यशोविजय सूरिश्वरजी महाराज से मेरी याचना

'बर्ग वार्ता' की आज की पोस्ट दिमागी जर्राही बरास्ता नाक [इस्पात नगरी से - खंड 9] पढ़ कर (और टिप्पणी के रूप में ‘बिन माँगी सलाह’ देकर) चुप बैठ गया था। किन्तु लगा कि कुछ चूक कर रहा हूँ। सो, ब्लाग फिर खोला तो पाया कि प्रदीप मानोरिया भी मेरे अनुमान को पुष्ट करते हुए टिपिया चुके हैं। मनोरियाजी की टिप्पणी से लगा कि मैं ‘जैन साधु’ के विदेश प्रवास से ‘खिन्न’ हूँ। जबकि वास्तविकता इसके पूर्णतः विपरीत है। तब, अनुरागजी की दी हुई, अखबार की लिंक से, ‘पिट्सबर्ग ट्रीब्यून-रीव्यू’ का पूरा समाचार पढ़ा।


यशोविजय सूरिश्वरजी महाराज की प्रसन्नता भली लगी किन्तु डा. दिनेश मेहता और श्रीकान्त भाई पारीख का ‘स्पष्टीकरण’ अच्छा नहीं लगा। दोनों के ‘स्पष्टीकरण’ में ‘प्रायश्चित भाव’ यद्यपि कहीं नहीं है तदपि ‘अपराध बोध’ को ‘बिटविन द लाइन्स’ आसानी से पढ़ा जा सकता है।


मैं ‘सनातनी’ हूँ किन्तु स्वीकार करता हूँ कि सनातनी साधुओं में से गिनती के साधु ही मुझे आकर्षित कर पाए है और प्रभावित करने वाले तो नगण्य से हैं। वे ‘मोह माया त्याग’ करने का उपदेश देते हैं किन्तु देखता हूँ वे खुद ‘मोह माया’ को चिपटाए बैठे हैं। इनमें से कुछ राजाओं को भी परास्त करते नजर आते हैं तो कई स्थानीय जमीदारों/जागीरदारों जैसे।

इनकी तुलना में जैन साधुओं ने मुझे तनिक अधिक आकर्षित किया। इनमें भी दिगम्बर सन्तों ने अधिक। इनमें से विद्यानन्दजी महाराज को तो मैं अब तक अपनी स्मृति में से रंच मात्र भी मद्धिम नहीं कर पाया हूँ। उनके प्रवचन सुनने के लिए मैं अपने गाँव मनासा से कोई सवा दौ सौ किलोमीटर की यात्रा कर इन्दौर तक गया हूँ। यह सन् 61-62 की बात होगी तब यातायात के साधन अत्यल्प और सीमित थे। आकाशवाणी के इन्दौर केन्द्र के तत्कालीन केन्द्र निदेशक नैयर साहब ने, इन्दौर में उनका साक्षात्कार जब रेकार्ड किया था तब सौभाग्यवश मैं भी उपस्थित था। वह साक्षात्कार, अपने-अपने क्षेत्र के दो महारथियों का ऐसा अविस्मरणीय सम्वाद था जिसमें दोनों ही ‘लुट जाने को उतावले’ हुए जा रहे थे। नैयर साहब घुमा-फिरा कर सवाल कर रहे थे और विद्यानन्दजी महाराज बिना किसी लाग लपेट के उत्तर दिए जा रहे थे वह भी इतना विस्तृत कि नैयर साहब के अगले दो-तीन पूरक प्रश्न उसमें स्वतः ही समाहित हो रहे थे। उस साक्षात्कार में विद्यानन्दजी महाराज ने (सम्भवतः कन्नड़ के) कुछ लोक गीत गाकर सुनाए थे।

उनके बाद मुझे आकर्षित, प्रभावित और मोहित किया, त्रिस्तुतिक श्वेताम्बर समाज के जयन्‍तसेन सूरिश्वरजी महाराज ने। इनके व्याख्यानों की सादगी और सरलता मेरे अन्तरतम तक पैठ गई और आज दशा यह है कि वे यदि मेरे कस्बे के आसपास कहीं आते हैं तो उनके दर्शनार्थ जाने की कोशिश अवश्य करता हूँ।


मेरे इस आचरण पर सनातनी कम और जैनी अधिक ताज्जुब करते हैं। हाँ, सनातनी इस बात पर रोष अवश्य प्रकट करते हैं कि मैं लोकप्रिय और स्थापित साधु-सन्तों तथा प्रवचनकारों के पाण्डालों की भीड़ में नजर क्यों नहीं आता हूँ। मैं चुप रह जाता हूँ। यह भी नहीं बताता कि जिन, दिगम्बर जैन सन्त तरुणसागरजी के पाण्डालों को ‘दर्शक’ हर बार छोटा और अपर्याप्त साबित करते हैं, मैं वहाँ भी नहीं होता।

सो, मुझे यशोविजय सूरिश्वरजी महाराज के विदेश प्रवास ने पुलकित ही किया। मैं ने अनुरागजी को उनसे मिलने का आग्रह केवल इसलिए किया ताकि जैन सन्तों के विदेश प्रवास के समर्थन में पुष्ट, शास्त्रोक्त तर्क और प्रमाण प्राप्त किए जा सकें और उनका लाभ विश्व भर के ‘श्रावकों’ को मिल सके। किन्तु डाक्टर मेहता और श्रीकान्त भाई के वक्तव्यों ने मुझे निराश किया।


‘जैन मत’ के बारे में मेरी जानकारियाँ उतनी ही हैं जितनी कि किसी ‘सड़कछाप आदमी’ की हैं। किन्तु जैन सन्तों सहित मैं समस्त धर्मों, समुदायों के ‘साधु-सन्तों’ के विदेश प्रवास का ‘धुर समर्थक’ हूँ। इसके पीछे हैं - विवेकानन्द। वे भी ‘साधु-सन्त’ ही थे। वे यदि भारत से बाहर नहीं जाते तो अमरीकी समाज को भारत और भारतीयता की आत्मा के दर्शन नहीं हो पाते।

इस क्षण जैन सन्त सुशील मुनिजी महाराज बड़ी शिद्दत से याद आ रहे हैं। उन्होंने न केवल विदेश यात्राएँ कीं अपितु विदेशी महिलाओं को अपने शिष्य मण्डल में भी सम्मिलित किया। सुशील मुनिजी के इस आचरण पर तब हल्ला मचा था किन्तु वे अविचलित रहे। आज भी उनके अनुयायी पूरी दुनिया में मौजूद है और इससे बड़ी तथा महत्वपूर्ण बात यह कि उन्हें ‘अजैन’ अथवा ‘जैन विरोधी’ घोषित कर उनका बहिष्कार नहीं किया गया।


मालवा स्थित भानपुरा (जिला मन्दसौर, मध्य प्रदेश) स्थित शंकराखर्य उप पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी सत्यमि़त्रानन्दजी गिरी ने समस्त निषेधों को परे धकेल कर, सत्तर की दशक के पूर्वार्द्ध में विदेश यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान उन्हें उपलब्ध ‘स्त्री गाईड’ ने बीसियों बार उनका कन्धा थपथपाते हुए, ‘सी, मिस्टर गिरी’ कह कर महत्वपूर्ण स्थानों/चीजों की ओर उनका ध्यानाकर्षित किया जबकि उनके लिए ‘स्त्री स्पर्श’ वर्जित था। ये बातें स्वयम् सत्यमित्रानन्दजी ने मेरे गृह नगर मनासा में, दादा को दिए एक साक्षात्कार में बीसियों भक्तों की उपस्थिति में बताई थीं। यह साक्षात्कार उन दिनों, मन्दसौर से प्रकाशित हो रहे ‘दैनिक कीर्तिमान’ में ‘सुरा लोक में शंकराचार्य’ शीर्षक से श्रृंखलाबध्द सचित्र प्रकाशित हुआ था। सत्यमित्रानन्दजी का सान्निध्य और मार्ग दर्शन आज भी समूचे सनातन समाज को प्राप्त है और उनके प्रति आदर भाव में रंच मात्र भी कमी नहीं है।


ऐसे में यशोविजय सूरिजी महाराज का पिट्सबर्ग जाना, अपनी शल्य चिकित्सा कराना मुझे न केवल भला और आह्लादकारी लगा अपितु, ‘जीव जगत् की बड़ी सेवा’ भी लगा। महाराजजी की पिट्सबर्ग यात्रा को मैं तो ‘ईश्वरेच्छा’ से तनिक आगे बढ़ कर ‘ईश्वरीय आदेश’ मानता हूँ। डाक्टर मेहता और श्रीकान्त भाई को तो, महाराजजी के पिट्सबर्ग आगमन के प्रसंग से, वहाँ उपजे उल्लास और उत्सव भाव का उद्घोषक बन कर, यह कहना बन्द कर देना चाहिए कि महाराजजी वहाँ केवल चिकित्सा हेतु पहुँचे हैं सो चिकित्सा करवाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करेंगे, कुछ भी नहीं कहेंगे।


‘साधु-सन्त’ किसी भी समाज की मूल्यवान परिसम्पत्ति मात्र नहीं होते, वे तो समाज की सबसे बड़ी ‘आश्वस्ति’ होते हैं। परिवार के बड़े-बूढ़ों की उपस्थिति से समूचे परिवार में जो निश्चिन्तता उपजती है, वही निश्चिन्तता पूरा समाज अपने साधु-सन्तों कर उपस्थिति के कारण अनुभव करता है।

डाक्टर मेहता और श्रीकान्त भाई ने सूचित किया है कि अपनी विदेश यात्रा के ‘पातक के प्रायश्चितरूवरूप’ महाराजजी आने वाले दिनो में उपवास करेंगे। इस सूचना से ‘उत्साहित’ और तनिक अधिक ‘लालची’ होकर (कि जब आप 'प्रायश्चित-उपवास' कर ही रहे हैं तो), मैं आदरणीय यशोविजय सूरिश्वरजी महाराज साहब से कर बध्द याचना कर रहा हूँ - ‘‘महावीर की इच्छा (या कि आदेश) के अधीन आप पिट्सबर्ग पहुँचे हैं। वहाँ के ‘जैन श्रावाकों’ पर ही नहीं, वहाँ प्रकृति में उपस्थित समस्त जीवों पर कृपा कीजिए, उन्हें ‘महावीर वाणी’ का अमृत पान कराने का पुण्योपकार करें। उन सबके सौभाग्य से ही आप वहाँ विराजमान हुए हैं। इस ‘अजैन श्रावक’ की यह याचना स्वीकार करने का उपकार करें। आप चाहेंगे तो, आपके प्रायश्चित में, अपनी क्षमतानुरूप मैं भी शामिल होने का प्रयत्न करूँगा।

‘‘आपका यह कृपापूर्ण आचरण महावीर की महत् सेवा की दिशा में ऐसा ‘छोटा सा कदम’ होगा जिससे बनी पगडण्डी, वैश्विक राजमार्ग में परिवर्तित होगी।

‘‘कृपया मेरी वन्दना स्वीकार कर मुझे उपकृत करें।’’

(मेरी यह पोस्ट ‘स्मार्ट इण्डियन’ श्री अनुराग शर्मा को समर्पित है। यह उनकी निजी सम्पत्ति है। वे अपनी इच्छानुसार इसका उपयोग करने को अधिकृत तथा स्वतन्त्र हैं।)

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'वर्षा' आ गई फागुन में : इसे सहेज लीजिए

‘जीवन वर्षा’
भारतीय जीवन बीमा निगम की नई योजना (पालिसी)

कल, 16 फरवरी को, भारतीय जीवन बीमा निगम (एल. आई. सी.) एक बार फिर अपने स्थापित, जग-जाहिर और पारम्परिक आत्म विश्वास का परिचय देते हुए अपनी नई पालिसी ‘जीवन वर्षा’ बाजार में प्रस्तुत कर रहा है। मन्दी की उथल-पुथल से त्रस्त इस ‘भीषण विकट आर्थिक समय’ में एल. आई. सी. एक बार फिर सुनिश्चित लाभ (ग्यारण्टीड एडीशन) देने वाली पालिसी प्रस्तुत कर, देश के असंख्य मझोले निवेशकों को ‘बीमा सुरक्षा और सुनिश्चित लाभ’ एक साथ उपलब्ध कराने का ‘अविश्वसनीय कारनामा’ ही कर रही है।

‘जीवन वर्षा’ (तालिका 196) की महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार हैं -

- यह एल. आई. सी. की ऐसी पहली ‘धन वापसी योजना’ (मनी बेक पालिसी) है जिसमें तीन-तीन वर्षों के अन्तराल पर धन वापसी का प्रावधान है। अन्यथा, एल. आई. सी. की अब तक उपलब्ध ‘धन वापसी योजनाओं’ (मनी बेक पालिसियों) में चार-चार अथवा पाँच-पाँच वर्षों के बाद ‘धन वापसी’ का प्रावधान है।

- यह योजना सीमित अवधि, 31 मार्च 2009 तक के लिए ही उपलब्ध है।
- यह योजना, 15 वर्ष (पूर्ण) से 66 वर्ष की आयु समूह के लोगों के लिए है।
- परिपक्वता आयु अधिकतम 75 वर्ष।
- योजना दो अवधियों (9 वर्ष तथा 12 वर्ष)के लिए उपलब्ध है।

- प्रीमीयम भुगतान अवधि - 9 वर्ष। यह अवधि दोनों पालिसी अवधियों के लिए समान है। अर्थात् 12 वर्ष की पालिसी अवधि का विकल्प लेने पर भी किश्त भुगतान 9 वर्ष तक ही करना है। 9 वर्ष पालिसी अवधि विकल्प में तो किश्त भुगतान अवधि 9 वर्ष है ही।

सुनिश्चित लाभ (ग्यारण्टीड एडीशन)

