पालिसी पर नामन (नामिनेशन) : अर्थ, आवश्यकता और महत्व

इस विषय पर चर्चा करने से पहले कुछ शब्दों के, देवनागरी में अंग्रेजी पर्याय जान लें -

नामन - नामिनेशन , नामित - नामिनी, नामांकित - नामिनेट

‘नामन’ (नामिनेशन) का अर्थ है - पालिसी की पूर्णावधि से पहले ही, पालिसीधारक की मृत्यु हो जाने की दशा में, मृत्यु दावे की रकम प्राप्त करने के लिए वैध विमुक्ति-पत्र (डिस्चार्ज फार्म) प्रस्तुत कर, मृत्यु दावे की रकम प्राप्त करने हेतु किसी व्यक्ति का ‘नामांकन’ कर उसे ‘नामित’ व्यक्ति के रूप में उल्लेखित करना।

स्पष्ट है कि ‘नामित’ का अर्थ ‘उत्तराधिकारी’ नहीं होता। -उत्तराधिकारी तो मृतक की सम्पत्तियों और उत्तरदायित्वों का स्वामी होता है जबकि ‘नामित’ इन दोनों बातों से बिलकुल ही सम्बन्धित नहीं होता।

इसे और अधिक स्पष्ट करें तो - ‘नामित’ व्यक्ति उत्तराधिकारी नहीं होता किन्तु उत्तराधिकारी ‘नामित’ व्यक्ति हो सकता है।

जीवन बीमा पालिसियों में उत्तराधिकारी का नहीं, केवल ‘नामन’ का प्रावधान है और प्रस्ताव पत्र प्राप्त करते समय एजेण्ट भी, प्रस्तावक से ‘नामित’ का ही नाम पूछता है। चूँकि अधिकांश मामलों में ‘नामित’ और ‘उत्तराधिकारी’ एक ही व्यक्ति होता है, सो लोक प्रचलन में (जीवन बीमा के सन्दर्भ में) ‘नामित’ को ही ‘उत्तराधिकारी’ भी मान लिया जाता है।

‘नामन’ की आवश्यकता - किसी पालिसीधारक की (पाॅलिसी की पूर्णावधि से पहले) मृत्यु हो जाने की दशा में, पालिसी पर किए जाने वाले दावे की रकम का भुगतान प्राप्त करने के लिए, ‘नामन’ की आवश्यकता होती है। इस हेतु ‘नामांकित’ व्यक्ति ‘नामित’ होता है।

पालिसी की पूर्णावधि से पहले पालिसीधारक की मृत्यु हो जाने की दशा में, दावा प्रस्तुत करना, दावे की रकम प्राप्त करने के लिए वैध विमुक्ति पत्र (डिस्चार्ज फार्म) प्रस्तुत कर, दावे की रकम प्राप्त करना, ‘नामित’ का अधिकार होता है।

‘नामित’ केवल रकम प्राप्त करने का अधिकारी होता है। वह दावे से मिली रकम का स्वामी नहीं होता।उसकी भूमिका ‘न्यासी’ की होती है। दावे की रकम प्राप्त कर, उस रकम को, रकम के ‘वास्तविक अधिकारी व्यक्ति/व्यक्तियों’ तक पहुँचाना, ‘नामित’ का उत्तरदायित्व होता है।

‘नामन’ न होने के नुकसान - जिस पालिसी में ‘नामन’ नहीं हो और ऐसी पालिसी के धारक की मृत्यु, पालिसी पूर्णावधि से पहले हो जाए तो उसका भुगतान तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि मृतक के उत्तराधिकारी का, विधिक निर्णय नहीं हो जाता। अर्थात् बिना ‘नामन’ वाली पालिसी के धारक की मृत्यु से उपजे दावे की रकम प्राप्त करने के लिए उत्तराधिकार-प्रमाण-पत्र (सक्सेशन सर्टिफिकेट) प्राप्त करना पड़ेगा।


इसलिए, बीमा पालिसी लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पालिसी पर ‘नामन’ की सुनिश्चितता कर लेनी चाहिए।

कौन हो सकता है ‘नामित’ - ‘नामन’ पालिसीधारक का विधिक अधिकार है। वह जिसे चाहे, उसे अपना ‘नामित’(नामिनी) बना सकता है।


चूँकि यह ऐसा आर्थिक मामला है जो पालिसीधारक की असमय मृत्यु के बाद, उसके आश्रितों को जीवनाधार दे सकता है। इसलिए ‘नामन’ (नामिनेशन) में भावुकता की अपेक्षा वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर व्यवहारिकता बरतनी चाहिए।

इसलिए निम्नांकितों में से किसी एक को ही ‘नामित’ बनाया जाना अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक होगा -


(1) विवाहित व्यक्ति अपने जीवन साथी को ही नामित बनाए। ‘जीवन साथी’ ही व्यक्ति का ‘प्राकृतिक और प्रथम विधिक उत्तराधिकारी’ भी होता है।

(2) अविवाहित व्यक्ति को अपनी माता को ‘नामित’ बनाना चाहिए क्योंकि ऐसे प्रकरणों में सामान्यतः माँ ही व्यक्ति की प्राकृतिक तथा प्रथम विधिक उत्तराधिकारी होती है।

(3) यदि प्रस्तावक अविवाहित है और उसकी माता का भी स्वर्गवास हो चुका है तो ऐसे प्रकरण में पिता को ‘नामित’ बनाना अधिक उचित होगा।

(4) यथा सम्भव, किसी अवयस्क को नामित बनाने से बचने का प्रयास किया जाना चाहिए।किन्तु यदि किसी अवयस्क को नामित बनाया जा रहा है तो इस स्थिति में एक ‘नियुक्त व्यक्ति’ (अपाइण्टी) आवश्यक है। ऐसे ‘नियुक्त व्यक्ति’ (अपाइण्टी) के, सहमति सूचक हस्ताक्षर भी प्रस्ताव पत्र पर प्राप्त करना अनिवार्य होते हैं।

ऐसे प्रकरणों में ‘अवयस्क नामित’ और ‘नियुक्त व्यक्ति’ यदि पालिसीधारक के ही कोई रक्त सम्बन्धी हो तो अधिक अच्छा होगा।

नामन में परिवर्तन - जिस प्रकार नामन करना पालिसीधारक का अधिकार है उसी प्रकार नामन में परिवर्तन करना भी पालिसीधारक का अधिकार है।

निम्नांकित स्थितियों में नामन में परिवर्तन कराया जाना पालिसीधारक के हित में होगा -

(1) वर्तमान नामित की मृत्यु गई हो।

(2) अवयस्क बीमाधारक जैसे ही वयस्कता की आयु प्राप्त करता है तो उसे नामन का अधिकार स्वतः ही मिल जाता है। ऐसे प्रकरणों मे पालिसीधारक के वयस्क होते ही अविलम्ब नामन करा लेना चाहिए।
अवयस्कों के जीवनद पर जारी की गई पालिसियों में नामन अंकित ही नहीं किया जाता है। ऐसे प्रकरणों में, अवयस्क पालिसीधारक की मृत्यु यदि वयस्कता आयु प्राप्त करने से पहले हो जाती है तो प्रस्तावक ही स्वतः नामित होता है और उसे ही ऐसी पालिसी के दावे की रकम का भुगतान किया जाता है।

(3) यदि पालिसी को, किसी ऋण अथवा मूल्यवान प्रतिफल के लिए किसी व्यक्ति अथवा संस्था को समनुदेशित (असाइन)(‘असाइन’ को बोलचाल की भाषा में ‘गिरवी’ कहा जा सकता है) किया गया हो और ऐसे ऋण अथवा मूल्यवान प्रतिफल का चुकारा कर दिया गया हो, और जिसके पक्ष में पालिसी समनुदेशित की गई थी (या कि जिसके पास गिरवी रखी गई थी) वह ऐसे समनुदेशन को निरस्त करने के निर्देश बीमा कम्पनी को दे दे। तो ऐसे प्रकरण में, पालिसीधारक के पक्ष में पुनर्समनुदेशन होते ही, अविलम्ब ही, नामन करा लेना चाहिए।

इसे यूँ समझना अधिक सहज होगा। आपने बैंक से लोन लिया। बैंक ने, जमानत के रूप में आपकी पालिसी अपने (बैंक के) पक्ष में समनुदेशित (असाइन) करवा ली (अर्थात् आपकी पालिस पर बैंक के पक्ष में गिरवीनामा अंकित करा लिया)। कालान्तर में आपने लोन चुका दिया। बैंक ने इस आशय का पत्र बीमा कम्पनी को लिख कर कह दिया कि आपकी पालिसी आपके पक्ष में समनुदेशित (असाइन) कर दे (अर्थात् पालिसी का स्वामित्व आपके नाम कर दे)। ऐसे में पालिसी तो आपके नाम हो गई किन्तु उस पर नामन किसी का भी नहीं रहा है क्योंकि पालिसी समनुदेशित (असाइन) करते ही (अर्थात् गिरवी रखते ही) उस पर किया गया नामन स्वतः निरस्त हो जाता है।

ऐसे प्रकरणों में पालिसी पर एक बार फिर नामन करना होता है और यह काम अविलम्ब करा लिया जाना चाहिए।

नामन का स्वतः निरस्त अथवा निष्प्रभावी होना -


(1) जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, पालिसी का किसी के पक्ष में समनुदेशन होते ही, पालिसी पर किया गया नामन स्वतः ही, तत्काल प्रभाव से निरस्त अथवा निष्प्रभावी हो जाता है।

(2) पालिसी की पूर्णावधि के बाद, किन्तु पूर्णावधि दावे के भुगतान से पहले, यदि पालिसीधारक की मृत्यु हो जाए तो भी नामन स्वतः निरस्त अथवा निष्प्रभावी हो जाता है।अर्थात्, पालिसीधारक के जीते जी, नामित व्यक्ति को पालिसी से मिलने वाली रकम प्राप्त करने का अधिकार नहीं होता।

चूँकि पालिसी की पूर्णावधि तक पालिसीधारक जीवित था, इसलिए पूर्णावधि दावे की रकम पालिसीधारक को ही भुगतान की जानी थी। किन्तु यह भुगतान पा्रप्त करने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। ऐसी दशा में नामित के अधिकार स्वतः ही समाप्त हो चुके थे। इसीलिए, पूर्णावधि दावे की रकम प्राप्त करने का अधिकार नामित को नहीं रहा। ऐसी स्थिति में यह पालिसी ‘बिना नामन वाली’ श्रेणी में आ जाएगी और इसका भुगतान, उस व्यक्ति को किया जाएगा जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रस्तुत करेगा।

अर्थात्, नामित के अधिकार, पालिसी की पूर्णावधि दिनांक से पहले तक ही सीमित हैं।

एक विशेष स्थिति -संयोग से ऐसा हो जाए कि नामित की मृत्यु हो गई किन्तु नामन में परिवर्तन नहीं कराया गया और इसी बीच पालिसीधारक की मृत्यु हो जाए तो इस स्थिति में भी यह पालिसी ‘बिना नामन वाली पालिसी’ मानी जाएगी और इसका भुगतान भी उसी व्यक्ति को किया जाएगा जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रस्तुत करेगा।

यह उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण तथा आवश्यक है क्यों कि ऐसे प्रकरणों में कभी-कभी, मृत नामित के उत्तराधिकारी, अपने आप को इस पालिसी की रकम के दावेदार के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं।

इसलिए, यदि आपकी पालिसी पर नामन अंकित नहीं हुआ है तो कृपया आपके शाखा कार्यालय से अथवा अपने एजेण्ट से सम्पर्क कर, इस काम को सर्वोच्च प्राथमिकता पर पूरा करें।

इस विवरण में मैंने एकाधिक बार ‘समनुदेशन’ (असाइन) शब्द प्रयुक्त किया है।

अगली बार इसी ‘समनुदेशन’ पर जानकारी प्रस्तुत होगी।

कृपया ध्यान दीजिएगा - ये जानकारियाँ मेरे श्रेष्ठ ज्ञान और जानकारियों पर आधारित हैं। इन्हें भारतीय जीवन बीमा निगम की अधिकृत जानकारियाँ बिलकुल न समझें।

----


इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

‘रोन्या’ और रोतल्या’: मैं

बार-बार, बात-बे-बात रोने वाले को मालवी में ‘रोन्या’ और ‘रोतल्या’ कहते हैं। चिट्ठा जगत के कृपालु मुझे ‘रोन्या’ या ‘रोतल्या’ कहें तो मुझे तनिक भी (निमिष मात्र को भी) बुरा नहीं लगेगा।

यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरी कुछ पोस्टों पर एकाधिक कृपालुओं ने, मेरे रोने को भी अपनी टिप्पणियों में स्थान दिया है। अधिकांश ने मेरी इस ‘कमजोरी’ पर चिन्ता जता कर मुझे इससे उबरने का ‘अपनत्वपूर्ण’ परामर्श दिया तो कुछ ने जिज्ञासा जताई - मैं बार-बार रोता क्यों हूँ?

सबसे पहले तो मेरी चिन्ता करने वालों के प्रति हार्दिक आभार और कृतज्ञता। सच कह रहा हूँ, यदि मित्रों ने मुझे नहीं सम्हाला होता तो मैं तो अब तक जीवित भी नहीं रह पाता। जब भी अवसर मिलता है, मैं कहता हूँ कि मैं तो उधार का जीवन जी रहा हूँ। जैसे मित्र मुझे मिले, ईश्वर सबको वैसे मित्र दे और मुझ जैसा मित्र किसी को न दे। मेरे मित्र ही मेरी अमूल्य परिसम्पत्तियाँ हैं और मैं सब मित्रों का अयाचित, अवांछित उत्तरदायित्व।

किन्तु ईश्वर की कृपा सचमुच में अकूत और चिरन्तन है। चिट्ठा जगत में आकर मेरी परिसम्पत्तियाँ तो सहस्रगुना हो गईं! जो मुझे जानते नहीं, जिन्होंने मुझे देखा नहीं, मुझसे कभी बात नहीं की ऐसे अनगिनत चिट्ठाकारों ने मानो मुझे अपने परिवार में सम्मिलित कर लिया। पल-प्रति-पत शुष्क होते जा रहे इस समय में कौन किसके रोने की चिन्ता करता है? किसी के आँसुओं की कौन परवाह करता है? कोई रो रहा है तो रोता रहे। प्रत्येक के पास अपनी-अपनी असमाप्त व्यस्तताएँ हैं।

किन्तु चिट्ठा जगत ने मुझे न केवल हौसला दिया, अपितु वह ऊष्मापूर्ण अपनत्व दिया जो व्यक्ति की जीवनी-शक्ति बढ़ाता है, व्यक्ति का एकान्त नष्ट करता है, उसे वह आश्वस्ति भाव और निश्चिन्तता देता है जिसके दम पर आदमी की हर परेशानी बहुत ही छोटी, बहुत ही हलकी और आसानी से झेली जा सकने वाली हो जाती है।

मैं बहुत जल्दी रुँआसा हो जाता हूँ। छोटी-छोटी (और अर्थहीन) बातें भी मुझे रुला देती हैं, यह सच है। ऐसा क्यों है-इसका कोई उत्तर मेरे पास नहीं है। किन्तु अपनी इस दशा पर मुझे तनिक भी संकोच और लज्जा नहीं है। मैं एक सामान्य मनुष्य हूँ जिस पर सारे आवेग-सम्वेग अपना प्रभाव डालते हैं। मैं इनसे न तो बच पाता हूँ और न ही बचने का प्रयत्न करता हूँ। रुलाई और हँसी को मैं न तो रोक पाता हूँ और न ही इन्हें रोकने का कोई प्रयत्न ही करता हूँ।

