद उससे यत्नपूर्वक मिलता है। 

घटना के समय रामप्रसाद मनासा ब्लॉक काँग्रेसाध्यक्ष था। तब हमारा मकान कस्बे के बाहर, खेत पर नहीं, कस्बे में ही, पुरबिया गली, भाटखेड़ी रास्ते पर हुआ करता था। वहाँ, रास्ते आते-जाते आसानी से आया जा सकता था। ब्लॉक काँग्रेसाध्यक्ष होने के कारण रामप्रसाद प्रायः ही घर पर आता रहता था।

एक दिन दादा को अपराह्न तीन बजे की बस से बाहर जाना था। अचानक ही खबर आई कि काँग्रेस नेता, श्री कमलापति त्रिपाठी का निधन हो गया है। दादा ने जाने से पहले शोक सभा करने का विचार किया और रामप्रसाद से कहा - ‘मुझे तीन बजे की बस से जाना है। उससे पहले शोक सभा हो सकती है?’ रामप्रसाद ने कहा - ‘क्यों नहीं हो सकती? हो जाएगी।’ तय हुआ कि दोपहर ढाई बजे, अन्नपूर्णा मन्दिर पर शोक सभा होगी।

तब आज जैसी मोबाइल और वाट्स एप की सुविधा तो थी नहीं। लेण्ड लाइन फोन भी बहुत कम थे। एक-एक के पास जाकर खबर करनी पड़ती थी। वक्त कम था और काम बड़ा। सो, फैसला होते ही रामप्रसाद, हमारे घर से ही चल पड़ा, लोगों को खबर करने के लिए। अपने स्कूटर पर।

कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा लोगों को खबर करना किसी चुनौती से कम नहीं था। रामप्रसाद ने अपना तरीका निकाला। दुकान के सामने, एंजिन बन्द किए बिना स्कूटर रोका। जब तक दुकान में बैठा कार्यकर्ता रामप्रसाद की ओर न देख ले तक तक रामप्रसाद बराबर हार्न बजाए। कार्यकर्ता की नजर पड़ते ही रामप्रसाद ने, सड़क पर खड़े-खड़े, खुले गले से सूत्र-सन्देश की हाँक लगाई - ‘ए! हुण। कमलापति फिनिश। दादा ने क्यो। अन्नपूर्णा। ढाई वजाँ।’ याने ‘ए! सुन! कमलापतिजी का निधन हो गया है। दादा ने कहा है कि अन्नपूर्णा मन्दिर पर ढाई बजे शोक सभा रखी है। आना है।’ कह कर, सुननेवाले की प्रतिक्रिया से बेपरवाह रामप्रसाद यह जा, वह जा।

अधिकांश लोगों ने रामप्रसाद की इस सूचना-शैली पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ ‘जूने-पुराने’ लोगों को अच्छा नहीं लगा - “ये कौन सा तरीका है शोक सभा की खबर देने का। मरनेवाले को तो वैसे भी आदर से याद किया जाता है। फिर कमलापतिजी तो अपने राष्ट्रीय नेता रहे हैं! उन्हें बिना मान-सम्मान के ‘कमलापति’ कहना? कम से कम ‘कमलापतिजी’ तो कहना चाहिए!” लेकिन वे कहते किससे? रामप्रसाद तो हवा का झोंका बना कस्बे में घूम रहा था। सो, ऐसे झुंझलाए तमाम ‘जूने-पुराने’ मन मसोस कर रह गए।

रामप्रसाद की मेहनत फलीभूत हुई और शोक सभा, कमलापतिजी की प्रतिष्ठा के अनुरूप  ‘ढंग-ढांग’ से सम्पन्न गई। सभा के बाद इन ‘जूने पुरानों’ ने दादा से शिकायत की - ‘पता है रामप्रसाद ने क्या किया? ये भी कोई तरीका है?’ दादा ने सबको आश्वस्त किया कि वे रामप्रसाद से पूछेंगे और उसे समझाएँगे। दादा चले गए। लेकिन बात आई-गई नहीं हुई।

अवसर मिलते ही दादा ने पूछा - ‘भई! रामप्रसाद! ये तुमने शोक सभा की खबर कैसे दी? ऐसा क्यों किया भई?’ हनुमान की तरह नतमस्तक, विनयावनत मुद्रा में रामप्रसाद ने जवाब दिया - ‘अशो हे दादा! के आपने तीन वजाँ जाणो थो। अबे मूँ एक-एक की दुकान पर स्कूटर बन्द करी ने, सड़क पर ऊबो करीने, दुकान में जईने पूरी वात हमजातो। केतो के भई आपणा कमलापतिजी त्रिपाठी मरी ग्या। वणा की शोक सभा हे। ढाई वजाँ। थने आण्ो हे। ने ऊ पूछी लेतो के ई कमलापति कूण हे? तो वणीने पूरी वात हमजाणी पड़ती। अणी तराँ ती खबर करतो दादा! तो तीन तो यूँ ईज वजी जाती ने तीन मनक नी पोंचता सभा में! अबे आप ई वताओ! अशो नी करतो तो कई करतो?’ (ऐसा है दादा कि आपको तीन बजे जाना था। यदि मैं एक-एक दुकान पर स्कूटर बन्द कर, सड़क पर खड़ा कर, दुकान में जाकर पूरी बात समझाता। कहता कि अपने कमलापतिजी त्रिपाठी का स्वर्गवास हो गया है। ढाई बजे उनकी शोक सभा है। तुझे आना है। यदि वह पूछ लेता कि कमलापतिजी कौन हैं? तो उसे पूरी बात समझानी पड़ती। यदि इस तरह खबर करता न दादा! तो, तीन तो यूँ ही बज जाती और शोक सभा में तीन लोग नहीं पहुँचते। अब आप ही बताओ! मैं ऐसा न करता तो क्या करता?)

रामप्रसाद के लाजवाब जवाब ने दादा को बेजवाब कर दिया। वे मुस्कुरा कर रह गए - ‘ठीक किया रामप्रसाद।’ 

दादा की प्रतिक्रिया जानकर रामप्रसाद  खुश हो गया और जाने की अनुमति माँगी - ‘तो! दादा! म्हारे खिलाफ कम्पलेण्ट फिनिश? मूँ जऊँ?’ (तो! दादा! मेरे विरुद्ध शिकायत समाप्त? मैं जाऊँ?)

दादा की हँसी चल गई। हँसते-हँसते ही बोले - ‘हाँ। फिनिश। तू जा।’ 

और रामप्रसाद पूर्वानुसार ही, हनुमान की तरह, विनयावनत मुद्रा में प्रस्थान कर गया।
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भिखारी एक, शर्मिन्दा पूरा जी. डी. आर.


बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - पहला हिस्सा

रोस्तोक से
12-9-76
शाम 6 बजे
भारतीय समय रात्रि 10.30

प्रिय बब्बू,

प्रसन्न रहो,

इस आशा से यह लम्बा पत्र फिर लिख रहा हूँ कि मेरा पूर्व पत्र मिल गया होगा और लगता होगा कि पत्र अधूरा है। मैं नहीं जानता कि तुम लोग मेरे उस पत्र का कैसा और क्या उपयोग करने का सोच रहे होगे। खैर,

वह पत्र लिखते-लिखते एक दिलचस्प घटना घट गई। श्री के. एन. सेठ जिनका कि आने की हम लोग उम्मीद छोड़ बैठे थे वे अनायास आ गये। दिल्ली से मास्को और फिर मास्को से बर्लिन, उनकी अकेले की यात्रा कम दिलचस्प नहीं रही। पर वे स्वयम् एक जागरुक पत्रकार हैं सो उनकी यात्रा पर वे खुद लिखेंगे। ज्यों ही होटल में हम लोगों को पता चला कि श्री सेठ दिल्ली से रोस्तोक पहुँच गये हैं, हर कमरे से प्रतिनिधि भाग कर उनके कमरे में जा पहुँचे। उन्हें घेर लिया। भारत के ताजा समाचार वे ही हमें दे सकते थे। वे हमारे तीन-चार दिन बाद भारत से चले थे। यद्यपि बी. बी. सी. का समाचार बुलेटिन हमारे लोग सुन लेते थे तो भी मात्र एक दिन पूर्व के समाचार उनसे ही मिलने की प्रामाणिक उम्मीद थी। पर श्री सेठ ने हम सबको निराश किया। वे न तो समाचार लाये न पुराने समाचार-पत्र ही। भारत में सब कुछ यथावत है। कोई विशेष गर्म हवा उधर नहीं चली। निराशा के साथ ही साथ तसल्ली भी मिली। यहाँ न तो हिन्दी अखबार आते हैं न अंग्रेजी। हाँ, लन्दन से निकलने वाला अंग्रेजी अखबार मार्निंग स्टार (Morning Star) जरूर आता है। पर वह मूलतः भारत विरोधी अखबार है। किसी की दिलचस्पी उसमें नहीं थी। मेरे पास तो केवल 5-9 से 11-9 तक का ‘धर्मयुग’ है जिसे मैं पचासों बार तरह-तरह से पढ़ चुका हूँ।

अंग्रेजी को किसी तरह का प्रोत्साहन यह देश नहीं देता है। अंग्रेजी सारे यूरोप में अपाहिज और अमान्य भाषा है। यदि दुभाषिया नहीं हो तो यहाँ अंग्रेजी किसी काम नहीं आये। अपनी भाषा जर्मन के लिये इस देश की आसक्ति हम हिन्दी वालों के लिये ईर्ष्या की बात है। मैंने कहा न! अंग्रेजी यहाँ पहले पंगु है फिर अनाथ।

जर्मनी में भिखारी?
श्री सेठ के आगमन से भी अधिक दिलचस्प रही दूसरी घटना। इस घटना ने हमें मनुष्य की कमजोरियों का आश्वासन दिलवा दिया। हुआ यह कि बड़ी सुबह कोई 7.30 या 8 बजे मैं होटल के ठीक बाहर अपनी डाक डालने के लिये पोस्ट के डिब्बे का ढक्कन टटोल रहा था कि एक जर्मन भिखारी मेरे सामने खड़ा हो गया। पाँच फिनिक्स का सिक्का दिखा-दिखा कर वह हाथ फैला रहा था। यह समूचे संसार के लिये एक अविश्वस्त समाचार है पर है बिलकुल
मूलचन्‍दजी गुप्‍ता और दादा
सच। मैंने तत्काल श्री मूलचन्द गुप्ता को बुलाकर उस भिखारी से उनकी भेंट करवा दी। हमने किसी ने उसे भेंट या भीख नहीं दी पर मेरा मन करता है हो न हो वह भिखारी इस देश का निवासी नहीं रहा होगा। पर फिर बाहरी आदमी 
यहाँ क्यों कर भीख माँगेगा? आनन्द तब आया जब वह मुझसे पाँच फिनिक्स के लिये आजिजी करने लगा। मुझे अपने बीते दिन याद गये। मेरी हँसी भी चल गई। एक भिखारी से दूसरा भिखारी माँग रहा है! वह भी जी. डी. आर. जैसे समाजवादी देश में! वाह रे भाग्य? भीख से यहाँ भी पीछा नहीं छूटा। अपने जैसे हर जगह भगवान मिला देता है। पर उस समय सारे होटल में कुहराम मच गया जब हमारे व्यवस्थापकों को इस बात का पता चला। किस बुरी तरह उस भिखारी की ढूँढ मची कि मैं कह नहीं सकता। ईश्वर जाने उसका क्या भविष्य हुआ होगा। राम जाने वह कहाँ होगा। पर हम लोगों से क्षमा माँगते-माँगते हमारे व्यवस्थाकों की जबान घिस गई है।

कल दोपहर के भोजन के बाद हम लोग रोस्तोक काउण्टी छोड़ देंगे। दो  रातें रास्ते के किसी मोटल में बिताकर 15-9 की सुबह बर्लिन पहुँच जायेंगे। पूरे आठ दिन इस प्रान्तर में बहुत अध्ययन मनन के काटे। खाने वालों ने खूब खाया। मैंने खूब लिखा पर सबसे ज्यादह बाजी मार ले गये पीने वाले। रूसी शराब, जिसे वोदका कहते हैं, यारों ने खूब पी। यहाँ की स्थानीय शराब कोनिया भी पट्ठों ने खूूब गटकी। कोनिया बमुकाबले वोदका कुछ कम नशीली होती है। पर नशा आखिर नशा तो है ही।

अब पता चला कि हमारी यह यात्रा जून 1976 में क्यों नहीं हो पाई? चक्कर यह चला कि एक साथ एक होटल में कहीं भी 25 बिस्तर या 16 कमरे नहीं मिल सके। मार्च में हम लोगों के लिये कमरों की तलाश शुरु हुई। कमरे मिल पाये सितम्बर के लिए। वे भी आठ दिन एक जगह और आठ दिन दूसरी जगह। 6 माह  पूर्व कमरों का आरक्षण यहाँ सामान्य बात है। जिस समय मनासा में यह समाचार आया कि हमारी यात्रा जून के बदले सितम्बर में होगी तो तुझे पता होगा, मेरे ईर्ष्यालु फूहड़ आलोचकों ने कितनी फब्तियाँ कसी थीं। वे लोग कितना कूदे थे। राम जाने यह सब पढ़कर उन पर क्या बीत रही होगी क्योंकि मैं यह सारी राम कहानी उसी देश से लिख रहा हूँ। इतना ही नहीं इस देश की यात्रा मारिशस से और जुड़ गई। याने एक के बदले दो देश जाना पड़ा। ईश्वर कितना सटीक उत्तर देता है!


