शपथपूर्वक खादी न पहननेवाला काँग्रेसी

जहाँ तक मेरी जानकारी है, काँग्रेस सदस्यता दो श्रेणियों की
होती है। पहली, साधारण सदस्यता और दूसरी सक्रिय सदस्यता। इन दिनों का चलन तो मुझे पता नहीं लेकिन पुराने जमाने में सक्रिय सदस्य वही बन सकता था जो कम से कम पचीस साधारण सदस्य बनाए। सक्रिय सदस्य ही पदाधिकारी बन सकता था। सक्रिय सदस्यता की शर्तों में एक शर्त होती थी - अनिवार्यतः खादी ही पहनना।

इस चित्र में मैं जिनके साथ नजर आ रहा हूँ वे हैं श्री कृष्ण कुमार मिश्रा जिन्हें के. के. मिश्रा के नाम से ज्यादा जाना जाता है। ये उन काँग्रेसियों में शरीक हैं जिन्हें आपातकाल में गिरफ्तार कर जेल में रखा गया था। मेरी जानकारी के अनुसार ये इन दिनों मध्य प्रदेश काँग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता हैं। लेकिन इतने बड़े पदाधिकारी होने के बावजूद ये खादी नहीं पहनते। वस्तुतः इन्होंने खादी न पहनने की सौगन्ध ले रखी है। 

खादी न पहनने की सौगन्ध लेने की कहानी खुद मिश्राजी ने ही बताई और वह भी एक सार्वजनिक आयोजन में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए। बा-बापू के 150वें जन्म वर्ष के सन्दर्भ में इन्दौर की सुपरिचित, 60 वर्ष पुरानी प्रतिष्ठित संस्था ‘अभ्यास मण्डल’ ने पाँच अक्टूबर को एक आयोजन किया था। इसमें मैं भी एक वक्ता के रूप में आमन्त्रित था। वहीं मिश्राजी से यह किस्सा सुना।

जेल में मिश्राजी को ‘ए श्रेणी’ मिली हुई थी। इन्दौर का एक कुख्यात अपराधी, ए श्रेणी के इन बन्दियों की सेवा में तैनात किया गया था। परस्पर परिचय तो पहले से ही था लेकिन जेल में यह परिचय तनिक प्रगाढ़ता में बदल गया। वह बदमाश निष्ठा और प्रेम भाव से इन राजनीतिक बन्दियों की सेवा करता था।

सजा पूरी कर मिश्राजी बाहर आए। वे नियमित रूप से एक हनुमान मन्दिर पर दर्शन करने जाया करते थे। एक सुबह मिश्राजी ने हनुमान -प्रार्थना कर आँखें खोलीं तो उस कुख्यात बदमाश को अपने पाँव छूते पाया। मिश्राजी ने उसे आशीर्वाद दिया। जेल में की गई उसकी सेवा और भलमनसाहतभरे व्यवहार से मिश्राजी उससे प्रभावित और खुश थे ही। उसे अच्छा नागरिक बनाने में मदद करने की भावना से मिश्राजी ने कहा - ‘जिला उद्योग केन्द्र के मेनेजर जैन साहब मेरे दोस्त हैं। मेरे साथ चलना। तुम्हें बीस-पचीस हजार का लोन जाएगा। अपना कोई काम-धन्धा शुरु कर लेना और भले आदमी की जिन्दगी जीना।’

सुनकर वह नामी बदमाश खुश हुआ। उसने हाथ जोड़कर और माथा झुकाकर मिश्राजी को धन्यवाद दिया और तसल्ली भरे स्वरों में बोला - ‘आपकी मेहरबानी है दादा। मुझ पर जो मुकदमे चल रहे थे उनमें से एक को छोड़ कर बाकी सब में बाइज्जत बरी हो गया हूँ। एक जो बचा है, उसमें में भी बरी हो ही जाऊँगा क्योंकि मेरे खिलाफ गवाही देने की हिम्मत कोई नहीं करेगा। अब मैंने पोलिटिक्स को ही पेशा बनाने का फैसला कर लिया है। आप देख ही रहे हो, मैंने समाजसेवा की वर्दी पहन ली है। अब मुझे लोन की जरूरत नहीं है।’ 

बदमाश का जवाब सुना तो मिश्राजी का ध्यान उसके कपड़ों पर गया। वह सफेद झक्क खादी का, कलफदार कुर्ता-पायजामा पहने हुए था। मंच से बोलते हुए मिश्राजी ने कहा - “मैं हक्का-बक्का रह गया। मुझसे बोलते नहीं बना। मुझे कुछ नहीं सूझा। वह एक बार फिर मेरे पैर छू कर चला गया। मैं उसे जाते हुए देखता रहा। उसके जाते ही मेरे मन में पहली बात आई - ‘चाहे जो हो जाए, मैं कभी खादी नहीं पहनूँगा।’ और मैंने हनुमान-साक्षी में, कभी खादी न पहनने की सौगन्ध ले ली।”

वह दिन और आज का दिन, मिश्राजी ने खादी की तरफ देखा ही नहीं।
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भगवान हे तो कई छाती पर पड़े!

रामलीला का यह किस्सा मेरे गृहनगर मनासा का ही है।

गाँधी चौक में बने छोटे से मंच को, लकड़ी के तख्तों से विस्तारित किया गया था। उस रात लक्ष्मण-मूर्छा और हनुमान द्वारा संजीवनी बूटी लाने का प्रसंग मंचित होना था। मंच के सामने, बाँयी ओर, कोई तीस-पैंतीस फीट दूरी पर स्थित हरिवल्लभजी झँवर की दुकान के बाहर नीम का ऊँचा, घना पेड़ था। (आश करता हूँ कि अब भी हो।) उत्साही कार्यकर्ताओं ने तय किया कि संजीवनी बूटी लेकर हनुमानजी को इस पेड़ से सीधे मंच पर उतारा जाए। 

योजना पर बारीकी से विचार किया गया। कलाकार की सुरक्षा सुनिश्चित की गई। खूब मोटा रस्सा तलाश कर एक छोर नीम की मजबूत डाली से और दूसरा छोर मंच के आगे वाले बड़े तख्ते के पाये से बाँध गया। हनुमान बने कलाकार के सीने पर ट्रक (के पहिये) की ट्यूब दुहरी-तिहरी कर बाँधी गई। कलाकार को एक हाथ में पहाड़ की प्रतिकृति और दूसरे में गदा लेकर,  हवा में तैरते हुए, सीधे मंच पर आना था। इसलिए सन्तुलन और दिशा बनाए रखने के लिए मोटे पटियों पर रस्सी की मोटाई से अधिक गहरी नाली बनाई गई और रस्से से उसकी पकड़ न फिसलने के कड़े उपाय किए गए। कार्यकर्ताओं, कारीगरों और खुद अभिनेता ने सारे इन्तजाम देखे-भाले। छोटे से छोटे सन्देह को निर्मूल किया गया। 

उन दिनों रामलीला में प्रस्तुत किए जानेवाले प्रसंगों का प्रचार करने के लिए मध्य पंक्ति के दो-चार अभिनेता विभिन्न स्वांग धर कर, प्रत्येक शाम पूरे कस्बे में घूम कर मुनादी किया करते थे। उस रात चूँकि अनूठा उपक्रम था, तो उसका विशेष प्रचार किया गया - ‘संजीवनी बूटी लेकर आकाश से उतरते हनुमानजी को देखिए।’ प्रचार ने उत्सुकता बढ़ाई। परिणामस्वरूप उस दिन दर्शकों की संख्या सामान्य दिनों से अधिक ही थी।

मंच के सामने की खुली जगह, रस्सी की सहायता से दो हिस्सों में बाँट दी गई थी - एक ओर पुरुष, दूसरी ओर स्त्रियाँ। स्त्रियोंवाला भाग झँवर सेठ की दुकान की तरफ था। रामलीला के कार्यकर्ता अतिरिक्त उत्साहित थे तो दर्शक अत्यधिक अधीर और जिज्ञासु। सब प्रतीक्षा कर रहे थे - कब लक्ष्मण मूर्छित हों और कब हनुमानजी संजीवनी बूटी लेकर आकाश मार्ग से उतरें।

रामलीला शुरु हुई। एक के बाद एक प्रसंग आने लगे। और लक्ष्मण के मूर्छित होने का क्षण आ गया। लक्ष्मण मूर्छित हुए। वैद्य सुशेन आए और घोषणा की - ‘इन्हें संजीवनी बूटी से जीवन मिल सकता है।’ तयशुदा संवाद हुए और हनुमानजी ‘जय श्रीराम!’ का उद्घोष कर संजीवनी बूटी लेने रवाना हुए।

हनुमानजी के रवाना होते ही भगवान रामजी ने ‘हा! लक्ष्मण! हा!! लक्ष्मण!! विलाप शुरु कर दिया। साजिन्दों और गायकों ने ‘न जाने किसने बिलमाए, पवनसुत अब तक नहीं आए’ गीत शुरु कर दिया। गीत के दौरान,  हनुमान बने कलाकार को झँवर सेठ की दुकान के पतरों पर चढ़ा दिया गया। कलाकार ने नीम के पेड़ पर जाकर सारे इन्तजामों के मुताबिक खुद को तैयार किया कर ‘सिग्नल’ दिया और मंच से इशारा पाकर रस्से के सहारे मंच की ओर, नीचे सरकना शुरु किया। दर्शकों में उत्तेजना भरी प्रसन्नता छा गई। लोग तालियाँ बजाने लगे और जै-जैकार लगाने लगे। 

कलाकार ने लगभग आधी दूरी पार की और रुक गया। रुक कर उसने जोर से ‘जय श्रीराम’ की हुँकार भरी। नीचे बैठे लोग साँसें रोक कर हनुमानजी को देख रहे थे और प्रतीक्षा कर रहे थे कि हनुमानजी ‘सर्र ऽ र ऽ र्र’ से, तेजी से मंच तक आएँ। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा था। कलाकार आधे रास्ते रुक ‘जय श्रीराम’ की हुँकार किए जा रहा था।

हनुमानजी के इस तरह रुकने को लीला का हिस्सा समझा जा रहा था। नीचे लोग जैकारे लगाए जा रहे थे और ऊपर, अधर में ठहरा कलाकार ‘जय श्रीराम’ हुँकार-हुँकार कर नीचे आने की कोशिश कर रहा था। कुछ ही पलों में उसने हुँकारे लगाने बन्द कर दिए और घबराहट में तेजी से हाथ-पाँव मारने लगा। 

कुछ ही क्षणों में सबको समझ में आ गया कि ‘हनुमानजी’ फँस गए हैं। कार्यकर्ताओं को समझने में देर नहीं लगी कि व्यवस्था गड़बड़ा गई है। तीन-चार कार्यकर्ता झँवर सेठ की दुकान की ओर दौड़े। इधर, यह जानकर कि ‘हनुमानजी’ अधर में अटक गए हैं, दर्शक समुदाय ‘जामवन्त’ की तरह ‘हनुमानजी’ को उनकी शक्ति-सामर्थ्य की याद दिलाने के लिए जोर-जोर से ‘बजरंग बली की जय!’, ‘पवन पुत्र हनुमान की जय!’, ‘जय बजरंग बली, तोड़ दे दुश्मन की नली!’ जैसे जैकारे लगा-लगा कर हनुमानजी का उत्साहवर्धन कर रहा था। मंच पर चल रहा रामजी का विलाप और साजिन्दों-गायकों का गीत इस कोलाहल कहीं सुनाई नहीं दे रहा था। वातावरण में रोमांच और उत्तेजना अपने चरम पर थे। नीचे से कानफोड़ू जैकारे और ऊपर, उलझन से बचने के लिए छटपटाता, हाथ-पैर मार रहा कलाकार। उधर, कार्यकर्ता नीम के पेड़ पर चढ़ चुके थे। उन्होंने रस्सा हिला कर ‘हनुमानजी’ को गतिवान बनाने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए। 

कार्यकर्ताओं को समझ में आ गया कि कलाकार का पूर्व नियोजित तरीके से मंच तक पहुँचना सम्भव नहीं है। उन्होंने अपनी बुद्धि और विवेकानुसार निर्णय लिया और रस्सा काट दिया। रस्सा कटते ही हनुमान बना कलाकार, लगभग बीस फीट की ऊँचाई से,  धड़ाम् से, घुटनों और कोहनियों के बल, महिला दर्शकों वाले हिस्से में गिर पड़़ा। ‘हनुमानजी’ के गिरते ही महिलाओं में चीख-पुकार और भगदड़ मच गई। जो महिलाएँ थोड़ी ही देर पहले हाथ जोड़ कर, श्रद्धा भाव से, हनुमानजी के जैकारे लगा रही थीं वे अब ‘अरे! अरे! हट्! हट्! कई करे हे! दूरो रे!’ (अरे! हट! क्या करता है! दूर रह।) कह-कह कर ‘हनुमानजी’ को धकेल रही थीं। कलाकार गिनती की महिलाओं के बीच गिरा था। जो महिलाएँ अप्रभावित रहीं उनमें से कुछ ने इन महिलाओं को समझाने की कोशिश की - ‘अरे! यूँ कई करो हो दरी! ई तो आपणा हड़ुमानजी हे! आपणा भगवान हे!’ (अरे! ये क्या कर रही हो? ये तो अपने हनुमानजी हैं। अपने भगवान हैं।) समझाइश सुनकर प्रभावित महिलाओं में से एक, चिहुँक कर बोली - ‘भगवान हे तो अणीको मतलब कई छाती पर पड़े? भगवान हे तो भगवान की तरे रे।’ (भगवान है तो इसका मतलब क्या कि छाती पर आ गिरे? अरे! भगवान हैं तो भगवान की तरह रहें।) इधर महिलाएँ हनुमान बने कलाकार को दुरदुरा रही थीं उधर बेचारा कलाकार, कराहता हुआ, सहायता की आशा में अपने आसपास देखता हुआ, अपने लहू-लुहान घुटनों और कोहनियों को सहला रहा था। 