(अ) 9 वर्ष पालिसी अवधि वाली योजना के लिए 65 रुपये प्रति वर्ष प्रति हजार। तथा

(ब) 12 वर्ष पालिसी अवधि वाली योजना के लिए 70 रुपये प्रति वर्ष प्रति हजार।

- इसके अतिरिक्त, परिपक्वता भुगतान के साथ ‘निष्ठा आधिक्य’ (लायल्टी एडीशन) भुगतान

का भी प्रावधान।



योजना के लाभ -
(1) 9 वर्ष पालिसी अवधि वाली योजना में, पालिसी के -

- 3 वर्ष पूरे होने पर बीमा धन की 15 प्रतिशत राशि का भुगतान।

- 6 वर्ष पूरे होने पर बीमा धन की 25 प्रतिशत राशि का भुगतान।

- 9 वर्ष पूरे होने पर (अर्थात् परिपक्वता के समय) बीमाधन की शेष 60 प्रतिशत राशि के साथ सुनिश्चित लाभ की राशि तथा निष्ठा आधिक्य की राशि का भुगतान।

(2) 12 वर्ष पालिसी अवधि वाली योजना में, पालिसी के -

- 3 वर्ष पूरे होने पर बीमा धन की 10 प्रतिशत राशि का भुगतान।

- 6 वर्ष पूरे होने पर बीमा धन की 20 प्रतिशत राशि का भुगतान।

- 9 वर्ष पूरे होने पर बीमा धन की 30 प्रतिशत राशि का भुगतान।

- 12 वर्ष पूरे होने पर (अर्थात् परिपक्वता के समय) बीमा धन की शेष 40 प्रतिशत राशि के साथ, सुनिश्चित लाभ की राशि तथा निष्ठा आधिक्य की राशि का भुगतान।



बीमा सुरक्षा

-पालिसी प्रारम्भ दिनांक से, पालिसी के अन्तिम वर्ष से पहले वाले वर्ष तक की अवधि में मृत्य होने पर - बीमा धन की रकम तथा मृत्यु के समय तक की पालिसी अवधि के सुनिश्चित लाभ की रकम का भुगतान।

- पालिसी के अन्तिम वर्ष में (परिपक्वता दिनांक से पहले) मृत्यु होने की दशा में बीमा धन की रकम तथा सुनिश्चित लाभ की रकम तथा निष्ठा आधिक्य की रकम का भुगतान।

विशेष - मृत्यु दावे की रकम में से, 3-3 वर्षों के अन्तराल में किए गए भुगतान की रकम कम नहीं की जाएगी। यह प्रावधान, एल. आई. सी. की पहले से चली आ रही मनी बेक पाॅलिसियों में भी उपलब्ध है।

न्यूनतम बीमा धन - रुपये 50,000/-उसके बाद रुपये 5,000/- के गुणक में।
अधिकतम बीमा धन - कोई सीमा नहीं। (किन्तु प्रस्तावक की आयु और सकल आय के आधार पर निर्धारित अनुपात के अनुसार।)

प्रीमीयम निर्धारण में उपलब्ध रियायतें

भुगतान विधि छूट -

-वार्षिक भुगतान विधि पर मूल प्रीमीयम दर पर 2 प्रतिशत की और अध्र्द वार्षिक भुगतान विधि पर मूल प्रीमीयम दर पर 1 प्रतिशत की छूट।

बीमा धन छूट -

95,000/- तक - कोई छूट नहीं।

1 लाख से 1,95,000/- तक - मूल प्रीमीयम दर पर 2 रुपये प्रति हजार।

2 लाख से 4,95,000/- तक - मूल प्रीमीयम दर पर 3.50 रुपये प्रति हजार।

5 लाख तथा अधिक पर - 5 रुपये प्रति हजार।

(बीमा एजेण्ट जब आपको उदाहरण देते हुए प्रीमीयम बताता है तो उसमें समस्त रियायतें देने के बाद ही रकम बताता है।)

किश्त भुगतान विधि - वार्षिक, अध्र्द वार्षिक और तिमाही।

आय कर प्रावधान -
- चुकाई गई प्रीमीयम की रकम पर, आय कर अधिनियम की धारा 80 (सी) के अन्तर्गत कर छूट मिलेगी।
- पालिसी से मिलने वाली समस्त रकम, आय कर की धारा 10 (10) (डी) के अन्तर्गत आय कर से पूर्णतः मुक्त रहेगी।

प्राप्तियों का ‘लाभ-प्रतिशत’
- 30 वर्ष की आयु वाले व्यक्ति के जीवन पर ली गई, 9 वर्ष अवधि वाली, रुपये 5 लाख बीमा धन की पालिसी पर, आय कर छूट न लेने की दशा में लगभग 9 प्रतिशत की दर से तथा आय कर छूट लेने की दशा में लगभग 17 प्रतिशत की दर से लाभ प्राप्ति अनुमानित है।



- उपरोक्तानुसार ही, 12 वर्ष अवधि का विकल्प लेने पर यह लाभ प्रतिशत, आय कर छूट न लेने की दशा में लगभग 10 प्रतिशत तथा आय कर छूट लेने की दशा में 23 प्रतिशत अनुमानित है।

- यदि मिलने वाली रकम पर आय कर की छूट को भी शरीक कर लिया जाए तो यह लाभ-प्रतिशत और अधिक हो जाता है।

मेरी सलाह -
यह पालिसी उन समस्त लोगों के लिए ‘बिल्ली के भाग से टूटा छींका’ है जो 55 वर्ष से अधिक आयु के हो चुके हैं। 62 पार कर चुके लोगों के लिए तो यह ‘मनी बेक सुविधा सहित, छप्पर फाड़ बीमा सुरक्षा वर्षा’ है।

एल.आई.सी. की वर्तमान मनी बेक पालिसियों में, परिपक्वता की अधिकतम आयु 70 वर्ष निर्धारित की हुई है। अर्थात् 46 वर्ष का व्यक्ति 25 वर्षीय मनी बेक पालिसी, 51 वर्ष आयु का व्यक्ति 20 वर्षीय मनी बेक पालिसी और 56 वर्षीय व्यक्ति 15 वर्षीय मनी बेक पालिसी नहीं ले सकता। 12 वर्ष अवधि वाली कोई मनी बेक पालिसी एल.आई.सी. के पास उपलब्ध है ही नहीं।
किन्तु ‘जीवन वर्षा’ पालिसी में परिपक्वता आयु 75 वर्ष तक कर दी गई है। अर्थात् यह पॅलिसी 66 वर्ष तक की आयु वाले लोगों के लिए उपलब्ध है। वे 9 वर्ष अवधि वाली ‘जीवन वर्षा’ ले सकते हैं और 63 वर्ष की आयु वाले तो 12 वर्ष अवधि वाली ‘जीवन वर्षा’ ले सकते हैं।

जाहिर है कि ‘उच्च जोखिम क्षेत्र’ (हाई रिस्क झोन) में जी रहे जो वरिष्ठजन बीमा सुरक्षा लेने को उत्सुक हैं, उनके लिए तो यह ‘लपक लेने वाला प्रतीक्षित सुनहरा मौका’ ही है।

ऐसे लोगों को तो यह पालिसी, अपनी भुगतान क्षमता के अनुरूप, ‘बिना विचारे’ ही ले लेना चाहिए

- आर्थिक परिदृश्य पर छाया मन्दी का प्रभाव जल्दी दूर होता अनुभव नहीं हो रहा है। सरकार बार-बार भरोसा दिला रही है और अर्थ विशेषज्ञ चेतावनियाँ दे रहे हैं। बैंकों की ब्याज दरें कम होने की आशंका चारों ओर पसरी हुई है। ऐसे में ‘ग्यारण्टीड रिटर्न’ अपने आप में सबसे बड़ा आकर्षण है। कहा जा सकता है कि ‘जीवन वर्षा’ पालिसी लेकर, मन्दी के खतरे से बेफिक्र होकर, टाँगे पसार कर सोया जा सकता है।

- ‘जीवन आस्था’ के समय जो दो बातें मैं ने कही थीं, वे दानों ही दुहरा रहा हूँ। - यह योजना भले ही 31 मार्च तक उपलब्ध है किन्तु अन्तिम तारीख की प्रतीक्षा न करें। यदि यह योजना अनुकूल अनुभव होती है तो तत्काल ही खरीद लें।

- यथा सम्भव, 12 वर्ष अवधि की योजाना लें।

सदैव की तरह कृपया याद रखें - यह विवरण मुझे मिली अब तक की तानकारियों के आधार पर हैं। इन्‍हें भारतीय जीवन बीमा निगम की अधिकृत जानकारियां न समझें।

जीवन बीमा से जुड़ी कुछ छोटी-छोटी जानकारियाँ, गुरुवार को।

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यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

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वेलेण्टाईन डे का विरोध : एक 'कुविचार'

मेरे लेप टाप की घड़ी के मुताबिक इस समय 12 और 13 फरवरी की दरमियानी रात के दो बजने वाले हैं। ‘ब्लागवाणी’ के जरिए ढेर सारे ब्लागों की सैर की। कुछ पर टिप्पणी की। अचानक ही इस पोस्ट का विषय मन में कौंधा। मुमकिन है कि यह ‘कुविचार’ अथवा ‘कुतर्क’ हो किन्तु अन्ततः इसमें ‘विचार’ और ‘तर्क’ तो है ही। इसलिए इसके साथ तनिक अतिरिक्त सदाशयता और उदारता बरती जाए, यह अनुरोध भी है और अपेक्षा भी।


वेलेण्टाइन डे के विरोध का आधारभूत तर्क है कि यह नितान्त पाश्चात्य अवधारणा है और भारतीयता से इसका कोई तादात्म्य नहीं है। सही है। किन्तु यह एकमात्र ऐसी पाश्चात्य अवधारणा क्यों है जो आँखों में खटक रही है? अनेक पाश्चात्य अवधारणाएँ और परम्पराएँ हमने अत्यन्त उदारतापूर्वक और प्रसन्नतापूर्वक अंगीकर कर रखी हैं-बरसों से। जैसे कि, जन्म दिन पर केक काटना।


केक काटने में पहले, केक पर लगी मोम बत्तियाँ फूँक मार कर बुझाई जाती हैं। इसके ठीक विपरीत, भारतीय परम्परा में तो ऐसे प्रसंगों पर दीप प्रज्ज्वलन किया जाता है। कहाँ है वह परम्परा? और तो और, भारतीयता के ज्वाजल्य प्रतीक पुरुष अटलजी के जन्म दिन पर भी केक काटा जाता है! यही क्यों, अब तो मन्दिरों में भी केक काटे जाने लगे हैं! मेरे बच्चे भी केक काट कर ही अपना जन्म दिन मनाते हैं।


एक और पाश्चात्य परम्परा हम समारोहपूर्वक अंगीकार करने लगे हैं। यह है - रिंग सेरेमनी। भारतीय संस्कार सूची में ‘रिंग सेरेमनी’ कहीं है ही नहीं। हाँ, 'वाग्‍दान संस्‍कार' का उल्लेख अवश्य है। लेकिन इसका स्थान अब ‘रिंग सेरेमनी’ ने ले लिया है। मेरे बेटे का ‘वाग्‍दान संस्कार’ जब सम्पन्न हो रहा था तब ‘रिंग सेरेमनी‘ की आवाज उठी थी। मैं ने सहज भाव से इससे इंकार कर दिया था और कहा था कि भारतीय परम्परा में ‘रिंग सेरेमनी’ नहीं है। मेरी बात तब भले ही मान ली गई थी किन्तु कई लोग अब भी मुझसे खिन्न बैठे हैं और गाहे-बगाहे मुझे उलाहना दे ही देते हैं कि मैं ने एक रस्म पूरी नहीं होने दी।


हाथ मिलाना भी भारतीय परम्परा नहीं है। भारतीय परम्परा में तो अपने ही दोनों हाथ जोड़ कर, यथा सम्भव नत-मस्तक हो, सामने वाले का अभिवादन किया जाता है। लेकिन हम सब देख रहे हैं कि ‘करतल युग्म से नमस्कार’ करें न करें, हाथ अवश्य मिलाते हैं।


हाथ मिलाना पूर्णतः पाश्चात्य परम्परा है जिसका अपना अनुशासन है। इसमें ‘जूनीयर’ केवल ‘विश’ (यथा,गुड मार्निंग गुड नून,) करता है और प्रत्युत्तर में ‘सीनीयर’ हाथ बढ़ाते हुए ‘विश’ का जवाब देते हुए कुशलक्षेम पूछता है-‘हाऊ डू यू डू?’ किन्तु हमने न केवल इस पाश्चात्य परम्परा को प्रेमपूर्वक आत्मसात कर लिया है अपितु इसका भारतीयकरण भी कर लिया है-अब ‘जूनीयर‘ भी मिलते ही तपाक् से अपना हाथ आगे बढ़ा देता है और कोई भी इस ‘अशिष्टता’ का बुरा मानना तो दूर रहा, इसका नोटिस भी नहीं लेता!

नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा भी हमारे लिए एक समारोह मात्र है। इस प्रसंग का उपयोग हम अपनी भारतीयता को याद करने और प्रदर्शित करने के लिए करते हैं और जैसे ही हमारा यह ‘मतलब’ पूरा होता है, हम इसे तत्काल ही भूल जाते हैं। हममें से कितने लोग अपने दैनन्दिन व्यवहार में भारतीय महीनों और तिथियों का उपयोग करते हैं? अपवादों को छोड़ दें तो, कोई नहीं। हम सब ‘ईस्वी’ सन् और तारीखें ही प्रयुक्त करते हैं और ऐसा करते हुए क्षणांश को भी अनुचित, अन्यथा अथवा अटपटा नहीं लगता।


ये तो गिनती की बाते हैं जो मुझे इस समय बिना किसी कोशिश के याद आ रही हैं। कोशिश करने पर ऐसी बीसियों बातें निकाली जा सकती हैं।

फिर, आखिर वेलेण्टाईन डे का ही विरोध क्यों? मुझे सन्देह होने लगा है कि यह विरोध कहीं प्रायोजित अथवा ‘डब्ल्यू डब्ल्यू एफ’ की तरह ‘नूरा कुश्ती’ तो नहीं?


