प्रभु की पटखनी


यह प्रभु है। पूरा नाम प्रभुलाल सिलोद। सब्जियों का व्यापारी है। रतलाम के नीम चौक में बैठता है। राधा स्वामी सम्प्रदाय का अनुयायी है। जब भी इन्दौर में राधा स्वामी सत्संग होता है, अपनी दुकान बन्द कर इन्दौर जाता है। मेरा अन्नदाता रहा है। अन्नदाता याने मेरा बीमा ग्राहक। अब इसका बेटा धर्मेन्द्र मेरा अन्नदाता बना हुआ है। मेरे घर से इसकी दुकान तक पहुँचने के लिए मुझे दो सब्जी बाजार पार करने पड़ते हैं। लेकिन इस प्रभु का प्रताप यह है कि दोनों बाजार पार करते हुए, सब्जी की किसी दुकान पर नजर नहीं पड़ती। मैं इससे मोल-भाव नहीं करता। सब्जियों का झोला थमाते हुए जितनी रकम बताता है, आँख मूँद कर चुका देता हूँ।

मँहगे भाव का पेट्रोल जला कर, दो सब्जी बाजार पार कर, इस प्रभु से सब्जी खरीदने की शुरुआत तो इसी वजह से हुई थी कि यह मेरा ग्राहक है। जो मुझे ग्राहकी दे, मैं भी उसे ग्राहकी दूँ - यही भावना रही। किन्तु मेरी इस भावना को इसने जल्दी ही परास्त कर दिया। एक दिन इसने मुझे गिलकी देने से इंकार  दिया। बोला - ‘आज गिलकी नहीं है।’ मैं प्रभु की शकल देखने लगा। टोकरी में रखी गिलकियाँ मुझे नजर आ रही थीं और प्रभु इंकार कर रहा था। गिलकी की टोकरी दिखाते हुए मैंने कहा - ‘ये रखी तो हैं!’ अपना काम करते हुए, मेरी ओर देखे बिना ही प्रभु ने जवाब दिया - ‘हाँ। रखी हैं। लेकिन अच्छी नहीं है। आपको नहीं दूँगा।’ सुनकर मुझे विश्वास नहीं हुआ लेकिन अच्छा लगा - ‘मुझे अपना खास मानता है। मेरा ध्यान रखता है। मेरी चिन्ता करता है।’ उस दिन से मैं इस प्रभु का भगत हो गया। उस दिन के बाद से मैं ध्यान रखने लगा कि प्रभु से सब्जी तब ही लूँ जब कोई और ग्राहक मौजूद न हो ताकि मुझ ‘खासम-खास’ की चिन्ता करते हुए यह किसी धर्म-संकट में न पड़े। 

लेकिन आज प्रभु ने ‘खासम-खास’ का मेरा यह मुगालता दूर कर दिया। आज इसकी दुकान पर पहुँचा तो कोई और ग्राहक नहीं था। मैंने तसल्ली और बेफिक्री से अपनी ‘पानड़ी’ (सूची) प्रभु को सौंप दी। प्रभु सब्जियाँ निकालने लगा। मैं खड़ा-खड़ा उसे देखता, प्रतीक्षा करता रहा। तभी पीछे से आवाज आई - ‘चँवला फली है?’ प्रभु ने ‘आवाज’ की ओर देखा और जवाब दिया - ‘है तो सही लेकिन आज की नहीं, कल की है।’ ‘आवाज’ ने पूछा - ‘कल की है! कोई बात नहीं। लेकिन अच्छी तो है?’ प्रभु ने अविलम्ब जवाब दिया - ‘न तो बहुत अच्छी, न बहुत खराब। मीडियम है।’ अगला सवाल आया - ‘घर-धराणी (गृहस्वामिनी) नाराज जो नहीं होगी?’ प्रभु के हाथ थम गए। ‘आवाज’ की ओर देखता हुआ बोला - ‘मैं मेरी चँवला फली के बारे में कह सकता हूँ। आपकी घर-धराणी की आप जानो। आप दोनों के बीच में मुझे मत डालो। मैंने चँवला फली के बारे में बता दिया कि आज की नहीं, कल की है और मीडिमय क्वालिटी की है।’ ‘आवाज’ भी शायद इसका, मेरी ही तरह कोई दिल-लगा ग्राहक था। बोला - ‘चल! तू तेरा काम कर। मेरी मैं निपटूँगा। दे दे आधा किलो।’ प्रभु ने मेरा का रोका। ‘आवाज’ को चँवला फली दी और पैसे लेकर विदा किया।

अब फिर मैं अकेला ग्राहक था। मैं अपने ‘खासम-खास’ होने के एकाधिकार के ध्वस्त होने से छोटे-मोटे सदमे में आ गया था। मैंने पूछा - ‘सबको इसी तरह सब्जी बेचते हो?’ बच्चों के से भोलेपन से प्रभु ने जवाब दिया - ‘हाँ। तो? और क्या करूँ? सब्जी जैसी है, वैसी है। इसमें क्या छुपाना?’ मैं अचकचा गया था। सहम कर पूछा - ‘ग्राहक चला जाए तो?’ उसी भाव और मुख-मुद्रा में प्रभु बोला - ‘देखो बाबूजी! ग्राहक तो भगवान होता है। भगवान से क्या झूठ बोलना? मैं कुछ भी कह दूँ, सब्जी सामने नजर आ रही है। और फिर बाबूजी! जब ग्राहक मेरा बताया मोल चुका रहा है तो मेरी जवाबदारी है कि उसे मोल के मुताबिक माल दूँ। मुझे मेरी तकदीर का मिलेगा। लेकिन ग्राहक को तो सन्तोष होगा कि मैंने उसे ठगा नहीं।’

प्रभु ने मुझे अवाक् कर दिया था। मैं जड़-मति की तरह उसे देख रहा था। मैं तो समझ रहा था कि एक-अकेला मैं ही उसका खासम-खास हूँ। लेकिन हकीकत तो यह थी उसके लिए तो उसका हर ग्राहक खासम-खास था। मैं उसके अनगिनत खासम-खासों में से एक खासम-खास हूँ। जब सारे के सारे खासम-खास हों तो कोई एक खुद को खासम-खास कैसे समझ सकता है? 

प्रभु ने एक झटके में मुझे खासम-खास की आसन्दी से सामान्य के पटिये पर ला पटका था। लेकिन सच कहूँ,  इस पटखनी में बड़ा आनन्द आया। 

यह प्रभु तो वास्तव में प्रभु ही है - सबको एक नजर से देखनेवाला।
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युगबोध का पागल आदमी

यह आदमी पागल नहीं तो और क्या है? पागल ही है।


पूरा नाम ओम प्रकाश मिश्रा है। रतलाम का ही रहनेवाला है। हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुआ है। कस्बे की दो पीढ़ियों को पढ़ाया है इसने। रतलाम की शायद ही कोई गली ऐसी हो जहाँ इसे जाननेवाले, इसे नमस्कार करनेवाले मौजूद न हों। अन्तरंग हलकों में ‘ओपी’ से सम्बोधित किया जाता है तो कहीं ‘मिश्राजी’ और ‘मिश्रा सर’ से पुकारा जाता है। चार बेटियाँ हैं, चारों के हाथ पीले कर दिए हैं। चारों  अपनी-अपनी गृहस्थी में रमी हुई हैं। माथे पर कोई जिम्मेदारी नहीं है। तबीयत भी टनटनाट जैसी ही है। चुस्ती-फुर्ती किसी खिलाड़ी जैसी बनी हुई है। महीने की पहली तारीख को अच्छी-भली पेंशन बैंक खाते में जमा हो जाती है। जरूरतें सब पूरी हो रही हैं। सब कुछ भला-चंगा, ठीक-ठाक चल रहा है लेकिन ये आदमी है कि इसे चैन नहीं पड़ती।

यूँ तो याददाश्त बहुत अच्छी है इस आदमी की लेकिन यह याद नहीं कि उम्र के किस मुकाम पर नाटकों से दोस्ती कर ली। सन् 1977 में एक नाट्य संस्था बनाई। नाम रखा युगबोध। कस्बे के नौजवानों को जोड़ा। खूब नाटक किए और करवाए। कस्बे के, आज के कई नामी-गिरामी लोगों के कोटों के बटन होलों में ‘युगबोध’ का गुलाब आज भी टँगा हुआ है। वे आज भी खुद को गर्व से युगबोध का कलाकार कहते फूले नहीं समाते। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, वे सब अपने काम-धन्धों में लग गए। किसी ने पलट कर युगबोध की ओर नहीं देखा। यह आदमी अकेला रह गया।

लेकिन यह आदमी न तो निराश हुआ और न ही थका। उम्मीद तो जरूर की लेकिन अपेक्षा किसी से नहीं की। यह ‘अपेक्षाविहीनता’ ही इस आदमी की ताकत बनी, बनी रही और बनी हुई है। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के ‘एकला चालो रे’ का ध्वजवाहक बना यह आदमी आज अकेला ही युगबोध को जीवित बनाए हुए है।

युगबोध का यह पागल आदमी सन् 2009 से अनवरत ‘बाल नाट्य शिविर’ लगाए जा रहा है। हुआ यह कि मध्य प्रदेश की ‘अलाउद्दीन खाँ नाट्य अकादमी’ ने 2009 में युगबोध को, पाँच से पन्द्रह वर्ष के बच्चों के लिए एक बाल नाट्य शिविर लगाने का प्रस्ताव दिया। प्रस्ताव में आर्थिक सहयोग का भरोसा भी था। लेकिन वह सहयोग लेने के लिए जिन रास्तों से यात्रा करनी होती है, ‘ओपी’ या तो उन रास्तों से अनजान थे या उन रास्तों पर चल नहीं पाए। सो, अकादमी का आर्थिक सहयोग कागजों से बाहर नहीं आ पाया। लेकिन इस पागल आदमी ने शिविर न तो स्थगित किया न ही निरस्त। निराश होने के बजाय अधिक उत्साह से वह शिविर तो पूरा किया ही, उसके बाद से शिविर को नियमित कर दिया। वह दिन और आज का दिन। बाल नाट्य शिविर का यह ग्यारहवाँ बरस है। ‘ओपी’ नाम का यह पागल आदमी हर वर्ष मई महीने में मैदान में उतर आता है और बच्चों में रम जाता है। किसी से मदद माँगता नहीं। कोई मदद कर दे तो धन्यवाद देकर आगे बढ़ जाता है। 

मैं पूछता हूँ - ‘यह क्या खब्त है? किसी डॉक्टर ने कहा है यह सब करने को? क्यों अपना वक्त, अपना रोकड़ा खरचते हैं? क्यों इतनी मेहनत करते हैं?’ सुनकर ओपी बारीक सी हँसी हँस देते हैं। कहते हैं - ‘यार विष्णुजी! इस मिट्टी ने मुझे क्या नहीं दिया? मुझे तो बनाया ही इस मिट्टी ने! मेरी हर चाहत, हर हरसत इसने पूरी की। मेरी भी तो कुछ जिम्मेदारी है! क्या लेता ही लेता रहूँ? देने का मेरा कोई फर्ज नहीं बनता? वही फर्ज निभाने की कोशिश कर रहा हूँ। और वैसे भी, मुझे कोई व्यसन तो है नहीं! मुझे बस, नाटक आता है। यही मेरा व्यसन है। वही कर रहा हूँ।’ मैं कहता हूँ - ‘आप तो गुरु परम्परा वाले शिक्षक हैं। आप बच्चों को निःशुल्क पढ़ा सकते हैं। उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार कर सकते हैं। उसमें आपका पैसा भी खर्च नहीं होगा, मेहनत भी कम लगेगी और घर ही घर में रहते हुए वह सब कर लेंगे।’ ओपी के पास सवाल से पहले जवाब तैयार था - ‘आज की शिक्षा वैसी शिक्षा नहीं रही जैसी आप कह रहे हैं। अब तो शिक्षा बच्चों को रुपये कमानेवाली मशीनें बना रही है। अपने आसपास देखिए, नफरत और प्रतियोगिता के नाम पर शत्रुताभरी प्रतिद्वन्द्विता के सिवाय और कुछ नजर आता है आपको? मनुष्यता खतरे में पड़ गई है। ऐसे में कुल जमा तीन चीजें हैं जो हमें बचा सकती हैं - साहित्य, ललित कलाएँ और खेल। ये तीनों ही सारे भेद-विभेद मिटा कर आदमी को आदमी से जोड़ती हैं। प्रेम, भाईचारा और एकता की जड़ें हैं ये तीनों। ये बच्चे तो मिट्टी के लोंदे हैं। इन्हें जैसा बनाओ, बन जाएँगे। इस समय इनमें प्रेम, भाईचारा, मनुष्यता, नैतिकता जैसे भाव-बीज डाल देंगे तो उनकी फसल लहलहा जाएगी। ये बच्चे बड़े पेकेजवाले प्रोफेशनल बनें न बनें, बेहतर इंसान जरूर बनेंगे। आज हमें इंसानों की जरूरत है। मैं उसी इंसानियत की सेवा का अपना फर्ज पूरा करने की कोशिश कर रहा हूँ।’ मैं निरुत्तर हो जाता हूँ। 
‘हम अंग्रेजों के जमाने के मास्टर हैं।’ बच्चों को सीखाते समय ‘ओपी’ कभी-कभी छड़ी जरूर उठा लेते हैं लेकिन हवा में ही लहराते रहते हैं।