‘रोना‘ मेरे तईं एक सहज प्राकृतिक क्रिया है जिसे मैं निर्बाध रूप से पूरी होने देने के पक्ष में हूँ। मेरा बचपन देहात में बीता जहाँ एक का दुख, सबका दुख होता है-आज भी। सो, जिस मिट्टी से मेरी मानसिकता गूँधी गई वह शायद ऐसी ही भावनाओं के पानी से तैयार हुई होगी। विवाह प्रसंगों में मैं वधु की विदाई के क्षणों में भाग आता हूँ। मेरी इस बात पर हर कोई अविश्वास ही करेगा किन्तु यह शब्दशः सच है कि मेरे ‘पाणिग्रहण संस्कार’ के बाद जब मेरी पत्नी की विदाई का क्षण आया तो मैं अपने मित्रों के साथ जनवासे चला आया। वहाँ रुक जाता तो लोग देखते कि नव विवाहित वर वधु, जोड़े से रो रहे हैं। मेरी इस बात की पुष्टि मेरी जीवन संगिनी से की जा सकती है। आज भी मुझसे ‘बेटी की विदाई’ न तो देखी जाती है और न ही झेली जाती है।

मैं ऐसा ही हूँ। अपने रोने को लेकर कोई हीन भाव मुझे नहीं सताता और न ही ‘लोग क्या कहेंगे’ वाला ‘लोक भय’ मुझ तक आ पाता है। हाँ, हँसी के मामले में तनिक सावधानी बरतने का यत्न अवश्य करता हूँ। मेरा हँसना किसी की अवमानना, उपहास का कारण न बने, इस चिन्ता के अधीन यथा सम्भव चैकन्ना रहने की कोशिश करता हूँ और अपवादों को छोड़ दूँ तो कहने की स्थिति में हूँ कि ऐसे प्रयत्नों में मेरी सफलता का प्रतिशत पर्याप्त आत्म सन्तोषदायक है।

किन्तु एक मामले में मैं अपवादस्वरूप ही सफल हो पाता हूँ। वह है - अपने आवेश पर नियन्त्रण कर पाना। यह मेरी इतनी बड़ी कमी है जिसके कारण मुझे अनगिनत बार, अच्छी-खासी हानि झेलनी पड़ी है। यह क्रम अब भी निरन्तर बना हुआ है। ऐसे प्रत्येक अवसर पर मेरा विवेक मुझे टोकता रहता है किन्तु बुध्दि भ्रष्ट हो जाती है और मैं खदु ही अपना शत्रु साबित हो जाता।

किन्तु मेरे समस्त हितचिन्तक एक बात जानकर शायद प्रसन्न हों। यह रोना, मेरी दुर्बलता कभी नहीं बन पाया। अपने सम्पूर्ण आत्म विश्वास से कह पा रहा हूँ कि मेरे भावातिरेक का मनमाना उपयोग (इसे आप ‘दुरूपयोग’ भी कह सकते हैं) करने की सुविधा आज तक मैंने किसी को उपलब्ध नहीं कराई। सब निराश ही हुए।

सो, समूचा चिट्ठा जगत मुझ ‘रोन्या’ अथवा ‘रोतल्ये’ को जिस चिन्ता और अपनत्व से अब तक सहेजे हुए है, वह चिन्ता और अपनत्व बनाए रखिएगा। मेरे मित्र ही मेरी अमूल्य परिसम्पत्तियाँ और जीवनी शक्ति हैं।

और मैं? मैं तो ऐसा ही हूँ। ‘सुधरने’ की क्षीणतम सम्भावना (सम्भावना क्या, आशंका) भी नहीं है। आखिरी उम्र में क्या खाक मुसलमाँ होंगे?

मुझे मेरी इस कमजोरी सहित अपनाए रखने का उपकार कीजिएगा।

-----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

न तो उतना रोया, न वैसा रोया

बीमा व्यवसाय के दौरान मिला यह अनुभव मेरे लिए अब तक मर्मान्तक पीड़ादायक बना हुआ है। लगभग पन्द्रह वर्षों के बाद, इस क्षण तक भी मुझे लगता है कि निश्चय ही मैंने ईश्वर के प्रति कोई गम्भीर अपराध किया होगा जिसके दण्डस्वरूप मुझे ऐसे क्षणों का साक्षी बनना पड़ा। किन्तु जब इन क्षणों के ‘भोक्ता‘ का स्मरण होता है तो मेरी आत्मा काँप उठती है-ईश्वर उससे कितना खिन्न रहा होगा?

यह सम्भवतः 1993 की बात है। मेरी एजेन्सी का तीसरा वर्ष चल रहा था। बीमा व्यवसाय का मूल आधार होता है - सम्पर्क और अनुशंसा। जब भी किसी से बीमा मिलता है, उससे हम (एजेण्ट) लोग उसके किसी मित्र, परिचित का अता-पता लेते हैं और अनुरोध करते हैं कि वह अपने मित्र को, टेलीफोन कर हमारी सिफारिश कर दे और हमारी विश्वसनीयता की पुष्टि कर दे। बाकी काम हमारा।

ऐसे ही एक सिफारिशी फोन के ‘फालो-अप’ में मैं ‘उन’ सज्जन से मिला। सुविधा के लिए आगे मैं उन्हें 'रामजी' के काल्पनिक नाम से उल्लेखित करूँगा।

रामजी से यह मेरी पहली ही भेंट थी। न मैं उन्हें जानता था, न वे मुझे। सवेरे कोई सवा नौ-साढ़े नौ बजे मैं उनके निवास पर पहुँचा। मुख्य बाजार में गर्वोन्नत मस्तक खड़ा उनका तीन मंजिला मकान उनकी सुदृढ़ आर्थिक स्थिति का उद्घोष कर रहा था। बीच बाजार में उनकी, कपड़े की खूब बड़ी दुकान मैं देख ही चुका था। वैभव लक्ष्मी मानो अपने अनुचरों सहित वहाँ विराजित थीं। मैं खुश हुआ। बीमा मिलने की प्रचुर सम्भावनाएँ मुझे साफ-साफ नजर आ रही थीं।
रामजी नहा-धो कर, पूजा-पाठ कर उठे ही थे। भेंट पूर्व निर्धारित थी। वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिवादन के आदान-प्रदान के बाद मैंने अपना परिचय दिया। अपना विजिटिंग कार्ड उन्हें थमाया और उनके व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा आर्थिक ब्यौरे प्राप्त करने में जुट गया। मुझे यह जानकर विस्मय हुआ कि उनके परिवार मे अब तक किसी को बीमा नहीं था। किन्तु बहुत ही जल्दी समझ में आ गया कि ऐसा क्यों था। उनकी सारी गणना ब्याज केन्द्रित और ब्याज आधारित थी जिसके सामने बीमे से मिलने वाली प्राप्तियाँ तो पानी भी नहीं भर पातीं! कुछ ही क्षणों में मुझे भान हो गया कि यहाँ से बीमा या तो नहीं मिलेगा और मेरे सौभाग्य से मिल गया तो उसके लिए मुझे असाधारण परिश्रम करना पड़ेगा और उससे भी अधिक असाधारण धैर्य धारण कर भरपूर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।


बीमा को ब्याज के मुकाबिल बनाए रखने के लिए मैंने कहा - ‘आपको मुनाफा चाहिए तो बीमा में फूटी कौड़ी लगाना भी मूर्खता है। किन्तु यदि आपको सुरक्षा चाहिए तो फिर बीमे के अतिरिक्त और कहीं पैसा लगाना बुध्दिमानी नहीं है।’ रामजी ने जो हाव-भाव प्रकट किए उससे मुझे तत्क्षण ही लग गया कि इस वाक्य ने उन्हें तनिक उलझा दिया है। बोले - ‘मैं समझा नहीं। साफ-साफ समझाओ।’ मैंने कहा - ‘हम मुनाफा नहीं, सुरक्षा बेचते हैं।’


इसके बाद तो मुझे खुलकर खेलने के लिए बिना बाड़वाला लम्बा-चैड़ा मैदान मिल गया। लाभ के पाश में बँधा ‘चतुर-सुजान व्यापारी’ अचानक ही ‘असुरक्षा भाव से ग्रस्त’ हो गया। अब मैं बोल रहा था और रामजी सुन रहे थे। उनकी मुख मुद्रा से निर्विकार भाव तिरोहित हो चुका था और आत्मपरकता व्याप्त होने लगी थी। वे मेरी बातों पर सहमतिसूचक मुद्रा में अपना सर हिला रहे थे। यह देख-देख मेरे मन में फुलझड़ियाँ छूटने लगी।


तभी उनका इकलौता बेटा सीढ़ियाँ उतर कर कमरे में प्रकट हुआ। वह बी. काम. द्वितीय वर्ष का छात्र था। आयु के उन्नीसवें वर्ष में चल रहा था। पिता के पास बैठे अपरिचित का अभिवादन करना तो दूर रहा, उसने हम दोनों की ओर देखा भी नहीं। रामजी तनिक असहज हुए। उन्हें अच्छा नहीं लगा। बेटे के चेहरे पर पसरे उपेक्षा भाव को उन्होंने मानो पहली ही नजर में पढ़ लिया था। सो, उन्होंने यह भी नहीं कहा कि अतिथि को नमस्कार करो।


बेटा बिना बोले बाहर निकलने को ही था कि रामजी बोले - 'भैया, तू कल शाम को दुकान पर नहीं आया। नहीं आया तो कोई बात नहीं। खबर कर देता तो थोड़ी आसानी हो जाती। दोपहर में एक लड़के की छुट्टी कर दी थी, वह नहीं करता। शाम को दुकान पर थोड़ी परेशानी हो गई।' उनके स्वर में न तो आदेश भाव था न ही उपालम्भ। बेटे की असूचित अकस्‍मात अनुपस्थिति से उपजी अस्तव्यस्तता के कारण झेली परेशानी की सूचना थी - अत्यन्त दयनीय स्वरों में। मैं साफ-साफ समझ पा रहा था कि रामजी ने जो कहा सो कहा किन्तु जो नहीं कहा वह था - आगे से ऐसी परेशानी खड़ी न हो, इतनी मदद करना।


रामजी की बात सुनकर पुत्र ठिठका। गर्दन को रामजी की तरफ हलकी सी जुम्बिश देकर, चेतावनी भरे रूखे स्वरों में बोला - ‘टिड़, टिड़ मत करो। यह मकान मेरे नाम पर है। लात टिका कर निकाल दूँगा।’ यह कह कर वह बिना हम दोनों की ओर देखे, अपनी चेतावनी की प्रतिक्रया जानने का यत्न किए बिना, बेलौस चला गया।


वह तो चला गया किन्तु कमरे में जो कुछ छोड़ गया था, उसे झेल पाना हम दोनों के लिए समूची धरती का भार सर पर उठाने से भी अधिक कठिन था। रामजी सचमुच में जड़वत हो गए। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वे निश्चल, निस्पन्द, मूर्तिवत हो गए थे। मानो लकवाग्रस्त हो गए हों।


और मैं? मुझे लग रहा था कि पूरी धरती लट्टू की तरह पूरी तेजी से घूम रही है और इसी तरह घूमती-घूमती रसातल में चली जाएगी-मुझे और रामजी को अपने साथ लपेट कर। मैं हम दोनों को तेज भँवर की लपेट में आए हुए, घूमते देख रहा था। हम दोनों बचाव की मुद्रा में अपने-अपने हाथ उठाए हैं किन्तु आवाज किसी के भी गले से नहीं निकल रही है। केवल धरती के घूमने की आवाज गूँज रही है।


नहीं पता कि हम दोनों कब अपने आप में लौटे। मुझे अब तक नहीं याद कि पहले मैं संयत हुआ या रामजी। लेकिन, रसातल की ओर घिसटते जाने से बच धरती पर आए तो पाया कि हम दोनों ही हिचकियाँ ले-लेकर रो रहे हैं-निःशब्द। एक दूसरे को ढाढस बँधाने का न तो साहस न ही भान। बस, रोए जा रहे हैं। थोड़ी देर बाद रामजी के मुँह से निकला - ‘जिन्दगी बेकार हो गई।’ और इसके बाद उन्होंने जो रोना शुरु किया तो लगा कि उनके प्राण, उनकी छाती चीरकर बाहर निकल पड़ेंगे। वाल्मिकी के बाण से बिंधा क्रौंच पक्षी सम्भवतः कुछ इसी तरह छटपटाया, बिलखा होगा। वैसा ही क्रन्दन किया होगा जैसा रामजी कर रहे थे।


उनकी दशा देख मैं आहत था किन्तु जैसे-जैसे चेतना लौटने लगी तो भयभीत होने लगा। मुझे लगा - रामजी को ‘कुछ’ हो न जाए या फिर भावातिरेक में वे खुद ही ‘कुछ’ कर न लें। जैसे-तैसे खुद संयत हुआ और रामजी को अपनी बाँहों में लिया। वे फिर बिखर गए। मैंने सचमुच में ‘येन-केन-प्रकारेण’ रामजी को सम्हाला। उनके आँसू पोंछे। मेरा कुछ भी कहना व्यर्थ ही नहीं, मेरे लिए असम्भव ही था। केवल उनकी पीठ पर हाथ फेरता रहा। पता नहीं कितनी देर बाद उनका क्रन्दन हिचकियों से होता हुआ सुबकियों तक आया। ऐसी स्थिति का साबका मुझे मेरे अब तक के जीवन में पहली ही बार पड़ा था। सो, यह भी नहीं जानता था कि ऐसे समय में क्या कहना चाहिए, किस तरह ढाढस बँधाना चाहिए।


मानो, जेठ की चिलचिलाती दोपहर में, नंगे पाँवों, कच्छ का रन पार करके लौटे हों, कुछ ऐसी ही लस्त-पस्त स्थिति में उन्होंने अपने आप को सम्हालने का उपक्रम किया। मेरी ओर जिस दृष्टि से देखा उससे मुझे एक बार फिर रोना आ गया। मैं आँखें मूँद कर, कुर्सी की पीठ से टिक कर बैठ गया। तभी उनकी आवाज सुनाई दी। बोलने में मानो अपनी समूची शक्ति लगानी पड़ रही हो रामजी को। हाँफते, कराहते बोले - ‘इनकम टैक्स की प्लानिंग के लिए मकान इसके नाम कर रखा है। वकील साहब ने सलाह दी थी। लेकिन इसके कारण यह दिन देखना पड़ेगा यह तो सपने में भी नहीं सोचा था। मैं तो समझ रहा था कि मेरे घर में कोई कमी नहीं है। किन्तु आज मालूम पड़ा कि मेरे पास बस पैसा ही पैसा है, बाकी तो कुछ भी नहीं है। यह दिन दिखाने से तो अच्छा होता कि भगवान मुझे उठा ही लेता।’ मैं कुछ नहीं बोला। बोल पाना मेरे लिए मुमकिन ही नहीं हो पा रहा था।