इस दिन कोई आयोजन नहीं होते, कोई समारोह नहीं होते। होने के नाम पर बस, आपस में कार्ड का या भेंट का या फूलों का आदान-प्रदान होता है। ऐसे ‘डे’ और इनके बधाई पत्र भी भारतीय परम्परा का अंग नहीं हैं। किन्तु अनेक विदेशी कम्पनियाँ इनका उत्पादन/व्यापार करती हैं। इस व्यापार के आँकड़े अरबों-खरबों के निकल आएँ तो मुझे ताज्जुब नहीं होगा। यही नहीं, यह आँकड़ा वर्ष-प्रति-वर्ष तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। मुझे सन्देह हो रहा है कि कहीं, इन कार्डों का उत्पादन/व्यापार करने वाली विदेशी कम्पनियाँ ही तो यह विरोध प्रायोजित नहीं करवा रहीं? सन्देह इसलिए भी हो रहा है क्यों कि विरोध करने वाले भाई लोग इन कार्डों का विक्रय करने वाली दुकानों को तो निशाने पर लेते हैं पर इन्हें उत्पादित करने वाली फैक्ट्रियों की तरफ देखते भी नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘वहाँ’ न देखने की एवज में ‘पार्टी फण्ड’ मिलता हो और यहाँ ‘देख लेने’ के नाम पर वसूली हो रही हो?


वेलेण्टाईन डे का विरोध करने वालों का विरोध करने के लिए अब गुलाबी चड्डियाँ भेजे जाने का क्रम चल पड़ा है। भारतीय समाज में ‘चड्डी’ कभी भी विरोध का प्रतीक अथवा माध्यम नहीं रही। यह भी पूरी तरह से पाश्चात्य प्रतीक और परम्परा है। इसके उत्पादन और व्यापार में भी विदेशी कम्पनियाँ अग्रणी हैं। कहीं यह अभियान भी तो प्रायोजित नहीं?


मुझे तो इस सबके पीछे कोई ‘विशेषज्ञ’ (मैं ‘माहिर’ और ‘शातिर’ जैसे विशेषण प्रयुक्त करने से बचना चाह रहा हूँ) ‘मानव मनोविज्ञानी मस्तिष्क’ अनुभव हो रहा है। सामान्य मनुष्य प्रकृति के अधीन ‘निषेध सदैव ही आकर्षित करते हैं।’ सो, इसी मनुष्य प्रकृति का ‘वाणिज्यिक उपयोग’ करने के लिए, वेलेण्टाईन डे का विरोध करवाया जा रहा हो ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा इसकी ओर आकर्षित हों, (और विदेशी कम्पनियों को मालामाल करने के लिए) ज्यादा से ज्यादा बधाई पत्र, भेंट दी जाने वाल वस्तुएँ खरीदें। इसे ‘दबाने पर गेंद और ज्यादा उछलती है’ या फिर ‘न्यूटन के गति नियमों’ के अनुसार ‘किसी भी क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है’ भी कहा जा सकता है।


अब ‘विरोध का विरोध’ भी चड्डियों के जरिए हो रहा है। मुझे तो यह भी ‘फारेन गुड्स की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी’ ही अनुभव हो रही है और प्रायोजित या कि ‘नूरा कुश्ती’ ही लग रही है।


आधी रात को मन में उठी इन बातों का मेरे पास न तो कोई आधार है और न ही कोई तथ्यात्मक प्रमाण। ‘यही सही है’ यह कहने की स्थिति में मैं बिलकुल ही नहीं हूँ। किन्तु ‘यह सही क्यों नहीं हो सकता?’ जैसा सवाल, इस समय तो मुझे मथ ही रहा है।


कहीं ऐसा तो नहीं कि भारतीयता की रक्षा के नाम अपने ही लोग अपने ही लोगों को पीट रहे हैं और जेबें भर रहे हैं विदेशियों की?

मुझे किसी की नीयत पर सन्देह नहीं है। किन्तु सन्देह के बीज को अंकुरित होने के लिए न तो उपजाऊ जमीन की आवश्यकता होती है और न ही खाद-पानी की। फिर, जयचन्द और मीर जाफर जैसे नाम, ऐसे क्षणों में न चाहते हुए भी मन में उठने लगें और ‘विश्वामित्र-मेनका’ जैसे प्रसंग आँखों के सामने नाचने लगें तो ऐसे ‘कुविचार‘ और ‘कुतर्क’ सच अनुभव होने लगें तो आश्चर्य नहीं।

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यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


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आपका अधिकार है किश्त भुगतान विधि में परिवर्तन

एनानीमस के नाम से एक पाठिका ने तीन बातें पूछी हैं-

1. लैप्स हुई पॉलिसी के लिए क्या किया जा सकता है? शायद अलग अलग तरह की पॉलिसी के लिए अलग अलग नियम हैं।

आपने बिलकुल ठीक सोचा। कालातीत (लेप्स) पालिसी के पुनर्चलन (चालू कराने) के कुछ नियम सामान्य होते हैं जो सब पालिसियों पर समान रूप से लागू होते हैं। पालिसीधारक की श्रेणी (जो उसके व्यवसाय से निर्धारित होती है), उसकी आयु, पालिसी कितनी चल चुकी है, बीमा धन जैसी कुछ बातें ‘प्राथमिक नियम’ हैं किन्तु योजना (पालिसी) कौन सी ली है, इस पर भी काफी कुछ निर्भर करता है। ये सारी बातें शाखा कार्यालय से सम्पर्क करने पर आपको विस्तार से बता दी जाएँगी।

इस सम्बन्ध मे कृपया मेरी लेप्स पालिसियो के पुनर्चलन का विशेष अभियान शीर्षक पोस्ट देखें। कई बातें स्पष्ट हो जाएँगी।

2. आजकल बहुत से एजेन्ट पहले की तरह किश्त के भुगतान आदि का समय पहले की तरह याद नहीं दिलाते। इसका एक कारण शायद यह भी है कि वे बहुत से कामों में हाथ डाले होते हैं और समय नहीं दे पाते।

अपने पालिसीधारकों को किश्त के देय होने की सूचना देना (और निर्धारित समयावधि में किश्त जमा कराने के लिए ग्राहक को प्रेरित, प्रोत्साहित कर, किश्त का भुगतान सुनिश्चित कराने की कोशिश करना) एजेण्ट की आचरण संहिता का महत्वपूर्ण और अनिवार्य अंश है।

आपका यह अनुमान सही हो सकता है कि एक से अधिक काम हाथ में लेने के कारण एजेण्ट इस संहिता का उल्लंघन करता हो। लेकिन यह उसकी अपनी कठिनाई है। इस आधार पर उसे आचरण संहिता से छूट नहीं मिलती। आप चाहें तो इसकी लिखित शिकायत, सम्बन्धित शाखा प्रबन्धक से कर सकते हैं। यह आपका अधिकार है। किन्तु मेरा विनम्र आग्रह है कि शिकायत करने के बाद, एजेण्ट के अनुनय-विनय से पिघल कर यदि आप अपनी शिकायत वापस लेने की मनःस्थिति में हों तो कृपया शिकायत करें ही नहीं। शिकायतों की वापसी अन्ततः ऐसे एजेण्टों का मनोबल ही बढ़ाती हैं और ग्राहकों के प्रति प्रबन्धन के मन मे अगम्भीरता उपजाती है।

3. क्या पॉलिसी रिन्यू करवाते समय फिर से डॉक्टरी जाँच आदि होती है ? यदि इस दौरान कोई बड़ा रोग हुआ हो तो क्या वह रिन्यू नहीं होती ?

जैसा कि मैंने ऊपर बताया है, पालिसी पुनर्चलन के लिए आवश्यकताओं का निर्धारण शाखा कार्यालय ही करेगा। आवश्यक होने पर आपसे विशेष चिकित्सा परीक्षण कराने के लिए कहा जा सकता है।

‘बड़े रोग’ से आपका आशय स्पष्ट नहीं है। कृपया अपनी ओर से किसी रोग को बड़ा या छोटा न मानें। रोगों का सुनिश्चित वर्गीकरण किया हुआ है। मुमकिन है, जिसे आप ‘बड़ा रोग‘ माने बैठे हैं, वह मामूली रोगों की सूची में हो।

चिकित्सा परीक्षण के आधार पर तीन में से कोई एक ही स्थिति सामने आएगी - (1) आपकी पालिसी पुनर्चलित हो सकेगी। या (2) पुनर्चलित नहीं हो सकेगी। या (3) अतिरिक्त प्रीमीयम के साथ पुनर्चलित हो सकेगी।

चिकित्सा परीक्षण के निष्कर्ष ही निर्णय का आधार होंगे।

श्रीPt.डी.के.शर्मा"वत्स"ने एक शिकायत की है, एक जानकारी चाही है और एक जिज्ञासा प्रस्तुत की है।

पहले उनकी शिकायत-

1.लगभग चार पहले अपने एजेंट के कहे अनुसार मैने न्यू जनरक्षा नाम की एक 2 लाख रूपए की पालिसी ली थी.हमारी अज्ञानता का लाभ उठाकर वो हमे एक पालिसी के बजाय 25-25 हजार की आठ पालिसियां थमा गया.वो तो अब जाकर मालूम हुआ कि वो अपने लाभ के लिए हमारा नुक्सान कर गया.

यह पढ़कर मैं शर्मिन्दा हूँ। किसी भी एजेण्ट ने ऐसा नहीं करना चाहिए। मुझे लगता है कि (जब आपने पालिसी ली थी, उस समय) नव व्यवसाय के सन्दर्भ में, पालिसी संख्या के आधार पर कोई प्रतियोगिता चल रही होगी। उसी के लालच में एजेण्ट ने यह अनपेक्षित और अनुचित आचरण किया होगा। अच्छा होता कि इसके लिए वह आपको विश्वास में लेता। कभी-कभी मैं भी ऐसा करता हूँ किन्तु ऐसे समय दो बातें ध्यान में रखता हूँ - (1) ग्राहक से स्पष्ट स्वीकृती लूँ। और (2) ऐसा करने से ग्राहक को किसी भी स्तर पर, कोई हानि न हो।

मेरी जमात के उस अनाम सदस्य ने आपके साथ जो किया, उसके लिए मैं आपसे क्षमा-याचना करता हूँ। वह जो भी हो, है तो एजेण्ट ही।

2.मेरी कुछ पालिसियों की किस्त भुगतान त्रैमासिक है तथा कुछ की अर्धवार्षिक.मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि क्या अब इनका भुगतान वार्षिक हो सकता है.

आप अपनी पालिसी की किश्त भुगतान विधि, पूरी पालिसी अवधि में चाहे जितनी बार बदल सकते हैं। यह सुविधा आपका अधिकार है। इस हेतु आपको न तो किसी से पूर्वानुमति लेनी है और न कोई पूछताछ करनी है।

बस, एक बात याद रखनी है-

किश्त भुगतान विधि सदैव ही पालिसी प्रारम्भ होने वाले महीने से ही प्रभावी होगी और वह भी तब जबकि आपने उस महीने की देय किश्त का भुगतान न किया हो।

इसे एक काल्‍‍पनिक उदाहरण से समझें -

माना कि आपकी पालिसी की किश्त भुगतान विधि तिमाही है और आपकी पालिसी, मार्च महीने में शुरु हुई है। अर्थात्, आपको मार्च में किश्त चुकानी है।

यदि आप अपनी इस पालिसी की किश्त भुगतान विधि बदल कर वार्षिक या अर्ध्‍द वार्षिक कराना चाहते हैं तो-

(अ) मार्च वाली किश्त नहीं भरें।

(ब) सम्बन्धित शाखा कार्यालय में एक सामान्य आवेदन दे दें। आपकी इच्छानुसार, आपकी किश्त भुगतान विधि बदल दी जाएगी।

(स) यदि आप भूल गए और आपने मार्च वाल किश्त जमा करा दी, और आप किश्त भुगतान विधि वार्षिक ही कराना चाहते हैं तो अब आपको, शेष तीन तिमाही किश्तें जमा कराते हुए अगले मार्च तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। किन्तु

(द) यदि आप किश्त भुगतान विधि अर्ध्‍द वार्षिक कराना चाहते थे तो सितम्बर में ही आप यह परिवर्तन करा सकते हैं। उसके लिए आप जून वाली किश्त जमा कर, तत्काल ही किश्त भुगतान विधि अर्ध्‍द वार्षिक करने का आवेदन दे दीजिए। आपकी किश्त भुगतान विधि सितम्बर से अर्ध्‍द वार्षिक कर दी जाएगी।

किश्त भुगतान विधि वार्षिक कराने के लिए आपको मार्च तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी और तब भी याद रखिएगा-मार्च वाली किश्त जमा मत कराइएगा।

अब देख लीजिए कि आपकी पालिसी कौन से महीने में शुरु हुई है। उस महीने से 6 महीने का अन्तराल जोड़ कर भुगतान विधि अर्ध्‍द वार्षिक करने हेतु आवेदन दे दीजिए और यदि वार्षिक स्तर पर ही भुगतान करना चाहते हैं तो इस परिवर्तन के लिए, पालिसी प्रारम्भ होने वाले महीने की प्रतीक्षा कीजिए।

एक बात और - इस उदाहरण में तिमाही से वार्षिक अथवा अर्ध्‍द वार्षिक विधि में परिवर्तन की बात कही गई है। किन्तु यह सुविधा इसके विपरीत भी उपलब्ध है। अर्थात् यदि आपकी किश्त भुगतान विधि वार्षिक है और आप उसे तिमाही या अर्ध्‍द वार्षिक कराना चाहते हैं तो, यह सुविधा भी आपको अधिकार के रूप में प्राप्त है। चाहे जब, चाहे जितनी बार।

3.आपने जो लेख के माध्यम से भुगतान में मूल प्रीमियम दर पर 1.5% की छूट के बारे में बताया है. किन्तु हमें तो कभी इस प्रकार की कोई छूट प्राप्त नहीं हुई.

