बालकवि बैरागी: शब्दों से परे हैं ये सन्बन्ध

डॉ. बंसीधर

आज के बालकवि और आज से पचास वर्ष पहले के नन्दराम दास बैरागी को मैंने पहली बार पीपल्या रावजी (मेरे गाँव भाटखेड़ी से कुछ दूरी पर स्थित एक गाँव) में देखा था। इस गाँव में मेरे रिश्ते की सुन्दर बुआ रहती थी। मैं उनके यहाँ आता-जाता रहता था। एक बार पहुँचा तो बुआ बोली कि मनासा से द्वारका दासजी का नन्दा भी आया हुआ है। अभी अपने खेत पर गया हुआ है। थोड़ी देर बाद बुआ के साथ मैं भी खेत पर पहुँच गया। वहाँ जाकर देखा कि नन्दराम दास और बुआ का कोई एक लड़का ‘कलाम-डारा’ खेलने में लगे हैं। नन्दराम हैं कि आम के वृक्ष की एक जाड़ी-लम्बी डाल पर बैठे हैं और नीचे खड़ा है बुआ का लड़का। दाँव जो भर रहा था। हाथ में डण्डा लिए ऊपर की ओर ताक रहा था, शायद सोच रहा था कि कैसे नन्दराम को छूकर ‘आडर’ किया जाए। इस समय नन्दराम उर्फ बालकवि सफेद टोपी पहने हुए थे।  उस समय उनसे क्या बातें हुईं, यह तो मुझे स्मरण नहीं है, पर हाँ, इतना भर याद है कि उन्होंने डालपर बैठे-बैठे ही मुझसे कहा था कि वे आठवीं में पढ़ते हैं। यह सुनकर मेरे मन में उनके प्रति गर्व का भाव जन्मा था; क्योंकि मैं तो उन दिनों दूसरी-तीसरी कक्षा में रहा होऊँगा। फिर वे कब अपने गाँव मनासा गए और कब मैं अपने गाँव भाटखेड़ी लौटा, कुछ भी याद नहीं है।

अपने व अपने ननिहाल के गाँव (पड़दा) से प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मुझे हाईस्कूल मनासा में भरती कराया गया। उन दिनों मनासा का यह हाईस्कूल मेरे गाँव से दक्षिण में लगभग पाँच-छह किलोमीटर की दूरी पर था। इसलिए छठवीं कक्षा से मैट्रिक की परीक्षा पास करने (1955) तक गाँव से मनासा और मनासा से गाँव तक की हर रोज की पाँच-छह किलोमीटर की इस पैदल-्यात्रा का क्रम बराबर बना रहा। उन दिनों मनासा पाँच-छह हजार की बस्ती वाला एक कस्बा था। मेरे गाँव की ओर से मनासा में प्रवेश करके कुछ ही दूरी पार करने पर बाएँ हाथ की ओर जाने वाली एक गली के मोड़ पर पहला ही मकान बाल कवि का पड़ता था। मैं अपने सहपाठी ऋषभ चरण जैन के साथ इसी गली से होकर, कामरिया लोगों का मुहल्ला पारकर स्कूल पहुँचता था। रोज के आने-जाने के इस क्रम में बालकवि का यह मकान हमारे लिए विश्राम स्थल सा हो गया था। मकान के बाहर ही लगा हुआ एक ओटला था, जिस पर बालकवि के पिता अक्सर बैठे हुए मिल जाया करते थे। प्रसन्न वदन और सबका सुख-दुःख बाँटने वाला उनका वाणी-व्यवहार मुझे अब भी खूब याद है। रोज ही उनके घर के आगे से गुजरने के कारण मेरा उनसे ठीक-ठीक परिचय हो गया था। स्कूल से घर लौटते समय मैं अक्सर उनके पास पाँच-दस मिनट के लिए बैठ जाया करता था। घर-परिवार और मेरी पढ़ाई-लिखाई यही मूलतः हमारी बातचीत का विषय हुआ करता था। इस बीच कभी प्यास लगी होती तो बालकविजी की माताजी पानी का लोटा-गिलास भरकर रख जातीं। पानी पीकर गाँव-घर का रास्ता पकड़, उसके पूर्व एक आशीर्वाद अवश्य ही उनके पिताजी से मिल जाता था - ‘खूब पढ़ा-लिखो और अच्छी उन्नति करो।’