अब तक मैं अपने आप में आ चुका था। बुद्धि और विवेक जाग्रत हो मेरे कान उमेठने लगे थे। रामजी भी ‘खतरे से बाहर’ हो चुके थे। ‘मुझे अब यहाँ से निकल जाना चाहिए’ जैसी स्थिति आ गई थी। अचानक मुझे ध्यान आया-हम दोनों इतना रो लिए, रामजी ने इतना विलाप, इतना क्रन्दन किया किन्तु रामजी की पत्नी तक आवाज नहीं पहुँची! मैंने पूछा - ‘भाभीजी घर में नहीं हैं?’ रामजी ने कहा - 'है। तीसरी मंजिल पर।' कह कर उन्होंने कमरे के स्विच बोर्ड का एक बटन दबाया। घण्टी की धीमी आवाज सुनाई दी। कुछ ही क्षणों में रामजी की पत्नी सीढ़ियों उतरीं। मैंने नमस्कार किया। मेरे नमस्कार का जवाब देने के बजाय वे चकित हो हम दोंनों को देखने लगीं। रामजी ने मुझसे कहा -‘आप पधारो सा'ब। फिर कभी आना।’ उनकी पत्नी ने कुछ पूछना चाहा तो रामजी बोले -‘इन्हें जाने दो। फिर बात करेंगे।’


और मैं चला आया। उस दिन मैं भोजन नहीं कर पाया। घर से बाहर भी नहीं निकल पाया। मेरी पत्नी नौकरी पर गई हुई थीं। खुल कर रोने के लिए मुझे पूरा-पूरा एकान्त मिला। जितना उस दिन रोया, उतना न तो उससे पहले कभी और न ही अब तक कभी रोया। सीधा बिस्तर पकड़ लिया। दोपहर होते-होते बुखार आ गया। पता नहीं मैं सो रहा था या तन्द्रा में था किन्तु रामजी का चेहरा मेरी नजरों से नहीं हट रहा था। उनका बिलखना, उनका हाथ-पाँव पटकना मेरी आँखें नहीं झपकने दे रहे थे।


अगले दिन सामान्य हो पाया। जिन सज्जन ने सिफारिश कर मुझे रामजी के पास भेजा था वे फोन पर पूछ रहे थे -‘रामजी ने बीमा दिया या नहीं?’ मैंने कहा - ‘बाद में बुलाया है।’ यह ‘बाद’ आज तक नहीं आया। रामजी के पास जाने की हिम्मत ही नहीं हुई। डरता रहा कि मुझे देखते ही वे कहीं आत्म ग्लानि में आकण्ठ डूब न जाएँ।


इस घटना के कोई सात माह बाद मेरे एक मित्र ने कहा -‘रामजी तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे। तुम्हें नमस्कार कहलवाया है।’ मैंने पूछा -‘तुम उनसे मिल कर आ रहे हो?’ मित्र बोला -‘हाँ। परसों मिला था। सूरत में।’ मैं चैंका। पूछा - ‘सूरत में?’ मित्र ने निस्पृह भाव से कहा -‘हाँ। सूरत में। पता नहीं क्या हुआ कि पाँच-छह महीने पहले रामजी अपना मकान और दुकान बेच कर सूरत चले गए। कह रहे थे कि यहाँ से उनका मन उचट गया है।’


मैंने खोद-खोद कर मित्र से रामजी के बारे में पूछा तो मालूम हुआ कि रामजी सूरत में बहुत ही सामान्य, छोटे से मकान में रह रहे हैं। दुकान भी नाम मात्र की कर रखी है, इतनी कि घर चल जाए। यहाँ से जो रकम लेकर गए थे, वह बैंक में एफडी कर दी है और उसके ब्याज की रकम निर्धन बच्चों की पढ़ाई के लिए दे देते हैं। इस सबमें उनकी पत्नी उनके साथ है।


‘और उनका बेटा? वह कैसा है?’ मैंने पूछा। मित्र तनिक अचरज से बोला -‘पता नहीं क्या हुआ! वह तो पूरा बदल गया है। कोशिश करता है कि रामजी को दुकान पर या तो बैठना ही नहीं पड़े या फिर कम से कम बैठना पड़े। यहाँ तो वह रामजी की परवाह ही नहीं करता था लेकिन वहाँ तो श्रवण कुमार बना हुआ है।’


मित्र की बात सुनकर मेरी आँखें बहने लगीं। मित्र घबरा गया। बोला -‘क्यों? क्या बात है? तुम क्यों रो रहे हो?’ मैंने कहा - ‘कुछ नहीं। सात महीने पहले मैं लुट गया था। आज मेरी लुटी रकम मुझे सूद समेत मिल गई सो रोना आ गया।’


मित्र मुझे लाल बुझक्कड़ की तरह देखने लगा। मैं उसे, इसी दशा में छोड़ घर लौट आया। घर आकर मैं फिर रोया।


लेकिन इस बार न तो उतना रोया और न ही वैसा रोया।

-----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

सबसे गरीब और नितान्‍त अकेला

बेंगलुरु स्थित मेरे एक परिचित ने कल पहली बार मेरा यह चिट्ठा पढ़ा और चिट्ठे पर टिप्पणी करने के बजाय ‘मेल‘ कर पूछा कि चिट्ठे पर आत्म परिचय में मैंने 'इस एजेन्सी के कारण धनपतियों की दुनिया में घूमने के बाद का निष्कर्ष कि पैसे से अधकि गरीब कोई नहीं । पैसा, जो खुद अकेले रहने को अभिशप्त तथा दूसरों को अकेला बनाने में माहिर' वाला वाक्य क्यों लिखा?


बीमा ऐजन्सी के कारण मुझे सभी स्तर की आर्थिक हैसियत वाले परिवारों में जाना पड़ता है। जीवन को हम ‘इन्द्रधनुष’ क्यों कहते हैं, यह मैंने इसी एजेन्सी के कारण जाना। मैंने पाया, निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों में अभाव तो होते हैं किन्तु परिजनों में परस्पर दुराव-छिपाव और उपेक्षा भाव या तो होता ही नहीं है और यदि होता भी है तो वह सम्भवतः 'अनिवार्य और अपरिहार्य' की दशा में ही होता है और वह भी अपने न्यूनतम स्तर पर। इसके विपरीत, धनाढ्य परिवारों में ये सारी बातें मुझे सामान्य से अधिक स्तर पर अनुभव हुईं और इस सबके पीछे एक ही कारण अनुभव हुआ - पैसा। इन परिवारों में कहीं कोई अभाव नहीं दिखाई दिया और पैसा आवश्यकता से अधिक ही दिखा।

जिन निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों में अभाव देखे वहाँ परिवार का प्रत्येक सदस्य अन्य सदस्यों की चिन्ता करते हुए दिखाई दिया जबकि अभावविहीन परिवारों में कोई किसी की चिन्ता, परवाह करता नजर नहीं आया। हाँ, ऐसे परिवारों के वृध्द सदस्य अवश्य अपने बच्चों की और उनकी इस मानसिकता की चिन्ता करते मिले।

अनगिनत परिवारों से मिले अनुभवों के आधार मैं कहने की स्थिति में हूँ कि मनुष्य जीवन तो 'इन्द्रधनुष' से भी एक कदम आगे है। इन्द्रधनुष में काला रंग नहीं होता किन्तु ‘इस इन्द्रधनुष’ में तो काला रंग भी नजर आया। मेरे एजेन्सी काल के प्रारम्भिक समय का एक अनुभव प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अभावविहीन, अतिरिक्त समृध्द ऐसे ही एक परिवार में चार सदस्य हैं। माता, पिता और उनके दो पुत्र। घटना के समय दोनों पुत्र अविवाहित थे। आज दोनों ही बाल-बच्चेदार हैं। तब मैं डाक घर की अल्प बचत योजनाओं का एजेण्ट भी था। उन दिनों ‘किसान विकास पत्र’ में निवेशित रकम पाँच वर्षों में दुगुनी हो जाया करती थी और तब ‘एण्टी मनी लाण्ड्रिंग एक्ट’ भी लागू नहीं था। ‘किसान विकास पत्र’ निवेशकों के बीच सम्भवतः सर्वाधिक लोकप्रिय ‘निवेश माध्यम’ था।

इस परिवार के चारों सदस्यों ने एक के बाद एक, मेरे माध्यम से ‘किसान विकास पत्र’ खरीदे। प्रत्येक की निवेशित रकम का आँकड़ा ‘भारी भरकम’ था। निवेश करते समय प्रत्येक ने शर्त रखी कि उसके निवेश की जानकारी शेष तीनों परिजनों को न हो। चूँकि निवेश अलग-अलग समय पर किया गया था सो तब मुझे कुछ भी अटपटा और असहज नहीं लगा। किन्तु, चारों के निवेश के बाद जब उस घर में मेरा आना-जाना बार-बार होने लगा तो यह बात पहले तो मुझे चैंकाने लगी और बाद में कचोटने लगी।

तब ऐसा होने लगा कि मैं उन चारों में से किसी एक से बात कर रहा होता तो हमारा विषय ‘किसान विकास पत्र’ ही होता। किन्तु बात करने के दौरान जैसे ही, परिवार का कोई दूसरा सदस्य आता तो मुझसे बात करने वाला मेरा निवेशक तत्काल विषय बदल देता। उदाहरणार्थ, बात तो किसान पत्र पर हो रही है और माताजी आ गईं। बेटा तत्काल कहता - ‘तो भाई साहब! फिर आपने नगर निगम में मेरे आवेदन की पूछताछ की या नहीं?’ माताजी से अकेले में बात कर रहा होता और उनके पतिदेव आ जाते तो माताजी उलाहना देने लगतीं - ‘आपसे कितनी बार कहा कि भाभीजी को लेकर आइए लेकिन आप सुनते ही नहीं।’ पिताजी से बात कर रहा होता तो बेटा या पत्नी के आगमन पर फौरन ‘ट्रेक’ बदल लेते - ‘आप तो बुध्दिजीवी हैं। आपकी बात सब सुनते और मानते हैं। नेताओं से कह कर शहर की दशा सुधारते क्यों नहीं?’


शुरु-शुरु में तो मुझे यह सब सामान्य लगता रहा किन्तु ऐसा जब बार-बार होने लगा तो मुझसे रहा नहीं गया। बेटा, बाप से छुपा कर और बाप, बेटे से छुपा कर निवेश करे या माँ-बेटे परस्पर छुपा कर निवेश करें, यह तो मुझे अटपटा नहीं लगा किन्तु पति-पत्नी दुराव-छिपाव बरतें, यह मुझे न केवल अटपटा लगता अपितु मुझे असहज और परेशान भी करता। एक दिन मैंने पतिदेव से इसका कारण पूछा तो हँसकर (लगभग टालने का प्रयत्न करते हुए) बोले - ‘अभी आपने दुनिया नहीं देखी है। पैसे के लिए औरतें अपने आदमी का खून तक करा देती हैं। आखिर में पैसा ही साथ देता है। पति-पत्नी के भरोसे-वरोसे वाली बातों में कोई दम नहीं है।’ एकान्त में उनकी पत्नी से पूछा तो बोलीं - ‘मर्दों का कोई भरोसा नहीं। पति है तो क्या हुआ? है तो मर्द ही। इन्हें अपने पैसे पर बड़ी अकड़ है। क्या पता, कल एक औरत और कर लें और मुझे घर से निकाल कर सड़क पर खड़ा कर दें? तब पैसा ही तो साथ देगा?’ दोनों बेटों के पास भी इसी प्रकार अपने-अपने तर्क थे।


चारों की बातें सुनकर मुझे अचरज और कष्ट हुआ। चारों के चारों, एक छत के नीचे, एक साथ रह रहे हैं किन्तु किसी को किसी पर विश्वास नहीं है। और तो और, पवित्र अग्नि के फेरे लेकर, अपने-अपने कुल देवताओं की साक्षी में जिन पति-पत्नी ने आजीवन दुख-सुख में साथ निभाने की और एक दूसरे की चिन्ता करने की शपथ ली, वे भी एक दूसरे पर न केवल सन्देह और अविश्वास कर रहे हैं अपितु अपने प्राणों पर खतरा मान कर भयभीत भी हैं। प्रत्येक ने अपने बचाव में, परिवार की अति-समृध्दि को ही कारण माना।

इस परिवार के अनुभव ने मेरा कौतूहल बढ़ाया और पैसे के ऐसे प्रभाव पर अतिरिक्त रूप से ध्यान देने लगा। मैंने अनुभव किया कि जहाँ-जहाँ आवश्यकता से अधिक पैसा है वहाँ-वहाँ यही स्थिति है। कहीं कम, कहीं अधिक किन्तु है यही सब। कहने को परिवार है किन्तु परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने आप में अकेला और ‘पैसे से उपजे आतंक’ के कारण भयभीत भी।

मेरे मानस पर इस सबका गहरा प्रभाव हुआ है। मैं ईश्वर से सदैव प्रार्थना करता हूँ कि परिवार में कोई न कोई अभाव निरन्तर बनाए रखे ताकि परिवार के सारे सदस्य एक दूसरे की चिन्ता करते रहें। गप्प गोष्ठियों में मैं परिहास करता हूँ कि यदि किसी का बुरा करना हो तो उसे श्राप देने के बजाय ईश्वर से प्रार्थन कीजिए कि उसे, उसकी आवश्यकता से कई गुना अधिक धन दे दे। उसका सुख-चैन छिन जाएगा।

मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि अभाव परिवार को जोड़े रखते हैं और अति समृध्दि परिवार में बिखराव लाती है। यह बिखराव परिदृश्य पर भले ही दिखाई न दे, पूरा परिवार इसे भोगने को अभिशप्त रहता है।


यह सब लिखते हुए मैं भली प्रकार जानता हूँ कि इसके अपवाद हो सकते हैं किन्तु अपवाद तो सदैव ही सामान्यता की ही पुष्टि करते हैं!

इसीलिए मैंने कहा है कि पैसा सबसे गरीब होता है। जहाँ आवश्यकता से अधिक पैसा है वहाँ सामूहिकता और विश्वास अनुपस्थित हो जाते हैं। इसीलिए : पैसा - अकेला रहने को अभिशप्त और लोगों को अकेला करने में निष्णात।


ऐसे ही कुछ कड़वे अनुभव (या कि इन्द्रधनुष का काला रंग) फिर कभी।

-----


इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

ज्योतिष : मात्र जिज्ञासा, प्रश्न नहीं

(अपने एक अनुभव से उपजी जिज्ञासा प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह प्रश्न नहीं है और ‘चुनौती‘ जैसा भाव और मनःस्थिति तो ‘कल्पनातीत‘ या कि ‘स्वप्नातीत‘ ही है। इसके बाद भी, ‘ज्योतिष‘ से (किसी भी स्तर और प्रकार से) जुड़े महानुभावों को यह सब तनिक भी ‘अनपेक्षित, अन्यथा, अनुचित, अशालीन‘ लगे तो मैं उन सबसे कर-बध्द क्षमा याचना करता हूँ।
मैं 'ज्योतिष' पर न तो आँख मूँद कर विश्वास करता हूँ और न ही इसे सिरे से निरस्त ही करता हूँ। इसके साथ ही साथ यह भी भली प्रकार जानता हूँ कि किसी का असम्मान कर मैं स्वयम् के लिए भी असम्मान की फसल ही उपजाऊँगा।)

यह 1990 की बात है। दवाइयाँ बनाने वाली हमारी औद्योगिक इकाई ‘नगद हानि‘ (केश लास) की दशा में आ गई थी। मेरे दोनों भागीदार अत्यधिक परिश्रमी, प्रतिभाशाली, उद्यमी और अच्छे व्यापारी । जबकि मैं जीवन, उद्योग और व्यापार के सिद्धान्तों, नियमों, व्यवहार जैसे समस्त पक्षों में शून्य। वे दोनों मुझे निभा रहे थे। आँकड़े मुझे समझ नहीं पड़ते थे (आज भी समझ नहीं पड़ते) किन्तु स्थितियाँ तो दिखाई दे रही थीं। वे दोनों मेरा लिहाज भी करते थे और चिन्ता भी। मुझसे उनका दुख नहीं देखा जाता था।

जनरल इंश्योंरेस की एक कम्पनी के स्थानीय शाखा प्रबन्धक ने मुझे एजेण्ट बनने का प्रस्ताव दिया। अपने भागीदारों को बताए बिना और उनसे सहमति लिए बिना कोई भी अन्य काम शुरु करना मेरे लिए अनैतिक ही था। सो मैंने इंकार कर दिया। शाखा प्रबन्धकजी ने मेरे भागीदारों से सम्पर्क किया। दोनों भागीदारों ने अपनी ओर से कहा कि मैं यह एजेन्सी ले लूँ ताकि घर में ‘बघार‘ तो लग सके। मैंने एजेन्सी ले ली किन्तु वह नाम मात्र तक ही सीमित रही। उसके लिए जितना समय चाहिए था, कारखाने से लौटने के बाद वह निकाल पाना सम्भव नहीं था। महीने में पाँच-सात, छोटे-छोटे बीमे मिल जाते थे किन्तु उनका कमीशन प्रोत्साहित करने वाला नहीं था।


मेरे प्रति मोहग्रस्त, मुझे अग्रज मानने वाला एक स्वजाति युवक मेरी दशा से खिन्न था। उसे लगता था कि मुझे मेरा प्राप्य नहीं मिल रहा। वह मुझे बार-बार इस भागीदारी से मुक्त होने के लिए कहता रहता था। चाहता तो मैं भी था कि मैं अपने दोनों भागीदारों को मुक्त कर दूँ किन्तु साहस नहीं हो पा रहा था। न तो गाँठ में पूँजी, न ही भेजे में अकल! करूँ भी तो क्या?

