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वे और मैं

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की इकतीसवीं/अन्तिम कविता 





वे और मैं

आश्वासन से उपासना तक
मैं उन्हें कुछ नहीं दे पाया।
उन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया है
गाली से गुलाल तक।
उनकी कनपटियों की गर्मी
मैं अपनी रगों से जोड़ता हूँ
वे मेरा जो चाहे सो करें
सारा फैसला
उन्हीं पर छोड़ता हूँ।
स्वागत-द्वार, तोरण, वन्दनवार
फूल-हार और जय-जयकार
पहिले की तरह रोमांचित नहीं करते।
वे जानते हैं कि
मैं क्या बोलूँगा
मैं जानता हूँ कि
वे क्या कहेंगे?
निश्छलता के दोनों किनारे
टूट चुके हैं।
मक्कारी और स्वार्थ के बीच वाले
राजमार्ग ने
निगल ली हैं
विश्वास की सारी पगडण्डियाँ।
वे जी रहे हैं एक घुटन, टूटन और आक्रोश को
मैं जी रहा हूँ
असुविधा और सुलगते हुए आत्म सन्तोष को।
होना बहुत कुछ चाहता है
पर होता नहीं है।
झुग्गी से लेकर झिलमिल शीश महल तक
चैन से कोई सोता नहीं है।
वे सिमट गये हैं अपने आप में
मैं फैल गया हूँ सीमा से ज्यादह
फिर भी उन्हें मेरी प्रतीक्षा है
राम जाने
यह किसकी अग्नि परीक्षा है।
जीने को सब जी रहे हैं
चलने को सब चल रहा है
साबूत कोई भी नहीं है
हर एक का
कुछ-न-कुछ जल रहा है।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
कॉपीराइट: लेखक
मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग





यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 















एक निर्लज्ज प्रश्न: बदले परिवेश से

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की तीसवीं कविता 





एक निर्लज्ज प्रश्न: बदले परिवेश से

ताशकन्द से विजयघाट तक
यह कैसी खामोशी?
रक्त-ज्वार का शोर कहाँ है
यह कैसी नामोशी ?
क्या रहस्य की गाँठें बोलो
अब भी नहीं खुलेंगी?
तुम जिसको कालिख कहते थे ;
अब भी नहीं धुलेगी?
क्यों ललिता की माँग सुहागन
हुई अचानक रीती?
अनाघात आघात हुआ क्यों?
वामन पर क्या बीती?
घाव-घाव से परिचित हो तुम
ओ बदले परिवेश!
सारे उत्तर माँग रहा है
तुमसे मेरा देश।
अमन-अमन! कह करके हमको
तुम तो मत बहकाओ।
ताशकन्द से अब तो पूछो
सत्य प्रकट करवाओ।
ओ दिल्ली के देव फरिश्तों!
नये नये अवतारों!
राजनीति के शब्दकोश को
तुम तो जरा सुधारो।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
कॉपीराइट: लेखक
मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग




यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














खून

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की उनतीसवीं कविता 







 खून
(सिन्धी कविता का अनुवाद)

मैंने अपने रक्त रंगे हाथों को देखा
मेरे ही हैं हाथ
किन्तु यह रक्त नहीं है मेरा।
मेरा होगा भी कैसे?
हो ही नहीं सकेगा मेरा।
हाथ-पाँव नीले हैं मेरे
और देह सारी पीली है
आँखें मेरी हरी कच्च हैं।
मेरे पास कहाँ से आया लाल रक्त यह!
निश्चय ही यह किसी दूसरे का ही होगा।
रक्त दूसरे का?
मेरे हाथों पर?
कैसे हो सकता है?
भला, किसी का खून बहाऊँगा मैं क्यों कर?
लेने-देने छिनवाने या
छीन झपट के लिये
किसी के पास रहा ही क्या है?
खून किसी का भला बहाऊँगा मैं कैसे?
मुझमें इतनी शक्ति कहाँ है?
और कहाँ सामर्थ्य शेष है
जो कि बहाऊँ रक्त किसी का?
ना
नहीं किसी का खून बहाया है मैंने।
मैं इसका सबूत रखता हूँ।
कि, मेरे पीछे कोई पुलिस नहीं हैं
किसी नियम या विधि विधान ने
न्यायालय में नहीं किया है प्रस्तुत मुझको।
जो निर्दाेषों तक को फाँसी दे देते हैं
वे क्या दोषी को यूँ
मुक्त विचरने देते?
तो फिर क्या है ?
खून नहीं है मेरा सचमुच
और नहीं है किसी दूसरे का भी
तो फिर मेरे हाथों पर यह क्यों है?
एक बार फिर मंने अपने
रक्त रंगे हाथों को देखा बहुत गौर से
और खुद से खुद ही पूछा
कहो! खून तुम किसके हो?
मेरे ही हाथों पर क्यों हो?
लगा कहकहा कहा खून ने
मुझे नहीं पहिचाना तुमने?
सच है
पहिचानोगे भी नहीं मुझे तुम।
मैं
रक्त तुम्हारा नहीं
तुम्हारे जीवन का हूँ
जीवन ने प्रत्येक एक को
अपना एक सलीब दिया है
जिसका बोझ स्वयं ही अपने आप
तुम्हें ढोना होता हैँ।
और रक्त अपने जीवन का
देकर अपने ही हाथों
एक विवश जीवन जीने को
खुद प्ररतुत होना होता है।