मुझे याद नहीं आता कि इस बीच मेरी कभी बालकवि से भेंट हुई हो। इतनी जानकारी जरूर मेरी थी कि वे मैट्रिक पास करके मनासा में ही एक जाने-माने वकील श्री जमनालालजी जैन के साथ उनके कोर्ट-कचहरी के काम से जुड़ गए हैं। मैं नहीं जानता कि वे मुझे कितना जानते थे और कितना नहीं? पर मेरा अनुमान है कि अपने माता-पिता के माध्यम से वे इतना तो जान ही गए होंगे कि मैं भाटखेड़ी का रहनेवाला उन्हीं के समाज का एक किशोर हूँ, जो मनासा के हाईस्कूल में पढ़ता है।

मेरा अनुमान है कि बालकवि तब तक अपनी काव्य-साधना में लग चुके थे। उनके निकट तथा आसपास रहनेवाले लोग एक कवि के रूप में उन्हें जानने भी लगें हों तो आश्चर्य नहीं। मैं यह बात इस आधार पर कह रहा हूँ कि उनके मकान की ऊपरी मेड़ी, जिसे उनकी साधना-स्थली भी कह सकते हैं, के पश्चिम की ओर खुलनेवाले दरवाजे के एक पल्ले पर लिखे “पागल कुटीर” शब्द पर प्रायः मेरी दृष्टि, स्कूल से लौटते समय पड़ जाया करती थी। मैं लम्बे समय तक इस शब्द को पढ़ता रहा हूँ। ‘पागल’ शायद उन्होंने अपना उपनाम रखा था। एक बार मुझे भी इस मेड़ी पर जाने का अवसर मिला था। तब तक सुशीला भाभी और बालकवि एक बालक मुन्ना (सुशील नन्दन) के माता-पिता बन चुके थे। मैंने तीनों को पहली बार इस मेड़ी पर देखा था। बाद में लम्बे समय तक वह ‘मेड़ी’ तथा उसके दरवाजे का वह पल्ला तो बने रहे, किन्तु पल्ले पर का ‘पागल-कुटीर’ शब्द कब लुप्त हो गया, कह नहीं सकता? अब तो मेड़ी या कुटीर भी नहीं है। इधर ‘पागल’ को अपदस्थ कर वर्षों पहले उसकी जगह ‘बालकवि’ शब्द आकर जम गया है। देश और दुनिया उन्हें इसी नाम से जानती है।

