बैठे-बिठाए मिल गई यह गाथा (कच्छ का पदयात्री भाग एक)











समर्पण

रोमांच
की प्यास लिये
भटकती हुई
किशोर पीढ़ी को
(जो वास्तव में
संघर्षों के कच्छ के रन
में रास्ता ढूँढ़ रही है)
शुभकामनाओं सहित
समर्पित।
-----

मेरी बात

एक उम्र होती है जिसमें आदमी प्रताड़ित होता है, घबराता है, टूटता है, पलायन करता है पर उसकी जीवट उसे निराशा से बार-बार बाहर खींचती है। तब वह कुछ न कुछ कर बैठता है। अज्ञात दिशाओं में अपनी यात्राएँ शुरु करके भी कोई दिशा ले बैठता है। इस पुस्तक के नायक ने ऐसा ही कुछ किया है। जो भी पढ़ेगा, उसे ऐसा लगेगा कि जीवन में कभी न कभी उसे भी इस तरह के ‘कच्छ’ में भटकना पड़ा है। अनिश्चित यात्रा का समापन जब जय-यात्रा में होता है तब जिन्दगी निखर आती है। अस्तु,

यह पृष्ठ लिखते समय तक दादा हमारे बीच में स्वस्थ-प्रसन्न हैं। ईश्ववर उन्हें दीर्घायु दे।

--बालकवि बैरागी
 
 -----
 
 
बैठे-बिठाए मिल गई यह गाथा 
(कच्छ का पदयात्री भाग एक)

‘दादा’ के साथ आप दस बरस रह लीजियेगा, वे आप पर छाप नहीं छोड़ते। मेरा-उनका परिचय कोई बीस वर्ष से है पर मैं भी उनसे प्रभावित नहीं हुआ। हम उनके निकट के लोग उनको दादा कहते हैं। ‘दादा’ के अर्थ अलग-अलग अंचलों में अलग-अलग होते हैं। बम्बई की भाषा में दादा का मतलब गुण्डे और असामाजिक व्यक्ति से लिया जाता है, पर हमारे मालवा में बड़े भाई को ‘दादा’ कहा जाता है। हमारे यहाँ यह सम्बोधन आदर का सूचक है। शायद मराठी में भी ‘दादा’ का अर्थ आदरसूचक ही होगा। उनके परिवार में उनके बच्चे भी उनको ‘दादा’ ही कहते हैं। परिजनों के सिवाय जान-पहचान वाले उनको ‘नाडकर्णी साहब’ कहते हैं पर वे इस सम्बोधन को उदासीनता से लेते हैं। नाम उनका है गोविन्द राव  नाडकर्णी पर मैं उन्हें दादा ही लिखूँगा।

अप्रैल और मई 1968 हमारे देश की राजनीति में कच्छ के नाम पर महत्वपूर्ण माने जायेंगे । भारत की कई राजनैतिक पार्टियों ने कच्छ कीे धरती के लिए सत्याग्रह और अन्य तरह के आन्दोलन किये। उन्हीं दिनों एक शादी समारोह में दादा और हम इकट्ठे मिल गये। सदा की तरह मैंने दादा की इस स्थिति को भी साधारण ही लिया और हम लोग चाय पीते- पिलाते गपशप करते रहे। तभी दैनिक अखबार आ गए और जिसके हाथ में जो अखबार लगा, वह उसी में खो गया। संसद में उस दिन शायद कच्छ के सत्याग्रहियों के साथ सरकार के व्यवहार पर गरमा-गरमी हुई थी और महत्वपूर्ण समाचार यह था कि सरकार इन सत्याग्रहियों को कच्छ के रन में दो-चार मील भीतर प्रवेश करने के बाद पकड़ती है। बाज सत्याग्रही तो सात-सात मील पैदल भी चले हैं और वहाँ की जानलेवा लू और गर्मी ने कई को बेहोश तक कर दिया था। मैंने देखा कि समाचार पढ़ते-पढ़ते दादा एकाएक गम्भीर हो गये और फिर एक मुसकराहट उनके भद्दे होंठों पर फैलकर लुप्त हो गयी। मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी। उनकी इस मुद्रा को देखते ही समझ गया कि दादा कहीं कुछ कहना चाहते हैं। मैंने साधारण-सा सवाल किया कि इस समाचार पर मुसकराने का उनका मतलब क्या है। शायद दादा उस दिन कुछ जल्दी में थे, कुछ टालते-से लगे। मैंने नरम नस पकड़ ली। चाय का एक प्याला और उनके लिए मँगवाकर समय लिया। कहने लगे, ‘कच्छ के बारे में जब समाचार पढ़ता हूँ तो मुझे रोमांच हो आता है। लगता है मेरे घर का कोई समाचार देख रहा हूँ।’ मुझे थोड़ा सा अचरज हुआ। पूछा, ‘दादा, आपका कच्छ से क्या रिश्ता है?’ दादा सहज गम्भीर हुए और कहने लगे, ‘भैया, मैंने कच्छ को चौड़ाई में 36 मील पैदल पार किया है। आज जब वहाँ पद-यात्रियों का दल जाकर हताश होता है तो मुझे हँसी आती है। कुल 17 वर्ष की उम्र में मैंने जिस जीवट और उमंग के साथ कच्छ के रन की छाती पर अपने युवा पैरों की छाप छोड़ी है उनको देखने का मन इन समाचारपत्रों ने फिर से जगा दिया है।’

