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उठो मेरे चैतन्य

 





श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की सैंतीसवीं/अन्तिम कविता 




उठो मेरे चैतन्य

पता नहीं कौन
पकड़ लेता है हाथ
ठिठका देता है प्रवाह
रोक देता है स्याही का
सारा उफान
सुन्न हो जाता है
कलम का सारा तूफान।
भीतर से बोलते-बोलते
हो जाता है कोई गूँगा
ये लिखूँगा-वो कहूँगा
जैसे सारे संवेग
सोए से लगने लगते हैं
संवेदना के सारे सिंगार
खोए से लगने लगते हैं।
न कहीं ऊर्जा की कमी
न कोई थकान
फिर भी एक
अजनबी सा अनमनापन
कहाँ से आ गया
मेरे मन!
अँधेरे का घनत्व
और उजाले का महत्व
कल से ज्यादा है
मुखरता गुणित प्रखरता
धन शतगुणा शब्द
मारकता
ये गणित सीधा-सादा है।
रुक जाए कलम
सूख जाए स्याही
सो जाए चेतना
ठिठक जाए प्रवाह
इससे बड़ा
और क्या होगा गुनाह ?
उठो मेरे चैतन्य
संस्कार की
सान पर चढ़ो
हो जाओ बेलिहाज
और पूरे पैनेपन के साथ
आज के अँधेरे से लड़ा।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली
 
 
 

वासुदेव धर्मी




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की छत्तीसवीं कविता 




वासुदेव धर्मी

विशाल, विराट् और
वन्दनीय वट-वृक्षों की
वनस्थली में
मैं अकेला हूँ
पीपल का पेड़।
जिसके पास
न कोई जटा
न कोई जूट
जिसपर न किसी का घोंसला
न किसी चील
या गिद्ध की लम्पट-लूट।

आते-जाते धरा-पुत्र
बाँध देते हैं, अपना पशुधन
मेरे तने से
यदाकदा आ जाती हैं
दो-चार सुहागनें
चढ़ा जाती हैं एकाध श्रीफल
लगा जाती हैं कुंकंुम
कर जाती हैं गिनकर
सात परिक्रमाएँ
ढाँककर माथा
माँग लेती हैं
अपने अहिवात की
शुभकामनाएँ।

जती-जोगी, बाबा-बैरागी
धूनी रमाते हैं वटों के नीचे
लेकिन
मानते हैं मुझे वासुदेव
पता नहीं क्यों
करते हैं मेरी अभ्यर्थना
अब मैं भी करूँ
किस-किसको मना?

चलती है ज्यों ही
जरा सी आड़ी-टेढ़ी हवा
काँप उठता है मेरा पत्ता-पत्ता
और तब चीख पड़ती है
वट-वृक्षों की अहम पीड़ित सत्ता।
डाँटते हैं मुझे, समझाते हैं,
‘हवा के हलके से आघातों से
यों क्या काँप-काँप जाते हो
जरा सी चोट से भी
हाँफ जाते हो?
हमें देखो,
आँधी-तूफान सब झेल जाते हैं
जड़ बनती जटाओं के सहारे
सारे खेल, खेल जाते हैं।
यों हाँफना काँपना बन्द करो
ध्यान रखो अपनी ऊँचाई का
संवेदना को समझाओ
भावना की भाँवर का प्रबन्ध करो।’
और..... मैं.....
समझा नहीं पाता हूँ
इन विराट वटों को
संवेदना-वेदना और
वायुवेग से मिताई
मेरा मूल-धन है

परिवेश को अनागत से
अवगत रखना
मेरा तपोव्रत परम पवित्र है
करुण हो या कठोर
किन्तु हवा की हलकी सी थपकी से
काँप जाना
मेरे पत्तों का चरित्र है।
मेरे पास प्राणवायु तक
मेरी अपनी है
मेरी अपनी ही प्राणवत्ता है
यही मेरी अस्मिता
और इयत्ता है।
सम्भावित वायुवेगों की
पूर्व सूचनाएँ मैं ही देता हूँ
अपशकुनों और अपशकुनियों से
सावधान रखता हूँ, तुम्हे
अपने इस वासुदेव धर्म के बदले
तुमसे क्या लेता हूँ ?

तुम बेशक बनाने दो
अपने घर में उल्लुओं को घोंसले
अपनी अनन्त जटाओं को
अहर्निश बढ़ाओ
पर मर्म समझो मेरे वासुदेव धर्म का
एक चरित्रवान से
उसका चरित्र
मत छुड़ाओ।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















