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‘नागरिक’ को मिल गया नल कनेक्शन


न तो गुस्सा न ही शिकायत। न ही उपहास। बात कोई अनूठी भी नहीं। ऐसा केवल रतलाम में ही नहीं हुआ। सब जगह होता होगा। लिखने का भी कोई मतलब नहीं। लिख कर भी क्या होगा? एक आदमी हो तो सुधारने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन व्यवस्था को बदलने की कोशिश करना तो दूर, ऐसी कोशिश करने की सोचना भी निरी मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं। 


अपने रतलाम के एक ‘नागरिक’ को अपने घर के लिए नल कनेक्शन चाहिए था। वह नगर निगम दफ्तर गया। जल विभाग में मिला। सबने भाव खाया। किसी ने भाव नहीं दिया। बार-बार ‘हुजूर! माई बाप!’ किया लेकिन किसी पर कोई असर नहीं। अहसान करते हुए, अकड़कर जवाब दिया - ‘कम से कम तीन सप्ताह लगेंगे और रोड़ कटिंग तथा दूसरे खर्चों का लगभग दस हजार खर्च आएगा।’ ‘नागरिक’ ने कहा कि रकम पर वह सहमत है लेकिन कनेक्शन जल्दी चाहिए। लेकिन तीन सप्ताह से नीचे उतरने को कोई तैयार ही नहीं हुआ।

निराश, रुँआसी मुद्रा में ‘नागरिक’ बाहर आया। नगर निगम की सीढ़ियों पर खड़ा-खड़ा दाढ़ी खुजला रहा था कि एक आदमी सामने आया। बोला - ‘कनेक्शन फटाफट हो जाएगा और रुपये भी चार हजार से अधिक नहीं लगेंगे।’ ‘नागरिक’ को भरोसा नहीं हुआ। उसे ठगी की कई घटनाएँ याद आ गईं। लगा, कोई उसे दस लाख की लॉटरी खुलने की खबर देकर रकम जमा कराने के लिए उससे बैंक खाता नम्बर पूछ कर उसकी रकम हड़पने की कोशिश कर रहा है। उसने अविश्वास से देखा। ‘आदमी’ ने कहा - ‘पहले कनेक्शन करवा लो। पैसे बाद में देना।’ अब ‘नागरिक’ के पास इंकार करने का कोई कारण नहीं था।

‘नागरिक’ के साथ ‘आदमी’ बाजार गया। नल कनेक्शन का सामान खरीदा। अपने एक सहायक के साथ ‘नागरिक’ के घर आया। दिन-दहाड़े, चौड़े-धाले सड़क खोदी, वाटर सप्लाय की मेन लाइन तलाश की और कुछ ही घण्टों में नल कनेक्शन कर दिया। ‘नागरिक’ पूरा भुगतान करने लगा तो ‘आदमी’ बोला - ‘मुझे पाँच सौ और इस हेल्पर को दो सौ दे दो। फिर आगे की बात बताता हूँ।’ ‘नागरिक’ ने आँख मूँदकर कहना माना।

अपनी मजदूरी लेकर ‘आदमी’ ने कहा - ‘अपने मोहल्ले के किसी आदमी से शिकायत करा दो कि तुमने अवैध नल कनेक्शन कर लिया है। शिकायत के दो दिन बाद नगर निगम चले जाना। अवैध नल कनेक्शन लेने का गुनाह कबूल करके कनेक्शन को वैध कराने की अर्जी दे देना। बत्तीस सौ रुपयों में कनेक्शन वैध हो जाएगा।’ ‘नागरिक’ ने अविश्वास से देखा तो ‘आदमी’ ने उसकी पीठ थपथपा कर भरोसा दिलाया।

‘नागरिक’ ने वैसा ही किया जैसा ‘आदमी’ ने बताया था। अपनी शिकायत करवाई और चौथे दिन नगर निगम पहुँच गया। अपना गुनाह कबूल किया। कनेक्शन को वैध कराने की अर्जी लगाई। थोड़ी लिखा-पढ़ी हुई। उससे बत्तीस सौ रुपये माँगे गए। ‘नागरिक’ ने फौरन दे दिए। हाथों-हाथ पूरी रकम की रसीद दे दी गई और उसका नल कनेक्शन वैध हो गया।

किस्सा यहीं खतम हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हुआ। 

बत्तीस सौ की रसीद घड़ी करके ‘नागरिक’ जेब में रखकर निकलने ही वाला था कि उसे ‘नेक सलाह’ दी गई - ‘एक अर्जी लिख दो कि तुम्हें यह कनेक्शन नहीं चाहिए। सील-ठप्पे लगवा कर अर्जी की पावती लो और  हर महीने के डेड़ सौ रुपये देना भूल जाओ। चैन की नींद सो जाओ।’ ‘नागरिक’ को बात समझ में नहीं आई। सलाहकार ने कहा - ‘अरे! तुम अर्जी दे जाओ। हमें कनेक्शन काटने की फुरसत नहीं। ठाठ से पानी वापरो और जब रकम वसूल करनेवाले आएँ तो अर्जी की, सील-ठप्पेवाली पावती बता देना। कहना कि तुमने तो कनेक्शन कटवा लिया। अब पैसा किस बात का?’

‘नागरिक’ की आँखें फट गई - ‘अरे बाप रे! ऐसा भी होता है?’ लेकिन ‘नागरिक’ बोला - ‘नहीं भैया! मुझे तो नल कनेक्शन चाहिए था। जो खर्चा बताया था उसके चालीस परसेण्ट में ही हो गया। यही बहुत है। पानी की चोरी नहीं करूँगा।’ और इस तरह अपने ‘नागरिक’ को नल कनेक्शन मिल गया। 

जैसे हमारे इस ‘नागरिक’ के दिन फिरे, वैसे सबके दिन फिरें।
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एक आदमी के दो एड्रेस प्रूफ दीजिए

यह ‘बाबू राज’ का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसकी शिकायत भी नहीं की जा सकती क्योंकि सुननेवाला कोई नहीं है।