सन् 1952 में देश में पहला-पहला आम चुनाव। मैं उन दिनों हाईस्कूल में ही पढ़ता था। उन दिनों शायद आठवीं कक्षा में रहा होऊँगा। इसी दौरान चुनाव प्रचार की दृष्टि से काँग्रेस के वरिष्ठ व ख्यातनाम नेता डॉ. कैलाशनाथ काटजू का मनासा में एक आमसभा का आयोजन होना था। मैं भी सुनने को पहुँचा था उन्हें। आमतौर पर आम सभाओं में जैसी गहमा-गहमी होती है, वैसी यहाँ भी थी। मेरी उत्सुकता काटजूजी को देखने और सुनने में थी। मंच पर वे आकर बैठ चुके थे। दो-चार स्थानीय नेता भी उनके अगल-बगल जमे हुए थे। स्वागत-सत्कार की औपचारिकता के बाद एकाएक मंच से ‘अनाउंसमेण्ट’ हुआ कि अब नन्दरामदास बैरागी अपना एक गीत गाएँगे। वहाँ मैंने पहली बार बालकवि को हारमोनियम पर मालवी गीत गाते हुए सुना। उन्होंने वहाँ एक से ज्यादा ही गीत गाए थे। काफी दिनों तक मुझे इन गीतों के मुखड़े याद थे। उसके बाद तो बालकवि ने रामपुरा वगैरह में भी श्री काटजू की उपस्थिति में आम सभाओं में अपनी रचनाएँ पढ़ीं (बात स्वयं बालकविजी ने पिछली 29 सितम्बर को मेरे निवास पर हुई बातचीत में प्रसंगवश बताई थी) इस गीत-गान ने श्री काटजूजी का मन मोहा और स्नेह से भरकर सहज रूप से इस उभरते रचनाकार को उन्होंने ‘बालकवि’ सम्बोधन करके अपना आशीष दे दिया। यों नन्दरामदास बैरागी ‘बालकवि’ के रूप में एक नई ऊर्जा के साथ सामने आए। उन्होंने अपने गीतों में पहले मालवा को गाया और फिर देश को। नाम उनका भले ही ‘बालकवि’ रहा हो, किन्तु इस गीतकार-कवि ने ओज व श्रृंगार की अपनी रचनाओं की अत्यन्त ही आह्लादक, मोहक एवं सस्वर प्रस्तुति द्वारा अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों के मंचों पर विराजे देश के बड़े-बड़े तपःपूत साधकों एवं लोकप्रिय रचनाधर्मियों से भी अपनी पीठ थपथपाने एवं उनका शुभाषीश प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है। इस सम्बन्ध में मैं यहाँ सन् 1957 में इन्दौर के ‘टाउन हॉल’ में आयोजित उस अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का उल्लेख करना चाहूँगा, जिसमें देश के तत्कालीन शीर्ष कवि श्री बच्चन, डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन, श्री नीरज आदि मंच पर मौजूद थे। हॉल खचाखच भरा हुआ। हजारों लोगों ने हॉल के बाहर खड़े रहकर अपने प्रिय कवियों को सुना। आए थे लोग उक्त प्रसिद्ध कवियों को सुनने, पर उस दिन मंच ले गया मालवा का यह बालकवि बैरागी। उस समय उन्होंने जो रचना पढ़ी थी, उसका शीर्षक था ‘हम बच्चों का है कश्मीर’। हजारों-हजार तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बालकवि बैरागी उस मंच पर एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में उभरकर सामने आए। सम्भवतया इसी मंच ने बालकवि को एक अखिल भारतीय कवि के रूप में पहचान दी। उन दिनों मैं ‘होल्कर कॉलेज’ में इण्टरमीडिएट का छात्र था। सन् 1955 में मैंने हाईस्कूल मनासा से मैट्रिक की परीक्षा पास की।

उसके बाद मेरे सामने प्रश्न आया कि नौकरी करूँ या आगे पढ़ने के लिए इन्दौर जाऊँ? जिस जैन परिवार में मैं रहता था, उसने यह निर्णय मेरे ऊपर छोड़ दिया था। अन्त में मैंने इन्दौर जाकर आगे पढ़ने की इच्छा जताई। इस जैन परिवार का बड़ा पुत्र मोहनलाल, जिसे मैं मोहन दादा कहता था, इन्दौर में शिक्षक था तथा छोटा पुत्र ऋषभ चरण, जिसका नामोल्लेख ऊपर हो चुका है, मेरे साथ ही मैट्रिक पास हुआ था। उसे तो आगे पढ़ाई की दृष्टि से इन्दौर जाना ही था। सो, उसके साथ-साथ अपना भी नम्बर लग गया। वहाँ मुझे भी मोहन दादा के साथ ही रहना था। अतः आवास-आहार की समस्या तत्काल तो सामने नहीं थी; किन्तु कॉलेज की फीस पुस्तकें आदि का खर्च तो सामने था। मैं नहीं चाहता था कि मोहन दादा पर मेरा यह अतिरिक्त भार भी पड़े। इसी चिन्ता में मैं एक दिन बालकवि के पास मनासा पहुँचा और उनके सामने अपनी समस्या रखी। तब उन्होंने तत्काल ही कविवर डॉ. सुमनजी (वे उन दिनों होल्कर कॉलेज इन्दौर में प्रोफेसर व हिन्दी विभागाध्यक्ष थे) के नाम एक पत्र लिखकर मुझे दे दिया।