करके देखो




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की पैंतीसवीं कविता 




करके देखो

घर-घर, देहरी-देहरी
छज्जे-छज्जे, आले- आले
सुहागनों ने रख दिए
अपने दीये
बरसा दिए अपने
आँचलों से
आसमान भर उजाले।
जगमग हो गया जगत
हर मुँडेर हो गई सुहागन
तब भी तुम्हारी
उदासी नहीं गई।
शर्तें लगाते हो
रोज नई-नई,
‘ऐसा हो तो वैसा करूँ
वैसा हो तो ऐसा करूँ’
ऐसे में कौन आएगा
दीया रखने
तुम्हारे सुनसान बियाबान में
शोकसभा करते रहो
जिन्दगी भर
अपने मसान में ।
फुरसत नहीं है दुनिया को
जो तुम्हारे सुख की सोचे
अपनापन देकर
तुम्हारे आँसू पोंछे।
अपना दीया खुद बनाओ
उसे नेह से भरो
बाती रखो संघर्षवती
संकल्पशील तीली की
जुगत करो।
दोस्ती करो उजाले से
बात करो
अपने गुमसुम आले से
देहरी लीपो
माँडो एकाध माँडणा
टेढ़ा-मेढ़ा।
और सुरे-बेसुरे ही सही
अगर तुमने ‘हीड़’
का कोई सुर छेड़ा
तो जुट जाएँगे लोग
कट जाएँगे सारे मनोरोग
अपने आप सज जाएगी
लक्ष्मी-पूजा की छोटी-बड़ी थाली
भाग खड़ी होगी
अमावस काली
कहेगी,
‘अरे! अरे!!
ये तो मनाने लगा
अच्छी -खासी दीवाली।’
मरी उदासी को कूड़े पर फेंका
और कुछ नहीं
कर पा रहे हो तो
ऐसा ही करके देखो।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















पर जो होता है सिद्ध-संकल्प




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की चौंतीसवीं कविता


 

पर जो होता है सिद्ध-संकल्प

आसान नहीं था
किले गढ़ना

तब भी लोगों ने गढ़े।
आसान नहीं था
उनपर चढ़ना

तब भी ललकारकर
लोग उनपर चढ़े।

किले होते ही हैं
फतह के लिए

वैसे ही रात भी
होती ही है सुबह के लिए।

पर सुबह की प्रतीक्षा को ही
बना ले कोई
अपना लक्ष्य
तो उसे निगल जाता है
उसका अपना ही
शयनकक्ष।
वो या तो पड़े-पड़े
करवटें बदलता है
या सवेरे के इन्तजार में
आँखें मसलता है।

पर जो होता है सिद्ध-संकल्प
वो ठानता है
अँधेरे से लड़ाई
कर बैठता है
उसके साम्राज्य पर
चक्रवर्ती चढ़ाई।

जलाता है दीया
सुलगाता है मोमबत्ती
और पाट लेता है
रात और प्रभात के
बीच की अन्धी खाई।

आज जब चप्पे-चप्पे पर
अँधेरे ने अपने
किले गढ़ लिये हैं
तब लाख टके का
एक ही सवाल है कि
हममें कितने सूरमा
ऐसे हैं
जो उनपर चढ़ लिये हैं?
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















नसैनी




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की तैंतीसवीं कविता


 

नसैनी

बनाया उन्होंने मुझे
अपनी नसैनी
महज एक माध्यम
वही--ऊँचाइयाँ पानेवाली
सीढ़ी,
और तार लीं
अपनी दो-चार पीढ़ी।

सधते ही अपना स्वार्थ
मारकर मुझे लात
गिरा दिया जमीन पर
और मुझसे पाई हुई
ऊँचाइयों पर, ठाट से
अट्टहास करते हुए
चलाने लगे अपना राजपाट।
बोने लगे बबूल
उगाने लगे नागफनियाँ
लेने लगे प्रतिशोध
बना बैठे सन्देहों के संसार में
अपना लाक्षागृह,
अविश्वास और आत्मघात की
ईंटों से भुतहा राजमहल।

पर,
न वहाँ प्राणवायु
न वहाँ कोई बस्ती
न धूल-धरती का कोई स्पर्श
न तीज-त्यौहारों भरा
कोई पर्व-वर्ष
सन्देहों और अविश्वासों के
धधकते अलावों में
न कोई अपना
न कोई शुभ सपना।
समय के थपेड़ों ने
फेंका जब नीचे
तो फिर गिरे मुझपर ही।

लोग हँसे
सयानों ने ताने कसे
‘नसैनी खड़ी थी तो सीढ़ी थी
लात खाकर गिरी तो
आज काम दे रही है अरथी का,
खड़ी हो या पड़ी
काम यही आ रही है।’
और बोलते हुए
“राम-नाम सत्’
उठा लिया कन्धों पर
चल पड़े सीधे श्मशान की ओर।

वे चढ़े तब भी
मुझ पर वजन थे
गिरे, तब भी
मैं ही उन्हें ढो रहा हूँ।
लोग मुझपर हँस रहे हैं
और मैं?
अपनी, माध्यम होने की
मूर्खता पर रो रहा हूँ।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















