जनाक्रोश या निर्वीर्यों द्वारा पुंसत्व का उद्घोष?

मर्मान्तक पीड़ा और उतनी ही शर्मिन्दगी से यह सब लिख रहा हूँ। रुका नहीं जा रहा। पीड़ा इसलिए कि सहा नहीं जा रहा और शर्म इसलिए कि इस सबमें मैं भी बराबर से शरीक हूँ।
 
दिल्ली में, चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार से पूरा देश उद्वेलित है। लेकिन यह सब मुझे क्षणिक लग रहा है। बिलकुल, पानी के बुलबुले की तरह या कि सोड़ा वाटर बोतल के उफान की तरह - जो ‘देखत ही बुझ जाएगा’ या जितनी तेजी से बोतल से बाहर आएगा उससे अधिक तेजी से बैठ जाएगा।
तात्कालिक रूप से भले ही कुछ हो जाए, लोगों के मन को समझा दिया जाए लेकिन स्थायी रूप से कुछ भी नहीं होगा। होगा वही जो हम सब अब तक करते चले आ रहे हैं - भूल जाएँगे। भूलने में माहिर जो हैं हम लोग!
 
बिना किसी मेहनत के कुछ बातें मुझे नजर आती हैं जिनके कारण यह जघन्य दुष्कृत्य इस तरह से राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। पहली - यह दिल्ली में हुआ। दूसरी - चूँकि हमारा मीडिया दिल्ली केन्द्रित है, इसलिए यह राष्ट्रीय मुद्दा बना। और तीसरी बात - दुष्कृत्य की शिकार लड़की का किसी राजनीतिक दल या नेता से सम्बद्ध नहीं होना। एक चौथी बात की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। वह यह कि दिल्ली और केन्द्र में एक ही दल की सरकार होने कारण इस पर राजनीति का परोक्ष प्रभाव।
 
मेरी इन चारों बातों को एक सूत्र में सामहित किया जा सकता है - ‘देश में कानून का शासन न होना।’ यदि देश में कानून का शासन हुआ होता तो ऐसी नौबत आना तो दूर रहा, ऐसी नौबत आने की आशंका भी नहीं हो पाती। किन्तु ऐसा है नहीं तथा यदि सब कुछ आज जैसा ही बना रहे तो होने की सम्भावना तो छोड़िए, कानून का शासन होने की आशंका भी नहीं होगी।
 
हम लोग कानून का शासन चाहते तो हैं किन्तु होने नहीं देते। उसके लिए निरपेक्ष भाव चाहिए जो हमारे खून से, हमारे चरित्र से, हमारे आचरण से तिरोहित हो चुका है। हमें कानून का शासन तो चाहिए किन्तु हमें छोड़कर बाकी पूरे देश पर हो।
 
न्यायपालिका यदि न हो तो हमारे देश में कानून, सत्तारूढ़ दल की रखैल बन कर रह गया है। ‘क्या अपराध हुआ है?’ इससे पहले देखा जाता है कि अपराध किसने किया है। यदि अपनेवाले (सत्तारूढ़ दल के समर्थक) ने किया है तो कानून कुछ नहीं देखेगा, कुछ नहीं कहेगा और कुछ नहीं करेगा। अपराध यदि अपने सामनेवाले (प्रतिपक्ष के समर्थक) ने किया है तो उस सबके लिए भी कार्रवाई हो जाएगी जो उसने किया ही नहीं। यदि किसी तीसरे ने किया है तो कानून अपनी मर्जी और अपनी सुविधा से काम करेगा।
 
जो कुछ दिल्ली में हुआ वही सब देश के कौन से राज्य में नहीं हो रहा? अखबार उठा कर देख लीजिए, सारी की सारी राज्य सरकारें मानो दिल्ली और केन्द्र सरकार को मात देने में लगी हुई हैं। मेरे कस्बे में गए दिनों तीन साल की तथा छः साल की, दो बच्चियों पर, अलग-अलग बलात्कार हुए किन्तु सच मानिए, अखबारों में दो/तीन कॉलम शीर्षक समाचारों से आगे कुछ भी नहीं हुआ और इन घटनाओं की चर्चा दूसरे दिन तक भी नहीं टिक पाईं।
 