यदि आपने किश्त भुगतान विधि अर्ध्‍द वार्षिक ले रखी है तो विश्वास कीजिए, आपको मूल प्रीमीयम दर में 1.5 प्रतिशत की छूट मिली हुई है। आप जब किश्त भुगतान विधि वार्षिक अथवा तिमाही कराएँगे तब आपको नई किश्त की रकम से यह अन्तर तत्काल ही अनुभव हो जाएगा।

ऐसी ही कुछ और छोटी-छोटी बातें अगली बार।

सदैव की तरह ही कृपया ध्‍‍यान दीजिएगा-ये जानकारियां मेरे श्रेष्ठ ज्ञान और अनुभव के आधार पर हैं। भारतीय जीवन बीमा निगम की ओर से नहीं।

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गन्ध के झोंके: मनु और प्रज्ञा




1995 की फरवरी की 22 तारीख को उनके आँगन में गूँजी थी पहली किलकारी। ‘अयनी’ जनमी थी उसी दिन। लेकिन वे मुझे मिले थे 'दोनों अकेले', अयनी के जनम से पहले।

निश्चय ही कम से कम पन्द्रह बरस पहले की बात होगी। सर्दियों की सुबह हम सबने किया था नाश्ता पोहा जलेबी का। रतलाम के सर्किट हाउस में। उनके आने की खबर की थी गोर्की ने। उसी के मित्र थे (अभी भी हैं ही) वे दोनों। गोर्की, मेरा छोटा भतीजा। नितिन भाई ने जुटाया था सारा संरजाम।


‘वे दोनों’ याने मनु श्रीवास्तव और प्रज्ञा श्रीवास्तव। मनु, भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के सदस्य और प्रज्ञा, भारतीय पुलिस सेवाओं की। आए-आए ही थे नौकरी में। लबालब थे उत्साह और जोश से। कर गुजरना चाहते थे कुछ ऐसा जो अब तक नहीं किया हो किसी ने। गोया, लिख देना चाह रहे हों अपना नाम अनन्त आकाश के केनवास पर, अपनी उमंग-उछाह की कूची से।


उन ‘दोनों अकेले’ से हुई वह पहली मुलाकात। बनी हुई है अब तक अन्तिम भी। आपने-सामने नहीं मिले हम लोग उसके बाद से अब तक। लेकिन नहीं। लगता है, कह रहा हूँ कुछ गलत मैं। क्योंकि मिलने का मतलब नहीं होता आमने-सामने मिलना या कि एक दूसरे से ‘हाय! हैलो! कह कर हाथ मिलाना ही? दूरी नहीं होती बाधक मिलने में। कुछ लोग सामने होकर भी नहीं मिल पाते। मिल पाना तो छोड़िए, दिखाई भी नहीं देते। नहीं सुनाई देते उनके बोल। और कुछ लोग नजर न आकर भी मिल लेते हैं। छू लेते हैं आपको गन्ध के झोंके की तरह आपके पास से तैरते हुए। लपेट लेते हैं आपको अपने भुजबन्ध से। ऐसे और इतना कस कर कि साँसे घुट जाएँ, इतनी कि प्राणान्त की इच्छा जाग उठे तत्क्षण। इतनी खुशी फिर मिले, न मिले क्या पता? ऐसा ही कर रहे हैं मनु और प्रज्ञा मेरे साथ। गए, कोई पन्द्रह बरस से।


हर साल, पहली जनवरी आती है बाद में। बाद में बदलता है केलेण्डर । पहले थपथपाती हैं मेरा दरवाजा, प्रज्ञा और मनु की शुभ-कामनाएँ। आत्मीयता से भरीं, ऊष्मा से सराबोर। हर साल। बिना नागा किए।


उनका अभिनन्दन पत्र होता है हर बार अनूठा, सबसे अलग। बाजार में नहीं मिलता किसी दुकान पर। और उसमें छपी कविता? क्या कहा जाए उसके बारे में! बहा लेती है हर बार, हर साल मुझे, तटबन्ध तोड़ कर हहराती, उफनती नदी की तरह, अपने साथ।


‘हम सब मिल कर तैयार करते हैं ग्रीटिंग कार्ड’ कह रही थी अयनी फोन पर। शहतूत की मिठास को लजा रही थी उसकी आवाज। ‘हम सबसे क्या मतलब?’ पूछा था मैं ने। ‘हम सब मीन्स माम, पापा, समवी और मैं’ कहा अयनी ने। ‘समवी मेरी यंगर सिस्टर है। अभी नाइंटिंथ डिसेम्बर को मनाया है हमने उसका नाइंथ बर्थ डे।’ बताया था अयनी ने जब पूछा था मैंने - ‘कौन है यह समवी?’

बह रही थी पहाड़ी नदी की तरह किलकारियाँ मारती अयनी फोन पर। ‘दीपावली से ही शुरु कर लेते हैं नेक्स्ट ईयर के ग्रीटिंग कार्ड की तैयारी हम सब मिल कर। तय होती है थीम सबसे पहले और बनाते हैं उसके चित्र हम सब बारी-बारी से। चारों का काण्ट्रीब्यूशन कम्पलसरी होता है इसमें। पापा लिखते हैं कविता। वे ही छपाते हैं इस कार्ड को। खास हम सबका होता है यह कार्ड। इसीलिए नहीं मिलता किसी दुकान में, छान मारें आप दुनिया भर के बाजार तो भी।’

अयनी की बातें मुझे ठेल देती हैं पुराने बक्से की ओर। तलाशने लगता हूँ मैं प्रज्ञा और मनु के भेजे पुराने बधाई पत्र। आँखें चुराने लगता हूँ अपने आप से थोड़ी ही देर में। एक भी कार्ड नहीं तलाश पाता हूँ इसलिए। लेकिन प्रज्ञा-मनु के भुजबन्ध की कसावट तिल भर भी नहीं होती ढीली। कसती जा रही है यह साल, दर साल। मैं जकड़ा जा रहा हूँ इसमें । और। और, और।

शब्द कैसे रीतते हैं और बोलता मनुज कैसे हो जाता होगा गूँगा, अनुभव हो रहा है मुझे इस पल। कितना भी चाह लूँ, अधूरा, अव्यक्त ही रह जाऊँगा मैं।

सब कुछ समझा देगी , खुद मनु की कविता आपको। खुद के बारे में भी और कर देगी बखान, ‘इस पल उपस्थित मेरी अक्षमता’ का भी।किसी की पैरवी की नहीं मोहताज यह कविता-


कविताओं
नर्सरी की किताबों

और आसमान में,

भले ही चाँद आवारा घूमा करे।


अपने कागजों, कम्प्यूटर-स्क्रीनों पर

अपने रिश्तों, सपनों में,

रचें खुद का एक चाँद,

बेहद पर्सनल

खास सिर्फ अपना।


फिर भरें उसमें अपने पसन्दीदा रंग

अपनी-सी मुस्कान

किसी पुरानी चोट का बचा हुआ निशान

आँखें-खुद में उतरती हुईं

बाल-घुँघराले, कुछ बिखरे से।



इस साल,

अपने अपने राकेटों और पतवारों के साथ

अपने जुनून और दीवानगी से लैस

अपनी परछाईयों को पीछे छोड़ते हुए,

चल निकलें अपने चन्द्रयान पर
पहुँचने अपने चाँद तक।


तब फिर

पहुँचा हुआ होगा

यह साल,

चाँद सा साल।





पहले चित्र में श्रीवास्‍तव परिवार और दूसरा चित्र उनके 2009 के अभिनन्‍दन-पत्र का।

नितिन वैद्य मेरी मुम्बई में जावरा का ओटला शीर्षक पोस्‍ट के नायक हैं।


मनु श्रीवास्तव, भारत सरकार के पेट्रोलियम एवम् गैस मन्त्रालय में डायरेक्टर के पद पर और प्रज्ञा श्रीवास्तव, केन्द्रीय विद्यालय संगठन में संयुक्त आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं। मनुजी से srimanu@hotmail.com पर और प्रज्ञाजी से pragyarsrivastava@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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रतलाम में अतिथि 'रतलामी'

यह शनिवार 7 फरवरी की दोपहर की बात है। अनुजवत् प्रिय (प्रो) संजय वाते और (प्रो) अभय पाठक के साथ मैं कला एवम् वाणिज्य महाविद्यालय में लगी, रंगकार आलोक भावसार की एकल चित्र प्रदर्शनी देख रहा था। ‘नारी सशक्तिकरण’ पर केन्द्रित, दो दिवसीय सेमीनार के प्रसंग पर यह प्रदर्शनी आयोजित थी। प्रदर्शित चित्र, चित्र नहीं थे। स्केच थे और जलरंग से पूरित थे। पहली ही नजर में अनुभव होता था कि कलाकार और कूची के बीच न केवल दीर्घावधि के सम्बन्ध हैं अपितु परस्पर परिपक्व समझ भी है। कलाकार से मिलने का जी किया। अता-पता पूछा तो पाठकजी ने जो पता बताया तो मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला - 'आप तो रविजी (मेरे ‘उस्ताद‘ श्री रवि रतलामी) का पता बता रहे हैं!' पाठकजी ने पुष्टि की। मन ही मन तय किया कि आलोकजी से पूर्व सम्पर्क कर, मिलने का समय तय करूँगा।

लौटते में रास्ते में ही था कि मोबाइल घनघनाया। पर्दे पर 'रवि रतलामी' उभर रहा था। गाड़ी रोक कर (चलती गाड़ी पर मोबाइल पर बात करने का साहस अब तक नहीं जुटा पाया हूँ) बात की। लेकिन बात केवल बात करने तक ही सीमित नहीं रही। मुझे तो बात के साथ ‘मुलाकात’ का बोनस भी मिल रहा था। रविजी बता रहे थे कि वे रतलाम में ही हैं। मैंने मेरे घर आने का न्यौता दिया तो बोले - ‘आप ही इधर आ जाएँ तो अच्छा रहेगा।’ मैं ने कहा -‘मैं आपका शोषण करना चाहता हूँ इसलिए मेरे घर बुला रहा हूँ।’ वे बोले - ‘यहीं कर लीजिएगा।’ मैं उन्हें मेरे घर में देखना चाहता था। सो कहा -'मुझे मेरे ब्लाग में काफी कुछ जुड़वाना है, सुधार करवाना है। आप जहाँ हैं वहाँ इण्टरनेट सुविधा नहीं होगी।' रविजी ठठाकर बोले - 'जाल में लिपटा हुआ ही रतलाम पहुँचा हूँ। सारी व्यवस्था साथ ही है। आप तो अपना लेप टाप लेकर आ जाईए।' उन्होंने मुझे ‘बेबहाना’ कर दिया।

अपने लेप टाप के साथ कोई सवा दो बजे मैं उनके पास पहुँचा। वे अपने मित्र सारस्वतजी के यहाँ ठहरे थे। सारस्वतजी, रतलाम के उत्कृष्ट विद्यालय में व्याख्याता हैं। रविजी को रतलाम में देखकर आत्मीय प्रसन्नता तो हुई किन्तु 'रतलामी' को रतलाम में अतिथि की दशा में देखकर तनिक असामान्य और असहज अनुभूति ही हुई। (उन्हें अब 'इसी तरह' देखने की आदत मुझे डालनी होगी। वे ऐसे ‘रतलामी’ हैं जो अब भोपाल में पाए जाने लगे हैं।)

‘कुशल क्षेम का शिष्टाचार’ शुरु करने से पहले ही समाप्त कर दिया उन्होंने। हाँ, यह अवश्य बताया कि रतलाम आने का उनका कोई कार्यक्रम नहीं था किन्तु रेखाजी को सेमीनार में आना था सो ‘वे’ ‘उन्हें’ भी साथ ले आईं।

मैं कुछ ‘बतियाना’ शुरु करता उससे पहले ही वे सीधे ‘कामकाज’ की बात पर आ गए। मेरे दूसरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ में आ रही कठिनाइयों के बारे में पूछा। मेरा यह ब्लाग चैबीस घण्टे पीछे चल रहा था, उसमें लेबल नहीं आ रहे थे और ब्लाग खोलने पर केवल नवीनतम पोस्ट ही नहीं, सारी पोस्टें एक साथ सामने आ रही थीं। मैं अपने दोनों ब्लागों पर 'ब्लागवाणी' प्रदर्शित करना चाह रहा था किन्तु ‘तकनीकी ज्ञान-शून्य’ होने के काकरण नहीं कर पा रहा था। रविजी बोले -‘चलिए, देखते हैं कि क्या कुछ किया जा सकता है।’ मैं अपना लेप टाप खोलने लगा तो बोले - ‘रहने दीजिए। मेरे लेप टाप पर ही कर लेते हैं।’ और रविजी शुरु हो गए।

मेरी उपस्थिति का नोटिस उन्होंने तभी लिया जब उन्हें मुझसे कुछ पूछना होता था। वर्ना, वे मेरी उपस्थिति से बेखबर हो, काम में लग गए थे।जल्दी ही उन्होंने ‘सब कुछ’ ठीक कर दिया। मेरा 'मित्र-धन' अब वर्तमान से कदम मिला रहा था। लेबल नजर आने लगे थे, केवल नवीनतम पोस्ट का (केवल एक) पन्ना खुल रहा था और मेरे दोनों ब्लागों पर 'ब्लागवाणी' सज चुका था। एक ही रचनाकार के लिए अलग-अलग लेबल नजर आने पर उन्होंने बताया कि मैं ने हर बार अलग-अलग वर्तनी में इबारत लिखी सो लेबल अलग-अलग नजर आ रहे हैं। उन्होंने मुझे लेबल लगाना भी सिखाया।

मुझे लगा कि मेरा स्वार्थ सध चुका, सो मैं ‘एट ईज’ होने लगा तो बोले -''आपके पास कृतिदेव परिवर्तक का पुराना वर्जन है जिसमें ‘श’ और ‘ष’ आपको ठीक करने पड़ते होंगे। अब नया वर्जन आ गया है।'' कहते-कहते उन्होंने यह नया वर्जन मेरे लेप टाप पर लोड कर दिया।

इतना सब करने के बाद रविजी ने साँस ली और मुझसे मुखातिब हुए। मैं उन्हें धन्यवाद देने लगा तो, अपने स्थापित स्वभाव और चरित्र की रक्षा करते हुए असहज और खिन्न हो गए। बोले - ‘आप ये धन्यवाद, वन्यवाद देना बन्द कीजिए। मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं ने किया ही क्या है?’