रामबाण की पीड़ा




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की बत्तीसवीं कविता 




रामबाण की पीड़ा

राम मेरे!
हो गया वनवास पूरा
लौट आए तुम अयोध्या में
विजेता बन
मन गईं दीवालियाँ सारे अवध में
हो गया हर शत्रु का सन्धान-वध।
शेष अब कुछ भी नहीं है
जो तुम्हारे शौर्य या सन्धान का
कारण बने।
अब
राज्य को दोगे नया ही नाम
जिसको लोग कहकर गर्व से
उन्मत्त होंगे, राज्य है यह राम का,
यानी कि संज्ञा से विशेषण
या विशेषण से कसौटी
जो कहाए-‘रामजी का राज्य’।
और फिर होगा वही सब
जो सुनिश्चित है,
वनवास माता जानकी को फिर,
पुनः सामना अपने स्वयं के अंश से।
और सीता का, सुयश के बाद
अपनी माँ- धरा की गोद पाना
फिर तुम्हारा शेष जीवन
ग्लानि से भरकर बिताना।
छटपटाना, तिलमिलाना
किन्तु मर्यादा निभाना।
और फिर चुपचाप-एकाएक
पुण्य-सलिला मातु सरयू के किनारे
जा खड़े होना
जल-समाधि के लिए।
लोग जय-जयकार में
धन्य हो प्रभु! धन्य हो!
तुमको कहेंगे
चल पड़ोगे तुम अगम जलराशि में।
शस्त्र अपने सब रखोगे वहीं तट पर
और ‘मै’, हाँ! हाँ! तुम्हारा ‘रामशर’
तट पर पड़ा रह जाऊँगा
तूणीर में।
कोसता, रोता रहूँगा दैव!
इस दुर्भाग्य पर,
मैं तुम्हारी पीठ पर तूणीर में
निष्प्राण ही करता प्रतीक्षा
रात-दिन सिसका किया
कि आज तुम सन्धान में
मुझको वरोगे, जन्म मेरा भी सफल
सार्थक करोगे।
किन्तु मेरे राम!
मैं लदा बैठा रहा
मेघवर्णी पीठ पर तूणीर में
मात्र बोझा ही रहा रघुवंश पर
समय पर तुमने
मुझे साधा नहीं।

हाय!
यह अपयश भरा जीवन निरर्थक
मैं कहो कैसे जीऊँगा?
काम कुछ आया नहीं
राम का शर बन गया पर
शौर्य का संस्पर्श तक पाया नहीं ।

तूणीर से तनते धनुष तक
नासिका से कर्ण तक की यात्रा देते मुझे
बेधता मैं लक्ष्य को
मित्र करते ईर्ष्या
और अपने अग्निवंशी हास्य से
मैं करता निरुत्तर।

किन्तु मेरे राम!
मैं निरर्थक ही रहा बोझा बना
तूणीर तरकश में पड़ा
एक बन्धक की तरह श्यामल,
तुम्हारी पीठ पर
क्या करूँ इस आग का?
लाभ क्या रण-राग का?
और सचमुच एक दिन
राह का काँट समझकर फेंक देंगे
अवधवासी।

मुझ अभागे की करुणा गाथा
पूज्य! मेरा कष्ट जानेंगे नहीं
राम का मैं बाण था
लोग मानेंगे नहीं।
कर सको तो
मात्र यह उपकार कर दो
साधकर चाहे मुझे आकाश में
छोड़ दो बिलकुल अकेला,
पात्र हूँ मैं भी तनिक सम्मान का,
काम आया कुछ तुम्हारे
यह मेरा सन्तोष होगा
दो मुझे सादर विदा
क्षण मुझे मत दो
हलाहल पान का
पात्र हूँ में भी
तनिक सम्मान का!
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















पेड़ की प्रार्थना




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की इकतीसवीं कविता 




पेड़ की प्रार्थना

अपने तुच्छ सुखों के कारण
मत लो मेरी जान,
मत काटो, मत चीरो मुझको
मुझमें भी हैं प्राण।

            - 1 -

आठों पहर खड़ा रहता हूँ
लेकर अपनी काया
मेरी पत्ती-पत्ती देती
तुमको शीतल छाया
तब भी चला रहे हो आरी
कैसे हो इनसान ?
मत काटो, मत चीरो मुझको
मुझमें भी हैं प्राण।
अपने तुच्छ सुखों के कारण
मत लो मेरी जान।

            - 2 -

मुझे काटकर बनवा लोगे
कुरसी-मेज-तिपाई
या पलंग या खटिया-पटिया
कुछ चीजें सुखदायी
अपनी बैठक सजा-धजाकर
बढ़वा लोगे शान
(पर) मत काटो, मत चीरो मुझको
मुझमें भी हैं प्राण।
अपने तुच्छ सुखों के कारण
मत लो मेरी जान।

            - 3 -

समय-समय पर फल देता हूँ
देता सुन्दर फूल
जड़ से लेकर फुनगी तक हूँ
औषधि के अनुकूल
किसी तरह भी तुच्छ नहीं है
मेरा भी अवदान
मत काटो, मत चीरो मुझको
मुझमें भी हैं प्राण।
अपने तुच्छ सुखों के कारण
मत लो मेरी जान।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















उनका पोस्टर




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की तीसवीं कविता


 


उनका पोस्टर

मेरे शहीदों!
आज तक मैंने
किसी से नहीं कहा
कि
तुम्हारी शहादत के
बाद भी
तुम्हारे नाम पर
मैंने कितना कुछ सहा।
यूँ तो मेरा सिर
हमेशा नीचा है
तुम्हारे सामने
लेकिन बीसवीं सदी का
सबसे बड़ा अपराधी
(वह भी तुम्हारा)
बना दिया है
मुझे राम ने।

मैं खुद को
तुम्हारा निर्लज्ज अपराधी
घोषित करता हूँ
माँगता हूँ तुमसे
कठोर सजा
कि,
तुम जब गाड़कर
आकाश पर मेरी ध्वजा
वापस नहीं लौटे
तब,
उन्होंने मेरी दीवार पर
अपना पोस्टर
बड़े दर्प से चिपकाया
और मुझे चेताया--
‘देखो!
यह पोस्टर हम
लेई या गोंद से नहीं
शहीदों के खून से
चिपका रहे हैं
ससम्मान रखवाली करना
इस पोस्टर की
हम दूसरी दीवार की
तलाश में जा रहे हैं।’
अब,
दीवार मेरी
पोस्टर उनका
और खून तुम्हारा।
मातम मेरे घर
और उनके घर
बेशर्म खुशियों का फव्वारा।