उस युवक ने, मेरी अनुपस्थिति में मेरी जन्म पत्रिका अपने विश्वस्त और प्रिय ज्योतिषी (इस पोस्ट में आगे मैं उन्हें ‘पण्डितजी‘ उल्लेखित करूँगा) को दिखाई। पण्डितजी ने ‘स्पष्ट प्रश्न’ माँगे। युवक ने कहा - ‘वर्तमान दुर्दशा से मुक्ति और भविष्य में किया जाने वाला व्यवसाय।’ पण्डितजी ने एक पखवाड़े के बाद बुलाया और कहा - ‘बैरागी को लेकर आना।’


निर्धारित दिनांक और समय पर हम दोनों पहुँचे। यह अक्टूबर 1990 की बात है। पण्डितजी ने मुझसे कहा - ‘पहले आप अपनी बात कह दें।’ मैंने कहा - ‘सब कुछ भाई ने आपको बता ही दिया है। मेरे दोनों भागीदारों का दुःख मुझसे नहीं देखा जा रहा। मेरी इच्छा है कि मैं उन्हें मेरी जिम्मेदारी से मुक्त कर दूँ। इस भागीदारी से अलग हो जाऊँ।’

पण्डितजी ने कहा - 'आप लिख लो, 1991 की पहली अप्रेल से आप इस भागीदारी में नहीं रहेंगे। इसलिए आप अभी चुप रहें। निकलने का निर्णय लेने के अपयश से बचें। वैसे भी, यदि आप अलग भी होना चाहेंगे तो भी आपका अलग होना, चालू वित्तीय वर्ष की समाप्ति (31 मार्च 1991) के बाद ही प्रभावशील होगा। इसलिए आप चुप रहें। प्रतीक्षा करें। और यदि 31 मार्च 1991 तक वैसा न हो जैसा कि मैं आपको कह रहा हूँ तो 1991 की पहली अप्रेल को आप अलग होने की बात कर दें। आपके भागीदारों को तो कोई आपत्ति होगी ही नहीं।'


पण्डितजी की बात की तार्किकता और व्यवाहारिकता मुझे बिलकुल ठीक लगी। मेरे हितैषी युवक ने पूछा -‘फिर, आगे क्या?’ पण्डितजी ने अविलम्ब उत्तर दिया - 'आप दलाली शुरु कर दें। आपको दलाली से ही आय प्राप्ति के योग हैं।' पण्डितजी की बात सुनते ही मैं ऐसे भड़का जैसे साँड को लाल कपड़ा दिखा दिया हो। पण्डितजी को मेरी पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि भली प्रकार मालूम थी। हँसते हुए बोले -'दलाली केवल तबादले कराने और लोगों के अटके काम कराने में ही नहीं ली जाती। आप तेल, जमीन, लोहा आदि व्यापार की दलाली शुरु कर दें।' मैंने कहा - ‘मुझे तो दलाली शब्द से ही चिढ़ है।’ पण्डितजी बोले - ‘आपकी आप जानो किन्तु आपको आजीविका तो दलाली से ही मिलनी है।’

पण्डितजी की बात सुनकर मैं उद्विग्न हो गया। मुझे लाने वाला मेरा हितैषी युवक असहज हो गया। हम उठने का उपक्रम करने ही वाले थे कि पण्डितजी ने कहा - ‘आपके पास जल्दी ही दलाली का सुन्दर प्रस्ताव आने वाला है। आप गर्मी खाकर, तुनक कर इंकार मत कर दीजिएगा। लक्ष्मी आपका दरवाजा खटखटा रही है।’

अब तक तो मैं खिन्न था। पण्डितजी की बातों ने दुखी कर दिया था। सो दुखी-मन हो लौटा और अपने आप को व्यस्त रखने के जतन करने लगा।

नवम्बर के अन्तिम सप्ताह में नितिन वैद्य नामक एक नौजवान मेरे पास आया (नितिन का उल्लेख मेरी गन्ध के झोंके: मनु और प्रज्ञा और मुम्बई में जावरा का ओटला पोस्टों में आया है)। वह भाजीबीनि में, नया-नया विकास अधिकारी बना था और एजेण्ट तलाश रहा था। मुझसे मेरे भाई साहब का नाम जुड़ा होने से उसे मुझमें ‘अपार सम्भावनाएँ’ दिखीं। मुझे रोमांच हो आया। ‘पण्डितजी’ की बातें मेरे कानों में गूँजने लगीं। मुझे उसी क्षण सूझ पड़ा कि एजेण्ट और एजेन्सी से मिलने वाला कमीशन, बोलचाल की भाषा में ‘दलाल’ और ‘दलाली‘ ही तो है! किन्तु मैंने कोई उत्तर नहीं दिया और पूर्वानुसार ही यह गेंद भी अपने दोनों भागीदारों के पाले में सरका दी। दोनों ने न केवल सहमति दी बल्कि इस काम के लिए, कारखाने से तनिक जल्दी जाने का परामर्श भी अपनी ओर से दे दिया।

मैंने अपनी कुछ विवशताएँ और शर्तें नितिन के सामने रखीं। उसने कहा-‘आप तो केवल हाँ कर दो। बाकी सब मैं देख लूँगा।’

और 30 जनवरी 1991 को मैं विधिवत तथा अधिकृत रुप से भारतीय जीवन बीमा निगम का एजेण्ट हो गया। निर्धारित समय पर नितिन अपनी 'बुलेट' पर आता और हम दोनों, कस्बे में ‘फेरी’ पर निकल पड़ते। मुझे जो ‘रिस्पान्स’ मिला उससे मैं आज तक चकित हूँ। फरवरी 1991 के कमीशन की रकम ने मेरा हौसला इतना बढ़ाया कि मुझे लगा कि मैं अपने भागीदारों को तत्‍काल ही मुक्त कर दूँ। किन्तु पण्डितजी की बातें मुझे अब तो और अधिक याद आने लगी थीं। सो, मैं चुप ही रहा और भागीदारी की तथा बीमा की अपनी जिम्मेदारियाँ अधिकाधिक परिश्रम से निभाने में जुट गया।

1991 का मार्च शुरु हो चुका था। मैं अत्यन्त अधीरतापूर्वक एक-एक दिन गिन रहा था। आधा मार्च निकल गया। पत्ता भी नहीं खड़का। दिन, एक-एक करके बीत रहे थे और मेरी आकुलता और चैकन्नापन बढ़ते ही जा रहे थे। मैं फैक्ट्री में बैठता तो था किन्तु वहाँ होकर भी वहाँ नहीं होता था।

इसी तरह एक-एक दिन होते हुए 25 मार्च आ गया। सब कुछ वैसा का वैसा ही। अन्य तमाम दिनों की तरह। दोपहर तीन बजे की चाय हुई। एक भागीदार अपने ‘उत्पादन विभाग’ में चला गया। अब हम दो भागीदार बचे थे। जैसे-तैसे काम करते हुए चार बजे। साढ़े चार बजते-बजते घर लौटने का उपक्रम शुरु किया ही था कि मानो बिजली कड़की और शून्य को चीरती हुई हमारे कमरे में आ खड़ी हुई। बिना किसी सन्दर्भ-प्रसंग के, मेरा भागीदार अकस्मात् बोला -‘विष्णु! पहली अप्रेल से तुम अपनी व्यवस्था कर लो यार! अब यह गाड़ी नहीं चल पाएगी।’

उस क्षण की मेरी दशा का वर्णन कर पाना मेरे बूते में न तब था न अब है। मेरी जबान सूख कर मानो तालू से चिपक गई। बोल पाना मुश्किल क्या, असम्भवप्रायः हो गया। मेरे मुंह से ‘गों! गों!’ करती घरघराहट सी कुछ हुई। पहले गला भर आया और अगले ही क्षण आँखें झरने लगीं। मेरे भागीदार ने मुझे समझाया। दूसरा भागीदार भी तब तक वहाँ आ गया। पहले वाले ने अपने निर्णय की जानकारी दी, दूसरे ने बिना बोले, सिर हिलाकर सहमति दी। और कुछ ही क्षणों में हम तीनों अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे। बिना बोले। बस! एक दूसरे की ओर कनखियों से देखते हुए।


1991 की 30 मार्च को शनिवार था। याने भागीदार के रूप में, इस कारखाने में मेरा अन्तिम दिन। दोपहर में भोजन करने घर लौटा तो लौटते में, अपनी जेब की क्षमता से अधिक खर्च कर मिठाई ले गया। शेष दिन काम किया और लौटते समय कामगारों, कर्मचारियों और दोनों भागीदारों को मिठाई खिलाकर विदा ली। सबका मन भारी था। मेरा भी। किन्तु मैं 'विस्मित होने के चरम' पर था। शब्दशः वही और वैसा ही हुआ जो और जैसा पण्डितजी ने बताया था।


उसके बाद मैं बीमा एजेन्सी में जुट गया। जिस दिन मैं ने भागीदारी छोड़ी उस दिन विपन्नता की कगार पर था - लगभग, अपने परिवार के पुराने व्यवसाय, भिक्षा वृत्ति की कगार पर। बीमा एजेन्सी ने मेरी विपन्नता दूर की, मैं निर्धनता तक आया, उसके बाद साधनहीनता समाप्त होने लगी, घर में ‘दो पैसे’ आने लगे। जो छुटपुट कर्जा था, उससे मुक्ति मिली। बच्चों की पढ़ाई आसान लगने लगी। दुश्वारियाँ कम होने लगीं, आसानियों में इजाफा होने लगा।

आज मेरा बड़ा बेटा बी.ई., एम.बी.ए. कर हैदराबाद में ठीक-ठीक वेतन पर काम कर रहा है। छोटा बेटा बी. ई. के दूसरे वर्ष में पढ़ रहा है। बड़े बेटे के विवाह की पहली वर्ष गाँठ इस नौ मार्च को हमारा परिवार मनाएगा। माथे पर बाजार का कोई कर्ज नहीं है। आज मैं, 30 प्रतिशत की 'स्लेब' में, सरचार्ज सहित आय कर चुका रहा हूँ। बीमा एजेण्टों में, 'अध्यक्ष क्लब' की प्रतिष्ठादायी सदस्यता प्राप्त किए हूँ। आर्थिक सुविधा ऐसी और इतनी हो गई है कि लोगों से अशिष्टता तथा दम्भपूर्वक बातें कर लेता हूँ।


निस्सन्देह, मेरी जीवन संगिनी का संघर्ष मेरे संघर्ष की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक रहा। उन्होंने अपनी नौकरी की, बच्चे सम्हाले, घर सम्हाला, परिवार के सारे सामाजिक उत्तरदायत्वि निभाने का विकट काम सफलतापूर्वक किया, मेरी ज्यादतियाँ और अशिष्टताएँ सहन कीं, मुझे सम्हाला। यदि वे नहीं होतीं तो जिन-जिन उपलब्धियों की दुदुम्भी मैं बजा रहा हूँ, वे सब अर्थहीन हो जातीं। मेरी जीवन संगिनी ने ही इन सबको सार्थक बनाया। घर को घर और मुझे मनुष्य बनाए रखा।

आज पण्डितजी हमारे परिवार के आदरणीय और पूजनीय सदस्य बने हुए हैं। किन्तु उसके बाद से अब तक उनकी अधिकांश (लगभग 95 प्रतिशत) बातें सच नहीं हुईं जैसी उनकी पहली बात हुई थी। मैं पण्डितजी से यह सब कहता भी हूँ। वे हँसकर कहते हैं - ‘मैं ने तब भी वही कहा था जो मुझे आपकी पत्रिका में नजर आ रहा था। आज भी वही कहता हूँ जो आपकी पत्रिका में नजर आता है। वह सच होता है या नहीं, यह मेरी चिन्ता नहीं है।’

मेरी जिज्ञासा यही है। मैं वही का वही हूँ और मेरी पत्रिका भी वही की वही। इसी पत्रिका को देख कर, पण्डितजी की कही बात शब्दशः (बोलचाल की भाषा में कहूँ तो ‘तारीखवार’) वास्तविकता में बदली। किन्तु अब क्या हो गया है? पण्डितजी का अनुभव और परिपक्वता का ग्राफ 1990 की अपेक्षा बढ़ा ही है। आज उनकी कही बातें सच क्यों नहीं हो रही हैं?