ब्लाग विधा और ब्लाग अखाड़े की बातें शुरु हुईं। कुछ भी बोलकर मैं अपना नुकसान ही करता। सो, प्रायः चुप ही रहा। उन्हें सुनता रहा। उतना ही बोला जो उन्हें और बोलने के लिए सहायक हो। ‘ब्लाग’ और इसके भविष्‍य को लेकर उनका विश्वास, उत्साह और मुग्धता अवर्णनीय है। बच्चे भी शर्मा जाएँ।

तभी रेखाजी आ गईं। वे सेमीनार में मिलने वालों के नाम और उनसे हुई चर्चा के अंश प्रस्तुत करने लगीं। अचानक ही पूछ बैठीं - ‘आप लोगों ने पानी-वानी पिया कि नहीं?’ रविजी बोले -‘ वह तो हो गया। चाय मिल जाती तो अच्छा होता।’ सुनते ही रेखाजी मेजबान बन गईं और थोड़ी ही देर में चाय के प्याले हम तीनों के हाथ में थे।

मेरा एक कर्जा इन दोनों के माथे चढ़ा हुआ है। मैं ने अनुरोध किया कि आज शाम वे मेरा यही कर्ज चुका कर मेरी वसूली करवा दें। रविजी ने, शाम की व्यस्तता की लम्बी सूची प्रस्तुत कर दी। मुझे निराश होते देखकर रेखाजी बोलीं -‘आप भोपाल आकर ब्याज सहित अपना कर्ज वसूल कर लें।’ पति-पत्नी की इस जुगलबन्दी ने मेरी आशा पर तुषारापात कर दिया। रतलाम में होते हुए तो मेरा कर्जा नहीं चुका रहे हैं और ‘उधार लेने में माहिर पेशेवर’ की तरह व्यवहार कर, भोपाल आकर वसूली का ‘आफर’ दे रहे हैं! ‘गुरु’ और ‘गुरु-माता’ के सामने ऐसे में मेरी बोलती बन्द ही होनी थी।

तभी मेरी श्रीमतीजी का फोन आया। वे मेरी प्रतीक्षा कर रही थीं। तय हुआ था कि शाम साढ़े चार बजे मैं उनके स्कूल पहुँचूँगा जहाँ से हम दोनों चाँदनी चैक जाएँगे। दो विवाहों में वधुओं को भेंट देने के लिए उन्हें पायजेबें खरीदनी थीं। उनका फोन आने पर मालूम हुआ कि साढ़े चार बज चुके हैं। सवा दो घण्टे तो एक पल में ही बीत गए। रविजी याद रहे, बाकी सब भूल गया। रविजी में ही गुम हो गया। किन्तु तत्काल नहीं निकलता तो ‘गृहस्थी’ पर संकट आने का खतरा था। सो, रविजी और रेखाजी से क्षमा-याचना करते हुए, विदा ली।

मेरा कैमरा मेरी जेब में ही था। बार-बार जी कर रहा था कि कुछ तस्वीरें ले लूँ। किन्तु रविजी के अन्तर्मुखी स्वभाव और उनके खिन्न हो जाने के भय से अपने मन की नहीं कर सका। लेकिन यह पोस्ट लिखते समय अनुभव हो रहा है कि मैं ने ‘वह अशिष्टता’ कर लेनी चाहिए थी। अगली बार कर ही लूँगा। रविजी को बुरा लगे तो लगे। (वैसे भी, यह सब पढ़कर वे भी तो मेरी भावी अशिष्टता के लिए मानसिक रूप उसे तैयार होंगे ही।)

मैं लौट तो आया किन्तु अकेला नहीं था। क्या कुछ और कितना कुछ मेरे साथ था, यह बता पाना सम्भव नहीं। हाँ, मन में जो आ रहा था, वह कुछ इस प्रकार था-

भोपाली हो गए रतलामी,

बनकर मेहमान आए रतलाम।

था तो मेरा

किन्तु समझा अपना

और

कर गए सारा काम।

एक बार नहीं रविजी!

आपको बार-बार सलाम।
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लेप्स पालिसियो के पुनर्चलन का विशेष अभियान

वे समस्त सज्जन इस पोस्ट को ध्यान से पढ़ने के लिए तनिक समय निकाल लें जो भारतीय जीवन बीमा निगम के पालिसीधारक हैं और जिनकी पालिसी/पालिसियाँ बन्द (लेप्स) है/हैं, और जो अपनी पालिसी/पालिसियाँ चालू करवा कर बीमा सुरक्षा पुनः प्राप्त करने को उत्सुक हैं।

लेप्स पालिसियों को चालू कराने के लिए भा.जी.बी.नि. ने विशेष अभियान चलाया है जो 28 फरवरी को समाप्त हो जाएगा। इस अभियान के अन्तर्गत वे सभी पालिसियाँ पुनर्चलित (चालू) की जा सकेंगी जो अपनी पहली बकाया किश्त के दिनांक से सात साल की अवधि पार नहीं हुई हो और जो पेड वेल्यू अर्जित कर चुकी हों।

इस अभियान के अन्तर्गत, पालिसियों के पुनर्चलन के लिए दो स्तरों पर निम्नांकित विशेष, आकर्षक और उल्लेखनीय सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं-

पहली - बकाया किश्तों की रकम पर लगने वाले ब्याज की रकम पर 20 प्रतिशत की छूट दी जा रही है। इस छूट की रकम की अधिकतम सीमा 10,000/- रुपये है।

यह छूट पूरी पालिसी अवधि में अधिकतम दो बार दी जाती है किन्‍‍तु तकनीकी कारणों से उपजी स्थिति के कारण यह सुविधा इस समय प्रत्‍‍येक पालिसी में उपलब्ध है, भले ही यह सुविधा दो बार पहले भी ली जा चुकी हो।

दूसरी - सामान्य स्थितियों में, पालिसियों के पुनर्चलन के समय माँगे जाने वाले, विभिन्न चिकित्सा परीक्षण न कराने की छूट, पुरुषों और महिलाओ को समान रूप से दी गई है।

इस छूट के अन्तर्गत -

(अ) 50 से 55 वर्ष के आयु समूह के पालिसीधारकों को 3,00,000/- रुपये बीमा धन तक

(ब) 56 से 60 वर्ष के आयु समूह के पालिसीधारकों को 1,00,000/- रुपये बीमा धन तक की पालिसियों को चालू कराने के लिए विशेष चिकित्सा परीक्षणों (यथा ई.सी.जी., फास्टिंग ब्लड शुगर आदि) से मुक्त कर दिया गया है और ऐसे पालिसीधारकों से केवल ‘स्वास्थ्य सम्बन्धी घोषणा-पत्र’ (अर्थात् डी.जी.एच. अर्थात् डिक्लेरेशन आफ गुड हेल्थ) लेकर पालिसियाँ पुनर्चलित कर दी जाएँगी।

किन्तु निम्नांकित पालिसियों पर, विशेष स्वास्थ्य परीक्षणों वाली यह छूट लागू नहीं होगी -

1. जीवन साथी (तालिका 89)

2. बीमा सन्देश (तालिका 94)

3. अनमोल जीवन और अनमोल जीवन-1 (तालिका 153 तथा 164)

4. जीवन श्री (तालिका 112)

5. जीवन मित्र (तालिका 88 तथा 133)

6. बीमा किरण (तालिका 111)

7. अमूल्य जीवन तथा अमूल्य जीवन-1 (तालिका 177 तथा 190)

8. आशा दीप तथा आशा दीप-1 ( तालिका 110 तथा 121)

9. जीवन आशा (तालिका 131)

विशेष चिकित्सा परीक्षणों से छूट की सुविधा, पुनर्चलन के लिए प्रस्तुत पालिसी/पालिसियों के सकल बीमा धन के आधार पर उपलब्ध कराई गई है। अर्थात् - यदि, 50 से 55 वर्ष के आयु वर्ग के किसी पालिसीधारक की, पुनर्चलित की जा रही बीमा पालिसी/पालिसियों का सकल बीमा धन तीन लाख रुपयों से अधिक है तो उसे, इस छूट की सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकेगी। उस दशा में उसे, पुनर्चलित की जा रही अपनी पालिसी/पालिसियों के सकल बीमा धन के आधार लगने वाले समस्त विशेष चिकित्सा परीक्षण करवा कर उनकी रिपोर्टें प्रस्तुत करनी पड़ेंगी।

इसे और अधिक स्पष्ट कर रहा हूँ-उपरोक्त उदाहरण वाले प्रकरण में यदि सकल बीमा धन चार लाख रुपये है तो उसे, चार लाख रुपये बीमा धन के लिए आवश्यक, समस्त विशेष चिकित्सा परीक्षण कराने पडेंगे। अन्यथा, ऐसे मामलों में लोग स्वतः ही धारणा बना लेते हैं कि तीन लाख रुपये बीमा धन की छूट के बाद, केवल एक लाख रुपये बीमा धन के लिए लगने वाले विशेष चिकित्सा परीक्षण कराए जाने चाहिए। कृपया ऐसी धारणा बनाने से बचें।

ब्याज की छूट वाली बात को दुहरा रहा हूँ - ब्याज की रकम में 20 प्रतिशत की छूट उपलब्ध कराई गई है। छूट की रकम की अधिकतम सीमा 10,000/- रुपये है और यह सुविधा समस्त पालिसियों में समान रूप से उपलब्ध है।

50 वर्ष की आयु के बाद बीमा कराने पर, बीमा धन के आधार पर कई विशेष चिकित्सा परीक्षण कराने पड़ते हैं और यदि उनके निष्कर्ष प्रतिकूल आते हैं तो या तो बीमा मिलता ही नहीं है या फिर अतिरिक्त प्रीमीयम के साथ (अर्थात् सामान्य से अधिक प्रीमीयम दर पर) मिलता है।

इस दृष्टि से, विशेष स्वास्थ्य परीक्षण कराए बिना, अपनी लेप्स पालिसी को चालू कराने का यह सुन्दर अवसर है। मेरे विचार से समस्‍त सम्बन्धितों को इसका लाभ उठाना ही चाहिए।

यदि आपका एजेण्‍ट 'अन्‍तर्ध्‍यान' हो गया है तो भी चिन्ता न करें और सीधे ही, अपनी पालिसी वाले शाखा कार्यालय से सम्पर्क करें। वहाँ आपको समुचित सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

पालिसी लेप्स होने से सर्वाधिक घाटा (आर्थिक रूप से, मानसिक रूप से और बीमा सुरक्षा न मिलने के रूप से भी) ग्राहक को ही होता है। अधिकांश लोग आलस्यवश अथवा अपने एतेण्‍‍‍ट से खिन्न/क्षुब्ध होकर अपनी पालिसी चालू नहीं कराते हैं। यह आत्मघाती मानसिकता है। यदि दुर्योगवश आप भी इसी मानसिकता में हैं तो कृपया इससे तत्‍‍‍‍क्षण उबरें और अपनी पालिसी अविलम्ब चालू करा लें। इसी में समझदारी भी है और फायदा भी।

पूर्वानुसार ही कृपया ध्यान दीजिएगा - ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, भारतीय जीवन बीमा निगम के नहीं।
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इस ब्लाग पर प्रत्येक गुरुवार को जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्‍या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

बीमा किश्‍त भुगतान की विधियाँ

‘भुगतान विधियाँ’ से यहाँ तात्पर्य है, किश्‍त भुगतान करने में उपलब्ध अन्तराल सुविधा।


किन्तु इससे पहले यह जानना रोचक होगा कि भुगतान के लिए विभिन्न अन्तरालों की सुविधा भले ही उपलब्ध कराई जाए, किश्‍त का दायित्व वार्षिक आधार पर ही निर्धारित होता है। इस बात को विस्तार से आगे समझा जा सकेगा।

यहाँ उपलब्ध कराई गई सारी जानकारियाँ, भारतीय जीवन बीमा निगम के सन्दर्भ में हैं-यह याद रखिएगा। और यह भी याद रखने की कृपा कीजिएगा कि यहाँ प्रस्तुत विचार और मन्तव्य पूर्णतः मेरे निजी हैं, भारतीय जीवन बीमा निगम के नहीं।

किश्‍त भुगतान के लिए वार्षिक, अर्ध्‍द वार्षिक, तिमाही, मासिक, वेतन बचत योजना के अन्तर्गत मासिक अन्तराल वाली भुगतान विधियाँ प्रचलन में हैं।

वार्षिक - इस भुगतान विधि के अन्तर्गत ग्राहक वर्ष में एक बार अपनी किश्‍त चुकाता है। वार्षिक किश्‍त चुकाने पर बीमा कम्पनी अपने ग्राहक को मूल प्रीमीयम दर पर तीन प्रतिशत की छूट देती है। (कुछ पालिसियों में यह छूट 1.5 प्रतिशत है। ऐसी पालिसियों में अर्ध्‍द वार्षिक भुगतान विधि मे कोई छूट नहीं है।)

अर्ध्‍द वार्षिक - इस भुगतान विधि के अन्तर्गत ग्राहक अपनी बीमा किश्‍त 6-6 महीनों के अन्तराल से वर्ष में दो बार जमा कराता है। इस विधि से किश्‍त भुगतान करने वाले ग्राहक को बीमा कम्पनी मूल प्रीमीयम दर पर 1.5 प्रतिशत की छूट देती है।

तिमाही - इस भुगतान विधि के अन्तर्गत ग्राहक अपनी बीमा किश्‍त 3-3 महीनों के अन्तराल से वर्ष में चार बार जमा कराता है। इस भुगतान विधि पर बीमा कम्पनी ग्राहक को मूल प्रीमीयम दर पर कोई छूट नहीं देती है।

मासिक - इस भुगतान विधि में ग्राहक अपनी बीमा किश्‍त प्रति माह (वर्ष में 12 बार) जमा कराता है। इस विधि से भुगतान करने वाले ग्राहक से बीमा कम्पनी, मूल प्रीमीयम दर पर 5 प्रतिशत अतिरिक्त रकम वसूल करती है।

वेतन बचत योजना - इस विधि के अन्तर्गत किश्‍त भुगतान की सुविधा वेतन भोगी ग्राहकों को ही उपलब्ध होती है। अधिकांश संस्थान/विभाग अपने कर्मचारियो के लिए यह सुविधा उपलब्ध कराती हैं। इस हेतु संस्थान/विभाग और बीमा कम्पनी के बीच एक लिखित अनुबन्ध सम्पादित होता जिसमें संस्थान/विभाग, अपने कर्मचारियों के वेतन से प्रति माह बीमा किश्‍त की कटौती कर बीमा कम्पनी को भेजने का वचन देता है। यह कटौती उसी कर्मचारी के वेतन से होती है जो ऐसी कटौती के लिए अपने नियोक्ता से लिखित अनुरोध करता है।

