मेरे बेटे

मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं भी एक औसत पिता की तरह ही अपने दोनों बेटों (वल्कल और तथागत) में कमियाँ देखता रहता हूँ और उन पर चिढ़ता-कुढ़ता रहता हूँ। कह सकते हैं कि अरस्तु से चली आ रही सनातन परम्परा का पालन सम्पूर्ण निष्ठा से करता चला आ रहा हूँ। किन्तु इस समय (यह शायद ‘ब्राह्म मुहूर्त’ ही होगा - सूर्योदय से पहले, लगभग पौने पाँच बजे) सच ही कह रहा हूँ - यह ‘कमी देखना‘ और इस पर चिढ़ना/कुढ़ना, उनकी बेहतरी सोच-सोच कर ही होता है कि काश! यह फलाँ-फलाँ कमी इनमें नहीं होती तो कितना अच्छा होता!

अपनी ‘कमियों’ से मुझे ‘चिढ़ाने/कुढ़ानेवाले’ मेरे इन्हीं दोनों बेटों ने, सोलह फरवरी की रात मुझे भावाकुल कर प्रेमाश्रुओं से ‘निहाल’ कर दिया।

जैसा कि मैंने अपवादों में आपवादिक सुखद संयोग शीर्षक अपनी पोस्ट में बताया था, सत्रह फरवरी को मेरे विवाह की छत्तीसवीं वर्ष गाँठ थी और उसी दिन मेरे बड़े साले, चि. देवेन्द्र की इकलौती बेटी प्रिय चि. नवनी का विवाह भी था, सोलह फरवरी की रात को, नवनी के विवाह प्रसंग पर आयोजित ‘महिला संगीत’ में मेरे इन्हीं, ‘कमियोंवाले’ दोनों बेटों ने हम दोनों पति-पत्नी को ‘सुखद आश्चर्य’ से हर्षास्तब्ध कर दिया।

निर्धारित कार्यक्रमानुसार, कुटुम्ब के बच्चे/बच्चियाँ, महिलाएँ अपनी-अपनी प्रस्तुतियाँ दे रहे थे। हम सब उनका आनन्द ले रहे थे। वल्कल और तथागत ही कार्यक्रम का संचालन कर हे थे। अचानक ही दोनों ने कहा - ‘अब नवनी के विवाह से थोड़ा अलग हटकर, हमारे पापा-मम्मी के विवाह की बात करने दें। कल उनके विवाह की छत्तीसवीं वर्ष गाँठ है।’ जब यह घोषणा हुई, उस समय मैंने भोजन के लिए अपनी प्लेट लगाई ही थी और पहला ही कौर लिया था। मैंने उत्सुकता से मंच की ओर देखा। वहाँ अँधेरा कर दिया था और मंच पर तने, सफेद पर्दे पर, प्रोजेक्टर से आकृतियाँ उभरनी शुरु हो गईं।

इस क्षण भी नहीं जानता कि यह ‘फिल्म’ थी या ‘स्लाइड-शो’, किन्तु मैंने अचानक ही देखा कि मेरे विवाह के अल्बम के श्वेत-श्याम चित्र एक के बाद एक पर्दे पर आने लगे। वल्कल का पार्श्व-स्वर चित्र-परिचय दे रहा था और फिल्म ‘ममता’ का, हेमन्त कुमार और लताजी का गाया गीत ‘छुपा लो यूँ दिल में, प्यार मेरा’ वातावरण को अपनी गन्ध में लपेट रहा था। मैं अपने अतीत को पर्दे पर देख रहा था। मेरा कौर, हाथ का हाथ में रह गया।

शायद एक क्षण भी नहीं लगा, मेरी आँखें धुँधलाने लगीं। मेरी माँ, मेरे पिताजी, मेरी भाभी, मेरी जीजी, मेरे मामा का बड़ा बेटा ईश्वर दादा, मेरे ममिया सुसर पपी मामाजी, मनासावाले बापू दादा (जैन), मदन दादा (सोडानी), मालवी के अनुपम लाड़ले बेटे हीरु भाई (हरीशजी निगम, उज्जैन), गिरिवरसिंहजी भँवर, मेरा सहपाठी नन्दा (प्रह्लाद पाराशर), रामपुरा में छात्रावास का मेरा सह-आवासी राधेश्याम धनोतिया जैसे अनेक स्वर्गवासी परिजन/प्रियजन पर्दे पर नजर आने लगे।

मुझे पता ही नहीं चला कि कब वल्कल मेरे पास आया, मेरे हाथों से प्लेट लेकर एक तरफ रखी, मेरी बाँह थाम, मुझे ले जाकर अपनी माँ की बगल में मुझे बैठा दिया। मैं कुछ भी नहीं देख पा रहा था। लग रहा था, बरसात से धुँधलाई कोई फिल्म देखने की कोशिश कर रहा हूँ। महिलाएँ और बच्चे कुछ कह जरूर रहे थे किन्तु क्या कह रहे थे, समझ नहीं पा रहा था।