मामला भारत सरकार के एक उपक्रम के कार्यालय का है। इसके एक आवेदन में, आवेदक को दो पते देने की व्यावहारिक सुविधा उपलब्ध कराई गई है - एक पता पत्राचार का और दूसरा पता स्थायी या आवासीय पता। जाहिर है, आवेदन फार्म का प्ररूप बनाते समय यह व्यावहारिक सुविचार सामने आया होगा कि कोई आदमी रहता कहीं और होगा और काम कहीं और करता होगा। मुझे यह प्रावधान सराहनीय लगा। 

सरकार ने डाक विभाग को दयनीय दशा में ला खड़ा कर दिया है। किसी भी शहर में डाकियों के पूरे पदों पर भर्ती नहीं है। मेरे रतलाम में ही कई डाकियों को दो-दो, तीन-तीन बीटों की जिम्मेदारी दी हुई है। ऐसे में वे चाह कर भी अपना रोज का काम रोज पूरा नहीं कर पाते। सब तरह के लोग सब जगह होते हैं। कस्बे के बाहरी इलाके के कुछ डाकिए सप्ताह में एके दिन डाक बाँटते हैं। ऐसे में, उक्त प्रावधान लोगों को अत्यधिक अनुकूल और सुविधाजनक है। कस्बे के बाहरी इलाकों में रहनेवाले लोग अपने काम-काजी स्थल का पता दे कर अपनी चिट्ठियाँ प्राप्त करने की सुनिश्चितता हासिल कर सकते हैं। 

लेकिन इस दफ्तर के बाबू ने इस सराहनीय भावना और व्यवस्था की ऐसी-तैसी कर रखी है। उसका कहना है कि आवेदक जो भी पता देना चाहे, खुशी-खुशी दे। लेकिन आवेदक को ऐसे प्रत्येक पते का दस्तावेजी प्रमाण देना पड़ेगा। उदाहरण के लिए मैं यदि अपना पत्राचार का पता बाजार में अपनी बैठकवाले किसी व्यापारिक संस्थान का देना चाहूँ तो मुझे अपने उस पते का दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ेगा। ऐसा कर पाना मेरे लिए सम्भव ही नहीं। मेरे आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, ड्रायविंग लायसेंस, पासपोर्ट आदि में मेरा स्थायी आवासीय पता अंकित है। बाजार में स्थित मेरे मित्र के व्यापारिक संस्थान पर तो मेरी बैठक है जहाँ प्रतिदिन डाक वितरित होती ही है। जबकि, मेरे आवासीय इलाके का डाकिया कभी-कभी (दूसरी बीट की डाक निपटाने के कारण) मजबूरी में गैरहाजिर रह जाता है।

भारत सरकार के उपक्रम का यह बाबू इन सारी बातों को व्यक्तिशः तो मानता और कबूल करता है। लेकिन आवेदन को आगे बढ़ाने के मामले में अड़ जाता है। बड़ी ही विनम्रता से कहता है - ‘मैं पता लिखने से मना तो तो नहीं कर रहा ना? लेकिन मैं तो सरक्यूलर से बँधा हुआ हूँ जो कहता है कि मैं वही पता लिखूँ जिसका दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध कराया गया है। आप सरक्यूलर देख लो।’ वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं। उसे समझाने की कोशिश की - ‘भाई मेरे! प्ररूप की भावना को समझने की कोशिश करो। एक आदमी के दो-दो पतों के दस्तावेज कैसे हो सकते हैं? स्थायी पते का दस्तावेजी सबूत दे तो रहे हैं! पत्राचार के पते का दस्तावेजी प्रमाण कैसे जुटाया जा सकता है?’ बड़ी विनम्रमा से बाबू जवाब देता है - ‘देखो सा‘ब! मैं तो सरक्यूलर से बँधा हुआ हूँ। आप सरक्यूलर अमेण्ड करवा दो। आपका काम भी हो जाएगा और मेरा भी।’

ऐसे में, इस दफ्तर के इस आवेदन में लोगों को दोनों ही जगह एक ही पता लिखना पड़ रहा है। सरक्यूलर को अमेण्ड करवाने के मुकाबले यह बहुत-बहुत आसान है। सरकार अव्वल तो लोगों की सुविधा का ध्यान रखती नहीं। गलती से यदि रख भी लिया तो ‘बाबू’ उसकी ऐसी-तैसी कर देता है। 

यही ऐसी-तैसी यहाँ हो रही है।
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दुष्यन्त कुमार के ‘मुनासिब लोग’

हम पति-पत्नी के दो बैंकों में खाते हैं। पहला बैंक ऑफ बड़ौदा की स्टेशन रोड़ शाखा में और दूसरा भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की कलेक्टोरेट एरिया शाखा में। बड़ौदा बैंक में हमारा खाता बरसों से चल रहा है। किन्तु, श्रीमतीजी सरकारी नौकरी में थी। उनकी पेंशन एसबीआई की इसी शाखा से मिलनी थी। इसलिए यहीं खाता खुलवाने  बाध्यता थी। एसबीआई में हमेशा इतनी भीड़ रहती है कि घुसने की ही हिम्मत नहीं होती। तीन दिन चक्कर काटे लेकिन खाता नहीं खुला। अचानक ही मालूम हुआ कि शाखा प्रबन्धक, एलआईसी की हमारी शाखा मे पदस्थ विकास अधिकारी श्री संजय गुणावत के बड़े भाई हैं। उन्होंने मदद की। खाता फौरन ही खुल गया। 

जब-जब भी एसबीआई जाने की जरूरत हुई, जाने से पहले ही हिम्मत पस्त हो जाती। ईश्वर महरबान हुआ और एक कृपालु वहाँ पदस्थ मिले। उनका काम ऐसा कि सप्ताह में तीन दिन उन्हें शाखा से बाहर रहना पड़ता है। जाने से पहले तलाश कर लेता। वे वहाँ होते तो ही जाता। नहीं होते तो जाना टाल देता।

