हँसते गाते

श्री बालकवि बैरागी के दूसरे काव्य संग्रह
‘जूझ रहा है हिन्दुस्तान’ की तीसवीं कविता

यह संग्रह पिता श्री द्वारकादासजी बैरागी को समर्पित किया गया है।




हँसते गाते

हँसते गाते, धूम मचाते, आगे कदम बढ़ायेगें
आजादी के रखवाले हम, भारत नया बनायेंगे
भाई हँसते.....

हम काँटों में राह बना दें, चल दें हम अंगारों पर
आँच नहीं हम आने देगें, भारत के सिंगारों पर
जिसने हमको जनम दिया है
जिस माता का दूध पिया है
पूरा नहीं, अधूरा लेकिन उसका कर्ज चुकायेंगे
आज़ादी के रखवाले हम भारत नया बनायेगें
भाई हँसते गाते.....

चन्द दिनों में हम पर भी तो नई जवानी आयेगी
नये देश की खाली झोली रत्नों से भर जायेगी
प्यारा-प्यारा नाम हमारा
नया निराला काम हमारा
सच कहते हैं इतिहासों में, सोने से लिखवायेगें
आजादी के रखवाले हम भारत नया बनायेंगें
भाई हँसते गाते
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हम पर गौरव होगा तुमको, मानो या मत मानो रे
ऊषा के आँचल में उगते, सूरज को पहिचानो रे
ये किरणें हैं जग उजियारी
कहाँ रहेगी अब अँधियारी
हर मुश्किल से लोहा लेंगे, पीठ नहीं दिखलायेंगे
आजादी के रखवाले हम, भारत नया बनायेंगे
भाई हँसते गाते.....
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जूझ रहा है हिन्दुस्तान
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मालव लोक साहित्य परिषद्, उज्जैन (म. प्र.)
प्रथम संस्करण 1963.  2100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन (म. प्र.)










यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। 
‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। 
रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।





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