उसने यह तैयारी खुद ही की होगी

अब जो मैं लिखने जा रहा हूँ, उसकी कोई प्रासंगिकता या सन्दर्भ नहीं है। कोई कारण भी नहीं है कि मैं यह सब लिखूँ। लेकिन कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि न चाहते हुए भी लिखना पड़ जाता है। जबरन। नहीं जानता कि क्यों लिख रहा हूँ। लेकिन लिख रहा हूँ क्योंकि बिना लिखे रहा नहीं जा रहा। 

धीमी गति से, निरन्तर हो रहे बदलाव सामान्यतः अनदेखे ही रह जाते हैं। उनके बारे में हमें अपने आसपास से जानकारी मिलती है तो हम चौंक जाते हैं - ‘अरे हाँ! ऐसा हुआ तो है। लेकिन कब, कैसे हो गया? पता ही नहीं चला!’ कुछ ऐसी ही दशा होती है हमारी। 

किन्तु नरेश में धीमी गति से आया यह बदलाव मुझे बराबर नजर आता रहा। लेकिन मेरा ‘पत्रकार’ सदैव सन्देही बना रहता है। किसी भी बात पर मुझे फौरन ही विश्वास नहीं करने देता। लेकिन कोई दो बरस से मैं नरेश को ध्यानपूर्वक देख रहा हूँ और अब विश्वास कर पा रहा हूँ कि उसमें स्वभावगत बदलाव आया है और ऐसा बदलाव आया जो आनन्ददायी, सुखकारी है।

नरेश के बारे में, उससे मेरे नाते-रिश्ते के बारे में मैं पहले बता चुका हूँ। यह भी बता चुका हूँ कि वह स्वभाव से ही सेवाभावी है। लेकिन कुछ बरस पहले तक वह अपनी उलझनों के कारण ‘जी भर सेवाभावी’ नहीं था। उसके, अपनी किस्म के संघर्ष थे। तब, धनोपार्जन उसका प्रमुख लक्ष्य अनुभव होता था। थक कर बैठने की सुविधा उसे कभी मिली नहीं। इसलिए वह थकता कभी नहीं था। रुकता तभी था जब आगे बढ़ने के लिए रुकना जरूरी हो। जब भी बात करो, व्यापारिक व्यस्तताओं की एक असमाप्त सूची सदैव उसकी जबान पर बनी रहती थी। ऐसे में तब, वह अपनी सुविधा से ही किसी की सेवा कर पाता था।

लेकिन गए दो-तीन बरस से नरेश में अनूठा बदलाव मैं साफ देख रहा हूँ। पहले वह ‘कमाई’ के लिए मेहनत करता था। अब ‘पुरुषार्थ’ के निमित्त काम करता नजर आता है। अब उसकी बातों में भाव-ताव, मार्जीन, मुनाफा जैसे शब्द गुम हो गए हैं। अब वह केवल काम करने के लिए काम करता नजर आता है। बस! अपना काम करो, बाकी बातों की छुट्टी। कितना, क्या मिलेगा, यह जानने, गिनने की जिज्ञासा अब मुझे नरेश में नजर नहीं आती।

एक बात मैं तेजी से अनुभव कर रहा हूँ। उसका ‘सेवा भाव’ अब एक कदम आगे बढ़कर ‘सहयोग भाव’ में बदल रहा है। और सहयोग भी कुछ इस तरह जो सामनेवाले को ‘लाभदायक’ हो। प्रत्येक सुपात्र उसके ‘लाभदायक सहयोग’ का ‘लाभिती’ होता है। नरेश उसकी चिन्ता तब तक करता है जब तक कि उसकी चिन्ता से खुद मुक्त न हो जाए।

मेरे आसपास के लोगों में ऐसा बदलाव मुझे पहली बार अनुभव हो रहा है। आदमी में ऐसा बदलाव तब ही आ पाता है जब वह दूसरों के कष्टों, अभावों को अनुभव करे। अपने विकट संघर्ष से नरेश ने जीवन की प्रतिकूलताओं को परास्त किया और आर्थिक अभावों को बिदाई दी। सुखपूर्वक जीवन जीते हुए आदमी को अपना अतीत नजर आने लगता है। तब उसे, जमाने की तकलीफें अपनी तकलीफें लगने लगती हैं। तकलीफों का यह तादात्म्य आदमी को करुणा से सराबोर कर तमाम तकलीफजदा लोगों से जोड़ देता है। मैं अनुममान लगा रहा हूँ, शायद ऐसा ही कुछ, किसी क्षण नरेश के साथ हुआ होगा। और घर में अकेले बैठे-बैठे ही वह दुनिया से जुड़ गया। 

कभी, किसी से सुना था (शायद अपने ब्लॉग पर लिखा भी हो) कि लक्ष्मी की तीन स्थितियाँ होती हैं - दान, भोग और नाश। आपके पास यदि अपनी आवश्यकताओं से अधिक धन हो तो ‘दान’ उसके उपयोग की सर्वोत्कृष्ट स्थिति है। लेकिन यदि दान करने को जी न करे, मन में आए कि न दिन को दिन समझा न रात को रात। सर्दी-गर्मी-बरसात नहीं देखी। बैल की तरह जुट कर धन कमाया। ऐसे धन को भला किसी को दान कैसे कर दूँ? तब उत्कृष्ट स्थिति होती है कि आदमी उसे खुद पर खर्च कर ले, उसका उपभोग कर ले। लेकिन यदि न दान किया न ही उपभोग तो उसकी तीसरी और अपरिहार्य स्थिति होती है - नाश। चोरी चला जाएगा, आग लग जाएगी, नोटों को दीमक लग जाएगी, उधारी डूब जाएगी आदि-आदि। कभी-कभी मुझे लगता है, कहीं नरेश ने लक्ष्मी की यह व्याख्या तो नहीं सुन ली?
  
वास्तविकता या तो नरेश जाने या फिर ईश्वर लेकिन ऐसे बदलाव मुझे आदमी के पुनर्जन्म जैसे लगते हैं - एक नया जीवन, एक नया जीव, एक नया आदमी, एक बेहतर आदमी। 

मैं कहने का साहस नहीं जुटा पा रहा कि ‘काश! ऐसा मेरे साथ हुआ होता।’ क्योंकि ऐसा तब ही होता है जब आदमी खुद ऐसा होने के लिए तैयार हो।

सुनता रहा हूँ कि अपनी इच्‍छाओं की पूर्ति हेतु ईश्‍वर सुपात्रों का चयन करता है। लेकिन निस्‍सन्‍देह  नरेश ने यह तैयारी खुद ही की होगी।
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खिलाड़ी, मजदूर, आबादी, जनमत और जन प्रासाद



बर्लिन से बब्‍बू को
पहला पत्र - छठवाँ/अन्तिम हिस्सा


खिलाड़ियों पर यह देश बहुत ध्यान देता है। आज से 25 वर्ष पूर्व जब इस देश ने खेलकूद पर पैसा खर्च करना शुरु किया तो पश्चिम ने इसकी बहुत आलोचना की। वैसे ही जैसी कि हमारी अणु नीति पर की गई है। पर यह देश अपने खिलाड़ियों को अवसर देता रहा। परिणाम ओलम्पिक (माण्ट्रियल) की पदक तालिका पर अमिट है। जब मैंने कुछ ओलम्पिक खिलाड़ियों से भेंट करने की इच्छा प्रकट की तो मुझे बताया गया कि हमारे खिलाड़ी अभी थकान उतार रहे हैं, आराम कर रहे हैं। हम उन्हें किसी तरह की बाधा नहीं पहुँचायें, कृपा होगी।

यहाँ के मजदूर की समस्या आज न रोटी है न कपड़ा। और मकान, शिक्षा या चिकित्सा तो है ही नहीं। उसकी समस्या अब है टेलिविजन, कपड़े धोने की मशीन और रेफ्रीजरेटर। सन 1980 तक यह सब हर वर्कर को प्राप्त हो जायेगा ऐसा वादा अगले प्लान में आ रहा है।