इसके बाद क्या हुआ होगा - हनुमानजी संजीवनी लेकर सीधे मंच पर पहुँचे या नहीं? रामजी ने पवन-पुत्र की अगवानी की या नहीं? लक्ष्मणजी मूर्छा से बाहर आए या नहीं? उस दिन की लीला के शेष  प्रसंग पूरे हुए या नहीं? इन (और ऐसे) सारे सवालों के जवाब आप खुद ही खुद से माँग लीजिए। बस! इस बात से खुश हो जाइए कि हनुमान बने कलाकार को कोई फ्रेक्चर नहीं हुआ। मामूली मरहम-पट्टी से काम चल गया। हाँ, रामलीला की शेष अवधि में वह दर्शक-कलाकार की भूमिका ही निभा सका।
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यह पोस्ट लिखी ही थी कि न्यूनाधिक ऐसी ही घटनावाला यह वीडियो नजरों से गुजरा। 

छपे हरफों पर कुदरत की जीत

यह किस्सा रामलीला से जुड़ा हुआ नहीं है। लेकिन यदि
रामलीला  प्रयोजन नहीं होती तो हास-परिहास का यह प्रकरण भी नहीं बनता।

मनासा के पंजाबी समाज द्वारा आयोजित रामलीला का संक्षिप्त ब्यौरा मैं अपनी इस पोस्ट में दे चुका हूँ। हायर सेकेण्डरी पास करने के बाद जब मैंने मनासा छोड़ा, उन अन्तिम वर्षों में एक छोटा सा परिवर्धन रामलीला आयोजन में हुआ था। मनासा के कुछ प्रबुद्ध लोगों के सुझाव पर पंजाबी समाज ने रामलीला अवधि में कोई एक सामाजिक नाटक खेलने की सहमति दे दी थी। ऐसे ही एक नाटक के पूर्वाभ्यास के दौरान हास्य की यह छोटी सी फुलझड़ी छूटी थी।

अब मुझे नाटक का नाम उसकी विषय वस्तु याद नहीं। नाटक के निर्देशक थे श्री रामगोपालजी पांचाल। वे हमारे स्कूल के ग्रन्थपाल (लायब्रेरीयन) थे। वे हम सबके ‘पांचाल सर’ थे। वे सुरुचिसम्पन्न कलाप्रेमी थे। चूँकि ग्रन्थपाल थे तो किताबें तो उनकी अनिवार्य सहचरी थीं ही। यह वह समय था जब विद्यार्थी स्वेच्छा से, उत्साहपूर्वक लायब्रेरी में जाया करते थे। हम बच्चों में किताबें इश्यू कराने की होड़ लगी रहती थीं। मैं और जमनालाल राठौर अपनी कक्षा के ऐसे विद्यार्थियों थे जो अपने पाठ्यक्रम के विषयों से अलग हटकर, साहित्यिक किस्म की किताबें इश्यू कराते थे। इस कारण हम लोगों पर पांचाल सर की नजर बनी रहती थी। लायब्रेरी में मौजूद नाटकों की सारी किताबों की, उनमें संग्रहित नाटकों की और नाटकों की विषय वस्तु की जानकारी उनके जिह्वाग्र पर रहती थी। रामलीला में मेरी भागीदारी की जानकारी उन्हें रहती ही थी। उन्होंने एकाधिक बार मुझे कहा कि मैं पंजाबी समाज के लोगों को सामाजिक नाटक मंचित करने के लिए कहूँ। मैंने हर बार हाँ तो भरी लेकिन पंजाबी समाज के लोगों से कहने की हिम्मत कभी नहीं हुई। मुझसे निराश होकर पांचाल सर ने अपने स्तर पर ही सम्पर्क कर इस दिशा में प्रयास किए और सफलता पाई। पांचाल सर को निर्देशन का ज्ञान तो था ही, वे अच्छे चित्रकार और मेक-अप आर्टिस्ट भी थे। लिहाजा, नाटक चयन, निर्देशन और मेक-अप की जिम्मेदारी उन्हें अपने आप ही मिल गई।

पांचाल सर ने नाटक चुना। उनका चुनाव पहला और अन्तिम था। कलाकार मुख्यतः पंजाबी समाज के लोग ही होने थे। पांचाल सर ने कलाकारों का चुनाव किया। आठ-दस हजार की आबादीवाले कस्बे में नाटक की स्क्रिप्ट टाइप करवाना उन दिनों हिमालय चढ़ाई से कम कठिन नहीं था। सो, तीन-तीन, चार-चार कलाकारों के बीच स्क्रिप्ट की एक-एक प्रति साझा की गई।

कलाकारों में एक कलाकार थे रूपचन्दजी। उनका पूरा नाम तो रूपचन्द ग्रोवर था लेकिन पूरा कस्बा उन्हें रूपचन्दजी पंजाबी ही कहता-पुकारता था। रूपचन्दजी अपने भाई गणेशदासजी के साथ मनिहारी सामान की दुकान चलाते थे। वे परिहास प्रिय, बहुत कम बोलनेवाले आदमी थे। पंजाबी समाज की सीमाएँ लाँघ कर कस्बे की सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में खूब सक्रिय थे। रोजमर्रा की छोटी-छोटी, सामान्य बातों में परिहास तलाश लेने की अद्भुत-अनूठी प्रतिभा के धनी थे। उनके पास बैठने का मतलब होता था, हँसते रहना और हँसते-हँसते लौटना। उनकी एक और विशेषता थी - उनके मित्रों में बच्चे से लेकर बूढ़े तक शरीक होते थे। एक ही परिवार की तीन पीढ़ियाँ उनकी समान मित्र होती थीं। उनसे बात करते हुए आयु का अन्तर शून्य हो जाता था। बात करनेवाले को लगता था, वह किसी हम उम्र से ही बात कर रहा है। 

पांचाल सर उत्साह से लबालब थे।  रिहर्सलें शुरु करने से पहले उन्होंने सारे कलाकारों की बैठक ली। अपनी बात, अपनी अपेक्षाएँ, बरती जानेवाली सावधानियाँ, रिहर्सल के दौरान अनुशासन आदि के बारे में  विस्तार से समझाया। 

रिहर्सलें शुरु हुईं। नाटकों के नाम पर मनासा में अब तक स्कूली नाटक ही होते थे। सार्वजनिक स्तर पर बड़े फलकवाला यह पहला नाटक था। शुरुआती, छोटी-छोटी मुश्किलों से उबरते हुए नाटक आकार लेने लगा। लेकिन एक जगह गाड़ी बार-बार अटकने लगी। रूपचन्दजी की पृष्ठभूमि उर्दू की थी और नाटक था शुद्ध हिन्दी का। उर्दू जबान में आधे स, ष (स् , ष्) का उपयोग सामान्यतः नहीं होता। उर्दू भाषी ‘सुस्पष्ट’ को ‘सुसपष्ट’, ‘कृष्ण’ को ‘किशन’ उच्चारते हैं। ऐसे प्रत्येक शब्द पर कठिनाई आने लगी। पांचाल सर ने कुछ शब्द तो बदले लेकिन ‘स्टेशन’ को बदल पाना उनके लिए सम्भव नहीं हुआ। रूपचन्दजी के एक संवाद में ‘स्टेशन’ शब्द आता था। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि उनका संवाद था - ‘तू स्टेशन पहुँच। मैं थोड़ी देर में आता हूँ।’ संवाद तो रूपचन्दजी को याद था लेकिन वे ‘स्टेशन’ नहीं बोल पा रहे थे। हर बार ‘सटेशन’ ही बोल रहे थे।

पांचाल सर ने दो-एक दिन तो ‘रूपचन्दजी! स्टेशन बोलने की प्रेक्टिस करो।’ कहा। लेकिन जैसे-जैसे मंचन का दिन पास आ रहा था, वैसे-वैसे पांचाल सर का ध्यान ‘स्टेशन’ पर ही केन्द्रित होने लगा। एक दिन वे मानो अड़ गए - ‘रूपचन्दजी से स्टेशन बुलवा कर ही मानूँगा।’ अब हालत यह कि रूपचन्दजी ‘सटेशन’ बोलें और पांचाल सर अड़े हुए - ‘स्टेशन बोलो।’ एक बार, दो बार, तीन बार, न जाने कितनी बार यही होता रहा कि रूपचन्दजी ‘सटेशन’ बोलें और पांचाल सर फौरन टोक कर ‘स्टेशन’ बोलने की कहें। रिहर्सल की रेल ‘सटेशन’ और ‘स्टेशन’ के बीच रुक गई। 

बीस-पचीस मिनिट हो गए। कमरे में मौजूद सारे कलाकार, पंजाबी समाज के लोग हैरान-परेशान। सबके चेहरों पर झुंझलाहट, बेचैनी और अधीरता छाई हुई। उधर पांचाल सर और रूपचन्दजी, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के ‘दो बाँके’ बने दम ठोक रहे थे - 

‘बोलो स्टेशन।’ 

‘सटेशन।’ 

‘मैं स्टेशन बुलवा कर रहूँगा।’ 

‘दम हो तो बुलवा कर देख लो।’

‘...................।’

‘...................।’

पांचाल सर झुंझला रहे लेकिन रूपचन्दजी पर कोई असर नहीं। वे शान्त भाव और निर्विकार मुद्रा में ‘सटेशन-सटेशन’ कह रहे। आखिकार पांचाल सर का धीरज छूट गया।  तनिक जोर से बोले - ‘यार रूपचन्दजी! स्टेशन बोलने में क्या तकलीफ है?’   

बच्चों जैसी मासूमियत और मिश्री मिली सौंफ की ठण्डाई जैसी ठण्डी-मीठी आवाज में रूपचन्दजी बोले - ‘देखो पांचाल सा’ब! आपकी बात मैं समझ रहा हूँ लेकिन मेरी बात आप नहीं समझ रहे। आप जैसा सटेशन मुझसे बुलवाना चाह रहे हो वैसा सटेशन मैं बाल नहीं पाऊँगा। जोर लगा कर और ध्यान रखकर यहाँ भले ही मैं वो ही बोल लूँ जो आप कह रहे हो। लेकिन वहाँ, सटेज पर तो मेरे मुँह से सटेशन ही निकलेगा। अब बोलो! क्या करना?’

रूपचन्दजी का यह कहना हुआ कि कमरा ठहाकों से गूँज उठा। पांचाल सर पल भर को तो सकपकाए लेकिन अगले ही वे भी ठहाके लगा रहे थे।

पांचाल सर की उलझन दूर हो चुकी थी। थोड़ी देर में सब सहज हुए तो पांचाल सर बोले - ‘ठीक है रूपचन्दजी! आप जीते, मैं हारा। मैं किताब में छपे हरफों पर जोर दे रहा था और आप कुदरत का कहा मान रहे थे। चलिए! एक रिहर्सल और कर लेते हैं।’

इस बार की रिहर्सल तसल्ली के सटेशन पर पहुँच कर ही थमी।
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रूपचन्दजी के ये फोटू उनके बेटे हरभगवान ने उपलब्ध करवाए। मैं और अच्छा फोटू चाहता था। हरभगवान ने अपने स्तर पर भरसक कोशिशें भी कीं। किन्तु हमें इन्हीं फोटुओं से सन्तोष करना पड़ा। हरभगवान और मैं कक्षापाठी हैं।     

आखिरी उम्र में सुधार

सीखने और सुधरने की कोई उम्र नहीं होती। यह बात कल, 02 अक्टूबर 2019 को मुझ पर लागू हो गई।

02 अक्टूबर जलजजी (डॉक्टर जयकुमारजी जलज) की जन्म तारीख है। कल वे 85 वर्ष के हो गए। उनके प्रति अपनी शुभ-कामनाएँ, सद्भावनाएँ प्रकट कर उन्हें बधाइयाँ देने, उनका अभिनन्दन करने के लिए हम कुछ लोग उनके निवास पर पहुँचे। जलजजी का कमरा, उनके मन जैसा बड़ा नहीं है। फलस्वरूप, उनका कमरा छोटा पड़ गया। हम कोई बीस-बाईस लोग थे। मेरे सिवाय बाकी सब, जलजजी के लिए ‘कुछ न कुछ’ लेकर पहुँचे थे। सब पहले जलजजी के पाँव पड़े और फिर टूट पड़े, अपना ‘कुछ न कुछ’ उन्हें अर्पित करने। ‘सबसे पहले मैं’ की होड़ लग गई। लगा, कमरे की दीवारें चार-चार फीट पीछे सरक जाएँगी। मैं बाहर निकल, आँगन में आ खड़ा हुआ। कुछ देर बाद कुछ लोग और बाहर आ गए। इनमें चाँदनीवालाजी, सूबेदारसिंहजी भी थे। बाहर खड़े हम सब फुरसत में थे। बिना बात की बात चल पड़ी। एक आवाज आई - ‘पता नहीं क्यों जलजजी ने ललितपुर की बजाय रतलाम पसन्द किया?’ जलजजी मूलतः ललितपुर (उत्तर प्रदेश) के ही हैं। सवाल मुझे समझ में नहीं आया। मैंने प्रतिप्रश्न किया - ‘क्यों ललितपुर में क्या खास बात है?’ जवाब दिया सूबेदारसिंहजी ने - ‘है ना खास बात! आपने वह कहावत नहीं सुनी?’ ‘कौन सी कहावत?’ मैंने पूछा। सूबेदारसिंहजी ने कहावत सुनाई -

