चिट्ठाकारों की बोध-कथा


कल कोई आधी रात, ज्ञानजी की पोस्ट थोक कट-पेस्टीय लेखन पढ़ी और उस पर टिप्पणी भी की। किन्तु उसके बाद देर रात तकयह पोस्ट मन में बनी रही।

यह पोस्ट और कुछ नहीं, मनुष्‍य मन की नाना-प्रकृतियों का ही दर्शन कराती है। मनुष्‍‍य परिश्रमी भी होता है और आलसी भी। ‘बिड़ला’ भी होता है और ‘बैरागी’ भी। ‘यशानुगामी’ भी होता है और ‘यश-विमुख’ भी।

इस पोस्ट ने मुझे वह कहानी याद दिला दी जो कभी, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, (स्वर्गीय) श्रीलहरसिंहजी भाटी ने ‘बतरस’ के चलते एक बार मुझे सुनाई थी। यह कहानी याद आ जाने के बाद ज्ञानजी की पोस्ट का मर्म समझ पड़ा और नींद आ गई।

कहानी आप भी पढ़ें।

एक किसान ईश्‍‍वर से अप्रसन्न हो गया। ईश्‍‍वर चिन्तित हुए। भक्त ने ही पूछ-परख बन्द कर दी तो नास्तिकों की तो दीवाली हो जाएगी! वे किसान के पास पहुँचे और अप्रसन्नता का कारण पूछा। किसान ने कहा कि ईश्‍‍वर उसकी ओर देखता ही नहीं, उसकी चिन्ता बिलकुल ही नहीं करता, मनमानी, अनदेखी और अत्याचार करता है। किसान अपने समूचे परिवार के साथ दिन-रात खेतों में मेहनत करता है और ईश्‍‍वर है कि कभी सूखा लाकर, कभी अतिवृष्‍िट लाकर, कभी अन्धड़ चला कर तो कभी पाला लाकर उसकी फसल नष्‍ट कर देता है और किसान को सपरिवार भूखों मरना पड़ता है। इसलिए वह अब ईश्‍वर को नहीं मानेगा।

ईश्‍‍वर घबरा गए। पूछा कि वे क्या करें जिससे किसान की अप्रसन्नता समाप्त हो जाए। किसान ने कहा कि यदि मौसम के मामले में ईश्‍‍वर वही करे जैसा किसान कहे तो किसान मान सकता है। ईश्‍‍वर ने मान लिया।

किसान ने गेहूँ की फसल बोई। उसने ईश्‍‍वर से कहा-बरसात कर दो। ईश्‍वर ने बरसात कर दी। किसान ने कहा-धूप निकाल दो। ईश्‍‍वर ने कहा मान लिया। किसान ने कहा-तेज हवा मत चलने दो। ईश्‍‍वर ने हवा को नियन्त्रित कर लिया। अर्थात् ईश्‍‍वर ने आँखें मूँद कर किसान का कहा माना।

परिणाम अच्छा दिखाई देने लगा। गेहूँ के पौधे सामान्य से तनिक अधिक ऊँचाई के हो गए, लम्बी-लम्बी हृष्ट-पुष्‍‍ट बालियाँ। किसान फसल को देख-देख कर प्रसन्न हो वर्ष भर की आर्थिक योजनाएँ बनाने लगा।

फसल कटाई का दिन आया। ईश्‍‍वर को धन्यवाद देता हुआ किसान अपने परिजनों और श्रमिकों के साथ खेत में पहुँचा। कटाई शुरु करने से पहले उसने बालियों को सहलाया तो चैंक पड़ा। यह क्या? बालियों में दाने तो थे ही नहीं! किसान पहले तो हैरान हुआ, फिर व्यग्र और अन्ततः क्रोधित-कुपित। उसने आवाज लगा-लगा कर ईश्‍वर को कोसना शुरु कर दिया।

ईश्‍‍वर भाग कर आए और पूछा कि अब क्यों उन्हें कोसा जा रहा है? उन्होंने तो अपनी इच्छाओं को उत्सर्जित कर, किसान की राई-रत्ती बात मानी थी। किसान ने वास्तविकता बताई और शिकायत की कि उसका समूचा परिश्रम एक बार फिर व्यर्थ कर दिया गया।

तब ईश्‍‍वर हँस कर बोले कि फसल को सब चाहिए। गर्मी भी, बरसात भी, धूप भी, छाँव भी, पाला भी, लू भी, तेज हवा के थपेड़े भी और धीमे-धीमे बहती मन्द बयार भी। ईश्‍‍वर ने कहा कि ‘प्राण’ के लिए 'निश्चितता'जितनी आवश्‍यक है उतनी ही आवश्यक 'अनिश्च्तिता' भी है। ‘संघर्ष और प्रयत्न’ जीवन के वे अपरिहार्य अंग हैं जो जीवन को सार्थक बनाते हैं। अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ, सुविधाएँ और असुविधाएँ, अभाव और समृध्दि आदि भाव और स्थितियाँ ही जीवन को सार्थकता देती हैं।

ईश्‍‍वर ने कहा - संघर्ष और प्रयत्नों के बिना न तो 'सत्' आता है और न ही ‘स्वत्व’।

मुझे लगता है कि ज्ञानजी ने अपने अन्दाज में यही कथा प्रस्तुत कर दी है। ईश्‍‍वर को अपनी सुविधानुसार चलाने वाले अन्ततः बिना दानों वाली बालियों से लहलहाती फसल के स्वामी होते हैं और संघर्ष तथा प्रयत्न करने वाले अनूप शुक्ल होते हैं।

मुझे तो बस, यही सब याद आया।

-----

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्‍‍य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

11 comments:

  1. वाह बैरागी जी, बहुत सुन्दर कथा से अवगत कराया आपने!

    ReplyDelete
  2. बढ़िया .मकर सक्रांति की शुभ कामनाये ..

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर बोध कथा।
    गीता में कहा है कि अन्न को बादल वर्षा देते हैं। पर बादल यज्ञ (प्रयत्न) से ही उपजते हैं।
    बिना मेहनत कुछ नहीं होता।

    ReplyDelete
  4. सच है केवल प्रयत्नशील / संघर्ष-र त को ही सफलता की राह मिलती है सुविधाभोगी /आलसी को नही ;
    कहा है---
    उद्यमेनन् हि सिध्यन्ति कार्यानि , न तु मनोरथै ;
    न हि सुप्तस्य सिन्हस्य , प्रविशन्ति मुखे मृगाः !

    ReplyDelete
  5. कितने खूबसूरती से आपने इस प्रेरणादायी कथा को प्रस्तुत किया. अद्भुत. आभार.

    ReplyDelete
  6. सुन्दर प्यारी कहानी. धन्यवाद.

    ReplyDelete
  7. अच्छा लगा इस बोधकथा को पढ़ना और इसे ज्ञान जी की पोस्ट से संदर्भित करना.

    ReplyDelete
  8. मकर सक्रांति की शुभ कामनाएं! यह प्रसंग बहुत अच्छा लगा. सचमुच सफलता (यहाँ मौलिकता) के लिए कर्म/श्रम की ज़रूरत है.

    ReplyDelete
  9. बहुत बढ़िया कहानी को बढ़िया प्रसंग से जोड़कर सुनाया है। धन्यवाद।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  10. ज्ञानदा की बात अगर समझदारों को समझ आने लायक लहजे में थी तो आपकी बात नासमझों को भी समझ आने वाली शैली में है। बहुत आनंद आया भैया...
    नवसंवत्सर की शुभकामनाएं...
    सादर अजित

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.