इस विधि के अन्तर्गत ग्राहक यद्यपि मासिक अन्तराल पर किश्‍त भुगतान करता है किन्तु ग्राहक से कोई अतिरिक्त प्रीमीयम नहीं ली जाती, जैसी कि ‘मासिक भुगतान विधि’ में ली जाती है।

निम्नांकित उदाहरण से बात अधिक स्पष्‍ट हो जाएगी -

26 वर्षीय व्यक्ति यदि 1,00,000 रुपये बीमा धन की, 20 वर्षीय धन वापसी योजना (तालिका 75 वाली मनी बेक पालिसी) लेता है तो उसकी विभिन्न भुगतान विधियों वाली किश्‍तों की रकम इस प्रकार होगी -

वार्षिक - रुपये 6,387/-

अर्ध्‍द वार्षिक - रुपये 3,243/- (अर्थात् रुपये 6,486/- प्रति वर्ष)

तिमाही - रुपये 1,646/- (अर्थात् रुपये 6,584/- प्रति वर्ष)

मासिक - रुपये 576/- (अर्थात् रुपये 6,912/- प्रति वर्ष)

वेतन बचत योजना - रुपये 549/- (अर्थात् रुपये 6,588/- प्रति वर्’ा)

उपरोक्त उदाहरण से स्पष्‍ट है कि किश्‍त भुगतान विधि में अन्तराल जितना कम होता है, किश्‍त की रकम बढ़ती जाती है।

वेतन बचत योजना और तिमाही विधि से भुगतान करने पर वार्षिक रकम में कोई विशेष अन्तर नहीं आता। इसका कारण आगे प्रस्तुत किया जा रहा है।

वार्षिक विधि से भुगतान करने वाले ग्रहकों को बीमा कम्पनी पर खर्च और श्रम कम करना पड़ता है। उसके लिए वर्ष में एक सूचना पत्र भेजा जाता है, एक रसीद जारी करनी पड़ती है, सम्बन्धित कर्मचारी का समय वर्ष में एक ही बार लगता है, खाता संधारण में भी समय और श्रम की बचत होती है।

अर्ध्‍द वार्षिक विधि से भुगतान करने वाले ग्राहक के लिए बीमा कम्पनी को यह सब कुछ दुगुना, तिमाही विधि से भुगतान करने वाले ग्राहकों के लिए चार गुना और मासिक भुगतान विधि वालों के लिए बारह गुना करना पड़ता है।

वेतन बचत योजानान्तर्गत भुगतान करने वाले ग्राहकों को कोई अन्तर न पड़ने का कारण बहुत ही सीधा-सादा है। इस योजानन्तर्गत बीमा कम्पनी को एक ही चेक से कई ग्राहकों की किश्‍त प्राप्त होती है। ऐसे भुगतान के लिए बीमा कम्पनी को कोई सूचना पत्र नहीं भेजना पड़ता और प्रत्येक ग्राहक की अलग-अलग रसीद जारी नहीं करनी पड़ती। खाता संधारण पर होने वाला श्रम और लगने वाला समय यद्यपि तनिक भी कम नहीं होता तदपि इस योजना से मिलने वाली सुविधा के कारण कर्मचारी बीमा कराने को सहजता से तैयार हो जाते हैं क्यों कि किश्‍त कटौती वेतन से होने के कारण उन्हें आर्थिक भार की विशेष अनुभूति नहीं होती। वैसे भी कर्मचारी वर्ग ऐसी कटौती की मानसिकता लिए हुए होता है।

सुविधा अन्तराल की : किश्‍त की वसूली पूरी

यह बहुत ही महत्वपूर्ण बिन्दु है।

‘भगवान’ और ‘भाग्य’ वाले हमारे समाज में बीमा बेचना अत्यधिक कठिन काम है और बीमे के लिए एक मुश्‍त रकम निकाल पाना सामान्य मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए मानसिक और व्यावहारिक रुप से, प्रथम दृष्‍टया तनिक कठिन ही अनुभव होता है। इस दो तरफा कठिनाई को कम करने तथा अधिकाधिक लोगों को बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराने की सदाशयता से विभिन्न अन्तराल वाली भुगतान विधियों की सुविधा उपलब्ध कराई जाती हैं। किन्तु जैसा कि इस पोस्ट के प्रारम्भ में ही कहा गया है, किश्‍त की वसूली सदैव ही वार्षिक आधार पर ही की जाती है।

उदाहरणार्थ : किसी व्यक्ति ने जनवरी में बीमा पालिसी ली और किश्‍त भुगतान के लिए ‘तिमाही भुगतान विधि’ का विकल्प लिया। अर्थात् अब यह ग्राहक प्रति वर्ष जनवरी, अप्रेल, जुलाई और अक्टूबर में अपनी कि”त का भुगतान करेगा।

पालिसी अवधि के दौरान किसी वर्ष में, दुर्भाग्‍यवश ऐसे ग्राहक की मुत्यु अगस्त महीने में हो गई। तब तक वह जनवरी, अप्रेल और जुलाई की देय, तीन तिमाही किश्‍तों का भुगतान कर चुका था। जब उसकी पालिसी के मृत्यु दावे का भुगतान किया जाएगा तक अक्टूबर वाली तिमाही किश्‍त की रकम उसमें से काट ली जाएगी।

स्पष्‍ट है कि केवल भुगतान सुविधा के लिए विभिन्न अन्तरालों की विधियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं, किश्‍त की वसूली वार्षिक आधार पर ही की जाती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि वाहन बीमा किश्‍त सदैव वार्षिक ली जाती है।

मेरा सुझाव - वार्षिक भुगतान विधि सदैव ही सबके लिए लाभकारी और हितकारी होती है। यदि यह सम्भव न हो तो अर्ध्‍द वार्षिक भुगतान विधि के विकल्प में भी कोई हर्ज नहीं है। किन्तु तिमाही भुगतान विधि का विकल्प लेने से बचा जाना चाहिए। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि लेप्स होने वाली पालिसियों में तिमाही भुगतान वाली पालिसियों का प्रतिशत 90 तक है। मासिक भुगतान विधि वाला विकल्‍प तो नहीं ही लें।

ऐसी ही कुछ और बातें फिर कभी।
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लो जी! मैं उकस गया

कल वाली मेरी पोस्ट राष्‍‍ट्र बनाम ‘माँ’ और ‘वार वनीता’ पर मायोपिकजी की टिप्पणी नहीं आती तो सच मानिए मेरी दशा उस महिला जैसी हो जाती जिसने नई, मँहगी, भारी-भरकम बनारसी साड़ी पहनी हो और कोई उससे यह भी न पूछे-‘साड़ी नई है? कितने की है?’


सो, सबसे पहले मायोपिकजी को अन्तर्मन से धन्यवाद और आभार। यदि वे ‘अपनीवाली’ पर नहीं आते तो मुझे यह सब कहने का निमित्त कैसे मिलता?


मैं कांग्रेसी हूँ या नहीं इसकी सफाई व्यर्थ होगी (क्योंकि मायोपिकजी ने मेरी सारी पोस्टें थोड़े ही पढ़ी हैं?) किन्तु यह कहना जरूरी है कि मैं बरसों 'शाखा' में गया हूँ, खूब 'दक्ष-आराम' किया है और ‘धरम पर मरना सीखा है, धरम से कैसे हट जाएँ’ तथा ‘भारत के वीरों जागो, सोये सितारों जागो’ जैसे समवेत गीतों में अपना कण्ठ मिलाया है।


‘संघ’ की अनेक ‘परोक्ष विशेषताएँ’ मेरे लिए सदैव आकर्षण का विषय। रहीं उनमें से चार मुझे महत्वपूर्ण लगीं। पहली : जिस काम के लिए दूसरों को वर्जित करो वही काम दबंगता से खुद करो किन्तु हाँ, अकेले मत करो, सामूहिक रूप से करो और दबदबा बनाते हुए करो ताकि तत्काल प्रतिरोध, प्रतिवाद और प्रतिकार करने का साहस कोई नहीं जुटा पाए। दूसरी : स्‍ववर्जित काम करते हुए पकड़े जाओ तो जोर-जोर से कहो कि वह काम मैं ने किया ही नहीं, लोग झूठ बोल रहे हैं। तीसरी : फिर भी लोग न मानें और बात बनती न दिखाई दे तो अपने विरोधी की वैसी ही गलती बताओ और उसे दलील बना कर अपनी गलती का औचित्य साबित करो। चौथी : ऐसा करते समय यह विशेष ध्यान रखो कि वृत्ति का हवाला मत दो, व्यक्ति का हवाला दो क्योंकि लोग वृत्ति को नहीं जानते, व्यक्ति को जानते हैं। (संघ के विरोधी इस तरीके को ‘व्यक्तित्व हनन‘ अथवा ‘चरित्र हनन’ करना कहते हैं।)


मायोपिकजी की राजनीतिक प्रतिबध्दता मुझे नहीं पता किन्तु वे संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक की तरह व्यवहार करते दिखाई दे रहे हैं और यही भूमिका निभाते हुए उन्होंने इन्हीं विशेषताओं का सहारा लिया। उनकी ट्रेनिंग सफल रही। बधाई।


मैंने अपनी पोस्ट में किसी का नाम नहीं लिया किन्तु मायोपिकजी को शायद समस्त सम्बन्धितों के नाम नजर आ गए। ऐसा ही होता है। आदमी सारी दुनिया से अपने पाप छुपा ले, अपने आपसे नहीं छुपा पाता और ऐसे में यदि कोई किसी और की बात करे तो भी उसे अपना ही उल्लेख अनुभव होता है।


मायोपिकजी ने किन्हीं कांग्रेसी मिनिस्टर किरण चौधरी द्वारा, राष्‍‍ट्रीय शोक काल में सूरजकुण्ड मेले का रंगारंग उद्घाटन का उल्लेख कर मुझे ‘उकसाते’ हुए पूछा है कि मैं चौधरीजी पर कब लिख रहा हूँ। नेक काम में देरी कैसी? लो जी! लिख दिया। फौरन। किरण चौधरी कोई ‘पवित्र गाय’ नहीं है जो राष्‍ट्रीय शोक काल में उत्सव मनाने के अपराध से मुक्त हो जाएँ। वे कांग्रेसी हों या कोई और, अपराध तो अपराध है। उनकी सजा भी वही जो मध्य प्रदेश के ‘संघियों’ की। अब मायोपिकजी की बारी है। वे बताएँ कि मध्यप्रदेश के संघियों को कब सजा दिलवा रहे हैं ताकि किरण चौधरी को सजा दिलवाने का उपक्रम शुरु किया जा सके?


लेकिन किरण चौधरी में और मायोपिकजी की जमात में एक मूलभूत अन्तर है। किरण चौधरी की जमात के लोग राष्ट्रवाद की ठेकेदारी नहीं करते। वे संस्कृति, नैतिकता, ईमानदारी, सदाचार और ऐसी ही तमाम बातों की दुहाइयाँ नहीं देते। वे अपनी गरेबान में भले ही न झाँकते हों किन्तु दूसरों की गरेबान पर भी नजर नहीं डालते। वे 'सोशल पुलिसिंग' भी नहीं करते। वे ‘भारतीय संस्‍कृति’ की दुहाई देकर महिलाओं को सड़कों पर नहीं पीटते। जो काम वे खुद करते हैं वे काम दूसरे करें तो आपत्ति नहीं उठाते।


इसके ठीक विपरीत संघ परिवारी वह सब करते हैं जिसके लिए वे दूसरों को मना करते हैं। वे ईमानदारी की दुहाई देते हैं और उनके आनुषांगिक संगठन भाजपा के राष्‍‍ट्रीय अध्यक्ष कैमरे के सामने 'मिठाई' के निमित्त प्रसन्नतापूर्वक रिश्‍वत लेते हैं। ‘हिन्दुओं की घर वापसी’ का अभियान चलाने वाले उनके जन-नायक, 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा कसम, खुदा से कम भी नहीं' कहते हुए नोटों की गड्डियाँ लेने में न तो देर करते हैं और न ही संकोच। वे ‘चरित्र’ की दुहाइयाँ देते हैं और उनके स्वयंसेवक, रंगरेलियाँ मनाते हुए 'मादरजात' अवस्‍‍था में पकड़े जाते हैं।


किसी गरीब हिन्दू की बेटी यदि किसी मुसलमान से प्रेम कर बैठे तो समूचे हिन्दुत्व पर संकट आ जाता है लेकिन खुद आडवाणी की सगी भतीजी एक मुसलमान के बच्चों की माँ बनी हुई है, इसका जिक्र नहीं करते। सुना तो यह भी है कि भाजपा के कम से कम दो मुसलमान नेताओं (उनमें से एक तो भूतपूर्व केन्द्रीय मन्त्री बताए जाते हैं) की वंश बेल बढ़ाने का पुण्य कार्य भी हिन्दू स्त्रियों के ही खाते में जमा है जिस पर एक भी ‘हिन्दू धर्म रक्षक संघी’ को आज तक आपत्ति नहीं हुई है।


वे इसाई मिशनरी संचालित स्कूलों को इसाईयत के प्रचार केन्द्र और धर्मान्तरण के कारखाने कहते हैं लेकिन मेरे शहर में आ जाइए, आपको ऐसे बीसियों ‘हिन्दू वीरों’ के दर्शन करा दूँगा जो सवेरे तो 'शाखा' में जाते हैं और दोपहर में अपने बच्चों या पोतों/पोतियो को लेने के लिए कान्वेण्ट स्कूल के सामने प्रतीक्षारत खड़े हैं। ‘संघ’ के कुछ 'निष्‍‍ठावान स्वयंसेवकों' ने, ‘धर्मान्तरण के ऐसे कारखानों’ में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए मुझसे सिफारिश कराई है।