मैं चीखना चाहता था
पर चीख नहीं पाया
इस कायर भीड़ से
अलग दिख नहीं पाया।
मेरे शहीदों!
मेरी दीवार पर
उनके पोस्टर के पीछे लगा
तुम्हारा खून पपड़ा रहा है
और यह पपड़ाता लहू
मुझे न जाने
कौन-कौन से पाठ
पढ़ा रहा है?
-----






संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















तब भी




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की उनतीसवीं कविता 




तब भी

अधमरी उमंगें
अधमरा उल्लास
न कहीं वसन्त
न कहीं मधुमास।
मीलों तक पता नहीं
टेसू पर फूलों का
बीत गया सारा फागुन
पर ताला नहीं खुला
कामदेव के स्कूलों का।
आम बौराया नहीं
कोयल ने पंचम लगाया नहीं
रसीली तितली की तलाश में
एक भी भँवरा आया नहीं।
कुँवारे ही मर गए
अलसी और सरसों के फूल
सबकुछ अटपटा
सबकुछ ऊलजलूल।
डफ, चंग और माँदल पर
घनघोर उदासी
अलगोजे की तान तक
ले रही है उबासी।
तब भी वे मान रहे हैं
इसे वसन्त
शायद यही है अनन्त-का-अन्त।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
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सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















पराजय-पत्र




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की अट्ठाईसवीं कविता




पराजय-पत्र

अपराजिता ही नहीं
अपरा हो तुम
अद्भुत! अपूर्व!!
शील और सहनशीलता
का प्रतिमान
तुम्हें भी नहीं है
जिसका अनुमान।

शील और सहनशीलता
के नाम पर
सदा होती रही है
तुम्हारी परीक्षा।
क्या-क्या नहीं सहा तुमने?
कब-कब नहीं सहा तुमने
मुझे?
माँ बहिन पत्नी और प्रतिमा
हर रूप में, हर रिश्ते में
भार रहा मैं ही तुम पर।

तुम्हारे ‘समर्पण’ का
सदैव किया है दुरुपयोग मैंने।
यह ‘मैं’
यहाँ पुरुषवाची ‘मै’ है।
इसी ने तुम्हें भरमाया
भटकाया और भीरु बनाया
इसी ने तुम्हें रिश्तों के
कमल-वन में उलझाया।

माँ के सामने मैं मचला
बहिन के सामने में
सीधा नहीं चला
पत्नी के पतिव्रत पर
तिल भर नहीं पिघला
और बना-बनाकर
देवी रूपों में
तुम्हारी प्रतिमाएँ
चढ़ाता रहा फूल
लगाता रहा अगरबत्तियाँ
करता रहा प्रार्थनाएँ
माँगता रहा मनौतियाँ।
और तुम?
सहती रहीं हर क्षण
मेरे सारे पाखण्ड।

विजेता के रूप में
जब-जब भी आया
तुम्हारे सामने
तुम मुसकराती रहीं
कभी लोरी तो कभी
लावण्य गाती रहीं ।
और इशारों-ही-इशारों में
चुपचाप मुझे समझाती रहीं कि,
पुत्र से लेकर पति और पुरुष तक के
मेरे हर रूप को तुम
खूब पहचानती हो
तब भी तुम मुझे अपना
न जाने क्या-क्या मानती हो।

और तब बालू की नींव पर
खड़ा मेरा दुर्दम्य दर्प
परास्त होकर
हस्ताक्षर करता है
अपने पराजय-पत्र पर
जिसपर लिखा है
अपराजिता ही नहीं
अपरा हो तुम
शील और सहनशीलता
का प्रतिमान
तुम्हें भी नहीं है
जिसका अनुमान।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















जन्मदिन पर-माँ की याद




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की सत्ताईसवीं कविता 




जन्मदिन पर-माँ की याद

आज आगर माँ होती
तो कुँवारी बछिया के गोबर से
लीपती आँगन
बिछाती उस पर हरी दूब
निछराती कुंकुम-अक्षत
पधराती मंगलदीप
पूरब को करती प्रणाम
और करके आचमन
लेकर अपने कुल देवता का नाम
सिर सहलाती मेरा
छाती से चिपटाती मुझे
अपना आँचल ओढ़ाती
ममता और वात्सल्य के
महँगे मोती लुटाती
बलैयाँ लेती
और मन-ही-मन मेरा
मंगल मनाती।
कहती,
‘खूब जियो मेरे लाल!
अपना दिल-दिमाग और दरवाजा
हमेशा रखना खुला और विशाल।’
और अपने हाथ से
खिलाती पुराने गुड़ की डली।
तब
इस उम्र में भी
ममता के उफान से
गीले हो जाते उसके आँचल
सूखी रेत पर
फूट पड़ती सहस्रधारा।
नए सिरे से
समझ में आता मुझे
गंगोत्री, गौमुख और
गंगा का मतलब
तब
मैं छूता माँ के पाँव
उठाता कलम
और लिखता एकाध शाश्वत पंक्ति।
लाड़ भरी झाड़ खाता उसकी,
‘कुछ काम भी करेगा
कि सारी उम्र बस
कागज ही काले करेगा?
राम जाने
इतना लिख-लिखकर
किसके सिरहाने धरेगा?’
और फिर
एक भरपूर नजर
मुझपर डालकर
डाँटती अपनी बहू को,