इस संस्मरण से जुड़े सारे पात्र जीवित हैं और चाहने पर उनसे सम्पर्क किया जा सकता है।

मैं न तो पण्डितजी की विद्वत्ता और ज्ञान पर प्रश्न चिह्न लगा रहा हूँ और न ही ‘ज्योतिष’ की विश्वसनीयता पर। पर जो सच है, वह सामने है। उससे उपजी जिज्ञासा ने ही मुझसे यह पोस्ट लिखवाई है।

-----


इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

दावा छूट और पुनर्चलित पालिसियाँ

गत गुरुवार को अपनी पोस्ट बीमा किश्त भुगतान की रियायती अवधि में मैंने कहा था: ''पालिसी लेप्स होने पर उसे चालू कराने के साथ ही ग्राहक को बीमा सुरक्षा फिर से मिलने लगती है। किन्तु लेप्स पालिसी चालू करा लेने के बाद भी, (पालिसी के लेप्स होने के कारण उपजा खतरा और उससे होने वाली हानि के कारण) ग्राहक ने अपना कितना बड़ा नुकसान कर लिया है, यह ग्राहक को मालूम नहीं हो पाता।''

इस बात को समझने के लिए पहले दावा छूट (क्लेम कन्सेशन) को समझ लेना उचित होगा।


रियायती अवधि में किश्त जमा नहीं कराने पर पालिसीधारक को जोखिम सुरक्षा (रिस्क कवरेज) उपलब्ध नहीं होता और ऐसी दशा में यदि पालिसीधारक की मृत्यु हो जाए तो उस पालिसी पर मृत्यु दावा राशि का भुगतान नहीं मिलता।


किन्तु प्रत्येक बार ऐसा नहीं होता। निर्धारित अवधि पूरी हो जाने के बाद, यदि रियायती अवधि में किश्त जमा नहीं हो और पालिसीधारक की मृत्यु हो जाए तो भी नामित (नामिनी) को दावा राशि का भुगतान किए जाने के प्रावधान हैं।


ऐसे प्रावधानो को ‘दावा छूट’ (क्लेम कन्सेशन) कहा गया है। यह छूट मुख्यतः दो प्रकार की है - आधारभूत दावा छूट (बेसिक क्लेम कन्सेशन) तथा विस्तारित दावा छूट (एक्सटेण्डेट क्लेम कन्सेशन) । इनके ब्यौरे निम्नानुसार हैं-


आधारभूत दावा छूट (बेसिक क्लेम कन्सेशन) - यदि पालिसी की तीन वर्षों की किश्तें जमा कराई जा चुकी हों और पालिसीधारक की मृत्यु, रियायती अवधि के बाद किन्तु 6 महीनों की अवधि के भीतर हुई हो तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा (मृत्यु दिनांक तक की पालिसी अवधि के) बोनस की रकम का भुगतान देय होगा।


इस भुगतान में से अन्तिम बकाया किश्त की रकम काट ली जाएगी।


उदाहरण - पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर 2005 है। इस पालिसी की, दिसम्बर 2007 तक की किश्तें जमा कराई जा चुकी हैं किन्तु दिसम्बर 2008 वाली किश्त का भुगतान नहीं हुआ है। इस पालिसीधारक की मृत्यु यदि दिनांक 27 जून 2009 को या उससे पहले हो गई है तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा दिसम्बर 2005 से दिसम्बर 2008 तक की अवधि के बोनस की रकम का भुगतान किया जाएगा।

यदि पालिसी शर्तों में ‘दुर्घटना हित लाभ’ उपलब्ध कराया गया है और मृत्यु दुर्घटना से हुई है तो बीमा धन के बराबर रकम का भगतान अतिरिक्त रूप से किया जाएगा।

भुगतान की जाने वाली राशि में से दिसम्बर 2008 वाली किश्त की रकम काट ली जाएगी।

विस्तारित दावा छूट (एक्सटेण्डेट क्लेम कन्सेशन) - यदि पालिसी की पाँच वर्षों की किश्तें जमा कराई जा चुकी हों और पालिसीधारक की मृत्यु, प्रथम बकाया किश्त की देय दिनांक के 12 महीनो की अवधि के भीतर हुई हो तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा (मृत्यु दिनांक तक की पालिसी अवधि के) बोनस की रकम का भुगतान देय होगा।

इस भुगतान में से अन्तिम बकाया किश्त की रकम काट ली जाएगी।

उदाहरण - पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर 2002 है। इस पालिसी की, दिसम्बर 2006 तक की किश्तें जमा कराई जा चुकी हैं किन्तु दिसम्बर 2007 वाली किश्त का भुगतान नहीं हुआ है। इस पालिसीधारक की मृत्यु यदि दिनांक 27 दिसम्बर 2008 को या उससे पहले हो गई है तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा दिसम्बर 2002 से दिसम्बर 2008 तक की अवधि के बोनस की रकम का भुगतान किया जाएगा।

यदि पालिसी शर्तों में ‘दुर्घटना हित लाभ’ उपलब्ध कराया गया है और मृत्यु दुर्घटना से हुई है तो बीमा धन के बराबर रकम का भगतान अतिरिक्त रूप से किया जाएगा।

भुगतान की जाने वाली राशि में से दिसम्बर 2007 वाली किश्त की रकम काट ली जाएगी।

किन्तु, अपने पालिसीधारकों तथा उनके परिवारों की चिन्ता करते हुए ‘निगम’ ने ‘चेयरमेन रिलेक्सेशन रूल्स 1987’ के अधीन अतिरिक्त रूप से दावा छूट (क्लेम कन्सेशन) सुविधा और उपलब्ध कराई है। यह सुविधा केवल उन्हीं पालिसियों पर उपलब्ध कराई गई है जिनकी, दो वर्षों की किश्त जमा कराई जा चुकी हों।

इस छूट का विवरण इस प्रकार है -
(1) दो वर्षों की किश्तें जमा कराई जा चुकी हैं किन्तु अगली देय किश्त की रकम रियायती अवधि में जमा नहीं कराई जा सकी।


ऐसे पालिसीधारक की मृत्यु यदि उपरोक्त किश्त के देय दिनांक से 3 माह की अवधि में हुई तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा पालिसीधारक की मृत्यु दिनांक तक की पालिसी अवधि के बोनस की रकम का भुगतान मिलेगा।
उदाहरण - पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 नवम्बर 2006 है। इसकी, नवम्बर 2007 वाली किश्त जमा कराई जा चुकी है किन्तु नवम्बर 2008 वाली किश्त जमा नहीं की गई है। इस पालिसीधारक की मृत्यु यदि 27 फरवरी 2009 को या उससे पहले होने की दशा में नामित को पूर्ण बीमा धन तथा नवम्बर 2006 से नवम्बर 2008 तक की अवधि का बोनस भुगतान किया जाएगा।इस भुगतान में से नवम्बर 2008 वाली किश्त की रकम काट ली जाएगी।


(2) उपरोक्त उदाहरण में, यदि पालिसीधारक की मृत्यु, देय दिनांक से 3 माह (27 फरवरी 2009) के बाद किन्तु 6 माह पूर्ण होने से पहले (27 मई 2009 तक)हो जाती है तो नामित को बीमा धन की आधी रकम का भुगतान किया जाएगा। इस स्थिति में बोनस राशि का भुगतान नहीं किया जाएगा। और
भुगतान की जाने वाली राशि में से नवम्बर 2008 वाली किश्त की रकम काट ली जाएगी।

(3) उपरोक्त उदाहरण में यदि पालिसीधारक की मृत्यु देय दिनांक से 6 माह (27 मई 2009) के बाद किन्तु 12 माह (28 नवम्बर 2009) से पहले हो जाती है तो नामित को ‘आनुपातिक प्रदत्त मूल्य’ राशि का भुगतान किया जाएगा।इस स्थिति में भी बोनस राशि का भुगतान नहीं किया जाएगा और बकाया किश्त की रकम काट ली जाएगी।
उदाहरणार्थ - पालिसी एक लाख रुपये बीमा धन और 20 वर्ष अवधि की है। इसकी कुल दो किश्तें जमा हुई हैं और तीसरी किश्त के देय दिनांक से एक वर्ष पूर्ण होने से पहले ही पालिसीधारक की मृत्यु हुई। अर्थात् पालिसीधारक ने कुल जमा की जाने वाली किश्तों (20) की 1/10 किश्तें (कुल 2) किश्तें ही जमा कराई हैं, इसलिए यहाँ पालिसी के बीमाधन का 1/10 बीमा धन ही भुगतान किया जाएगा।


विशेष: ‘चेयरमेन’ द्वारा उपलब्ध कराई गई इस छूट के अन्तर्गत ‘दुर्घटना हित लाभ’ की रकम का भुगतान नहीं किया जाएगा भले ही पालिसीधारक की मृत्यु, दुर्घटना से हुई हो और भले ही पालिसी शर्तों के अन्तर्गत ‘दुर्घटना हित लाभ’ उपलब्ध क्यों न कराया गया हो।


उपरोक्त वर्णित दावा छूट, ‘निगम’ की निम्नांकित तालिकाओं वाली पालिसियों में किसी भी दशा में नहीं दी जाती हैं -तालिका 21, 58, 94, 111, 150, 153, 164, 177 तथा 190.
उपरोक्त के अतिरिक्त ‘निगम’ की पेंशन योजनाओं में भी किसी भी प्रकार की दावा छूट उपलब्ध नहीं है।

किन्तु गत पोस्ट का अन्त और इस पोस्ट का प्रारम्भ मैंने जिस बात से किया उसका इन ‘दावा छूटों’ से क्या लेना-देना?

है। लेना-देना है और अत्यन्त गम्भीरता से है।

कालातीत (लेप्स) पालिसी के पुनर्चलन को मूल पालिसी का ‘फिर से’ चालू होना माना जाता है। ऐसा करते समय पालिसी के प्रारम्भ दिनांक और पालिसी की बोनस अर्जन पात्रता पर तो कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता किन्तु ऐसी पालिसियों में ‘जोखिम सुरक्षा दिनांक’ स्वतः ही बदल जाता है। ऐसी पालिसियों में, पालिसी को फिर से चालू करने के दिनांक को ‘जोखिम सुरक्षा प्रारम्भ दिनांक’ माना जाता है और तदनुसार ही, उपरोक्त समस्त दावा छूटों का लाभ मिल पाता है।इसे इस तरह समझें - पालिसी प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर 2001 है। पालिसी की दिसम्बर 2006 तक की किश्तें जमा की जा चुकी हैं अर्थात् पहली चुकाई जाने वाली बकाया किश्त इस प्रकरण में दिसम्बर 2007 है।

इस पालिसी पर, उपरोल्लेखित ‘विस्तारित दावा छूट’, 27 दिसम्बर 2008 तक उपलब्ध थी। 28 दिसम्बर 2008 से यह पालिसी उक्त छूट की दावेदार भी नहीं रही।

दिनांक 20 जनवरी 2009 को यह पालिसी चालू कराई गई। अब, इस दशा में इस पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर 2001 ही रहेगा और बोनस की गणना भी इसी दिनांक से की जाएगी किन्तु ‘दावा छूट’ की गणना 20 जनवरी 2009 से की जाएगी। अर्थात् पूरे 8 वर्ष चल चुकने के बाद भी, जोखिम सुरक्षा (रिस्क कवरेज) के सन्दर्भ में यह पालिसी, 20 जनवरी 2009 से प्रारम्भ मानी जाएगी।


मेरी बात की गम्‍भीरता अब स्‍पष्‍ट हो गई होगी।


इसलिए ग्राहक की बेहतरी इसी में है कि अपनी पालिसी की प्रीमीयम किश्तें रियायती अवधि में ही भरे और किसी भी हालत में अपनी पालिसी कोे लेप्स न होने दे।

ऐसी ही कुछ छोटी-छोटी बातें फिर कभी।

एक बार फिर याद रखने का उपकार कीजिएगा कि ये सूचनाएँ मैं व्यक्तिगत स्तर पर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इन्हें भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा प्रस्तुत जानकारियाँ न समझें।
-----


इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

इन्दौर के सिन्धी समुदाय को सलाम

सिन्धी समुदाय ने एक बार फिर मुझे अपना ‘मुरीद’ बना लिया है। ‘एक बार फिर’ से ही स्पष्ट है कि मैं पहले से ही इस समुदाय का ‘मुरीद’ बना हुआ हूँ-कम से कम दो बातों के लिए।

पहली - इस समुदाय का पुरुषार्थ। विभाजन से विस्थापित इस समुदाय ने जीवन संघर्ष की जो जिजीविषा बरती, वह सदैव मुझे रोमांचित करती रही है। दूसरी - इस समुदाय के लोगों का शुध्द हिन्दी उच्चारण। अधिसंख्य हिन्दी फिल्मों में कोई न कोई ‘सिन्धी चरित्र’ हमारे सामने परोसा जाता रहा है और उस चरित्र का उच्चारण ‘हास्य’ पैदा करने का निमित्त बनाया जाता है। ऐसे प्रत्येक चरित्र ने, प्रत्येक फिल्म में, प्रत्येक बार मुझे अपनी ही नजरों में शर्मिन्दा किया है। जिस ‘सिन्धी उच्चारण’ को हम उपहास का विषय बनाते हैं, वही उच्चारण ‘हिन्दी का शुध्द उच्चारण’ है, हममें से कितने लोग इस बात को जानते हैं?

हिन्दी की अहमन्यता से ग्रस्त हम हिन्दी भाषी, हिन्दी के अशुध्द उच्चारण के स्थायी अपराधी हैं, इस ओर हमने कभी ध्यान दिया? हम हिन्दी की दुहाइयाँ देते हैं, उसके ध्वज वाहक बनते हैं और उसकी दुर्दशा पर दुख व्यक्त करते हैं। किन्तु हमारा दोगलापन यही है कि जो सिन्धी समुदाय हिन्दी का शुध्द उच्चारण करता है, उसे उपहास भाव से देखते हैं! अपने अपराध को छिपाने का यह अनूठा उपाय हमने स्थायी रूप से अपना रखा है।

‘रामलाल’ को हम हिन्दी भाषी कभी ‘रामलाल’ नहीं बोलते। हम सदैव ही ‘राम्लाल्’ उच्चारित करते हैं। इसके सर्वथा विपरीत, समूचा सिन्धी समुदाय ‘रा म ला ल’ उच्चारित करता है। प्रत्येक अक्षर पर किया गया उनका ‘शब्दाघात’ हमारे लिए हास्य का विषय होता है। मेरा आश्चर्य तो यह कि अपनी इस विशेषता से खुद सिन्धी समुदाय के लोग परिचित नहीं हैंै। अपने सिन्धी मित्रों को जब मैं यह विशेषता बताता हूँ तो वे मुझे आश्चर्य से देखते हैं। सो, सिन्धी समुदाय की इस विशेषता का मुरीद मैं पहले ही दिन से बना हुआ हूँ।

इसी समुदाय ने अभी-अभी, एक बार फिर मुझे अपना मुरीद बनाया है। कल के सान्ध्य अखबारों ने सूचना दी कि इन्दौर के सिन्धी समुदाय की समस्त पंचायतों ने निर्णय लिया है कि राजनीतिक व्यक्तियों को समाज की संस्थाओं का पदाधिकारी नहीं बनाया जाएगा। अर्थात् विभिन्न दलों में ‘दिग्गज‘ की हैसियत प्राप्त सिन्धी सज्जन अब न तो समाज के निर्णयों को प्रभावित कर पाएँगे और न ही सिन्धी समुदाय के आयोजनों/कार्यक्रमों में, मंचों पर नजर आएँगे। वे अब मंचों के सामने बिछी जाजम/कुर्सियों पर बैठे नजर आएँगे।


मेरे तईं यह ‘क्रान्तिकारी निर्णय’ है। राजनीति को उसकी औकात बताने की दिशा में इन्दौर के सिन्धी समुदाय ने यह ऐसा कदम उठाया है जो सारे देश को न केवल प्रेरित करेगा अपितु ‘राजनीति और राजनेताओं से उपजे त्रास’ से मुक्ति दिलाने की कामना कर रहे लोगों को हौसला भी देगा।


राजनीति को हमने वह सर्वोच्च प्राथमिकता और महत्ता दे दी कि वह आज सबसे बड़ा प्रदूषण बन कर, ‘अमरबेल’ की तरह छा गई है। अपने ही बनाए नेताओं को हम ही इतनी स्वच्छन्दता दे देते हैं कि वे उच्छृंखल बन कर कब हमारे नासूर बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता। इसका एक ही उपाय होता है - अपने नेताओं को नियन्त्रित करना, उन पर अंकुश लगाना।