‘संघ परिवारी’ आज भी 6 दिसम्बर को ‘हिन्दू शौर्य दिवस’ के रूप में मनाते हैं। इसी दिन बाबरी मस्जिद का ध्वंस, सुनियोजित तरीके से किया गया था। लेकिन मजे की बात यह है कि ‘छोटे सरदार’ से लेकर मेरे मोहल्ले के छुटभैया स्वयंसेवक तक, एक भी ‘हिन्दू नर पुंगव’ इस ‘शौर्य’ की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सब के सब एक स्वर में कहते हैं - ‘‘हिन्दू शौर्य दिवस का कारण बना ‘बाबरी मस्जिद ध्वंस’ मैं ने नहीं किया।’’ अपनी-अपनी जमानत का जुगाड़ सबकी जिन्दगी और मौत का सबब बन गया-हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व गया भाड़ में। श्रेय लेने के लिए 'शूर वीर' हैं और जिम्मेदारी लेने के नाम पर 'शिखण्डी' को शर्मिन्दा कर दें। ये न तो बाप का नाम बताते हैं और न ही श्राध्द करते हैं। ये सबके सब मादा हैं, यह जानने के लिए इनकी पूँछे उठाकर देखने की भी जरूरत नहीं रखी भाई लोगों ने।


लेकिन मैं यह सब क्यो कह रहा हूँ? यह सब ही नहीं, इसका करोड़ गुना अधिक तो खुद मायोपिकजी को मालूम है-वह सब भी, जो दुनिया को नहीं मालूम। लेकिन यह सब नहीं कहता/लिखता तो मायोपिकजी निराश हो जाते, मुझे उकसाने का उनका उपक्रम अपूर्ण रह जाता।


सो, मायोपिकजी शायद अब अनुभव करें कि जिस जमात की सरपरस्ती वे उत्साह के अतिरेक की सीमा तक करते हैं उस जमात के बन्दे भी औसत मनुष्‍य ही हैं-देवता नहीं। उनमें भी वे तमाम कमजोरियाँ हैं जो बाकी सबमें हैं। उनकी जमात के लोग भी बाकी सब लोगों की तरह रिश्वत लेते-देते हैं, टैक्स चुराते हैं, नम्बर दो में खरीद-बिक्री करते हैं, यातायात के नियमों का उल्लंघन करते हैं, लोक भय के अधीन एक सामान्य व्यक्ति जितना चरित्रवान रह पाता है, उतने ही चरित्रवान वे भी रह पाते हैं, अपने स्वार्थ के लिए बिना सोचे, अपने सम्पूर्ण आत्म विश्‍‍वास से झूठ बोल लेते हैं, पाखण्ड करने में तो उनका कोई सानी है ही नहीं।


इसलिए, हे! राष्ट्रीयता के ठेकेदारों के सरपरस्त श्रीमान् मायोपिकजी! मुद्दे की बात यह है कि आप और आपकी जमात के लोग जिस सहजता से पैमानों का दोहरीकरण कर रहे हैं, उस पर पुनर्विचार कीजिए। राष्‍‍ट्रीयता की दुहाई आप बेशक दें किन्तु अपनी बारी आने पर उस दुहाई को याद रखें। आप लोगों की ऐसी ही हरकतों के कारण ‘संघ’ को लांछन और आरोप झेलने पड़ रहे हैं। राष्‍‍ट्रीय प्रतीक का अपमान कोई भी करे, अपराध है। कोई कांग्रेसी है या संघी, इस आधार पर वह अपराध मुक्त नहीं होता।


दूसरों के अपराध को बचाव की दलील की तरह प्रयुक्त करने से आप निर्दोष नहीं हो जाते। उनके उन तमाम अपराधों को गिनवा कर तथा लोगों को वैसे अपराधों से मुक्ति दिलाने का वादा कर आप सत्ता में आते हैं तो आपकी यह न्यूनतम जिम्मदारी (मेरी हिम्मत देखिए कि मैं आपसे ‘जिम्मेदारी’ की उम्मीद करने लगा!) होती है कि आप वैसी कोई गलती नहीं करें। यदि दूसरों के अपराध के आधार पर आप अपराध करने की सुविधा और छूट लेना चाहते हैं तो फिर पुराने वाले ही क्या बुरे थे? लोगों ने उन्हें हटाया ही क्यों? उस दशा में तो फिर उन्हें ही चुना जाना चाहिए था-वे आपसे अधिक ‘अनुभवी अपराधी’ जो थे!

इसीलिए अपनी कल वाली पोस्ट की अन्तिम बात फिर कह रहा हूँ। यदि आप चाहते हैं कि आपकी ‘माँ’ को सारी दुनिया ‘देवी’ माने और उसकी पूजा करे तो इसकी शुरुआत आपको ही करनी पड़ेगी। यह बिलकुल नहीं चलेगा कि आप तो अपनी माँ के साथ ‘वार वनीता’ जैसा व्यवहार करें और चाहें कि बाकी सब उसे देवी मानें और पूजा करें।


यह न तो सम्भव है और न ही उचित।
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राष्‍ट्र बनाम ‘माँ’ और ‘वार वनीता’

पुलिसवालों के बीच एक कहावत अत्यधिक लोकप्रिय ही नहीं है, वे इसे अपनी सफलता का मूल-मन्त्र भी मानते हैं। कहावत है-‘काम मत कर, काम की फिक्र कर, फिक्र का जिक्र कर। तेरा प्रमोशन पक्का।’

संघ परिवार की गतिविधियाँ देख कर लगता है कि या तो उसने पुलिसवालों की इस कहावत को अपना भी आदर्श बना रखा है या फिर पुलिसवालों ने यह आदर्श, संघ परिवार से ग्रहण किया है।

भोपाल के, इसाई मिशनरी संचालित एक स्कूल में घुसकर अ.भा.वि.प. कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ कर दी। गणतन्त्र दिवस समारोह में, इस स्कूल के प्राचार्य ने, ध्वजारोहण के बाद, राष्ट्रगीत शुरु करने वाले एक अध्यापक को बीच में ही रोक दिया था। अ.भा.वि.प. के कार्यकर्ता, प्राचार्य के इस 'अनुचित और राष्ट्र विरोधी आचरण' से उत्तेजित थे। तोड़फोड़ करने वालों में, बजरंग दल के कार्यकर्ता भी शरीक हो गए। पुलिस ने प्राचार्य को गिरतार किया जिसे बाद मे जमानत पर छोड़ दिया गया।

राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिन्ता तो की ही जानी चाहिए और ऐसा करना निस्सन्देह प्रशंसनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है। किन्तु ऐसा, प्रत्येक अवसर पर समान रूप से किया जाना चाहिए। याने, पैमाने दोहरे नहीं होने चाहिए।

गणतन्त्र दिवस के आयोजनों में, मध्य प्रदेश में दो स्थानों पर, भाजपा पार्षदों और पदाधिकारियों ने राष्‍‍ट्रध्वज के स्थान पर पार्टी का झण्डा फहरा दिया। एक भी संघ परिवारी ने इस पर कार्रवाई करना तो कोसों दूर की बात रही, इसका नोटिस भी नहीं लिया। इसके विपरीत, भाजपाइयों के इस आचरण का बचाव किया गया और इस आचरण का औचित्य प्रतिपादित किया गया। भोपाल के, इसाई मिशनरी संचालित स्कूल के प्राचार्य का आचरण यदि राष्‍‍ट्र विरोधी था तो, राष्‍‍ट्रीय ध्वज के स्थान पर पार्टी ध्वज फहराना राष्‍‍ट्र विरोधी क्यों नहीं है?

भूतपूर्व राष्‍‍ट्रपति वेंकटरमण के निधन के कारण देश में सात दिनों का राष्‍‍ट्रीय शोक घोषित किया गया। किन्तु इसी अवधि में कटनी के एक स्कूल के वार्षिकोत्सव में फिल्मी गीतों पर नृत्यों सहित रंगारंग कार्यक्रम आयोजित हुए। इस आयोजन में भाजपा विधायक मुख्य अतिथि थे तथा स्थानीय निकायों के पदों पर आसीन भाजपाई प्रमुखता से उपस्थित थे। लोगों ने इस पर जब आपत्ति ली तो अपनी गलती स्वीकार करने के स्थान पर पचासों ‘किन्तु-परन्तु’ के साथ इस सबका औचित्य प्रतिपादित किया गया।

राष्‍‍ट्रीय शोक की इसी अवधि में, सिवनी जिले की पेंच वेली में, सरकारी स्तर पर ‘मोगली महोत्सव’ ससमारोह आयोजित किया गया। इस पर आपत्ति उठाई गई तो इसका भी बचाव किया गया।

राष्‍‍ट्रीय सम्मान के पैमाने सभी मामलों में, सभी स्थानों पर समान होते हैं। किन्तु संघ परिवार इस मामले में जो दोहरापन अपना रहा है उससे वह आज भले ही खुश हो जाए किन्तु अन्ततः यह न केवल संघ परिवार के लिए अपितु समूचे राष्‍‍ट्र के लिए अत्यधिक घातक होगा।

व्यक्ति उसकी बातों से नहीं, आचरण से जाना जाता है। राष्ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को लेकर संघ परिवार का आचरण ईमानदार नजर नहीं आता। वह इस सम्मान को अपने आचरण में उतारने के बजाय इसे अपनी चिन्ता का विषय और अपनी इस चिन्ता के सार्वजनिक प्रकटीकरण को (पुलिसिया कहावत को चरितार्थ करता हुआ) अपना अन्तिम विषय तथा लक्ष्य बनाता हुआ नजर आ रहा है। कथनी और करनी में 180 डिग्री का यह अन्तर संघ परिवार की मंशा पर प्रश्न चिह्न लगाता है।

‘चिन्ता’ यदि ‘आचरण’ में नहीं बदलती है तो वह ‘पाखण्ड’ हो जाती है।

अपने आनुषांगिक संठन ‘भाजपा’ के जरिए संघ आज यदि सत्ता में है तो राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के सन्दर्भ में उसकी जिम्‍मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। किन्तु वह जिम्मेदार होने के स्थान पर ‘पद-मदान्ध’ होकर उच्छृंखल आचरण करता नजर आ रहा है। वह 'वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति' उक्ति को चरितार्थ करता दिखाई दे रहा है और राष्ट्र तथा राष्‍‍ट्रीय सम्मान के लिए पैमानों का दोहरीकरण कर रहा है। वह चाह रहा है कि दूसरे तो राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों का समुचित सम्मान करे किन्तु उसे इस मामले में मनमानी करने की सुविधा मिले।

दूसरों को सुधारने के प्रयत्नों में सफलता सदैव संदिग्ध ही रहती है जबकि खुद को सुधारने के प्रयत्नों में सफलता असंदिग्ध तथा सुनिश्चित होती है।

संघ परिवार यदि सचमुच में राष्‍‍ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिन्ता करता है तो उसकी ईमानदारी लोगों को अनुभव भी होनी चाहिए। वर्ना परिदृश्‍‍य पर अभी तो स्थिति ‘भटजी भटे खाएँ, औरों को परहेज बताएँ’ वाली अनुभव हो रही है।

अपनी माँ के प्रति आपका व्यवहार तो ‘वार वनीता’ जैसा हो और आप चाहें कि बाकी सारी दुनिया उसे देवी की तरह पूजे।

क्या यह सम्भव है? और उससे भी पहले, क्या यह उचित है?

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‘सम्बन्ध’ तोड़ दिया मेरी वाली ‘इस लड़की’ ने

हे! प्रभु, कैसी विवशता? कैसी असहाय दशा? कहाँ तो जी कर रहा है कि ‘इस’ लड़की के चित्र से अनन्त आकाश को ढँक दूँ और कहाँ यह लाचारी कि उसका चित्र तो दूर की बात रही, उसका नाम भी अपने ब्लाग पर नहीं दे पा रहा हूँ।

उसके विवाह की तारीख तय हो चुकी थी। निमन्त्रण पत्र छप चुके थे। आयोजन हेतु परिसर आरक्षित कर उसका अग्रिम भुगतान किया जा चुका था। आमन्त्रि अतिथियों के ठहरने के लिए होटल बुक की जा चुकी थी। वस्त्राभूषणों की सारी खरीदी हो चुकी थी। शेष था तो केवल बारात का आना, तोरण का मारा जाना और पाणिग्रहण संस्कार का सम्पन्न होना। किन्तु परसों 'उसने' ‘यह रिश्‍ता’ तोड़ दिया-अपनी ओर से। अत्यन्त विनम्रतापूर्वक किन्तु उतनी ही दृढ़तापूर्वक।

'वह' बेंगलुरु की एक कम्प्यूटर कम्पनी में साफ्टवेयर इंजीनीयर है। कोई डेड़-दो महीने पहले ही उसका ‘सम्बन्ध’ तय हुआ था। सब कुछ उसके पिता ने किया था। उसने लड़का देखने या उससे मिलने की कोई उत्सुकता नहीं जताई थी। पिता ने जो किया, उसे सर-माथे चढ़ा लिया था। बस, यही कहा था कि विवाहोपरान्त भी वह नौकरी करती रहेगी। ‘सम्बन्ध’ तय होने से पहले लड़के और उसके पिता को भी यह बात साफ-साफ बता दी गई थी। दोनों ने इसे स्वीकार किया था। उसके बाद ही जन्म पत्रियों का मिलान और बाकी सारी बातें हुई थीं और ‘सम्बन्ध’ तय हुआ था।

किन्तु कोई एक पखवाड़ा पहले ‘लड़के’ ने अपना विचार बदलने की सूचना दी। दोनों पिता असहज हुए। आपस में बात की और तय किया इस बारे में लड़का-लड़की ही आपस में बात करें और अन्तिम निर्णय लें। सो, दोनों ने बात की, बार-बार की। यह महत्वपूर्ण नहीं था कि लड़के ने विचार क्यों बदला। यही महत्वपूर्ण था कि लड़के ने विचार बदला है। हाँ, लड़के ने इतनी रियायत दी कि शादी के बाद पाँच-सात महीने तक लड़की नौकरी कर सकेगी किन्तु अन्ततः उसे नौकरी तो छोड़नी ही पड़ेगी। लड़की इसके लिए जब शुरु से ही तैयार नहीं थी तो अब क्या तैयार होती? सो, अन्तिम निर्णय लड़की ने लिया-‘तो फिर मैं यह शादी नहीं करूँगी।’ दोनों ने यह भी तय किया कि अपने-अपने पिता को इस निर्णय की जानकारी वे खुद ही देंगे।