‘अच्छा-भला नारियल-सा
गोल-मटोल सौंपा था तुझे
बनाकर रख दिया है
साँतिये की लकीर-सा,
इसे कुछ खाने को दे
सुख-चैन से रख
रात-दिन करती रहती है
न जाने कहाँ की चख-चख।’
और उसे भी देती आशीष,
’सुख से रहें तेरे लाल
हीरे-मोती बरसते रहें
तेरे आँगन में
तेरे पड़ोसी की देहरी को भी
नहीं छुए दुःख की परछाई
जब से तू इस घर में आई
उजाला-ही-उजाला है
दिपदिपाती रहे तेरी बिन्दिया
लहकता रहे तेरा सिन्दूर।
कुछ खाया-पिया कर
अपने बच्चों की
रमत-गमत में
हँसती-गाती जिया कर।’
और फिर
जुड़ जाती अपने नाती पोतों से।

पर.....
आज नहीं है माँ
बरसों पहले
एक अनुभूत-अज्ञात-अलख ईश्वर ने
छीन लिया मुझसे
उसी का दिया हुआ
वो सशरीर ईश्वर,
जो सम्बोधन से होता था-‘माँ!’
और उपस्थिति से होता था
पालनहार परमात्मा-मेरा ईश्वर
उसके बिना
यह मन्दिर अब रह गया है
ईंट-पत्थर का मात्र एक मकान
या अधिक-से- अधिक
मेरा घर।

समझ नहीं पड़ता
आज के दिन मैं क्या करूँ?
ये एक कागज और
कर दिया काला
इसे अब
किसके सिरहाने धरूँ?
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















एक और जन्म-गाँठ




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की छब्बीसवीं कविता 




एक और जन्म-गाँठ

आज अगर पिताजी होते
तो ब्राह्ममुहूर्त में ही
कर चुके होते
मेरी खातिर
सुन्दरकाण्ड का पाठ
और पोथी को
बस्ते में बाँधने से पहले
लगा चुके होते
उसकी डोरी में
एक और गाँठ।
जिसे वे गिनवाते
माँ से
और पूछते कि आज मेरी
कौन सी जन्म-गाँठ है।

जब आशीष लेने
जाता मैं उनके पास
तो देते जरूर आशीर्वाद
लेकिन
पहले देते उपदेश
गिनवाते जिम्मेदारियाँ
पूछते न जाने किस-किसका
कुशलक्षेम
ब्योरा लेते परिजनों का।
मैं कहाँ-कहाँ गया
कहाँ-कहाँ घूमा
क्या-क्या किया
कौन मरा, कौन जिया ?
यानी कि
मथ देते मेरी चेतना को
यहाँ से वहाँ तक।
थाह ले लेते मेरी एक-एक शिरा की
झाँक लेते मेरे अन्तर के
एक-एक गवाक्ष में
नाप लेते मेरे अन्तर्यामी
का कद
मैं गिनता रहता रुद्र के मुख
अपने काल्पनिक रुद्राक्ष में।

कहते,
‘एक चक्कर लगा आ
खेत की मेड़ पर
बित्ता भर ही सही
आखिर बाप-दादा का धन है
जाने का तो मेरा भी मन है
पर अब तू ही हो आ।’

और फिर
माँ को लगाते आवाज
बुलाकर पेशी करते उसकी
लगाते कोई आरोप
कोई इल्जाम
और सुनाते फैसला।
झल्लाते बिना बात
जोड़ते हम दोनों के हाथ
छोड़ते लम्बी साँस
कहते, ‘तुम लोगों से भरपाया
ज्यादा-से-ज्यादा
फाड़ लूँगा एकाध कुरता और
इतनी कट गई
इतनी और कट जाएगी
पर तुम लोग
कब समझोगे अपनी जिम्मेदारी?’
और फिर उँडेलकर अन्तर की
पितृ-भावना सारी-की-सारी
कहते, ‘खैर,
जाओ! खुश रहो!!
खूब फलो-फूलो
पर भगवान
और अपने माँ-बाप को
मत भूलो।’
कोशिश अगर
करती माँ
बीच में बोलने की
तो वे खीज पड़ते,
‘तूने अपने जाये को
माथे पर बैठाकर
बिगाड़ रखा है
तभी तो इसने जिम्मेदारियों से
पल्ला झाड़ रखा है।
जाओ! बाँटो मिठाई
और अपना मन पड़े
वो करो
मेरे सामने खड़े-खड़े
आज के दिन
ठण्डी साँसें मत भरो।
साल भर में एक बार
ये दिन आता है
वो भी तुम माँ-बेटों से
राजी-बाजी नहीं मनाया जाता है।’

और...माँ मुझे समझाती,
‘ले, चल बेटे!
इनकी जबान मत देख
इनका मन मेरे ही जैसा है,
मुझे देख,
ऐसा नहीं होता तो
क्या मैं सात-सात जनमों के लिए
इन्हें अपना सुहाग मनाती ?
तुझे अपनी कोख में
लेने से पहले ही
मर नहीं जाती?’