(मूलकवि: श्री कृष्ण राही। सर्वभाषा कवि सम्मेलन,
आकाशवाणी दिल्ली में दिनांक 24 जनवरी 1980 को प्रस्‍तुत।)
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
कॉपीराइट: लेखक
मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग






यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 















एक निवेदन

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की अट्ठाईसवीं कविता 





एक निवेदन

जन्म भर तुमसे असहमत ही रहा हूँ.
इसलिए मैं आज भी सहमत नहीं हूँ
उस दिशा से
जिस दिशा में रास तुमने मोड़ कर के
छोड़ना चाहा मुझे था।
स्पष्ट सुन लो
मैं असहमत हूँ तुम्हारी मृत्यु से भी।
प्रार्थता का प्रश्न ही पैदा नहीं होता
स्वार्थ है
सचमुच सनातन स्वार्थ है
शुद्ध मेरा, या कि
मेरी ही तरह लाखों करोड़ों का।
मत करो तैयारियाँ अन्तिम बिदाई की
रहो जीवित
खिलौना टूटने मत दो।
तुम्हें हम छू सकें, बतिया सकें
वक्त आने पर तुम्हें हम दे सकें धोखा
इसलिए मैं कह रहा हूँ
मत करो तैयारियाँ अन्तिम बिदाई की
रहो जीवित।
यदि कहीं तुम चल बसे
तो फिर वही षड़यन्त्र होगा
जो तुम्हारी जान लेने पर तुले हैं
वे सभी साथी तुम्हारे
हाँ वही
जिनको कि तुम अनुयायियों में मानते हो
दूर गंगा या कि जमना के किनारे
एक स्मारक था समाधि
रस्म में बनवायेंगे
और उस पर
दूसरे तट खड़े मेरी तरह के लोग
ठाठ से जाकर शपथ खा जायेंगे
और फिर हम देश को देंगे दगा
यह शपथबाजी यहीं से बन्द हो
तुम करो मेरी मदद
मत करो तैयारियाँ अन्तिम बिदाई की
रहो जीवित
प्रार्थना का प्रश्न ही पैदा नहीं होता
यह सरासर स्वार्थ है
स्मारकों की श्रेणियों से दूर ही खुद को रखो
तुम मरो मत 
द्वार किसके जायेगी
मेरी असहमति
इन करोड़ों असहमतियों को
इस घड़ी विधवा करो मत।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
कॉपीराइट: लेखक
मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग





यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














हम भूल गए हैं वेदराग

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की सत्ताईसवीं कविता 





हम भूल गए हैं वेदराग

(आर्य समाज, बदायूँ के शताब्दि समारोह 12, 1, 14 अक्टूबर 1975
के अवसर पर महर्षि दयानन्द के प्रति एक भावांजलि।)

वह शक्ति नहीं वह भक्ति नहीं
आसक्ति मात्र बस रही शेष।
हे क्रान्ति देव! तुम देखो तो
अब वहाँ जा रहा आर्यदेश?