अब तक के दस बरसों में डेड़ सौ से भी अधिक बच्चों को नाटक से जोड़ चुके ‘ओपी’ इस बरस भी अपनी फर्ज अदायगी कर रहे हैं। अपने उसी चिरपरिचित अन्दाज में। शिविर शुरु होने से पहले एक सामान्य विज्ञप्ति जारी कर देते हैं और भूल जाते हैं। अपने अच्छे-खासे परिचय क्षेत्र में खबर कर देते हैं। पन्द्रह-बीस बच्चे हर बरस जुट जाते हैं। आशीष दशोत्तर नियमित रूप से बच्चों के लिए हर बरस दो नाटक लिखता है। नाटक सामाजिक सन्देश लिए होते हैं। आशीष की कलम को मैं हर बरस सलाम करता हूँ। हर बार लगता है, ये नाटक गए बरस के नाटकों से बेहतर हैं। ओपी इन नाटकों पर खूब मेहनत करते हैं। डाँट-फटकार, पुचकार, सख्ती, नरमी सब साथ-साथ चलते हैं। शिविर का समापन दोनों नाटकों की प्रस्तुतियों से होता है। इन शिविरों की वजह से आशीष की कलम ने बच्चों के लिए अब तक लगभग बीस नाटक तैयार कर दिए हैं - एक से एक उम्दा। आशीष को तो पता ही नहीं होगा कि, बाल साहित्य के अकाल वाले इस समय में उसने कितना बड़ा काम कर दिया है। 

आशीष दशोत्तर
अन्तर्मुखी और लक्ष्य केन्द्रित ‘ओपी’ को अपने शिविर से मतलब रहता है। प्रचार-प्रसार की कोई लालसा नहीं। हम दो-चार लोग अखबारवालों से ‘भाई-दादा’ करके, हाथा-जोड़ी करते हैं, शिविर का महत्व बताते हैं तो वे भी उदारतापूर्वक कृपा प्रसाद बरसा देते हैं। स्थानीय टीवी चैनलों की रुचि बिलकुल नहीं होती।

ऐसे उदासीन समय और समाज में ओम प्रकाश मिश्रा नाम का यह आदमी, अकेला ही पठार पर अलाव जलाने की, रेगिस्तान में पौधे रोपने जुगत में लगा हुआ है।

यह आदमी पागल नहीं तो और क्या है? पागल ही है।

लेकिन याद रखें - यह दुनिया पागलों ने ही बदली है।)
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नौ मिनिट में नौ महीने

कवि दादू प्रजापति का वास्तविक नाम सुरेश प्रजापति है। सुरेश भले ही बच्चों का बाप है लेकिन यह हमारे परिवार का ही ‘बच्चा’ है। इसका बचपन हमारे परिवार में ही बीता। इसके पिताजी मिस्त्री सा’ब उर्फ श्री भँवरलालजी प्रजापति पर लिखी मेरी यह ब्लॉग पोस्ट पढ़ कर आप मेरी कही, आधी-अधूरी बात, पूरी तरह समझ जाएँगे। 

दादा से जुड़ा यह संस्मरण मेरी जिन्दगी का हिस्सा बना रहेगा। अवसर था मेरी किताब ‘तरकश के तीर’ के विमोचन का। दिन था 16 अक्टूबर 2016, रविवार, शरद पूर्णिमा का। मेरे गुरु श्रीयुत गणेशजी जैन की सलाह पर यह समारोह ग्राम आँतरी माताजी के स्कूल परिसर में आयोजित किया गया था। यह आयोजन, दादा के मुख्य आतिथ्य में, मेरी जन्म वर्ष गाँठ 10 सितम्बर 2016 को होना था। लेकिन उस दिन दादा उपलब्ध नहीं थे। दादा की सुविधानुसार 16 अक्टूबर की तारीख तय हुई थी। दादा के आने से मेरा उत्साह कुलाँचें मार रहा था। लेकिन धुकधुकी भी लगी हुई थी - ‘ऐसे आयोजनों का मुझे न तो अनुभव न जानकारी। कहीं, कोई चूक न हो जाए।’ 

पुस्तक विमोचन के चित्र में बाँये से - डॉ. पूरन सहगल, दादा, मारुतिधाम आश्रम (गुड़भेली) की सीता बहिनजी, सम्पादक तथा ख्यात भजन गायक श्री रतनलालजी प्रजापति (भीलवाड़ा), श्री नरेन्द्र व्यास और श्री प्रमोद रामावत (नीमच)।

दादा ने पहले ही कह दिया था कि उनके पास समय कम है। उनकी कोई पूर्वनिर्धारित व्यस्तता रही होगी। हम लोग कम से कम समय में बहुत कुछ कर लेना चाहते थे। लगभग बारह बरसों से मेरे साथ चित्रकारी का काम कर रहा भाई मुकेश सुतार तो वहाँ था ही, जाने-माने, नामचीन बाँसुरी वादक श्री विक्रम कनेरिया भी आमन्त्रित थे। दोनों कलाकारों की इच्छा तो थी ही, हम सब भी चाहते थे कि पुस्तक विमोचन से पहले इन दोनों की कलाओं का प्रदर्शन दादा के सामने हो। लेकिन दादा से मिली, वक्त की कमी की चेतावनी की अनदेखी भी नहीं कर सकते थे। 

अचानक ही मुझे एक आइडिया सूझा। कनेरियाजी और मुकेश की मौजूदगी में मैंने गणेश सर से कहा कि क्यों न ऐसा किया जाए कनेरियाजी, दादा के लिखे, फिल्म रेशमा और शेरा के कालजयी गीत ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ को बाँसुरी पर प्रस्तुत करें और इस प्रस्तुति के दौरान ही मुकेश, दादा का चित्र मौके पर ही बनाए और हाथों-हाथ दादा को भेंट करें? मेरा आइडिया सबको जँच गया। मुकेश के लिए यह आइडिया किसी चुनौती से कम नहीं था। 

हमने यही किया। साथी वादकों की संगत में कनेरियाजी ने गीत की मोहक तान छेड़ी और मुकेश की कूची चलने लगी। समारोह में मौजूद लोग मन्त्र मुग्ध हो टकटकी लगाए देख रहे थे। लेकिन हमारी साँसें बन्द हो गई थीं - बाँसुरी और ब्रश की जुगलबन्दी कामयाब होगी या नहीं?

लेकिन हमारी खुशी का पारावार नहीं रहा जब हमने देखा कि इस जुगलबन्दी ने हमारे विचार को साकार कर दिया। कनेरियाजी ने नौ मिनिट में गीत पूरा किया और गीत पूरा होते-होते मुकेश ने फायनल स्ट्रोक मार दिया। जुगलबन्दी सम पर आकर ठहर गई। हमारे लिए तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। पूरा पाण्डाल तालियों से गूँज उठा।

 बाँसुरी की धुन पर दादा का चित्र  बनाते हुए मुकेश सुतार

हमारी साँस में साँस आई। हमने दादा की ओर देखा। देखा और हक्के-बक्के रह गए। यह क्या? दादा की आँखों से आँसू बहे जा रहे हैं! पाण्डाल में सन्नाटा छा गया। किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। दादा ने खुद को सम्हाला। पानी पीया। सहज हुए और मुकेश को अपने पास बुलवाया। उसे आशीर्वाद दिया और भरे गले से बोले - ‘मुकेश! मुझे जनम देने के लिए मेरी माँ को नौ महीने लगे लेकिन तुमने तो मेरा चित्र नौ मिनिट में ही बना दिया! खूब खुश रहो।’ कहते-कहते दादा के आँसू फिर बह चले। दादा का यह कहना था कि पाण्डाल एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

मुकेश सुतार को बधाई देते हुए दादा

लेकिन दादा ने चौंकाया। उन्होंने मेरी किताब का विमोचन तो किया ही, मेरी किताब की पहली प्रति खुद ही खरीदी - पूरे पाँच सौ रुपयों में। उसके बाद दादा ने आशीर्वचन से हम सबको समृद्ध किया। कार्यक्रम समाप्त हुआ और वे अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम निपटाने चले गए।

कवि दादू प्रजापति की पुस्तक ‘तरकश के तीर’ की पहली प्रति का मूल्य देते हुए दादा

हम सब बहुत खुश थे। हमारी हर इच्छा पूरी हुई थी और दादा खूब खुश होकर लौटे थे।

हमारी ओर से तो कार्यक्रम समाप्त हो चुका था। लेकिन हमें नहीं पता था कि दादा की ओर से समापन नहीं हुआ था। कुछ दिनों बाद दादा का सन्देश आया - ‘कनेरियाजी और मुकेश को मेरे पास भेजो। मुझे बात करनी है।’ ताबड़तोड़ दोनों को दादा के पास भेजा। दोनों ने सोचा था, दादा एक बार फिर शाबाशी देना चाहते हैं। उन्हें नहीं पता था कि एक सरप्राइज उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। दोनों पहुँचते उससे पहले दादा ने पूरनजी सहगल को बुलवा रखा था। कनेरियाजी और मुकेश पहुँचे तो दादा ने सहगल सर के हाथों कनेरियाजी को 11,000/- रुपयों का तथा मुकेश को 2,500/- रुपयों का चेक दिलवाया। दोनों के पहुँचने से पहले ही दादा ने चेक तैयार कर रखे थे। दोनों को तो इसकी कल्पना भी नहीं थी। यह तो दादा के आशीर्वाद का टॉप-अप था! खुशी के मारे दोनों की दशा देखने जैसी हो गई थी।

दादा की मौजूदगी में, दादा के घर पर, मुकेश को चेक देते हुए डॉ. पूरन सहगल, बीच में जेकेट और काला चश्मा पहने कनेरियाजी।

आज दादा हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी ऐसी यादें उन्हें हमेशा हमारे साथ बनाए हुए हैं। 
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कवि दादू प्रजापति,
122, रामनगर कॉलोनी,
मनासा-458110
(जिला-नीमच)(म. प्र.)
मोबाइल - 96694 34092 

हास-परिहास हो, उपहास नहीं

दादा श्री बालकवि बैरागी की पहली बरसी (13 मई 2019) पर कुछ लेख पढ़ने को मिले। वे सारे लेख ‘नियमित लेखकों’ के थे। अचानक ही मुझे फेस बुक पर भाई बृज मोहन समदानी का यह लेख पढ़ने को मिला। भाई बृज मोहन समदानी अनियतकालीन लेखक, तीखे, दो-टूक, निरपेक्षी टिप्पणीकार और संवाद-विश्वासी हैं। मनासा में वे अपनी पीढ़ी के सम्भवतः ऐसे इकलौते व्यक्ति रहे जो दादा से निस्संकोच, सहज सम्वाद कर लेते थे। दादा के व्‍यक्तित्‍व के कुछ अनछुए पहलू उजागर करनेवाले इस लेख को इससे अधिक टिप्पणी की दरकार नहीं।

  
हास-परिहास हो, उपहास नहीं
बृज मोहन समदानी
  'बातचीत' की 10 अप्रेल 2018 की गोष्‍ठी  में बोलते हुए दादा।  यह उनकी अन्तिम गोष्‍ठी थी। 
मेरे बड़े भाई साहब आदरणीय गोविन्दजी समदानी (जो मुम्बइवासी हैं जहाँ उन्हें सर्वोच्च न्यायालय और महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के हलकों में ‘जीएस मनासावाला’ के रूप में पहचाना जाता है) के बाल सखा एवं हमेशा उनको स्मरण करने वाले, मनासा की पहचान, विनोदप्रिय, ठहाके लगा कर हँसने वाले, फक्कड़पन से जिन्दगी का आनन्द लेने वाले, आदरणीय दादा बालकविजी बैरागी को देह त्यागे एक बरस हो गया। 

दादा को अपनी इच्छानुरूप ‘अकस्मात मृत्यु’ मिली। अवसान के कुछ दिनों पहले ही उन्होंने नगेन्द्रश्री वीथिका, समदानीजी की बाड़ी में उनकी ही प्रेरणा से चल रहे आयोजन ‘बातचीत’ में कहा था - ‘ईश्वर से कुछ भी मत माँगो। उसने सब व्यवस्था की हुई है।’ फिर बोले थे - ‘मैं घनश्याम दासजी बिड़ला की इस बात से प्रभावित हुआ हूँ और ईश्वर से यही कहता हूँ कि मेरी चिन्ता तो तुझे है। मैं औेर कुछ नही माँगता। बस! माँगता हूँ तो अकस्मात मृत्यु।’ 
और क्या यह संयोग नहीं था कि दादा एक उद्घाटन समारोह से आये, घर पर सोये और सोये ही रह गए। अकस्मात मृत्यु! 

