मेहनत करवा वारा मरदाँ

  


श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की तेईसवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



मेहनत करवा वारा मरदाँ

मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो, उतरो गहरा ज्ञान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में

एक जुद्ध जीतीग्या रे जोद्धा, मचक गुलामी देईगी
(पण) दारीद्दर का भर्या टोबला, व्हा लारे न्हीं लेईगी
(तो) हिम्मत की तरवाराँ रे मरदाँ, मती मेलो थी म्यान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकरयाँ जइर्यो

जूनी नाव जुगत जोड़ी ने, भम्मर में ती काड़ी
थाँ के हाथ में डाँड देई ने, पोढ़ीग्यो खेलाड़ी
नाव फसी न्हीं जारे रे नावड़्या, फेर पाछी तूफान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो

जद-जद माँ की आँखाँ छलकी, थाँ ने शीश कटाया
महूँ मानू हूँ म्हारी माँ बेनाँ ने, कुल का रतन लुटाया
पण चार चँदरमाँ और लगई लो, देई ने पसीनो दान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो

गाम गोयरे कल-कल नद्दी, विफरी-विफरी वेऽईरी
थारा गाम की अनधन लछमी, चौड़े धाले जईरी
जल बिन आँसूड़ा ढारे रे घराणी, गोड़ा-गोड़ा धान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो

ऊँची मेड़्याँ, टूटा छपरा, या सब प्रभु की माया
पण ऊँच-नीच, कंगाल-मातबर सब एक माँ का जाया

यूँ कई फरक करे रे वेंडा, एक जरणी का थान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो

चेतो रे बारक चेतो रे बूढ़ा, चेतो रे मोट्याराँ
ई दन पाछा न्ही आवेगा, जामण ने सिणगाराँ
श्रम का गीत गुँजाओ म्हारी बेन्याँ, खेत, खदान, अडाण में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगला मोहरत निकर्याँ जईर्यो

देव-देवरा वारा पण्डत, हुणजे रे हेलो म्हारो
ओ मज्जित का काजी-मुल्ला, मानूँगा जस थारो
नवा बोल ई जोड़ी दी जो, आरती और अजान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन





यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।

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