हल्की-सी आँधी में बरगद तक
उखड़ गए निर्मूल हुए।
अनुकूल दैव भी क्यों होगा
जब हम खुद ही प्रतिकूल हुए।

पदचिह्न तुम्हारे मिटे नहीं
पर हमसे जाता नहीं चला।
पहिले पूजो फिर बिसराओ
यह सीखी हमने नई कला।

बस धूर्तनीति ही प्रमदा है
है लोकनीति निश्शेष यहाँ।
वेश्या से बदतर राजनीति
विषकाल विषम परिवेश यहाँ।

सौ साल तुम्हें हम जी न सके
किस मुँह से गायें यशोगान?
हम प्रायश्चित तक कर न सके
मत देना हमको क्षमा दान।

जो तुमने जीवन भर साधा
हम भूल गए वह वेदराग।
निर्गन्ध फूल-सा जीवन है
कण मात्र नहीं परिमल पराग।

पथ भूले, भटके, ठिठके हैं
फिर वेद पन्थ दिखलाओ तो।
हे! आर्य-क्रान्ति के आदि पुरुष!
तुम एक बार फिर, एक बार फिर आओ तो।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
कॉपीराइट: लेखक
मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग




यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














अपनी-अपनी शक्ति

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की छब्बीसवीं कविता 





अपनी-अपनी शक्ति

पहाड़ों!
जितना टूट सकते हो टूट लो
प्रहरियों!
जितना लूट सकते हो लूट लो
न हम मासूम हैं
न बदहवास
निरीह तो हम हैं ही नहीं,
तोल लो अपनी-अपनी शक्ति
ताकत या कुव्वत
तुम्हारे पास हैं
चार टाँगों वाली कमजोर कुर्सी
हमारे पास हैं दो बलिष्ठ हाथ
जब भी आयेंगी
ये कमजोर टाँगें हमारे हाथों में
तुम बेशक पूछ लो पीछे वालों से
तब तिनके होंगे तुम्हारे दाँतों में।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग




यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध  कराया  है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।


रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














वशीकरण के खिलाफ

 



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की पचीसवीं कविता 





वशीकरण के खिलाफ

एक पागल सा अँधेरा
थाम कर उँगली हमारी चल पड़ा
और हम भी अनमने से चल पड़े हैं
राम जाने किस तरफ!
मंजिलों की बात
अब बस बात है
अन्ततः यह कौन-से उत्सर्ग की
सौगात है?
एक भ्रम का जाल टूटा
किन्तु जाला मोह की मकड़ी
नया फिर बुन रही है
और घायल पीढ़ियाँ
नोंचती हैं बाल, माथा धुन रही हैं!
हर तरफ दिग्पाल पढ़ते लग रहे हैं
मन्त्र काले
नींव की निष्ठा निरीहों सी पड़ी है
और पकते जा रहे हैं पीठ के छाले
एक पूरी पक्व पीढ़ी
फँस गई है टोटका करते हुए
टटपूँजिए मक्कार ओझा के अजाने देश में।
मिर्च, नींबू और अभिमन्त्रित उड़द
वाली लरजती मुट्ठियाँ हर ओर हैं
नव वशीकरणी हवा का स्पर्श है 
परिवेश में।
जब गणित ही दोगला होकर दगा देने लगे
तो राष्ट्रध्वज की डोरियों को
खींचता है कौन इसको छोड़िये
शून्य में हर अंक को करके समाहित
ठीक सच्चे समीकरण की ओर
युग को मोड़िये।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग






यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध  कराया  है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














दैन्य द्वापर का

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की चौबीसवीं कविता 





दैन्य द्वापर का

सूर्य ने स्याही उगल कर
कर दिया आकाश फिर काला
चलो माँजो गगन को
रक्तवर्णी पीढ़ियों पर
फिर वही दायित्व आया है।
हो सके तो फिर नया सूरज उगाओ
किस कदर हर साँस पर
अंधियार छाया है।
देश में इतना अँधेरा आज से पहिले
कभी था ही नहीं
पीढ़ियाँ ऐसी कभी भटकी नहीं थीं।
द्वार, तोरण और वन्दनवार के
उलझाव में
आत्मा आराध्य की ऐसी कभी
अटकी नहीं थी।
देव का आसन
जिसे अभिषिक्त अपने रक्त से
तुमने किया था
आज उस पर दैत्य सादर
जम गए हैं शान से
शील मिट्टी का सरासर भग्न है
और हम सब जी रहे हैं
पाण्डु पुत्रों की तरह अभिमान से। 
दैन्य द्वापर का सतत् साकार है
शौर्य जड़वत् मौन है चुपचाप है
हाय! ऐसी जड़ समाजी चेतना का
कवि कहाना
दैव है, दुर्देंव है या फिर किसी का श्राप है!
अभिशप्त-सा संतप्त-सा
पत्थरों के देश में
आकाश भर अँधियार में भी गा रहा हूँ
दे चुकी तुमको तुम्हारी भोर ही
उजला दगा।
मैं तुम्हारे नाम पर
निश्छल सुबह फिर ला रहा हूँ।
तुम उठो! माँजो गगन को
रक्तवर्णी पढ़ियों पर
फिर वही दायित्व आया है
तुम चलो तो!
पत्थरों को चेतना का स्पर्श दो
पंछियों तक ने
परों को फड़फड़ाया है।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग




यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध  कराया  है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














बहसरत वे

 

बहसरत वे

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की तेईसवीं कविता 





बहसरत वे

उनकी बहस का विषय
अभी भी
न तो आम आदमी है
न आम आदमी की समस्या।
वे बहस कर रहे हैं
स्याही के रंग पर!
वह स्याही
जो इतिहासकार
इतिहास लिखते समय
उनके नाम के लिए
प्रयोग में लायंेगे।
स्वनाम के सिवाय
शेष सब के नाम
उन्हें अभी से काले दिखाई दे रहे हैं
इस ओछी बहस में
वे एक दूसरे की जान ले रहे हैं।
खून का रंग लाल
और पसीने का रंग पनीला होता है
वे इस बात तक को भूल गए हैं।
वे इस बात को भी याद नहीं रख पाये कि
इतिहास के पृष्ठ
उनकी प्रतीक्षा में
कोरे नहीं पड़े रहेंगे
कितना भ्रम है उन्हें कि
काल अश्व पर वे
अनन्त काल तक चढ़े रहेंगे! .
उनका यशोगान करने वाले
पालतू तोतों को वे
इतिहासकार मान बैठे
उफ्
कितने भोले और
आत्मरतिलीन हैं वे
इतिहास की जठरानल
और पाचनशक्ति से अपरिचित
और कितने उदासीन हैं वे?
वे
अपने खुद के सिवाय
आज तक हुए नहीं किसी के
बहस ही बहस में
वर्तमान को पीना
और अत्यन्त व्यस्त निकम्मा जीवन जीना
कोई उनसे सीखे।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग




यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध कराया  है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 








तीसरा विकल्प

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की बाईसवीं कविता 





तीसरा विकल्प

जय-जयकारों से प्रमादित जनार्दन को
प्रमाद का प्रसाद प्राप्त हो गया
गिरोहों की गुलाम हो गई है क्रान्ति
गरिमा का गणित समाप्त हो गया।
शेष हैं दो ही विकल्प
या तो गाली दे गणित को
या कोसे करम को।
पर मेरे पास है तीसरा विकल्प
समीक्षा करो स्वयं के संकल्प की
निकम्मे आक्रोश को अनुशासित रख कर
फिर से उभारो
शोणित सो गया है, मरा नहीं है
सही भूमिका के लिए उसे फिर से पुकारो।
परिवर्तन से पीठ टिका कर बैठने की परिणति
और क्या होगी ?
क्रान्ति का नारा बनाने वालों की गति
और क्या होगी?
पीढ़ियाँ जब करने लगती हैं
इंकलाब पर केवल बहस
तो इंकलाब चुप हो जाता है
लफ्फाजी से लगाव नहीं हैं उसका
सूरज की छाती पर सिर रख कर
तब वह आराम से सो जाता है।
रक्त पीने और पिलाने की क्षमता हो जिसमें 
वह ही लगाए आवाज इंकलाब को, क्रान्ति को
सड़ा, सफेद और मुर्दार खून 
बड़े शौक से हल करे गिरोहों का समीकरण
और बनाये रखे
श्मशान की शान्ति को।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
कॉपीराइट: लेखक
मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग





यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध  कराया है।  ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