मुझ पर दादा का असीम प्रेम था। मेरे कई सुझावों को उन्होंने दिल्ली दरबार तक पहुँचाया था, कुछ क्रियान्वित भी हुए। ‘केश सबसीडी स्कीम’ इनमें प्रमुख है। 15-16  वर्ष पूर्व मेरे इस सुझाव को दिल्ली दरबार में पहुँचा कर सीधे हिताधिकारी के बैंक खाते में पैसे डालने की इस योजना के क्रियान्वित होने पर उन्होंने मुझे पत्र भी लिखा था। मेरे लिए धरोहर बन चुका यह पत्र यहाँ दृष्टव्य है।



पिछले कुछ सालों मे दादा ने मुझे कई बार कहा कि बाड़ी (हमारे पैतृक परिसर) में 10-20 जने बैठो और बिना किसी विषय के चर्चा करो। दादा का बचपन गोविन्द भाई साहब के साथ बाड़ी में ही बीता था। इससे दादा की यादें भी जुड़ी थी और कुछ दादा की रुचि भी संवाद कायम रखने की थी।

दादा ने एक संस्था बनाने हेतु दो नाम सुझाये - रंगबाड़ी और बातचीत। सबकी राय से ‘बातचीत’ नाम तय हुआ। दादा समय के पाबन्द थे। वे ठीक समय पर आ जाते। करीब 3 -4 घण्टे बातों का दौर चलता। दादा के कहे अनुसार संस्था में कोई छोटा-बड़ा नहीं था। कोई पदाधिकारी भी नहीं। सभी बराबरी के सदस्य। आश्चर्य तो तब हुआ जब हमने दादा की कुर्सी पर गादी रखी तो दादा ने पहले गादी हटाई फिर बैठे।

‘बातचीत’ में दादा सहित सर्वश्री विजय बैरागी, नरेन्द्र व्यास ‘चंचल’, सुरेश शर्मा, कैलाश पाटीदार ‘कबीर’, भाई संजय समदानी, अर्जुन पंजाबी, अनिल मलहरा, जगदीश छाबड़ा, बसन्त लिमये, कैलाश सोनी, अस्तु आचार्य और स्वयं मैं भागीदार रहते।




चित्र में बॉंये से बृज मोहन समदानी, दादा और मेरे प्रिय मित्र गोपाल आचार्य की बिटिया अस्तु आचार्य।  गोपाल  की निश्छलता भरे कुछ संस्मरण   आप   यहाँयहाँ और  यहाँ पढ़ सकते हैं।

यह अपनी तरह का अनूठा, अनौपचारिक ऐसा आयोजन होता था जिसमें कोई पूर्व निश्चित विषय नही होता। राजनीति पर चर्चा नहीं करने का अघोषित निर्णय सर्वसम्मति से ले लिया गया था। दादा अलग-अलग विषय रखते। दूसरे भागीदार भी रखते थे। सहज चर्चा में दादा बहुत गम्भीर बातें बोलते थे। बकौल दादा, किसी के संघर्ष को छोटा मत समझो क्योंकि संघर्ष का अनुभव भोगने वाले की  सहनशीलता, संघर्षशीलता पर भी निर्भर करता है।

दादा का कहना था कि आज रिश्ते औपचारिक हो गये हैं। हास्य का अभाव हो गया है। बातचीत में हास-परिहास हो, उपहास नहीं। एक गोष्ठी में दादा ने कहा था कि सशर्त विवाह कभी सफल नही हो सकते। जैसे शिवजी के धनुष को तोड़ने की शर्त पर हुए सीता के विवाह में सीता का क्या हुआ? धरती में समाना पड़ा। और ठीक भी तो है। दहेज की शर्त, शहर में रहने की शर्त, परिवार से अलग रहने की शर्त, व्यापार या नौकरी की शर्त पर आज जो विवाह होते हैं उनमें कितने सम्बन्ध आपसी क्लेश में उलझ जाते हैं।

दादा ने शिक्षा और विद्या पर भी चर्चा की। प्राचीन काल के गुरु विद्यार्थियों के समग्र विकास की, नैतिक एवं चारित्रिक शिक्षा की भी सोचते थे। दादा के अनुसार उनके जमाने मंे नामजोशीजी (रामपुरावाले) एक आदर्श गुरु थे। आज के विद्यार्थी आदर्श गुरु का नाम नहीं बता सकते। 

दादा की उपस्थिति और उनके चिन्तन-मनन-वक्तव्य का असर यह होता था कि किसी की उठने की इच्छा ही नहीं होती थी। आखिकार दादा ही सभा विसर्जन की घोषणा करते - ‘अब बहुत हो गया।’ 

‘बातचीत’ की गोष्ठियों का आरम्भ और समापन चाय से होता था। दादा काली, फीकी, बिना दूध वाली चाय पीते थे। 10 अप्रेल 2018 वाली उनकी गोष्ठी अन्तिम थी। शुरुआती चाय का मौका आया तो दादा बोले ‘तुम सब मीठी दूध वाली चाय पियो। मेरे लिए तो गरम पानी ही मँगवा दो। मैं अपनी चाय की थैली (टी बेग) साथ लाया हूँ।’ समापनवाली चाय के वक्त हमने मान लिया कि दादा अपना टी बेग लेकर आए ही हैं। हमने गरम पानी का कप उनके सामने बढ़ा दिया। दादा बोले ‘थैली एक ही लाया था।’ अब क्या किया जाय? हम कुछ सोचते उससे पहले ही दादा बोले ‘इस गरम पानी में ही चाय की पत्ती डाल दो।’ चाय की पत्ती डाल दी गई और हम लोग छन्नी तलाशने लगे तो दादा बोले ‘छानने के चक्कर में मत पड़ो।’ और उन्होंने, पेंदे में बैठी चाय-पत्ती से बचते हुए, ऊपर-ऊपर से चाय पी ली। गजब की सहजता!

10 अप्रेल 2018 वाली इसी गोष्ठी में मैंने दादा से कहा था - ‘उम्र के इस पड़ाव पर भी आपकी स्मरण शक्ति अद्भुत और धैर्य गजब का है। आप स्थितप्रज्ञता को जी रहे हैं।’ दादा कुछ नहीं बोले थे। बस! मुस्करा दिए थे।

दो साल पहले ही दिगम्बर जैन मुनिद्वय प्रणम्य सागरजी महाराज एवं शीतल सागरजी महाराज के साथ नगेन्द्रश्री वीथिका में दादा भी पधारे थे और जैनत्व की चर्चा की थी। दादा ने मुनिश्री जिज्ञासा प्रकट की थी कि महावीर ने मान, मोह, माया,सब त्याग दिए लेकिन एक मन्द मुस्कान यानी स्मित हमेशा उनके चेहरे पर रही। वो नही त्यागी। यानी महावीर हमेशा सस्मित रहे।

तब प्रणम्यसागर जी महाराज ने बहुत सुन्दर दार्शनिक विवेचना की थी कि जब महावीर ने माया-मोह सब छोड़ दिये एवं ध्यान लगाया तो उन्हें संसार की नश्वरता दिखी। तब उन्होंने नेत्रों को थोड़ा सा खोला तो यह देखकर उन्हें हल्की सी हँसी आई कि दुनियावी लोग इसी नश्वरता को अमरता समझ रहे हैं। इसी कारण महावीर सदैव सस्मित रहे। दादा को मुनिवर का यह दार्शनिक विवेचन बहुत पसन्द आया था।

आचार्य तुलसी एवं आचार्य महाप्रज्ञ जी से दादा काफी प्रभावित थे। उनसे कई बार मुलाकातें भी की थीं। ओशो भी दादा की कवितायें पढ़ते थे। कुमार विश्वास भी दादा के नाम का उल्लेख करते हुए दादा की कविताएँ उद्धृत करते हैं। 

आदरणीय गोविन्द भाई साहब एवं दादा  सहपाठी भी रहे और रामपुरा होस्टल के कमरे के सहरहवासी भी। दादा अन्तरंग और सार्वजनिक रूप से दोनों के सम्बन्धों के बारे में बताते ही रहते थे। गोविन्द भाई साहब के पचहत्तर वर्ष पूर्ण करलेने के अवसर पर उन्होंने एक विस्तृत लेख भी लिखा था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय एक कविता में उन्होंने गोविन्द भाई साहब के कारण ही, टाटा-बिड़ला के साथ समदानी शब्द भी जोड़ा था।

बहुत कुछ लिखने को है। मेरा सौभाग्य है कि दादा का मुझे भरपूर  स्नेह एवं वात्सल्य मिला। अपने अन्तिम बरसों में दादा असामान्य रूप से अतिरिक्त, अत्यधिक सहज हो  गए थे। मैं शायद कुछ ज्यादा भी पा सकता था उनसे। नहीं पा सका। चूक मेरी ही रही।

दादा को श्रद्धा सुमन सहित प्रणाम।





बृज मोहन समदानी, 
मनासा-458110  (जिला-नीमच, म. प्र.)
मोबाइल नम्बर - 90397 12962

भीख का कटोरा और ‘नेट लॉस’



आज दादा की पहली बरसी है। पूरा एक बरस निकल गया उनके बिना। लेकिन कोई दिन ऐसा नहीं निकला जब वे चित्त से निकले हों। उनकी मौजूदगी हर दिन, हर पल अनुभव होती रही। वे मेरे मानस पिता थे। मुझमें यदि कुछ अच्छा, सन्तोषजनक आ पाया तो उनके ही कारण। वे दूर रहकर भी मुझ पर नजर रखते थे। मेरे बारे में कुछ अच्छा सुनने को मिलता तो फोन पर सराहते थे। कुछ अनुचित सुनने को मिलता तो सीधे मुझे कुछ नहीं कहते, खबर भिजवाते थे - ‘बब्बू से कहना, उसके इस काम से मुझे अच्छा नहीं लगा। पीड़ा हुई। यह उसे शोभा नहीं देता।’ मैं कहता - ‘सराहना तो सीधे करते हैं और खिन्नता औरों के जरिए जताते हैं! ऐसा क्यों दादा?’ वे कहते - ‘इसलिए कि तू जान सके कि तेरे इस गैरवाजिब की जानकारी मुझसे पहले औरोें को है। इसलिए कि तू इस कारण अतिरिक्त फिकर कर सके और खुद को सुधार सके।’

दादा को याद करने का कोई बहाना जरूरी नहीं। उनके रहते हुए भी और उनके न रहने के बाद भी। उन्हें भूला ही नहीं जा सकता। जाग रहा होऊँ तब भी और सो रहा होऊँ तब भी। वे मुझे कभी अकेला नहीं रहने देते। 