इन्दौर के सिन्धी समुदाय का यह निर्णय मुझे इसी दिशा में बढ़ाया कदम अनुभव हो रहा है। नेता को जन सामान्य की तरह, भीड़ का हिस्सा बनना कभी पसन्द नहीं होता। आम आदमी की दुहाई दे कर वह सदैव ही प्रमुखता प्राप्त करना चाहता है। सो, इन्दौर के सिन्धी समुदाय के इस निर्णय के बाद, ‘नेता’ को आम आदमी की तरह शरीक होना पड़ेगा जिसके लिए ‘वह’ शायद ही तैयार हो। इस ‘जलालत’ से बचने का एक ही रास्ता रहता है - ऐसे आयोजन/कार्यक्रम में जाओ ही मत। याने, अब ‘नेता’ अनुपस्थित रहेगा। नेता की अनुपस्थिति कितनी सुविधाएँ, कितनी अनुकूलताएँ प्रदान करती है, यह हम सब जानते हैं।


सो, मैं तो इन्दौर के सिन्धी समुदाय को प्रणाम करता हूँ। राजनीति को परे धकेल कर उसे उसकी औकात बताना आज का सबसे बड़ा और सर्वाधिक दुरुह ‘पुरुषार्थ‘ बन गया है।

इन्दौर के सिन्धी समुदाय ने इस पुरुषार्थ का प्रारम्भ कर दिया है।

-----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

चिट्ठाकारों! मुझे रास्ता दिखाओ

कल पूरे दिन और कोई आधी रात भर से मैं असमंजस में हूँ। ‘चिट्ठा‘ और ‘चिट्ठाकारी’ को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अखबार और पत्रकारिता के समान ही, अभिव्यक्ति का सार्वजनिक माध्यम मानकर, उस पर प्रकाशित सामग्री को अवमानना की परिधि में लेने के समाचार कुछ चिट्ठों पर पढ़े और प्रायः सब पर टिप्पणी भी दी।

किन्तु मन-मस्तिष्क का द्वन्द्व अभी भी असमाप्त है। व्यवहार में चिट्ठा अवश्य नितान्त व्यक्तिगत-अभिव्यक्ति है किन्तु अब ‘चिट्ठा-विश्व’ का निरन्तर होता जा रहा विस्तार इसकी ‘व्यक्तिगतता’ को ‘सार्वजनिक‘ में बदल रहा है, यह भी सत्य है। मई 2007 में मैं ने जब इस विश्व में पाँव रखा तो चिट्ठों की संख्या 2000 भी नहीं थी। आज यह संख्या चार गुना बढ़कर तेजी से पाँच गुना होने को अग्रसर है। मैथिलीजी तय नहीं कर पा रहे हैं कि इस दशा पर प्रसन्न हुआ जाए या सतर्क क्यों कि चिट्ठा-संख्या के इस तीव्र गति वाले विस्तार के कारण एग्रीगेटर पर चिट्ठों और टिप्पणियों का ‘गोचर जीवन काल’ कम से कमतर होता जाएगा।

मैं ‘लेखक’ कभी नहीं रहा और अब तक बन भी नहीं पाया। किन्तु वर्तमान पर टिप्पणी करने का ‘व्यसन’ मेरे लेखक होने का भ्रम बनाता लगता है। एक टिप्पणीकार के रूप में भी मैं पहले ही क्षण से इस बात का पक्षधर हूँ कि जो भी लिखा जाए, जिस भी स्थिति में लिखा जाए, उसमें ‘उत्तरदायित्व भाव’ अवश्य हो। मेरे लिए तो ‘स्वान्तः सुखाय लेखन’ भी अन्ततः ‘सामामजिक सरोकार‘ लिए होता है। सो, जहाँ ‘उत्तरदायित्व भाव’ नहीं, वहाँ न तो प्राण हैं और न ही विश्वसनीयता। ऐसा प्रत्येक ‘लेखन’ (वह ‘सृजन‘ हो अथवा ‘टिप्पणी’) मुझे ‘अवैध सन्तान’ ही लगता है।

सो, सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय मुझे तनिक भी अस्वाभाविक/असहज नहीं लगा। चिट्ठों पर आई टिप्पणियों को भी चिट्ठाकार का उत्तरदायित्व मानना मुझे आपत्तिजनक नहीं लगता। यदि चिट्ठे को ‘अखबार’ माना जाए तो उस पर आई टिप्पणी स्वतः ही ‘सम्पादक के नाम पत्र’ की हैसियत प्राप्त कर लेती है। तब यह, प्रकाशन के पहले ही क्षण से चिट्ठाकार का उत्तरदायित्व तो बनती ही है।मेरा द्वन्द्व इसी बात को लेकर है। मैं अभिव्यक्ति पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध अस्वीकार करता रहा हूँ। आपातकाल में आरोपित की गई सेंसरशिप का विरोध करने के कारण मुझे तब आकाशवाणी का सम्वाददाता बनाने से इंकार कर दिया गया था। किन्तु अपने उस निर्णय का मुझे न तब दुख था न अब है।

इसी मानसिकता के अधीन, चिट्ठों पर ‘वर्ड वेरीफिकेशन’ और ‘कमेण्ट माडरेशन’ के प्रावधान मुझे नहीं सुहाते। मेरे गुरु रविजी ने एक बार, धीमे से मुझे परामर्श दिया था - कमेण्ट माडरेशन की व्यवस्था अपने ब्लाग पर लागू करने का। निस्सन्देह उन्हें आगत की आहट सुनाई दे रही होगी और वे मेरी चिन्ता ही कर रहे होंगे। किन्तु उन्होंने जितना लिहाज बरतते हुए मुझे परामर्श दिया था, उससे अधिक विनम्र-दृढ़ता बरतते हुए मैं ने इंकार कर दिया था।
किन्तु कल से मैं द्वन्द्व में हूँ। क्या करूँ? मेरे लिखे का उत्तरदायित्व तो असंदिग्ध रूप से मेरा ही है। किन्तु टिप्पणियों का उत्तरदायित्व? मैं तो उसके लिए भी तत्पर हो सकता हूँ किन्तु मुझे यह तो मालूम हो कि टिप्पणीकार कौन है! इस जगत् में ‘एनानिमसों’ की संख्या ‘कुकुरमुत्तों’ की तरह बढ़ती जा रही है। स्थिति यह हो गई है कि एक ही विषय पर एक ‘एनानीमसजी‘ सहमति जताते हैं तो उसी टिप्पणी के ठीक नीचे दूसरे ‘एनानीमसजी’ असहमति अंकित कर रहे होते हैं। यह तय कर पाना कठिन हो जाता है कि ये दो अलगःअलग आत्माएँ हैं या एक ही व्यक्ति सुविधा के दुरुपयोग का खेल, खेल रहा है!

तो मैं क्या करूँ? जो मुझे सपने में भी स्वीकार नहीं, वही कमेण्ट माडरेशन की व्यवस्था अपने चिट्ठे पर लागू कर लूँ? या फिर चिट्ठा जगत को ही नमस्कार कर लूँ? दोनों ही स्थितियाँ मेरे लिए तो प्राणलेवा है।

या फिर, अपने चिट्ठे पर ‘न्यायिक क्षेत्राधिकार’ की घोषणा स्थायी रूप से अंकित कर दूँ? ताकि, यदि कोई मुझ पर कानूनी कार्रवाई करे तो मैं देश की विभिन्न अदालतों में उपस्थिति देने के लिए किए जाने वाले ‘आशंकित विवश देशाटन’ से बच सकूँ।

क्या यह द्वन्द्व मुझे अकेले का है?
-----


इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

‘स्माइल पिंकी’ की जय हो

‘स्माइल पिंकी’ और उससे जुड़े तमाम लोगों को सलाम। इस तथ्य के बाद भी कि ‘स्लमडाग’ को श्रेष्ठ फिल्म का ‘आस्कर’ पुरुस्कार मिल चुका है।

मैं उन ‘अल्पसंख्यकों’ में शामिल हूँ जिन्हें ‘आस्कर’ का नाम न तो आतंकित करता, न ही प्रभावित। आकर्षित तो बिलकुल ही नहीं करता। भारतीय फिल्मों और फिल्मकारों के अपने मानक और अपने लक्ष्य हैं और कहना न होगा कि कई भारतीय फिल्में उन पूरी तरह खरी उतरी हैं। किन्तु ‘घर का जोगी जोगड़ा’ वाली मानसिकता से कोई नहीं उबर सकता। यह मानव मनोविज्ञान की एक ग्रन्थि है। हर कोई ‘घर से बाहर’ अपनी पहचान बनाना चाहता है। सो, भारतीय फिल्मकारो के लिए ‘आस्कर’ यदि ‘जीवन की अन्तिम अभिप्सा’ हो तो यह सहज और स्वाभाविक ही है। यह ललक गए कुछ वर्षों से ‘सनक’ की सीमा को भी छू गई। इस बार यह अपने चरम पर रही।

इस ‘सनक’ का चरम पर जाना ही मुझे आस्कर समारोह के प्रति उत्सुक बना बैठा। सेवेर से ही ‘बुध्दू बक्सा’ खोल लिया था। नौ बजते-बजते, ‘स्लमडाग’ को दो श्रेणियों में ‘आस्कर’ मिल चुका था तभी बिजली चली गई। दस बजे लौटी तो ‘स्लमडाग’ को सात ‘आस्कर’ मिलने का उत्सव पर्दे पर छाया हुआ था।

किन्तु मेरी उत्सुकता ‘स्माइल पिंकी’ को लेकर थी। ‘स्लमडाग’ के कोलाहल में उद्घोषक ने (खानापूर्ति की शैली में) सूचित किया कि अपने वर्ग में ‘स्माइल पिंकी’ ने ‘आस्कर’ प्राप्त कर लिया है। ‘स्लमडाग’ के (इस टिप्पणी के लिखे जाते समय तक) आठ ‘आस्कर’ पर ‘स्माइल पिंकी’ का एक ‘आस्कर’ मुझे भारी ही नहीं, भारी-भरकम अनुभव हो रहा है। मैं, ‘नक्कारखाने में अनसुनी हो रही तूती’ की आवाज में अपनी आवाज, परम् प्रसन्नता से मिला रहा हूँ।

‘स्लमडाग’ और ‘स्माइल पिंकी’ में मूलभूत अन्तर है। ‘स्लमडाग’ पूरी तरह से विदेशी उपक्रम है जिसमें कुछ भारतीयों को भी काम दिया गया। इन सब भारतीयों ने साबित कर दिया कि अपने काम में वे सब के सब निष्णात् हैं। उनकी इस महारत को तो हम सब पहले से ही सलाम कर रहे हैं। हम चाह रहे थे कि उनकी इस महारत को शेष विश्व भी स्वीकार करते हुए सम्मानित करे। इस वर्ष के ‘आस्कर’ पुरुस्कारों में हम भारतीयों की यह साध पूरी हो गई।

किन्तु प्रसन्नता के इस आवेग में मैं यह भूल नहीं पा रहा हूँ कि ‘स्लमडाग’ भारतीय फिल्म नहीं है। यह पूरी तरह से ऐसी विदेशी फिल्म है जो भारतीय समाज की एक बड़ी समस्या पर केन्द्रित है। मैं यह भी नहीं भूल पा रहा हूँ कि यह पूर्णतः व्यावसायिक फिल्म है जिसमें फिल्म निर्माण से जुड़े प्रत्येक पक्ष के लिए साधनों-सुविधाओं का अम्बार सहजता से उपलब्ध था। इसके लिए आवश्य ‘श्रेष्ठ मस्तिष्क’ अपनी मुँह माँगी कीमत वसूल कर, अपनी सेवाएँ दे रहे थे। जिस समस्या को लेकर फिल्म बनाई गई, उस समस्या का समाधान नहीं अपितु उसकी ‘मार्केटिंग’ कर भरपूर लाभार्जन इसका लक्ष्य था। वहाँ भारत की गरीबी को ‘ग्लेमराइज’ कर वाहवाही और रोकड़ा लूटना मकसद रहा।

और ‘स्माइल पिंकी’? ग्लेमर की चकाचौंध में यह छोटी सी डाक्यूमेण्टरी, अत्यन्त सीमित साधानों-सुविधाओं में बनी, शत-प्रतिशत भारतीय प्रयास है। इसकी अवधारणा, निर्माता, फिल्म के समस्त पक्षों से जुड़े समस्त लोग भारतीय हैं। इसका सम्पूर्ण फिल्मांकन भी भारत में ही हुआ है। इसमें न तो ग्लेमर है न ही व्यवसाय। मार्केटिंग की कल्पना तो इसे कहीं छू भी नहीं पाई। इसकी कथा और लक्ष्य ‘वैश्विक मानवता’ है। इसकी केन्द्रीय पात्र अवश्य भारतीय है किन्तु ऐसे बच्चे दुनिया के किसी भी हिस्से में पाए जा सकते हैं। ‘स्माइल पिंकी’ वस्तुतः दुनिया के ऐसे सारे बच्चों की चिन्ता करती है।

‘स्लमडाग’ जहाँ ‘वाणिज्यिक सोच’ के अधीन बनी है वहीं ‘स्माइल पिंकी’ ‘सेवा भावना’ के अधीन।

एक बात और। व्यावसायिक फिल्मों के लिए एकाधिक श्रेणियाँ निर्धारित की जाती हैं जबकि जिस श्रेणी में ‘स्माइल पिंकी’ पुरुस्कृत हुई वह श्रेणी अपने आप में इकलौती है। इस पैमाने पर ‘स्माइल पिंकी’ ने ‘अपनी श्रेणी में शत प्रतिशत’ पुरुस्कार प्राप्त किए हैं जबकि ‘स्लमडाग’ ने ‘अधिकांश पुरुस्कार’ प्राप्त किए हैं।

सो, ‘स्लमडाग’ को मिली सफलता, मेरी दृष्टि में ‘विदेशी उपक्रम के माध्यम से कुछ भारतीयों की उपलब्धि’ है जबकि ‘स्माइल पिंकी’ को मिली सफलता ‘भारत और भारतीयता की उपलब्धि’ है। दोनों में बहुत ही बारीक अन्तर है किन्तु यही अन्तर ‘स्माइल पिंकी’ को ‘स्लमडाग’ के मुकाबले हिमालयी ऊँचाई दिला रहा है।

मैं निस्सन्देह ‘स्लमडाग’ के उत्सव में शामिल हूँ किन्तु मन में तो ‘स्माइल पिंकी’ ही बसी हुई है। मैं जानता हूँ कि ‘मार्केटिंग की मारी और टीआरपी के लिए जी रही’ चैनलों के लिए ‘स्माइल पिंकी’ की बात करना मूर्खतापूर्ण और घाटे का सौदा है। इसके नाम पर विज्ञापन नहीं मिल सकते। इसलिए ‘स्लमडाग’ के मुकाबले इसे उपेक्षित ही रहना है। यह भी ‘घर का जोगी जोगड़ा’ वाली उक्ति की श्रेष्ठ मिसाल बना दी जाएगी। किन्तु सच तो यही है कि यदि किसी भारतीय प्रयास ने आस्कर जीता है तो वह केवल और केवल ‘स्माइल पिंकी’ ही है।

बुध्दू बक्से पर कहा जा रहा है कि अभी दो श्रेणियों के ‘आस्कर‘ और घोषित होना शेष हैं। मुमकिन है कि वे दोनों ही ‘स्लमडाग’ को मिल जाएँ फिर भी वह ‘स्माइल पिंकी’ के सामने पानी भरती ही नजर आएगी।

‘स्माइल पिंकी’ को और उससे जुड़े तमाम लोगों को फिर से सलाम।

-----


इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

विवश कर दिया भुवनेश ने

गई रात काम-काज निपटाते-निपटाते कुछ अधिक ही देर हो गई। सवेरे तीन बजे बिस्तर पर जा पाया। तय किया था कि आज ब्लाग पर कुछ भी नहीं लिखूँगा। किन्तु भुवनेश ने ‘निश्चय भंग’ कर दिया।