और मैं छूकर पिता के पाँव
माथे पर कर लेता
माँ के आँचल की छाँव।
पर...आज?
न माँ है न पिताजी
रह-रहकर
यादें हो जाती हैं ताजी
कितनी याद आती है माँ?
कितना याद आते हैं पिता?
उपदेश-अनुशासन
वात्सल्य और ममता के बिना
इस जन्म-गाँठ
की क्या तो उमंग
और कैसी अस्मिता?
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















राज करिए दीप को




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की पचीसवीं कविता 




राज करिए दीप को

फूँक देकर मत बुझाओ
उस दीये को
जो लड़ा हो रात भर अँधियार से
आ गई हो यदि
दिवाकर की कनक किरणें
तुम्हारे द्वार पर।
तो 
दीये को दो विदा सादर
मानकर आभार उसका
वन्दना उसकी करो
प्रार्थना में सिर झुकाओ
फूँक देकर मत बुझाओ
‘राज’ कर, दो विदा।
माँ मुझे अकसर यही कहकर
दीये के सामने करती खड़ा
और करती प्रार्थना
‘ज्योतिधर! हे ज्योति के वंशज!!
यह कृपा कुछ कम नहीं
हम पर तुम्हारी
जबकि कोई भी नहीं तैयार था
इस युद्ध को तुमने लड़ा
तम-तोमवाली कज्जली काली अमावस
रात से निष्कम्प जूझे
हारकर हम सो गए
किन्तु तुम हारे नहीं
रात भर देकर उजाला
दी हमें आश्वस्तियाँ
हो गई उजली हमारी बस्तियाँ
हे ज्योतिधर! अब तुम करो विश्राम!
और फिर करती ‘पवन’
आँचल उढ़ाकर
दीप की उजली किरण को
एक पल भर ढाँकती
आह्वान करके
‘राज’ करती।
फिर वही आँचल उढ़ाती थी मुझे
शीश मेरा ढाँकती
और कहती,
‘दीप है तू ही मेरे वंश का
जिन्दगी में हो अँधेरा
तो कभी विचलित न होना
जूझना-लड़ना मगर
बुझना नहीं, हारना मत
साथ दे संघर्ष में
आभार उसका मानना
जो अँधेरे से लड़े उस
बन्धु को फूँक देकर
मत मारना।
‘राज’ का मतलब नहीं है
राज्यसत्ता
राज का मतलब
उसे राजी रखो
नाराज उसको मत करो
फूँक देना थूक देना है
तपस्या पर किसी की
दीप का अपमान है
यह।
राज करके यदि विदा दोगे
उसे तो
हौसला उसका सदा जीवित रहेगा
कल तुम्हारे युद्ध में
इस हौसले के साथ वह
फिर से जलेगा
भावना मन से
निरादर की निकालो
ज्योति का व्यवहार
यह संसार
सादर ही चलेगा।’
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
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संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















एक दिन




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की चौबीसवीं कविता 




एक दिन

दाहिने हाथ ने
जल-कलश से
गमले के फूल-पातों को सींचा
और बाएँ हाथ ने
उसका एक फूल तोड़ा।

मनीषी मन ने
बाएँ हाथ को मरोड़ा
‘यह क्या पागलपन है?’
गमला बोला,
‘यही है सुबन्धु हाथों का
अपना-अपना धर्म
मनीषी होकर भी
नहीं समझते
पूर्व-अपूर्व का मर्म।’
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
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संस्करण - प्रथम 2003
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मैं रहा टेसू-का-टेसू




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की तेईसवीं कविता 





मैं रहा टेसू-का-टेसू

कोई न कोई
रिश्ता है जरूर
आम और कोयल में।
ये गाए
और वो बौराए
याकि
ये बौराए
और वो गाये
कैसे हो जाता?

पता नहीं
पहल कौन करता है ?
ये उसपर मरती है
या वो इसपर मरता है ?
पर कोई-न-कोई रिश्ता
है जरूर!

जब मैंने पूछा
पड़ोसी पलाश से
कि गुरु!
तुम्हें तो जरूर
जानकारी होगी
इस अन्तर्यामी अनुराग की
तो वो बोला-
भाई, कसम खाता हूँ
मेरी अपनी आग की
मुझे कुछ पता नहीं।
कोई चक्कर-वक्कर हो तो
कोयल की कोयल जाने
आम की आम जाने
इन बौराते-गाते दिलों की
बातें राम जाने।
जी हाँ!
मैं खड़ा हूँ लाल सुर्ख
गाल लिये
पर ये काली-कलूटी
कलमुँही कोयल
फूटी आँख भी नहीं देखती
मेरी ओर
और नापकर अनन्त आकाश
के अनजाने छोर
अनायास घुस आती है
अमराई की झमकारियों से।
चढ़ जाती है
ऋतुराज के रति महल की
अनगिन सीढ़ियाँ
और फागुन से आषाढ़ तक
कभी-कभी तो
फागुन से सावन तक
गाती रहती है
अनंग के अनगाए गीत
और जब तक
नहीं जाता
वसन्त बीत
तब तक जलाती रहती है
मेरा कलेजा।
झरता हूँ मैं पात-पात
अकसर सारा-सारा दिन
और पूरी-पूरी रात सुनता हूँ
इनके हूक भरे संवाद
छन्द-छन्द
देखा नहीं जाता मुझसे
ये केलि-कीर्तन
कर लेता हूँ
अपनी आँखें बन्द।