रिहायशी मकानों की समस्या को इस देश ने जिस तरह हल किया है उसका मुकाबला इतिहास में नहीं है। 1945 में यह सारा देश राख और मलबे का ढेर मात्र था। आज शहरों के आसपास ऊँची-ऊँची आवासीय बस्तियों के इन्द्रलोक बस गये हैं। 20 हजार से कम आबादी वाला कोई उपनगर नहीं बसाया गया। हर उपनगर में हर सुविधा प्रदान की गई। एक कमरे का फ्लैट, दो कमरों का फ्लैट और फिर तीन, चार और पाँच कमरों के फ्लैट।

साफ सफाई की बात क्या पूछिये! सड़कें, गलियाँ, घर, आँगन, बाग-बगीचे और गलियारे, बाथरूम, सब मन्दिरों की तरह साफ और सजे हुए। मकानों के रंग बिलकुल सादे। कोई रंगीनी पुताई में नहीं। सड़कें, फुटपाथ फूलों, पौधों से लहलहाते। जगह-जगह कचरा पेटियाँ और चलती फिरती कचरा बटोरने वाली ट्रालियाँ। गन्दगी से कोई रिश्ता नहीं।

पीने के पानी का कोई नल मीलों तक नहीं। पानी पीना हो तो बाथरूम में जाओ और नल चला कर पानी पियो। होटलों में पानी नहीं दिया जाता। न कहीं सार्वजनिक मूत्रालय, न शौचालय। हर आदमी मानो कहीं जरूरी काम से भागा जा रहा हो। धीरे चलने का कोई कारण नहीं। सबको न जाने कौन-सी जल्दी पड़ी है। कोई किसी की न तो सुनता है न कहता है।

जनमत और जन प्रासाद
साम्राज्यवाद, अमेरिका, प्रतिक्रियावाद, नाजीवाद, फासिस्ट, हिटलर, सम्प्रदायवाद, रंगभेद ये ऐसे शब्द हैं जिन्हें पूरी नफरत के साथ बोला जाता है। पूँजीवाद माँ-बहिन जैसी गाली के अर्थ में प्रयुक्त होता है। जबकि शान्ति, अमन, भाईचारा, समाजवाद, साम्यवाद, मित्रता, कॉमरेड, संघर्ष, मुक्ति, मानवता, समानता ऐसे शब्द हैं, जिन्हें बोलते समय गर्व और प्रगति का अनुभव किया जाता है। गाँंधी, नेहरु, लेनिन, मार्क्स को आदर से बोला जाता है। इन्दिरा गाँधी और भारत के प्रति आत्मीय समादर व्यक्त होता है। भारतीयों को ये लोग पवित्र पूज्य और आदर्श मानते हैं। भारतीयों की कमजोरियों से खूब परिचित है यह देश। पर भारत ने गये 30 सालों में बिना किसी नो-हाऊ के जो तकनीकी तरक्की की है, वैज्ञानिक विकास किया है और समाजवाद को हृदय से स्वीकार किया है उसका लोहा यह देश खुलकर मानता है। हमारी यात्रा के ओर-छोर कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े हैं। अभी-अभी इस देश की 9वीं काँग्रेस सम्पन्न हुई है। जुलाई में इन्दिराजी का भव्य स्वागत इस देश ने किया। आगामी सत्रह अक्टूबर को यहाँ की संसद और काउण्टी कौंन्सिलों (प्रान्तीय-विधानसभाओं) के आम चुनाव हैं। माण्ट्रियल की अद्भुत विजय, माओ की मृत्यु, भारतीय हवाई जहाज का अपहरण वातावरण में अपना असर बनाये हुए हैं। किसी बात पर यहाँ वाले चुप हो जाते हैं तो किसी बात पर हम चुप्पी लगा जाते हैं। 

अद्भुत है यहाँ का संसद भवन जिसे पीपुल्स पैलेस कहा जाता है। मैंने इसे जन प्रासाद नाम दिया है। मात्र 32 महिनों में यह विशाल भवन आधुनिकतम तकनीक पर बना दिया गया। यह आश्चर्य की बात है। पूरा भवन तो हम लोग नहीं देख पाये पर इसका मात्र एक प्रेक्षागृह हमने देखा है। 5000 सीटों वाला यह सभागार दो तीन बटन दबाने मात्र से चाहे जिस आकार में बदल लिया जाता है। इसका मंच और कुर्सियाँ अपने आप कम ज्यादह हो जाते हैं। 12 भाषाओं में अनुवाद की व्यवस्था इस सभागार में है। पूरे संसद भवन में कहीं भी, एक भी, पर्दा नहीं लगाया गया है। सारी दीवारें स्टील और एल्यूमिनियम की हैं। ताम्रवर्णी पारदर्शी विशाल शीशे, धूप से रक्षा करते हैं और जीवन की हर सुविधा यहाँ उपलब्ध है। यह संसद भवन बर्लिन में है। संसद की बैठक वर्ष में चार या पाँच बार होती है और वह भी केवल एक-एक दिन के लिये। यहाँ की चुनाव पद्धति और कार्यप्रणाली पर पूरा लेख अलग से हो सकता है। कुल पाँच पार्टियाँ जनता में काम करती हैं पर विरोधी दल नाम की कोई चिड़िया इस देश में नहीं है। भ्रष्टाचार, लालफीता और वेश्यावृत्ति इस देश के लिए अपरिचित शब्द है। 

दूसरा पत्र तुझे जल्दी ही लिखूँगा। अभी इतना ही बस।

भाई, 

हाँ! सर! मैंने भी दिल खो दिया

यह तीस जून 2018 की शाम है। शाम के 6 बजनेवाले हैं। सुबह के अखबार अभी-अभी देखे और जी धक् से रह गया। उपाध्याय सर के उठावने का विज्ञापन नजर आया। उपाध्याय सर के उठावने की रस्म हुए एक घण्टा होने को आ रहा है। आजकल अखबार देखने को जी ही नहीं करता। इसीलिए अखबार अब देखे। सुबह ही देख लेता तो उतना दुःख तो नहीं ही होता जितना इस समय हो रहा है। कम से कम उठावने में तो शरीक हो जाता।

उपाध्याय सर याने श्री श्यामसुन्दरजी उपाध्याय। हम इन्हें इस नाम से नहीं जानते थे। हमारे लिए वे प्रोफेसर एस. आर. उपाध्याय थे। मूलतः देवास जिले के गाँव सतवास के रहनेवाले थे। इन्हें पहली बार 1965 में देखा था। रामपुरा कॉलेज में। वे वहाँ बॉटनी के प्रोफेसर थे। मैं बी. ए. का विद्यार्थी था। विषय और संकाय के लिहाज से मेरा, इनका कोई नाता नहीं था। लेकिन रामपुरा कॉलेज बहुत छोटा कॉलेज था। इस स्नातकोत्तर कॉलेज की, तीनों संकायों की छात्र संख्या ढाई सौ के आसपास थी। इससे अधिक छात्र संख्या तो, इन्दौर के किसी कॉलेज के एक विषय के, सभी सेक्शनों के पहले वर्ष के छात्रों की हो जाती होगी। इतनी कम छात्र संख्या की वजह से प्रत्येक प्रोफेसर, लगभग प्रत्येक विद्यार्थी को नाम से जानता-पहचानता था। लेकिन उपाध्यायजी से मेरे परिचय का यही एक कारण नहीं था।

