पाणिग्रहण संस्कार से तनिक आगे

परसों, आठ दिसम्बर को मेरी पोती, नीरजा-गोर्की की बड़ी बेटी अभिसार का पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुआ। गोर्की मेरा छोटा भतीजा है और नीरजा उसकी उत्तमार्ध्द। नीरजा का घर का नाम ‘मीरू’ है और विवाहोपरान्त दादा ने उसका नाम बदल कर ‘रूपा’ कर दिया है। मैं उसे ‘मीरू’ ही सम्बोधित करता हूँ। ‘नामसझ उम्र’ में ही दोनों में ‘स्कूली-प्रेम’ हो गया था। कानूनी परिभाषा के अनुसार गोर्की तो ‘बालिग’ हो गया था किन्तु मीरू नाबालिग ही थी। दोनों के प्रेम को दोनों ही परिवारों ने गम्भीरता से नहीं लिया था। परवाह ही नहीं की थी शायद। बचकानी बात मानी थी दोनों के प्रेम को। किन्तु दोनों ही अड़े रहे। इतने और ऐसे कि दोनों परिवारों को सहमत होना ही पड़ा (गोर्की ने हम सबसे कहा था -  ‘आप कह रहे हैं तो मैं इस लड़की से विवाह नहीं करूँगा। किन्तु  यह भी सुन लीजिए कि फिर विवाह करूँगा ही नहीं।’ दादा ने मीरू से कहा/पूछा था - ‘इस लड़के में अकल-वकल तो हैं नहीं। तुम क्या देख/जान/समझ कर इसके चक्कर में पड़ गई?’ उत्तर में मीरू ने कहा था - ‘अंकल! यह देखने के लिए आपको मीरू की आँखों से देखना पड़ेगा और जानने/समझने के लिए मीरू का मन चाहिएगा।’ कहना न होगा कि इसके बाद दादा के पास कोई जवाब नहीं रहा) और 21 जून 1983 को, नीमच में, हजारों लोगों की उपस्थिति में दोनों जीवन साथी बने। यह केवल प्रेम विवाह नहीं था। इससे तनिक आगे बढ़कर यह ‘अन्तर्जातीय प्रेम विवाह’ था। गोर्की की जाति बैरागी और मीरू का जाति कायस्थ।

जैसा कि मैं बार-बार बताता रहा हूँ, ‘भिक्षा वृत्ति’ हमारे परिवार की आजीविका थी सो समाज की, आर्थिक स्तर आधारित वर्ग व्यवस्था में हमारा परिवार ‘निम्न वर्ग’ से निचली सीढ़ी पर खड़ा परिवार रहा है। जातिगत आग्रहों और परम्पराओं/रूढ़ियों के सन्दर्भों में ऐसे परिवार स्वाभाविक रूप से ‘कट्टर’ ही होते हैं। फिर, मेरे पिताजी अपने इलाके के बैरागी समाज के ‘महन्त’ थे। ऐसे में, अन्तर्जातीय विवाह को लेकर उनकी और मेरी अनपढ़ माँ की मनःस्थिति का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। सो, जातिवाद को देश की तरक्की में बड़ी बाधा माननेवाली, दादा की (और मेरी भी) सम्पूर्ण प्रगतिशीलता, एक सीमा तक ही कारगर हो पा रही थी। ऐसे में, आज से लगभग तीस बरस पहले, गोर्की-मीरू का विवाह, न केवल बैरागी समाज में अपितु हमारे समूचे अंचल में किसी ‘क्रान्ति’ से कम नहीं था।

इन्हीं गोर्की-मीरू की बड़ी बेटी, अभिसार (जिसे हम सब ‘मीकू’ कहते/पुकारते हैं) ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। उसने गौरव को अपना जीवन साथी चुना। दोनों एक ही संस्थान में काम करते हैं। गौरव, मीकू का ‘सीनीयर’ है। अब तक मीकू का ‘गौरव सर’ था। अब जीवन संगी है। गौरव का पूरा नाम गौरव जुनेजा है। नाम से ही उसका पंजाबी होना मालूम हो जाता है। मुझे नहीं पता कि पंजाबियों में उसकी जाति क्या है किन्तु तय है कि वह बैरागी तो नहीं ही है। मीकू और गौरव जब मालाएँ पहना कर, एक दूसरे को जीवन साथी के रूप में स्वीकार करने को सर्वाजनिक कर रहे थे तब मैं सोच रहा था - ‘मीकू के पिता की जाति बैरागी, माता की जाति कायस्थ। मीकू की खुद की जाति क्या? और अब पति की जाति पंजाबी! इन दोनों के बच्चों की जाति क्या होगी?’ अपने इस सवाल के जवाब मैं खुद ही पुलकित हो गया - आनेवाले बरसों में नामों के आगे जाति का उल्लेख या तो होगा ही नहीं और यदि होगा तो वह अर्थहीन ही होगा - कोई उसकी ओर ध्यान ही नहीं देगा। तब विद्यालयों के प्रवेश पत्रों में और विभिन्न प्रश्नावलियों में ‘कुल नाम’ (सरनेम) वाला प्रावधान शायद ही दिखाई देगा। इस अनुमान ने मुझे यह अतिरिक्त प्रसन्नता दी कि भारत के ऐसे भविष्य के निर्माण में मेरे कुटुम्ब के बच्चे भी शरीक हैं।

