धन्यवाद

 



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की पाँचवीं कविता 






धन्यवाद


दीया
मैं ही बनाऊँ
मैं ही जलाऊँ
और मैं ही उसे
आपकी देहरी पर पधराऊँ।

और आप?
न उसमें तेल पूरें
न बाती उकसाएँ
और न अन्धी हवाओं से
उसे बचाएँ।

बस,
उसकी लौ से उधार लेकर
अछूती आग
छोड़ें अपने फुलझड़ी-पटाखे
और अपनी अधमरी आग की
हैसियत आँकें।

मन जाए जब आपको दीवाली
भर जाए जब आपके
अहं का पेट
तब आप
पुजते हैं अपनी देहरी
फेंक देते हैं मेरे निर्माण
और भूल जाते हैं उस निर्माण की
विराट् सर्जना को,
जीने लगते हैं
फिर से अपनी सहज वर्जना का।

करने लगते हैं आलोचना
देने लगते हैं गालियाँ
उतर आते हैं विरोध पर
और विरोध से भी
हजार कदम आगे
पालने लगते हैं दुश्मनी।

तब मैं ?
तब मैं सांत्वना नहीं देता
अपने निर्माण/उसके उजास
और अपने प्रयास को।

बल्कि
धन्यवाद देता हूँ आपको
बलिहारी जाता हूँ आपकी
कृतघ्नता पर
आभार मानता हूँ
आपकी माँ अमावस का
जिसने आपको पाला-पोसा
तम से संस्कारित करके
बड़ा किया
और अपनी अधमरी आग सहित
मेरे उदार दीये की
अग्निधर्मा अछूती
लौ के सामने
कभी नहीं लौटाए जानेवाले
उधार के उजास
और लपलपाती आग के लिए
एक ऋण मुद्रा
में खड़ा किया।

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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली

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