
परम्परा से साक्षात्कार

महज एक वाचनालय नहीं
निजी सपने साकार करने के लिए प्रयास भी निजी ही होते हैं। किन्तु सपना यदि राष्ट्र का या राष्ट्र पुरुष का हो तो? कहना निरर्थक ही होगा कि तब पूरे राष्ट्र को और सारे नागरिकों को इस हेतु प्रयास करने पड़ेंगे। किन्तु करता कौन है? शायद ही कोई ऐसा ‘करने’ पर सोचे। हर कोई सोचता है कि उसके सिवाय बाकी सब लोग यह सपना पूरा करें। यह अलग बात है कि पूरा देश चाहता होता है कि यह सपना पूरा हो। चाहत सबकी, कोशिश किसी की नहीं! हमारे संकटों का एक बड़ा (इसे ‘सबसे बड़ा’ कहने को जी कर रहा है) कारण शायद यही है - चाहत सबकी, कोशिश किसी का नहीं।प्रवक्ता डॉट काम की लेख प्रतियोगिता
समसामयिक विचार पोर्टल प्रवक्ता डॉट कॉम के तीन साल पूरे होने पर द्वितीय ऑनलाइन लेख प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। इससे पूर्व ‘प्रवक्ता’ के दो साल पूरे होने पर भी लेख प्रतियोगिता (http://www.pravakta.com/archives/18521) का आयोजन किया गया था।
प्रथम पुरुस्कार: रु. 2500/, द्वितीय पुरुस्कार: रु. 1500/- एवं तृतीय पुरुस्कार रु. 1100/- तय किया गया है।
पुरुस्कार के सम्बन्ध में निर्णायक मण्डल का निर्णय सर्वोपरि होगा। अपना लेख ई-मेल के ज़रिये prawakta@gmail.com पर भेज सकते हैं। कृपया अपना लेख हिन्दी के युनिकोड फ़ोंट जैसे मंगल (Mangal) में अथवा क्रुतिदेव (Krutidev) में ही भेजें।
विस्तृत विवरण के लिए यहाँ क्लिक (http://www.pravakta.com/archives/31304) करें या फिर सम्पर्क करें: संजीव कुमार सिन्हा, सम्पादक, प्रवक्ता डॉट कॉम, मो. 09868964804
अण्णा को पता तो चले
अण्णा का अधूरा आह्वान
मैं इस कल्पना मात्र से ही भयभीत हूँ। मैं अण्णा को असफल होते नहीं देखना चाहता।
जूझना अपने आप से
इसका शीर्षक आप ही दीजिए
अब तक आपकी जिज्ञासा बढ़ गई होगी और कोई ताज्जुब नहीं कि आप मुझ पर चिढ़ने लगे हों। तो सुन लीजिए वह जवाब जो अलग-अलग शब्दों में कमोबेश एक ही था - ‘आपकी संस्था पर हमें विश्वास है कि आप झाँकीबाजी और दुकानदारी नहीं करेंगे क्योंकि जितने नाम छपे हैं उनमें किसी भी नेता का नाम नहीं है।’
......और माताजी चबूतरे पर स्थापित हो गईं
कोई 6 बरस हो गए हैं, आशीष को अब तक नहीं पता कि उसने कितनी पुरानी परम्परा तोड़ दी या कि तुड़वा दी। कौन आशीष? वही आशीष दशोत्तर जिसकी पचास से अधिक गजलें आप, दो बरसों से भी अधिक समय से मृत पड़े मेरे ब्लॉग मित्र-धन परआशीष ‘अंकुर’ की गजलें टैग में पढ़ चुके हैं। हिन्दुत्व की सच्ची रक्षा
बिना किसी भूमिका के वे उठ खड़े हुए। वे पूरी तरह असहज हो गए थे। इतने कि जब चलने को हुए तो ‘अरे! अरे!! इन्हें कहाँ लिए जा रहे हैं? ये तो मुझे दे दीजिए’ कहते हुए मुझे उनके हाथ से पेड़े झटकने पड़े।
छोटी बात, बड़ी बात
बात तो बस, बात होती है। न छोटी, न बड़ी। बस, देखनेवाले की नजर ही उसे छोटी या बड़ी बनाती है। इसीलिए ऐसा होता है कि जो बात किसी एक के लिए कोई मायने नहीं रखती वही बात किसी दूसरे के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाती है। यह ‘बात’ ही तो है जो कहीं महाभारत करवा दे तो कभी राजा भर्तहरि को जोगी बना दे। बस, सब कुछ देखनेवाले की नजर पर निर्भर करता है।भ्रष्टाचार: एक अण्णा बनाम चार ‘ना’
तीन सौ की जगह केवल तीस!
मेरे कस्बे (रतलाम) में, भारतीय जीवन बीमा निगम के तीन शाखा कार्यालय हैं जिनके अभिकर्ताओं और कर्मचारियों की सकल संख्या लगभग 900 है।
यह अनूठा स्वर्ण पदक
सबके साथ ऐसा हो
मुझे नहीं, आपको ही मुबारक हो
अज्ञान का आतंक
गिनती की ये ही बातें मैंने बताईं किन्तु छहों की शकलें देख कर लगा कि यह ‘सार संक्षप’ भी उन्हें ‘महा सागर’ की तरह लगा।
1000 दफ्तर बन्द कर दिए निजी जीवन बीमा कम्पनियों ने
बन्द किए गए शाखा कार्यालयों की कुल संख्या - 1,015
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ - 20,000 थे, 7,000 निकाले, 13,000 कार्यरत हैं।
निकाले गए कर्मचारियों की कुल संख्या - 22,992
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ - मुनाफा 260 करोड़ से बढ़कर 810 करोड़ हो गया, 550 करोड़ की वृद्धि हुई।
यह छोटा सा बदलाव समाप्त कर सकता है भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार को भ्रष्ट किया रामदेव ने