आम लुटता है बौर-बौर
कसकता है मेरा पोर-पोर।

अब किस ज्योतिषी से
जँचवाऊँ मेरी कुण्डली
किस काम की ये ललाई
जिसपर रीझ नहीं पाई
एक भी करमजली।

आखिर मैं भी तो हूँ
इसी ऋतुराज का एक हिस्सा
पर ये दोनों
मस्त हैं अपने-अपने
राग में, अनुराग में
और मैं रात-दिन
जल रहा हूँ
अपनी ही आग में।
अब
जो गा रही है उसे गाने दो
जो बौरा रहा है उसे बौराने दो
मैं रहा टेसू-का-टेसू
मुझे अपने टेसुए, इसी तरह,
यूँ ही बहाने दो।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















आज का अखबार

 



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की बाईसवीं कविता 




आज का अखबार

क्षितिजों पर स्वस्तिक माँडती ऊषा
स्वस्तिकों का स्तवन करता सूरज
आकाश का अलस आलिंगन करती सुषमा
तारों से छिप-छैंया खेलती छटा
इधर धरती पर
रँभाती गैयाँ
कुलाँचें भरते वत्स
खिलते फूल
चटखती कलियाँ
गुनगुनाते भँवरे
उड़ती तितलियाँ
कमानीदार कोंपलें
नाचते मोर
कलरव करते पंछी
आह्लाद बरसाती बयार
यह सब दिखाई पड़ा
बरसों बाद पहली बार
तो बरबस फूट पड़ी ऋचाएँ
अब आपको
क्या-क्या बताएँ?
दरवाजा खटखटाया खुशबू ने
आवाज दी सौरभ ने
लाँघकर देहरी
बाहर तो निकल।
भूल जा धन और ऋण का गणित
जी भर लूट ले
सम्पदा-समृद्धि-अनन्त वैभव
खोल ले अपने भाग
हो जा सौ क्या हजार गुणा
देख तो सही अद्भुत आकाश को
आ भी जा प्रकृति की बाँहों में।
चल नहीं पाता तो
बैठ जा घुटनों के बल
माँड कर ओक
पी ले जितना पी सके
रन्ध्र-रन्ध्र में समा ले समष्टि को
प्राणों में बसा ले अलख वृष्टि को
कोई नहीं है रोकनेवाला
कौन है तुझे टोकनेवाला ?
बन्द करके कपाट
आदत डाल ली अँधेरे की
भूल गया अठखेलियाँ
सुबह-सवेरे की।
पागल नहीं थे पुरखे तेरे
वे गायत्री पढ़ते नहीं रचते थे
उनके मन्द्र षड़ज से
नक्षत्र तक कहाँ बचते थे?
लगते ही पहला सुर
उछल पड़ता था सूरज
बावली हो जाती थी ऊषा
आँगन बुहारना भूल जाती थी सुषमा
छीना-झपटी बिसर जाती थी छटा
अनुशासित हो जाता था सारा अटपटा।
और तू?
उनका उत्तराधिकारी
अपने ही बुने अँधेरे में
फटा दूध पी रहा है
तिस पर प्रमाद ये कि
तू ठीक जी रहा है।
पढ़ा तूने उस अलख का
आज का अखबार?
न कोई छापे की भूल
न कोई व्याकरण की गलती
उफ।!
कितना सही वाक्य विन्यास
न हत्या, न बलात्कार
न हिंसा, न हाहाकार
हर पृष्ठ पर सात्विक
और सत्य समाचार।
शब्द-शब्द ब्रह्म
पंक्ति-पंक्ति रस
अनुस्वार तक आनन्ददायी
इधर से पढ़ो कि उधर से
कविता....कविता और केवल
कविता
तिल भर भी फैली नहीं स्याही
अब बाहर भी निकल
मेरे भाई!
मसलकर आँखें
आँगन में आ जा
साँसों में समेट ले
ये सारा कुबेर-धन
आज से ही आदत डाल
उगता सूरज देखने की
वरना
इस आपा-धापी में
तू ऊब जाएगा
और चाहे मत मान
मेरी बात
पर सूरज से पहले ही
तू डूब जाएगा।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















हिन्दी




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की इक्कीसवीं कविता 





हिन्दी

हिन्दी नहीं किसी की दासी
हिन्दी अपने घर की रानी
हिन्दी है भारत की भाषा
हिन्दी है गंगा का पानी,
हिन्दी अपने घर की रानी।

            - 1 -

भारत में ही जनमी हिन्दी
भारत में परवान चढ़ी
भारत इसका घर-आँगन हैं
नहीं किसी से कभी लड़ी.
सबको गले लगाकर चलती
करती सबकी अगवानी
हिन्दी अपने घर की रानी।

            - 2 -

खेतों-खलिहानों की बोली
आँगन-आँगन की रांगोली
सत्यं-शिवं-सरलतम-सुन्दर
पूजा की यह चन्दन रोली
जनम-जनम, जन-जन की भाषा
कण-कण की वाणी कल्याणी
हिन्दी अपने घर की रानी।