इन दिनों चुनाव चल रहे हैं। हमारे चुनाव बरस-दर-बरस मँहगे होते जा रहे हैं। संसद में करोड़ोंपतियों की संख्या हर बरस बढ़ती जा रही है। राजनीति आज पूर्णकालिक पारिवारिक धन्धा हो गया है। यह सब देख-देख मुझे उनकी वह बात याद आती है जो उन्होंने 1969 में, सूचना प्रकाशन राज्य मन्त्री बनने के ‘लगभग’ फौरन बाद कही थी। ‘लगभग’ इसलिए कि राज्य मन्त्री बनने के फौरन बाद ही वे  व्यस्त हो गए थे। मेरा भोपाल जाना बहुत-बहुत कम होता था। जब भी जाता, वे सदैव व्यस्त मिलते। लेकिन एक बार, एक पूरा दिन उन्हें खाली मिल गया। उस दिन उन्होंने खूब बातें की थीं। 

राज्य मन्त्री बनने पर उन्हें पूरे देश से बधाई सन्देश मिले थे। सचमुच में ‘बोरे भर-भर कर।’ अपनी आदत के मुताबिक उन्होंने उस प्रत्येक पत्र का जवाब दिया था जिस पर भेजनेवाले का पता था। वह धन्यवाद-पत्र कविता की शकल में था। उसकी पंक्तियाँ थीं - 

एक और आशीष मुझे दें माँगी या अनमाँगी।
राजनीति के राज-रोग से मरे नहीं बैरागी।।

हम दोनों, शाहजहानाबाद स्थित सरकारी बंगले ‘पुतली घर’ के लॉन में बैठे थे। मैंने दादा से पूछा था - ‘दादा! आप तो प्रबल इच्छा शक्ति के धनी हैं। आपको यह डर क्यों?’ खुद में खोये-खोये उन्होंने जवाब दिया था - ‘डर नहीं। राजनीति में कभी-कभी वह भी करना पड़ जाता है जिसके लिए अपना मन गवाही नहीं देता। यहाँ पग-पग पर फिसलन है। ऐसे हर मौके पर मेरा मन मुझे टोकता रहे, इसके लिए मुझे सबकी  शुभ-कामनाएँ चाहिए। मेरी पूँजी तो मेरी प्राणदायिनी कलम है। तेने केवल दो पंक्तियाँ ही कही। दो पंक्तियाँ और हैं।’ मुझे वे पंक्तियाँ याद आ गईं -

मात शारदा रहे दाहिने, रमा नहीं हो वामा।
आज दाँव पर लगा हुआ है, एक विनम्र सुदामा।।

दादा बोले - ‘यह सुदामापन ही मुझे जिन्दा बनाए रखता है, ताकत देता रहता है। जिन लोगों ने मुझे यहाँ भेजा है, उनसे मैंने मदद माँगी है  िकवे मुझे सुदामा बने रहने में मेरी मदद करें। मेरी चिन्ता करें।’

बात मेरी समझ से बाहर होने लगी थी। मैंने कहा - ‘मैं उलझन में पड़ता जा रहा हूँ।’ सुनकर दादा ने भेदती नजरों से मुझे देखा और बोले - ‘मेरी-तेरी मानसिक निकटता पूरा परिवार जानता है। अब जो मैं तुझे कहने जा रहा हूँ, बहुत ध्यान से सुनना। मुन्ना-गोर्की (मेरे दोनों भतीजे) अभी बहुत छोटे हैं। बच्चे हैं। बई और दा’जी (माँ-पिताजी) घर तक ही सिमटे हैं और रहेंगे। एक तू ही है जो इधर-उधर घूमता नजर आएगा। (उस समय मेरी अवस्था बाईस बरस थी) तेरे पास अभी कोई काम-धन्धा भी नहीं है। मुझ तक पहुँचने का तू आसान जरिया है। इसलिए तुझसे कह रहा हूँ। एक-एक शब्द ध्यान से सुनना और गाँठ बाँध लेना।’

दादा की बात सुनकर मैं, जो तनिक पसर कर बैठा था, सीधा हो गया, खिसक कर उनकी ओर झुक गया। उस दिन दादा ने जो कहा, वह अब भी मेरे जीवन का पाथेय बना हुआ है। मैं निश्चय ही बड़भागी हूँ जो मुझे यह अमूल्य जीवन निधि मिली। दादा ने कहा - “ये जो मुझे मिनिस्ट्री मिली है ना, यह जितनी अचानक मिली है उससे अधिक अचानक कभी भी चली जाएगी। यह टेम्परेरी है। क्षण भंगुर। इसलिए, इस टेम्परेरी चीज पर कभी इतराना, घमण्ड मत करना। मुझसे काम करवाने के लिए तेरे पास बड़े-बड़े, आकर्षक ऑफर आएँगे। जब भी तेरे पास लालच भरा ऐसा कोई प्रस्ताव आए तब याद कर लेना - अपन ने भीख के कटोरे से जिन्दगी शुरु की है। जब तक कटोरा हाथ में न आ जाए, तब तक अपना कोई ‘नेट लॉस’ नहीं है। बस! इतने में सब समझ ले।”

दादा का उस दिन का कहा, इस पल तक जस का तस मेरी पोटली में बँधा हुआ है। दादा के इस जीवन सूत्र ने जो हौसला, अभावों, प्रतिकूलताओं से से जूझने का जो जीवट दिया, विचलित कर देनेवाले पलों में संयमित रहने का जो सम्बल दिया वह सब अवर्णनीय है। 

जैसी दादा ने कल्पना की थी, उनके मन्त्री काल में मेरे पास खूब ‘ऑफर’ आए। ऐसे-ऐसे कि ‘दलीद्दर’ धुल जाते। लेकिन तब भीख का कटोरा बेइज्जत हो जाता। लेकिन मुझे सन्तोष है कि दादा की सीख ने मुझे उस कटोरे की इज्जत बरकरार रखने की ताकत दी।

ऐसी ताकत जिसके पास हो वह न तो गरीब होता है न ही कमजोर। मैं वही हूँ। मेरे दादा की वजह से।
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(यहॉं दिया चित्र 12 अप्रेल 2018 का है। उस दिन हम हमारी भानजी प्रतिभा-विनोद की बिटिया के विवाह प्रसंग पर मन्दसौर में इकट्ठे हुए थे। चित्र मैंने ही लिया था।)

ऐसे ही बदतमीज बने रहिए


चित्र में मैं जिनके साथ बैठा दिखाई दे रहा हूँ वे हैं श्री दिनेश चन्द्रजी जोशी। मेरे दिनेश दादा। रतलाम के चिन्तकों, विचारकों, प्रबुद्धों में अग्रणी। सेवा निवृत्त अध्यापक हैं। कुशल, दीघानुभवी आयुर्वेद चिकित्सा-परामर्शदाता। हिन्दी के ख्यात, अमर कवि प्रदीप के सगे भानजे। उनसे जुड़े किस्सों की खान हैं दिनेश दादा। वैसे, दिनेश दादा से जुड़े अनगिनत रोचक-बौद्धिक किस्से भी रतलाम की गलियों में बिखरे पड़े हैं।

आज अचानक ही दिनेश दादा एलआईसी दफ्तर में नजर आए तो चौंक पड़ा। उनके आने से नहीं, उनके दुबलेपन और बमुश्किल सुनी जा सकनेवाली उनकी अत्यन्त धीमी आवाज से। जिनकी आवाज तीन गलियाँ पार कर लेती थीं उन्हीं की बात सुनने के लिए आज मुझे उनके मुँह से अपने कान लगाने पड़ रहे थे। एलआईसी दफ्तर आने का उनका प्रयोजन पूछा। भोजनावकाश शुरु हो गया था। दिनेश दादा को कम से कम आधा घण्टा प्रतीक्षा करनी ही थी। सो, बातें शुरु हो गईं।

साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न दिनेश दादा रतलाम में पूर्णेश्वर मन्दिर के पास, चक्कीवाली गली में रहते हैं। उनका निवास, कुछ बरसों पहले तक उनकी पसन्द के लोगों का अड्डा बना रहता था। दादा अपनी ओर से किसी न किसी जयन्ती, पुण्य तिथि, साहित्यिक प्रसंग पर लोगों को बुला लिया करते थे। ऐसे प्रत्येक अवसर पर दो-ढाई घण्टे की जोरदार अड्डेबाली हो जाया करती थी। हमस ब शाम को, सुस्त-सुस्त उनके यहाँ पहुँचते और ठहाके लगाते हुए, ताजादम लौटते थे। ऐसा ही एक किस्सा आज उन्हें देखते ही याद आ गया। कुछ और एजेण्ट भी बैठे थे। किस्सा मैंने याद दिलाया। मैंने ही सुनाया भी। दिनेश दादा ने मेरे सुनाए किस्से की पुष्टि की। 
वह किस्सा मैं कभी नहीं भूल सकता। भूलना चाहूँगा भी नहीं। उस शाम दिनेश दादा ने, बीमा एजेण्ट के रूप में मुझे जो प्रमाण-पत्र दिया, उसके सामने बड़ा से बड़ा प्रमाण-पत्र भी टटपूँजिया लगेगा। पूरा किस्सा जान लेंगे तो आप भी मुझसे सहमत हो जाएँगे कि वैसे प्रमाण-पत्र के लिए हर बीमा एजेण्ट तरस जाएगा।

यह कोई  बारह-पन्द्रह बरस पहले की बात होगी। अब याद नहीं कि प्रसंग क्या था। लेकिन था किसी की जयन्ती का ही। हम कोई बीस लोग थे। आयोजन समाप्त हो चुका था। बतरस के साथ अल्पाहार चल रहा था। अचानक ही, बिना किसी सन्दर्भ, प्रसंग के दिनेश दादा ने मुझे सम्बोधित किया - ‘यार बैरागीजी! ये बताओ! आप जैसा बदतमीज आदमी, कामयाब बीमा एजेण्ट कैसे हो गया?’ सवाल उछलते ही गोष्ठी में सनाका और सन्नाटा खिंच गया। कुछ लोग मुझे और कुछ लोग दिनेश दादा को। दो-चार पल बाद वे लोग भी मुझे ही देखने लगे जो दिनेश दादा को देख रहे थे। और मैं? मेरी तो कुछ पूछिए ही मत। ‘अचकचा गया’, ‘सपकपा गया’, ‘सिटपिटा गया’, ‘सम्पट भूल गया’, ‘सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई’ जैसे तमाम पोस्टर मुझ पर चिपक गए थे। सब लोग भी, आशंकित चेहरे लिए हैरत में थे। यह क्या बात हुई? यह क्या हो गया? स्वल्पाहार करते हाथ इस तरह रुक गए जैसे किसी बच्चे ने खेलते हुए सबको ‘स्टेच्यू’ कह दिया हो। सहज होने में मुझे कुछ पल लगे। बात पल्ले पड़ते ही मुझे गुदगुदी होने लगी। खुल कर हँसते हुए मैं अपनी जगह से उठा, दिनेश दादा के पास गया और उनके पाँव छू कर कहा - ‘यह तो आप ही बताओगे कि ऐसा कैसे हो गया लेकिन दादा! आज आपने मुझे निहाल कर दिया। अब मुझे अपने किसी ग्राहक से, किसी संस्था-संगठन से, हमारे मेनेजमेण्ट से, किसी से भी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं रही।’ 

मेरी बात का पहला असर यह हुआ कि सारे लोग तनावमुक्त हो गए। दूसरा असर दिनेश दादा पर हुआ। वे सस्मित बोले - ‘अरे! कमाल है यार! मैंने आपको बदतमीज कहा और आप मुझे धन्यवाद दे रहे हो! मेरे पाँव छू रहे हो!’ मैंने कहा - ‘हाँ दादा! मैं ऐसा नहीं करता तो जरूर बदतमीज हो जाता।’ अब दिनेश दादा खुल कर हँसे और बोले - ‘याने उतने बेवकूफ भी नहीं हो जितने नजर आते हो। चलो अच्छा हुआ। मेरा सिलेक्शन गलत नहीं है।’

अब सब लोग इतने सहज हो चुके थे कि हँस सकें। सो, वे सब अब हँस रहे थे। स्वल्पाहार का, थमा क्रम फिर शुरु हो गया। मुझे लगा, बात आई-गई हो जाएगी। सो फौरन ही कहा - ‘आपके सवाल का जवाब आपके ही पास है। बता दीजिए कि यह बदतमीज आदमी कामयाब एजेण्ट कैसे बन गया।’ दिनेश दादा ने बिना विचारे (विदाउट थॉट) जवाब दिया - ‘दो कारणों से। पहला - आपकी बोली भले ही कड़वी है, आप भले ही पत्थरमार बोलते हैं लेकिन आपकी नियत खराब नहीं होती। दूसरा - आपकी ग्राहक सेवा, जिसके बारे में मुझे पूरे रतलाम में सुनने को मिलता है। जितनी सराहना आपकी सुनने को मिलती है उतनी और किसी एजेण्ट की नहीं।’

दादा का यह कहना था कि मैं ‘पोमा’ गया। फूल कर कुप्पा हो गया। जिस कुर्सी पर मैं बैठा था, वह छोटी लगने लगी। मेरी यह दशा देख कर दिनेश दादा ने अंगुली से पहले तो मुझे अपने पास आने का इशारा किया और जैसे ही मैं उठा वैसे ही अपनी वह अंगुली अपने पैरों की तरफ कर दी। मैं जमीन में गड़ गया और बाकी सब के ठहाकों से पूरी चक्कीवाली गली गूँज उठी। झेंपते-झेंपते ही मैंने दिनेश दादा के पाँव छुए। दादा ने मेरी पीठ थपथपाई और कहा - ‘पोमाने के अलावा ऐसे ही बदतमीज बने रहिए।’ इस बार फिर जोरदार ठहाका लगा। हाँ, इस बार इन ठहाकों में मेरा ठहाका भी शामिल था।

दफ्तर का भोजनावकाश समाप्त हो रहा था। मैंने साथी एजेण्ट प्रदीप जादोन से हम दोनों का फोटू लेने का आग्रह किया। दादा का काम निपटा कर उन्हें सीढ़ियों तक छोड़ने गया। उन्होंने मुझे असीसा। मुझे लगा, वे कहेंगे - ‘ऐसे ही बदतमीज बने रहिए।’ लेकिन नहीं कहा।

कह देते तो मैं एक बार फिर निहाल हो जाता।
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‘वे’ अब ऐसी गलतियों से ही याद किए जाएँगे


लोक सभा के चुनावों के महत्व को अनुभव करते हुए विश्वास कर रहा हूँ कि दैनिक भास्कर के आज (14 अप्रेल 2019) के अंक में छपा उपरोक्त समाचार निश्चय ही भास्कर के समस्त संस्करणों में छपा होगा। इस समाचार में, प्रदेश के पूर्व मुख्य मन्त्री स्वर्गीय श्री वीरेन्द्र कुमार सकलेचा का हवाला देते हुए उनका जो चित्र छपा है वह सकलेचाजी का नहीं, किसी और का है। समाचार का, गलत चित्र वाला हिस्सा भी यहाँ दे रहा हूँ।
समाचार का वह अंश जिसमें सकलेचाजी के चित्र की जगह किसी और का चित्र छपा है।

सकलेचाजी के चित्र बहुत कम मिलते हैं। कैमरे से नजदीकी उन्हें नहीं सुहाती थी। मेरे छोटे भतीजे गोर्की के विवाह समारोह में (दिनांक 21 जून 1983) वे वर-वधू को आशीर्वाद देने पहुँचे तो भरपूर विलम्ब से। समारोह के समापन छोर पर। मंच पर पहुँचे तो चित्र खिंचवानेे को तैयार नहीं हुए। गोर्की उनसे अनौपचारिक होने की छूट ले लिया करता था। उसने कहा कि चित्र तो खिंचवाना पड़ेगा। वे अत्यधिक अनिच्छापूर्वक तैयार हुए तो वर-वधू से भरपूर दूरी बना कर खड़े हुए। तब गोर्की ने हँसते हुए, उनकी बाँह पकड़ कर अपने पास खींचते हुए भरोसा दिलाया था कि वे (सकलेचाजी) निश्चिन्त रहें, इस चित्र का राजनीतिक उपयोग नहीं होगा। गोर्की के इस आश्वासन पर ही उन्होंने फोटू खिंचवाया तो जरूर लेकिन गोर्की के और फोटोग्राफर के बार-बार आग्रह के बाद भी मुस्कुराए नहीं।

सकलेचाजी संघ के निष्ठावान, समर्पित स्वयम्सेवक थे। हिटलरी मूँछें रखना संघियों की पहली पसन्द है। बल्कि यह कहना अधिक समीचीन होगा कि हिटलरी मूँछें संघियों की प्रमुख पहचान है। सकलेचाजी भी हिटलरी मूँछे रखते थे और मुस्कुराने से परहेज करते लगते थे। सकलेचाजी के, बिना मूँछोंवाले चित्र की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

पत्रकारिता में ऐसी चूकें होना बहुत सामान्य बात है। वैसे भी पत्रकारिता की आज की पीढ़ी अध्ययन से दूर होती जा रही है। वह तकनीक और गूगल पर निर्भर हो गई है। पुराने पत्रकारों को सहेजना तो दूर की बात रही, उनकी पूछ-परख भी नहीं रही। उनके पास बैठ कर उनके अनुभव सुनना अब वक्त खराब करना हो गया है। ऐसे में सकलेचाली के चित्र की जगह किसी और का चित्र छाप देना, पीड़ादायक भले ही हो, किन्तु आश्चर्यजनक नहीं। मैंने भी गूगल से उनका चित्र तलाश किया। जो चित्र मिला वह यहाँ दे तो रहा हूँ लेकिन खुद भी सन्देहग्रस्त हूँ। मेरे मानस में सकलेचाजी की जो छवि है, उससे यह चित्र मेल खाता है। हिटलरी मूँछें आश्वस्त होने में सहायता करती हैं। यह चित्र उनकी जवानी के दिनों का लगता है। 

स्वर्गीय श्री वीरेन्द्र कुमारजी सकलेचा
(चित्र सौजन्य गूगल)

लेकिन ऐसी एक मजेदार चूक का किस्सा मुझे 1975-76 में भोपाल में सुनने को मिला था। उन दिनों मैं अंग्रेजी दैनिक हितवाद के प्रबन्धन विभाग में नौकरी करता था। श्री गोविन्द तोमर वहाँ वरिष्ठ संवाददाता थे। समाजवादी विचारधारावले तोमरजी के पास नेताओं और पत्रकारिता के अन्तर्सम्बन्धों और सस्मरणों का खजाना था। 

प्रेस की चूक का यह मजेदार किस्सा उस जमाने का है जब चित्रों के ब्लॉक बनाए जाते थे। उस जमाने में एक विज्ञापन भोपाल के लगभग तमाम अखबारों में, ‘स्पेस बुकिंग एग्रीमेण्ट’ के तहत प्रतिदिन छपता था। यह विज्ञापन था हकीम वीरूमल आर्यप्रेमी का। जैसा कि नाम से ही जाहिर है, वे हकीम थे और आर्य समाजी थे। उन दिनों सफेद टोपी आर्य समाजियों की पहचान हुआ करती थी। विज्ञापन के साथ हकीम वीरूमलजी का चित्र भी छपता था जिसमें वे सफेद टोपी पहने नजर आते थे। 

भारत के राष्ट्रपति रहे डॉक्टर शंकर दयालजी शर्मा उस काल खण्ड में मध्य प्रदेश की राजनीति के चर्चित चेहरों में शामिल थे। वे भोपाल ही रहते थे। वे भी सफेद टोपी पहनते थे। बिना टोपीवाला उनका चित्र अपवादस्वरूप भी शायद ही मिले। डॉक्टर साहब और हकीमजी के चित्रों के सिंगल कॉलम चित्र लगभग एक जैसे लगते थे। 

स्वर्गीय डॉक्टर शंकर दयालजी शर्मा
(चित्र सौजन्य गूगल)  

मुझे याद नहीं कि तोमरजी ने अखबार का नाम बताया था या नहीं। लेकिन एक अखबार में ऐसा हुआ कि विज्ञापन विभाग ने लायब्रेरियन से हकीम वीरूमल आर्यप्रेमी का ब्लॉक माँगा। लायब्रेरियन ने अपना खजाना टटोला और सफेद टोपी लगा जो ब्लॉक नजर आया वह विज्ञापन विभाग को दे दिया। वही ब्लॉक उस अखबार में छपा और छपता रहा।

पाँच-सात दिन बाद, किसी कर्मचारी का ध्यान चित्र पर गया तो चौंक उठा। विज्ञापन में हकीम वीरूमल आर्यप्रेमी के चित्र के बजाय डॉक्टर शंकर दयालजी शर्मा का चित्र छप रहा था। उसने सम्बन्धितों को बताया तो सबका ध्यान गया और तत्काल ही गलती दुरुस्त की गई। लेकिन गौर करनेवाली बात यह रही कि इस चूक की ओर किसी का ध्यान नहीं गया - न विज्ञापनदाता का, न अखबारवालों का, न ही किसी काँग्रेसी का। हकीमजी के चित्र की जगह डॉक्टर साहब का चित्र छपा और छपता रहा। चूक की दुरुस्ती भी किसी के चौकन्ननेपन की वजह से नहीं, एक अदना कर्मचारी के, फुरसत में ‘यूँ ही’ फोटू देखने से हुई। ईश्वर तोमरजी को दीर्घायु प्रदान करें। यह लेख उन तक पहुँचेगा तो वे निश्चय ही इस विवरण की पुष्टि करेंगे।

पता नहीं, भास्कर की इस चूक की ओर किसी का ध्यान गया या नहीं। ध्यान जाएगा भी या नहीं। क्योंकि प्रेस/मीडिया-जगत में ऐसी चूक होना कोई गम्भीर बात नहीं होती।

बाल संरक्षण के लिए नोबल पुरुस्कार प्राप्त श्री कैलाश सत्यार्थी वाला मामला तो बहुत पुराना नहीं है। उस समाचार में कैलाश सत्यार्थी की जगह कैलाश विजयवर्गीय को दे दी गई थी और दिग्गज भाजपाइयों ने गर्वपूर्वक ‘अपने कैलाशजी’ का महिमा बखान करते हुए अपनी विद्वत्ता बघारते हुए विजयवर्गीय को बधाइयाँ भी दे दी थीं। 

आप-हम जो भी कहें। कह लें। लेकिन प्रेस की चूक यह परम्परा तो सनातन से चली आ रही है जो प्रलय तक चलती रहेगी और डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा, कैलाश सत्यार्थी, सकलेचाजी जैसे कई लोग ऐस बहानों से भी याद किए जाएँगेे।
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साकार होती एक लोक कथा

प्रायः प्रत्येक अंचल में पाई जानेवाली लोक कथा का ‘वृद्ध पुरुष संस्करण’, (यदि सब कुछ वैसा ही सामान्य बना रहा है जैसा इस क्षण है तो) अपनी पूर्णता के अन्तिम सोपान पर है और मैं इसका हिस्सा हूँ।

इस लोक कथा में किसी एक देश का राजकुमार या राजकुमारी किसी दूसरे देश की अनदेखी राज कुमारी का नख-शिख वर्णन सुनकर या अनदेखे राजकुमार के साहस और शूर-वीरता का बखान सुनकर मोहित हो, उसी से विवाहबद्ध होने का प्रण ले लेता/लेती है। अनेक घटनाओं/प्रसंगों से गुजरती हुई लोक कथा का समापन दोनों के विवाह से होता है।

कुछ ऐसा ही यहाँ हो रहा है। बड़ा अन्तर यह कि इस कथा में न तो कोई राजकुमारी है न ही राजकुमार। दोनों पात्र पुरुष हैं और आधिकारिक रूप से ‘वृद्ध’ हैं - एक 77 वर्ष का और दूसरा 72 वर्ष का।