मैं और मेरे आसपास बैठे सभी लोग सन्नाटे में आ गये। कहाँ तो अखबारों मे कच्छ रन की भीषणता और भयानकता का वर्णन, कहाँ संसद में हंगामे और कहाँ दादा का सहज कथन - ‘कच्छ का रन मैंने पैदल पार किया है’। यह उन्होंने इतनी आसानी से कहा जैसे आपका कोई बालक कुल्फी खाने की बात कहता हो। हम सबकी दिलचस्पी दादा में खासी हो गयी और में प्रश्न करने उद्यत हो गया। दादा ने मेरी उत्सुकता को समझा और वे भी उत्तरों के लिए तैयार हो गये। अखबारी भाषा में इसे इण्टरव्यू कहते हैं, यह दादा को आज तक पता नहीं।

आप दादा को देखें तो एक निरा साधारण देहाती अनुमान ही आप लगा पायेंगे। न उनके कपड़े सलीके के, न उनका पहनावा व्यवस्थित। इस समय वे मध्यप्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग में सहायक शाला निरीक्षक हैं पर मुझे तो वे साधारण शिक्षक का आभास भी नहीं देते हैं। न वे कारकून लगे, न बाबू। अफसर तो वे सात जन्म भी नहीं लगेंगे। जिन्दगी जीने की उनकी रफ्तार इतनी विचित्र है कि उनका व्यक्तित्व कभी बन ही नहीं पायेगा। बात करेंगे तो अपने आप पर मजाक ज्यादा कर बैठेंगे। उनके विनोद की पात्र हमारी जीजी ज्यादा होती है। जीजी का मतलब है उनकी पत्नी से। अपने आप में इतना बड़ा मजाक है कि वे तो दादा और उनकी पत्नी जीजी। दादा का मतलब बड़ा भाई और जीजी का मतलब बड़ीे बहन। दादा इस मजाक को भी ठाट से ठहाके के साथ कर लेते हैं। भगवान ने उनको सौंन्दर्य या सुन्दरता नाम की चीज दी ही नहीं। न दादा खूबसूरत, न हमारी जीजी सलौनी। दादा के चेहरे पर भद्दे चेचक के दाग और घनी भौंहें, कड़े बालों की दाढ़ी और मूँछ सफाचट। कभी दो-चार दिन दाढ़ी नहीं बने तो दादा डरावने हो आ्यें। आज दादा 55 साल के हैं पर बदन उनका सख्त और गठा हुआ लगता है। उम्र उनसे पल-पल लड़ रही है पर दादा अ्रपनी सहज भाषा में ‘जा स्साली!’ कहकर उम्र को बगली मार रहे लगते हैं। हाँ, दादा के जबड़े आपको हमेशा भिंचे और कसे दिखाई पड़ेंगे। यही एक निशानी है जिससे लग सकता है कि दादा जो भी संकल्प कर लेंगे, उसे पूरा पटक जायेंगे। बोली में प्रकृति ने उनको मिठास दी है। मर्द को मीठा बोल बड़ी मुश्किल से मिलता है। पर दादा के पास वह पूँजी है। विनोद और विनोद के साथ उनका मीठा स्वर तथा फक्कड़ों-सा बात करने का लहजा दादा के पास अखूट है। उनसे यदि आपने बोल उगलवा लिया तो फिर दादा आपको निहाल कर देंगे पर अगर उनका बोल नहीं फूटा तो फिर मुश्किल है। आश्चर्य इस बात का है कि अपनी