दलित महिलाओं के साथ दुराचार से लेकर उन्हें निर्वस्त्र कर, गाँव में उनका जुलूस निकालने की घटनाएँ आए दिनों होती रहती हैं। किन्तु कोई नोटिस नहीं लेता। सरकारी छात्रावास में रह रहीं नाबालिग बच्चियों के गर्भवती होने की घटनाएँ उजागर होने के बाद भी कुछ नहीं होता। अखबार भी रस्म अदायगी करके रह जाते हैं। पत्ता भी नहीं खड़कता। सब कुछ इस तरह होता है मानो यह तो होता ही रहता है और होता ही रहेगा।
 
जिस देश में किसी मुख्य मन्त्री को, कॉलेज प्राध्यापक की हत्या के आरोपित से मिलने के लिए जेल में जाने में कोई हिचक न हो, कोई सरकार ऐसे आरोपित के विरुद्ध कोर्ट में हारने पर उत्सव मनाए, उस देश में यह हो हल्ला चकित ही करता है। कानून का शासन होता तो ऐसे दृष्यों की कल्पना भी की जा सकती? मेरे प्रदेश में शिवराज सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार सत्ता पर काबिज है। दिल्ली की इस घटना पर मेरे प्रदेश के गृह मन्त्री उमा शंकर गुप्ता की प्रतिक्रिया में वह तल्खी, वह उत्तेजना, वह आक्रोश, वह क्षोभ कहीं नहीं था जो लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के भाषण और मुख मुद्रा में था। गुप्ता ने घटना पर टिप्पणी करने से बचते हुए, शान्त और संयत स्वरों में, घटना के बाद पुलिस कार्रवाई में बरती जानेवाली तत्परता को महत्वपूर्ण बताया। जाहिर है कि उन्हें अपने प्रदेश की दशा ने ही ऐसा करने/कहने के लिए मजबूर किया। यदि कानून पर सत्ता का नियन्त्रण नहीं होता तो सुषमा स्वराज और उमा शंकर गुप्ता की प्रतिक्रियाओं में कोई अन्तर नहीं होना चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ। ऐसा ही होता है। सबके सब ऐसा ही करते हैं। कोई भी कानून को अपना काम नहीं करने देना चाहता।
 
और जो मीडिया आज हलकान हुआ जा रहा है उसे कभी गाँवों में जाने की फुरसत मिली? उसके लिए तो घटना वही होती है जो दिल्ली में होती है। दूरदराज के किसी गाँव में, उस घटना से सौ गुना अधिक जघन्य घटना, मीडिया के लिए घटना नहीं होती। हो भी कैसे? उसे दिल्ली से फुरसत मिले तो!
 
उद्वेलित लोगों में खुद को शरीक करते हुए भी यह कहने से अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूँ कि यह सब मुझे किसी निर्वीर्य द्वारा खुद को पुंसवान घोषित किए जाने के व्यर्थ प्रयास से अधिक नहीं लग रहा।
 
हर कोई, अपराधियों को फाँसी पर चढ़ाने की माँग कर रहा है। व्यथातिरेक और भावातिरेक में यह स्वाभाविक  ही है। किन्तु जब आवश्यकता होगी और अवसर आएगा तब कितने लोग गवाही देने न्यायालय जाएँगे? कौन इसके लिए अपना काम छोड़ कर जाएगा? कौन नौकरी से सी एल लेगा और कौन अपनी दुकान बन्द करने का नुकसान उठाएगा? ऐसे प्रकरणों को तलाश करने में ज्यादा परिश्रम नहीं करना पड़ेगा जिनमें गवाह या तो आए ही नहीं या फिर पलट गए। ऐसे असंख्य मामले आसानी ये याद आ जाएँगे जिनमें अपराधियों को दोष मुक्त करते हुए न्यायाधीशों ने अपनी आक्रोशित विवशता प्रकट की है।
 
दिल्ली की यह शापित लड़की कम से कम इस मामले में सचमुच में भाग्यशाली रही कि वह दिल्ली में दरिन्दों की शिकार हुई और किसी राजनीतिक पार्टी या नेता से जुड़ी हुई नहीं थी। इनमें से यदि एक भी बात होती तो उसे कोई नहीं पूछता। उसका इलाज होना तो दूर, उसका नाम लेने की फुरसत भी किसी को नहीं होती।
 