आत्मालाप

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की इक्कीसवीं कविता 





आत्मालाप

ओ मेरे ‘स्व’!
हँस
मेरे अन्तर्यामी मनु!
तू हँस!
व्यवस्था की जटिलता
और आचरण की कुटिलता
लाख रोके तुझे
पर तू हँस!
मेरे आत्मदेव! तू हँस!
विषम वातावरण में हँस कर जीना
और नागफणी निराशा का विष
ठठाकर पीना
मात्र तेरे बस की बात है।
तेरे निर्माता ने हँसने की शक्ति
दी है केवल तुझे, याने कि मनुष्य को।
तेरे सिवाय कोई हँस नहीं सकता
न घोड़ा, न गधा, न बन्दर, न भालू
न तोता, न मैना
फिर भी बिना हँसे गुमसुम रहना
खुला विरोध है उस प्रभु का।
विरोध भी करना है तो हँसते-हँसते कर।
रुदन से जीवन शुरु करने वाले मेरे आराध्य मनुष्य!
मरना भी हो तो हँसते-हँसते मर!
वक्त-बे-वक्त हँसने के लिए खुद को गुदगुदा
इस छोटे से काम के लिए
नहीं उतरेगा आसमान से
कोई खुदा ।
उसे और भी कई काम हैं
वैसे भी तेरे मारे उसकी नींद हराम है!!.
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
कॉपीराइट: लेखक
मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग






यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध  कराया है।  ‘रूना’  याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














सुबह का भूला

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की बीसवीं कविता 





सुबह का भूला

कोई भी अनुकूल नहीं है
न आकाश, न हवा, न पानी
और राम तेरी मेहरबानी
आग का तो कोई सवाल ही नहीं है।
या तो वह बुझ गईं है
या हो गई हे बर्फ।
अब बची केवल धरती
सो उससे सम्वाद टूटे
एक अरसा बीत गया।
इतना क्यों सहती हैँ वह?
धीरज का पाठ क्यों देती है वह?
इसी गुस्से में उसे पीठ दे दी।
अब कोई भी अनुकूल नहीं है।
जिनसे बना है मिट्टी का यह काँच
वे पाँच के पाँच
बिलकुल प्रतिकूल हो गए।
सारे रेत महल हवाई किलों की तरह
फिजूल हो गए।
तब फिर किससे बोलूँ?
मन की गाँठ किसके सामने खोलूँ?
सोचता हूँ धरती से ही शुरुआत करूँ
बाकी चार के लिए भी उसी से बात करूँ
अपनी ही जमीन से जुड़ने में
आखिर हर्ज क्या है? 
शायद वही बता सके कि
आग, आकाश, हवा और पानी को
इन दिनों मर्ज क्या है ?
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














मुद्दा

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की उन्नीसवीं कविता 





मुद्दा

क्रान्ति से कम
उनकी बहस का मुद्दा कभी नहीं रहा
उसे वे
सम्पूर्ण क्रान्ति तक ले गए
एक समूचा संकल्प काल
उनके हाथ से फिसल गया
और वे
बहस ही करते रह गए
अब वे फिर बहस कर रहे हैं।
बहस भी ऐसी वेसी नहीं
भरपूर और खुली
इस बार का विषय है
मेरा, तुम्हारा या और किसी का
भविष्य।
यह और बात है कि
चिन्ता अभी भी उन्हें
अपने ही भविष्य की है।
मैं नजर गड़ाए देख रहा हूँ
और सोच रहा हूँ कि
कितनी देर हो गई
अभी तक वे क्रान्ति की तरफ
क्यों नहीं मुड़े
याने कि
कुर्सी से क्यों नहीं जुड़े?
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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मूल्य: पच्चीस रुपये 
मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














चुनाव: मेरा खेत, मेरी फसल

 