जिन्दगी को साँस-साँस संघर्ष में डुबाने वाले दादा को भगवान ने चुप रहने की ताकत भी जबरदस्त दी है। अमूमन ऐसे आदमी वाचाल और खुद के भाँड हो जाते हैं, पर दादा जाने-अजाने इस शक्ति की साधना बराबर करते आ रहे हैं। दादा अपनी ओर से नहीं बोलते। वे शहद के छत्ते की तरह हैं। आप हल्का-सा सूराख शहद के गर्भ में कर दीजियेगा, आपकी हँडिया टप-टप करके पूरी भर जायेगी। बात करते-करते वे यदि अपने सिपाहियाना बालों पर एक दो-बार हथेली फिरा लें तो समझ लो कि दादा मूड में हैं। तारीफ वे अपनी या परायी कभी पसन्द नहीं करते और जब वे अपने पहलवान कट बालों को हथेली से दबाकर शेप देने लगते हैं तो फिर मान लीजियेगा कि दादा घड़ी-अध-घड़ी सब कुछ सुनने-कहने को तैयार हैं। उनके कानों पर भी लम्बे-लम्बे बाल हैं औेर बात करते-करते वे कभी-कभार उन बालों को सुध भी ले ही लेते हैं। दादा का व्यक्तित्व बड़ा ही बेमजा और बेशेप है। पर जब मैंने अपने 8 वर्षीय पुत्र को दादा की तस्वीर बताकर पूछा कि यह आदमी उसेे कैसा दिखाई देता है तो उस मासूम बालक ने जो उत्तर दिया उसने भी मेरी आँखें खोल दीं। उसने कहा कि यदि इनकी बुशर्ट हटा दी जाए तो यह आदमी उसको सन्त या सन्यासी महाराज जैसा लगेगा। यदि आप दादा को देखते तो मेरी तरह आप भी बच्चे की इस बात से सहमत होते। दादा ने अपनी यह महान् दुस्साहसी यात्रा एक साधु के वेश में ही की है। यह सहज बात है कि किशोरावस्था में गेरूआ पहन कर सैंकड़ों मील पैदल चलना और कच्छ जैसे प्राणलेवा रन को पदयात्री के रूपमें पार करना तथा फिर रिटायरमेण्ट के बाद सन्यासी बन कर शेष जिन्दगी गुजारने का अरमान सँजोनेवाले दादा के मानस में गेरूआ वस्त्र एक संस्कार की भाँति घर कर गया है। जिसने दादा को नहीं देखा वह भी उनको सन्यासी जैसा ही मानता है। दादा के बदसूरत और बर्नार्ड शा कीे तरह भद्दे चेहरे पर उम्र की रेखाएँ घनी और गहरी हैं। पर उनसे भी दादा का जीवट ही बोलता है।

जब मैंने उनसे पूछा कि कच्छ पैदल पार करने की नौबत उन पर क्यों आयी तो दादा को अपनी स्मृति को पीछे नहीं ले जाना पड़ा। एक मुस्तैद और सजग-सतर्क विद्यार्थी को तरह वे सिलसिलेवार शुरु हो गये। 






किताब के ब्यौरे -
कच्छ का पदयात्री: यात्रा विवरण
बालकवि बैरागी
प्रथम संस्करण 1980
मूल्य - 10.00 रुपये
प्रकाशक - अंकुर प्रकाशन, 1/3017 रामनगर,
मंडोली रोड, शाहदरा, दिल्ली-110032
मुद्रक - सीमा प्रिंटिंग प्रेस, शाहदरा? दिल्ली-32
कॉपीराइट - बालकवि बैरागी