और कल ‘उसने’ अपने पिता को बैंगलुरु से फोन पर खबर दी-‘पापा! आज मैंने शादी से इंकार कर दिया है।’ पिता यह आशंका पहले ही लिए बैठे थे। सो, असहज तो अवश्‍य हुए किन्तु उन पर पहाड़ नहीं टूटा। थोड़ी ही देर में लड़के के पिता का फोन आ गया और दोनों ने एक दूसरे से क्षमा-याचना कर ली। दोनों दुःखी अवश्‍य थे किन्तु किसी के मन पर बोझ नहीं था। यह फैसला उन दोनों में से किसी का नहीं था।

लड़की के पिता ने विस्तार से मुझे सारी बात बताई। मैंने लड़की से बात की। वह किंचित मात्र भी असहज नहीं थी। मैंने पूछा-‘अब आगे क्या?’ वह बोली-‘आगे क्या, क्या? मुझे थोड़े ही कुछ करना है? सब कुछ पापा ही करेंगे। पापा का फैसला, मेरा फैसला। बस, शादी के बाद भी नौकरी करने की मेरी शर्त बरकरार है और पापा यह अच्छी तरह जानते हैं।’

मुझे इस लड़की पर बड़ा मान हो आया। कोई ‘किन्तु-परन्तु’ नहीं। अपनी इच्छा और मानसिकता को लेकर न तो कोई संशय और न ही कोई भ्रम। अपनी पढ़ाई और उसके दम पर कर रही अच्छी-खासी कमाई का कोई गुमान और अहंकार भी नहीं। पिता पर अन्धविश्‍वास! लड़का कौन हो, कैसा हो, कहाँ का हो, इन सारी बातों से कोई लेना-देना नहीं। पिता जो भी करेंगे, श्रेष्‍ठ और हितकारी ही करेंगे। किन्तु अपनी पहचान और आर्थिक स्वतन्त्रता के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं।

अपनी जड़ों से जुड़े रहकर मध्यवर्गीय परिवार की कोई औसत लड़की कितनी प्रगतिशील, कितनी आत्म विश्‍वासी और कितनी दृढ़ इच्छा शक्ति वाली हो सकती है-यह अनूठा अनुभव मुझे आज हुआ।

इस लड़की से बात करते हुए मुझे मैंगलोर में, पब से घसीटी जा रही और पिट रही लड़कियाँ याद आने लगीं। मुश्‍िकल से पाँच लाख की आबादी वाले कस्बे की, मेरी वाली ‘यह लड़की’ अभी भी ‘जीन्स’ तक नहीं पहुँची है। आज भी सलवार-सूट ही पहनती है। लेकिन यह मन से कितनी प्रगतिशील है और आत्मा से कितनी संस्कारशील?

कुँवारी कन्या को सौ वर। सो, मेरी वाली ‘इस लड़की’ की शादी भी होगी और ईश्‍वर ने चाहा तो जल्दी ही होगी। तब, आपको ‘उससे’ अवश्‍य मिलवाऊँगा। वादा रहा।

तब तक आप मेरी वाली ‘इस लड़की’ की बेहतरी के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना कीजिएगा। प्लीज।

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जड़ों में बैठे लोग

मालवा की एक कहावत है - ‘भूतों का डेरा इमली पर।’ आज के सारे के सारे भूत राजनीति की इमली पर एकत्र और एकजुट हो गए हैं।

केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्री अम्बुमणी रामदास को लोगों के स्वास्थ्य की सचमुच में अत्यधिक चिन्ता है। वे इसी में दुबले हुए जा रहे हैं। तम्बाकू को देश का सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं। चाहते हैं कि लोग तम्बाकू का सेवन या तो करें ही नहीं और करें तो कम से कम और वह भी अपने-अपने घर में। इसीलिए सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान को दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया है। चाहते तो थे कि गरीब की बीड़ी को भी कब्जे में ले लेते किन्तु लोग ही उनके साथ नहीं आए। फिल्मों में उड़ते सिगरेट के छल्ले रामदास को अपने आसपास घेरा कसते लगने लगे थे। उन्हें प्रतिबन्धित किया तो सर्वोच्च न्यायालय ने खेल बिगाड़ दिया।

रामदास अब पब संस्कृति का विरोध कर रहे हैं। उनके लिए राहत की बात है कि येदुरप्पा उनके लिए पहले ही भूमिका बनाए बैठे हैं। भगवा और तिरंगा कहीं तो एक हुए! हालाँकि दोनों ही ‘कोतवाल’ हैं लेकिन अपना-अपना कोतवालपन भूल जाना चाहते हैं।

ये दोनों और इनके जैसे सारे लोग पानी में लट्ठ मारने और छाया पर तलवार चलाने का शानदार स्वांग कर रहे हैं। गजब के साहसी भी हैं! चाहते हैं कि सारा देश इनके इस स्वांग को सच माने! दोनों ही यदि गम्भीर और ईमानदार हैं तो एक झटके में अपने-अपने क्षेत्राधिकार में ‘पब’ समूल नष्‍ट कर सकते हैं। लेकिन करेंगे नहीं। इनसे अच्छी तो मध्यप्रदेश की सरकार है जो गाँव-गाँव में बिना मिलावट वाली 'शुध्द शराब' उपलब्ध कराने का वादा करती है। (यह अलग बात है कि अपने नागरिकों को पेय जल उपलब्ध कराने के नाम पर गूँगी बन जाती है।)

ये तमाम लोग खुद की सहित सारी असलियत खूब अच्छी तरह जानते हैं। रामदास भली प्रकार जानते हैं कि तम्बाकू की खेती पर रोक लगाने से उनकी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो सकती है और येदुरप्पा जानते हैं कि उनकी कलम की एक जुम्बिश, भारतीय संस्कृति को बचाने की उनकी दलील को हकीकत में बदल सकती है। लेकिन दोनों अनजान बने रहना चाहते हैं।

ये ऐसे लोग हैं जो चोर की माँ को जानते तो हैं लेकिन उसकी तरफ देखते भी नहीं और चाहते हैं कि न तो चोर रहे और न ही चोरी हो। ये लोग चोर की माँ की हिफाजत पूरी ईमानदारी से करते हैं क्योंकि वही तो इन्हें चुनाव लड़ने के लिए धन उपलब्ध कराती है। ऐसे लोग अनूठे मातृभक्त और इनकी माँ की दुनिया की सर्वाधिक ममतामयी माँ।

ये फुनगियों की छँटाई करते हैं और जड़ों की हिफाजत।

करें भी क्यों नहीं? जड़ों में ये ही तो बैठे हैं!
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वसन्त की गुमशुदगी

सवेरे-सवेरे कोई पाँच-सात किलोमीटर हो आया हूँ। नहीं। पैदल नहीं। मोटर सायकिल पर।

कहीं कुछ असामान्य और विशेष नहीं है। रेल्वे स्टेशन पर टिकिट खिड़िकियों के सामने लम्बी कतारें, प्री-पेड बूथ पर पर्चियाँ बनवाते लोग, ‘प्लेटफार्म पर नहीं छोड़ूँगा, गाड़ी में आपको बैठाकर, आपके पास आपका सामान रख कर आऊँगा‘ जैसी बातें कह कर अपना पारिश्रमिक तय करने के लिए जद्दोजहद करते कुली, अपने-अपने मुकाम के ‘रूट’ वाले टेम्पो को तलाश में लगभग बदहवास लोग।

तीन स्कूलों के सामने से जानबूझकर निकला। किन्तु वहाँ भी सब कुछ प्रतिदिन जैसा। आटो रिक्शा से उतरते बच्चे, अपने बच्चों को छोड़कर घर लौटने को उतावले पिता, बच्चों से पहले स्कूल में पहुँचने के लिए लगभग दौड़ कर आ रही अध्यापिकाएँ, गेट पर खड़ा, निर्विकार भाव से सब-कुछ देखते हुए खड़ा चैकीदार। औत्सुक्य भाव लिए कहीं कुछ अनूठा नहीं।

घर से बाहर जाते समय भी और लौटते समय भी वे ही और वैसी की वैसी ही सड़कें, झाड़ू लगाती, कचरे के ढेर बना कर उन ढेरों में चिंगारी सुलगाती सफाई कर्मचारी, दो बत्ती पर और राम मन्दिर के सामने, अपने पसीने के खरीददार की प्रतीक्षा के लिए ‘मण्डी’ बनने के लिए पहुँचते मजदूर, चाय का पहला कप धरती को अर्पित कर रहा होटल मालिक और उस चाय को आँखों से पी जाने की कोशिश कर रहा भिखारी। सब कुछ ऐसा मानो समूची सृष्‍िट, यन्त्र हो गई हो।

वांछित की असफल तलाश से लस्त-पस्त हो मैं घर लौटा हूँ। यहाँ भी सब कुछ ‘वही का वही’ है। गेट के पास पड़े अखबार, चाय बनाकर प्रतीक्षा कर रही पत्नी, पड़ौसी को आवाज लगा रहा दूधवाला, भोपाल पेसेंजर पकड़ने के उपक्रम में अपने आसपास को भी भूल जाने वाले जैन साहब।

मैं ‘उदास सा’ होने से बचने के लिए अपना अतीत खँगालने लगता हूँ। आज के दिन पिताजी सवेरे जल्दी उठा देते थे-लगभग ‘हाँक’ लगा कर। मैं भागकर, पास के गाँव ‘पुरोहित पीपल्या’ के बाहर खड़े आम के वृक्ष से कुछ ‘बौर’ तोड़ता और भाग कर ही घर लौटता। स्नान कर तैयार होता उससे पहले ही माँ ‘तरबेणे’ (सम्भवतः ‘त्रिवेणी’ का अपभ्रंश पुल्लिंग, ताँबे का बना तसला, जिसमें ठाकुरजी को स्नान कराया जाता था) में गुलाल रख कर ले आती। मैं, आम के ‘बौर’ को उस तरबेणे में रखता और बीच रास्ते खड़ा हो जाता। आते-जाते लोगों के माथे पर गुलाल लगाता। वे प्रसन्न होकर आशीष देते। उनमें से कुछ, 'तरबेणे' में छोद वाला ताँबे का एक पैसा, अधन्ना (आधा आना) डाल देते। मुझे अच्छा लगता। खुश हो जाता और अपेक्षा करता कि वे सब, जिनके माथे पर मैं गुलाल लगा रहा हूँ, कुछ न कुछ ‘तरबेणे‘ में जरूर डालें। लेकिन ऐसा नहीं होता। मैं शिकायत भरी नजरों से पिताजी की ओर देखता। वे हँस कर कहते - ‘अपन साधु हैं। अपने को अपने पास कुछ भी नहीं रखना है। अपने को तो देना ही देना है। आज बसन्त पंचमी है। लोगों को तो अपने काम से ही फुरसत नहीं होती। उन्हें कौन याद दिलाए कि आज बसन्त पंचमी है। आज से ऋतु बदल रही है। आम के बौर के ‘दर्शन’ करा कर तू उन सबको इस बदलाव की याद दिला रहा है। इससे उन्हें खुशी होगी। तू गुलाल नहीं लगा रहा है, उन्हें खुशियाँ बाँट रहा है। उनके मन में जो आनन्द पैदा होता है उसका कोई मोल नहीं है। पैसों का क्या है? पैसा तो हाथ का मैल है। परवाह मत कर। प्रसन्न मन से गुलाल लगा।’ आज सोच-सोच कर हैरत में पड़ रहा हूँ कि भिक्षा वृत्ति पर आश्रित परिवार का मुखिया पैसे को हाथ का मैल कैसे कह पा रहा होगा? वह भी हँसते-हँसते? शायद यह भी वसन्त-आगमन से उपजे उल्लास का ही प्रभाव होता होगा कि भिखारी भी पैसे को हाथ का मैल कह दे।

जब थोड़ा बड़ा हुआ तो, सेवेर गुलाल लगाने की ‘ड्यूटी’ पूरी करने के बाद स्कूल पहुँचता तो स्कूल पूरा का पूरा बदला हुआ नजर आता। मुख्य द्वारा पर आम के पत्तों की बन्दनवारें सजी होतीं। प्रधानाध्यापकजी और सारे गुरुजी किसी न किसी उपक्रम में व्यस्त होते। स्कूल के अन्दर वाले खुले मैदान के एक कोने में टेबल के ऊपर कुर्सी रख कर उसे रंगीन पकड़े से ढक दिया गया होता था और उस पर विद्या की देवी, माँ सरस्वती की तस्वीर रखी होती थी। सीनीयर बच्चे ‘बेटी के बाप’ की तरह व्यवस्थाएँ कर रहे होते। घण्टी बजती। प्रार्थना होती और उसके ठीक बाद सरस्वती पूजा का आयोजन शुरु हो जाता। हम छोटे बच्चों को जो भी कुछ ‘गीत-कविता’ याद होती, प्रस्तुत करते। मेरी माँ के पास लोकगीतों का खजाना था और कोयल का कण्ठ। उसी के खजाने से मैं कुछ ‘बधावे‘ गाता और वाहवाही पाता। बड़े बच्चे पाठ्य पुस्तकों की कविताएँ प्रस्तुत करते। हिन्दी वाले ‘सर‘ घनानन्द के छन्दों का पाठ करते जो हमारी समझ में नहीं आता। संस्कृत वाले 'शास्त्री सर' अत्यन्त गर्वपूर्वक ‘जाने क्या-क्या’ उच्चारते। बरसों बाद समझ आया कि वे सरस्वती स्तुति करते थे। सबसे अन्त में हमारे प्रधानाध्यापकजी का भाषण होता। कार्यक्रम का समापन जलेबी से होता। हम लोग उस पूरे दिन सरस्वती पूजन और जलेबी की बातें करते।

आज सेवेर से मैं वही सब कुछ तलाश करने निकला था। लेकिन खाली हाथ लौटा हूँ। मुझे न तो ‘वसन्त’ मिला और न ही उसके आने की ‘पदचाप’ ही सुनाई दी है। अखबार के मुख पृष्ठ पर जरूर वसन्त है किन्तु त्यौहार की तरह नहीं, ‘इवेण्ट’ के रूप में।

सोच रहा हूँ, नहा-धो कर आज किसी से बीमा की बात करने के बजाय पहले पुलिस स्टेशन जाऊँ और दरोगाजी से गुहार लगाऊँ-'मेरी मदद कीजिए। मेरा वसन्त खो गया है। ढूँढ दीजिए।'

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