उत्तराखण्ड: मध्यावधि चुनाव की अपरिहार्यता

विवेक पर जब लालच हावी हो जाए तब आदमी आत्मघाती मूर्खता करने लगता है। उत्तराखण्ड में काँग्रेस यही करती नजर आ रही है। सत्ता का लालच, दीवार पर लिखी इबारत पढ़ने से इंकार कर रहा है। तयशुदा दुर्दशा की अनदेखी की जा रही है। साफ नजर आ रहा है कि काँग्रेस वहाँ सौ प्याज भी खाएगी और सौ हण्टर भी। ताज्जुब यह कि सारे के सारे काँग्रेसी चुप हैं। शायद बाद में बोलने के लिए कि तब ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था। लकीर पीटने की सुविधा हासिल करने के लिए साँप को जाने दिया जा रहा है?
उत्तराखण्ड के मतदाताओं ने किसी के पक्ष में दो टूक निर्णय नहीं दिया है। सबको कुर्सी से दूर रखा है। ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि सारे के सारे दल नैतिक साहस बरतते और एक बार फिर लोगों के बीच जाकर स्पष्ट जनादेश माँगते। लोकतन्त्र की सेहत के लिए एक और चुनाव का भार इतना बड़ा खर्च नहीं है कि प्रदेश में राजनीतिक प्रहसन की छूट दे दी जाए। मतपेटियों के जरिए कही अपनी बात को उत्तराखण्ड के लोगों ने सड़कों पर आकर भी कहने का बुद्धिमत्तापूर्ण साहस बरतना चाहिए। यह चुप्पी अन्ततः उत्तराखण्ड के लोगों को ही भारी पड़ेगी।
साफ नजर आ रहा है कि निर्दलियों की बैसाखियों पर बन रही, काँग्रेस की सरकार पाँच साल नहीं चलेगी। चलेगी तो कभी नहीं। जब तक बनी रहेगी तब तक घिसटती ही रहेगी। समय से पहले इसका गिरना पक्का है - बिलकुल वैसे ही जैसे काँग्रेस ने चन्द्रशेखर और देवगौड़ा की सरकारें गिराई थीं। चार लोग, बत्तीस लोगों को तिगनी का नाच नचा देंगे। और क्या ग्यारण्टी कि इन बत्तीस लोगों में भी ‘चार लोग’ शरीक नहीं हैं? काँग्रेस की तो पहचान ही यही है कि उसे हारने/परेशान होने के लिए विरोधियों की आवश्यकता कभी नहीं रहती!
भाजपा की चुप्पी भी ‘भलमनसाहत’ नहीं, मजबूरी है। बसपा का साथ ले पाना अब उसके लिए आकाश कुसुम से भी अधिक कठिन है। किन्तु भाजपाई खुश हो सकते हैं कि मजबूरी से उपजी उनकी यह चुप्पी उनके पक्ष में जा रही है। वर्ना, कर्नाटक में उसने साबित कर ही दिया है कि सत्ता के लालच के मामले में वह काँग्रेस के निकृष्ट संस्करण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
राजनीति का ककहरा न जाननेवाला, सड़कछाप आदमी भी जान रहा है कि उत्तराखण्ड में मध्यावधि चुनाव होंगे ही होंगे। तब, लोकतन्त्र के नाम कुछ सफेद हाथियों के दाना-पानी का खर्च क्यों लोगों की जेब पर डाला जाए? इसके मुकाबले तो मध्यावधि चुनाव का खर्च हर मायने में कम ही होगा। फौरन ही मध्यावधि चुनाव क्यों नहीं करा लिए जाएँ? फौरन ही चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी जाए। चुनाव प्रचारी की गर्मी अभी भी सतह पर बनी ही हुई है। लोहा गरम ही है। हाँ, चुनाव सुधारों की सांकेतिक शुरुआत भी यहाँ से की जा सकती है कि जो लोग इन चुनावों में हार गए हैं, उन्हें उम्मीदवारी से वंचित किया जाए क्योंकि उन्हें तो लोग खारिज कर ही चुके हैं।
उत्तराखण्ड को सुस्पष्ट बहुमतवाली सरकार मिलनी ही चाहिए और इसके लिए बैसाखियों के सहारे घिसटती किसी सरकार को मौका देना न तो राजनीतिक विवेक है न ही लोकतन्त्रीय विवेक।

2 comments:

  1. जब किसी का बहुमत न हो तो सरकार बनाने का कोई वैधानिक सूत्र होना चाहिए।

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  2. एक आत्मनियम तो बनाना पड़ेगा ही..

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