 मैं ईश्वर चन्द्रजी को नहीं जानता। उन्हें देखा भी नहीं। उनके बारे में कभी-कुछ सुना भी नहीं। मुझे लेकर यही स्थिति ईश्वर चन्द्रजी की भी है। फेस बुक पर ही उनके चित्र देखे और उनकी पोस्टें पढ़ीं। अब यह भी याद नहीं आ रहा कि उनकी ओर कब ध्यानाकर्षित हुआ। एक बार उनकी, आत्म-कथ्य जैसी एक पोस्ट पढ़ी थी जिससे मालूम हुआ कि वे आपातकाल के विरुद्ध अभियान में सक्रिय थे और (शायद) जेल भी गए थे। शायद उनके समाजवादी रुझान ने ही मुझे उनकी ओर आकर्षित किया होगा। लोहिया मुझे शुरु से लुभाते रहे हैं। व्यवस्था के विरुद्ध उनकी तथ्यपूर्ण, धारदार किन्तु शालीन आक्रामता मुझे विस्मित करती रही है। ओंकार शरद लिखित लोहिया की जीवनी मेरे पास बरसों सुरक्षित रही। लेकिन  कोई भरोसेमन्द मिलनेवाला उसे ले उड़ा। बाद में नीमचवाले डूँगरवालजी, जीरनवाले रामचन्द्रजी शर्मा, गाहे-ब-गाहे मन्दसौर-नीमच की यात्राओं पर आते रहे बाबू लाड़ली मोहन निगम (इन्हें मैंने देखा ही देखा है, सामुख्य कभी नहीं हुआ। इनकी बातें खूब सुनीं हैं।), ‘विषपायी’ के नाम से पहचाने जानेवाले बाबू भाई माली, मंगलजी मेहता, कमल जैन आदि-आदि समाजवादी चिन्तकों/विचारकों से लगातार निकट सम्पर्क ने समाजवादियों के प्रति आकर्षण को घना किया। जब समाजवादी आन्दोलन अपने विद्रोही तेवरों के चरम पर था तब से लेकर अब तक मेरी यह धारणा यथावत् बनी हुई है कि समाजवादियों के सत्तासीन होने ने भारतीय लोकतन्त्र की अपूरणीय हानि पहुँचाई है। समाजवादी यदि सत्ता में न जाते तो हमारा लोकतन्त्र आज की बदहाली नहीं भुगतता। ये लोग लोकतन्त्र के सच्चे रक्षक हो सकते थे लकिन सत्ता-सुन्दरी की रति-लिप्सा में स्खलित हो बैठे। सो, ईश्वर चन्द्रजी के समाजवादी रुझान ने ही मुझे उनके प्रति आकृष्ट किया होगा।

उनकी खुद की वाल पर उनकी पोस्टें और दूसरों की वालों पर उनकी टिप्पणियाँ पढ़-पढ़ कर उनकी सटीकता मुझे धीमे-धीमे कायल करने लगी। सूत्रों में बात करती, ‘सतसैया के दोहरे’ की तरह उनकी टिप्पणियाँ ‘बीज में वृक्ष’ की अनुभूति कराती  लगीं। (बाद में मालूम हुआ कि वे भवानीमण्डी रहते हैं। दीर्घानुभवी वकील हैं। कम बोल कर ज्यादा कहने का कमाल कोई वकील ही कर सकता है।) शेर-ओ-शायरी की शकल में उनकी भावनाएँ बड़ी नजाकत से गहरे पैठती लगती हैं। फूलों के सुन्दर चित्र उनके प्रकृति प्रेमी होने का सन्देस देते हैं। 

इसी इक्कीस फरवरी की सुबह तीन बजे नींद खुल गई। मेरे साथ ऐसा सामान्यतः होता नहीं। मैं ‘उन नौ लोगों’ में भी नहीं जिन्हें नींद न आए। लेकिन नींद का क्या है, खुल गई तो खुल गई। नींद खुलने के बाद चैतन्य होने के पहले ही क्षण विचार आया - ‘ईश्वर चन्द्रजी से मिलना चाहिए।’ इस बात को एक महीना होने को आ रहा है लेकिन अब तक समझ नहीं पाया कि यह विचार क्यों आया। विचार आते ही 03ः04 बजे मेसेंजर पर उन्हें सन्देश दिया - 

“यह शायद ब्राह्म मुहूर्त की वेला है। बिना किसी सन्दर्भ-प्रसङ्ग मन में आया कि यदि कभी भवानीमण्डी आना हुआ और आपसे मिलने को जी चाहे तो किस पते पर पहुँचूँ?

भवानीमण्डी आज तक नहीं गया और दूर-दूर तक कोई कारण नजर नहीं आता भवानीमण्डी आने का।” 

सन्देश देकर मैं अपने काम पर लग गया। दिन भर खूब काम किया। दिन में किए काम का टेबल वर्क निपटाकर, भोजन करते-करते खूब देर हो गई। रात साढ़े ग्यारह बजते-बजते अचानक ईश्वर चन्द्रजी की याद आई। मेसेंजर खोला तो शाम 07ः53 पर आया उनका सन्देश देखा -

“आप ज़रूर पधारें। बहुत खुशी होगी। आपको ‘उपग्रह’ में पढ़ता रहा हूँ। ‘जनसत्ता’ में भी। अब यह अखबार यहाँ नहीं मिलता। मेरा पचपहाड़ में फार्म पर घर है आपको असुविधा नहीं होगी। भवानीमण्डी में वकालत करता हूँ यहाँ भी रामनगर गोटावाला  कॉलोनी में मकान है। बड़े भाई साहब से परिचित था। मेरा  मोबाइल नम्बर ------- है। आप कहें तो कार लेकर भानपुरा आ  सकता हूँ। आग्रह है आप अवश्य पधारें।”

इसके बाद हमारा संवाद शुरु हुआ -

मैं - “अरे! आप इतने समीप के निकले! सुखद आश्चर्य। 
आप भानपुरा क्यों आएँगे? मैं तो रतलाम में हूँ। आऊँगा तो भवानीमण्डी (अब पचपहाड़) ही आऊँगा। मुझे वहाँ कोई काम नहीं है। बस! उस भोर मन में बात आई। बता दी। नहीं जानता कि कब आऊँगा। लेकिन जब भी आऊँगा, अब पूछ/कह कर आऊँगा।”

ईश्वर चन्द्रजी - “मन की बात का ठेका मोदीजी का नहीं है।
कृपया जल्दी प्रोग्राम बना कर सूचित करें। स्टेशन पर स्वागत के लिए उत्सुक हूँ।”

मैं - “यह सब तो अब संस्मरण बनता जा रहा है।

बीमा एजेण्ट हूँ। लेकिन लालची नहीं। जरूरतें सब पूरी हो रही हैं लेकिन धन्धे की प्रकृति अनुमति नहीं दे रही। ‘मार्च-बाधा’ जनवरी से आड़े आ खड़ी है। ‘अन्नदाता’ जैसे कुछ कृपालु इन दिनों मुझे अपने पास ही चाह रहे हैं। जानता हूँ कि मेरे बिना उनका (उनका क्या, किसी का भी) काम नहीं रुकेगा। लेकिन रुकना है।

इसलिए, अभी तो मार्च तक रतलाम में ही। आगे प्रभु इच्छा।”

ईश्वर चन्द्रजी - “जी। समझ सकता हूँ। अप्रैल में पधारें।”

मैं - “प्रभु मुझे जल्दी आपके दरवाजे पर खड़ा करे।”

ईश्वर चन्द्रजी - “तथास्तु। बात यह है कि 78 पार कर रहा हूँ सो चाहता हूँ आप जैसे प्रिय लेखकों से इति के पहले मिल लूँ।

अच्छा लगेगा आपसे मिल कर।”

मैं - “मैं आपके पीछे-पीछे ही चल रहा हूँ - मार्च में 73वाँ शुरु हो जाएगा। रोचक संयोग यह कि जैसा आप सोच रहे हैं, मैं भी ठीक वैसा ही सोचे हुए हूँ। जब भी इन्दौर जाता हूँ, ऐसे ही अपने पसन्ददीदा दो-एक कलमकारों से जरूर मिल आता हूँ।

यह उतावलापन मुझे भी तनिक परेशान करने लगा है। लेकिन यह परेशानी आनन्ददायक है।”

ईश्वर चन्द्रजी - “अब आप समझ गये मेरी उत्सुकता। मुझे गम्भीरता से लेंगें, इस आशा के साथ, शुभरात्रि।”

वह दिन और आज का दिन। एक-एक करके दिन बीतते जा
रहे हैं। मैं अपना काम किए जा रहा हूँ। इस बीच अप्रेल के लिए काम आने शुरु हो गए हैं। पन्द्रह से इक्कीस अप्रेल तक की व्यस्तता अभी से पक्की हो गई है। यह स्थिति देख कर घबराहट हो रही है। मुझे जल्दी से जल्दी पचपहाड़/भवानीमण्डी जाना चाहिए। बिना काम की मुलाकतें जीवनी-शक्ति देती हैं। ऐसी मुलाकातों को लोग नफे-नुकसान से देखते-तौलते हैं, घाटे का सौदा मानते हैं। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। लिख भी चुका हूँ। 

अब मुझे खुद को कसौटी पर कसना है।
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ईश्वर चन्द्रजी के चित्र मैंने फेस बुक से, उनकी वाल से ही लिए हैं। 
एक चित्र पुराना लगता है और दूसरा अभी-अभी का। 

    

‘नागरिक’ को मिल गया नल कनेक्शन


न तो गुस्सा न ही शिकायत। न ही उपहास। बात कोई अनूठी भी नहीं। ऐसा केवल रतलाम में ही नहीं हुआ। सब जगह होता होगा। लिखने का भी कोई मतलब नहीं। लिख कर भी क्या होगा? एक आदमी हो तो सुधारने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन व्यवस्था को बदलने की कोशिश करना तो दूर, ऐसी कोशिश करने की सोचना भी निरी मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं। 


अपने रतलाम के एक ‘नागरिक’ को अपने घर के लिए नल कनेक्शन चाहिए था। वह नगर निगम दफ्तर गया। जल विभाग में मिला। सबने भाव खाया। किसी ने भाव नहीं दिया। बार-बार ‘हुजूर! माई बाप!’ किया लेकिन किसी पर कोई असर नहीं। अहसान करते हुए, अकड़कर जवाब दिया - ‘कम से कम तीन सप्ताह लगेंगे और रोड़ कटिंग तथा दूसरे खर्चों का लगभग दस हजार खर्च आएगा।’ ‘नागरिक’ ने कहा कि रकम पर वह सहमत है लेकिन कनेक्शन जल्दी चाहिए। लेकिन तीन सप्ताह से नीचे उतरने को कोई तैयार ही नहीं हुआ।

निराश, रुँआसी मुद्रा में ‘नागरिक’ बाहर आया। नगर निगम की सीढ़ियों पर खड़ा-खड़ा दाढ़ी खुजला रहा था कि एक आदमी सामने आया। बोला - ‘कनेक्शन फटाफट हो जाएगा और रुपये भी चार हजार से अधिक नहीं लगेंगे।’ ‘नागरिक’ को भरोसा नहीं हुआ। उसे ठगी की कई घटनाएँ याद आ गईं। लगा, कोई उसे दस लाख की लॉटरी खुलने की खबर देकर रकम जमा कराने के लिए उससे बैंक खाता नम्बर पूछ कर उसकी रकम हड़पने की कोशिश कर रहा है। उसने अविश्वास से देखा। ‘आदमी’ ने कहा - ‘पहले कनेक्शन करवा लो। पैसे बाद में देना।’ अब ‘नागरिक’ के पास इंकार करने का कोई कारण नहीं था।

‘नागरिक’ के साथ ‘आदमी’ बाजार गया। नल कनेक्शन का सामान खरीदा। अपने एक सहायक के साथ ‘नागरिक’ के घर आया। दिन-दहाड़े, चौड़े-धाले सड़क खोदी, वाटर सप्लाय की मेन लाइन तलाश की और कुछ ही घण्टों में नल कनेक्शन कर दिया। ‘नागरिक’ पूरा भुगतान करने लगा तो ‘आदमी’ बोला - ‘मुझे पाँच सौ और इस हेल्पर को दो सौ दे दो। फिर आगे की बात बताता हूँ।’ ‘नागरिक’ ने आँख मूँदकर कहना माना।

अपनी मजदूरी लेकर ‘आदमी’ ने कहा - ‘अपने मोहल्ले के किसी आदमी से शिकायत करा दो कि तुमने अवैध नल कनेक्शन कर लिया है। शिकायत के दो दिन बाद नगर निगम चले जाना। अवैध नल कनेक्शन लेने का गुनाह कबूल करके कनेक्शन को वैध कराने की अर्जी दे देना। बत्तीस सौ रुपयों में कनेक्शन वैध हो जाएगा।’ ‘नागरिक’ ने अविश्वास से देखा तो ‘आदमी’ ने उसकी पीठ थपथपा कर भरोसा दिलाया।

‘नागरिक’ ने वैसा ही किया जैसा ‘आदमी’ ने बताया था। अपनी शिकायत करवाई और चौथे दिन नगर निगम पहुँच गया। अपना गुनाह कबूल किया। कनेक्शन को वैध कराने की अर्जी लगाई। थोड़ी लिखा-पढ़ी हुई। उससे बत्तीस सौ रुपये माँगे गए। ‘नागरिक’ ने फौरन दे दिए। हाथों-हाथ पूरी रकम की रसीद दे दी गई और उसका नल कनेक्शन वैध हो गया।

किस्सा यहीं खतम हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हुआ। 

बत्तीस सौ की रसीद घड़ी करके ‘नागरिक’ जेब में रखकर निकलने ही वाला था कि उसे ‘नेक सलाह’ दी गई - ‘एक अर्जी लिख दो कि तुम्हें यह कनेक्शन नहीं चाहिए। सील-ठप्पे लगवा कर अर्जी की पावती लो और  हर महीने के डेड़ सौ रुपये देना भूल जाओ। चैन की नींद सो जाओ।’ ‘नागरिक’ को बात समझ में नहीं आई। सलाहकार ने कहा - ‘अरे! तुम अर्जी दे जाओ। हमें कनेक्शन काटने की फुरसत नहीं। ठाठ से पानी वापरो और जब रकम वसूल करनेवाले आएँ तो अर्जी की, सील-ठप्पेवाली पावती बता देना। कहना कि तुमने तो कनेक्शन कटवा लिया। अब पैसा किस बात का?’

‘नागरिक’ की आँखें फट गई - ‘अरे बाप रे! ऐसा भी होता है?’ लेकिन ‘नागरिक’ बोला - ‘नहीं भैया! मुझे तो नल कनेक्शन चाहिए था। जो खर्चा बताया था उसके चालीस परसेण्ट में ही हो गया। यही बहुत है। पानी की चोरी नहीं करूँगा।’ और इस तरह अपने ‘नागरिक’ को नल कनेक्शन मिल गया। 

जैसे हमारे इस ‘नागरिक’ के दिन फिरे, वैसे सबके दिन फिरें।
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कमरे में दुनिया और बाजार में अकेलापन

कल शाम जब उपाध्यायजी से मिलने गया तब तक कल्पना भी नहीं थी कि मैं यह सब लिखूँगा। नहीं, ‘लिखूँगा’ कह कर ठीक नहीं कर रहा। यहाँ ‘लिखना पड़ेगा’ लिखना चाहिए था मैंने। अब दुरुस्त कर लेता हूँ - उपाध्यायजी से मिलने तक कल्पना भी नहीं थी कि यह सब लिखना पड़ेगा।

उपाध्यायजी याने डॉक्टर प्रोफेसर प्रकाश उपाध्याय। मेरे रतलाम की यशस्वी पहचानों में से एक। मृदुभाषी, सुरुचिसम्पन्न उपाध्यायजी जाने-माने साहित्यकार हैं। कबीर पर साधिकार बात करते हैं। मालवी लोक जीवन के गहरे जानकार। एक सरकारी कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। अच्छे-भले सामाजिक प्राणी हैं। कस्बे की अधिकांश गतिविधियों में उनकी मौजूदगी नजर आती है। घर-गृहस्थी के काम-काज निपटाते हुए यदा-कदा, आते-जाते दीख जाते हैं। जो भी देखता है, मान ही लेता है कि उपाध्यायजी उसे ही देखकर मुस्कुरा रहे हैं। मेरा उनसे नियमित मिलना तो नहीं होता किन्तु उनके बारे में इधर-उधर से जानकारी मिलती रहती है। उनसे मिलने का कोई मौका छोड़ता नहीं। उनसे मिलना और बतियाना सदैव ही सुखकर होता है। जब भी उनसे मिलता हूँ, समृद्ध होकर ही लौटता हूँ।

अभी, तीन दिन पहले, शनिवार को सुभाष भाई जैन के यहाँ बैठा था।  ओमजी (उपभोक्ता न्यायालय के नामित
न्यायाधीश) भी बैठे थे। बातों ही बातों में ओमजी ने बताया कि उपाध्यायजी की एंजियोप्लास्टी हुई है। सुनकर अच्छा नहीं लगा। साधु पुरुषों को ऐसी यन्त्रणा झेलनी पड़े, यह सूचना ही अपने आप में यन्त्रणादायी होती है। विश्वास नहीं हुआ। उपाध्यायजी की जिन्दगी सीधी लकीर की तरह है - नियमित, संयमित, अनुशासित। भला उन पर ईश्वर की यह कुदृष्टि क्यों? उसी क्षण तय किया कि जल्दी से जल्दी उपाध्यायजी से मिलना है।

कल, सोमवार की शाम को उनके घर पहुँच गया। पहले फोन कर दिया था। दरवाजा उपाध्यायजी ने ही खोला। बिलकुल सहज, सामान्य। सदैव की तरह ताजादम। चेहरे पर वही मोहिनी मुस्कान। रोग, पीड़ा की छोटी सी खरोंच भी चेहरे पर नहीं। लगा, ओमजी ने गलत जानकारी दे दी या फिर मैंने ही कुछ गलत सुन लिया।

मैं अधीर था। खुद को रोक नहीं पाया। बैठते-बैठते ही पूछ लिया - ‘सच्ची में आपकी एंजियोप्लास्टी हुई है?’ उपाध्यायजी की हँसी बिखर गई। बोले - ‘बैठिए तो! बताता हूँ।’ उसके बाद उपाध्यायजी ने जो कुछ सुनाया, उसी के कारण मुझे यह सब लिखना पड़ा।

उपाध्यायजी ने बताया, मई 2018 की एक शाम वे अपने स्कूटर पर बाजार जा रहे थे। एक नौजवान ने टक्कर मार दी। बाँये कन्धे में फ्रेक्चर हो गया। इलाज शुरु हुआ। उसी दौरान एक रात घबराहट हुई। सीधे सरकारी अस्पताल पहुँचे। वहाँ समाधान नहीं हुआ। एक निजी अस्पताल पहुँचे। वहाँ भी समाधान नहीं हुआ। डॉक्टर सुभेदार साहब के यहाँ पहुँचे। उन्होंने जल्दी से जल्दी इन्दौर जाने की सलाह दी। इन्दौर मेदान्ता में पहुँचे। जाँच का निष्कर्ष निकला - एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। दो स्टेण्ट लगाए। कुछ दिनों बाद रतलाम लौट आए। जिन्दगी पहले ही संयमित, नियमित थी। इसलिए डॉक्टर के निर्देश-पालन के लिए अतिरिक्त कुछ नहीं करना पड़ा। अब सब सामान्य है। ठीक-ठीक चल रहा है।

सुनकर तसल्ली तो हुई लेकिन यह सूचना मुझ तक पहुँचने में दस महीने लग गए! इसी बात ने मुझे विचार में डाल दिया। उपाध्यायजी घर-घुस्सू आदमी नहीं हैं। लोगों से मिलना-जुलना उन्हें अच्छा लगता है। किसी समागम में शामिल होने का, लोकाचार निभाने का मौका नहीं छोड़ते। रतलाम बहुत बड़ा कस्बा नहीं। अधिकाधिक पन्द्रह मिनिट में कस्बे के एक छोर से दूसरे छोर पर पहुँचा जा सकता है। मैं बीमा एजेण्ट हूँ। लगभग दिन भर घर से बाहर रहता हूँ। मुख्य बाजार हो या दूर-दराज का मुहल्ला, कस्बे के हर हिस्से में मेरा आना-जाना होता ही है। रोज ही दस-बीस लोगों से मिलता हूँ। कई लोग ऐसे हैं जो मेरे और उपाध्यायजी के सम्पर्क क्षेत्र में समान (कॉमन) हैं। लेकिन उपाध्यायजी की यह जानकारी मुझे कहीं नहीं मिली! इसी बात ने मुझे चौंकाया और विचार में डाल दिया।

हम कहाँ आ गए हैं? क्या हो गए हैं? उपाध्यायजी के और मेरे, समान (कॉमन) परिचितों से बात करते हुए हमने कभी किसी अपनेवाले के बारे में बात करने की जरूरत ही अनुभव नहीं की! अपनी और अपने काम की बातें करते रहे! अपने मतलब तक ही सिमटे रहे! हमारी बातों में किसी तीसरे, ‘अपनेवाले’ का जिक्र आया ही नहीं! इण्टरनेट ने हमें, अपने घर में बैठे, बन्द कमरे में होते हुए भी सारी दुनिया से जोड़ दिया लेकिन घर से बाहर, दुनिया के बीच बैठकर भी हम अपने आप में ही रहने लगे! दुनिया अंगुलियों की पोरों पर आ सिमटी है। कोई भी सूचना हो, कुछ ही पलों में हर-एक के पास पहुँच जाती है। लेकिन उपाध्यायजी की यह सूचना, गाँव की गाँव में मुझ तक दस महीनों में पहुँची! यह एकान्त हमने बुना या हम अनायास ही इस एकान्त के शिकार हो गए?

उपाध्यायजी से मिल कर लौटे हुए मुझे लगभग सोलह घण्टे हो गए हैं। लेकिन यह विचार पीछा नहीं छोड़ रहा। इस समय भी, जब मैं यह सब लिखने को विवश हुआ और लिख चुका।
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एक आदमी के दो एड्रेस प्रूफ दीजिए

यह ‘बाबू राज’ का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसकी शिकायत भी नहीं की जा सकती क्योंकि सुननेवाला कोई नहीं है।

मामला भारत सरकार के एक उपक्रम के कार्यालय का है। इसके एक आवेदन में, आवेदक को दो पते देने की व्यावहारिक सुविधा उपलब्ध कराई गई है - एक पता पत्राचार का और दूसरा पता स्थायी या आवासीय पता। जाहिर है, आवेदन फार्म का प्ररूप बनाते समय यह व्यावहारिक सुविचार सामने आया होगा कि कोई आदमी रहता कहीं और होगा और काम कहीं और करता होगा। मुझे यह प्रावधान सराहनीय लगा। 

सरकार ने डाक विभाग को दयनीय दशा में ला खड़ा कर दिया है। किसी भी शहर में डाकियों के पूरे पदों पर भर्ती नहीं है। मेरे रतलाम में ही कई डाकियों को दो-दो, तीन-तीन बीटों की जिम्मेदारी दी हुई है। ऐसे में वे चाह कर भी अपना रोज का काम रोज पूरा नहीं कर पाते। सब तरह के लोग सब जगह होते हैं। कस्बे के बाहरी इलाके के कुछ डाकिए सप्ताह में एके दिन डाक बाँटते हैं। ऐसे में, उक्त प्रावधान लोगों को अत्यधिक अनुकूल और सुविधाजनक है। कस्बे के बाहरी इलाकों में रहनेवाले लोग अपने काम-काजी स्थल का पता दे कर अपनी चिट्ठियाँ प्राप्त करने की सुनिश्चितता हासिल कर सकते हैं। 

लेकिन इस दफ्तर के बाबू ने इस सराहनीय भावना और व्यवस्था की ऐसी-तैसी कर रखी है। उसका कहना है कि आवेदक जो भी पता देना चाहे, खुशी-खुशी दे। लेकिन आवेदक को ऐसे प्रत्येक पते का दस्तावेजी प्रमाण देना पड़ेगा। उदाहरण के लिए मैं यदि अपना पत्राचार का पता बाजार में अपनी बैठकवाले किसी व्यापारिक संस्थान का देना चाहूँ तो मुझे अपने उस पते का दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ेगा। ऐसा कर पाना मेरे लिए सम्भव ही नहीं। मेरे आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, ड्रायविंग लायसेंस, पासपोर्ट आदि में मेरा स्थायी आवासीय पता अंकित है। बाजार में स्थित मेरे मित्र के व्यापारिक संस्थान पर तो मेरी बैठक है जहाँ प्रतिदिन डाक वितरित होती ही है। जबकि, मेरे आवासीय इलाके का डाकिया कभी-कभी (दूसरी बीट की डाक निपटाने के कारण) मजबूरी में गैरहाजिर रह जाता है।