इस क्षण भी याद नहीं कि यह स्थिति कितनी देर रही। किन्तु जब तालियाँ बजीं तो मालूम हुआ कि फिल्म/स्लाइड शो समाप्त हो चुका है। मेरा रोना जारी था। तालियों ने मुझे अतीत से वर्तमान में लौटाया। मेरा जी भरा हुआ था और जी कर रहा था कि धाड़ें मार-मार कर रोऊँ और देर तक रोता रहूँ। उपस्थितों में महिलाएँ ही महिलाएँ थीं। पुरुष तो नाम मात्र के थे। व्यवस्थाओं के लिए। उस रात, इतनी ढेर सारी महिलाओं के बीच (वे भी मेरे ससुराल पक्ष की!) अपने रोने पर मुझे रंचमात्र भी झेंप नहीं आई। बाद में मेरी उत्तमार्द्ध ने बताया कि तथागत औचक नजरों से मुझे देख रहा था और वल्कल ने ही मुझे सम्हाला।

सत्रह की रात नवनी की बिदाई हुई। अठारह की सुबह हम सब ‘लुटे हुए काफिले के मुसाफिर’ बने बैठे थे - सबके मन भरे हुए थे। आयोजन समेटने का सारा काम बाकी था। सबके सब चुप। मैंने ही सन्नाटा तोड़ा और सोलह की रात वाले फिल्म/स्लाइड शो के बारे में पूछा। वल्कल और तथागत ने बताया कि दोनों ने इसकी कल्पना की थी। मालूम हुआ कि कुछ दिन पहले दोनों बेटे और बहू अ. सौ. प्रिय प्रशा की रतलाम यात्रा अचानक ही नहीं हुई थी। मेरे विवाह का अल्बम स्केन करने के लिए ही वे सब रतलाम आए थे। मुझे लगा था कि वे अपने निजी संग्रह के लिए चित्र सहेज रहे हैं।
चित्रों का क्रम-निर्धारण और शब्द परिचय वल्कल ने तय किया था जबकि चित्रों और गीत का ‘मिक्सिंग’ तथागत ने किया था। यह सब केवल, इस ‘सुखद आश्चर्य’ तक सीमित नहीं रहा था। पूरे कार्यक्रम के गीतों/नृत्यों का चयन और अन्तिम निर्धारण भी इन दोनों ने ही किया था और सारे गीतों का ‘मिक्सिंग’ तथागत ने ही किया था। ‘महिला संगीत’ के नाम पर बरती जा रही फूहड़ता को लेकर मेरे मन में ‘वितृष्णा’ तक का विकर्षण है (जिसे मैं जल्दी ही अपनी अलग पोस्ट पर उजागर करूँगा) किन्तु मैंने देखा कि इस चयन में मेरे दोनों बेटों ने अतिरिक्त सावधानी बरती। फूहड़ता नाम मात्र को और क्षण भर को भी नहीं आने दी। सब कुछ अत्यधिक (कहने दीजिए कि पूरी तरह) ‘सुरुचिपूर्ण’ था। ‘सांग मिक्सिंग’ ने मुझे तथागत के तकनीकी कौशल से परिचित कराया। उसने ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ (आई टी) में स्नातक उपाधि प्राप्त की है। मुझे नहीं पता कि आगे जाकर वह क्या करेगा, किन्तु उसका यह कौशल उसके व्‍यक्तित्‍व का अनूठा पक्ष लगा मुझे। विभिन्न मनोरंजन चैनलों पर मैंने कई कार्यक्रमों में ‘सांग मिक्सिंग’ देखे हैं। मैं बिना किसी ‘मोहग्रस्त-भाव’ से कह पा रहा हूँ कि तथागत का यह कौशल मुझे ऐसे अनेक कार्यक्रमों की गुणवत्ता के बराबर का लगा।

इस क्षण मैं सचमुच में निर्मल भाव से अपने दोनों बेटों पर गर्व-बोध से आप्लावित हूँ।

प्रिय वल्कल और तथागत! मुझे तुम दोनों पर गर्व है। ईश्वर तुम्हें सदा सुखी रखे - कष्टों की परछाईं की कल्पना से भी दूर।

7 comments:

  1. जइसन जे कर दाई ददा तइसन ते कर लइका..., शुभकामनाएं.

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  2. ये छत्तीस का आँकड़ा कुछ तो दर्द देता ही है, देखिए आप को सब के बीच रूला गया न।

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  3. भावुक क्षण्……… शुभकामनाएं

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  4. भावाकुल पिता और क्या कह सकता है...
    आनंद आ गया । कभी उस स्लाइड शो को यहाँ भी लगाइये ।

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  5. गहन अनुभूतियों का प्रस्फुटन!! हमें भी अन्तर तक भावुक कर गया।

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  6. आपका गर्व आपके बच्चों का मार्गदर्शक प्रकाश स्तम्भ बने..ऐसी सहत्र शुभकामनायें..

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