बॉंये से -  गोर्की, गौरव, मीकू और मीरू


किन्तु इससे तनिक अधिक महत्वपूर्ण बात अभी बाकी है।

मीकू की बिदाई से कुछ ही मिनिट पहले दादा इस नव-युगल के पास पहुँचे। सबने अनुमान लगाया - विदा से पहले दादाजी अपनी पोती और दामाद को आशीर्वाद देने पहुँचे होंगे। किन्तु वास्तविकता कुछ और ही रही। दादा ने एक माँग रखी - ‘मेरी बात ध्यान से सुनना और जवाब अभी ही देना। जवाब देने में भले ही तुम्हें वक्त लगे। मैं प्रतीक्षा कर लूँगा लेकिन जवाब अभी ही देना। वादा करो कि चाहे जो स्थिति बने, तुम दोनों भ्रूण हत्या नहीं करोगे।’ कुछ क्षणों के लिए मानो समय ठिठक गया, प्रकृति अवाक् हो गई। सन्नाटा पसर गया। मीकू की आँखें बरसात की झड़ी की तरह बहनी शुरु हो गईं। गौरव अकबका गया। आसपास खड़े हमसब जड़वत् हो गए। अन्ततः मीकू ने ही सबको और सब कुछ को सजीव किया। बहते आँसुओं और अविराम हिचकियों के बीच बोली - ‘हाँ! दादाजी!! ऐसा ही होगा।’ अब दादा की आँखें बह रही थीं। उन्होंने मीकू के माथे पर हाथ फेरा और गौरव की ओर देखा। गौरव ने दो बार पलकें झपका कर हामी भरी। दादा ने दोनों को बाँहों में भर, आसीसा।

वर माला के ठीक बाद गौरव और मीकू

बारात कल विदा हो गई है। मीकू अपने घर पहुँच गई है। हम सब अपने-अपने घर लौट आए हैं। मीकू-गौरव अपनी-अपनी दिनचर्या का पुनर्निधारण में लग गए होंगे और हम सब अपनी बँधी-बँधाई दिनचर्या पर लौट आए हैं।

नहीं जानता कि मेरे इस लिखे को किस तरह लिया जाएगा - एक परिवार में सम्पन्न पाणिग्रहण संस्कार की सूचना की तरह या कि राष्ट्रीय स्तर पर जरूरी एक बड़े सामाजिक बदलाव हेतु आयोजित हवन में दी गई एक आहुति की तरह। किन्तु मुझे लगा कि मेरे आसपास ऐसा कुछ, तनिक असाधारण अवश्य हुआ है जिसे लिखने से मैं खुद को रोक नहीं सका।

मैं चाहूँगा कि ऐसा ही लिखने के लिए मुझे रोज-रोज विवश होना पड़े।

13 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (11-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. कोटिश: धन्‍यवाद और आभार। आपने मुझे विस्‍तारित और सम्‍मानित तो किया ही, मेरी बात/भावना को समर्थन भी दिया और आगे भी बढाया।

      अन्‍तर्मन से आपका आभारी हूँ।

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  2. समय की मांग- भ्रूण हत्या बंद होना चाहिए । इसलिए ये अच्छा कदम है । जहां तक जाति का प्रश्न है, अब इस जमाने मे ये बेमानी होती जा रही है, ये अच्छा ही है ।

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  3. वर -वधू और आप सभी को बहुत बहुत बधाई ।

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  4. एक समझदार बुजुर्ग की आधुनिक युग की समझाइश के लिए नमन ....

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  5. धीरे धीरे सब मान जायेंगे

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  6. ऐसा लग रहा था कि सिनेमा देख रहे हों, अद्भुत विवरण

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  7. यह मात्र एक पारिवारिक घटना नहीं है ... सामाजिक जागरूकता को दिखा रही है ... बहुत अच्छा लगा यह सब पढ़ कर ।

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  8. डॉ. कमलकांत बुधकर, हरिद्वारDecember 11, 2012 at 9:35 PM

    आदरणीय भैया श्री बालकवि बैरागी जी और उनके सारे परिवार को जितना मैं जानता हूं, उनका आचरण और व्‍यवहार उनकी नवविवाहिता पोती और पोतजवांई के लिये अत्‍यंत सहज और स्‍वाभाविक रहा है। वे जब जहां रहते हैं वहां लोग उनसे प्रेरित प्रभावित होते ही हैं। पर अपने परिवार के निजी उल्‍लास क्षणों को उन्‍होंने जिस वाक्‍य से प्रेरित किया उससे सिद्ध हुआ कि वे केवल निजी परिवार में ही नहीं, देश समाज के अनवरत चिंतन में जीते है। विष्‍णुभैया,आपका लिखा वर्णन जीवन्‍त और सटीक है। बधाई।

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    1. कमल भैया! जैसाकि मैंने आपसे फोन पर कहा था, यह सब तो आपको ही लिखना था। किन्‍तु आप आ नहीं पाए और मुझे लिखना पडा। आप लिखते तो इससे कई गुना बेहतर लिखते। जिन्‍होंने आपका लिख नहीं पढा वे नहीं जान पाऍंगे कि उन्‍हें कितने कमतर लेखान से सन्‍तोष करना पड रहा है।

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  9. फेस बुक पर श्री सुरेशचन्‍द्रजी करमरकर, रतलाम की टिप्‍पणी -

    अब यह (प्रेम विवाह) अनिवार्य और अपरिहार्य है। प्रेम विवाह हमारा सामाजिक परिदृष्‍य बदल देंगे। मैं, अपनी रिश्‍तेदारियों में, 6 प्रेम विवाहों का साक्षी हूँ और सब जोडे खुश हैं।

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.