भारत सरकार के उपक्रम का यह बाबू इन सारी बातों को व्यक्तिशः तो मानता और कबूल करता है। लेकिन आवेदन को आगे बढ़ाने के मामले में अड़ जाता है। बड़ी ही विनम्रता से कहता है - ‘मैं पता लिखने से मना तो तो नहीं कर रहा ना? लेकिन मैं तो सरक्यूलर से बँधा हुआ हूँ जो कहता है कि मैं वही पता लिखूँ जिसका दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध कराया गया है। आप सरक्यूलर देख लो।’ वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं। उसे समझाने की कोशिश की - ‘भाई मेरे! प्ररूप की भावना को समझने की कोशिश करो। एक आदमी के दो-दो पतों के दस्तावेज कैसे हो सकते हैं? स्थायी पते का दस्तावेजी सबूत दे तो रहे हैं! पत्राचार के पते का दस्तावेजी प्रमाण कैसे जुटाया जा सकता है?’ बड़ी विनम्रमा से बाबू जवाब देता है - ‘देखो सा‘ब! मैं तो सरक्यूलर से बँधा हुआ हूँ। आप सरक्यूलर अमेण्ड करवा दो। आपका काम भी हो जाएगा और मेरा भी।’

ऐसे में, इस दफ्तर के इस आवेदन में लोगों को दोनों ही जगह एक ही पता लिखना पड़ रहा है। सरक्यूलर को अमेण्ड करवाने के मुकाबले यह बहुत-बहुत आसान है। सरकार अव्वल तो लोगों की सुविधा का ध्यान रखती नहीं। गलती से यदि रख भी लिया तो ‘बाबू’ उसकी ऐसी-तैसी कर देता है। 

यही ऐसी-तैसी यहाँ हो रही है।
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बात जरूर कर, लेकिन ‘यूँ ही’ मत कर

रतलाम में होता हूँ तो अखबार पढ़ने का मन नहीं होता। लेकिन जब इन्दौर में होता हूँ तो अखबार की तलाश रहती है। काम-धाम कुछ रहता नहीं। फुरसत ही फुरसत रहती है। वहाँ अखबार मुश्किल से मिल पाता है। दो-तीन दिनों के लिए जाता हूँ। बन्दी के अखबार बाँटनेवाले हॉकर के पास अतिरिक्त प्रतियाँ नहीं होतीं। रिंग रोड़ पर सिन्धिया प्रतिमा चौराहे पर अखबारवाला आता तो है लेकिन अपने मन का राजा है। उसके बाद अखबार मिलता है ठेठ पलासिया चौराहे पर। इतनी दूर कौन जाए? इसलिए, सुबह-सुबह सड़क पर आ खड़ा होता हूँ। इस उम्मीद से कि कभी, कोई हॉकर महरबान हो जाए। 

इसी ‘कृपाकांक्षा’ में परसों, मंगलवार की सुबह कनाड़िया मार्ग पर आ खड़ा हुआ। सामनेवाली मल्टी के नीचेवाली होटल की सर्विस रोड़ के लिए बनी दो-फुटी दीवाल पर टिक गया। सात बज रहे हैं। होटल खुली नहीं है। एक ऑटो खड़ा है। दो सज्जन बैठे हुए हैं। बतिया रहे हैं। कड़ाके की सर्दी है - तापमान सात डिग्री। मैं उनकी बातें सुनने लगता हूँ। अपनी तरफ मेरा ध्यान देखकर वे अपनी बातों का सिलसिला तोड़ देते हैं। पूछते हैं - ‘कहीं बाहर से आए हैं? नए लगते हैं। पहले कभी नजर नहीं आए।!’ मैं अपना परिचय देता हूँ और वहाँ बैठने का मकसद बताता हूँ। एक कहता है - ‘आपको अखबार शायद ही मिले। लेकिन थोड़ी देर राह देख लीजिए। पाँच-सात रुपयों के लालच में कोई हॉकर किसी बन्दी वाले का अखबार आपको दे-दे।’ मैं मौन मुस्कुराहट से जवाब दे देता हूँ। उनकी बातों का टूटा सिलसिला जुड़ जाता है -

‘बहू को अच्छी नहीं लगी कैलाश की बात।’

‘कौन सी बात?’

‘वही! प्रियंका को चिकना चेहरा कहनेवाली बात।’

‘हाँ। वो तो अच्छा नहीं किया कैलाश ने। ऐसा नहीं कहना चाहिए था। शोभा नहीं देता। लेकिन सज्जन ने भी तो वही किया! उसे क्या जरूरत थी जवाब देने की? चुप रह जाता!’

‘हाँ। सज्जन ने भी घटियापन का जवाब घटियापन से दिया।’
‘हाँ। पता नहीं इन लोगों को क्या हो गया है! इन्हें न तो अपनी इमेज की चिन्ता है न अपनी पार्टी की इमेज की। पता नहीं, इनकी ऐसी बातें सुन कर इनके टीचर लोग क्या सोचते होंगे!?’

‘क्या सोचते होंगे! अपना माथा कूटते होंगे। यही पढ़ाया हमने इनको? पता नहीं राजनीति में आते ही इन लोगों को क्या हो जाता है!’

‘ऐसी बातों से ही लोग राजनीति को गन्दी मानते हैं।’

‘हाँ। राजनीति के कारण ही सज्जन बोला होगा। सोचा होगा, चुप रह जाऊँगा तो लोग बेवकूफ समझेंगे।’

‘हो सकता है। लेकिन बोल कर बेवकूफ साबित होने से तो अच्छा है कि चुप रह बेवकूफ साबित हुआ जाए। बेवकूफी का जवाब बेवकूफी नहीं होता।’

सन्दर्भ मुझे समझ में आ जाता है। कैलाश याने कैलाश विजयवर्गीय और सज्जन याने मध्य प्रदेश सरकार के मन्त्री सज्जन सिंह वर्मा। हमारे राज नेता भाषा की शालीनता से दूरी बढ़ाने की प्रतियोगिता करते नजर आ रहे हैं। उन्हें रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं। लेकिन यह वार्तालाप सुनकर मेरी सुबह अच्छी हो गई - लोग हमारे नेताओं पर न केवल नजरें बनाए हुए हैं बल्कि उनकी भाषा पर भी ध्यान दे रहे हैं। आज अकेले में बात कर रहे हैं, कल मुँह पर बोलेंगे। बात निकलती है तो दूर तलक जाती ही है। बेवकूफी का जवाब बेवकूफी नहीं होता। खून के दाग खून से नहीं धोए जा सकते।

अब तक एक भी हॉकर इधर से नहीं निकला है। वे दोनों खड़े होते हैं। मुझे सलाह देते हैं - ‘अच्छा होगा कि आप माधव राव के पुतलेवाले चौराहे पर चले जाओ।’ उनके साथ-साथ मैं भी उठ जाता हूँ। 

रिंग रोड़ चौराहे पर खूब भीड़ है। बॉम्बे हास्पिटल की ओर से आ रहा एक ट्रक उलट गया है। नुकसान तो कुछ नहीं हुआ लेकिन यातायात अस्तव्यस्त हो गया है। जाम लगा हुआ है। शीत लहर के कारण कलेक्टर ने स्कूलों की छुट्टी कर दी है। स्कूलों के वाहन गलती से ही नजर आ रहे हैं। उद्यमों/संस्थानों के वाहन सड़कों पर हैं। उनके कर्मचारी अपने-अपने वाहन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सबको जल्दी है। ट्रेफिक पुलिस के दो जवान और तीन-चार समाजसेवी मिलकर ट्रेफिक क्लीयर करने में लगे हुए हैं। लोग उनकी परवाह नहीं कर रहे हैं। जिसे, जहाँ गुंजाइश मिल रही है, अपना वाहन घुसेड़ रहा है। ऐसा करने में खुद की और सबकी मुश्किलें बढ़ रही है। अखबारवाला नहीं आया है।एक ऑटो वाला कहता है - ‘अब नहीं आएगा। आना होता तो आ गया होता।’ मैं अपने मुकाम की ओर चल पड़ता हूँ। दारू की दुकान से दो दुकान आगेवाली होटल के सामने, दो लोग सड़क पर खड़े-खड़े चाय पीते हुए, दीन-दुनिया से बेपरवाह बातें कर रहे हैं। इस तरह कि रास्ते चलते आदमी को बिना कोशिश के ही सुनाई दे जाए। लगता है, दोनों एक ही संस्थान में काम करते हैं और कम्पनी के वाहन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दोनों समवय हैं। चालीस-पैंतालीस के आसपास। मुखमुद्रा और बेलौसपन से एक झटके में समझ पड़ जाती है कि गम्भीर बिलकुल नहीं हैं। वक्तकटी की चुहलबाजी कर रहे हैं -

‘तुम स्साले काँग्रेसियों को उस एक खानदान के सिवाय और कुछ नजर नहीं आता। अपने घर के हीरों की न तो परख करते हो न ही पूछताछ। ये तो हम हैं जो बड़ा दिल करके तुम्हारेवालों को सम्मानित कर देते हैं। हिम्मत चाहिए इसके लिए। तुम सब तो मम्मी से डरते हो।’

तू कभी नहीं सुधरेगा! तेरे आका इतने भले नहीं है कि बिना किसी लालच के किसी के गले में माला डाल दे। इतने भले होते तो आडवाणी और जोशी की ये दुर्गत न करते। लोकसभा चुनाव में सीटों का घाटा पूरा करना है। इसलिए बंगालियों को खुश करने के लिए प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न दे दिया। लेकिन ये चाल उल्टी न पड़ जाए। जानता है प्रणव मुखर्जी कौन है? इन्दिरा गाँधी ने जो इमरजेन्सी लगाई थी, उसका ब्लाइण्ड सपोर्टर था! उस समय, उसकी केबिनेट में मिनिस्टर था। इन्दिरा की इमरजेन्सी का विरोध और इमरजेन्सी का समर्थन करनेवाले को भारत-रत्न! तेरे आकाओं ने ये भी नहीं सोचा कि उन्होंने इमरजेन्सी का समर्थन कर दिया है। अब किस मुँह से इमरजेन्सी को क्रिटिसाइज करेंगे? और अभी जो कमलनाथ ने मीसा बन्दियों की पेंशन खत्म करने का जो आर्डर जारी किया है, उसका विरोध किस मुँह से करोगे? मुँह उठाकर कुछ तो भी बोल देते हो! कुछ अक्कल-वक्कल है के नहीं?’

‘अरे! तू तो सीरीयस हो गया यार! कहाँ तो तू राहुल को पप्पू कहता है और कहाँ ऐसी बातें कर रहा है?’

‘तेने हरकत ही ऐसी की! मैं तो जानता हूँ कि मुझे राहुल और सोनिया रोटी नहीं देते। लेकिन तू तो ऐसे बातें करता है जैसे मोदी केवल तेरे भरोसे, तेरे दम पे पीएम बना हुआ है और वहीं से तेरा टिप्पन आता है! अरे भई! जब पढ़े-लिखे लोग भी ऐसी बातें करेंगे तो सबका भट्टा बैठेगा नहीं तो और क्या होगा? ईमानदारी से अपना काम करो। सही को सही और गलत को गलत कहो।’

‘सॉरी-सॉरी यार! तू सही कह रहा है। मैंने तो यूँ ही बात-बात में बात कर दी थी। दिल पे मत ले।’

‘बात-बात में बात तो जरूर कर लेकिन यूँ ही मत कर। पढ़ा-लिखा, समझदार, एक बच्चे का बाप है। जिम्मेदारी से बात किया कर।’ उसे कोई जवाब मिलता उससे पहले ही उनकी बस आ गई। 

वे दोनों चले गए। अब मुझे अखबार की जरूरत नहीं रह गई थी। जाते-जाते वह अनजान आदमी सूत्र दे गया - ‘बात जरूर कर लेकिन यूँ ही मत कर। जिम्मेदारी से किया कर।’ क्या यह सूत्र मुझ अकेले के लिए है?
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 31 जनवरी 2019