मेरा मोहल्ला याने अयोध्या


कल का दिन तनाव भरा तो नहीं रहा किन्तु सामान्य और सहज भी नहीं रहा।

अल्पाहार की होटलें और चाय की गुमटियाँ, ठेले सुबह सामान्य रूप से खुले। जलेबी-पोहे का नाश्ता करने के साथ-साथ अखबार पढ़ते लोग नजर आ रहे थे। दस बजते-बजते बाजार खुलने लगा किन्तु दुकानदार सावधानी बरत रहे थे। केवल मुख्य दरवाजे का शटर खोला। काँच ढकनेवाले शटर नहीं उठाए। चिन्ता सबकी एक ही थी - बिक्री हो न हो, नुकसान न हो।

लेकिन ग्यारह बजते-बजते सब कुछ बदल गया। पुलिस के जो जवान सवेरे, जन सामान्य के साथ होटलों, गुमटियों, ठेलों पर चाय पी रहे थे, अनायास ही अतिरिक्त सक्रिय हो गए। दुकानें बन्द करने और लोगों को घर जाने की ‘विनम्र सलाह’ देने लगे। सलाह और वह भी पुलिसवालों की? लोगों ने कहा मानने में ही खैर समझी। दोपहर बारह बजते-बजते तो डालु मोदी बाजार, चैमुखी पुल, चाँदनी चौक, बजाजखाना, माणक चौक जैसे सारे प्रमुख बाजार बन्द हो चुके थे। यह शब्दशः कर्फ्यू ही था किन्तु अघोषित।

स्कूलों की पालियाँ सुबह की कर दी गई थीं। दोपहर एक बजे तक ही स्कूल लगने थे। किन्तु बच्चे आएँ तो स्कूल लगे! सो, वहाँ भी बारह बजने से पहले ही ताले लगने लगे।

केन्द्र और राज्य सरकारों के दफ्तर खुले अवश्य। कर्मचारी भी आए तो किन्तु उनकी ‘चाय पानी’ करनेवालों का अता-पता नहीं था। लिहाजा, सरकारी दफ्तरों के आसपास (अपवादस्वरूप) खुली होटलवालों को मजबूरी में इन बाबुओं से ही अपना भुगतान प्राप्त करना पड़ा। ऐसे अनूठे अनुभव इन दुकानदारों को गलती से ही मिलते हैं।

बैंकों में छःमाही लेखाबन्दी के कारण ग्राहकों की आवाजाही बन्द थी। बीमा कम्पनियों के दफ्तर खुले रहे। भारतीय जीवन बीमा निगम की तीनों शाखाओं में काम काज चल रहा था किन्तु सर्वाधिक भीड़ मेरेवाले शाखा कार्यालय में रही। यह कार्यालय मुख्य सड़क पर है सो यहाँ वैसे भी दोनों अन्य कार्यालयों की अपेक्षा अधिक भीड़ रहती है। किन्तु दोनों कार्यालयों की अपेक्षा अधिकवाली आज की भीड़, रोज की भीड़ से बहुत कम थी। सामने, सड़कपार चाय की दुकान चला रहा मनोज रोज की तरह चाय उबाल रहा था। किन्तु उसकी दुकान पर ग्राहक नाम मात्र के ही थे। हाँ, हमारे कार्यालय मे आज उसने खूब चक्कर लगाए। हम कोई उन्नीस-बीस एजेण्ट थे। हममें से किसी न किसी के पॉलिसीधारक आ रहे थे। हम लोग उनकी खिदमत कर रहे थे।

मेरेवाले शाखा कार्यालय के कर्मचारी समय पर तो आ गए थे किन्तु काम करने में किसी का मन नहीं लग रहा था। दो बजे जब भोजनावकाश हुआ तो केवल शाखा प्रबन्धक, एक खजांची, दो सेवक और हम नौ-दस एजेण्ट ही रह गए। ढाई बजते-बजते सन्नाटा पसर गया।

बीमा एजेण्टों के संगठन ‘लियाफी’ (‘लाइफ इंश्योरेंस एजेण्ट्स फेडरेशन ऑफ इण्डिया’ के, अंग्रेजी प्रथमाक्षरों से बना संक्षिप्त नाम) के लिए अगले कार्यक्रम बनाने के लिए हम लोगों को अनायास ही ढेर सारा समय मिल गया था। दफ्तर की दशा देख एक उत्साही एजेण्ट ने शाखा प्रबन्धकजी पर व्यंग्योक्ति उछाली - ‘देखा साहब! आपके सारे कर्मचारी भाग गए और हम एजेण्ट जान पर खेलकर आपके लिए काम कर रहे हैं।’ शाखा प्रबन्धकजी ने व्यंग्योक्ति को परिहास में लेकर हवा में उड़ा दिया।

किन्तु हम लोग ज्यादा देर तक नहीं बैठ पाए। पुलिस के सन्देश आने लगे - ‘अपने-अपने घर जाइए।’ शाखा प्रबन्धकजी को तो रहना ही था। उन्होंने भी अपनी टेबल पर पड़ा, ढेर सारा लम्बित काम निपटाया।

तीन बजे जब घर पहुँचा तो पूरा मुहल्ला साँय-साँय कर रहा था। बच्चे भी घरों में ही दुबके हुए थे। पालकों ने ऐसी अतिरिक्त सावधानी बरती कि घर के बाहर भी नहीं निकलने दिया। घरों से टेलीविजन की आवाजें आ रही थीं।

शाम साढ़े चार बजे के आसपास जब निर्णय आया तो मैंने बाहर जा कर देखा। लोग अभी भी घरों में बन्द ही थे। निर्णय को लेकर कहीं कोई जिज्ञासा, रोमांच, उत्तेजना नहीं थी। मुझे अचरज हुआ। इतनी उदासीनता!

जैसे-तैसे साँझ ढली तो महिलाओं की आवाजें सुनाई देने लगीं। किसी को समझ नहीं पड़ रहा था कि निर्णय क्या आया है। तब तक बच्चे भी बाहर निकल आए और झुटपुटे में ही क्रिकेट खेलने लगे। अब मुहल्ला रोशन और जिन्दा था। किन्तु रात आठ बजते-बजते ही मानो आधी रात हो गई। अब घरों से टेलीविजन की आवाजें भी नहीं आ रही थीं।

और इस तरह बहुप्रतीक्षित दिन का समापन हुआ। मुहल्ले में नीरवता थी। लोग चैन से अपने-अपने बिस्तरों में दुबक गए थे।

आज सुबह अखबारों में पढ़ा, कल की रात अयोध्या में भी ऐसी ही सुख-शान्ति भरी रही।

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6 comments:

  1. ये तो होना ही था… :)

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  2. कल यहाँ पर भी यही नज़ारा था।

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  3. जो हुआ अच्छा हुआ।

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  4. आगे भी शांति बनी रहे.

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  5. चलो अच्छा हुया यही तो चाहिये था। धन्यवाद। मेरी ब्लाग लिस्ट मे आपका ब्लाग अपडेट नही हो रहा। मुझे पता नही चलता आपकी पोस्ट का।

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