उपाध्यायजी थे तो बॉटनी के प्रोफेसर लेकिन नाटक में उनकी भरपूर रुचि थी। गणित विभाग में थे प्रोफेसर जे. सी. मिश्रा। एकदम गंजे। बोलते बहुत कम थे लेकिन मोटे चश्मे से झाँकती उनकी बड़ी-बड़ी आँखें मानो हरदम बतियाती रहती थीं। वे भी नाटक-संगीत में खूब रुचि रखते थे। गाते भी बहुत अच्छा थे। आँखें मूँदकर, अपने आप में डूब कर वे जब सी. एच. आत्मा का गाया गीत ‘प्रीतम आन मिलो’ गाते थे तो लगता था साक्षात महादेव शान्त रस का पाठ कर रहे हों। मिश्राजी राजेन्द्रनगर (इन्दौर) में रहते थे। गए दिनों उनका भी निधन हो गया।

मुझे भी नाटकों और संगीत में रुचि थी। कॉलेज के वार्षिकोत्सव का भार मिश्राजी और उपाध्याय सर के जिम्मे रहता था। इसी कारण इनसे सम्पर्क बना और ऐसा बना कि उपाध्याय सर का घर मेरी सराय बन गया। मैं जब अपने छात्रावास में नहीं होता था तो फिर केवल उपाध्याय सर के यहीं होता था। मेरे घरवालों की तरह वे भी मुझे 'बब्‍बू' ही पुकारने लगे।

उपाध्याय सर से घरोपा इतना बढ़ा कि मेरी भाभीजी एक बार जब रामपुरा आईं तो उपाध्याय सर के यहीं रुकीं। एक बार उपाध्याय सर और ओम ठाकुर सर मेरे घर मनासा आए थे और रात रुके थे। ठाकुर सा’ब हमें हिन्दी पढ़ाते थे। वे मूलतः हैं तो सैलाना के लेकिन इन्दौर में (सुदामा नगर में) ही बस गए हैं। इन्दौर में उनकी गिनती हिन्दी साहित्यकारों की पहली पंक्ति में होती है। अभी 26 जून की शाम, श्री म. भा. हिन्दी साहित्य समिति द्वारा दादा श्री बालकवि बैरागी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में धर्मेन्द्र रावल के साथ ठाकुर सा’ब से भेंट हुई थी तो हम तीनों देर तक उपाध्याय सर की बातें करते रहे थे।

बॉटनी के प्रोफेसर और बी ए के विद्यार्थी का रिश्ता ऐसा रहा कि उपाध्याय सर की छोटी बहन कृष्णा के विवाह में शामिल होने के लिए मैं सतवास गया था। मैं अकेला नहीं था। जमनालाल (राठौर) के साथ गया था। जमनालाल और मैं कॉलेज में ‘जुगल-जोड़ी’ के रूप में पहचाने जाते थे।

उपाध्याय सर केवल मेरे ही नहीं, मुझ जैसे कुछ ‘बागड़बिल्लों’ के संरक्षक और पथप्रदर्शक थे। वे हमसे परेशान भी खूब रहते थे और हमें चाहते भी उतना ही थे। घरोपे के घनत्व का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वे जब हमे डाँटते तो मनोरमा भाभी हमें, सचमुच में अपने पीछे, अपनी ओट में लेकर, हमारा बचाव करते हुए उपाध्याय सर से झगड़ लिया करती थीं। उपाध्याय सर मन मसोस कर रह जाते और हम खुश होकर भाभी की चापलूसी में लग जाते। वे मखमली मिजाज के, बेहद सम्‍वेदनशील व्‍यक्ति थे।

एक बार कुछ लड़कों ने उपाध्याय सर के साथ बदतमीजी कर दी। वे मर्माहत हुए। कई दिनों तक दुखी रहे। इतने कि घोषणा कर दी - ‘मैं पप्पू को गुण्डा बनाऊँगा। वह एक-एक को निपटेगा।’ पप्पू उनका बेटा था-चार बहनों (अर्पिता, अर्चना, वन्‍दना और मंगला) का इकलौता भाई। बड़ा होकर पप्पू गुण्डा नहीं, कामयाब दन्त चिकित्सक बना। उसे डॉक्टर राघवेन्द्र उपाध्याय के नाम से पहचाना गया। इन्दौर में, टोरी कार्नर पर उसकी क्लीनिक थी। सर की चार बेटियों में से मुझे इस समय केवल उनकी बड़ी बेटी अर्पिता की याद है। वह हम सबकी ‘गुड्डी’ थी। बड़ी शान्त चित्त बच्ची थी वह। 

मुझे यह देख-देखकर मर्मान्तक दुःख और आश्चर्य होता रहा कि ईश्वर ने उपाध्याय सर जैसे सन्त, सात्विक, निष्कलुष, निश्छल, सर्वथा अहानिकारक आदमी को किस बात की, इतनी सजाएँ दीं? पहले तो उनसे हमारी भाभीजी को छीन लिया और फिर इकलौते बेटे राघवेन्द्र को। राघवेन्द्र का निधन इतना आकस्मिक, इस तरह हुआ कि जब मुझे खबर लगी तो लगा, मुझसे क्रूर मजाक किया जा रहा है। राघवेन्द्र उज्जैन में अपनी छोटी बहन का विवाह संस्कार निपटा कर लौटा ही था कि शायद एक सप्ताह के आसपास ही हृदयाघात से उसका अवसान हो गया। सर ने उसकी मृत्यु की खबर देनेवाला अन्तर्देशीय पत्र भेजा था तो देखकर, खोलने से पहले मुझे लगा था कि यह उज्जैन में, शादी में शामिल होने के लिए आभार-पत्र होगा। लेकिन मेरा दुर्भाग्य था कि वह पप्पू के निधन की सूचना थी।

पता नहीं ईश्वर उनसे इतना नाराज, कुपित क्यों रहा होगा? पप्पू के अवसान से पहले उपाध्याय सर अपनी ‘एक और सन्तान’ की जवान-मृत्यु का आघात झेल चुके थे। चूँकि इस ‘जवान मृत्यु’ की सूचना किसी को नहीं दी गई थी इसलिए इसकी आघात की जानकारी बहुत ही कम लोगों को रही होगी। 

यह 1965 से 1968 के कालखण्ड की ही बात है। उपाध्याय सर बताते रहते थे कि उनकी, बॉटनी की एक किताब आनेवाली है। उसके प्रूफ उनके पास डाक से आया करते थे। किताब इन्दौर में छप रही थी। उनका कोई जूनीयर साथी उस किताब का काम देख रहा था। कुछ महीनों बाद उन्होंने खुशी से चहकते-महकते खबर दी थी - ‘बब्बू! किताब छप गई है। कॉपी डाक से आ रही है।’ लेकिन डाक से कॉपी आई तो उपाध्याय सर की सारी खुशी हवा में उड़ गई। उनके उस जूनीयर साथी ने, उपाध्याय सर के साथ अपना नाम भी लेखक के रूप में दे दिया था। किताब देख कर उपाध्याय सर मुरझा गए थे। उस दिन कॉलेज नहीं जा पाए। उसके बाद हफ्तों तक अनमने रहे। पता नहीं, भाभी ने किस तरह उनकी उदासी हटाई।

