वर्ना

श्री बालकवि बैरागी के काव्य संग्रह 
‘वंशज का वक्तव्य’ की अठारहवीं कविता

यह संग्रह, राष्ट्रकवि रामधरी सिंह दिनकर को समर्पित किया गया है।



वर्ना

जिनकी माँ हो
केवल गाय और गंगा
जिनके लिए कपड़ों का चिथड़ा मात्र
हो पावन तिरंगा।

आजादी को अभिशाप और
प्रजातन्त्र को जो समझें
मर्खों का तन्त्र
हर तरह की दासता ही हो
जिनका मूलमन्त्र।

गाली, गोली और देशद्रोह हो
जिनका कार्यक्रम
ऐसे मीरजाफरों और जयचन्दों को
कब तक सहेंगे हम?

भारत को जो मानें मात्र
महाभारत का देश
जिनकी भाषा और संस्कृति हो
अशालीन, फूहड़ और गन्दी विशेष।

जो माँ और बहिन तक को
नहीं पहचानें
जो आज भी गुलामी को
गाँधी से बेहतर मानें।

उन्हें पहचानो, पकड़ो और बेनकाब करो!
इस देश में जीने का शर्तनामा
चिपकाओ उनकी आँखों पर।

बचाओ उनसे गाय और गंगा को।
उन्हें राजनीति की भाषा और
प्रजातन्त्र की परिभाषा का बोध कराओ।

बेशक उन्हें नहीं मिली है आजादी घुट्टी में
पर विरासत निरर्थक नहीं होती।
देशमाता का दयित्व भी होता है जीवन दर्शन।

लाठी, कवायद और घृणा से 
नहीं होता पीढ़ियों का निर्माण।
उनसे बन सकता है पाकिस्तान
पर कदापि निर्मित नहीं होता हिन्दुस्तान।

राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद के लिए
संकीर्णता नहीं, सन्तुलन चाहिये।

इन सारी बातों को उनकी भाषा में बोलो।
उनसे कहो कि आत्महत्या के 
और भी कई तरीके हैं।
देश के नाम पर नहीं करें वे
हत्या या आत्मघात
वर्ना बड़े क्रूर होते हैं इतिहास के हाथ।

समय के पंजे बहुत सख्त होते हैं
और सजा देते वक्त वे बहुत कम्बख्त होते हैं।
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वंशज का वक्तव्य (कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - ज्ञान भारती, 4/14,  रूपनगर दिल्ली - 110007
प्रथम संस्करण - 1983
मूल्य 20 रुपये
मुद्रक - सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस, मौजपुर, दिल्ली - 110053




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। 
‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा की पोती। 
रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।




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