झाँसी गले ही फाँसी,
दतिया गले का हार।
ललितपुर ना छोड़िए,
जब तक मिले उधार।।

सुनते ही मैंने कहा - ‘आप गलत कह रहे हैं। सही कहावत यह है -

झाँसी गले की फाँसी,
दतिया गले का हार।
लश्कर कभी ना छोड़िए,
जब तक मिले उधार।।’

मेरा यह कहना था कि एक के बाद एक कई लोग मुझ पर टूट पड़े। सूबेदारसिंहजी की जड़ें उत्तर प्रदेश में हैं। चाँदनीवालाजी दो बरस ललितपुर रह चुके हैं। कुछ और लोग ऐसे थे जो मूलतः उत्तर प्रदेश से थे। 

जलजजी का जन्मोत्सव तो एक तरफ रह गया और ‘ललितपुर-लश्कर’ की अच्छी खासी बहस छिड़ गई। मैं अकेला लश्कर पर अड़ा हुआ था और वे सब ललितपुर का नगाड़ा बजा रहे थे। किसी ने प्रेम से, किसी ने आदर से, किसी ने झल्लाते हुए तो किसी ने मेरी खिल्ली उड़ाते हुए मुझे समझाने की कोशिश की लेकिन मैं मानने को तैयार नहीं हुआ। नहीं माना सो नहीं ही माना।

इस बीच जलजजी सहित सब लोग आँगन में आ गए। अपनी-अपनी आवश्यकता और इच्छानुसार हम सबने जलजजी के साथ फोटू खिंचवाए। प्रीती भाभीजी ने सबका मुँह मीठा कराया और हम सब, एक बार फिर जलजजी को प्रणाम कर अपने-अपने मुकाम पर लौट आए।

लेकिन मैं अकेला नहीं लौटा। ललितपुर और लश्कर मेरे साथ-साथ चले आए। सब लोगों ने जिस तरह एक स्वर से कहावत में ललितपुर बताया था, उसने मेरे आत्म विश्वास को डगमगा दिया। मैं बरसों तक ग्वालियर, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड जाता रहा हूँ। कभी एक दिन तो कभी दो दिन रुकता रहा हूँ। वहाँ भी यह कहावत कई बार सुनी लेकिन हर बार लश्कर ही सुना। कुछ मराठीभाषी मित्रों/परिचितों से बात हुई तो उन्होंने भी लश्कर की उल्लेखित किया। मैंने अपने जीवन में, इस कहावत में एक बार भी ललितपुर का नाम नहीं सुना। हर बार लश्कर ही सुना।

मैंने सबसे पहले वीरेन्द्रसिंहजी भदौरिया को फोन किया। वे ग्वालियर निवासी हैं। वे व्यस्त थे। बोले कि थोड़ी देर बाद फोन करेंगे। फिर मैंने महेन्द्र भाई कुशवाह को फोन लगाया। वे दो वर्ष तक भास्कर के ग्वालियर संस्करण के स्थानीय सम्पादक रह चुके हैं। उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। मैंने बुन्देलखण्ड अंचल के अपने एजेण्ट मित्रों को फोन लगाया। जवाब ने मुझे धरती पर ला पटका। सबका एक ही जवाब था - ललितपुर। फिर मैंने गूगल खंगाला। वहाँ के सारे परिणामों में ललितपुर ही मिला। थोड़ी देर में भदौरियाजी का फोन आया। उन्होंने भी ललितपुर की ही पुष्टि की।

मुझे हैरत हुई। अपने गलत होने पर नहीं, इस बात पर हुई कि इस कहावत को मैंने कई बार, अलग-अलग जगहों पर प्रयुक्त किया और सुना। लेकिन एक बार भी किसी ने ललितपुर का नाम नहीं लिया नहीं। किसी ने मुझे नहीं टोका। क्या वे सब भी मेरी जैसी ही स्थिति में थे/हैं?

शाम को मैंने चाँदनीवालाजी को पत्र लिख कर धन्यवाद दिया कि उन्होंने मुझे सुधार दिया।

सच ही है - सीखने/सुधरने की कोई उम्र नहीं होती। मैं गवाह नहीं, उदाहरण हूँ।
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जलजजी और प्रीती भाभी के साथ हम लोग

जलजजी के साथ चाँदनीवालाजी

दोनों चित्र श्री नरेन्द्रसिंह पँवार के सौजन्य से। चित्र उन्हीं ने लिए इसलिए वे नजर नहीं आ रहे। 

हनुमानजी कुइया में समा गए

फुरसतिया बैठकों में राजा ने यह किस्सा हमें कई बार सुनाया। राजा याने राजा दुबे। मूलतः बड़वानी का निवासी राजा, मध्य प्रदेश सरकार के जनसम्पर्क विभाग में बड़े/ऊँचे पद से रिटायर होकर भोपाल में बस गया है। लेकिन वह नौकरी से रिटायर हुआ है, लेखन से नहीं।

पुराने जमाने में (कृपया इसे केवल कहावत के तौर पर ही लें क्योंकि पचास-साठ बरस की अवधि ‘पुराना जमाना’ नहीं होती) उत्तर प्रदेश से रामलीला और रासलीला मण्डलियाँ आया करती थीं। रामचरित और कृष्णचरित की मंचीय प्रस्तुतियाँ ही इनका, जीविकोपार्जन का जरिया हुआ करता था। इन मण्डलियों में बीस-बीस, तीस-तीस सदस्य हुआ करते थे। प्रायः सारे सदस्य सारे काम कर लिया करते थे। याने, अभिनय, गायन-वादन (तबला, ढोलक, पाँवों से बजाया जानेवाला हारमोनियम बजाना), पर्दों की रस्सियाँ खींचना, नृत्य-गीतों के दौर मिलनेवाली न्यौछावर एकत्रित करना आदि-आदि। कुछ सदस्य सपरिवार हुआ करते थे। ये मण्डलियाँ कस्बों/गाँवों में बड़ा अहाता-बाड़ा किराये पर लेकर प्रस्तुतियाँ देती थीं। ऐसे परिसर का एक ही प्रवेश द्वार होता था। दर्शकों को, प्रवेश के समय, दरवाजे पर ही निर्धारित टिकिट दर से नगद भुगतान करना पड़ता था। दर्शकों के लिए, पुरुषों-स्त्रियों के लिए बैठने की समुचित व्यवस्था होती थी। लेकिन लोग अपनी-अपनी सुविधा से अपनी जगह लेते। कोई अहाते के किसी पेड़ के सहारे टिक जाता तो कोई अहाते में बने ओटले पर अड्डा जमा लेता। 

लीलाएँ भले ही राम-कृष्ण की होती थीं लेकिन था तो धन्धा ही, इसलिए अधिकाधिक धन-संग्रह के उपाय किए जाते थे। कभी राम-सीता, राधा-कृष्ण की झाँकी, कभी किसी युद्ध में शत्रु पर राम, हनुमान की विजय, मूर्छित लक्ष्मण के लिए संजीवनी ले आने की घटना आदि प्रसंगों पर मालाएँ-चढ़ाने के निमित्त न्यौछावर का आग्रह। उस जमाने में एक माला का मूल्य एक-दो रुपये होता था। मण्डली के सारे सदस्य दर्शकों की भावनाएँ उकसा कर अधिकाधिक मालाएँ पहनवाने की कोशिशें करते। लीला शुरु होते ही की जानेवाली आरती की थाली दर्शक समुदाय में घुमाना तो धन संग्रह का स्थायी उपक्रम होता था। आरती लेकर प्रत्येक दर्शक कुछ न कुछ रकम थाली में डालता ही था। आरती की थाली घुमाने का जिम्मा प्रायः ही हनुमानजी बने पात्र के जिम्मे होता था। यह पात्र, नाना प्रकार की हरकतों और मुद्राओं से दर्शकों का मनोरंजन करते हुए थाली घुमाता था।  मण्डली के सदस्यों के अगले दिन के भोजन के लिए दर्शकों से यजमान बनने का आग्रह किया जाता। रोज ही कोई न कोई धर्माकुल श्रोता यजमान बन ही जाता। मण्डली जीमने जाती तो कभी-कभी राम-लक्ष्मण की भूमिका निभानेवाले पात्र इन देवताओं के स्वांग में ही जाते। अच्छी कमाई वाले कस्बे/गाँव में ये मण्डलियाँ कभी-कभी महीना-महीना रुक जातीं।

यह किस्सा ऐसी ही एक मण्डली का है। 

राम-जानकी आरती से लीला की शुरुआत हुई। अपनी ड्यूटी निभाते हुए ‘हनुमानजी’ ने आरती की थाली लेकर दर्शक समुदाय में प्रवेश किया। कभी उछल कर तो कभी ‘हुप्प-हुप्प’ करते हुए, कभी पूँछ से किसी की पीठ सहलाते हुए तो कभी ‘खी-खी’ करते हुए किसी का माथा झिंझोड़ते हुए, दर्शकों का मनोरंजन करते हुए आरती दे रहे थे। दर्शक भी भक्ति भाव से आरती ले रहे थे। 

‘हनुमानजी’ लगभग समूचे दर्शक समुदाय को आरती दे, समापन की और बढ़ रहे थे। आरती की थाली सिक्कों से भर गई थी। दो-चार नोट भी नजर आ रहे थे। अब केवल वे पाँच-सात दर्शक बच गए थे जो, अहाते के एक कोने में, एक अर्द्ध वृत्ताकार चबूतरे पर पंक्तिबद्ध बैठे थे। ‘हनुमानजी’ ने उन्हें देखा। दूरी का अनुमान लगाया और जोर से ‘हो ऽ ऽ प्प’ करते हुए छलांग लगाई। अनुमान शायद तनिक गड़गड़ा गया था। छलांग तनिक लम्बी लग गई और ‘हनुमानजी’ उन दर्शकों के सामने उतरने के बजाय उन्हें पार करते हुए, उनके ऊपर से, उनके पीछे पहुँच गए। यह कौतुक देखकर लोग तालियाँ बजाने ही वाले थे कि सबके हाथ रुक गए। जोर से ‘धम्म’ की आवाज आई और ‘हनुमानजी’ अदृष्य हो गए। 

‘हनुमानजी’ का इस तरह अन्तर्ध्यान होना सबके लिए अनपेक्षित, अकल्पनीय था। दर्शक समुदाय कुछ समझता उससे पहले, अर्द्ध वृत्ताकार चबूतरे पर बैठे दर्शक चिल्लाए - ‘अरे! हनुमानजी डूब गए रे!’ किसी को समझ नहीं आया कि क्या हुआ। 

हुआ यह कि हनुमान बना पात्र जिसे चबूतरा समझ बैठा था वह चबूतरा नहीं, अहाते में बनी कुईया की पाल थी जिस पर दर्शक बैठे हुए थे। मण्डली को कस्बे में आए ज्यादा दिन नहीं हुए थे। हनुमान बने पात्र को कुइया की जानकारी नहीं हो पाई थी और यह घटना हो गई।

अच्छा यह हुआ कि कुइया बहुत गहरी नहीं थी। लेकिन पानी इतना था कि आदमी डूब जाए। मण्डली के सदस्यों और दर्शकों ने फुर्ती से ‘हनुमानजी’ को निकाल लिया। तसल्ली की बात यह रही कि चोट बिलकुल नहीं आई। हनुमान बना पात्र, आरती की खाली थाली थामे, रुँआसी मुद्रा में कुइया से बाहर आया। आरती का दीपक और सारी चिल्लर डूब गई थी। उसके चेहरे पर एक रंग आ रहा था तो दूसरा जा रहा था। वह खुश था कि जान बच गई। लेकिन दुःखी था कि उस दिन का पूरा करा कलेक्शन पानी में चला गया।

हनुमान बने पात्र को देख-देख मण्डली का संचालक कभी गुस्सा हो रहा था तो कभी दया दिखा रहा था। लाड़ से डाँटते हुए, अपनी बोली में बोला - ‘हनुमान की एक्टिंग करते-करते तू तो सच्ची में हनुमान बन गया!’ नजरें नीची किए, सहमी आवाज में जवाब आया - ‘अब हनुमानजी बने हैं तो हनुमानजी की ही तो एक्टिंग करेंगे न दद्दा! हमें क्या पता कि वहाँ कुइया है! कुइया का पता होता तो हमारी छोड़ो, हनुमानजी भी वहाँ जाते?’