             - 3 -

भूख नहीं है इसे राज की
प्यास नहीं है इसे ताज की
करती आठों पहर तपस्या
रचना करती नव समाज की
याचक नहीं, नहीं है आश्रित
सदा सनातन अवढर दानी
हिन्दी अपने घर की रानी।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















गुलदस्ते! गमले! बगीचे और खेत




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की बीसवीं कविता 





गुलदस्ते! गमले! बगीचे और खेत

बने-बनाए गुलदस्ते
और सजे-सजाए गमले
लेकर पहुँच जाते हैं वे
अपने देवता के दरबार में
ठीक उस वक्त जबकि
बँटने को होता है प्रसाद।
समय को साधना
और अवसर को भँजाना
कोई उनसे सीखे।
वे करीने से सजाते हैं
अपने गमले
चतुराई से रखते हैं
गुलदस्ते
फूलों और कलियों का
बना देते हैं एक किला
और फिर शुरु होता है
प्रसाद की लूट का सिलसिला।
फूलों के किले में कैद देवता
न हिलने का न डुलने का
न चलने का न फिरने का
सारी दुनिया देखती है
यह दृश्य
गन्धमादन में
सक्षम देवता के
घिरने का।
इधर आप
करते रहते हैं
खेती फूलों की
तैयार करते हैं
बाग-बगीचे
उम्मीद करते हैं कि
कभी इधर से
गुजरेंगे देवता
देखेंगे आपके बाग-बगीचे
आँकेंगे फूलों की
खेती के करिश्मे को
प्रसाद न सही
मिलेगा आपको प्रोत्साहन।
लेकिन ऐसा होता नहीं है
न वे होने देते हैं।
क्योंकि अपनी
कातर प्रार्थनाओं में
वे समझा देते हैं देवता को,
‘हे देव!
ये वे ही फूल हैं
जो आप ही के लिए खिले हैं
हमें बड़े परिश्रम
और पुण्यों के बदले
मिले हैं।’
और फिर,
होने लगती है
नई सजावट
लूट लेते हैं सारा प्रसाद
उलझा लेते हैं आरतियों
और आर्त वचनों में
आपके देवता को।
इस तरह
आपका परिश्रम-पसीना
फूलों भरे खेत और
बाग-बगीचे हार जाते हैं
और
आपके ही फूलों से
सजे-धजे गमले
और गुलदस्ते
बाजी मार जाते हैं।
आप खेतों और
बगीचों को
ले नहीं जा सकते
वहाँ तक
गमले और गुलदस्ते
पहुँच जाते हैं
जहाँ तक।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















बड़ी ताकत है फूलों में




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की उन्नीसवीं कविता 




बड़ी ताकत है फूलों में

उन्होंने
आपके कदमों में
सोच-समझकर
पहला फूल रखा
और अपनी चतुरंग चौसर
की चतुराई का
पहला स्वाद चखा।
आपने किया
फूल का लिहाज
उसे रौंदा नहीं
कुचला नहीं
ठिठक गए आप
बाएँ के बाद
दायाँ पाँव चला नहीं।
और वे समझ गए
कि वे बदल सकते हैं
आपकी चाल
महज दस-बीस फूलों से
उन्हें क्या लेना-देना है
आपके उसूलों से।
बस
उन्होंने लगा दिए 
आपके रास्ते में
मेले फूलों के
देखते-देखते
बदल दिए उन्होंने
पाल आपके मस्तूलों के।
बेशक आप
चल जरूर रहे हैं
पर चुपचाप
बदल दिए हैं उन्होंने
आपके रास्ते।
अब उनके रास्ते ही हैं
रास्ते आपके वास्ते।
कल तक फूल उनके थे
पर रास्ते आपके थे
आज रास्ते भी उनके
फूल भी उनके
दरिया भी उनका
दुकूल भी उनके।
आप इन फूलों को
मसलें-न-मसलें
वे आपके चरित्र को
मसल देते हैं
बड़ी ताकत है फूलों में
वे आपका
चाल-चलन सब
बदल देते हैं।
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















उनका पेशा




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की अठारहवीं कविता 




उनका पेशा

न वे आपके
प्रेमी हैं, न पुजारी
सेवक या उपासक
तो हैं ही नहीं।
भक्त वे हो नहीं सकते।

उनके इष्ट या अभीष्ट का
अनुमान नहीं है आपको
बड़े अगम्य हैं वे
इसीलिए प्रणम्य हैं वे।
जो लगते हैं आपको
आराधक जैसे
सीधे-सादे साधक जैसे।

उनकी नन्दी मुद्रा
उनका गरुड़ासन
सब हैं सोद्देश्य
वे चाहते हैं बस
आपकी कृपा विशेष
कि केवल एक बार
आप उनकी पीठ भर
सहला दें
ताकि वे आपके नाम से
दुनिया को दहला दें।

हर ताकतवर के सामने
उकड़ूँ बैठना
उनका संस्कार है
उकड़े बैठकर
अपनी पीठ खोल देना
उनका पेशा है
व्यापार है।

इसमें
न पूँजी लगती है
न पैसा
जिस पेशे में
नफा ही नफा हो
उसमें सोच और
संकोच कैसा ?
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संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली