नई चुनौती

श्री बालकवि बैरागी के दूसरे काव्य संग्रह
‘जूझ रहा है हिन्दुस्तान’ की अठारहवीं कविता

यह संग्रह पिता श्री द्वारकादासजी बैरागी को समर्पित किया गया है।




नई चुनौती

नये समय की मई चुनौती, नव युवकों स्वीकार करो
चलो पसीने की बूँदों से, माता का सिंगार करो
नई जवानी ज़िन्दाबाद
नई चुनौती जिन्दाबाद
नया जमाना जिन्दाबाद
नया पसीना जिन्दाबाद

महामुकुट हिमगिरि को कहकर, तुमने माँ को बहलाया
सागर जैसा दास बता कर, माँ का मन भरमाया
गंगा, जमना, ब्रह्मपुत्र का, रतन-हार पहिनाया
हाँक-हाँक कर लम्बी डींगें, कुंकुम माँ का लुटवाया
श्रम-बिन्दी से शीश सजाओ भैया हिन्दी रे
अब श्रम बिन्दी से शीश सजाओ, आलस पर अंगार धरो
चलो पसीने की बूँदों से जननी का सिंगार करो
नई चुनौती ज़िन्दाबाद.....

घट-घट, पनघट-तट, घूँघट में, अब भी कोई रोती है
उसकी प्यारी सन्तानें, इस युग में भूखी सोती हैं
उस छाती में दूध नही हैं, नहीं तवे पर रोटी है
सारी पूँजी उस बेबस की, पलकों के दो मोती हैं
बिना बिंधे इन मुक्ताओं का भैया हिन्दी रे
बिना बिंधे इन मुक्ताओं का, मत झूठा व्यापार करो
चलो पसीने की बूँदों से माता का सिंगार करो
नई चुनौती ज़िन्दाबाद.....

माटी के दो महल बना कर, खेल खेलते नन््हें लाल
इन महलों में सभी बराबर, क्या धनवाले, क्या कंगाल
तुतला-तुतला कर कहता है, भारत का ये भाग्य विशाल
मेरी किस्मत का रखवाला, नये खून का नया उबाल
इस तुतलाई अभिलाषा की भैया हिन्दी रे
इस तुतलाई अभिलाषा की, रक्षा का इकरार करो
चलो पसीने की बूँदों से माता का सिंगार करो
नई चुनौती ज़िन्दाबाद.....

आँख मूँद लो, मत देखो, इन हरे-हरे मैदानों को
गदराये उपवन मत देखो, मत देखो खलिहानों को
आँख लड़ाने से मत रोको, इन अनब्याहे धानों को
देख सको तो आज देख लो, इन बंजर शमशानों को
हलधारी बलराम चलो रे भैया हिन्दी रे
हलधारी बलराम चलो, इस मरुथल का संहार करो
चलो पसीने की बूँदों से, माता का सिंगार करो
नई चुनौती जिन्दाबाद.....

गंगा रोको, जमना रोको, रोको कृष्णा, कावेरी
दामोदर पर दया न करना, मुझे अखरती है देरी
सागर गरजे तो मत डरना, जिम्मेदारी है मेरी
इधर करो अभिषेक धरा का, उधर बजा दो श्रम-भेरी
चरण-शरण में अम्बर उतरे भैया हिन्दी रे
चरण-शरण में अम्बर उतरे, प्रलयंकर हुँकार भरो
चलो पसीने की बूँदों से माता का सिंगार करो
नई चुनौती जिन्दाबाद.....

नब्बे कोटि भुजाएँ जिस दिन, माँ के शूल हटायेंगी
कौन शक्ति है जो फागुन की, राहों में अड़ जायेगी?
खुशहाली की फसलें जिस दिन, खलिहानों में आयेंगी
इन्द्रलोक की परियाँ जबरन, कुटिया में बस जायेंगी
चाहो तो तुम ठुकरा देना भैया हिन्दी रे
चाहो तो तुम ठुकरा देना, चाहे अंगीकार करो
चलो पसीने की बूँदों से माता का सिंगार करो
नई चुनौती जिन्दाबाद.....

जब कि सितारों की दुनिया से, स्वर्ग धरा पर लाना है
(तो) आसमान से आशीषों की, नाहक आस लगाना है
श्रम के बल पर ताल ठोक कर, आगे बढ़ते जाना है
करो-मरो की तरह देश में नारा नया लगाना है
कसम तुम्हें मेरे गीतों की भैया हिन्दी रे
कसम तुम्हें मेरे गीतों की, मुझ पर ही उपकार करो
चलो पसीने की बूँदों से माता का सिंगार करो
नई चुनौती ज़िन्दाबाद.....

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जूझ रहा है हिन्दुस्तान
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मालव लोक साहित्य परिषद्, उज्जैन (म. प्र.)
प्रथम संस्करण 1963.  2100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन (म. प्र.)
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यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। 
‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। 
रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।





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