हम पति-पत्नी नेट बैंकिंग या ई-बैंकिंग अब तक नहीं सीख पाए। एटीएम कार्ड घर बैठे आया। बच्चों ने हिम्मत बढ़ाई और सिखाया तो एटीएम से रकम निकालनी शुरु की। पाँच-सात बरस से एटीएम का उपयोग कर रहा हूँ लेकिन रकम निकालते समय आज भी हाथ काँपते हैं। श्रीमतीजी तो एटीएम का उपयोग अब तक नहीं सीख पाईं। बड़ौदा बैंक के कुछ मित्रों ने ई-बैंकिंग के लिए खूब प्रोत्साहित किया। बार-बार आग्रह किया। हिम्मत कर ई-बैंकिंग सुविधा के लिए खानापूर्ति की। किन्तु पता नहीं, प्रक्रिया के किस चरण में मुझसे कहाँ चूक हुई कि पास वर्ड उलझ गया और ऐसा उलझा कि बैंक के तमाम जानकार मित्र जूझ-जूझ कर हार गए लेकिन पास वर्ड उलझा ही रहा। अब तक उलझा हुआ ही है। मैंने तो उलझन की शुरुआत में ही घुटने टेक दिए। उसके बाद से ई-बैंकिंग के नाम से धूजनी (कँपकँपी) छूटने लगती है।

इसी के चलते, अपने खाते के ब्यौरे जानने के लिए हम लोग पास बुक पर ही निर्भर बने हुए हैं। लेकिन एसबीआई से पास बुक छपवाना किसी युद्ध लड़ने से कम नहीं। खिड़की पर लम्बी लाइन। अपना नम्बर आए तो बाबू पास बुक लेते हुए, मुँह बिगाड़ कर, हड़काते हुए सलाह दे - ‘मशीन से क्यों नहीं छपवा लेते?’ मेरे पास कोई जवाब नहीं होता। परिचित सज्जन ने एक बार कह ही दिया - ‘यार! सरजी! आप पास बुक मशीन से छपवा लिया करो।’ उसके बाद उनकी मदद लेने की हिम्मत भी जाती रही। 

अब, पास बुक छपवाना मेरे लिए दुनिया का सर्वाधिक दुरुह काम बन गया। इधर श्रीमतीजी हैं कि महीना-दो महीना पूरे होते ही टोकने लगती हैं।

गए दिनों अचानक ही मालूम हुआ कि मित्र निवास रोड़ पर पास बुक छापने की एक नहीं दो-दो मशीनें लगी हैं। पुष्टि करने गया। देखा, बहुत ही आसानी से पास बुकें छपवा रहे हैं। मशीन भी बहुत बढ़िया - बराबर निर्देश भी देती है और प्रक्रिया की जानकारी भी। लेकिन वहाँ भी ल ऽ ऽ ऽ म्बी ऽ ऽ लाईन। देख कर छक्के छूट गए। मेरी दशा देख एक अनुभवी ने कहा - ‘रात नौ बजे के आसपास आईए। मशीनें खाली मिलेंगी।’ मेरा दिल बल्लियों उछल गया।

मैं बुधवार 14 नवम्बर की रात गया। एक सज्जन पास बुक छपवा रहे थे। मैं दूसरी मशीन की तरफ बढ़ा। उसके पर्दे पर मशीन के काम न करने की सूचना तैर रही थी। मैं, पास बुक छपवा रहे सज्जन के पीछे आ खड़ा हुआ। उनकी पास बुक छपते ही मशीन ने पास बुक लेने का सन्देश दिया। उन्होंने पास बुक निकाली। वे हटे। मैं मशीन के सामने खड़ा हुआ। लेकिन यह क्या? क्षमा याचना करते हुए मशीन के पर्दे पर, मशीन के काम न करने का सन्देश चमक रहा था। मैंने मुझसे पहलेवाले सज्जन से मदद माँगी। वे भी हैरत में पड़ गए। उन्होंने भी अपनी सूझ-समझ के मताबिक मशीन को टटोला, मेरी पास बुक ‘स्लॉट’ में डाली। किन्तु कोई हलचल नहीं हुई। सज्जन ने कहा कि कभी-कभी अचानक लिंक टूट जाने से या सर्वर में समस्या आ जाने से ऐसा हो जाता है। थोड़ी देर मे अपने आप ठीक हो जाएगा। मैं करीब बीस मिनिट वहाँ रुका रहा। फिर थक कर लौट आया। 

मैं गुरुवार 15 नवम्बर की रात फिर गया। लेकिन दोनों मशीनें पूर्ववत निश्चल, निष्क्रिय खड़ी थीं। शुक्रवार 16 नवम्बर की रात को फिर देहलीज पर मत्था टेका। लेकिन देवियाँ नहीं पिघलीं। शनिवार 17 नवम्बर को मैंने फेस बुक पर दो पोस्टों में अपनी व्यथा-कथा सार्वजनिक की। कुछ टिप्पणियाँ आईं। एक-दो ने बैंक की व्यवस्था को कोसा। बाकी  सबने एक भाव से नेट बैंकिंग अपनाने की सलाह दी। शनिवार की मेरी दूसरी पोस्ट पर मेरे प्रिय मित्र श्री राधेश्यामजी सारस्वत ने ढाढस बँधाया कि शनिवार को यदि पास बुक नहीं छपे तो सोमवार को वे हर हालत में मेरी पास बुक छपवा देंगे। सारस्वतजी बड़े प्रेमल व्यक्ति हैं। वे कलेक्टोरेट में सेवारत हैं और मेरी सहायता करने के अवसर तलाश करते रहते हैं।

इन चार दिनों (14 से 17 नवम्बर) में श्रीमतीजी ने अपने पास बुक प्रेम के अधीन मुझे उलाहने देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हर उलाहने का अन्त एक ही वाक्य से हुआ - ‘आपसे इतना सा काम भी नहीं होता? हुँह!’