‘अन्त भला सो सब भला’ की तर्ज पर सबने भगवान को धन्यवाद दिया कि बड़ी दुर्घटना टल गई। इस घटना का असर यह हुआ कि लोगों के मन में मण्डली के प्रति दया और सहानुभूति का ज्वार उमड़ आया और वहीं, मौके पर ही अगले तीन दिनों के लिए मण्डली के भोजन की बुकिंग हो गई।

आरती का कलेक्शन पानी में चले जाने का दुःख अब, मण्डली के किसी भी सदस्य के चेहरे पर नहीं था।
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......और रावण ने बन्दूक चला दी

यह घटना मैंने दादा के मुँह सुनी और अनेक बार सुनी।

दादा का वैवाहिक जीवन आधी सदी से अधिक का रहा। याने, यह घटना लगभग पचास बरस पुरानी है। दादा की बारात राजस्थान के गाँव केरी गई थी। बाद में उनके ससुरजी नीमच जिले की जावद तहसील के तारापुर में आ बसे। दादा के सुसराल पक्ष के कुछ परिवार जावद तहसील के ग्राम अठाना में थे। मुझे अब ठीक-ठीक याद नहीं कि घटना किस गाँव की है और इसके केन्द्रीय पुरुष रिश्ते में दादा के क्या लगते थे। लेकिन दादा जिस तरह से यह किस्सा सुनाते थे उससे अनुमान करता हूँ कि वे दादा के (सम्भवतः) ताया ससुरजी थे। उनका नाम भी अब याद नहीं। बस इतना याद है कि उनका कुल-नाम (सरनेम) देवमुरार था।

वे देवमुराजी अपने गाँव के हैसियतदार, कारोबारी आदमी थे। उस जमाने में उनके पास बारूद से चलनेवाली, टोपीदार लायसेंसी बन्दूक थी। गाँव के सामाजिक/सार्वजनिक मामलों मंे उनकी भूमिका निर्णायक हुआ करती थी। ऊँची कद-काठी और भरे-पूरे शरीर के धनी ये देवमुरारजी ‘विजया प्रेमी’ थे। साँझ ढलते ही उनके लिए भाँग छानने का उपक्रम शुरु हो जाता था।

गाँव में हर बरस रामलीला होती थी। देवमुरारीजी इस रामलीला के ‘परमानेण्ट रावण’ थे। इस भूमिका को वे राजसी रूआब से कुछ इस तरह निभाते कि लोगों को लगने लगता था कि लंका का रावण देवमुरारजी जैसा ही रहा होगा। लेकिन उनकी यह ‘रावणी वास्तविकता’ रामलीला तक ही सीमित होती थी। अपने दैनन्दिन व्यवहार से वे गाँव में समुचित आदर-सम्मान पाते थे।

नवरात्रि चल रही थी। रामलीला का मंचन शुरु हो चुका था। छायादार घने पेड़ों से घिरा, छोटा से मैदान रामलीला स्थल था। पेट्रोमेक्स (गैस) की रोशनी में मंच नहाया हुआ था। लगभग पूरा गाँव ही मैदान में मौजूद था। अधिकांश लोग मैदान में, बिछात पर बैठे थे। लेकिन, पीछे बैठने से बचनेवाले कई लोग आसपास के पेड़ों पर बैठे थे। 

उस दिन, पता नहीं विजया-प्रभाव की सान्द्रता रही या कोई और बात, देवमुराजी अड़ गए - ‘बन्दूक लेकर बैठूँगा।’ लोगों ने खूब समझाया - ‘रावण के जमाने में बन्दूक नहीं होती थी।’ देवमुरारजी ने राजसी रौब से जवाब दिया - ‘उस जमाने में जब बन्दूक थी ही नहीं तो रावण बन्दूक लेकर कैसे बैठता? लेकिन आज तो बन्दूक है! आज तो रावण बन्दूक लेकर ही बैठेगा।’ समझाइश के स्वर थोड़ी देर में अनुनय-विनय, याचना से होते हुए गिड़गिड़ाहट में बदल गए। लेकिन ‘लंकेश’ अपनी बात पर अटल रहे। लोगों ने हथियार डाल दिए और ईश्वर से, किसी अनजान, अकल्पनीय अनिष्ट से बचाने की प्रार्थना करते हुए पीछे हट गए।

रामलीला शुरु हुई। रावण दरबार का दृष्य  आया। कंधे पर भरी बन्दूक लटकाए, गहनों से लदे-फँदे देवमुरारजी राजसी वेशभूष में सिंहासनारूढ़ थे। प्रसंगानुसार सारे पात्र अपने-अपने संवाद बोल रहे थे, अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभा रहे थे। देवमुरारजी की बारी आई। उन्हें अत्यधिक क्रोधित मुद्रा में, चुनौती देते हुए, ललकारते हुए अपने संवाद बोलने थे। बरसों का रियाज था। सो, संवाद तो भली प्रकार याद थे। लेकिन बन्दूक लेकर पहली बार बैठे थे। यदि बन्दूक का उपयोग नहीं किया तो फिर बन्दूक का मतलब ही क्या रहा? सो एक भारी-भरकम संवाद बोलते हुए (कल्पना कर लीजिए कि ‘आज तू लंकेश के हाथों मारा जाएगा।’ या ऐसा ही कोई संवाद रहा होगा) उन्होंने काँधे से बन्दूक उतारी, घोड़ा खींचा, ताँबे की टोपी चढ़ाई और आसमान की ओर नली करते हुए घोड़ा दबा दिया। 

बन्दूक बारूद से भरी हुई थी। घोड़ा दबते ही जोरदार धमाका हुआ। पूरा गाँव गूँज गया। आसपास के पेड़ों पर चढ़े आठ-दस लोग धरती पर टपक पड़े। मैदान में भगदड़ मच गई। जिसे जिधर जगह मिली, उधर भाग निकला। लोगों की चीखें गूँजने लगीं। मंच के कलाकार पता नहीं कब, कहाँ अन्तर्ध्यान हो गए। उधर, मंच पर तनी चाँदनी से लपटें उठने लगीं। बारूद से निकली लपटों का असर हो गया था। 

कुछ ही पलों में मैदान का नक्शा बदल गया। इसके समानान्तर (या कहिए कि बन्दूक का धमाका होते ही) एक बात और हुई - ‘भंग-भवानी’ ने देवमुरारजी की काया त्याग दी। देवमुरारजी एक झटके में ‘मिथ्या जगत’ की वास्तविकता में आ गए। आते ही उन्होंने देखा कि केवल मंच पर ही नहीं, पूरे मैदान मे वे अकेले खड़े हैं। अब वे ‘लंकापति’ न रह कर ‘वीराने के बादशाह’ बन गए हैं। उन्होंने आसपास नजरें दौड़ाई। कोई नहीं था। उन्होंने अपने रुतबे के मुताबिक भदेस गालियाँ देकर लोगों को कोसकर बुलाना चाहा लेकिन पाया कि उनके गले से आवाज ही नहीं निकल रही है। माहौल में ठण्डक थी लेकिन देवमुरारजी पसीने में नहाए हुए थे। 

गाँव यूँ तो छोटा ही था लेकिन आसपास के गाँवों से बड़ा था। इसलिए वहाँ पुलिस चौकी कायम थी। लोगों की तलाश में नजरें घुमा रहे देवमुरारजी ने देखा कि पुलिस के दो जवान चले आ रहे हैं। न तो जवानों ने कुछ पूछा न ही देवमुरारजी ने कुछ पूछा। तीनों चुपचाप चौकी पर चले आए। तब तक (जान बचाकर भागे हुए) लोग भी एक के बाद एक जुटने लगे। अब पुलिस चौकी आबाद और रोशन थी। 

काफी-कुछ हो सकता था। लेकिन कुछ नहीं हुआ। गर्जना करनेवाले देवमुरारजी के बोल नहीं फूट रहे थे। गाँव के लोग उनके बचाव में एकजुट हो गए थे। दोनों जवानों को भी उसी गाँव में रहना था। सबने मिलजुल कर गाँव की इज्जत बचा ली।

चौकी से बिदाई होने लगी तो रामलीला का संरक्षक देवमुरारजी के सामने खड़ा हो गया। हाथ जोड़कर बोला - ‘देखो महाराज! रामलीला के रावण तो आप ही बनोगे। लेकिन आज, गाँव के सामने, मेरे माथे पर हाथ रखकर, मेरे बच्चों की सौगन्ध खाओ कि रामलीला में बन्दूक लेकर नहीं बैठोगे।’ 

अब तक देवमुरारजी सहज हो चुके थे। सस्ते में छूट जाने का बोध भी उन्हें हो चुका था। लेकिन अपनी हैसियत और रुतबा भी याद रहा। घर का रास्ता नापते हुए बोले - ‘चल! मान लिया। नहीं बैठूँगा बन्दूक लेकर।’ रामलीला संरक्षक खुश हो गया। खुशी में रमकते हुए बोला - ‘और भाँग भी मत पीना।’

सुनकर देवमुरारजी रुक गए। आँखें तरेर कर बोले - ‘रावण के राज में बन्दूक जरूर नहीं थी। लेकिन भाँग तो थी।’
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रावण के दरबार मे अंगद चारों कोने चित

नाम तो उनका कन्हैयालाल शर्मा था लेकिन ‘लोक’ का परचून-दुकानदार, मानो शकर या चाय-पत्ती की तरह इस नाम को भी पुड़िया में बाँधकर, खपरेल में छुपाकर भूल गया और वे पूरे गाँव के “काना मा’राज” बन गए। 

काना मा’राज मस्तमौला आदमी थे। अखाड़े के पहलवान। अपनी गृहस्थी, अपनी दुकान और अखाड़ा - यही उनकी दुनिया थी। अपने रास्ते जाना, अपने रास्ते आना। सन्तोषी जीव। गणेशपुरा गली में उनकी, सिलाई की छोटी सी दुकान थी। उनके मिजाज से मेल खानेवाले अहानिकारक लोगों का अड्डा था उनकी दुकान। ये सब अड्डेबाज दुकान की रग-रग से और ग्राहकों से इतने वाकिफ रहते थे कि काना मारा’ज की गैरहाजिरी में आए किसी भी ग्राहक को कभी निराश नहीं लौटना पड़ता था। इनका व्यवहार और दुकान पर इनकी मौजूदगी कभी-कभी जिज्ञासा पैदा कर देती थी कि दुकान पर परमानेण्ट कौन है - काना मारा’ज या ये अड्डेबाज?

दुकान का काम काज बहुत ही शान्तिपूर्वक चलता रहता था। कभी हल्ला-गुल्ला नहीं सुना गया। मित्र मण्डल अपनी बातों में मशगूल रहता और काना मा’राज चुपचाप कैंची चलाते रहते या सिलाई मशीन। वे किसी बात में शरीक नहीं होते। उनकी शिरकत के लिए मित्र मण्डली को तनिक अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती। दो-तीन बार जोर से बोलकर या पटिया ठोक कर काना मारा’ज का ध्यानाकर्षित करना पड़ता। ऐसी स्थिति में काना मारा’ज चौंक कर पहले अपनी आँखें उठाते, फिर हाथ का काम रोक कर गरदन उठाते। बोलते कुछ नहीं। भौंहें और गरदन उचका कर पूछते - ‘क्या बात है? फिर से बोलो।’ दरअसल काना मारा’ज की ‘कानाखेड़ी उजाड़’ थी। याने, वे कम सुनते थे। उनसे बात करने के लिए जोर से बोलना पड़ता था। इतने जोर से कि आसपास के दो-दो घरों तक सुनाई पड़ जाए।

इन्हीं काना मारा’ज को एक मनचले अड्डेबाज ने गले-गले तक विश्वास दिला दिया कि वे बहुत अच्छे अभिनेता हैं और उन्होंने रामलीला में अपनी प्रतिभा दिखानी चाहिए। उसने हैरत से कहा (और जाहिर है कि जब काना मारा’ज को कहा तो आधे मोहल्ले को जबरन सुनना पड़ा) कि रामलीला के डायरेक्टर को तो खुद काना मारा’ज के पास आकर प्रार्थना करनी चाहिए थी। वह अब तक नहीं आया इसका मतलब है कि उसने जानबूझकर काना मारा’ज की प्रतिभा की बेइज्जती की है। काना मारा’ज ने मशीन के पायदान से पैर उठाए, हाथ से मशीन का पहिया रोका और हैरत और अविश्वास से अपनी प्रतिभा का बखान सुना। एक पल उसे घूरा और पहलवानी सुरों में पूछा - ‘हें! सच्ची?’ काना मारा’ज ने अड्डेबाज को अंगुली थमा दी थी। उसने पहुँची पकड़ ली और काना मा’राज ने पल भर में खुद को जन्मजात प्रतिभावान कलाकार मान लिया।

शाम को दुकान मंगल कर काना मा’राज सीधे अखाड़े में जाया करते थे और सौ-पचास मुद्गर घुमा कर और कुश्ती के दो-चार जोर कर घर पहुँचते थे। लेकिन उस दिन काना मा’राज सीधे घर पहुँचे। हाथ-पाँव धोकर, भोजन-प्रसादी पाकर सीधे रामलीला के अड्डे पर पहुँचे। सबने गर्मजोशी से काना मा’राज का स्वागत तो किया लेकिन पूछ-परख नहीं की। रस्म अदायगी के लिए ‘और कैसे काना मा’राज? आज किधर रास्ता भूल गए?’ भी नहीं पूछा। सब अपनी-अपनी तैयारी में लगे हुए थे। काना मारा’ज को अड्डेबाज की बात याद आ गई - ‘सबने जानबूझकर प्रतिभा की उपेक्षा की है।’ उन्होंने एक पल भी जाया नहीं किया। सीधे निर्देशक से बोले - ‘मुझे पार्ट दो।’ पार्ट याने भूमिका। निर्देशक ने नोटिस नहीं लिया। बिना देखे ही ‘कोई पार्ट-वार्ट नहीं है।’ कहा और अपने काम पर लग गया। उसने ध्यान ही नहीं दिया कि काना मारा’ज को सुनाने के लिए जोर लगाना पड़ता है। काना मा’राज का पहलवान जाग गया। एक तो बहरा आदमी वैसे ही कुछ ज्यादा जोर से बोलता है। उस पर, यहाँ तो अनदेखी-अनसुनी कर दी गई थी! ठेठ पहलवानी अन्दाज में काना मा’राज ने हाँक लगाई - ‘सुना नहीं? मैंने कहा, मुझे पार्ट दो।’ इस बार निर्देशक ने ही नहीं, मौजूद सबने सुना और सहम कर सुना। काना मा’राज की शकल देखकर निर्देशक का निर्देशकपना उड़न-छू हो गया। स्थिति समझने में सबको कुछ पल लगे और जब समझे तो सब दहशतजदा हो गए। काना मा’राज और एक्टिंग! कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। लेकिन जिस युद्ध मुद्रा में काना मा’राज खड़े थे उससे साफ लग रहा था कि वे एक्टिंग करके ही मानेंगे। निर्देशक ने घिघियाते हुए पहले तो समझाने की असफल कोशिश की और जब समझ आ गया कि वह कुछ भी कर ले, काना मा’राज को नहीं समझा सकेगा तो उपाय की तलाश शुरु हुई। 