दिल्ली की यह घटना और इस पर हुई जन-प्रतिक्रिया वस्तुतः हमारे खोखलेपन और दोहरे पैमाने अपनाने के दुराचरण को ही उजागर करती है। ‘घटना’ को जब तक हम ‘घटना’ नहीं मानेंगे, उसे निरपेक्षता से नहीं देखेंगे, तक तब ऐसा ‘हो हल्ला’ (ऐसे जघन्य दुष्कृत्य पर जन-प्रतिक्रिया को ‘हो-हल्ला’ कहने का मुझे दुःख तो है लेकिन क्या करूँ? मुझे यह ‘हो-हल्ला’ ही लग रहा है) होता रहेगा। कानून का शासन कभी नहीं हो पाएगा। हम होने ही नहीं देगें।

13 comments:


  1. सारी न्याय व्यवस्था पर ध्यान देने की जरूरत है। सब से पहले तो ह्में अपनी अदालतो का अनुपात देखने की जरूरत है। 10 लाख की आबादी पर अमरीका में 140 और इंग्लेंड में 55 अदालतें हैं। भारत की संसद समझती है कि भारत में 50 भी पर्याप्त होंगी। लेकिन सरकार ने उपलब्ध कराई हैं 11 अदालतें। वही काम जो अमरीका में 140 जज करते हैं भारत मे 11 जजों से करने की अपेक्षा है। शीघ्र न्याय भारतवासियों के लिए अगली सदी का सपना है।

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  2. चुनाव सुधार और कानून का राज पहली आवश्यकता है। हो हल्ला आक्रोश जनित है..इसे हल्के में न लिया जाय इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

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  3. और ये भी लग रहा है कि अपराधी किसी राजनितिक दल से नहीं है वर्ना प्रतिक्रियाएं कुछ और होती.

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  4. हमारे समाज में वहशी भेड़िये भी रहते हैं , जिनसे बच पाना नामुमकिन है ! कुछ श्वान प्रकृति के पुरुष अपनी जीभ लपलपाते हुए चाटने को तत्पर रहते हैं ! इनकी विकृत मानसिकता का कोई इलाज नहीं है! हां यदि सरकार चाहे तो महिलाओं की सुरक्षा चाक-चौबंद कर सकती है! हमें भी निर्भय जीने का अधिकार दे सकती है !

    इस मुद्दे पर वोटिंग करा लें तो ये पाखंडी वॉक-आउट कर जायेंगे !

    .

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (21-12-2012) के चर्चा मंच-११०० (कल हो न हो..) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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    1. कोटिश: आभार मयंकजी। कृतज्ञ हूँ।

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  6. हमें कड़ाकानून बनाकर सख्ती से पालन करवाना चाहिए.तब इस घटना का सही हल मिल पायेगा .

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  7. सामूहिक बलात्कार,नाबालिग और छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की जो घटनाए दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है,उसके लिए इंटरनेट,खुलापन और पुलिस सबसे ज़्यादा उत्तरदायी है । आज इंटरनेट पर क्लिक करते ही ढेरों पोर्न /ब्लू फिल्मों का खज़ाना मिल जाता है,जो दरिंदगी का जनक बन गया है,क्या देश का कानून ये सब सख़्ती से रोक नही सकता ?

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  8. दिल्ली में ही आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं .... और बस एक दिन की खबर बन कर रह जाती हैं .... इस घटना में पुरुष मित्र का बच जाना और आरोपियों का पकड़ा जाना ही मुख्य कारण रहा आक्रोश का ... आपकी बात से सहमत हूँ ... मात्र यह हल्ला ही बन कर न रह जाए ।

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  9. आपने पोस्ट में भले सही सटीक मुद्दे उठाए हैं लेकिन सबसे सहमत होना मुश्किल है जिस देश में सरकार क़ानून का पालन करवाना भूल चुकी हो ,क़ानून कानूनी तौर पे नहीं सामने वाले का मुंह देख

    के लागू होता हो ,वाड्रा क़ानून अलग ,गडकरी अलग ,कलावती क़ानून अलग , देश में ऐसा आइन्दा भी होता रहेगा .

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    1. लगता है, आप अत्‍यधिक आवेशित और उत्‍तेजित हैं। इसीलिए, आपने शायद मेरी पोस्‍ट ध्‍यान से नहीं पढी। मैंने वही कहा है जो आप कह रहे हैं - अपराधी की शकल देखकर कानून अपना काम करता है।

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  10. नारी हो न निराश करो मन को - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.