शनिवार को भी मशीनें बन्द की बन्द ही मिलीं। रविवार को मैंने सारस्वतजी को फोन किया - ‘पास बुक कहाँ पहँचाऊँ?’ उन्होंने कहा कि वे सोमवार सुबह मेरे घर आकर पास बुक ले लेंगे। सोमवार सुबह दस बजे वे आए। पास बुक ली। चले गए। ग्यारह बजते-बजते उनका फोन आया - ‘सर जी! पास बुक छप गई। फोटू वाट्स एप कर रहा हूँ।’ शाम को वे घर आकर पास बुक दे गए। (यह पूरा किस्सा फेस बुक पर मेरी वाल पर 17 और 19 नवम्बर को विस्तार से दिया हुआ है।)

बात यहीं खतम हो जानी चाहिए। लेकिन यह ब्यौरा तो मेरी मूल बात की भूमिका है। मेरी बात तो यहीं से शुरु होती है। 
जैसा कि मैंने कहा है, सत्रह नवम्बर की मेरी दोनों फेस बुक पोस्टों पर और काम हो जाने के बाद 19 नवम्बर वाली फेस बुक पोस्ट पर आई टिप्पणियों में दो-एक मित्रों ने ही बैंक के प्रति खिन्नता जताई। बाकी सबने मुझे ई-बैंकिंग और/या नेट बैंकिंग अपनानेे की न केवल सलाह दी अपितु इसके फायदे भी समझाए। मेरे ऐसा न करने पर दो-एक कृपालुओं ने तो यथेष्ठ खिन्नता भी जताई।

मैं भली प्रकार जानता हूँ कि इन सारे मित्रों ने मेरी चिन्ता करते हुए, मुझे कष्ट न हो, बैंक पर मेरी निर्भरता समाप्त करने के लिए मुझे यह नेक सलाह दी। लेकिन मुझे ताज्जुब हुआ कि समुचित सेवाएँ न देने के लिए इनमें से किसी ने बैंक की आलोचना करना तो दूर, बैंक का नाम भी नहीं लिया।

यह, व्यवस्था के प्रति हमारी हताशाभरी उदासीन मानसिकता का नमूना है। हमने व्यवस्था के सामने घुटने टेक दिए हैं। हमने मान लिया है कि अपने ग्राहकों के साथ बैंक का व्यवहार तो ऐसा ही रहेगा। न तो वह सुधरेगी न ही हम उसे सुधार सकेंगे। यह हमारी हताशा का चरम है कि उसे सुधार की, उसके दुरुस्त होने की बात ही हमारे मन में आनी बन्द हो गई है। मुझे नेट/ई-बैंकिंग अपनाने की सलाह देते हुए मेरे तमाम कृपालु मित्र यह याद ही नहीं रख पाए कि बैंक अपने ग्राहकों को पास बुकें जारी कर रहा है और उन्हें छापने के लिए मँहगी स्वचलित मशीनें लगवाए चला जा रहा है। जाहिर है कि बैंक स्वीकार कर रहा है कि ग्राहक को यह सेवा देना अभी भी उसकी जिम्मेदारियों में शामिल है। लेकिन हमने हार मान ली है। क्रूर व्यवस्था से परास्त होना हमने अपनी नियती मान ली है। एक दुःखी उपभोक्ता के समर्थन में खड़े होने के बजाय सब उसे समझा रहे हैं - 
‘खुुुद ही सुधर जाओ भाई!’ 

यह सब याद करते हुए मुझे दुष्यन्त कुमार याद आ गए। बरसों-बरस पहले वे कह गए हैं -

न हो कमीज तो घुटनों  से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए

जहाँ हमें रीढ़ की हड्डी तानकर खड़े होना चाहिए वहाँ हम विनयावनत हो खुद को बदल लेते हैं। व्यवस्था को और चाहिए ही क्या?

हम (इस ‘हम’ में मैं भी शरीक हूँ) दुष्यन्त कुमार के ये ही ‘मुनासिब लोग’ हैं।
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मेरी छपी हुई पास बुक देने के लिए मेरे घर आए श्री राधेश्यामजी सारस्वत। 
भगवान इनका भला करे। 

रॉकेट की यात्रा, बैलगाड़ी में बैठकर

हम दोनों, पत्नी-पति के नाम पर डाक घर में पाँच आवर्ती जमा (आर. डी.) खाते  हैं। डाक घर की बचत योजनाओं के एजेण्ट मित्रों की मदद से ये खाते चल रहे हैं। कोई तीन महीने पहले, इन एजेण्ट मित्रों ने एक के बाद एक कहना शुरु किया कि हमें डाक घर में बचत खाता अनिवार्यतः खुलवाना पड़ेगा क्योंकि डाक घर से अब न तो नगद भुूगतान मिलेगा न ही चेक से। इन मित्रों को मैंने बताया कि हमारे खाते पहले से ही दूसरे बैंकों में हैं। अब कहीं और नया खाता खुलवाने का कोई औचित्य नहीं है। डाक विभाग चेक न दे, हमारे खाते में नेफ्ट के जरिये भुगतान कर दे। लेकिन एक के बाद एक, पाँचों ने कहा कि डाक विभाग नेफ्ट से भी भुगतान नहीं करेगा। डाक घर में ही खाता खुलवाना पड़ेगा।

बात मेरी समझ में बिलकुल ही नहीं आई। तमाम आय-कर सलाहकार कहते हैं कि लोगों को कम से कम बैंक खाते रखने चाहिए। मुमकिन हो तो एक ही खाते से काम चलाना चाहिए। लेकिन यहाँ सरकार का ही एक विभाग जबरन खाता खुलवाने पर तुला हुआ है। मुझे लगा कि शायद इन एजेण्टों को नए खाते खुलवाने का ‘टार्गेट’ दे दिया गया है और प्रत्येक एजेण्ट अपने-अपने आवर्ती खाते के लिए हमारा अलग-अलग बचत खाता खुलवाना चाह रहा है। याने पाँच बचत खाते। लेकिन मेरा यह अनुमान गलत निकला। कहीं कोई टार्गेट नहीं था। हमें एक ही बचत खाता खुलवाना पड़ेगा। मेरे गले बात उतर ही नहीं रही थी।