किसी को कुछ भी नहीं सूझ रहा था। इस पल का अन्देशा तो किसी को नहीं था। क्या किया जाए? इधर सब को समय चाहिए था और उधर भुजाओं की मछलियाँ उचकाते हुए पहलवान घोड़े पर घर लिए खड़ा था - पार्ट चाहिए और आज रात की रामलीला में ही चाहिए। ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की स्थिति बनी हुई थी। निर्देशक हाँ करे तो रामलीला अपाहिज हो और ना करे तो पता नहीं कौन-कौन अपाहिज हो जाए! निर्देशक की अकल सैर-सपाटे पर चली गई। आखिकार एक सुझाव आया - ‘आज रावण-अंगद संवाद है। काना मा’राज को रावण का दरबारी बना दिया जाए। संवाद कुछ बोलना नहीं है। रावण जब अंगद का पाँव डिगाने के लिए दरबारियों को कहेगा तब काना मारा’ज भी पाँव डिगाने का अभिनय कर लेंगे।’ बात सबको जँच गई। काना मा’राज को उनका, बिना संवाद का पार्ट समझाने में निर्देशक का पुनर्जन्म हो गया। काना महाराज सन्तुष्ट और प्रसन्न हो गए। निर्देशक ने उन्हें मेकअप मेन के जिम्मे कर दिया।

काना मा’राज की वजह से उस दिन रामलीला तय समय से लगभग आधा घण्टा देरी से शुरु हुई। जल्दी ही रावण-अंगद संवाद का दृष्य आ गया। भारी-भरकम शरीर वाले ओंकार सोनी रावण बने हुए थे। उन्हें हम सब ‘ओके बॉस’ कहते थे। अंगद ने रावण के दरबार में चुनौती पेश की - ‘यदि तेरा कोई दरबारी मेरा पैर हिला देगा तो मैं माता जानकी को यहीं हार कर चला जाऊँगा।’ रावणने अपने दरबारियों को हुकुम दिया - ‘मेरे वीरों! जाओ! इस बन्दर का पाँव उखाड़ फेंको।’ रावण का आदेश होते ही नेपथ्य में हरमोनियम-तबला, घब्बड़-धब्बड़ बजने लगे। दरबारी एक के बाद एक आते गए और अंगद का पैर उठाने में असफल होने का अभिनय करते हुए लौट गए। दरबारियों के असफल होने का एक राउण्ड पूरा हुआ तो अंगद ने कहा - ‘हे! रावण! एक बार और कोशिश कर ले!’ रावण ने फिर हुकुम दिया। हारमोनियम-तबला फिर धब्बड़-धब्बड़ बजने लगे। दरबारी एक के बाद एक फिर आने लगे। इस बार, जैसे ही काना मा’राज ने असफल होने का अभिनय किया वैसे ही अंगद ने अट्टहास करते हुए रावण को ललकारा - ‘हा! हा!! हा!!! रावण! तेरे दरबार में एक भी वीर ऐसा नहीं है जो मेरा पैर डिगा दे।’ ललकार इतनी बुलन्द थी कि काना मा’राज नहीं चाहते तो भी सुननी पड़ती। उन्हें सुनाई पड़ी और सुनते ही उनका पहलान जाग गया। उन्होंने गर्दन उठा कर अंगद को देखा और बोले - ‘अच्छा! तू मुझे चेलेंज दे रहा है? काना मा’राज को चेलेंज दे रहा है? ले! येल्ले!’ और उन्होंने अपनी पूरी ताकत से अंगद को धोबी पाट दे मारा। अंगद स्टेज पर चारों कोने चित। मंच पर भगदड़ मच गई। ओके बॉस - ‘अरे! अरे! काना मा’राज! ये क्या कर रहे हो यार! ये तो अंगद है! ये तो अंगद है!’ समूचा श्रोता समुदाय हँस-हँस कर बेहाल। प्राम्पटर हक्का-बक्का निर्देशक का मुँह देखे और निर्देशक! उसकी शकल देखने काबिल। उससे न हँसा जाए और न रोया जाए। और काना मा’राज! वे विजयी मुद्रा में स्टेज के बीचों-बीच खड़े हो, दोनों हाथ जोड़कर श्रोताओं के प्रति आभार जता रहे थे। उन्हें सपने में भी गुमान नहीं था कि उन्होंने नई रामायण लिख दी है।

इसके बाद अब क्या कहना-सुनना और क्या लिखना। उस दिन की रामलीला इस मुकाम पर समाप्त हो गई। अगले दिन काना मा’राज की दुकान पर भीड़ ही भीड़। जो भी आए, काना मा’राज को समझाए - ‘ऐसा नहीं करना चाहिए था। क्यों गुलाटी खिला दी अंगद को?’ काना मा’राज का एक ही जवाब रहा - ‘देखो उस्ताद! अंगद हो या कोई भी! पेलवान को चेलेंज मिलेगा नी, तो ये ऽ ई ऽ ज होगा। अगले साल अंगद को पेले से ई समझा देना।’
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मैं: रामलीला की सती सुलोचना

नवरात्रि मुख्यतः देवी आराधना का पर्व है। व्यक्तिगत स्तर पर और सामाजिक स्तर पर घट स्थापना हो जाती है। मुहल्ला स्तर से लेकर महानगर स्तर तक, गरबों के सतरंगी पाण्डाल तन जाते हैं। सुबह देवी आराधना से दिन शुरु होता है। दिन भर अपना काम, शाम को देवी पूजा और रात में गरबा। चौबीस घण्टों में सामान्यतः दस-बारह घण्टे व्यस्त रहनेवाला समाज सोलह-सोलह, अठारह-अठारह घण्टे व्यस्त हो जाता है। 

लेकिन यह पर्व केवल देवी आराधना और गरबा रास तक ही सीमित नहीं रहता। आश्विन/क्वाँर प्रतिपदा से एक सिलसिला और शुरु हो जाता है - रामलीलाओं का सिलसिला। देश के बाकी हिस्सों का तो पता नहीं किन्तु समूचा उत्तर भारत रामलीला के जरिए राम कथा में भी डूब जाता है। इसका समापन दशहरे को होता है। शाम को रावण-मेघनाद के पुतलों का दहन और रात को रामलीला के मंच पर रावण-वध। दिल्ली से देहात तक लोग अपनी-अपनी हैसियत और श्रद्धा के अनुसार रामलीलाएँ आयोजित करते हैं। 

मेरे गाँव मनासा में रामलीला का सिलसिला, शरणार्थी बन कर आए पंजाबी समाज ने शुरु किया। ‘प्रेम प्रचारणी रामलीला मण्डली’ के नाम से इस समाज ने रामलीला का शुरुआत की। कहते हैं कि दूरदर्शन पर ‘रामायण’ प्रस्तुत करनेवाले रामानन्द सागर भी मूलतः इसी मण्डली से जुड़े हुए थे। 

खुद को ‘हिन्दू पंजाबी’ कहनेवाले इस समाज ने मनासा में रामलीला की शुरुआत किस वर्ष से की यह तो मुझे ठीक-ठीक याद नहीं किन्तु सन् 1958-60 में चतुर्भुज बैरागी, चन्दनमल सालवी, मैं और कुछ अन्य लड़के इस रामलीला से जुड़े और कुछ बरसों तक जुड़े रहे। उस समय हमारी उम्र बारह बरस की रही होगी। बाद में, पंजाबी समाज की देखादेखी, मनासा के लोगों ने ‘अपनी’ रामलीला मण्डली (मुझे इस मण्डली का नाम ‘आदर्श रामलीला मण्डली’ याद आ रहा है) शुरु की। तब हम लोग इस मण्डली से जुड़ गए। 
प्रेम प्रचारणी मण्डली से हमें जोड़ने के लिए पंजाबी समाज के बड़े लोगों ने हम बच्चों से सम्पर्क किया था। हम सब राजी-राजी, बड़ी खुशी और उत्साह से शामिल हुए थे। हममें से किसी ने अपने घरवालों से पूछने की जरूरत नहीं समझी और न ही हमारे घरवालों ने कोई आपत्ति की।

हम सब लड़कों को स्त्री वेश ही धारण करना पड़ता था। तब तो अनुभव नहीं हुआ लेकिन बाद के बरसों में अनुभव हुआ कि स्त्री वेश धारण करने में पंजाबी समाज के बच्चे शायद तनिक हिचकते थे। उन्हीं की कमी पूरी करने के लिए हम बच्चों से सम्पर्क किया गया था। हमें कभी भी किसी पात्र की भूमिका नहीं दी जाती थी। हम लोग पर्दा उठते ही की जानेवाली गणेश वन्दना और उसके ठीक बाद होनेवाले दो-तीन नृत्य गीतों में नाचते-ठुमके लगाते। गणेश वन्दना की पहली पंक्ति मैं अब तक नहीं भूला हूँ - ‘हे! प्रथमे शिव नन्दन का सुमिरन हम करें, करें सब रे।’ इसके बाद एक नृत्य-गीत प्रति दिन होता था जिसमें, पनघट पर कुछ स्त्रियाँ पानी भरने के लिए जुटी हुई होती थीं और समूह की नायिका अपनी सहेलियों से उसका घड़ा माथे पर रखवाने में मदद माँगती थी। इस घड़े के बहाने नायिका अपने भाई, पिता आदि का उल्लेख करती थी। वह एक-एक सहेली से अनुरोध करती। जवाब में प्रत्येक सहेली ‘मैं ना!’ कह कर इंकार करती। गीत का मुखड़ा था - ‘सैंयों नी! जरा घड़ा उठा दे। कुछ तो हलका भार करा दे।’ जवाब मे सहेली कहती - ‘मैं ना!’ जवाब सुन कर नायिका घड़े का महत्व बताती - यह घड़ा मेरा भाई रतलाम से लाया था। ‘ये घड़ा मेरा बीर ले आया, ले आया रतलामूँ......’ (तब मनासा के लिहाज से रतलाम बहुत बड़ा शहर हुआ करता था। तब मुझे नहीं मालूम था कि मैं कभी रतलाम में ही बैठकर यह सब लिखूँगा।) इसके बाद एक-दो नृत्य गीत और होते और हमारा काम पूरा हो जाता।

इन दस दिनों में हम सब रामलीला के नशे में डूबे रहते। सामान्यतः रात आठ बजे से रामलीला शुरु होती। हम लोग सात बजते-बजते नेपथ्य में पहुँच जाते। मेक-अप के नाम पर ‘मुर्दा सिंघी’ का लेप भरपूर मात्रा में मुँह पर लगाते। यह पत्थर जैसा पदार्थ होता था जिसे घिस कर लेप बनाया जाता। हम सब जल्दी से जल्दी तैयार होने की कोशिश करते। पंजाबी समाज के ही जानकार लोग कलाकारों के मेकअप की जिम्मेदारी लिए हुए थे। मुझे मुर्दा सिंघी कभी अच्छी नहीं लगी। उसे लगाने के बाद चमड़ी खिंचती सी लगती। उसे छुड़ाने में काफी मेहनत लगती। अगले दिन भी चमड़ी पर भारीपन लगता। लेकिन इससे हमारा ‘नशा’ रंचमात्र भी कम नहीं होता था और शाम सात बजते-बजते हम लोग उत्साह से लबालब मुकाम पर पहुँच जाते।

पंजाबी समाज इस रामलीला को अत्यधिक भक्ति-भाव से आयोजित करता था। लम्बी-चौड़ी दीवार के आकार के तीन-चार, भारी-भरकम पर्दे होते थे जिन पर विभिन्न दृष्य चित्रित होते। ये चित्र दृष्यों की पार्श्वभूमि का काम करते थे। इन पर्दों को लम्बी-भारी बाँस-बल्लियों के सहारे ऊपर-नीचे किया जाता था। प्रत्येक पर्दे की रस्सी खींचने के लिए अलग-अलग आदमी होता था। जब मंच पर एक दृष्य चल रहा होता था तब उसकी पार्श्वभूमि बने पर्दे के पीछे अगले दृष्य की तैयारी चल रही होती। गणेश वन्दना के लिए जब पहला पर्दा उठने को होता तो समूचा वातावरण रोमांच और तनाव से भर जाता। गणेश वन्दना में अधिकाधिक कलाकार शामिल होते। सिटी बजती और पर्दा उठते ही, अपनी-अपनी भूमिका के अनुसार मेकअप किए कलाकार और हम जैसे ‘फिलर’ कलाकार अपनी पूरी शक्ति और मुक्त-कण्ठ से जब ‘हे! प्रथमे शिव नन्दन का.........’ शुरु करते तो मानो किसी जादुई दुनिया की रचना शुरु हो जाती थी। 

जब तक ‘आदर्श रामलीला मण्डली’ शुरु नहीं हुई तब तक हम बच्चा लोग, घाघरे-लुगड़े और पोलके पहन कर प्रेम प्रचारणी मण्डली के मंच पर खूब नाचते-ठुमके लगाते रहे। पंजाबी समाज की रामलीला में कलाकारों की भरमार नहीं थी। जबकि ‘आदर्श’ में मानो आधा मनासा कलाकार बन जाना चाहता था। हमसे अधिक आयु के लोग बढ़-चढ़कर भूमिकाएँ लेने लगे थे। ‘कलाकारों’ की अधिकता के चलते हमारे लिए अवसर कम होने लगे थे। लेकिन स्त्री पात्रों में किसी की रुचि नहीं होती थी। मुझे जैसे अन्ध-उत्साहियों  के लिए यह स्थिति ‘सुअवसर’ होती थी। इसी के चलते मैंने लगातार दो बरसों तक सती सुलोचना की भूमिका निभाई। जैसे-जैसे हम लोग हायर सेकेण्डरी कक्षाओं की ओर बढ़ने लगे, रामलीला से हमारी दूरी भी बढ़ने लगी। हायर सेकेण्डरी पास करने के बाद तो मनासा छूट गया और छूट गया रामलीला का साथ।

