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बाल-गीत : साँप, मेंढक और बाढ़



श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का बारहवाँ/अन्तिम बाल गीत 




साँप, मेंढक और बाढ़ 

ऐसा कुछ बरसा आषाढ़ 
गाँव-गाँव में घुस गईं बाढ़
नदियों ने तट तोड़ दिये
अपने आँगन छोड़ दिये

छिछले नाले बिना शऊर
इतराये होकर मगरूर
गाँव, गली और खेत, पहाड़
निगल गई थी सबको बाढ़

इसी बाढ़ का एक प्रसंग
ये भी है किस्मत का रंग
मणिघर काला एक भुजंग
बहता था लहरों के संग

सहता था हर कोप-कहर
फन फैलाये लहर-लहर
चला तैरता पानी में
फँसा हुआ हैरानी में

तभी खेल कुछ अजब हुआ
या कुदरत का गजब हुआ
भीषण एक लहर-आई
खींच एक मेढक लाई

घबराहट में चिल्लाता
कुछ भी समझ नहीं पाता
कैसे जान बचे भगवन्
शायद खतम हुआ जीवन

लगा मौत का फिर धक्का
भूल गया पंजा-छक्का
टर्राना तक भूल गया
मेंढक का दम फूल गया

लगा थपेड़ा तूफानी
सिर से गुजर गया पानी
तभी भाग्य के चक्कर से
तूफानों की टक्कर से

उछला ऊपर ठेठ गया
फैले फन पर बैठ गया
अजब तमाशा क्या कहिये?
चुप भी अब कैसे रहिये?

बात समझ के बाहर थी
लेकिन साफ उजागर थी
मेंढक को कुछ होश हुआ
पल भर तो खामोश हुआ

फिर खँखार का इतराया
बड़ी जोर से टर्राया
साँप दुखी था मन-ही-मन
ऊपर मेंढक, नीचे फन!

इधर बाढ़ का जोर बढ़ा
मेघ और घनघोर चढ़ा
साँप् लहरता जाता था
सतत् तैरता जाता था

दर्शक क्षड़े किनारे थे
सभी बाढ़ के मारे थे
तभी किसी ने व्यंग्य किया
नागराज को तंग किया

नागराज! क्या दिन आए?
दिन भी क्या अनगिन आए
जा के देखो दर्पण में
आग लगा दो इस फन में

मेंढक माथे चढ़ बैठा!
इतना आगे बढ़ बैठा!
तुम और ऐसी लाचारी!
बलिहारी है बलिहारी!

तभी नागने कहा निडर
ताना मत दो मित्र प्रवर
अभी बाढ़ है, पानी है
मौसम कुछ तूफानी है

मौसम उजला आने दो
उतर बाढ़ को जाने दो
तब फिर इसका टर्राना
टर्र-टर्र कर इतराना

भूल न जाए तो कहना
अभी मुझे है सब सहना
जब यह नीचे आएगा
दूर नहीं जा पाएगा

भक्ष्य है मेरा, मैं खाऊँगा
खाकर इसे पचाऊँगा
अभी बाढ़ से बचना है
यही भग्य की रचना है

अपमानों को पीना है
कुछ दिन यूँ ही जीना है
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संग्रह के ब्यौरे 

गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



बाल-गीतों का यह संग्रह
दादा श्री बालकवि बैरागी के छोटे बहू-बेटे
नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
ने उपलब्ध कराया।


 


 



















बाल-गीत : जूझ गई मौसम से



श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का ग्यारहवाँ बाल गीत 




जूझ गई मौसम से

जूझ गई मौसम से पाँखुरी गुलाब की
अब पसीना दीजिये और रोकिये बहार को

एक अजानी आग में जब घिरा चमन
और पराग होने लगा राख में दफन
लग रहा था फूल सब मरेंगे बे-कफन
(तो) कूद पड़ी आँगन में लाड़ली ऋतुराज की
अब तो अर्ध्य दीजिये इस कुन्दनी निखार को
जूझ गई मौसम से.....

काला गगन हो गया है आज सुनहला
हो गया वसुन्धरा का रूप रुपहला
हँस रही है झोपड़ी खुश है दुमहला
पुर गईं हर चौक में राँगोलियाँ पराग की
रूप नया दीजिये इस कुंकुंमी सिंगार को
जूझ गई मौसम से.....