उपाध्याय सर से मेरी अन्तिम मुलाकात 13 जनवरी 2017
को हुई थी। सुनील (बिरथरे) उनके बारे में मुझे बराबर खबर दिया करता था। उस दिन की मुलाकात का श्रेय भी सुनील को ही है। कनाड़िया रोड़ से आईपीएस एकेडमी के फार्मेसी विभाग तक की यात्रा मैंने एक स्कूटी से की थी। मैंने जब उनके पाँव छुए थे तो बहुत खुश भी हुए थे और विगलित भी। मेरे जाते ही मुझसे बात नहीं कर पाए थे। एक-डेड़ मिनिट बाद ही बोल पाए थे।

हम दोनों बड़ी देर तक रामपुरा को जीते रहे थे। आज के लोक-व्यवहार में आई कृत्रिमता (सिथेटिकनेस) से आहत थे। बड़ी पीड़ा से उन्होंने कहा था - ‘बब्बू! हमने दिमाग तो खूब पा लिए लेकिन दिल खो दिए।’ मैंने उस दिन उनके और सुनील के कुछ फोटू लिए थे। कहा था - ‘अपने ब्लॉग पर डालूँगा।’ लेकिन उपाध्याय सर वाला ब्लॉग लिखना हर बार टलता गया।

मैं जब भी इन्दौर पहुँचता हूँ तो इन्दौरी मित्रों के लिए बनाई गई ब्राडकास्ट लिस्ट पर खबर करता हूँ। 13 जनवरी 2017 के बाद मैंने जब-जब अपने इन्दौर पहुँचने की खबर की, तब-तब हर बार सुनील नाराज हुआ और उलाहना दिया - ‘अपनी इन्दौर यात्रा में आप अपने बुजुर्गों के लिए समय रखते हैं या नहीं?’ उसका इशारा उपाध्याय सर के लिए होता। मैं हँस कर रह जाता। सुनील को कैसे कहूँ कि मैं भी सत्तर पार कर चुका हूँ। बुजुर्ग की श्रेणी में आ गया हूँ। स्कूटर/स्कूटी पर इतनी लम्बी यात्रा करने में मुझे असुविधा होती है। लेकिन उपाध्याय सर की चिन्ता करते हुए सुनील मेरी इन हकीकतों की अनदेखी कर जाता।

आज जब उपाध्याय सर के उठावने का विज्ञापन देखा तो एक अपराध बोध मन में उभर आया। जो ब्लॉग जनवरी 2017 में, सर से मिलने के बाद आते ही लिख दिया जाना चाहिए था, वह आज लिख रहा हूँ। वह भी इसलिए कि अभी ही मुझे उपाध्याय सर के निधन की जानकारी हुई है। 

ब्लॉग तो लिखना ही था। लेकिन 2017 में लिख लेता तो उपाध्याय सर देख कर, पढ़ कर कितना खुश होते? इस खुशी से उनके चेहरे पर कितना उजास हो आता? उस उजास से मैं खुद कितना खुश होता? लेकिन अपनी यह खुशी तो मैंने ही खुद से छीन ली।

आपने सच कहा था सर! और लोगों की तरह आपके बब्बू नेे भी दिमाग पा लिया। दिल खो दिया।
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एक था कमाल कवि

दादा श्री बालकवि बैरागी को याद करते हुए, श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समित, इन्दौर ने 26 जून 2018 मंगलवार को, दादा पर केन्द्रित  दो आयोजन किए। पहले आयोजन में डॉ. श्री सरोज कुमार, श्री वेद प्रतापजी वैदिक और श्री सत्यनारायणजी सत्तन ने दादा से जुड़े अपने संस्मरण सुनाए। दूसरा आयोजन कवि सम्मेलन था जिसमें श्री सुरेन्द्र शर्मा, श्री सुल्तान मामा, श्री माणिक वर्मा, श्री मोहन सोनी, श्री सरोज कुमार, श्री सत्य नारायण सत्तन सहित कुल ग्यारह कवियों ने काव्य पाठ किया और दादा के संस्मरण सुनाए। यहाँ उल्लेखित सारे कवि वे हैं जिन्होंने दादा के साथ अनगिनत बार कवि सम्मेलन के मंच साझा किए।

दादा पर लिखी सरोज भाई की कविता खूब पसन्द की गई। यह कविता उन्होंने दो दिन पहले इन्दौर लेखक संघ की गोष्ठी में भी सुनाई थी जिस पर कवि श्री राजकुमार कुम्भज की टिप्पणी थी कि यह कविता स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम में शरीक करने योग्य है। 

28 जून को हम पति-पत्नी सरोज भाई से मिलने गए और उनकी वह कविता माँग कर लाए। वह कविता यहाँ प्रस्तुत है। कविता के पन्ने थामे, सरोज भाई ने दादा से जुड़ी खूब सारी बातें की। यहाँ दिया गया उनका चित्र उन्हीं क्षणों का है।