पता नहीं क्यों आज अचानक ही अपना रामलीला समय याद आ गया। इसके साथ ही याद आ गए, रामलीला से जुड़े दो-चार रोचक-मनोरंजक किस्से। 

लोक मंच से जुड़े ये किस्से जब मुझे, इस समय (सुबह सवा तीन बजे) अकेले में ही गुदगुदा रहे हैं तो आपको भी निश्चय ही गुदगुदाएँगे।

कोशिश करता हूँ, ये किस्से आप तक पहुँच ही जाएँ।
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.....एक बार फोन कर देना

बतरसियों और अड्डेबाजों के लिए बीमा एजेण्ट होना सर्वाधिक अनुकूल धन्धा है। लोगों से मिलने, बतियाने शौक भी पूरा होता है और दो जून की रोटी भी मिल जाती है। जाहिर है, बीमा एजेण्ट के सम्पर्क क्षेत्र में ‘भाँति-भाँति के लोग’ स्वाभाविक रूप से होते ही हैं। ये ‘भाँति-भाँति के लोग’ एजेण्ट को केवल आर्थिक रूप से ही समृद्ध नहीं करते, जीवन के अकल्पित आयामों से भी परिचित कराते हैं। ये ‘भाँति-भाँति के लोग’ कभी गुदगुदाते हैं, कभी चिढ़ाते है, कभी क्षुब्ध करते हैं तो कभी उलझन में डाल देते हैं
आज सुबह हुआ एक फोन-संवाद बिना किसी टिप्पणी, बिना किसी निष्कर्ष के, जस का तस प्रस्तुत है -

‘हलो अंकल!’

‘हलो।’

‘अंकल! वो आप हफ्ता भर पहले पापा की प्रीमीयम का चेक ले गए थे।’

‘हाँ। ले गया था। क्या हुआ?’

‘हुआ तो कुछ नहीं अंकल। बस! वो, चेक खाते में तो डेबिट हो गया लेकिन रसीद अब तक नहीं आई।’ 

‘रसीद नहीं आई? ऐसा कैसे हो सकता है? रसीद तो मैंने उसी रात को भिजवा दी थी। लिफाफे में। तुम्हारे पापा के नाम का लिफाफा था।’

‘लिफाफा? हाँ! हाँ!! एक सफेद लिफाफा आया तो था पापा के नाम का। उसमें रसीद थी?’

‘खोल कर नहीं देखा? उसमें रसीद ही थी। अभी देखो।’

‘अभी तो नहीं देख सकता। लिफाफा, पता नहीं, कहाँ रख दिया है।’

‘तो तलाश करो। खोल कर देखो। रसीद उसी में है।’

‘ठीक है अंकल। देखता हूँ।’

‘हाँ। देखो और मुझे बताना।’

‘जी अंकल। थैंक्यू।’

कोई बीस मिनिट बाद ‘उसका’ फोन आया -

‘रसीद मिल गई अंकल। लिफाफे में ही थी। थैंक्यू।’

‘ठीक है। पापा को मेरे नमस्कार कहना।’

‘जी अंकल। श्योर। लेकिन एक रिक्वेस्ट है अंकल।’

‘बोलो।’

‘वो अंकल! आगे से आप जब भी लिफाफे में रसीद भेजो तो एक बार फोन कर देना कि लिफाफे में रसीद भेजी है।’

‘..........!!!’
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फोटू भईजी का और पुकार मिट्टी की

क्या हुआ था, यह तो जानता हूँ लेकिन नहीं जानता कि क्यों हुआ था। 23 जुलाई की रात को यह हुआ था। इतने दिन बीत चुके हैं, अब तक नहीं जानता। 

मैं बनवारी लाल सारडा को नहीं जानता। रोमन ने हिन्दी के अनगिनत शब्दों के रूप विकृत कर दिए। रोमन लिपि में लिखे उनके नाम के कारण ही तय नहीं कर पा रहा कि बनवारी सारडा हिन्दी में खुद को क्या लिखते हैं - सारदा? या सारडा? या सारड़ा? वे फेस बुक पर मेरी मित्र सूची में हैं। उनसे मिला नहीं। फेस बुक पर उपलब्ध उनके परिचय के मुताबिक वे रतलाम स्थित इप्का लेबोरेटरीज मेें वितरण विभाग में सहायक महाप्रबन्धक हैं। लेकिन उनसे आमना-सामना अब तक नहीं हुआ। उन्हीं की वजह से यह सब हुआ और यह सब होने के बाद अनुमान लगा पा रहा हूँ कि वे खुद को सारड़ा ही लिखते होंगे।

यह 23 जुलाई की शाम सात-आठ बजे की बात होगी। फेस बुक को उलटते-पलटते अचानक इस चित्र पर नजर पड़ी। 



नजर पड़ी तो ठिठकीं और ठहर गईं। है। चित्र शायद घुड़-चढ़ी के मौके का है। एक दम दाहिने कोने पर एक दूल्हा, बीच में सफेद कुर्ते पर कत्थई रंग का नेहरू जेकेट पहने, माथे पर गुलाबी रंग की पगड़ी धारे, चश्मा लगाए प्रसन्न-वदन बुजुर्ग खड़े हैं। इन्हीं ने मेरी नजर पर कब्जा कर लिया - ‘अरे! ये तो भईजी हैं!’ मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। और फिर वही हुआ जो मैं अब तक नहीं समझ पाया हूँ - अपने लेप टॉप के सामने बैठे-बैठे मुझे धार-धार रुलाई आ गई। मैं विगलित भी था और चकित भी - ‘यह क्यों हो रहा है? अभी तो पक्का भी नहीं ये मेरे भईजी ही हैं! मैं क्यों रोए जा रहा हूँ?’ बुध्दि सन्देही कर रही थी और विवेक संयमित होने की सलाह दे रहा था। लेकिन इन दोनों को परे सरका कर मन बेकाबू हुए जा रहा था।

मैंने टिप्पणी कर पूछा -‘इस चित्र में बीच में, पगड़ीवाले क्या स्व. रूपचन्द्रजी सारड़ा हैं?’ जवाब बनवारी सारड़ा की ओर से आना था लेकिन आया बृजमोहन समदानी की ओर से - ‘ बिलकुल सही, रूपचंदजी सरड़ा ही हैं।’ यह पढ़ना था कि मेरी रुलाई और बढ़ गई - न तो  लेप टॉप के पर्दे पर अक्षर दीखें, न ही की-बोर्ड पर अंगुलियाँ चलें। सब कुछ गड्डमड्ड होने लगा। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि मेरी यह दशा क्यों हो रही है।

तनिक संयत होकर मैंने बनवारी सारड़ा से पूछा - ‘रूपचंदजी सारड़ा से आपका क्या सम्बन्ध है? उनका एक बेटा विश्वम्भर मेरा कक्षापाठी था।’ इस बार भी जवाब बृजमोहन समदानी ने ही दिया - ‘जी, बनवारी सारड़ा, रूपचंदजी सारड़ा के पौत्र हैं।’ (याने बनवारी से काका-भतीजे का रिश्ता जोड़ा जा सकता है।) आगे मेरी जिज्ञासा शान्त करते हुए बृजमोहन ने बताया कि बनवारी, विश्वम्भर का नहीं, विश्वम्भर के बड़े भाई, मदन दादा का बेटा है। थोड़ी ही देर बाद बनवारी का सन्देश मिला - ‘पोता हूँ सर! रतलाम में ही हूँ।’ जवाब में मैंने अपना मोबाइल नम्बर दिया और कहा कि मुझे काम कुछ नहीं है लेकिन यदि सम्पर्क करेंगे तो खुशी होगी। दूसरे दिन बनवारी का फोन आया। हम लोगों ने एक-दूसरे के पते जाने। मिलने की कोशिश करने के आग्रह के साथ ही यह सिलसिला एक मुकाम पर पहुँचा। 

लेकिन अब तक हैरान हूँ - ‘मैं रोया क्यों?’ मैंने खुद को खूब टटोला। बार-बार टटोला - कोई तो कारण मिले मेरे रोने का। कोशिश करने के बाद भी मैं एक कमजोर सूत्र भी नहीं पा सका जिसने मुझे भईजी से भावुकता के स्तर पर जोड़ा हो। फिर यह रोना क्यों? नितान्त एकान्त में, अपने घर में बैठे-बैठे, ऐसे आदमी की मात्र एक छवि देखकर जिससे मेरा, भावना के स्तर पर जुड़ाव मैंने, अपनी चेतनता में कभी अनुभव ही नहीं किया? यही सब सोचते-सोचते भईजी की कुछ छवियाँ उभरने लगीं।

मालवी में पिता के लिए प्रयुक्त सम्बोधनों में ‘भईजी’ भी एक है। दादा उन्हें ‘भईजी’ ही सम्बोधित करते थे। उन्हीं की देखा-देखी मैं भी उन्हें भईजी ही कहता था। भईजी मनासा के अग्रणी श्रेष्ठि पुरुष थे। उनके अनुभव और उनकी परिपक्वता उन्हें सबसे अलग और महत्वपूर्ण बनाए हुए थी। गम्भीर विषयों पर उनकी राय जानने के लिए उन्हें विशेष रूप से बुलाया जाता था। वे बहुत कम बोलते थे लेकिन जब भी बोलते थे तो बाकी सब लोग चुप हो जाते थे। वे बहुत धीमी, मीठी आवाज में, सधे स्वरों में, सुस्पष्ट रूप से अपनी बात कहते। स्वर तनिक मन्द जरूर होता था लेकिन होता था खनकदार। उनके वक्तव्य की खूबी यह होती थी कि उनकी सलाह भी सामनेवाले के पास निर्देश/आदेश की तरह पहुँचती थी। मनासा के सदर बाजार में उनकी बहुत बड़ी दुकान थी। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि मैंने उन्हें कभी दुकान पर बैठे, व्यापार करते देखा हो। मैंने उन्हें सदैव कस्बे में यत्र-तत्र ही देखा। वे जब सड़क पर निकलते तो लोग यन्त्रवत आदर भाव से उन्हें करबद्ध, नतनयन, नतमस्तक हो नमस्कार करते। मैंने उन्हें, बाजार में या सड़क पर कभी भी किनारे चलते हुए नहीं देख। वे सदैव सड़क के बीच ही चलते। यूँ तो वे सीधी नजर ही चलते लेकिन कभी-कभी, दोनों हाथ, पीछे, कमर पर बाँधे, विचारमग्न मुद्रा में चलते नजर आते। 

भईजी  की एक और विशेषता उन्हें सबसे अलग किए हुए थी। आदमी के दाहिने हाथ का अंगूठा देखकर उसकी प्रकृति समझने की अद्भुत प्रतिभा के धनी थे भईजी। इसीलिए वे ‘सर्वप्रिय’ से कहीं आगे निकलकर ‘सर्वजीत’ की स्थिति में थे। जो एक बार उनसे मिल लिया वह आजीवन उनका कायल को गया। परस्पर बैरी लोग भी भईजी के सम्पर्क क्षेत्र में समानता से मौजूद मिलते थे। उस समय तहसीलदार कस्बे का सबसे बड़ा अघिकारी होता था। भईजी के जीते-जी शायद ही कोई तहसीलदार ऐसा रहा हो जिसने सलाह लेने के लिए भईजी की सेवाएँ न ली हों।

भईजी से व्यक्तिगत रूप से मेरा सम्पर्क बहुत ही कम रहा। उनका बेटा विश्वम्भर मेरा कक्षा पाठी था। हम सबसे तनिक अधिक लम्बा था। वह कबड्डी का बहुत अच्छा खिलाड़ी था। उसकी लम्बाई कबड्डी में उसका हथियार बन जाया करती थी। विश्वम्भर की मौजूदगी टीम की जीत का भरोसा होती थी। शत्रु के पाले से अपने पाले में लौटते-लौटते विश्वम्भर, मध्य रेखा पर पहुँच कर अचानक, अपनी दाहिनी टाँग पर लट्टू की तरह घूम कर अपनी बाँयी टाँग पीछे की ओर फेंकता तो मानो उसकी टाँग की लम्बाई ड्योड़ी हो जाती थी और बेखबर शत्रु के एक-दो  खिलाड़ियों के गाल छू लेती थी। खेल प्रतियोगिताओं में तब कबड्डी के नियम बनने शुरु ही हुए थे। शत्रु के पाले में प्रवेश करते समय खिलाड़ी, ‘हुल कबड्डी-कबड्डी’ कहा करते थे। विश्वम्भर ‘हेल कबड्डी-कबड्डी’ कहकर प्रवेश करता था। नियमों के मुताबिक जब ‘हुल/हेल’ कहना फाउल करार दे दिया गया तो अपनी आदत बदलने में विश्वम्भर को महीनों लगे थे। विश्वम्भर का कक्षापाठी होने के बाद भी मुझे विश्वम्भर के घर जाने का काम नहीं पड़ा। लिहाजा, भईजी से मेरी मुलाकातें घर से बाहर ही हुईं। वे जब भी मिलते, कभी मेरे कन्धे पर तो कभी पीठ पर हाथ रखकर अत्यन्त प्रेमल मुद्रा और शहतूती मिठास भरे स्वरों में पूछताछ करते। 

बनवारी की वाल पर लगे फोटू में भईजी की मौजूदगी ने मुझे मानो एक पूरा काल खण्ड सौंप दिया। लेकिन तब भी सवाल बना रहा - ’मुझे रोना क्यों आया?’ 