यह किताब, दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती रौनक बैरागी याने हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराई है। रूना, राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य है और इस किताब के यहाँ प्रकाशित होने की तारीख को, उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।

8 comments:

  1. प्रणाम सर जी... मैं सचिन नाडकर्णी.... श्री गोविंद नाडकर्णी जी का पोता हू... आपसे बात हो सके तो बहुत आभारी रहूँगा... मेरा नंबर 8200680469 /9408063400

    ReplyDelete
  2. बहुत बहुत धन्यवाद सर जी.... मैं दादा श्री गोविंद नाडकर्णी जी का पोता हू और आपसे बात करना चाहता हू... मेरा नंबर 8200680469/9408063400

    ReplyDelete
    Replies
    1. सबसे पहले तो ब्‍लॉग पढने के लिए धन्‍यवाद। लगातार पढते रहना। बारहवें भाग में नाडकर्णी परिवार के बारे में काफी-कुछ सामग्री रहेगी।
      तुमसे बात करके मुझे भी खुशी होगी। मेरा नम्‍बर 98270 61799 है।

      Delete
  3. आदरणीय कामा (जैसा कि मैं बचपन से आपको संबोधित करता आया हूँ, काका और मामा का सम्मिलित रूप), पूरा नाडकर्णी परिवार आपका हृदय से आभारी है, बालकवि अंकल द्वारा रचित इस पुस्तक की पुनः प्रस्तुति द्वारा मेरे दादाजी की युवावस्था की इस प्रेरक कथा को पुनः पाठकों तक पहुंचाने हेतु। बालकवि अंकल तो जीवन मे सदैव प्रेरित करते रहे हैं, मेरा नाम यतीन्द्र उन्होंने ही रखा था मनासा में। आपसे शीघ्र मुलाकात का आकांक्षी हूँ।
    सादर चरण स्पर्श,
    यतीन्द्र नाड़कर्णी

    ReplyDelete
  4. प्रिय बण्टी,

    इसमें आभार जैसी कोई बात ही नहीं है। यह सब मैं अपनी प्रसन्नता और आत्म-सन्तोष के लिए कर रहा हूँ। अच्छा काम करना, इत्र-विक्रेता जैसा सुख देता है - जो भी सम्पर्क में आता है, सुवासित होकर लौटता है।

    यह कथा है ही अद्भुत। यह रोमांचित तो करती ही है, असाध्य को साधने की ललक भी पैदा करती है, प्रेरणा और हिम्मत देती है। इस कथा में जिस बात ने मुझे विस्मित किया वह है, दादा का ‘आब्जर्वेशन’ और स्मरण शक्ति। उस किशोर-वय में उन्होंने यात्रा के दौरान अपने आसपास की कितनी बातों, चीजों, स्थितियों को, कितने सूक्ष्म-विस्तृत रूप से देखा और इतने लम्बे समय बाद जस-का-तस याद भी रखा! दादा ने हिंगलाज माता के मन्दिर का और मूर्ति की स्थिति का जो ब्यौरा दिया, वह हू-ब-हू समान है। दादा की मेधा ने मुझे इस वृतान्त के शब्द-शब्द पर चौंकाया।

    इस श्रृंखला का अठारहवाँ भाग पूरी तरह से ‘नाडकर्णी परिवार’ पर केन्द्रित है। उसी में तुम सबके मनासा प्रवास का उल्लेख भी है और ‘कामा’ की कथा भी।

    तुमने मिलने की कामना की है। देखें, ईश्वर ने क्या तय किया हुआ है।

    अभी तो तुम सन्तु भैया के 75वर्षीय जलसे की तैयारी में व्यस्त होगे। उन्हें और शोभा भाभी को मेरे नमस्कार कहना।

    खूब खुश रहो।
    विष्णु।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी अवश्य। आजोबा से इस कथा को विस्तार से सुनने का सौभाग्य सभी पोते पोतियों में से मुझे प्राप्त हुआ है। उनका आशीर्वाद आज भी महसूस करता हूँ। आपका आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु आपसे शीघ्र मिलने का प्रयास करूंगा।
      सादर चरण स्पर्श।
      आपका,
      बंटी

      Delete
  5. अद्भुद व्यक्तिव रहा नाड़कर्णी जी और बैरागी जी का....

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.