एक था कमाल कवि

एक था कमाल कवि,
नाम था बालकवि।
मूल नाम नन्दराम,
था मनासा मुकाम।

गरीबी में पला था,
कोयल सा गला था।
गली-गली गाता था,
भीख माँग, खाता था।

माँ साथ होती थी,
किस्मत को रोती थी।
पिता स्वयम् तंग थे,
जन्म से अपंग थे।

गा-गा कर बडा हुआ,
पाँव पर खड़ा हुआ।
पढ़ने भी जाने लगा,
मंचों पर गाने लगा।

देश तब गुलाम था,
हो रहा संग्राम था।
गाँधी का जमाना था,
ये भी तो दीवाना था।

राजनीति भा गई,
कंग्रेसी हो गया।
और प्रजा-मण्डल के,
सपनों में खो गया।

गिरिवरसिंह भँवर और,
तोमर¹ को गुरु माना।
उनसे ही सीखा,
लिखना, लिखते जाना।

वह चुनाव भी लड़ा,
नेता बन गया बड़ा।
नेहले पर देहला था,
लेकिन कवि पहले था।

सदन में विधायक था,
बाहर कवि-गायक था।
स्वाभिमान का प्रतीक,
पारदर्शिता सटीक।

मन्त्री पद पाकर वह,
हवा में नहीं डोला,
अपनी निष्ठाओं की,
बोली वह नहीं बोला।

शून्य से उठा,
और शिखर चूमता रहा।
काजल के गलियारे,
बेदाग घूमता रहा।

कवियों में नेता था,
नेताओं में कवि था।
सर्वप्रिय, अजातशत्रु,
सज्जनता की छवि था।

मधुर, मालवी सपूत,
हिन्दी का उन्नायक।
चारण वह संस्कृति का,
जन-गण-मन का गायक।

कविताई पहले थी, 
नेताई बाद में।
वोटों से अधिक मजा,
आता था दाद में।

कविता ओजस्विनी,
कविता श्रंगार की।
कविता समझाइश की,
कविता ललकार की।

कविता में भाषण भी,
भाषण में कविता।
आत्मलीन, शान्त चित्त,
सारा जीवन कविता।

कहानियाँ गजब लिखीं,
हुआ नहीं आकलन।
कविताई सर्वव्याप्त,
संकल-दर-संकलन।

गद्य लिखा, पद्य लिखा,
भर दिए रजिस्टर।
लिख डाली आत्म-कथा,
‘मंगते से मिनिस्टर’।

लेकिन वह छपी नहीं,
मिला नहीं पब्लीशर²
लोग पढ़ नहीं पाए,
पढ़ी गई घर ही घर।

अब कोई भी छपवा दे,
एक काम हो जाए।
यह न हो कि वह लेखन,
रद्दी में खो जाए।

दोस्ती निभाता था,
यारों का यार था।
इस पल पुकारा,
उस पल तैयार था।

भाभी के जाने पर,
तनहाई, सन्नाटा।
एकाकी जीवन,
जैसे-तैसे काटा।

मृत्यु मिली भव्य, दिव्य,
सोता-सोता गया।
जिसने भी सुना,
चकित, रोता-रोता गया।

मंचों पर बालकवि,
टी. वी. पर बालकवि।
संसद में बालकवि,
सड़क पर बालकवि।

बालकवि!

बालकवि!!

चला गया बालकवि,
किस्से ही किस्से हैं।
किस्सों की सम्पत्ति में,
हम सबके हिस्से हैं।

मैं उसका मित्र रहा,
मुझे बहुत गर्व है।
बालकवि की चर्चा,
स्मृतियों का पर्व है।
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सरोज भाई का पता - 
मनोरम, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर-452018
                        फोन - (0731) 2561919  मोबा. - 94066 22290

1 - स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी श्री नरेन्द्र सिंह तोमर, ग्राम पिवड़ाय (जिला-इन्दौर) जो स्वतन्त्रता संग्राम के दिनों में इकतारे पर गीत गा-गा कर लोक चेतना जाग्रत करते थे।

2 - इस किताब को छापने के लिए कम से कम तीन प्रकाशकों ने अपनी ओर से दादा से सम्पर्क किया था। लेकिन कानूनी दृष्टि से वे किताब के कुछ अंशों से असहमत थे। उन्होंने दादा से उन अंशों को विलोपित करने का आग्रह किया जिसे दादा ने स्वीकार नहीं किया। इसलिए, किताब को प्रकाशक तो मिले लेकिन उसे अविकल रूप से छापनेवाले प्रकाशक नहीं मिले।

काम याने काम, छुट्टी याने छुट्टी


बर्लिन से बब्‍बू को
पहला पत्र - पाँचवाँ हिस्सा

बड़े बालों का फैशन यहाँ भी आया था। तब एक नियम बनाया गया - चाहे जितने बड़े बाल रखो पर उन्हें साफ रखो और उनके कारण काम में बाधा नहीं पड़नी चाहिए। बस! बाल एक ही झटके में कट गए। गर्दन तक आ गये। सारे रोस्टोक में एक अकेले हमारे साथी श्री गुप्ता ही बेलबाटम पहने घूम रहे थे। यहाँ पतलून न चुस्त है न ढीला। बिल्कुल करीने से है। पुरुष भी भरपूर कद्दावर कद वाले हैं पर खुले बटन और नंगी छातियों का प्रदर्शन नहीं करते। उनके कुरतों के बटन सलीके से बन्द होते हैं।

दवाई की दुकानें यहाँ बाजार और गलियों में नहीं हैं कि चाहे जहाँ से, चाहे जो, चाहे जैसी दवाई खरीद ले। डॉक्टर हर एक के लिए पूरी मुस्तैदी से तैयार बैठा है। पश्चिम से एल. एस. डी. और मादक दवाइयों का रोग यहाँ नहीं आया। ऐसी दवाईयों का सेवन करने वाला सीधा सख्त कैद पाता है। शराब पीने पर प्रतिबन्ध नहीं है, पर पी कर बेवकूफी करने पर तत्काल जेल दे दी जाती है।

परिवार और पारिवारिक खर्च
बच्चे पैदा करने पर कोई रोक नहीं है। कम आबादी की यहाँ समस्या है। पर दो बच्चों से अधिक के माँ-बाप स्वयं ही लज्जा महसूस करते हैं। यदि 5 बच्चों से अधिक का परिवार हो तो मकान किराये में सरकार सबसीडी देती है। परिवार का हर सदस्य कमाता है। 450 मार्क याने भारतीय 1800 रुपयों से कम किसी की तनख्वाह नहीं है। किन्तु ऊपर वालों की तनख्वाह 2600 मार्क अर्थात 10400 भारतीय रुपयों तक है। तनख्वाहों में दुगुना और तिगुना तक फर्क है। शनिवार और रविवार को शहर और सड़कें इस तरह सुनसान मिलेंगी मानो कर्फ्यू लग गया हो। सब छुट्टियाँ मनाने कहीं न कहीं चले जाएँगे। पर सोमवार से शुक्रवार तक सारा देश तन तोड़ मेहनत करता है। 

कपड़ा बहुत मँहगा है। ओव्हरकोट भारतीय 1000 रुपये तक, मौजे 80 रुपये तक, टाई भारतीय 300 रुपये तक और पूरा सूट भारतीय 3000 रुपये तक पड़ता है। रेडियो, टीवी और कैमरे भी खूब मँहगे हैं। सामान्य कलम तक मँहगा है। सब्जियाँ और फल सस्ते हैं। 

रोटी नहीं खाई जाती। डबल रोटी और मांस डटकर खाया जाता है। एक ही जहाज हमें दिखाया गया जो प्रतिदिन भारतीय 20 लाख रुपयों की मछलियाँ पकड़ता है। बहुत बड़ा जहाज था। 6 करोड़ रुपये प्रतिमाह मूल्य की मछली एक ही जहाज पकड़ता है। ऐसे 72 जहाज अकेले रोस्तोक काउन्टी (प्रान्त) के पास हैं। हर कारखाने में शानदार केण्टीनें। हिन्द महासागर के सिवाय बाकी सब समुद्रों में रोस्तोक के जहाज मछली का शिकार करते हैं।

बिना सोवियत संघ के इस देश का काम एक दिन भी नहीं चल सकता है। इस बात को यह देश स्वीकार करता है। किसी भी विदेशी पर कोई नजर भीतर घूमने पर रखी जाने का कोई उदाहरण नहीं मिला। हम लोग बेरोकटोक हमारी मर्जी से भी खूब घूमते हैं- अकेले ही। हर तरह के प्रश्न उत्तरित होते हैं। कोई पुलिस दिखाई नहीं देती। हाँ, सोवियत सैनिक और ऑफिसर अवश्य दिखाई दे जाते हैं।


...तो फिर तो दूल्हा भिखारी हुआ?