अब, जबकि भावावेग थमा हुआ है, मन संयमित है, मुझे लग रहा है, मिट्टी इसी तरह, अचानक ही पुकारती होगी। इतनी अचानक कि आदमी बेसुध, चेतनाशून्य हो अपनी मूल प्रकृति में, शिशु दशा में पहुँच जाए। तब शब्द अर्थविहीन हो केवल ध्वनियाँ रह जाते हैं। माँ की छाती से चिपके शिशु तक पहुँचती निःशब्द, नीरव ऊष्मा को व्याख्यायित करना सुरसती के लिए भी असम्भवप्रायः हो जाता है। फुनगियों, फूलों की हरीतिमा बनाए रखने के लिए जड़ों को मिट्टी से पानी की गुहार लगाते किसने सुना?

अब मुझे लग रहा है, भईजी की छवि के जरिए मेरी जड़ों ने अपनी मिट्टी से जो पानी लिया, वही पानी मेरी आँखों तक पहुँचा और बह निकला। 

मिट्टी पुकारती है तो आदमी को अपने साथ बहा लेती है।
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इतनी देर, देर नहीं होती याने माथों की बाट जोहती काँगसियाँ

रतलाम के भुट्टा बाजार में बहुत सम्हल कर चलना पड़ता है। वहाँ दो तरफा बचाव करना पड़ता है - खुद किसी से न टकराएँ और कोई दूसरा आपसे न टकराए। लेकिन लाख सावधानी बरतने के बाद भी टक्कर हो जाए तो भी घबराने की बात नहीं। सामनेवाला मुस्कुराते हुए ‘कोई बात नहीं सेठ! चलता है।’ कहते हुए आपको और खुद को झंझट-मुक्त कर देता/लेता है। 

मैं इसी भुट्टा बाजार से निकल रहा था। बहुत डरते-डरते, फूँक-फूँक कर, लगभग ‘मुर्दाना धीमेपन’ (डेड स्लो) से स्कूटर चलाते हुए। ऐसे सँकरे बाजार से निकलते समय मैं ताँगे का घोड़ा हो जाता हूँ - दोनों आँखों को अदृष्य कनटोपों से ढकते हुए। केवल सामने देखना, इधर-उधर बिलकुल नहीं देखना। ज्ञान पुस्तक भण्डार, मेरे अन्नदाता अशोक भाई की दुकान है। उन्हें नमस्कार करने के लिए नजर घुमाई तो ‘वह’ भी नजर आ गई। अशोक भाई की दुकान से दस-बीस कदम पहलेे, सड़क किनारे बैठी ‘वह’ माथा झुकाए अपना काम किए जा रही थी। अपना काम याने कंघियाँ बनाना। उसे यह काम करते देख कर मेरे हाथों ने यन्त्रवत स्कूटर का ब्रेक दबा दिया। अब मैं उसके सामने खड़ा था। वह लकड़ी की कंघियाँ बना रही थी। लेकिन उसके उत्पाद को ‘कंघियाँ’ कहना आभिजात्य व्यवहार हो जाएगा और उसकी मेहनत अपनी सार्थकता और पहचान ही खो देगी। उसके देसीपन की हत्या हो जाएगी। 



वह वस्तुतः ‘काँगसियाँ’ बना रही थी। ऐसी कंघियों को मालवा में ‘काँगसी’ ही कहा जाता है। ये काँगसियाँ’ भैंसों के सींगों और लकड़ी से बनती हैं। प्रत्येक काँगसी अलग-अलग बनाई जाती है। साँचे में नहीं ढलती। कोई भी दो काँगसियाँ कभी भी एक जैसी नहीं होती। इस लिहाज से प्रत्येक काँगसी ‘नायाब’ होती है। इनका आकार और बनावट ऐसी होती है कि मुट्ठी में आसानी से पकड़ी जा सकें। इनके दोनों हिस्सों में, बाल सँवारने के लिए ‘दाँते’ बनाए जाते हैं - एक ओर बारीक, सघन दाँते, दूसरी ओर मोटे, तनिक छितरे हुए दाँते। पकड़वाला, बीच का हिस्सा सीधा रहता है जबकि दोनों छोरों के चारों सिरे, बाहर की ओर तिरछे निकलते हुए। बाहर निकले हुए ये सिरे, मुट्ठी की पकड़ को आसान भी बनाते हैं और फिसल कर छूट जाने की आशंकाएँ भी न्यूनतम हो जाती हैं।

उसका काम मुझे, एक झटके में मनासा की पुरबिया गली में खींच ले गया।

मनासा। मेरा पैतृक गाँव। पुरबिया गली में तीन-चार परिवार यही काम करते थे - ‘काँगसियाँ’ बनाने का। वे परिवार भैंसों के सींगों की काँगसियाँ बनाते थे। भैंसों के सींगों को खड़े दो भागों में चीरते। फिर गरम करके उनकी गोलाई दूर कर, उन्हें सीधा-सपाट करते, और इस तरह काटते कि एक सींग में अधिकाधिक काँगसियाँ बन सकें। रास्ते से काफी उँचाई पर बने अपने मकानों के ढालिये में ये परिवार दिन-भर इसी में काम में लगे रहते थे। परिवारों का एक भी सदस्य, आदमी हो या औरत खाली हाथ या फुरसत में नजर नहीं आता था। कोई सींग चीर रहा है, कोई छोटी सी भट्टी गरम कर रहा है, कोई सींगों को गरम करने के लिए थप्पी जमा रहा है, कोई सींग तपा रहा तो दूसरा उसके पास, तपाये हुए सींग को दबा कर सीधा करने के लिए लकड़ी का भारी गट्टा लिए  खड़ा है। एक, सीधे किए सींग के टुकड़े बना रहा है तो दूसरा उन्हें छोटी टोकनी में जमा रहा है। तीसरा उस टुकड़े की एक ओर मोटे दाँते बना रहा है तो दूसरा, टुकड़े की दूसरी ओर बारीक दाँते बना रहा है। मोटे दाँतों के लिए लम्बी, बड़े आरों वाली करवत (आरी), बारीक दाँतों के लिए बारीक आरों वाली, छोटी सी करवत। दाँते बारीक बनाने हों या मोटे, सम्पूर्ण तन्मयता माँगता था - पहला दाँता बनाया, उसे बाँये हाथ के अंगूठे से दबाया और उससे सटता हुआ दूसरा दाँता बनाया। ऐसा करते समय बाँये हाथ के अंगूठे को करवत की चपेट में आने से बचाने के लिए उस अंगूठे पर चमड़े का खोल चढ़ा लिया जाता था। 

दोनों भागों के दाँते बनाने के बाद बारीक और मोटे दाँतों को विभाजित करनेवाले मध्य भाग पर, यथा सम्भव, कभी सीधी तो कभी सर्पिल लकीरों की सजावट की जाती। तैयार काँगसियों को बिक्री के लिए आकर्षक बनाने के लिए इन पर ‘तेल का हाथ’ फेरा जाता जिससे काँगसियाँ चमकदार हो जाती थीं। इन काँगसियों को टोकरी में, करीने से गोलाई में सजाकर, धूल से बचाने के लिए कपड़े से ढक कर रखा जाता था। टोकरियों में सजी ऐसी काँगसियों को, गाँव-गाँव, गली-गली फेरी लगाकर बेचती महिलाएँ मैंने देखी हैं। लेकिन नहीं जानता कि वे महिलाएँ इन्हीं परिवारों की होती थीं या दूसरी महिलाएँ इनसे खरीद कर ले जाती थीं। लेकिन गाँवों में इन ‘सेल्स वीमेन’ की प्रतीक्षा की जाती थी। दाँतों की लम्बाई, सघनता और तीखेपन से काँगसियों की गुणवत्ता आँकी जाती थी और दाम तय होता था।

उस समय, गाँव की महिलाएँ न तो नित्य स्नान कर पाती थीं न ही रोज बाल सँवार पाती थीं। स्नान करना और बाल सँवारना भी छोटे-मोटे  त्यौहार हो जाता था। काँगसी के बड़े दाँतों से बाल सँवारे जाते और छोटे दाँतों का उपयोग मुख्यतः जुँएँ-लीखें निकालने में किया जाता। इन कामों में जो काँगसी पास हो जाती, उसकी ‘सेल्स वुमन’ को अगली बार अधिक ग्राहकी मिलती। 

लेकिन अन्य अनेक हस्त शिल्प कला आधारित कुटीर उद्योगों की तरह यह कुटीर उद्योग भी खत्म हो गया। मेरे मनासा की अब पुरबिया गली में अब ये काँगसियाँ नहीं बनतीं। 

एक पल में पूरा एक जमाना मेरी आँखों से गुजर गया। अशोक भाई को नमस्कार करना भूल, मै ‘उसके’ ऐन सामने खड़ा हो गया। हाथ का काम रोक कर उसने झटके से सर उठाया। मेरी ओर देखा और भँवें उचका कर, आँखों से बोली - ‘क्या चाहिए?’ मैंने जवाब दिया - ‘कुछ नहीं चाहिए। तुमसे बात करनी है।’ उसे अच्छा नहीं लगा। उसे ग्राहकी की दरकार थी लेकिन मैं उसका ‘टेम’ खराब करने आ पहुँचा था। करवत (आरी) चलाता  हाथ रुक गया। बोली - ‘क्या बात करनी है?’ 

क्‍या चाहिए
'क्‍या चाहिए?'

इसके जवाब में हमारी बात कुछ इस तरह से हुई -

‘कितनी उमर है?’

‘पचहत्‍तर बरस।

‘इतनी उमर में काम क्यों करना पड़ रहा है?’

‘हाथ-पाँव चलते रहने से हारी-बीमारी दूर रहती है।’

‘बेटा-बहू देख-भाल नहीं करते?’

‘तो कौन करता है? तुम?’

मैं अचकचा गया। पत्थरमार बोलने में ये तो मुझसे भी सवाई है! अगला सवाल पूछने की हिम्मत हवा हो गई। फिर भी पूछा - ‘कच्चा माल कहाँ से लाती हो?’

‘तुम भी यह धन्धा शुरु कर दो। मालूम हो जाएगा।’
(याने वह अपना ‘ट्र्रे्डड सीक्रेट’ नहीं बताना चाहती। कहीं डर तो नहीं गई कि मैं सचमुच में उसकी ‘कम्पीटीशन’ में न आ जाऊँ? लेकिन अपनी टुच्ची सोच पर खुद ही झेंप आ गई।)

‘नाम क्या है?’ 

‘धापू।’

सुनकर मेरा रोम-रोम बह निकला। मेरी माँ का नाम भी धापू है। यह अभी 75 की है और मेरी माँ का देहावसान 72 वर्ष की आयु में हुआ। मैं असंयत हो गया। आँखें बहने लगीं। गला रुँध गया। मेरी दशा देख हैरत से बोली - ‘क्या हुआ?’ जवाब देने में मुझे थोड़ी देर लगी - ‘कुछ नहीं। मेरी माँ का नाम भी धापू है।’ सुन कर वह खुश हो गई। पता नहीं क्यों। केवल जवाब देने के लिए बोली - ‘अच्छा है।’

मैं उससे ‘इस जमाने में भी वह क्यों काँगसियाँ बना रही है?’ ‘दिन भर मेें कितनी बना लेती है?’ ’कितनी बिक जाती हैं?’ जैसी सरसरी बातें जानना चाहता था। लेकिन उसका नाम मालूम होते ही मेरी सारी जिज्ञासाएँ पवन-परियाँ हो गईं। मेरे पास बात करने के लिए कुछ भी नहीं रह गया। लेकिन मेरे पाँव सड़क में गड़े हुए थे। हिलने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। मैं कुछ देर और उसे देखते रहना, उससे बातें करना चाहने लगा था। बात करने के लिए मेरे पास कोई विषय नहीं था। लेकिन निश्चय ही ईश्वर मेरी मदद कर रहा था। मेरे मुँह से निकला - 

‘कितने में दी एक काँगसी?’ 

उसने अविश्वास से मुझे देखा। बोली -

‘तुमने तो कहा था कि तुम्हें तो बस बात करनी थी!’  

‘हाँ। करनी तो बात ही थी। पर बात करते-करते सोचा एक काँगसी ले ही लूँ।’

वह खुश हो गई। बगल में रखी टोकरी की ओर इशारा कर बोली -

‘छाँट लो।’

‘तुम ही दे दो। अपनी पसन्द से। जो तुम्हें अच्छी लगे।’

‘देखो! मुझे समझ में आ गया है कि तुम जबरदस्ती काँगसी खरीद रहे हो। कौन वापरेगा?’

‘तुम्हारी लाड़ी।’ 
(मालवा में बहू को लाड़ी कहते हैं। मुझे नहीं पता कि यह जवाब मेरे मुँह से कैसे निकला।)

मेरा जवाब सुन कर उसकी आँखों में चमक आ गई। झुर्रियों का खिंचाव मानो तनिक कम हो गया। उसके चूड़े का लाल रंग गहरा गया। आवाज का कड़कपन उड़न-छू हो गया। तनिक लाड़ से बोली -

‘लाड़ी! किसकी लाड़ी? तुम्हारे छोरे की लाड़ी या तुम्हारी लुगाई?’