मैं सीधा, प्रधान डाक घर के मुख्य डाक पाल से मिला। उन्होंने एजेण्टों की बात दुहराई - ‘यदि भुगतान लेना है तो आपको डाक घर में ही बचत खाता खुलवाना पड़ेगा।’ मैंने समझाने की कोशिश की तो वे अत्यधिक विनम्रता से बोले कि उन्हें मेरी बात समझ में आ रही है कि हम दोनों के नाम पर पहले से ही दूसरे बैंकों में खाते चल रहे हैं और हम चाह रहे हैं कि डाक विभाग नेफ्ट से हमारे खातों में हमारा भुगतान भेज दे। ‘लेकिन सर! इट इज नॉट पॉसिबल। आपको यहाँ खाता खुलवाना ही पड़ेगा। उसके बिना हम आपको पेमेण्ट नहीं कर पाएँगे।’ - उन्होंने शान्त स्वरों में कहा। वे तो शान्त थे लेकिन उनकी बात से मुझे चिढ़ आ गई। मुझे लगा, वे मेरे साथ ‘अफसरशाही’ बरत रहे हैं। मैंने कहा - ‘अजीब जबरदस्ती है! मेरा खाता पहले से बैंक में है। आप एक और खाता खुलवाने पर तुले हैं। मैं एक खाता और क्यों खुलवाऊँ? नहीं खुलवाना मुझे खाता।’ वे तनिक भी असहज या विचलित नहीं हुए। बोले - ‘यह तो आप ही तय करेंगे सर! लेकिन हमारी मजबूरी है कि हम आपको भुगतान तब ही कर सकेंगे जब आप डाक घर में बचत खाता खुलवा लें। आपके किसी और बैंक खाते में हम भुगतान नहीं कर सकेंगे।’

खुद पर नियन्त्रण रख पाना मेरे लिए पल-पल कठिन होता जा रहा था। धैर्य साथ छोड़ने को उतावला हुआ जा रहा था। तनिक ऊँची आवाज में मैंने कहा - ‘अजीब मनमानी है! ऐसा कोई आदेश है आपके पास?’ उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप अपना ड्राअर खोला और दो पन्ने मुझे थमा दिए। यह कहते हुए - ‘मुझे, यह आदेश मिलते ही लग गया था कि कभी न कभी, कोई यह सवाल जरूर करेगा। लीजिए! आप खुद ही पढ़ लीजिए।’ मैंने आदेश पढ़ा और मेरी बोलती बन्द हो गई। दोनों बातें साफ-साफ लिखीं थी - डाक घर से किया जानेवाला कोई भी भुगतान नगद या चेक से नहीं किया जाए और डाक घर के बचत खाते में ही भुगतान किया जाए। मेरे सुर बदल गए। मुख्य डाकपालजी से हो रहे सम्वादों में खिसियाहट और झेंप घुल गई। गर्मी खाने और अकड़ दिखाने पर शर्म भी आई। लेकिन गुस्सा कम नहीं हो रहा था। एक ओर तो डाक विभाग अपने तमाम डाक घरों को ‘सम्पूर्ण बैंक’ में बदल रहा है और दूसरी ओर बैंकिंग की न्यूनतम गतिविधि को अंजाम देने से इंकार कर रहा है! मैंने जानना चाहा कि आखिर क्या वजह है जो मुझे नेफ्ट से भुगतान नहीं मिल पाएगा? मुख्य डाकपालजी ने इस बार अत्यधिक विनम्रता बरती। बोले - ‘मुझे माफ करें। यह बताने की इजाजत मुझे नहीं है। आप तो व्यापक सम्पर्कों वाले आदमी हैं। पता करने में आपको देर नहीं लगेगी।’

मैं चुपचाप चला आया। इतना चुपचाप कि धन्यवाद ज्ञापित करने का शिष्टाचार निभाना भी भूल गया। वहाँ से निकलते ही सीधा अपने बैंक में गया। वहाँ मित्रों को सारी बताई तो वे गम्भीर हो गए। बोले - ‘सर! उन पर गुस्सा मत कीजिए। वे दया के पात्र हैं। हम उनकी कठिनाई समझ सकते हैं। एक तो स्टॉफ कम और दूसरे, लगभग जीरो इन्फ्रास्ट्रक्चर। वे भी क्या करें? उन्हें नेफ्ट करने की टेक्नोलॉजी ही उपलब्ध नहीं कराई गई है।’ जाहिर था, मुझे न केवल खाता खुलवाना था बल्कि चेक बुक भी जारी करवानी थी। (ताकि वहाँ की रकम अपने बैंक के खाते में जमा करा सकूँ।)

एक एजेण्ट मित्र से खाता खुलवाने की खानापूर्ति करवाई। कोई एक महीने में पास बुक मिली। पास बुक मिलते ही मैंने एजेण्ट मित्र से चेक बुक दिलाने में मदद माँगी। तीन दिन बाद उन्होंने कहा इसके लिए कि मुझे एक आवेदन देना पड़ेगा। फौरन आवेदन दिया। लेकिन चेक बुक फौरन ही नहीं मिली। कोई डेढ़ महीने बाद मिली। चेक बुक देख कर मैं हैरान रह गया। चेक बुक के आवरण पन्ने पर जरूर मेरी उत्तमार्द्धजी का नाम (संयुक्त खाते में पहला नाम उन्हीं का है) और खाता नम्बर लिखा था लेकिन अन्दर सारे के सारे चेक एकदम खाली थे - चेकों पर न तो नाम छपा था न ही खाता नम्बर। अब प्रत्येक चेक पर अपना खाता नम्बर और हस्ताक्षरों के नीचे अपना नाम मुझे ही लिखना है। बैंकिंग प्रक्रिया का यह बहुत ही महत्वपूर्ण काम डाक घर ने मेरे ही जिम्मे कर दिया। 

यहाँ मैं चेक बुक के आवरण पन्ने की और एक चेक की फोटू लगा रहा हूँ। आवरण पन्ने पर चेक बुक का नम्बर छपा है और पहले चेक पर भी वही नम्बर छपा है जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उसी चेक बुक का चेक है।

चेक बुक का आवरण पृष्ठ। चेक बुक नम्बर 751281 दृष्टव्य है।



चेक बुक का पहला खाली चेक जिस पर चेक नम्बर 751281 आसानी से देखा जा सकता है।

बहुत हैरत हो रही है और उतना ही गुस्सा भी आ रहा है। लेकिन भोंडा मजाक यह कि मेरे इस गुस्से के पात्र उच्चाधिकारी मेरे सामने नहीं हैं और जो कर्मचारी सामने हैं वे इस अव्यवस्था के लिए कहीं जिम्मेदार नहीं हैं। याने कुढ़ना, खीझना, झुंझलाना मुझे ही है - खुद पर ही।

डिजिटल इण्डिया का सपना शायद इसी तरह पूरा होगा - राकेट में यात्रा करनी है लेकिन अपनी बैलगाड़ी में बैठकर।
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मुसीबतों का ‘अपना घर’ याने बैंक ऑफ बड़ौदा


मेरे इस लिखे को बैंक ऑफ बड़ौदा के खिलाफ माना जाएगा जबकि हकीकत यह है कि मैं अपना घर सुधारने की कोशिश कर रहा हूँ।

अब तो यह भी याद नहीं कि इस बैंक में खाता कब खुलवाया था। लेकिन यह बात नहीं भूली जाती कि पहले ही दिन से इस बैंक में मुझे ‘घराती’ जैसा मान-सम्मान और अपनापन मिला। पहले ही दिन से मेरी खूब चिन्ता की जाती रही है। थोड़े लिखे को ज्यादा मानिएगा कि बैंकवालों का बस चले तो बैंकिंग सेवाओं के लिए मुझे घर से बाहर भी न निकले दें। अब, ऐसे में मैं इसके खिलाफ जब सोच ही नहीं सकता तो भला लिखूँगा क्या और कैसे?
मेरा खाता इस बैंक की, मेरे कस्बे की स्टेशन रोड़ स्थित शाखा में है। 

सब कुछ वैसे तो ठीक ही ठीक चल रहा है लेकिन मशीन आधारित ग्राहक सेवाएँ गए कोई तीन-चार बरसों से गड़बड़ हो रही हैं। शाखा के बाहर, मुख्य सड़क पर लगा इसका एटीएम एक बार तो इतने दिनों तक खराब रहा था कि मैं ने फेस बुक पर, अपने पन्ने पर एक पोस्टर चिपका कर लोगों से यह कर चन्दा माँगा था कि बैंक के पास इसे ठीक कराने के लिए पैसा नहीं रह गया है। तत्कालीन प्रबन्धक जैन साहब तनिक खिन्न हुए थे। फेस बुक पर लगाने से पहले मैंने वह पोस्टर औपचारिक पत्र के साथ  उन्हें भेजा था। उन्होंने तत्काल ही मेरे सामने ही ‘ऊपर’ बात कर मेरे पोस्टर का मजमून पूरा पढ़कर सुनाया था। लेकिन कुछ नहीं हुआ।

अपनी नीतियों के अनुरूप बैंक ने पूरे देश में तीन मशीनें (एटीम, रकम जमा करने की तथा पास बुक छापने की) अपनी शाखाओं में स्थापित कीं और ग्राहकों से कह दिया कि ये सेवाएँ अब मशीनों से ही प्राप्त करें। लेकिन ये मशीनेें बराबर चलती रहें इस ओर प्रबन्धन ने ध्यान देना बन्द कर दिया। मैं भली प्रकार जानता हूँ कि प्रबन्धन ने इन मशीनों का रख-रखाव निजी एजेन्सियों को दे रखा है। लेकिन अधिकांश ग्राहकों को यह नहीं पता। इसलिए, स्थानीय अधिकारी और कर्मचारी ही जन-आक्रोश झेलने को अभिशप्त हैं।

मेरे खातेवाली शाखा में तीन मशीनें लगी हुईं हैं और तीनों ही बदहाल हैं। इनका संक्षिप्त ब्यौरा इस प्रकार है -

यह बैंक के बाहर लगा ए टी एम है। इसके सेंसर काम नहीं कर रहे। 06-06 बार अपना कार्ड लगानेके बाद भी इसमें से पैसा नहीं निकलता। हर बार ‘अनेबल टू रीड कार्ड, प्लीज इन्सर्ट एण्ड रिमूव योर कार्ड अगेन’ का सन्देश पर्दे पर आता है। ए टी एम का देखभालकर्ता (केअर टेकर) कर्मचारी भी सहायता करता है। लेकिन उसे भी सफलता नहीं मिलती। वह तनिक झेंप और अत्यधिक विनम्रता से, शाखा के अन्दर लगी, रकम जमा करनेवाली मशीन (जो ए टी एम का काम भी करती है) से रकम निकालने की सलाह देता है।

यह, रकम जमा करनेवाली वही मशीन है जिसकी मदद से रकम निकालने की सलाह हम ग्राहकों को बाहर मिलती है। लेकिन यह मशीन भी मदद नहीं करती। यह भी बन्द रहती है। ‘मशीन बन्द है’ की सूचनावाला कागज प्रायः ही इस पर चिपका रहता है। गए दिनों एक ग्राहक की, जमा की जानेवाली रकम फँस गई। वह रकम उसे, आरटीजीएस के जरिए, किसी दूसरे शहर में जमा करानी थी। उसकी समस्या कैसे सुलझाई गई, यह अलग से सुनाया जानेवाला मसालेदार किस्सा है।

यह मशीन पास बुक की प्रविष्टियाँ छापती है। मुझे यह मशीन बहुत अच्छी लगती है। इसमें मुझे कुछ नहीं करना होता है। अपनी पास बुक अन्दर सरकाने भर का काम ग्राहक के जिम्मे है। उसके बाद पन्ने पलटना और जिस पन्ने से प्रविष्टियाँ छापनी हैं, वह पन्ना तलाश कर छपाई कर देना - सारे काम यह मशीन अपने आप कर देती है। इस मशीन के भरोसे, छोटे बच्चे को भी पास बुक छपवाने के लिए भेजा जा सकता है। लेकिन गए तीन महीनों से यह मशीन बन्द पड़ी है। 

ऐसे में कर्मचारियों की मुश्किल का अन्दाज आसानी से लगाया जा सकता है। कर्मचारियों की संख्या में दिन-ब-दिन होती जा रही कमी के चलते उनके लिए अपने ग्राहकों को सन्तुष्ट करना अब बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ग्राहकों से कर्मचारियों के निजी सम्बन्धों के कारण जन-असन्तोष सतह पर नहीं आ रहा लेकिन ‘लिहाज’ भी एक सीमा तक ही साथ देता है। 