कोई तीस-पैंतीस वर्षों से भुवनेश से सम्पर्क है। पता ही नहीं चला कि ‘दशोत्तरजी’ का रूपान्तरण कब और कैसे ‘भुवनेश’ में हो गया! जतन करने पर भी याद नहीं आ रहा। अब हम पारिवारिक स्तर पर जुड़े हुए हैं। मानसिक तादात्म्य उससे तनिक अधिक है। महीनों न मिलने पर भी कोई असुविधा और शिकायत नहीं होती।


भुवनेश रेल्वे में ‘चीफ ट्रेन गुड्स क्लर्क’के पद पर कार्यरत था। अभी-अभी, दिसम्बर 2008 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली है। दो बेटियों और एक बेटे का प्रेमल और जिम्मेदार पिता। तीनों बच्चे कामकाजी हैं। बड़ी बेटी का विवाह अभी-अभी किया है।


भुवनेश की पत्नी, हम सबकी सुषमा भाभी, कन्धे से कन्धा मिला कर भुवनेश का साथ निभाने वाली जुझारु और कर्मठ महिला। अपनी वृध्द सास और ‘चारों बच्चों’ की देखभाल बिलकुल ऐसे करती हैं जैसे कोटर में बैठे अपने बच्चों की देखभाल कोई कबूतरी करती है। परिवार का मुखिया निस्सन्देह भुवनेश ही है किन्तु घर तो सुषमा भाभी का है।


बीमा एजेण्ट होने के कारण मुझे असंख्य परिवारों में जाना पड़ता है। सो, अधिकारपूर्वक कहने की स्थिति में हूँ कि भुवनेश का परिवार सचमुच में ‘सबसे न्यारा’ ही है। ऐसा कम ही होता है कि परिवार के सारे सदस्यों की रुचि समान हो। जिसे यह अनूठापन देखना हो, वह भुवनेश-सुषमा का यह परिवार देख ले। पूरा परिवार अभिरुचि सम्पन्न है और इस अभिरुचि में भी ‘कला फिल्में’ (या कि समान्तर फिल्में) सबको समान रुप से पसन्द हैं। मधुबाला और मीनाकुमारी के ‘वाल साइज’ वाले ‘ब्लेक एण्ड व्हाइट पोस्टर’ मैंने पहली बार (और अब तक अन्तिम बार भी) मैंने भुवनेश के घर में ही देखे थे। सामाजिक और जातिगत स्तर पर मिलने-जुलने वाले और औपचारिक व्यवहार रखने वालों के बीच यह ‘दशोत्तर परिवार’ कभी ‘विचित्र किन्तु सत्य’ तो कभी ‘समझ में नहीं आता’ जैसे मुहावरों से उल्लेखित किया जाता है। रेल्वे-मित्रों के बीच भुवनेश को ‘पिछड़ा’ कहा और माना जाता रहा। 33 वर्षों की अपनी नौकरी में उसने ‘सूखी तनख्वाह’ से आगे बढ़ कर कभी सोचा ही नहीं। इस मायने में तो वह सचमुच में ‘पिछड़ा’ ही है। वर्ना, अच्छी-भली ‘सैल्स टैक्स इन्सपेक्टरी’ छोड़ कर रेल्वे की बाबूगिरी करना क्यों पसन्द करता?


अपनी अभिरुचि के अधीन ही भुवनेश को कलम ने आकर्षित किया। वह नियमित लेखक नहीं है। कभी-कभार ‘कुछ’ लिख लेता है। ‘प्रेम’ में भुवनेश का अगाध विश्वास है। कोई उससे प्रेम करे-न-करे, वह सबसे प्रेम करता है। इसी के चलते, ‘वेलेण्टाइन डे’ पर निकलने वाले अखबारी परिशिष्टों वे, जेब से रोकड़ा खर्च कर, ‘प्रेम सन्देश’ प्रकाशित करवाता है। इसमें उल्लेखनीय बात यह कि सुषमा भाभी भी इस ‘प्रेम प्रकटीकरण’ में ‘रोकड़ा से रोकड़ा मिलाकर’ भुवनेश का साथ देती हैं।


इसी भुवनेश ने आज, पोस्ट न लिखने का मेरा निश्चय भंग कर दिया। श्रीमतीजी की भाभी की शल्यक्रिया हुई है। उनकी मिजाजपुर्सी के लिए वे इन्दौर गई हुई हैं। सो, उठ कर (यह उठना दस बजे हो पाया), नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, चाय बनाई और फैली टाँगो पर अखबार बिछा लिया। पढ़ते-देखते, ‘नईदुनिया’ के रविवारीय परिशिष्ट का अन्तिम पन्ना सामने आया तो अन्तिम कालम में ‘राइट टाप’ पर, ‘फोर कलर’ में छपी भुवनेश की कविता नजर आई। मेरे लिए यह भुवनेश की पहली कविता थी। सो ‘लपक’ कर पढ़ना शुरु किया और एक साँस में पढ गया। एक बार पढ़ी। दूसरी बार पढ़ी। फिर पढ़ी। ‘इतनी बार’ पढ़ने का कारण केवल उसका ‘अच्छा लगना’ नहीं था। एक कारण और था। यह कविता ‘प्रेम’ पर नहीं थी। अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति अपने बच्चों के माध्यम से पूरे करने वाल ‘आप-हम जैसे अतिरेकी पालकों से त्रस्त स्कूली बच्चों’ पर थी यह कविता। इस कविता ने मुझे चैंकाया ही।


और कुछ कहूँ इससे अच्छा तो यही होगा कि आप खुद ‘गुमशुदा बचपन’ शीर्षक से प्रकाशित वह कविता पढ़ लें और मेरे चैंकने का कारण जान लें -


बचपन

हम बड़ों की भीड़ मे गुमशुदा है

हमने उसे बना लिया है

अपनी लालसाओं का शिकार।

उसके नन्हें कन्धों पर लाद दिए हैं

भारी भरकम बस्ते

प्रतिशतों से भयभीत मासूम

हाँफ रहा है

कोचिंग कक्षाओं के बीच।

बचपन को खड़ा कर दिया है हमने

दिखावटी मंच पर

उसके मुँह में डाल दिए हैं अपने

भद्दे चुटकुले।

उसके पास खड़ी कर दी हैं

छोटे वस्त्रों में इतराती

धरती की अप्सराएँ

वह नाच रहा है रुमानी गीतों

और

आयटम डांस की जहरीली थिरकन पर।

तालियों की गड़गड़ाहट में

ईर्ष्‍या और द्वेष लील रहे हैं

उसकी मासूमियत।

तथाकथित न्यायाधीशों से घिरा

भयभीत नौनिहाल

एसएमएस की दया माँग रहा है

और हम सब कभी खुशी कभी गम के इस प्रायोजित खेल में

अपनी विषबुझी महत्वाकांक्षाओं के साथ

सहर्ष शामिल हैं।

क्योंकि हमारे पास बचपन के लिए न तितली है, न चिड़िया

ना ही पहाड़, नदी और झरने

ना घरौंदे, ना लुका छिपी

और ना ही छुकछुक गाड़ी का खेल।

हम तो सिर्फ

बचपन को जल्दी से जल्दी

बड़ा करने की होड़ में हैं।

उसे एक चूहा दौड़ में

शामिल कर देने की तेज होती दौड़ में हैं।


इसके बाद कुछ भी कहने-सुनने को बाकी नहीं रह जाता। मेरी विवशता और आपकी समझदारी पर मुझे पूरा भरोसा है।
-----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

मिठास को उकेरती कसक

खेत में रखे अपने अण्डों की तरफ बढ़ते साँप को देखकर टिटहरी जो क्रन्दन करती है, वह मैंने आज तक नहीं सुना। किताबों में पढ़ा और लोक कथाओं, लोकोक्तियों में सुना भर है। किन्तु उस रात ऋषि की आवाज में मुझे टिटहरी का क्रन्दन सुनाई दे रहा था।

यह इसी पन्द्रह फरवरी की रात की बात है। कोई साढ़े आठ-पौने नौ बजे होंगे। मोबाइल घनघनाया। निपट अनजान नम्बर था। मेरी ‘हेलो‘ के जवाब में विगलित और व्याकुल स्वर सुनाई पड़ा -‘अंकलजी! मैं ऋषि बोल रहा हूँ। मेरी मदद कीजिए। प्लीज।’ उस रात को सर्दी ठीक-ठीक ही थी। किन्तु ऋषि की आवाज सुनकर पसीना आ गया। लगा, धड़कन बन्द होने के लिए सरपट दौड़ने लगी है। साँस घुटने लगी। लगा, प्राणान्त हो जाएगा।

ऋषि मेरे बड़े बेटे वल्कल का ‘सखा‘ और ‘सहपाठी’ है। बेंगलुरु में नौकरी पर था। कम्पनी ने उसे, दक्षिण कोरिया के ‘सुवों’ (SUWON) शहर भेजा है। अभी-अभी। इसी पहली फरवरी को वहाँ पहुँचा है ऋषि। बेंगलुरु से पूरे नौ घण्टों की हवाई-यात्रा कर। 'देस' से कोई 5600 किलोमीटर दूर। वहाँ के मुकाबले भारत में सवेरा कोई साढ़े तीन घण्टे पहले हो जाता है। याने जब भारत में सवेरे के सात बजते हैं तो वहाँ साढ़े दस बज रहे होते हैं। समय के इस अन्तर ने ही मुझे इस ‘प्राणान्तक’ स्थिति में ला खड़ा कर दिया था। याने, कोरियाई समय के हिसाब से ऋषि मुझसे आधी रात मे बात कर रहा था। नहीं, बात नहीं कर रहा था। ‘मेरी मदद कीजिए’ कह रहा था। परदेस में बैठा अकेला लड़का, आधी रात में 'मदद' के लिए आवाज लगा रहा था! जितनी भी हो सकती थीं, वे सब की सब कुशंकाएँ ‘शेष नाग’ बन कर अपने फन फहराने लगी थीं। कौन सी विपत्ति आ पड़ी उस अकेले लड़के पर? लेकिन उससे पहले ही सवाल आया-मैं उसकी क्या मदद कर पाऊँगा? उसकी अज्ञात विपत्ति की आशंका और अपनी ‘कोई भी सहायता न कर पाने की दशा’ ने मुझे संज्ञाहीन ही बना दिया।

मेरा तो मानो पुनर्जन्म हुआ। बड़ी कठिनाई से पूछ पाया - ‘क्या बात है? सब ठीक तो है ना? तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं?’ मेरी आवाज से ही मानो ऋषि ने मेरी दशा का अनुमान लगा लिया। तत्काल ही बोला -‘नहीं! नहीं! अंकलजी। वैसी कोई बात नहीं।’ उसने कहे तो कुल ये सात शब्द किन्तु मुझे लगा कि मैं ने चैरासी लाख योनियाँ पार कर लीं। मेरी साँस सामान्य तो हुई किन्तु संयत तो तब भी नहीं हो पाया। तनिक कठिनाई से ही पूछ पाया - ‘फिर क्या बात है? कैसी मदद चाहिए?’

उत्तर में ऋषि ने जो कुछ कहा, सुनकर मैं अपने आपे में नहीं रह सका। रोना आ गया। यूँ देखूँ तो ‘बात न बात का नाम’। किन्तु ऋषि की बात को ‘यूँ’ देख पाना ही तो मुमकिन नहीं हुआ! ऋषि ने कहा-‘हिन्दुस्तान के समय के मुताबिक आज सवेरे साढे़ आठ बजे से मैं कोशिश कर रहा हूँ कि या तो अभिषेक से मेरी बात हो जाए या फिर उस तक मेरी बात पहुँच जाए। किन्तु पूरे बारह घण्टे हो गए हैं। मैं हलकान हो गया हूँ। आज अभिषेक की शादी है। मुझे आज वहाँ होना चाहिए था। लेकिन मेरा होना तो दूर रहा, मेरी आवाज भी अभिषेक तक नहीं पहुँच पा रही है। हार कर मैंने आपको फोन लगाया है। प्लीज ऐसा कुछ कीजिए कि या तो अभिषेक से मेरी बात हो जाए या फिर मेरी बात उस तक पहुँच जाए।’

अभिषेक याने ऋषि और वल्कल का ‘सखा‘ और सहपाठी। उसी की शादी में ठुमके लगाने के लिए वल्कल हैदराबाद से यहाँ पहुँचा था। आते ही उसने भी ऋषि को याद किया था-अत्यन्त दुखी मन से। ऋषि का यहाँ न होना, उसके होने की कसक को और उभार रहा था। पता नहीं, इन तीनों ने क्या-क्या सोचा होगा इस प्रसंग के लिए। ऋषि भारत में होता तो सारी बाधाओं को चीर कर अभिषेक की शादी में आता और अपनी उपस्थिति को यादगार बना देता।


ऋषि की आवाज में यही कसक हुमक रही थी। वह रुँआसा था। शायद हताश भी। ऋषि, अभिषेक और वल्कल की तिकड़ी अपने स्कूल में पर्याप्त ‘ख्यात’ थी। अध्यापक इसके पहले ‘कु’ और छात्र ‘वि’ लगा लिया करते थे। वल्कल की शादी में भी ऋषि नहीं पहुँच पाया था। और अब अभिषेक की शादी में भी?