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की अठारहवीं कविता 





चुनाव: मेरा खेत, मेरी फसल

मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ
उन गड़रियों की
जो अपनी-अपनी भेड़ें लेकर आते हैं
और मेरी फसलें 
बड़े इत्मीनान से चराते हैं।
मैं जानता हूँ कि
वे रेवड़ के रवड़ लेकर आवेंगे
मेरी फसलों को चरावेंगे
और देखते-देखते
उनमें से कई भेड़ें 
बदल जायेंगी भेड़ियों में।
तब पहिये लगाकर ऐड़ियों में
ओझल हो जायेंगे वे गड़रिये।
अपने उजड़ते खेतों को देखता रहूँगा मैं
आराम से चरती रहेंगी वे भेड़ियानुमा भेड़ें।
खेत का रखवाला मैं
अपनी फसल के लिए कभी नहीं रोया
तसलल्ली इसी बात की है कि
अभी तक मैंने अपना खेत नहीं खोया।
हर बार लगता है कि
ये भेड़ें आज या कल कट जायेंगी
पर वे कटती नहीं हैं।
सुरक्षित हैं उनके रेवड़
आश्वस्त है उनकी बिरादरी।
मस्त हैं उनके गड़रिये।
मेरी इस दरिद्र तटस्थता पर
आहत हैं मेरे बच्चे
मेरा ठण्डापन उबाल देता है
उनके रक्त को।
वे वैसा कुछ करना चाहते हैं
जो उनसे हो नहीं पाता।
और इधर मैं इसलिए सो नहीं पाता
कि दिन-ब-दिन बंजर होता जा रहा है
मेरा खेत। 
कसूर न भेड़ों का है न गड़रियों का
कसूरवार हूँ मैं।
मेरे बच्चों!
बंजर होते हुए खेत को बचा लो
भूल जाओ रिश्ता
काट डालो मुझे
पी जाओ मेरा खून
मैं मरूँ या जियूँ
यह खेत, यह खेती तुम्हीं को सम्हालनी है।
आज उछालो या कल 
इन भेड़ों, भेड़ियों और गड़रियों की 
मूण्डियाँ तुम्हीं को
हवा में उछालनी हैं।
मेरी दरिद्र तटस्थता को कतई मत सहो
बेशक मैं तुम्हारा बाप हूँ
पर अपनी विरासत का रखवाला
मुझे मत कहो ।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














सगे सम्बन्धी

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की सत्रहवीं कविता 





सगे सम्बन्धी

संकट से बड़ा सगा
और सुख से बड़ा दगा
कभी नहीं मिला।
मिला होता तो इन्द्रधनुष में
सात नहीं आठ रंग होते
और जिन्दगी जीने के
सत्र्रह सौ साठ ढंग होते।
पर
सुख ओठों पर
और दुख आँखों में
ज्यों ही आते है
कि सारे रामदुवारे तीन-तेरह
होे जाते हैं।
एक को आते और दूसरे को जाते
देखना भी एक उत्सव हैं।
एक की दिखे पीठ
और दूसरे का दिखे मुँह
तो फिर कैसी वाह और कैसी उँह!
सगा
लाख रोको रुकता नहीं है
और दगा?
अपनी करनी से चूकता नहीं है।
तब भी मैं नहीं समझ पाया कि
संकट का सुख भला या सुख का संकट
बुनने वाले ने भी बुन दी है कैसी झंझट
एक छूटे नहीं, दूसरा छोड़े नहीं
एक माथे ले नहीं, दूसारा माथे ओढ़े नहीं ।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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मुद्रक: सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग






यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध  कराया  है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है। 














खूब

 




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘शीलवती आग’ की सोलहवीं कविता 





खूब

तुम!
जो बकौल तुम्हारे
कभी चुप कर दिये गए थे
अब क्यों चुप हो ?
अँधेरे में प्रार्थना करना
और उजाले में गालियाँ बकना
कायरता नहीं तो
और क्या हैं?
बुरा मत मानो
बाशऊर लोग
तब भी बोल रहे थे
और अब भी बोल रहे हैं।
बेशऊर लोग तब भी चुप थे
और अब भी चुप हैं।
ओर सनद कर लो कि वे
कल भी चुप रहेंगे।
चुप्पी तुम्हारा चरित्र है
अँधेरा तुम्हारा अध्यात्म
और आतंक तुम्हारा आत्मीय मित्र है।
कोई फर्क नहीं है तुम्हारी गिड़गिडाहट
और गुर्राहट में
खूब जी लेते हो यार!
झुँझलाहट और घबड़ाहट में।
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संग्रह के ब्यौरे
शीलवती आग (कविता संग्रह)
कवि: बालकवि बैरागी
प्रकाशक: राष्ट्रीय प्रकाशन मन्दिर, मोतिया पार्क, भोपाल (म.प्र.)
प्रथम संस्करण: नवम्बर 1980
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यह  संग्रह  हम  सबकी  ‘रूना’  ने  उपलब्ध  कराया  है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



रूना के पास उपलब्ध, ‘शीलवती आग’ की प्रति के कुछ पन्ने गायब थे। संग्रह अधूरा था। कृपावन्त राधेश्यामजी शर्मा ने गुम पन्ने उपलब्ध करा कर यह अधूरापन दूर किया। राधेश्यामजी, दादा श्री बालकवि बैरागी के परम् प्रशंसक हैं। वे नीमच के शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता हैं। उनका पता एलआईजी 64, इन्दिरा नगर, नीमच-458441 तथा मोबाइल नम्बर 88891 27214 है।