बीस कमल खिल गये हैं देश ताल में
फर्क साफ-साफ है पवन की चाल में
गा रहा हर एक भ्रमर सुर में ताल में
आ गई है बाग में बेला बिहाग की
अब मुक्त पवन दीजिये इस गन्ध को गुंजार को
जूझ गई मौसम से.....
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संग्रह के ब्यौरे 

गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद




बाल-गीतों का यह संग्रह
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बाल-गीत : हम हैं पहरेदार





श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का दसवाँ बाल गीत 




हम हैं पहरेदार  

हम हैं पहरेदार 
वतन के
हम हैं पहरेदार।।
इस गुलशन के हर मौसम के
हम हैं जिम्मेदार
वतन के हम हैं पहरेदार।।

                -1-

जिस मिट्टी ने हमें बनाया
पाला-पोसा, गोद खिलाया
कभी नहीं भूलेंगें हम उस मिट्टी का उपकार
वतन के हम हैं पहरेदार।।

                -2-

प्यारी धरती प्यारा पानी
प्यारा यह अम्बर लासानी
यही हमारा ईश्वर अल्ला यही हमारा प्यार
वतन के हम हैं पहरेदार।।

                -3-

इसके फूल सदा महकेंगे
पंछी गायेंगे चहकेंगे
कभी नहीं जाने देंगे हम इसकी जवाँ बहार
वतन के हम हैं पहरेदार।।
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संग्रह के ब्यौरे 
गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



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बाल-गीत : ओ मिट्टी के कण




श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का नौवाँ बाल गीत 




ओ मिट्टी के कण!

हम पर है उपकार कितना तेरा
हाँ तेरा
ओ मिट्टी के कण!
कैसे इतना कर्ज उतारे, छोटा सा जीवन
हमारा छोटा सा जीवन
ओ मिट्टी के कण!

जननी के आँचल में तू ही दूध बना प्यारे
तूने ही ममता के सारे खोल दिये द्वारे
(पर) दो किलकारी में ही सारा बीत गया बचपन
ओ मिट्टी के कण!

तू ही खून पसीना बन कर यौवन कहलाया
तू ने दी भरपूर उमंगे दी कंचन काया
(पर) दो सपने देखे ना देखे बीत गया यौवन
ओ मिट्टी के कण!

मिला बुढ़ापा, झुकी नजरिया झुकी कमरिया रे
मानो झक कर ढूँढ रही है गई उमरिया रे
ढूँढ-ढूँढ कर काया हो गई मरघट का ईंघन
ओ मिट्टी के कण!

आज नहीं तो कल या परसों कर्ज चुकाएँगे
तेरा यह एहसान चुकाने फिर से आएँगे
लाख जनम माँगेंगे तुझसे ऐसा ही जीवन
ओ मिट्टी के कण!
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संग्रह के ब्यौरे 

गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



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बाल-गीत : किरणों से जगमगाएँ




श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का आठवाँ बाल गीत 




किरणों से जगमगाएँ

किरणों से जगमगाएँ खुशबू से फैल जाएँ
बच्चों! हमारी दुनिया हम ही नई बनाएँ

हैं फूल इक चमन के, हैं इक गगन के तारे
खोटे हैं सब मुखौटे, नकली हैं सब दीवारें
तोड़ें हर एक बन्धन ये ये दूरियाँ मिटाएँ
बच्चों! हमारी दुनिया हम ही नई बनाएँ

घरती है माँ सभी की इस को न भूल जाएँ
माखन सा मन है इसका उसको नहीं दुखाएँ
पैगाम ये अमन का हर एक को सुनाएँ
बच्चों! हमारी दुनिया हम ही नई बनाएँ

माता-पिता हमारे आपस में लड़ रहे हैं
देते हैं दोष हमको के हम बिगड़ रहे हैं
इल्जाम ये बड़ों के मुसका के भूल जाएँ
बच्चों! हमारी दुनिया हम ही नई बनाएँ

बँटता नहीं है सागर लहरों को बाँटने से
कटता नहीं है अम्बर किरनों को काटने से
लायें नया उजाला सूरज नया उगाएँ
बच्चों! हमारी दुनिया हम ही नई बनाएँ

इंसानियत का मतलब समझा नहीं जिन्होंने
वे सब बना रहे हैं बारूद के खिलौने
लाखों गुलाब जलती बारूद में खिलाएँ
बच्चों! हमारी दुनिया हम ही नई बनाएँ
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संग्रह के ब्यौरे 

गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



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नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
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बाल-गीत : रिश्ते




श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का सातवाँ बाल गीत 




रिश्ते 

महक रही है रिश्तों से ही जीवन की फुलवारी
टूट नहीं पायेंगे रिश्ते, रिश्तों की बलिहारी
मीठे रिश्तों की बलिहारी

बेटी क्या है खुशबू घर की, पवन पिया संग जाए
धनुआ जैसी पहरेदारी, बेटा ही कर पाए
नील गगन का रूप पिता है, जनम-जनम सुखकारी
मीठे रिश्तों की बलिहारी।।

तुलसी बिरवा जैसी पावन, बहना माँ की जायी
ईश्वर का वरान सुहावन, परबत जैसा भाई
करुणाकर की करुणा को ही नाम मिला महतारी
मीठे रिश्तों की बलिहारी।।

पति को नाम दिया परमेश्वर, कुंकुम में रंग डाला
घर की लक्ष्मी पत्नी ने ही, पाला वंश उजाला
रिश्तों के रेशम में लिपटी, दुनिया लगती प्यारी
मीठे रिश्तों की बलिहारी।।
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संग्रह के ब्यौरे 

गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



बाल-गीतों का यह संग्रह
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बाल-गीत : 15 अगस्त





श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का छठवाँ बाल गीत 



 
                            15 अगस्त

                आजादी का महादिवस है
                आओ मेरे भाई।
                आओ मेरे राम रहीमा!
                खायें आज मिठाई।।

                                -1-

अपनी माता के बन्धन, इस दिन ही टूटे थे
फुलझड़ियों के संग पटाखे, इस दिन ही छूटे थे
लाल किल पर अमर तिरंगा, इस दिन ही फहराया था
सागर, नद, नालों का पानी, मस्ती से लहराया था
खुशहाली से इस दिन की थी पहली बार सगाई
आओ मेरे राम रहीमा! खायें आज मिठाई।।

                                -2-

कितना आगे देश बढ़ा है, आओ आज विचारें
दोष नहीं दें हम दूजों को, अपनी ओर निहारें
हमने खुद ने कितनी की है, अपनी माँ की सेवा
कितना खाया है हम सबने, बिन सेवा का मेवा
सब सच बोलें खुद को तौलें छोड़ें आज ठिठाई
आओ मेरे राम रहीमा! खायें आज मिठाई।।

                                -3-

अनुशासन कितना है हम में, कितने आज्ञाकारी
पाठ विनय का कितना सीखा, कितने हैं उपकारी
कितनी मदद करी मित्रों की, कितना पुण्य कमाया
अपने पावन विद्यालय का, कितना नाम बढ़ाया
गहरे मन से वह सब सोचो तब तो सफल पढ़ाई
आओ मेरे राम रहीमा! खायें आज मिठाई।।

                                -4-

अभी गरीबी से लड़ना है, देनी है कुरबानी
माँग रहा है लोहू हमसे, माँ गंगा का पानी
अभी हिमालय घायल अपना, दुश्मन है दरवाजे
नहीं सुनाई पड़ते तुमको, क्या वो मारू बाजे?
चलो चलें हिलमिल दुश्मन की, जी भर करें पिटाई
आओ मेरे राम रहीमा! खायें आज मिठाई।।

                                -5-

मेरे साथ तिरंगा पकड़ो, ऊँचा और उठाओ
आसमान की ऊँचाई तक, यह नेजा फहराओ
चाहे अपना सिर कट जाए, यह झुकने न पाए
काम करें हम ऐसा जिससे, नाम अमर हो जाए
भारत माँ का कर्ज चुका दो, गिन दो पाई-पाई
आओ मेरे राम रहीमा! खायें आज मिठाई।।
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गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य:  पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



बाल-गीतों का यह संग्रह
दादा श्री बालकवि बैरागी के छोटे बहू-बेटे
नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
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बाल-गीत : हम गाँधी के लाल





श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का पाँचवाँ बाल गीत 




हम गाँधी के लाल

हम गाँधी के लाल
देश को देंगे उजियाला

                            -1-

नारों में भटकाने वालों, हमको मत बहलाओ
अपने मन को निर्मल करके साथ हमारे आओ
हमने गीत नया छेड़ा है, तुम उसको दुहराओ
हम गाँधी के लाल
देश को देंगे उजियाला।।

                            -2-

सुन ले, मन-ही-मन कुछ गुन ले ओ भैया हड़ताली
अपनी ही मेहनत को पगले क्या देता है गाली
ऐसे कैसे होगी तुझसे पीढ़ी की रखवाली
हम गाँधी के लाल
देश को देंगे उजियाला।।

                            -3-

भूख गरीबी, बेकारी से आओ लड़ें लड़ाई
भारत माँ को आज भरोसा दे सारी तरुणाई
हम नहीं होने देंगे जननी, अब तेरी रुसवाई
हम गाँधी के लाल
देश को देंगे उजियाला।।
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संग्रह के ब्यौरे 

गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



बाल-गीतों का यह संग्रह
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नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
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बाल-गीत : गाँधी-गीत





श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का चौथा बाल गीत 




गाँधी-गीत

सत्य, अहिंसा, समता, ममता, न्याय, दया, बलिदान
रामराज्य की शुचि परिभाषा, जन-जन का कल्याण
समा गये सब एक वचन में, गाँधी जिसका नाम
राष्ट्र के बापू तुझे प्रणाम 
हमारे बापू तुझे प्रणाम,
सत्य, अहिंसा.....।।

                                -1-

कैसे कटते माँ के बन्धन, कैसे मिट्ते युग के क्रन्दन 
कौन यहा करता करुणा से मानवता का मृदु अभिनन्दन
पुण्य नहीं फलता पुतली का क्या होता परिणाम?
राष्ट्र के बापू तुझे प्रणाम
हमारे बापू तुझे प्रणाम
सत्य, अहिंसा.....।।

                                -2- 

कौन यहाँ सुनता दीनों की विष को कौन पचाता?
अँधियारों के रनिवासों में किरणें कौन नचाता?
पूरब कैसे उजला रहता हो-हो कर बदनाम
राष्ट्र के बापू तुझे प्रणाम
हमारे बापू तुझे प्रणाम
सत्य, अहिंसा.....।।

                                -3-

प्राण दिये हैं तूने हमको दी है मीठी बानी
और दिया है भाई-चारा, सत्य दिया बलिदानी
तेरा पंथ नहीं छोड़ेंगे अब हम आठों याम
राष्ट्र के बापू तुझे प्रणाम
हमारे बापू तुझे प्रणाम
सत्य, अहिंसा.....।।
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संग्रह के ब्यौरे 
गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: रू पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



बाल-गीतों का यह संग्रह
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नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
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बाल-गीत : आओ लड़ें अकाल से



श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का तीसरा बाल गीत 




आओ, लड़ें अकाल से

आओ लड़ें अकाल से
शस्य श्यामला पट नहीं जाये
मानव के कंकाल से
आओ लड़ें अकाल से।

सुजला सुफला माँ के बेटे
सोते हैं फिर भूखे
पेट पीठ से सटा हुआ है
सपने तक हैं रूखे
लव-कुश कैसे करें गुजारा
तरू की सूखी छाल से
आओ लड़ें अकाल से।

बड़े भाग से तरुणाई पर जिम्मेदारी आई
अभी नहीं जो आगे आये वह कैसी तरुणाई
सच पूछो तो महायुद्ध है
ऋतु की क्रूर कुचाल से
आओ लड़ें अकाल से।

जब तक खेत नहीं हरियायें मेघ नहीं दे पानी
तब तक लगती रहे दाँव पर पानीदार जवानी
नये सिरे से परिचय हो फिर
सरवर, पोखर, ताल से
आओ लड़ें अकाल से।
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संग्रह के ब्यौरे 
गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य:  पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



बाल-गीतों का यह संग्रह
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नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
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बाल-गीत: आजादी की पहरेदारी



श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का दूसरा बाल गीत 





आजादी की पहरेदारी

आजादी की पहरेदारी हम बच्चों की जिम्मेदारी
है.....
महाकाल से टकरा जाएँ
ये तैयारी
है.....हमारी ये तैयारी है।
आजादी की पहरेदारी।

-1-

ओ! आरूद बिछानेवालों
ओ! रे आग लगानेवालों
कफन बेचनेवालों सुन लो
सुन लो रे गुर्रानेवालों
उधर तुम्हारी
इधर हमारी ये लाचारी 
है.....
महाकाल से टकरा जाएँ
ये तैयारी 
है.....हमारी ये तैयारी है।
आजादी की पहरेदारी।

-2-

चिन्ता मत कर भारत माता
हम हैं तेरे भाग्य विधाता
देखेंगे अब तेरा दुश्मन
जिन्दा कैसे बच कर जाता
पूछ रहे हैं
एक-एक से किसकी बारी
है.....
महाकाल से टकरा जाएँ
ये तैयारी
है.....हमारी ये तैयारी है।
आजादी की पहरेदारी।

-3-

भाई-चारा पालेंगे हम
युद्ध हमेशा टालेंगे हम
लेकिन कोई येन समझे
सबकी ठोकर खा लेंगे हम
अंगारों की 
इज्जत रक्खे वो चिंगारी
हैं.....
महाकाल से टकरा जाएँ
ये तैयारी 
है.....हमारी ये तैयारी है।
आजादी की पहरेदारी।
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संग्रह के ब्यौरे 

गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य: रू पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



बाल-गीतों का यह संग्रह
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बाल-गीत : पावन राष्ट्र निशान



श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का पहला बाल गीत 



कवि का आत्म-कथ्य

‘आओ बच्चों! गाओ बच्चों!” मेरी नई बाल-कविताओं का संकलन है। भारत के भावी नागरिक देश की भावना के साथ आगे कदम बढ़ायें। रचनाएँ कैसी हैं, इन्हें बाल पाठक ही पढ़कर बतायेंगे, जिनके लिए यह लिखी गई हैं।

बाल-साहित्य के नाम पर आजकल, बहुत-कुछ लिखा जा रहा है, किन्तु जब तक बाल-मन लेखक के पास नहीं, बाल-सुलभ कल्पना नहीं, तब तक लिखना, लिखना मात्र है।

दो-चार गीत भी बच्चे याद कर गुनगुनायेंगे, उनसे उत्साह, आनन्द पायेंगे, तो मुझे सन्तोष होगा।

- बालकवि बैरागी
गणतन्त्र दिवस
26 जनवरी 1984


श्री बालकवि बैरागी के बाल-गीत संग्रह
‘गाओ बच्चों’ का पहला बाल गीत 
 
पावन राष्ट्र निशान

हमारा पावन राष्ट्र निशान
यही हमारा ईश्वर अल्ला
गीता और कुरान
पावन राष्ट्र निशान।।

            -1-

अम्बर से ऊँचा फहरेगा
तिल भर नहीं झुकेगा
उसको थामे चलने वाला
यौवन नहीं रुकेगा.....
दीन-धरम है यही हमारा
और यही ईमान
पावन राष्ट्र निशान।।

            -2-

अमर शहीदों ने लोहू से
जिसके चरण पखारे
प्रजातन्त्र के चारण जिसका
यश-गौरव उच्चारें
अभिलाषा यह इस पीढ़ी की 
ईश्वर का वरदान
पावन राष्ट्र निशान।।

            -3-

कभी नहीं बिछड़े धरती से
इसकी मंगल छाया
नीलाम्बर के शैल-शिखर तक
जावे यह फहराया
एक नहीं सो जनम करेंगे
हम इस पर बलिदान
पावन राष्ट्र निशान।।

            -4-

इस पर आँख उठाने वालों
इसका बल पहचानो
अमर पताका के वैभव को
छोटा मत अनुमानो
पैंसठ कोटि शरीरों का है
अमर तिरंगा प्राण
पावन राष्ट्र निशान।।
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अनुक्रम
01  पावन राष्ट्र निशान
02  आजादी की पहरेदारी
03  आओ लड़ें अकाल से
04  गाँधी गीत
05  हम गाँधी के लाल
06  15 अगस्त
07  रिश्ते 
08  किरणों से जगमगायें 
09  ओ मिट्टी के कण
10  हम हैं पहरेदार 
11  जूझ गई मौसम से
12  साँप, मेंढक और बाढ़ 


संग्रह के ब्यौरे 

गाओ बच्चों: बाल-गीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर 
पटना, भोपाल, लखनऊ-226018
चित्रकार: कांजीलाल एवं गोपेश्वर, वाराणसी
कवर: चड्ढा चित्रकार, दिल्ली
संस्करण: प्रथम  26 जनवरी 1984
मूल्य:  पाँच रुपये पच्चास पैसे
मुद्रक: देश सेवा प्रेस
10, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद



बाल-गीतों का यह संग्रह
दादा श्री बालकवि बैरागी के छोटे बहू-बेटे
नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
ने उपलब्ध कराया।