वह बता रहा था कि उसने अभिषेक और वल्कल के मोबाइलों पर वास्तव में अनगिनत बार ‘ट्राई’ किया किन्तु एक बार भी सफल नहीं हो पाया। उसने कहा-‘अंकलजी! यह भी कोई बात हुई? मैं क्या बताऊँ कि मुझे कैसा लग रहा है?’ मैंने उसे ढाढस बँधाने की कोशिश की। कहा कि मैं अभिषेक के घर बात कर, सम्पर्क कराने की कोशिश करता हूँ। मैंने उसे अभिषेक के घर का नम्बर भी दिया। अभिषेक की माताजी से बात कर ऋषि की व्याकुलता सूचित की। ऋषि से कहा कि फोन बन्द कर, ‘चेट’ पर आ जाए।


थोड़ी ही देर बाद चेट बाक्स में ऋषि का सन्देश आया - ‘अच्छा अंकलजी। गुड नाइट।’ उसने यह नहीं बताया कि अभिषेक से उसका सम्पर्क हुआ या नहीं। किन्तु उसकी पहली आवाज सुनने से लेकर चेट बाक्स में उसके सन्देश के आने के इन कुछ मिनिटों के समय में मैं एक पूर युग को जी गया। इस युग में प्रगाढ़ आत्मीयता थी, वह मिठास थी जो मिठास की तमाम उपमाओं और प्रतिमानों को बौना, अपर्याप्त और अधूरा साबित कर रही थी, अपनेपन की वह ऊष्मा थी जिसने कृत्रिमता, दिखावा, औपचारिकता को भस्म कर दिया था। इस युग में रिश्तों का वह सब कुछ था जो आज ‘अजायब घर के काबिल’ हो गया है। ये बच्चे भले ही अपनी आयु के तीसरे दशक को जी रहे हैं किन्तु दूरियाँ अभी भी इन्हें सालती हैं, ‘सखा का बाराती’ न बन पाना व्याकुल और व्यग्र करता है, उससे बात न कर पाना जीवन की व्यर्थता लगता है।

‘पैकेज के मारे’ इन युवाओं के मन में यह तड़प अभी भी बाकी है-यह अनुभव कर मन को शान्ति मिली। लगा, जेठ की तपती दुपहरी में ऋषि ने मुझे घने नीम की ठण्डी छाया में बैठा दिया है। ऋषि की आवाज की कसक ‘दोस्ती’ की मिठास को उकेर रही थी। इस कसक पर मैं न्यौछावर।

टिटहरी का क्रन्दन मैं अब भी सुन रहा हूँ किन्तु लग रहा है कि उसके अण्डों को खाने के लिए बढ़ रहा साँप क्रन्दन की विकरालता से भयभीत हो लौट गया है। शायद अपने प्राण बचा कर।

-----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

संस्‍कृति और धर्म रक्षा : व्यापार बनाम उद्यम

कल रात कोई सवा ग्यारह बजे यह समाचार एक चैनल पर देखा था और आज प्रातः अखबारों में देख रहा हूँ। ‘आश्चर्यचकित’ तो क्षणांश को भी नहीं हुआ किन्तु तनिक असहज अवश्य हूँ।

महाराष्ट्र राज्य शासन ने केन्द्र शासन के ‘माता-पिता के भरण पोषण और कल्याण कानून’ को अपने राज्य में लागू करने पर सहमति दे दी है। अब, महाराष्ट्र में भी, उन पुत्रों/पुत्रियों को तीन माह का कारावास अथवा पाँच हजार रुपयों तक का अर्थ दण्ड हो सकेगा जो अपने वृध्द माता-पिता का ‘सम्मान’ नहीं करेंगे।

आश्चर्यचकित इसलिए नहीं हुआ क्यों कि ‘यह तो होना ही था’ वाला पूर्वानुमान था। ‘भारतीय समृध्दि’ परिवार को छोटा नहीं करती। इसमें ‘संयुक्त परिवार’ अथवा ‘पारिवारिक सामूहिकता’ स्वतः सन्निहित है जिसमें परिवार का मुखिया, चाहे कितना ही वृध्द क्यों न हो जाए, परिवार के निर्णय लेने का पारम्परिक अधिकारी होता है। ‘पाश्चात्य समृध्दि’ में ऐसा नहीं है। वहाँ ‘वैयक्तिकता’ प्रधान है। इसीके चलते हम ‘छोटे परिवार’ से प्रारम्भ होकर ‘एकल परिवार’ तक आ पहुँचे। ऐसे में परिवार के वृध्द भी एक अलग और स्वतन्त्र ‘एकल परिवार’ बन कर रह गए।
किन्तु ‘राज्य द्वारा अपने नागरिकों की देखभाल’ के मामले में पश्चिम में और हममें मूलभूत अन्तर है। वहाँ, वृध्दों की देखभाल का जिम्मा राज्य का होता है। हमारे यहाँ ऐसा नहीं है। हमारे यहाँ तो वृध्द आज भी सन्तान का ही उत्तरदायित्व हैं।

पश्चिम के रास्ते चल कर समृध्दि प्राप्त करने के लिए ‘एकल’ होना अपरिहार्यता है। वह तो हम हो गए किन्तु सामाजिक स्तर पर ‘संयुक्त’ बने रहना भी अपरिहार्य है, यह भूल गए। ऐसे में, ‘राज्य’ हमें ‘एकल’ होने के लिए सुविधाएँ और प्रोत्साहन तो उपलब्ध करता है किन्तु उसके ‘उप उत्पाद’ (बाय प्राडक्ट) से उपजी स्थिति की जिम्मेदारी नहीं लेता। विकराल जनसंख्या के कारण यह सम्भव भी नहीं लगता।

अब, जबकि ‘भारतीय संस्कृति’ में जो माता-पिता ‘तीर्थ’ और दिनारम्भ में प्रणम्य (‘प्रातःकाल उठि कर रघुनाथा, मात-पिता, गुरु नाँवहि माथा’) हुआ करते थे, वे अब ‘कानूनी जिम्मेदारी’ बनने लगे हैं, तब मुझे लगता है, यही वह बिन्दु है जहाँ से ‘भारतीय संस्कृति की रक्षा की चिन्ता’ शुरु की जानी चाहिए।

यह स्थिति, बहुत ही धीमे-धीमे आई है, बिल्ली की तरह दबे पाँव। किन्तु इसका प्रतिकार तो अपनी सम्पूर्ण शक्ति, क्षमता और सक्रियता से, अविलम्ब ही करना पड़ेगा। क्षरण तो सदैव ही मन्द गति से प्रारम्भ होता है किन्तु उसके प्रभावों से बचने के उपाय तो तीव्रतम गति से करने पड़ते हैं।

भारतीय संस्कृति और धर्म के पहरुओं की भूमिका निभाने वाले इस ओर शायद ही दृष्टिपात करें। क्योंकि उन्हें सबसे पहले अपने वृध्द परिजनों को सम्मान देने के लिए समय निकालना पड़ेगा और उनके लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ करने का कष्ट उठाना पड़ेगा।

यह सब करने की अपेक्षा, सड़कों पर ताण्डव मचाना, लोगों को भयभीत करना, ‘अपनी सरकार’ होने के दम पर आतंक उपजा कर अपनी धाक जमाना अधिक सहज और सुविधाजनक होता है।

भारतीय संस्कृति के ठेकेदारों और धर्म रक्षकों के लिए यह एक और ‘स्वर्णिम अवसर’ उपलब्ध है। ‘पाश्चात्य समृध्दि’ के कारण अकेले हो रहे वृध्दों की सुरक्षा, सेवा और देख भाल के लिए वे कोई दीर्घकालीन और स्थायी प्रकल्प प्रारम्भ कर सकते हैं। हाँ, इस प्रकल्प से प्राप्त होने वाले सम्मान और दुआओं के लिए उन्हें वर्षों तक, अत्यन्त धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी होगी।

यह देखना रोचक होगा कि वे भय आतंक उपजाने वाले और ताण्डव मचाने जैसे ‘तत्काल प्रभाव’ वाले नकारात्मक काम करने में विश्वास करते हैं या भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा के सच्चे और वास्तविक दीर्घकालीन प्रकल्प शुरु करते हैं।

हाथों-हाथ लाभ की कामना भरे प्रयत्‍न व्यापारी (ट्रेडर) करता है जबकि दीर्घकालीन प्रकल्प बना कर, दूरगामी-स्थायी लाभ की कामना करने का साहस कोई ‘उद्यमी’ (एण्टरप्रीनर) ही कर पाता है।

भारतीय संस्कृति और धर्म की ठेकेदारी कर रहे लोग ‘व्यापारी’ हैं या ‘उद्यमी’, यह उन्हें ही साबित करना है।

-----


इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

बीमा किश्त भुगतान की रियायती अवधि


बीमा किश्तों के भुगतान के लिए भा.जी.बी.नि. अपने ग्राहकों को रियायती अवधि (ग्रेस पीरीयड) उपलब्ध कराता है। यह अवधि, सामान्यतः देय दिनांक से एक माह (किन्तु 30 दिन से कम नहीं) की होती है जबकि ‘कुछ पालिसियों’ में यह 15 दिनों की ही होती है।

वार्षिक, अध्र्द वार्षिक और तिमाही किश्त भुगतान विधि में यह अवधि एक माह (30 दिन से कम नहीं) और मासिक किश्त भुगतान विधि में 15 दिन होती है। किन्तु उपरोल्लेखित ‘कुछ पालिसियों’ यह अवधि सदैव 15 दिन ही होती है भले ही उनकी किश्त भुगतान विधि वार्षिक, अध्र्द वार्षिक अथवा तिमाही ही क्यों न हो।

रियायती अवधि सदैव ही ‘देय दिनांक’ से प्रारम्भ होती है। यह देय दिनांक वही होता है जो पालिसी का प्रारम्भ दिनांक होता है। वार्षिक विधि से किश्त भुगतान विधि वाली पालिसियों में देय माह भी वही होता है जो पालिसी का प्रारम्भ माह होता है।

इसे, इस उदाहरण से समझें।

किसी पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर है। यदि इसकी किश्त भुगतान विधि वार्षिक है तो इसकी किश्त प्रति वर्ष 28 दिसम्बर को देय होगी। किन्तु यदि इसकी किश्त भुगतान विधि अर्ध्‍द वार्षिक है तो इसकी किश्तें प्रति वर्ष 28 दिसम्बर और 28 जून को देय होंगी और यदि इसकी किश्त भुगतान विधि तिमाही है तो इसकी किश्त देय दिनांक प्रति वर्ष 28 दिसम्बर, 28 मार्च, 28 जून तथा 28 सितम्बर होगी। मासिक किश्त भुगतान विधि में प्रत्येक माह की 28 तारीख, देय दिनांक होगी। रियायती अवधि, इसी देय दिनांक से प्रारम्भ होगी।

इस रियायती अवधि का महत्व और इसकी गम्भीरता अधिकांश ग्राहकों को पता नहीं होती। ग्राहक सामान्यतः इसका एक ही अर्थ निकालते हैं कि इस अवधि में किश्त जमा करने पर किश्त की रकम पर ब्याज अथवा विलम्ब शुल्क नहीं देना पड़ता है। किन्तु इसका महत्व इसके अतिरिक्त भी है।

यह अवधि ‘निगम’ अपनी ओर से, स्वैच्छिक रूप से उपलब्ध कराता है इसलिए इस अवधि में ग्राहक किश्त जमा कराए या नहीं, उसे पूरी-पूरी बीमा सुरक्षा उपलब्ध रहती है। अर्थात्, 28 दिसम्बर को देय किश्त 27 जनवरी तक भी जमा नहीं कराई जाए और (इस अवधि के दौरान) ग्राहक की मृत्यु हो जाए तो ‘निगम’ उसके नामित (नामिनी) को मृत्यु दावे की रकम चुकाएगा।

इसमें एक बारीक बात और जिसके बारे में बहुत कम जानते हैं। रियायती अवधि के अन्तिम दिनांक को भी यदि ग्राहक ने किश्त जमा नहीं कराई और उस दिनांक की रात्रि 12 बजे से पहले उसकी मृत्यु हो गई तो भी ग्राहक के नामित को मृत्यु दावा देय होगा। इस बात में ‘पेंच’ मात्र यही है कि किश्त जमा कराने (आर्थिक ‘लेन-देन’) का समय बीमा कम्पनी अपनी सुविधा से (जैसे, सामान्य दिनों में अपराह्न साढ़े तीन बजे तक और शनिवार को दोपहर एक बजे तक) निर्धारित करती है जबकि ‘रिस्क कवरेज’ तो उस ‘पूरी तारीख’ (अर्थात् रात 12 बजे) तक उपलब्ध रहता है।

स्थिति का दूसरा पक्ष उपरोक्त विवरण से स्वतः स्पष्ट हो जाता है। अर्थात्, रियायती अवधि में किश्त जमा नहीं कराने पर पालिसी स्वतः ही कालातीत (लेप्स) हो जाती है और ग्राहक बीमा सुरक्षा से वंचित हो जाता है। अर्थात्, रियायती अवधि में किश्त जमा नहीं हो और ग्राहक की मृत्यु हो जाए तो ऐसे प्रकरण में मृत्यु दावा की रकम देय नहीं होगी।

अर्थात्, बीमा सुरक्षा निरन्तर प्राप्त करते रहने के लिए, ग्राहक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी पालिसी को चालू बनाए रखे जिसके लिए, रियायती अवधि में अपनी किश्त जमा कराना उसके लिए एक मात्र उपाय है।

इस पोस्ट के प्रारम्भ में ऐसी ‘कुछ पालिसियाँ’ उल्लेखित की गई हैं जिनकी किश्तें जमा कराने के लिए यह रियायती अवधि 15 दिनों की होती है। ये ऐसी पालिसियाँ होती हैं जिनमें, बहुत ही कम प्रीमीयम में ग्राहक को बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है। ऐसी पालिसियों में ग्राहक को परिपक्वता राशि (मेच्योरिटी वेल्यू) या तो बिलकुल ही नहीं मिलती (वाहन बीमा की तरह) या फिर, पालिसी अवधि में जमा कराई गई किश्तों की रकम में से कुछ रकम कम कर, ग्राहक को लौटाई जाती है। ऐसी पालिसियों को ‘शुद्ध बीमा’ (प्योअर इंश्योरेंस) अथवा ‘अवधि बीमा’ (टर्म इंश्योरेंस) अथवा ‘उच्च जोखिम योजना’ (हाई रिस्क प्लान) कहा जाता है। जैसा कि शुरु में कहा गया है, ऐसी पालिसियों की किश्त भुगतान विधि कोई सी भी हो, रियायती अवधि 15 दिन ही होती है।

इन ‘हाई रिस्क प्लान’ वाली लेप्स पालिसियों को चालू कराने के लिए वे समस्त औपचारिकताएँ पूरी करनी पड़ती हैं जो पालिसी लेते समय की गई थीं। केवल नया प्रस्ताव पत्र नहीं लिया जाता। इन औपचारिकताओं में यदि चिकित्सा परीक्षण भी शामिल हैं तो वे सब परीक्षण ग्राहक को अपने ही खर्चे से कराने पड़ते हैं। ऐसी योजनाओं में अमूल्य जीवन तथा अमूल्य जीवन-1 (तालिका 179 तथा 190), अनमोल जीवन तथा अनमोल जीवन-1 (तालिका 153 तथा 164), बीमा सन्देश (तालिका 94), तथा बीमा किरण और न्यू बीमा किरण (तालिका 111 तथा 150) प्रमुख हैं। इनमें से बीमा किरण तथा न्यू बीमा किरण में रियायती अवधि यद्यपि 30 दिनों की दी गई है किन्तु लेप्स पालिसी चालू कराने के लिए समस्त औपारिकताएँ पूरी करना इनके लिए भी अनिवार्य है।

शेष पालिसियों में, रियाती अवधि के बाद भी, भले ही भुगतान खिड़की पर, विलम्ब शुल्क अथवा ब्याज के साथ बीमा किश्त जमा कर ली जाती है किन्तु तब भी वह ‘लेप्स पालिसी का पुनर्चलन’ ही हो रहा होता है। ग्राहक को इसकी जानकारी केवल इसलिए नहीं होती क्योंकि उससे कोई औपचारिकता पूरी नहीं कराई जाती।

रियायती अवधि के बाद किश्त जमा कराने पर ग्राहक से, किश्त की रकम पर, रियायती अवधि का भी विलम्ब शुल्क अथवा ब्याज लिया जाता है। अर्थात् रियायती अवधि की छूट, रियायती अवधि तक ही उपलब्ध होती है। अवधि की समाप्ति के साथ ही साथ, सारी सुविधाएँ भी समाप्त हो जाती हैं।

इसलिए, ग्राहक की बेहतरी इसी में है कि रियायती अवधि में अपनी किश्त जमा कराए और निरन्तर बीमा सुरक्षा प्राप्त करता रहे।

पालिसी लेप्स होने पर उसे चालू कराने के साथ ही ग्राहक को बीमा सुरक्षा फिर से मिलने लगती है। किन्तु लेप्स पालिसी चालू करा लेने के बाद भी, (पालिसी के लेप्स होने के कारण उपजा खतरा और उससे होने वाली हानि के कारण) ग्राहक ने अपना कितना बड़ा नुकसान कर लिया है, यह ग्राहक को मालूम नहीं हो पाता।

इस खतरे के बारे में और ऐसी ही कुछ और छोटी-छोटी बातें फिर कभी।

अन्त में वही निवेदन - ये विचार मेरे हैं। कृपया इन्हें, भारतीय जीवन बीमा निगम के विचार न समझें।
-----


इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।