‘घर में धणी-लुगाई हम दो ही हैं। दोनों छोरे बाहर नौकरी कर रहे हैं। इसलिए मेरी लुगाई याने तुम्हारी लाड़ी इसे वापरेगी।’

इस बार वह खुद को नियन्त्रण में नहीं रख पाई। पानीदार नारीयल की तरह फूट गई और मानो उससे आचमन कर लिया हो। मीठे स्वर में बोली -

‘मेरी लाड़ी? नहीं बाबूजी! अपनी लाड़ी ही अपनी लाड़ी होती है। बाकी सब तो मुँह देखी बातें हैं। लेकिन आज तुम्हारी बातों ने जी ठण्डा कर दिया। सबको पच्चीस रुपयों में देती हूँ। तुमसे बीस ले लूँगी। लेकिन बीस से कम बिलकुल नहीं लूँगी। भाव-ताव मत करना। जमे तो लो। नहीं जमे तो मत लो।’

मेरे जमने, न जमने का तो कोई सवाल ही नहीं था। उसे बीस रुपये दिए। उसने टोकरी की काँगसियाँ टटोलीं। छाँट कर एक मुझे थमा दी। उससे बात करने का बहाना तलाशते हुए मैंने कहा - 

‘ढंग-ढांग की तो दी है ना? घर में डाँट तो नहीं खानी पड़ेगी?’

इस बार तनिक अधिक खुल कर हँसती हुई बोली -

‘तुम्हारी लाड़ी होगी तो डाँट देगी। मेरी लाड़ी होगी तो नहीं डाँटेगी।’ 

आधे-अधूरे किन्तु मुदित मन मैंने अपना स्कूटर बढ़ाया। अशोक भाई की दुकान के आगे रुका। उनसे नमस्कार किया। जवाब में सवाल आया - ‘आपने काँगसी खरीदी? भाव-ताव तो नहीं किया।?’ मैंने बताया कि मुँह-माँगी रकम चुकाई। तसल्ली की साँस लेते हुए अशोक भाई ने कहा - ‘भगवान ने आपको अक्कल दे दी जो आपने भाव-ताव नहीं किया। करते तो आपका मुँह लबूर (नोंच) देती। हमारे बाजार की बड़ी कड़क काकी है।’ फिर पूछा - ‘लेकिन जब आपने भाव-ताव नहीं किया तो इतनी देर तक क्या बातें करते रहे?’

इस बार फिर मेरे मुँह से बिना सोचे-विचारे जवाब निकला - ‘जब माँ से बात हो और बात अपने गाँव की गली में खड़े होकर हो तो इतनी देर, देर नहीं होती अशोक भाई!’ अशोक भाई के पल्ले कुछ नहीं पड़ा। मैं उन्हें उलझन में छोड़ कर चला आया।

आते समय आँखों के सामने धापू की शकल नाच रही थी और मन में जिज्ञासा - देश के कितने गाँवों-कस्बों में, कितनी काँगसियाँ, अपनी सार्थकता हासिल करने के लिए माथों की बाट जोह रही होंगी?

(यह पोस्ट निश्चय ही बहुत बड़ी लगेगी। लेकिन मुझे तनिक भी बड़ी नहीं लग रही। 
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काँगसियाँ बनने से पहले लकड़ी के टुकड़े

टोकरी में बिक्री के लिए तैयार काँगसियाँ


धापू की बनाई काँगसी



धर्म-शास्त्रधारी, ज्ञान सागर, विद्यावाहक का महाप्रयाण

सत्यमित्रानन्दजी नहीं रहे। 

सुबह-सुबह यही खबर सबसे पहले मिली। खबर मिलते ही मेरी यादों की पोटली खुल गई। बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन कुछ यादें हैं मेरी पोटली में। खट्टी-मीठी भी और कड़वी-कसैली भी।

यह सत्तर के दशक के शुरुआती बरस थे। मेरा कस्बा मनासा मानो ‘सत्यमित्रानन्दमय’ हो गया था। उनका आना भी त्यौहार होता था और जाना भी। लोग उमड़-घुमड़ कर उनकी अगवानी करते। उन्हें खूब सुनते और जब विदाई का दिन आता तो बिना किसी दुःख, क्लेश के, भरपूर आशावाद के साथ विदा करते - यह सोचते हुए कि जाएँगे नहीं तो फिर आएँगे कैसे? गोया उनकी विदाई हकीकतन उनकी अगली अगवानी की भूमिका होती थी। तब मनासा की आबादी कोई बारह-पन्द्रह हजार रही होगी। मुहावरों की भाषा में कहूँ तो मनासा के घर-घर में सत्यमित्रानन्दजी का चित्र लगा हुआ था जिस पर प्रतिदिन ताजा फूलों की माला चढ़ी नजर आती थी। वे घर-घर में पूजे जाते थे। मनासा के सैंकड़ों लोग उनके कण्ठी-बद्ध शिष्य थे जिनमें मेरे दादा-भाभी भी शरीक थे।

सत्यमित्रानन्दजी को देखना ही अपने आप में रोमांचक और उत्तेजक होता था। भरपूर कद-काठी, गोरा रंग, भव्य भाल, उन्नत ललाट, तीखी नाक, चमकती-लुभाती आँखें और इन सबको परास्त करती उनकी भुवन मोहिनी मुस्कान। हर किसी को लगता, स्वामीजी उसे ही देख कर मुस्कुरा रहे हैं। भगवा वेश में, हाथ में दण्ड धारण किए वे चलते तो पूरा मनासा उनके साथ चल रहा होता। लोग उनके चरण स्पर्श करना चाहते लेकिन उनका सस्मित प्रसन्न-वदन देखकर मानो मन्त्र-बिद्ध हो, पाँव छूना भूल, जड़वत खड़े रह जाते। सत्यमित्रानन्दजी का सम्मोहन पूरे कस्बे पर तारी रहता था। उनके प्रवचन सुनने के लिए लोग अपने हाथ के काम छोड़ कर चले आते थे। सत्यमित्रानन्दजी थे ही ऐसे। 

यह चित्र मनासा से श्री बृज मोहन समदानी के सौजन्य से मिला है। चित्र 18 फरवरी 2019 का है। श्री अशोक गुलाटी के घर पर लिए गए इस चित्र में बाँए से खड़े हुए कैलाश सोनी, प्रसन्न राघव शास्त्री, कुर्सी पर बैठे सत्यमित्रानन्दजी और खड़े हुए बृज मोहन समदानी। प्रसन्न राघव मेरा कक्षापाठी है। मैंने बरसों बाद प्रसन्न राघव की शकल देखी - इस चित्र के माध्यम से।

मैं उन दिनों हायर सेकेण्डरी का विद्यार्थी था। एक दिन हमें सूचित किया गया - ‘कल सत्यमित्रानन्दजी अपने स्कूल में आएँगे और विद्यार्थियों को सम्बोधित करेंगे।’ खबर सुनने के बाद सारे पीरीयड बिना किसी घोषणा के स्वतः ही निरस्त हो गए। पूरे स्कूल में मानो त्यौहार का उल्लास छा गया। 

अगला दिन बड़ी देर से आया।

हम सब बच्चे समय से बहुत पहले स्कूल पहुँच गए थे। उन दिनों ताम-झाम वाले सजीले मंच तो होते नहीं थे। ऐसी सभाओं के लिए तख्तों का चलन था। मझौले आकार का एक तख्ता सादगी से सजाया गया था। उस पर रेशमी शाल से ढकी एक कुर्सी लगी थी। सामने माइक। तख्ते के एक ओर अध्यापकों के लिए कुर्सियाँ लगी थीं और सामने बिछी दरी पर, स्कूल के हम तमाम छात्र बैठे थे। स्वामीजी के आगमन की प्रतीक्षा में हम सबके दिल बेतरह धड़क रहे थे। उस दिन हमें चुप रहने के लिए किसी भी अध्यापक को नहीं कहना पड़ा। हम सब मानो आवेशित (चार्ज्ड) हो, चुपचाप बैठे थे।

तय समय पर स्वामीजी आए तो हम सबकी साँसें रुक गईं। पलकों ने झपकने से इंकार कर दिया। स्वामीजी को ‘ज्यादा से ज्यादा’ देख लेने की कोशिश में हम सब घुटनों के बल उठंगे हो आए थे। हम सब उन्हें नख-शिख देख लेना चाहते थे ताकि बाद में शेखी बघार सकें - ‘मैंने स्वामीजी को सबसे ज्यादा देखा।’

हमारे प्रचार्य एस. डी. वैद्य साहब ने स्वामीजी का स्वागत किया। अपनी भावनाएँ प्रकट कीं और उद्बोधन के लिए स्वामीजी को आमन्त्रित किया। प्रभु स्मरण और गुरु नमन से स्वामीजी ने अपनी बात शुरु की। कहा कि वे तीस मिनिट बोलेंगे। उनकी बात सुनकर हमने उनके हाथों पर नजरें घुमाईं - घड़ी देखने के लिए। स्वामीजी ने घड़ी नहीं पहनी थी। हमें लगा, स्वामीजी खूब देर तक बोलेंगे। तीस मिनिट वाली बात उन्होंने केवल कहने के लिए कही होगी। 

स्वामीजी ने अपना उद्बोधन शुरु किया। उन्होंने किस विषय पर, क्या कहा, यह मुझे अब कुछ भी याद नहीं। केवल एक श्लोक याद रहा जिसमें उन्होंने ‘विद्यार्थी’ के लक्षण गिनवाए थे -

काक चेष्टा, बको ध्यानम्, श्वान निद्रा तथैव च।
अल्पाहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थीनाम पंच लक्षणा।।

यह श्लोक मैंने पहली बार सुना था। मुझे, तब से लेकर अब तक, जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तब तक, ताज्जुब है कि मुझे यह श्लोक कैसे याद रह गया। या तो स्वामीजी ने अपनी सम्पूर्णता से कहा होगा या फिर मैंने अपनी सम्पूर्णता से सुना होगा।

स्वामीजी को सुनना तो अनूठा अनुभव होता ही था लेकिन उन्हें बोलते हुए देखना अद्भुत अनुभव होता था। खनकती आवाज, सधा हुआ स्वर, सुस्पष्ट उच्चारण, संस्कृतनिष्ठ प्रांजल भाषा, मोतियों जैसी खनकती शब्दावली और मुक्ताहार जैसा वाक्य विन्यास। तिस पर, बोलने की गति ऐसी मानो वल्गा-मुक्त कुरंग अन्तरिक्ष में कुलाँचें भर रहा हो। वैसा धाराप्रवाह, विरल, अविराम वक्तव्य उसके बाद मैंने आज नहीं देखा-सुना। लगता था, साँस लेने की विवशता न हो तो स्वामीजी की आवाज रुके ही नहीं। स्वामीजी मानो स्वामीजी न रह कर ‘जबान के जादूगर’ हो गए थे जिसने वातावरण को सम्मोहन से ढक दिया हो। श्रोता भी निहाल और दर्शक भी निहाल।

इसी धाराप्रवहता में स्वामीजी ने अपना उद्बोधन समाप्त करने की सूचना देकर अपने प्रिय भजन ‘अब सौंप दिया इस जीवन का भार तुम्हारे हाथों में’ में सबको समवेत होने का आग्रह किया तो सबकी तन्द्रा टूटी। सबसे पहले हमारे प्राचार्य वैद्य साहब ने अपनी घड़ी देखी। उन्होंने अपनी घड़ी देखी और हम सबने उनकी चकित मुख-मुद्रा देखी। वैद्य साहब ने अपना बाँया हाथ उठाकर अपनी घड़ी के डायल का काच ठोक कर सबका ध्यानाकर्षित किया - सचमुच में तीसवें मिनिट में स्वामीजी ने अपना उद्बोधन पूरा कर दिया था। सब चकित थे।

इस उद्बोधन के बाद स्वामीजी के कुछ और प्रवचन सुनने के मौके मिले। उनका प्रत्येक श्रोता हर बार समृद्ध होकर ही लौटता था।

तब से लेकर अब मैं अपनी धारणाओं पर कायम हूँ कि, सत्यमित्रानन्दजी धर्म-शास्त्रधारी, ज्ञान सागर, विद्यावाहक थे। वे चुम्बकीय वक्ता और वशीकरण के सिद्धहस्त शिल्पी थे। समय पर उनका प्रभावी नियन्त्रण था। वे अद्भुत स्मरण शक्ति के धनी थे। मनासा के अपने प्रायः प्रत्येक अनुयायी को नाम और शकल से जानते-पहचानते थे और पहले नाम से ही सम्बोधित करते थे। 

पता नहीं, सत्यमित्रानन्दजी के अवसान की खबर का असर मनासा के लोगों पर क्या हुआ होगा। क्योंकि दलगत राजनीति की चपेट में आकर सत्यमित्रानन्दजी ने अपने अनेक शिष्य, अनुयायी खो दिए। स्थिति यह हुई कि उनके चित्र गटरों में नजर आए। ऐसे अमिट लोकोपवाद के विजित हुए कि उन्हें भानपुरा शंकरचार्य पीठ से विदा लेनी पड़ी। यह मर्मान्तक पीड़ादायक प्रसंग फिर कभी। लेकिन फिर भी मुझे पक्का विश्वास है कि मनासा के सौ-पचास लोगों ने आज अपना काम बन्द रखा होगा।

और स्वामीजी? हरिद्वार में लोग भले ही उन्हें समाधी दे रहे होंगे लेकिन स्वामीजी देवलोक में अब तक अपने प्रवचन शुरु कर चुके होंगे और श्रोताओं से, अपने प्रिय भजन ‘अब सौंप दिया सब भार तुम्हारे चरणों में’  में समवेत होेने का आह्वान कर रहे होंगे।
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