मैंने सुझाव दिया कि इन मशीनों पर एक-एक पोस्टर चिपका दें - ‘यह मशीन बैंक की है जरूर किन्तु इसके रखरखाव की जिम्मेदारी फलाँ-फलाँ एजेन्सी की है। इसके खराब रहने की दशा में कृपया फोन नम्बर फलाँ-फलाँ पर कम्पनी से सम्पर्क करें।’ मेरा सुझाव  सबको अच्छा तो लगा किन्तु ‘आचरण संहिता’ (कोड ऑफ कण्डक्ट) के अधीन वे चाह कर भी इस पर अमल नहीं कर पा रहे।

यह समस्या केवल इस बैंक की इसी शाखा की नहीं होगी। इसी बैंक की अन्य शाखाओं और दूसरे बैंकों की भी होगी। स्थानीय स्तर पर तमाम बैंकों के कर्मचारी/अधिकारी ग्राहकों की बातों से सहमत हैं लेकिन वे यथाशक्ति, यथा सामर्थ्य सहायता करने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते।

इस बैंक की इस शाखा के बहाने लिखी गई यह पोस्ट शायद कोई जिम्मेदार अधिकारी पढ़ ले और ‘कुछ’ करे, इसी उम्मीद से लिख रहा हूँ। इसकी ओर ध्यान जल्दी जाए, बैंक का प्रतीक चिह्नन (मैं नहीं जानता कि यह ‘लोगो है या ‘एम्ब्लम’ या कि ‘मोनो) सबसे ऊपर लगाने का यही मकसद है।

उम्मीद करता हूँ कि मेरी इस पोस्ट को बैंक के विरोध में अब तो नहीं ही समझा जाएगा।
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नहीं किया लेकिन कर दिया

अपनी ‘व्यवस्था’ (याने कि सरकारी तन्त्र) की माया सचमुच में अपरम्परापार है। कभी कहो तो भी काम न हो और कभी न करने की कह कर भी काम कर दे।

कोई तीस बरस हो गए होंगे इस बात को। श्री गोपाल कृष्ण सारस्वत हमारे रतलाम जिले के अतिरिक्त जिला दण्डाधिकारी (एडीएम) थे। वे मेरे पैतृक गाँव मनासा से बारह-तेरह किलो मीटर दूर स्थित ग्राम कुकड़ेश्वर के दामाद थे। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मन्त्री सुन्दरलालजी पटवा का पैतृक गाँव कुकड़ेश्वर ही है। सारस्वतजी के ससुर सूरजमलजी जोशीजी मनासा में भारतीय जीवन बीमा निगम के विकास अधिकारी के पद पर पदस्थ थे। प्रायः रोज का मिलना-जुलना। यह वह जमाना था जब एक का जमाई, पूरे गाँव का जमाई। सो, मैं भी सारस्वतजी को जमाईजी या कुँवर सा’ कह कर ही सम्बोधित करता था। वे भी मुझे उतना ही मान देते थे।

इस यादगार घटना के समय विधान सभा के चुनावों की प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी। सारस्वतजी पूरे जिले के प्रभारी थे। अचानक एक सुबह जावरा रेल्वे स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर खान सा‘ब आए। उनकी बिटिया अध्यापक थी और चुनावों में उसकी ड्यूटी लग चुकी थी। खान साहब मेरे ‘ज्यामितीय मित्र’ थे - मेरे मित्रों के मित्र। उन्होंने अत्यन्त विनीत भाव से कहा कि मैं उनकी बेटी की यह ड्यूटी निरस्त करवा दूँ। चुनावों को मैं ‘राष्ट्रीय त्यौहार’ और उसकी ड्यूटी को ‘राष्ट्रीय कर्तव्य’ मानता हूँ। सो, मैंने हाथ जोड़ते हुए, तनिक अधिक विनीत भाव से खान सा’ब से क्षमा याचना कर ली। मैंने कहा कि उसे ड्यूटी करनी चाहिए। आखिर हर्ज ही क्या है? खान सा’ब ने कहा-’मैं भी आपकी बात से इत्तफाक रखता हूँ लेकिन ऐन मतदान के दिन बिटिया का निकाह तय हो गया है।’ मैंने अपना आग्रह तत्क्षण त्याग दिया और वादा कर दिया - ‘तब तो ड्यूटी निरस्त करवानी ही पड़ेगी। आप बेफिक्र होकर जाएँ। निकाह की तैयारियाँ करे। बिटिया की ड्यूटी निरस्त हो ही गई समझिए।’ 

खान साहब को भेज कर मैं फौरन ही ‘जमाईजी’ के पास पहुँचा। खान सा’ब की बिटिया की ड्यूटी वाला आदेश उनके सामने रखा और कहा - ‘यह ड्यूटी निरस्त कर दीजिए।’ सारस्वतजी ने कागज देखे बिना ही, विनम्रता से कहा - ‘नहीं करूँगा।’ मैं आसमान से जमीन पर गिरा - धड़ाम। मैं बार-बार सारस्वतजी को कहूँ, समझाऊँ और वे हैं कि मानने, सुनने, समझने को तैयार ही नहीं। थोड़ी देर तो मैं परिहास ही मानता रहा लेकिन खुशफहमी टूटी तो मुझे गुस्सा आ गया। मैंने तमक कर कहा-‘मैं तो आपको एडीएम सा'ब, एडीएम सा'ब, जमाईजी, जमाईजी किए जा रहा हूँ और आप हैं कि भाव ही नहीं दे रहे। मत करो ड्यूटी केंसिल। बच्ची ड्यूटी पर नहीं जाएगी। क्या कर लोगे आप?’ सारस्वतजी ने पूरे शान्त भाव से मुस्कुराते हुए जवाब दिया - ‘कुछ नहीं करेंगे। मत भेजिए अपनी बच्ची को।’ 

मैं एक बार फिर आसमान से जमीन पर गिरा। इस बार चारों कोने चित। मैं अचकचा गया। बोल नहीं फूटे मेरे मुँह से। बौड़म की तरह उनको देखते हुए तनिक मुश्किल से बोला - ‘क्या मतलब आपका?’ इस बार मुस्कुराहट से आगे बढ़ कर सारस्वतजी तनिक हँस कर बोले - ‘मेरे कहने का मतलब यह कि रखिए अपनी बच्ची को अपने पास। मत भेजिए चुनावी ड्यूटी पर।’ सारस्वतजी ने बात तो मेरे मन की कही किन्तु मुझे विश्वास नहीं हुआ। भला ड्यूटी केंसिल हुए बिना बच्ची गैर हाजिर रही तो उसकी  नौकरी पर नहीं बन आएगी? मेरी शकल यकीनन, देखने लायक हो गई होगी। 

मेरी दशा देख सारस्वतजी इस बार खुल कर हँसे। बोले - ‘आप क्या समझते हैं कि एक मास्टरनी के दम पर चुनाव हो रहे हैं। अरे! हमने स्पेशल पोलिंग पार्टियाँ बना रखी हैं। कोई ड्यूटी पर नहीं आएगा तो क्या चुनाव का काम रुक जाएगा? अरे! भाई सा’ब। किसी न किसी को भेज दिया जाएगा।’ मैंने घुटी-घुटी आवाज में कहा - ‘लेकिन उसकी नौकरी?’ सारस्वतजी इस बार ठहाका मार कर हँसे। बोले - ‘कुछ नहीं होगा उसकी नौकरी को। आपने पूछा था न कि हम क्या कर लेंगे? तो सुनिए! हम उसे एक कारण शो-काज नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण माँग लेंगे। वो जवाब दे देगी कि उस दिन उसका निकाह था इसलिए ड्यूटी पर नहीं आ पाई। कागज फाइल में लग जाएगा। बस। बात खतम।’ 

सब कुछ मेरे मन का हो रहा था किन्तु जिस अन्दाज में हो रहा उससे मेरी धुकधुकी बन्द नहीं हो रही थी। सारस्वतजी ने दिलासा देते हुए कहा - ‘भाई सा’ब! आप तो जेन्युइन केस लेकर आए हो। लेकिन यदि मैंने यह एक ड्यूटी केंसिल कर दी तो मेरे दफ्तर के बाहर लाइन लग जाएगी और अपात्रों की लॉटरी लग जाएगी। इसलिए आप तो  बेटी के बाप से कहिए कि ड्यूटी-व्यूटी को भूल जाए और बेटी के हाथ पीले करे।’

सारस्वतजी के कमरे से बाहर आते हुए मैं तय नहीं कर पा रहा था कि सारस्वतजी को धन्यवाद दूँ या उन पर गुस्सा करूँ? उन्होंने मेरा कहा तो माना नहीं लेकिन मेरा काम कर दिया था।
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जल्दी याने जल्दी नहीं

यह आपबीती मुझे आज, 12 मई को मन्दसौर के एक ठेकेदार ने सुनाई।

मध्य प्रदेश सरकार ने अपना एक काम अपने एक उपक्रम से कराने का फैसला किया। याने कि सरकारी भाषा में उस उपक्रम को, ‘नोडल एजेन्सी’ बनाया।

काम कराने के लिए इस नोडल एजेन्सी ने दिसम्बर 2014 में निविदा निकाली। इस काम के अनुभवी, प्रदेश के कुछ ठेकेदारों ने अपने-अपने भाव प्रस्तुत किए। सबसे कम भाव होने के कारण मन्दसौर के इस ठेकेदार को ठेका मिला। शर्तों के मुताबिक इस ठेकेदार ने, निविदा की शर्तें पूरी करते हुए, जनवरी 2015 में 8,00,000/- रुपये अमानत राशि के रूप में जमा कराए। लेकिन उसके नाम पर कार्यादेश (वर्क आर्डर) जारी होता उसके पहले अचानक ही सरकार ने नोडल एजेन्सी बदल दी।

नई निविदा में किसी और ठेकेदार को काम मिल गया। मन्दसौर के इस ठेकेदार ने मार्च 2015 में, विधिवत आवेदन प्रस्तुत कर अपनी, अमानत की रकम माँगी।

ठेकेदार जानता था कि सरकार आसानी से रकम वापस नहीं करती। सो, आवेदन देकर प्रतीक्षा करने लगा। ‘सामान्य प्रतीक्षा अवधि’ निकल जाने पर ठेकेदार ने सम्बन्धित कार्यालय से फोन पर सम्पर्क किया। जवाब मिला-‘रकम जल्दी ही वापस कर रहे हैं।’ लेकिन इस ‘जल्दी’ को ‘बहुत जल्दी’ (शायद फोन पर जवाब देने के अगले ही क्षण) भुला दिया गया। ठेकेदार यह जानता था। सो, हर महीना-पन्द्रह दिन में फोन करता रहा। लेकिन पूरा एक साल बीत जाने के बाद भी वह ‘जल्दी’ किसी को याद नहीं आई। 

हारकर ठेकेदार ने मार्च 2016 में पंजीकृत पत्र भेज कर अपनी रकम माँगी। जवाब आया तो जरूर लेकिन कागज पर नहीं। फोन पर कहा गया कि (प्रक्रिया के अधीन) स्टाम्प पेपर पर रकम की अग्रिम पावती (एडवांस रसीद) भेजें। ठेकेदार ने अगले ही दिन अग्रिम पावती भेज दी। लेकिन भरपूर समय निकल जाने के बाद भी कोई खबर नहीं मिली। ठेकेदार ने फोन किया। जवाब मिला - ‘पावती तो मिल गई किन्तु वह एक सौ रुपयों के स्टाम्प पेपर पर होनी थी।’ ठेकेदार ने याद दिलाया कि निविदा के समय पचास रुपयों के स्टाम्प पेपर पर ही पावती दी जाती थी। जवाब मिला - ‘तब की बात तब गई। आज की बात करो।’ अप्रेल 2016 में ठेकेदार ने एक सौ रुपयों के स्टाम्प पेपर पर पावती भेज दी।

लेकिन कोई महीना भर बाद भी न तो रकम मिली और न ही कोई खबर तो ठेकेदार ने आज फोन किया। जवाब मिला - ‘बहुत जल्दी पड़ी है आपको! चलो! खुश हो जाओ। आपको रकम लौटाने के आदेश पर आज साहब के दस्तखत हो गए हैं। जल्दी ही आपको आपकी रकम मिल जाएगी।’

जवाब में यह ‘जल्दी’ सुनकर खुश होने के बजाय ठेकेदार चिन्तित हो गया है। इस कार्यालय का, उसका अनुभव कह रहा है - ‘जल्दी’ का मतलब है, कम से कम एक साल बाद।
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