पत्र का प्रभाव यह हुआ कि बी. ए. के प्रथम वर्ष में मेरी फीस भी माफ हो गई और ‘पूअर बॉयज फण्ड’ से पुस्तकों की व्यवस्था भी हो गई। इसी पत्र के कारण मैं डॉ. सुमनजी के सम्पर्क में आया और एम. ए. करने के बाद उनके निर्देशन में मुझे पी.एचडी. करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

सन् 1956 से 1961 तक का समय मेरा इन्दौर में पढ़ाई में बीता। बाद में तो वहाँ मुझे अध्यापक की नौकरी भी मिल गई थी। यों नौकरी एवं पढ़ाई दोनों ही साथ-साथ चलती रही। व्यस्त तो काफी रहना पड़ता था, पर ‘अच्छा पढ़ लेने की एक साध’ मेरे मन में सदैव पलती रही। इन वर्षों में बालकविजी से मेरा सम्पर्क सतत् बना रहा। वे अकसर आकाशवाणी इन्दौर और कवि सम्मेलनों में इन्दौर आया करते थे और मैं उनसे अचूक मिला करता था। वे भी मेरी खोज-खबर लेते रहते थे। मनासा की बजाय मैंने उक्त वर्षों में अपने को उनके अधिक निकट पाया। उसके बाद तो सम्बन्धों का यह सूत्र दृढ़ से दृढ़तर होता गया। सन् 1968 से मैं बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग से सम्बद्ध हो गया। मध्य प्रदेश छूट गया। निवृत्त होने के बाद भी यहीं जमा हूँ। इन चालीस वर्षों में बालकवि और मेरे सम्बन्‍धों में गहरी आत्मीयता का रंग घुलता रहा है।

यह मेरा सौभाग्य रहा है कि राजनीति व साहित्य जगत के बहुत बड़े फलक पर पहुँचने के बाद भी उनका भरपूर स्नेह-सौहार्द्ध मिलता रहा है। इन वर्षाे में जब भी गुजरात में आए हैं उन्होंने एक बड़े भाई की तरह मेरी व परिवार की सुध ली है। घर आए हैं, समय निकालकर। जितनी भी देर घर पर रहे, अपनी चर्चाओं एवं ठहाकों से उल्लास और आनन्द बिखेरते रहे हैं। यह सिलसिला घण्टों ही चलाए रखने की उनमें अद्भुत क्षमता है। इस माहौल में भी बीच-बीच में आपको उनसे उनके चिन्तन व अनुभव से अनुस्यूत सूत्रवाक्य सुनने को मिल जाएँगे। ऊब एवं उदासी के लिए उनके यहाँ कभी कोई जगह नहीं रही। सम्बन्धों को सींचने एवं उनका निर्वाह करने में वे अनुपमेय व अनन्य रहे हैं। मैंने उन्हें हरदम सजग व सचेत पाया है। अत्यन्त ही व्यस्तता में भी आप उन्हें हरदम व्यवस्थित पाएँगे। वाणी-व्यवहार के पूरे धनी-मानी हैं। वे सत्य व सौजन्य से भरपूर एक प्रेरणा पुरुष हैं। जितना भी कहा जाए, उतना ही कम होगा।

मुझे उनसे असीम अपनत्व व आत्मीयता मिली है, जिसे किसी तरह के शब्दों में व्यक्त कर पाना सम्भव नहीं है। इतना भर जानता हूँ कि वे मेरे अग्रज हैं तथा मैं उनका प्रिय ‘बंसी बाबू’।

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नंदा बाबा: फकीर से वजीर
ISBN 978.93.80458.14.4
सम्पादक - राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक - सामयिक बुक्स,
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प्रथम संस्करण - 2010
मूल्य - 300.00
सर्वाधिकार - सम्पादक
आवरण - निर्दोष त्यागी


यह किताब मेरे पास नहीं थी। भोपाल से मेरे छोटे भतीजे गोर्की और बहू अ. सौ. नीरजा ने उपलब्ध कराई।  

 


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