‘आप जैसे हो वैसे के वैसे चले आइए। फौरन। मैंने अभी-अभी दादा का वो व्यवहार का पंचशील वाला ब्लॉग पढ़ा है। मेरे पास भी आपको सुनाने के लिए वैसी ही जोरदार बात है। दादा की ही। आप चले आओ। मैं आपही राह देख रहा हूँ।’ उधर से सुभाष भाई बोल रहे थे। उन्होंने मेरे लिए बोलने को कुछ रखा ही नहीं। सब कुछ तय कर चुके थे। मुझे जाना ही था।




सुभाष भाई रतलाम के, गिनती के उन लोगों में हैं जिन्हें मैं अपना संरक्षक मानता हूँ। उनकी कई बातों से मैं दुःखी होने की सीमा तक असहमत हूँ और वे भी मुझसे इतने ही दुःखी हैं। हम लोग आपस में खूब बहस, तर्क-वितर्क करते हैं। बात-बात पर असहमत होते हैं। और हर बार ‘तो तय रहा कि अपन असहमत हैं।’ वाले निष्कर्ष के साथ विदा लेते हैं। मैं पहुँचा तो देखा, वे और मंजुला भाभी कहीं बाहर जाने के लिए तैयार बैठे हैं। केवल मेरी प्रतीक्षा में रुके हुए हैं। 

आज उन्होंने कोई मनुहार नहीं की। अन्यथा, उनकी मनुहार ‘प्राणलेवा’ होती है। कभी किसी काम से उनके मोहल्ले में जाता हूँ तब, और कभी-कभी, बिना किसी बात, बिना किसी काम के उनसे मिलने का जी करता है तो मन को डाँट-फटकार कर रोक लेता हूँ। अब तक समझ नहीं पाया कि मेरे लिए अधिक कठिन क्या है - उनकी मनुहार को नकारना या उनकी मनुहार (न तो आवश्यकता हो और न ही पेट अनुमति दे रहा हो तब भी) मान लेना? मैं अनगिनत बार कह चुका हूँ - ‘आपकी, खाने-पीने की मनुहार से मुझे बहुत ही तकलीफ होती है। मत किया कीजिए।’ वे अनिच्छापूर्वक हाँ तो भर लेते हैं लेकिन अगली ही बार अपनी हाँ भूल जाते हैं। लेकिन आज मेरे मन की हो गई। उनके, कहीं और जाने की जल्दी ने मनुहार को सर ही नहीं उठाने दिया। 

मैं कुछ पूछूँ उससे पहले खुद ही बोले - “आपके छोटे बेटे तथागत की शादी में दादा से खूब सारी बातें करने मौका मिला। कोई घण्टा-सवा घण्टा उनके पास बैठा। वो तो अपनी ओर से नहीं बोले। लेकिन मेरी बातों के जवाब में बहुत बातें कहीं। उन्हीं मे से एक बात वह है जो उनके पंचशील के बराबर है। उसीके लिए आपको बुलाया।

“शादी की परम्पराओं की बात करते-करते ‘कन्यादान’ की बात आ गई। उनके चेहरे से लगा कि यह शब्द सुनकर ही उन्हें गुस्सा आ गया। तीखे तो नहीं बोले लेकिन नाराजी उनकी आवाज से साफ लग रही थी। बोले - “यह शब्द किसी गाली से कम नहीं है। यह शब्द हमारी, हँसती-खिलखिलाती बेटियों को निर्जीव वस्तु बनाकर रख देता है। यह शब्द हम पिताओं को, सारे पुरुषों को निर्दयी, निर्मम और क्रूर बना देता है। अरे! बेटी भी भला दान की जा सकती है? एक ओर तो हम बेटी को ‘पेट की आँत’ कहते हैं और दूसरी ओर ‘कन्यादान’ की बात करते हैं। हम कभी अपने पेट की आँत को किसी को दान में देते हैं?”

“दादा का गुस्सा साफ नजर आ रहा था। उनसे क्या कहता? क्या जवाब देता? चुपचाप उनका मुँह देखता रहा। वो आगे बोले - ‘कुछ भी बोलने से पहले हम सोचते भी नहीं। अरे! अगर लड़की को दान दे रहे हो वो जो घोड़ी पर बैठा तुम्हारे दरवाजे पर खड़ा है वो भिखारी है? वो क्या दान लेने के लिए मँगते की तरह तुम्हारे दरवाजे पर खड़ा है? जब हम अपनी बेटी का हाथ किसी के हाथ में देते हैं तो कहते हैं कि हमने बेटी देकर बेटा लिया। लेकिन यहाँ तो हमने बेटी देकर भिखारी, मँगता ले लिया! क्या हम किसी भिखारी को अपनी बेटी सौंप रहे हैं?’

सुभाष भाई बोले - “दादा की बात मुझे सौ टंच सही लगी। मैंने भी बेटी ब्याही है। मैंने भी कन्यादान किया है। लेकिन तब तो ऐसी कोई बात मेरे दिमाग में आई ही नहीं। आती भी कैसे? दादा से मुलाकात और यह बात तो अब हुई। बेटी के ब्याह के दो बरस बाद। यदि पहले दादा से यह सुन लेता तो कह नहीं सकता कि तब क्या करता लेकिन उस समय यह बात कानों में बराबर गूँजती रहती। 

“हम सब ठोक-बजाकर, सारा आगा-पीछा देखकर बेटी का रिश्ता तय करते हैं। बेटी को दान में तो नहीं देते। दान देने के बाद तो उस वस्तु पर हमारा न तो कोई हक रह जाता है न ही उससे हमारा कोई नाता-रिश्ता। लेकिन बेटी से हमारा नाता-रिश्ता जिन्दगी भर बना रहता है। उस पर हमारा हक भी बना रहता है और ब्याह के बाद वह हमारी जिम्मेदारी भी बनी रहती है। हम देख रहे हैं कि दुःख में बेटियाँ दौड़-दौड़ कर आती हैं और माँ बन कर अपने माँ-बाप की सेवा करती हैं। इसलिए दादा की यह बात तो सही है कि  बेटी को ब्याहते समय कन्यादान वाली बात पर हम सबको फिर से सोचना चाहिए। जमाना बदल रहा है। बदल गया है।  बेटियाँ भी अब अपना भला-बुरा खुद सोच रही हैं। अपने फैसले खुद ही ले रही हैं। उन्हें इस काबिल हम ही बनाते हैं। ऐसे में कन्यादान की बात अब सच्ची में गले नहीं उतरती।”

मेरे पास तो कहने के लिए कुछ था ही नहीं। वैसे भी मैं सुनने के लिए ही आया था। चुपचाप सुन लिया - सुभाष भाई से (और दादा से भी) सहमत होते हुए। 

सुभाष भाई के यहाँ से जब भी लौटता हूँ तो, भले ही उनका घर हो या दफ्तर, एक झटके में उठ कर नहीं आ पाता। दरवाजे पर दो-एक मिनिट रुक कर, बात कर ही लौट पाता हूँ। लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ। मैं उठता, उससे पहले वे और मंजुला भाभी उठ खड़े हुए। आज मुझसे पहले उन्हें जाना था। आज पहले वे निकले। उनके पीछे-पीछे मैं।

सुभाष भाई से मिली दादा की यह बात दादा का चिह्नित किया एक और शील है। मुझे लग रहा है कि दादा के ऐसे कुछ और शील मुझे मिलेंगे। सुभाष भाई जैसे ही अन्य श्रोताओं से।
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